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  • ईरान के पास पहुंचा जेडी वेंस का शांति संदेश, तेहरान की चुप्पी ने बढ़ाई दुनिया की चिंता, क्या खत्म होगा अमेरिका से युद्ध?

    ईरान के पास पहुंचा जेडी वेंस का शांति संदेश, तेहरान की चुप्पी ने बढ़ाई दुनिया की चिंता, क्या खत्म होगा अमेरिका से युद्ध?


    नई दिल्ली। अमेरिका (America)और ईरान (Iran)के बीच जारी युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों के बीच कूटनीतिक हलचल (Diplomatic activity)एक बार फिर तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump)के निर्देश पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के सुरक्षा प्रमुख मोहसेन रेजाई को एक पत्र भेजा है। इस पत्र के जरिए दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू करने और सैन्य टकराव रोकने की संभावनाएं तलाशने की कोशिश की गई है। ईरानी मीडिया के अनुसार तेहरान को यह पत्र मिल चुका है लेकिन अभी तक ईरान की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया गया है। ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें अब ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

    समाचार एजेंसी तस्नीम ने एक सूत्र के हवाले से बताया है कि ईरान को अमेरिकी उपराष्ट्रपति का पत्र प्राप्त हो गया है। हालांकि तेहरान ने फिलहाल इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक जेडी वेंस ने राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देश पर यह संदेश भेजा है। इसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच संवाद का रास्ता खोलना और अमेरिका की ओर से संभावित नए सैन्य हमलों को रोकने की संभावनाओं पर चर्चा करना है। फिलहाल यह पहल किसी अंतिम शांति समझौते की शर्तें तय करने के बजाय बातचीत की रूपरेखा तैयार करने पर केंद्रित बताई जा रही है।

    अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। उस दिन अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर हवाई हमले किए थे। इन हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की मौत हो गई थी। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इस्राइल और पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। धीरे-धीरे यह संघर्ष व्यापक रूप लेता गया और क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता चला गया।

    युद्ध का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर देखने को मिला। ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते से व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही पर सख्त पाबंदियां लगा दीं। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक तेल खपत का करीब पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

    ईरान ने इस समुद्री रास्ते को दोबारा खोलने और युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका के सामने सात शर्तें रखी हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि इस संबंध में मध्यस्थों के साथ बातचीत जारी है। तेहरान की प्रमुख मांगों में पूरे क्षेत्र में युद्धविराम लागू करना और विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों पर लगी रोक हटाना शामिल है। इसके अलावा ईरान अपने तेल उद्योग पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध खत्म करने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी तत्काल हटाने की मांग भी कर रहा है।

    ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी ओर से तय किए गए सख्त ढांचे को कमजोर करने वाली किसी भी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जाएगा। इससे साफ है कि तेहरान बातचीत के लिए तैयार होने के बावजूद अपनी शर्तों पर पीछे हटने के मूड में नहीं है। दूसरी ओर अमेरिका की पहल से कूटनीतिक समाधान की उम्मीद जरूर जगी है लेकिन ईरान की चुप्पी ने स्थिति को अनिश्चित बना दिया है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान अमेरिकी प्रस्ताव पर सकारात्मक जवाब देगा या दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव और बढ़ेगा। यदि बातचीत आगे बढ़ती है तो पश्चिम एशिया में शांति की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य और आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहे तो समझौते की राह मुश्किल हो सकती है। फिलहाल दुनिया को तेहरान के जवाब और वाशिंगटन के अगले कदम का इंतजार है।

  • पूर्व मिस स्विट्जरलैंड ने डोनाल्ड ट्रंप पर लगाया रेप का आरोप… अमेरिका में मची हलचल

    पूर्व मिस स्विट्जरलैंड ने डोनाल्ड ट्रंप पर लगाया रेप का आरोप… अमेरिका में मची हलचल


