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  • चेन्नई के दूसरे एयरपोर्ट पर विजय सरकार का बड़ा फैसला, DMK ने विधानसभा में जानकारी को लेकर उठाए गंभीर सवाल

    चेन्नई के दूसरे एयरपोर्ट पर विजय सरकार का बड़ा फैसला, DMK ने विधानसभा में जानकारी को लेकर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली ।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने सोमवार को विधानसभा में चेन्नई के पास परंदूर में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट परियोजना को रद्द करने की घोषणा की। इस फैसले के साथ चेन्नई में दूसरे हवाई अड्डे के निर्माण की योजना फिलहाल रोक दी गई है। सरकार के निर्णय के बाद राज्य की राजनीति में इस परियोजना को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विपक्षी दल डीएमके ने विजय सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए परियोजना से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करने की मांग की है।

    मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में कहा कि चेन्नई का मौजूदा मीनमबक्कम हवाई अड्डा वर्तमान में यात्रियों की जरूरतों को संभालने की क्षमता रखता है। उनके मुताबिक शहर की मौजूदा जरूरतों को देखते हुए अभी नए हवाई अड्डे की तत्काल आवश्यकता नहीं है। उन्होंने औद्योगिक विकास और कार्गो परिवहन से जुड़ी भविष्य की जरूरतों का भी उल्लेख किया।

    विजय ने कहा कि यदि आने वाले समय में चेन्नई के लिए नए हवाई अड्डे की जरूरत महसूस होती है तो उसके लिए ऐसी जगह का चयन किया जाना चाहिए, जहां कृषि भूमि और रिहायशी इलाकों पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। सरकार के इस रुख को परंदूर परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    चेन्नई से करीब 70 किलोमीटर दूर परंदूर में प्रस्तावित एयरपोर्ट परियोजना का स्थानीय स्तर पर लंबे समय से विरोध होता रहा था। स्थानीय लोगों और किसानों की ओर से बहुफसली उपजाऊ कृषि भूमि के संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई गई थी। इसके अलावा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव और परियोजना के कारण प्रभावित होने वाले इलाकों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

    मुख्यमंत्री विजय विधानसभा चुनाव से पहले भी परंदूर एयरपोर्ट परियोजना के विरोध में स्थानीय लोगों और किसानों के साथ खड़े दिखाई दिए थे। उन्होंने इस मुद्दे को लेकर अभियान चलाया था। अब सत्ता में आने के बाद परियोजना को रद्द करने की घोषणा को उनके पहले के राजनीतिक रुख से जोड़कर देखा जा रहा है।

    हालांकि, परियोजना रद्द किए जाने के बाद विवाद खत्म होने के बजाय राजनीतिक रूप से और तेज हो गया है। डीएमके ने विजय सरकार से मांग की है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई परंदूर एयरपोर्ट परियोजना से संबंधित सभी फाइलें सार्वजनिक की जाएं। विपक्ष का कहना है कि दस्तावेज सामने आने से परियोजना की पूरी प्रक्रिया और उससे जुड़े निर्णयों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

    डीएमके ने सरकार को इसके लिए एक सप्ताह का समय देने की बात कही है। विपक्ष के अनुसार यदि निर्धारित अवधि में फाइलें सार्वजनिक नहीं की गईं तो विधानसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने पर विचार किया जाएगा। डीएमके ने यह भी आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ने विधानसभा में परियोजना से संबंधित जानकारी सही तरीके से प्रस्तुत नहीं की।

    इस बीच, चेन्नई की भविष्य की हवाई परिवहन जरूरतों को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। सरकार का कहना है कि मौजूदा हवाई अड्डे की क्षमता फिलहाल पर्याप्त है, जबकि भविष्य में आवश्यकता बढ़ने पर कम प्रभावित क्षेत्र में नई परियोजना पर विचार किया जा सकता है।

    परंदूर परियोजना को रद्द करने का फैसला विकास, पर्यावरण और कृषि भूमि के संरक्षण के बीच संतुलन से जुड़े सवालों को भी सामने लाता है। अब इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच आगे की राजनीतिक बहस विधानसभा में देखने को मिल सकती है। डीएमके की ओर से दिए गए एक सप्ताह के अल्टीमेटम के बाद परियोजना की फाइलें सार्वजनिक करने और सरकार के फैसले पर स्पष्टीकरण देने को लेकर विजय सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है।

  • परिसीमन बिल पर सरकार को एक विपक्षी दल का मिल सकता है साथ, द्रमुक का बदल रहा मूड

    परिसीमन बिल पर सरकार को एक विपक्षी दल का मिल सकता है साथ, द्रमुक का बदल रहा मूड


    नई दिल्ली।
    तमिलनाडु (Tamil Nadu) में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बाद केंद्र के परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर द्रमुक के रुख में भी बदलाव दिख रहा है। राज्य में चुनाव से पहले इस बिल का खुला विरोध कर रही द्रमुक अब कह रही है कि विधेयक के प्रावधानों को देखने के बाद इसके समर्थन करने या नहीं करने का फैसला लिया जाएगा।

    सूत्रों का कहना है उसके इस रुख का मतलब है कि यदि बिल में यह प्रावधान होता है कि राज्यों में विधानसभा की मौजूदा सीटों की संख्या में समान रूप से 50% की वृद्धि होगी तो द्रमुक समर्थन देने के लिए तैयार हो सकती है। अप्रैल में जो बिल सरकार ने पेश किया था, तब ऐसी बात कही गई थी लेकिन यह विधेयक में नहीं थी। वह विधेयक पारित नहीं हो पाया था।


    पहले विरोध में थी DMK

    सरकार पिछले सत्र में जब यह बिल लाई थी तो द्रमुक ने इसका खुलकर विरोध किया था और इसे तमिलनाडु के हितों के खिलाफ बताया था। तब विधेयक के प्रावधानों की बात पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। सूत्रों का कहना है कि द्रमुक के दबाव में ही तब इंडिया गठबंधन ने इस विधेयक का विरोध किया था। तब सरकार को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने वाली कांग्रेस इस विधेयक का विरोध करेगी। द्रमुक के वरिष्ठ नेता त्रिरुचि शिवा ने कहा कि जो रुख पहले था, वह अब नहीं है। अब हम कह रहे हैं कि पहले विधेयक का प्रारूप सामने हो, उसके बाद निर्णय करेंगे।

    द्रमुक के लोकसभा में 22 सदस्य हैं जो सरकार को दो तिहाई बहुमत से इस विधेयक को पारित कराने में अहम साबित हो सकते हैं। इस बिल को पारित करने के लिए सरकार को लोकसभा में 360 सांसदों का समर्थन चाहिए। अभी तक एनडीए के पास 326 तक की संख्या हुई है। बता दें कि इससे पूर्व कांग्रेस के टीवीके सरकार को समर्थन देने के मुद्दे पर नाराज द्रमुक इंडिया गठबंधन से अलग हो चुका है। ऐसे में सत्ता पक्ष की उम्मीदें उससे बढ़ी हैं।


    विशेष सत्र बुलाने का प्रस्ताव नहीं

    संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने बुधवार रात कहा कि महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर 16 से 18 अगस्त के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार मौजूदा मॉनसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की नए सिरे से कोशिश कर रही है। इस विधेयक का मकसद 2029 में लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करना है।

    कुछ राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि स्वतंत्रता दिवस के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन विधेयक और महिला आरक्षण संशोधन विधेयक फिर से पेश किए जा सकते हैं। इस बारे में पूछे जाने पर रीजीजू ने विशेष सत्र के किसी भी प्रस्ताव से इनकार किया।

  • तृषा से जुड़े कथित बयान पर बढ़ा विवाद, शिकायत के बाद उदयनिधि स्टालिन पर कार्रवाई, आरोपों से किया इनकार

    तृषा से जुड़े कथित बयान पर बढ़ा विवाद, शिकायत के बाद उदयनिधि स्टालिन पर कार्रवाई, आरोपों से किया इनकार


    नई दिल्ली ।
    तमिलनाडु की राजनीति में मंगलवार को उस समय हलचल तेज हो गई जब डीएमके नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन को एक कथित विवादित बयान के मामले में पुलिस ने हिरासत में ले लिया। अभिनेत्री तृषा से जुड़ी कथित टिप्पणी को लेकर दर्ज शिकायत के बाद यह कार्रवाई की गई। मामले के सामने आने के बाद राज्य की राजनीति के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

    पुलिस कार्रवाई के बाद उदयनिधि स्टालिन ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि उनके भाषण को वास्तविक संदर्भ से हटाकर संपादित किया गया और सोशल मीडिया पर भ्रामक तरीके से प्रसारित किया गया। उनके अनुसार उन्होंने किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं की थी और पूरे मामले को राजनीतिक रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है।