    वाशिंगटन।
    पूर्व मिस स्विट्जरलैंड (Former Miss Switzerland) बीट्रिस क्यूल (Beatrice Kühl) ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) पर 1993 में न्यूयॉर्क के होटल में रेप करने का आरोप लगाया है। क्यूल का दावा है कि घटना के दौरान उनकी ड्रेस फट गई थी और उनके शरीर पर चोटें आई थीं। अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा की न्यायपालिका समिति के डेमोक्रेटिक सदस्यों की नई रिपोर्ट में उनके आरोपों का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में ट्रंप और यौन अपराधों के दोषी जेफ्री एपस्टीन के कथित संबंधों की भी जांच की गई है। व्हाइट हाउस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए रिपोर्ट को राष्ट्रपति को निशाना बनाने की राजनीतिक कोशिश बताया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 1993 में क्यूल 24 साल की थीं और मॉडलिंग के साथ फाइनेंसियल सर्विस के सेक्टर में काम करती थीं। जिल हर्थ ने उन्हें अटलांटिक सिटी और न्यूयॉर्क में आयोजित होने वाले डोनाल्ड जे ट्रंप अमेरिकन ड्रीम पेजेंट में शामिल होने के लिए बुलाया था। इस प्रतियोगिता में 16 से 22 साल की युवतियां हिस्सा लेती थीं। क्यूल के मुताबिक, न्यूयॉर्क के प्लाजा होटल में आयोजित प्रेस लंच के दौरान उनकी मुलाकात ट्रंप से हुई। उस समय यह होटल ट्रंप के मालिकाना हक में था। आरोप है कि ट्रंप ने उन्हें वीजा दिलाने और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में दाखिला पाने में मदद करने का भरोसा दिया। इसके बाद एपस्टीन ने भी उनसे संपर्क किया और इसी तरह की मदद का प्रस्ताव दिया। उसने ट्रंप की फ्लोरिडा स्थित मार-ए-लागो संपत्ति में आयोजित होने वाली पार्टी में आने का न्योता भी दिया।


    ‘शरीर के कई हिस्सों पर चोट के निशान’

    रिपोर्ट में क्यूल के हवाले से बताया गया है कि बाद में ट्रंप के एक प्रतिनिधि ने उन्हें राष्ट्रपति से मिलने के लिए होटल के ऊपर बने एक कमरे में चलने को कहा। करियर और पढ़ाई में मदद मिलने की उम्मीद में वह उसके साथ कमरे में चली गईं। क्यूल का आरोप है कि कमरे में ट्रंप ने पीछे से उन्हें पकड़ लिया और रेप किया। रिपोर्ट के अनुसार, इस कथित घटना में उनकी ड्रेस फट गई और शरीर के कई हिस्सों पर चोट के निशान पड़ गए। उन्हें खून भी निकलने लगा था। क्यूल ने इस घटना को बेहद क्रूर बताया। आरोप है कि इसके बाद ट्रंप ने वीजा और यूनिवर्सिटी में दाखिले में मदद का भरोसा दोहराया और उन्हें चुप रहने के लिए कहा।


    ‘ट्रंप ने क्यूल से दोबारा किया था संपर्क’

    रिपोर्ट के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने उनसे कहा था, ‘शो जारी रहना चाहिए।’ क्यूल ने डर और सदमे की हालत में प्रतियोगिता पूरी की और फिर स्विट्जरलैंड लौट गईं। बाद में उन्होंने ट्रंप की ओर से आयोजित हवाई की एक अन्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। कुछ महीने बाद ट्रंप ने स्विट्जरलैंड में उनसे दोबारा संपर्क किया, लेकिन क्यूल ने मदद का प्रस्ताव ठुकरा दिया। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता लॉरेन बिस ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा बताया। उन्होंने कहा कि डेमोक्रेटिक सांसद राष्ट्रपति ट्रंप की उपलब्धियों से ध्यान हटाने के लिए राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। ट्रंप ने एपस्टीन को अपने मार-ए-लागो क्लब से निकाल दिया था और एपस्टीन से जुड़े मामलों में राष्ट्रपति को पूरी तरह पाक-साफ बताया।