    उदयनिधि ने कहा कि उनके भाषण के कुछ हिस्सों को “कट, कॉपी और पेस्ट” कर अलग अर्थ देने की कोशिश की गई है। उनका कहना है कि उन्होंने किसी का अपमान करने की मंशा से कोई टिप्पणी नहीं की और यदि पूरा भाषण देखा जाए तो वास्तविक संदर्भ स्पष्ट हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया का पूरा सम्मान करेंगे और मामले का जवाब कानून के दायरे में देंगे।

    यह विवाद एक सार्वजनिक सभा के दौरान दिए गए उनके संबोधन से जुड़ा बताया जा रहा है। सभा के दौरान मौजूद लोगों के एक समूह ने अभिनेत्री तृषा का नाम लेकर नारे लगाए थे। इसके बाद उदयनिधि द्वारा कही गई एक टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हो गया। सोशल मीडिया पर उस बयान के विभिन्न वीडियो क्लिप वायरल हुए, जिसके बाद इस पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं।

    विवाद बढ़ने के बाद अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम की महिला इकाई ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी महिलाओं के सम्मान के खिलाफ है और अभिनेत्री तृषा को लेकर आपत्तिजनक संकेत देती है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने संबंधित कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू की।

    मामले ने राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर मनोरंजन जगत का भी ध्यान आकर्षित किया। गायिका चिन्मयी श्रीपादा और अभिनेत्री तथा राजनेता खुशबू सुंदर ने सार्वजनिक रूप से इस कथित बयान की आलोचना की। उनका कहना था कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े नेताओं को महिलाओं के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करना चाहिए और किसी भी प्रकार की विवादित टिप्पणी से बचना चाहिए।

    हालांकि उदयनिधि स्टालिन लगातार यह दोहरा रहे हैं कि उनके बयान की गलत व्याख्या की गई है। उनका कहना है कि पूरा भाषण देखने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि वायरल किए गए वीडियो और वास्तविक संदर्भ में अंतर है। उन्होंने अपने समर्थकों से भी अपील की कि वे अफवाहों पर विश्वास करने के बजाय पूरे तथ्य सामने आने का इंतजार करें।

    फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। वहीं यह विवाद तमिलनाडु की राजनीति में नया मुद्दा बन गया है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है। आने वाले दिनों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर इस मामले की आगे की दिशा तय होगी।

  • राष्ट्रीय मुद्दों पर DMK को साथ लाने की कवायद तेज, TVK-कांग्रेस समीकरण के बीच विपक्षी एकता की राह बनी चुनौतीपूर्ण

    राष्ट्रीय मुद्दों पर DMK को साथ लाने की कवायद तेज, TVK-कांग्रेस समीकरण के बीच विपक्षी एकता की राह बनी चुनौतीपूर्ण


    नई दिल्ली ।
    संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी दलों के बीच नए समीकरणों की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। विशेष रूप से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) और कांग्रेस के बीच संभावित राजनीतिक सहयोग को लेकर विभिन्न नेताओं के बयान सामने आए हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा कोई भी समझौता आसान नहीं होगा, क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में हाल के घटनाक्रमों ने प्रमुख दलों के बीच विश्वास की दूरी बढ़ा दी है।

    लोकसभा के मानसून सत्र से पहले विपक्षी दल सरकार की संभावित रणनीति पर नजर बनाए हुए हैं। विपक्ष का मानना है कि कुछ महत्वपूर्ण विधायी प्रस्तावों पर सरकार दोबारा प्रयास कर सकती है। ऐसे में विपक्षी एकजुटता बनाए रखना उसकी प्राथमिकता बन गई है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर DMK की भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ी है और कई विपक्षी नेताओं ने उसे साझा मुद्दों पर साथ आने की आवश्यकता बताई है।

    तमिलनाडु की राजनीति में हाल के महीनों में हुए बदलावों ने राजनीतिक समीकरणों को काफी प्रभावित किया है। कांग्रेस और वीसीके के TVK के साथ जाने के बाद DMK ने इसे अपने साथ राजनीतिक प्रतिबद्धता के उल्लंघन के रूप में देखा। इसके बाद दोनों दलों के संबंधों में तनाव बढ़ा और राष्ट्रीय स्तर पर भी उनके बीच पहले जैसी सहजता दिखाई नहीं दी। यही कारण है कि संभावित सहयोग की चर्चाओं के बावजूद व्यावहारिक स्तर पर कई चुनौतियां बनी हुई हैं।

    कुछ विपक्षी नेताओं का मानना है कि विचारधारात्मक मुद्दों पर मतभेदों से ऊपर उठकर साझा राष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग संभव है। उनका तर्क है कि संसद के भीतर संविधान, संघीय ढांचे और अन्य राष्ट्रीय विषयों पर समान दृष्टिकोण रखने वाले दलों को साथ मिलकर रणनीति बनानी चाहिए। इसी सोच के तहत कई नेताओं ने DMK को विपक्षी बैठकों में फिर से शामिल करने की वकालत की है।

    कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों पर संवाद और सहयोग की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। उनका कहना है कि अतीत में कई महत्वपूर्ण संसदीय विषयों पर विभिन्न विपक्षी दलों ने एकजुट होकर अपनी भूमिका निभाई थी और भविष्य में भी आवश्यकता पड़ने पर ऐसा सहयोग संभव है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राज्य स्तर की राजनीतिक परिस्थितियां और गठबंधन की वास्तविकताएं इस प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं।

    दूसरी ओर, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि DMK की ओर से अभी तक इस प्रकार के प्रस्तावों पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में केवल अन्य दलों की ओर से दिए गए बयानों के आधार पर किसी संभावित गठबंधन की संभावना तय करना जल्दबाजी होगी। आने वाले दिनों में दलों की आधिकारिक रणनीति और नेतृत्व स्तर पर होने वाली बातचीत से स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि संसद के मानसून सत्र से पहले विपक्ष अपने भीतर अधिकतम समन्वय बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि तमिलनाडु की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां इस प्रयास की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में किसी प्रकार का साझा मंच तैयार होता है, तो उसके लिए सबसे पहले आपसी विश्वास बहाल करना और हाल के मतभेदों को दूर करना आवश्यक होगा। इसी आधार पर आगे की राजनीतिक दिशा और विपक्षी एकता की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।

  • 'मुख्यमंत्री के कामकाज में अदालत दखल नहीं दे सकती', करूर हादसे पर विजय के दौरे के खिलाफ डीएमके की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

    'मुख्यमंत्री के कामकाज में अदालत दखल नहीं दे सकती', करूर हादसे पर विजय के दौरे के खिलाफ डीएमके की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के करूर भगदड़ मामले से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री विजय को पीड़ित परिवारों से मिलने तथा मुआवजा और नियुक्ति पत्र वितरित करने से रोकने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मुख्यमंत्री के प्रशासनिक या सार्वजनिक कार्यक्रमों का निर्धारण करना न्यायालय का कार्य नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनीतिक मतभेदों को अदालत के माध्यम से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और राजनीतिक मंचों पर सुलझाया जाना चाहिए।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता पक्ष से कहा कि अदालत को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि यदि किसी राजनीतिक दल या सरकार के नेता किसी मुद्दे पर सार्वजनिक बयान देते हैं, तो विपक्ष भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है। न्यायालय ने इस प्रकार के विवादों में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया।

    यह मामला पिछले वर्ष करूर में आयोजित एक राजनीतिक रैली के दौरान हुई भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई थी। घटना के बाद राज्य में व्यापक चर्चा हुई और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। प्रारंभिक स्तर पर जांच विशेष जांच दल को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी गई। मामले की निगरानी भी न्यायिक व्यवस्था के तहत गठित समिति द्वारा की जा रही है, जिससे जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।

    मुख्यमंत्री विजय ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों से मुलाकात करने और प्रत्येक प्रभावित परिवार को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की घोषणा की है। इसके अलावा पात्र परिवारों को सरकारी नौकरी से संबंधित नियुक्ति पत्र भी दिए जाने की योजना है। इसी प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया कि इससे चल रही जांच प्रभावित हो सकती है।

    याचिका में यह भी कहा गया था कि पीड़ित परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया जांच पर असर डाल सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि अदालत किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रमों या प्रशासनिक निर्णयों पर इस प्रकार का निर्देश जारी नहीं कर सकती। न्यायालय का मानना था कि जब जांच पहले से स्वतंत्र एजेंसी की निगरानी में चल रही है, तब केवल आशंका के आधार पर किसी कार्यक्रम पर रोक लगाने का औचित्य नहीं बनता।

    इस फैसले को राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि करूर हादसा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार पीड़ित परिवारों को राहत और सहायता उपलब्ध कराने की बात कह रही है, वहीं विपक्ष जांच की निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब मुख्यमंत्री विजय के निर्धारित कार्यक्रम का रास्ता साफ हो गया है और वे पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर सहायता राशि तथा अन्य घोषित लाभ प्रदान कर सकेंगे। वहीं, हादसे की जांच अपनी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ती रहेगी और संबंधित एजेंसियां मामले के सभी पहलुओं की जांच जारी रखेंगी।

  • 'सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक लड़ाई का मंच नहीं'-करूर मामले में डीएमके को झटका, मुख्यमंत्री विजय की यात्रा पर रोक लगाने से इनकार

    'सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक लड़ाई का मंच नहीं'-करूर मामले में डीएमके को झटका, मुख्यमंत्री विजय की यात्रा पर रोक लगाने से इनकार

    नई दिल्ली । करूर भगदड़ मामले से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय को राहत देते हुए उनकी प्रस्तावित करूर यात्रा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने इस मामले में दायर याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं बन सकती और राजनीतिक दलों को अपने मतभेद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाने चाहिए।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी मुख्यमंत्री की सार्वजनिक गतिविधियों या पीड़ित परिवारों से मिलने जैसे कार्यक्रमों में हस्तक्षेप करना न्यायालय का कार्यक्षेत्र नहीं है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित मामले की प्राथमिकी में मुख्यमंत्री विजय का नाम आरोपी के रूप में दर्ज नहीं है, इसलिए केवल आशंकाओं के आधार पर उनकी यात्रा पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता।

    मुख्यमंत्री विजय करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों से मुलाकात करने तथा प्रभावित परिवारों के लिए आर्थिक सहायता और अन्य राहत उपायों की घोषणा करने वाले हैं। इसी प्रस्तावित दौरे को लेकर आपत्ति जताते हुए याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस तरह की गतिविधियों से मामले की निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती है।

    अदालत ने इस दलील पर असहमति जताते हुए कहा कि यदि किसी राजनीतिक दल को अपने प्रतिद्वंद्वी के बयानों या कार्यक्रमों पर आपत्ति है तो उसका जवाब राजनीतिक मंच पर दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक विवादों को अदालत में लाने की प्रवृत्ति उचित नहीं है और इससे न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि करूर भगदड़ मामले की जांच पहले से ही स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से आगे बढ़ रही है। ऐसे में जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने संबंधी किसी भी आरोप का मूल्यांकन तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, न कि राजनीतिक आशंकाओं के आधार पर। अदालत ने संकेत दिया कि जांच एजेंसियां अपने दायित्वों का निर्वहन स्वतंत्र रूप से करेंगी।

    इस मामले में पहले से जांच की निगरानी के लिए न्यायिक व्यवस्था लागू है, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि जब जांच निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार चल रही है, तब केवल राजनीतिक मतभेदों के आधार पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

    सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को राजनीतिक मामलों में न्यायिक संयम का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने दोहराया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान न्यायालय के बजाय सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। इस फैसले के बाद मुख्यमंत्री विजय का करूर दौरा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार होने का रास्ता साफ हो गया है, जबकि करूर भगदड़ मामले की जांच अपनी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी रहेगी।

  • करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची DMK, सीएम विजय और मंत्रियों की बयानबाजी पर रोक की मांग, CBI जांच की निष्पक्षता पर उठाए गंभीर सवाल

    करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची DMK, सीएम विजय और मंत्रियों की बयानबाजी पर रोक की मांग, CBI जांच की निष्पक्षता पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के बहुचर्चित करूर भगदड़ मामले में एक नया कानूनी मोड़ सामने आया है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए मामले में खुद को पक्षकार बनाए जाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि मुख्यमंत्री थलपति विजय, उनके मंत्रियों और अन्य आरोपियों की सार्वजनिक बयानबाजी से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। याचिका में अदालत से आग्रह किया गया है कि जांच पूरी होने तक संबंधित पक्षों को मामले पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से रोका जाए।

    करूर में 27 सितंबर 2025 को एक राजनीतिक जनसभा के दौरान मची भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 142 लोग घायल हुए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2025 को इसकी जांच CBI को सौंप दी थी। जांच की निगरानी पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति कर रही है, ताकि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहे।

    DMK के संगठन सचिव आर.एस. भारती की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि जांच के दौरान मुख्यमंत्री विजय, मंत्री आधव अर्जुन और अन्य आरोपियों की सार्वजनिक टिप्पणियां गवाहों और जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। याचिका में विशेष रूप से 2 जुलाई 2026 को मंत्री आधव अर्जुन के उस बयान का उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने करूर घटना को लेकर राजनीतिक जवाब देने जैसी टिप्पणी की थी। पार्टी का आरोप है कि इस प्रकार के बयान जांच की दिशा बदलने और गवाहों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने का माध्यम बन सकते हैं।

    याचिका में मुख्यमंत्री विजय के प्रस्तावित करूर दौरे का भी उल्लेख किया गया है। बताया गया है कि मुख्यमंत्री मृतकों के परिजनों और घायलों को सरकारी सहायता, अनुकंपा नियुक्ति तथा अन्य लाभ देने के लिए वहां जाने वाले हैं। DMK ने स्पष्ट किया है कि उसे पीड़ित परिवारों को राहत और सहायता दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जिन परिवारों को सहायता दी जानी है, वे CBI जांच में महत्वपूर्ण गवाह भी हैं। ऐसे में आरोपियों अथवा राजनीतिक कार्यपालिका का उनसे सीधा संपर्क जांच की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा कर सकता है।

    याचिका में यह भी कहा गया है कि अक्टूबर 2025 में, जब मामला न्यायालय में लंबित था, तब भी मुख्यमंत्री विजय ने मृतकों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये तथा घायलों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की थी। पार्टी का कहना है कि भविष्य में भी यदि ऐसी सहायता दी जाती है तो वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों के अनुरूप और CBI को पूर्व सूचना देकर ही दी जानी चाहिए, ताकि जांच प्रक्रिया पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

    DMK ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया है कि मंत्री आधव अर्जुन के हालिया बयान की जांच कराई जाए और यदि उसमें जांच को प्रभावित करने का प्रयास पाया जाता है तो उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए जाएं। साथ ही मुख्यमंत्री विजय, मंत्री आधव अर्जुन, बसी आनंद, सी.टी.आर. निर्मल कुमार और अन्य आरोपियों को जांच पूरी होने तक मामले पर किसी भी प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणी करने से रोका जाए। अब इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का रुख तय करेगा कि जांच के दौरान सार्वजनिक बयानबाजी और पीड़ित परिवारों से संपर्क को लेकर आगे क्या दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।

  • तमिलनाडु में बदले सियासी समीकरण: DMK से अलग हुई MDMK, विजय की TVK को दिया समर्थन

    तमिलनाडु में बदले सियासी समीकरण: DMK से अलग हुई MDMK, विजय की TVK को दिया समर्थन


    चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। डीएमके (DMK) की लंबे समय से सहयोगी रही मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कषगम (MDMK) ने डीएमके के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (SPA) से अलग होने की घोषणा कर दी है। पार्टी ने डीएमके पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाते हुए गठबंधन से बाहर निकलने का फैसला किया है। साथ ही अभिनेता और तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के प्रमुख सी. जोसेफ विजय को आगामी उपचुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों में समर्थन देने का भी ऐलान किया है।

    शनिवार को चेन्नई में आयोजित एमडीएमके की सामान्य परिषद की बैठक में यह फैसला लिया गया। पार्टी की ओर से पारित प्रस्ताव में कहा गया कि चुनाव पूर्व गठबंधन को लेकर अंतिम निर्णय उचित समय पर लिया जाएगा, लेकिन फिलहाल एमडीएमके डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा नहीं रहेगी।

    DMK पर लगाए गंभीर आरोप

    पार्टी प्रमुख वाइको ने आरोप लगाया कि डीएमके ने हिंदुत्व समर्थक ताकतों के साथ मिलकर एआईएडीएमके (AIADMK) के नेतृत्व वाली सरकार बनाने की कोशिश की थी। उनका कहना था कि यह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहा और इस घटनाक्रम के बाद सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस के अस्तित्व का उद्देश्य ही समाप्त हो गया।

    पार्टी के प्रस्ताव में कहा गया कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए गठबंधन में बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह गया था, इसलिए कार्यकर्ताओं की राय के आधार पर यह निर्णय लिया गया।

    विजय की पार्टी को समर्थन

    एमडीएमके ने अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के प्रति खुला समर्थन जताया। वाइको ने कहा कि टीवीके भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे, दो-भाषा नीति और सी.एन. अन्नादुरै के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का दावा करती है। उन्होंने संकेत दिए कि भविष्य में दोनों दलों के बीच राजनीतिक सहयोग और मजबूत हो सकता है।

    विधायकों के इस्तीफे को लेकर दावा

    वाइको ने यह भी दावा किया कि विजय ने एमडीएमके के दोनों विधायकों को इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने का सुझाव दिया था और उनके पक्ष में चुनाव प्रचार करने की पेशकश भी की थी। हालांकि दोनों विधायकों ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया।

    एमडीएमके के विधायक आर. सेंथिलसेल्वन और टी.एम. राजेंद्रन वर्ष 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में डीएमके के ‘राइजिंग सन’ चुनाव चिह्न पर जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। उस चुनाव में एमडीएमके ने गठबंधन के तहत चार सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें दो पर जीत हासिल की थी।

    ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के आरोपों पर जवाब

    विजय पर लगाए जा रहे ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के आरोपों का जवाब देते हुए वाइको ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि यदि उनकी पार्टी के विधायकों को डीएमके में शामिल कराने की कोशिश होती है, तो उसे क्या कहा जाएगा।

    एमडीएमके वर्ष 2017 से डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा थी। हालांकि पिछले कुछ महीनों से दोनों दलों के रिश्तों में लगातार खटास देखने को मिल रही थी। विजय और वाइको की हालिया मुलाकात तथा एमडीएमके नेताओं की नाराजगी के बाद अब गठबंधन टूटने से तमिलनाडु की राजनीति में नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना बढ़ गई है।

  • इंडी गठबंधन की अहम बैठक से दूर रही सीएम विजय की TVK, तमिलनाडु और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर चर्चा तेज

    इंडी गठबंधन की अहम बैठक से दूर रही सीएम विजय की TVK, तमिलनाडु और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर चर्चा तेज

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी एकजुटता को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित इंडिया ब्लॉक की बैठक के बीच तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी तमिलगा वेत्त्री कझगम की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली पार्टी के बैठक में शामिल न होने को लेकर विभिन्न तरह के राजनीतिक संकेत और संभावित रणनीतियों पर चर्चा तेज हो गई है।

    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों के समर्थन से सरकार बनाने वाली टीवीके फिलहाल राज्य की सत्ता में है। इसके बावजूद पार्टी ने दिल्ली में आयोजित विपक्षी गठबंधन की बैठक से दूरी बनाए रखी। इस फैसले को केवल एक औपचारिक अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके पीछे व्यापक राजनीतिक रणनीति होने की संभावना जताई जा रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीवीके की अनुपस्थिति का एक प्रमुख कारण उसका राष्ट्रीय संसद में प्रतिनिधित्व न होना हो सकता है। वर्तमान में पार्टी के पास लोकसभा या राज्यसभा में कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में केंद्र सरकार के खिलाफ संसदीय रणनीति और संसद से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित बैठक में उसकी भूमिका सीमित मानी जा सकती है। यही कारण है कि पार्टी ने फिलहाल दूरी बनाए रखना अधिक उपयुक्त समझा हो।

    एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि टीवीके अभी तक औपचारिक रूप से इंडिया ब्लॉक का हिस्सा नहीं बनी है। तमिलनाडु में सरकार गठन के लिए कांग्रेस और अन्य दलों का समर्थन मिलने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की संरचना और सदस्यता अलग विषय मानी जाती है। ऐसे में राज्य स्तर के राजनीतिक सहयोग और राष्ट्रीय गठबंधन की सदस्यता को एक समान नहीं माना जा रहा है।

    तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और टीवीके के बीच प्रतिस्पर्धा भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू मानी जा रही है। डीएमके लंबे समय से इंडिया ब्लॉक की प्रमुख सहयोगी पार्टियों में शामिल रही है। विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की सत्ता से बाहर होने के बावजूद डीएमके प्रदेश में एक प्रभावशाली विपक्षी दल बनी हुई है। ऐसे में टीवीके का इंडिया ब्लॉक की गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल होना राज्य की राजनीति में विरोधाभासी संदेश दे सकता है।

    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्री विजय अपनी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। विधानसभा चुनावों में टीवीके ने खुद को पारंपरिक राजनीतिक दलों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया था। यदि पार्टी जल्दबाजी में किसी राष्ट्रीय गठबंधन का औपचारिक हिस्सा बनती है, तो उसकी स्वतंत्र राजनीतिक छवि प्रभावित हो सकती है। इसलिए फिलहाल वह मुद्दों के आधार पर समर्थन और सहयोग की नीति अपनाना चाहती है।

    भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखते हुए भी टीवीके का यह रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राष्ट्रीय गठबंधनों में औपचारिक रूप से शामिल होने से राजनीतिक विकल्प सीमित हो सकते हैं। जबकि वर्तमान परिस्थितियों में पार्टी अपने लिए अधिक लचीलापन बनाए रखना चाहती है। इससे उसे राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलती है।

    तमिलनाडु में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच मुख्यमंत्री विजय की पार्टी का यह कदम आने वाले समय की रणनीति का संकेत माना जा रहा है। फिलहाल टीवीके सत्ता संचालन, संगठन विस्तार और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत करने पर ध्यान देती दिखाई दे रही है। ऐसे में इंडिया ब्लॉक की बैठक से दूरी को केवल एक अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

  • सीएम विजय ने एमके स्टालिन पर वार, कहा- आपके अपने लोग ही आपकी राजनीति खत्म करेंगे

    सीएम विजय ने एमके स्टालिन पर वार, कहा- आपके अपने लोग ही आपकी राजनीति खत्म करेंगे

    नई दिल्ली। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और टीवीके (TVK) के प्रमुख सी. जोसेफ विजय ने पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पर करारा हमला बोला है। टीवीके ने स्पष्ट किया कि स्टालिन को सबसे बड़ा राजनीतिक झटका उनके विरोधियों से नहीं, बल्कि उनके अपने करीबी सहयोगियों और आसपास सक्रिय लोगों से मिलेगा।

    टीवीके की आईटी विंग ने डीएमके (DMK) पर आरोप लगाया कि पार्टी परिवारवाद और सत्ता को केवल अपने ही परिवार तक सीमित रखती है। टीवीके ने कहा कि उनकी पार्टी गठबंधन और जनता के समर्थन के माध्यम से सत्ता में आई है, जबकि डीएमके केवल अपने परिवार और करीबी लोगों के लिए सत्ता संरक्षित रखता है।

    सीएम विजय ने स्टालिन को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि उनके इर्द-गिर्द मौजूद लोग उन्हें वास्तविक परिस्थितियों और जमीनी सच्चाई से दूर रख रहे हैं। टीवीके ने तंज कसते हुए कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो स्टालिन को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, जैसा कि उन्होंने कोलाथुर सीट और सत्ता खोने के समय देखा था।

    टीवीके ने अपने बयान में यह भी कहा कि पार्टी केवल राजनीतिक फायदा उठाने वाली स्वार्थी ताकत नहीं है और वह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखती है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि स्टालिन का राजनीतिक अंत उनके विरोधियों से नहीं, बल्कि उनके आसपास सक्रिय चापलूसों के समूह से होगा।

    टीवीके के इस बयान पर अभी तक DMK की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान आगामी विधानसभा और स्थानीय चुनावों को लेकर तमिलनाडु में बढ़ते तनाव को दर्शाता है।

    टीवीके का दावा है कि उनकी पार्टी जनता के व्यापक समर्थन के साथ सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। इसके जरिए वह यह संदेश देना चाहती है कि लोकतांत्रिक सहयोग और जनता की आवाज पर आधारित राजनीति ही टिकाऊ है।

    विश्लेषकों का कहना है कि सीएम विजय का यह हमला केवल पूर्व सीएम स्टालिन पर निशाना नहीं है, बल्कि यह DMK के भीतर सत्ता संघर्ष और नेतृत्व विवाद को उजागर करने की कोशिश भी है। आगामी महीनों में तमिलनाडु की राजनीतिक तस्वीर में इसके असर दिख सकते हैं।

    टीवीके ने अपने बयान के अंत में यह भी आगाह किया कि स्टालिन को सही तस्वीर और वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी नहीं दी जा रही है। अगर यही स्थिति जारी रही, तो यह उनके लिए गंभीर राजनीतिक परिणाम ला सकता है।

    इस बयान से साफ है कि तमिलनाडु की राजनीति में टीवीके और DMK के बीच टकराव अब और बढ़ सकता है, और आने वाले समय में दोनों पार्टियों की रणनीतियों और गठबंधनों पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।