  • ब्राजील में ट्रंप समर्थक को हराकर लूला फिर बने राष्ट्रपति, बोले- हमारा देश किसी के प्रभाव क्षेत्र में नहीं

    ब्राजील में ट्रंप समर्थक को हराकर लूला फिर बने राष्ट्रपति, बोले- हमारा देश किसी के प्रभाव क्षेत्र में नहीं


    नई दिल्ली। ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव में वामपंथी नेता लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा ने शानदार वापसी करते हुए चौथी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ कर लिया है। रविवार, 25 अक्टूबर को हुए दूसरे दौर के मतदान में उन्होंने दक्षिणपंथी नेता और सीनेटर फ्लेवियो बोल्सोनारो को हरा दिया। ब्राजील के चुनावी न्यायालय के मुताबिक, लूला को 51.79% और फ्लेवियो को 48.21% वोट मिले। लूला की जीत ऐसे समय में हुई है, जब लैटिन अमेरिका के कई देशों में दक्षिणपंथी राजनीति का प्रभाव बढ़ रहा है। जीत के बाद लूला ने स्पष्ट कहा कि ब्राजील किसी दूसरे देश के प्रभाव क्षेत्र में नहीं है।

    करीब 44 लाख वोटों से जीते लूला

    ब्राजील के चुनावी न्यायालय के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 100% मतगणना पूरी होने के बाद लूला को 6 करोड़ 42 लाख 56 हजार 232 वोट मिले, जबकि फ्लेवियो बोल्सोनारो के खाते में 5 करोड़ 98 लाख 26 हजार 41 वोट आए। दोनों के बीच करीब 44.3 लाख वोटों का अंतर रहा।

    80 वर्षीय लूला ने पहले दौर के चुनाव में फ्लेवियो से पिछड़ने के बाद दूसरे दौर में जीत दर्ज की। पहले चरण में फ्लेवियो को 47.03% और लूला को 45.16% वोट मिले थे। इसके बाद दोनों के बीच सीधा मुकाबला हुआ।

    लूला का नया कार्यकाल 5 जनवरी 2027 से शुरू होगा और वह 2030 तक राष्ट्रपति पद पर रहेंगे। इससे पहले वह 2003 से 2010 तक दो कार्यकाल राष्ट्रपति रह चुके हैं और 2023 में तीसरी बार सत्ता में लौटे थे।

    बोले- ब्राजील किसी दूसरे देश के प्रभाव क्षेत्र में नहीं

    जीत के बाद लूला ने ब्राजील की स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय संप्रभुता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ब्राजील किसी दूसरे देश किसी दूसरे देश के प्रभाव क्षेत्र में नहीं है। उनका संदेश ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और टैरिफ दबाव को लेकर ब्राजील-अमेरिका संबंध चर्चा में हैं।

    लूला ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के नियमन की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने डिजिटल माध्यमों के जरिए विदेशी हस्तक्षेप की कोशिशों को नाकाम किया। लूला ने यह भी कहा कि वह शासन के तरीके में बदलाव करेंगे और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाएंगे।

    उनके मुताबिक, चुनाव के बाद अब प्राथमिकता देश को चलाने के तरीके में बदलाव लाने और जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने की होगी।

    ट्रंप समर्थक दक्षिणपंथी राजनीति के बीच लूला की जीत

    लूला की जीत को लैटिन अमेरिका की राजनीति के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। क्षेत्र के कई देशों में दक्षिणपंथी नेताओं और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में ब्राजील में वामपंथी नेता की जीत क्षेत्रीय राजनीतिक रुझानों से अलग तस्वीर पेश करती है।

    ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ऐसे में लूला की सरकार के सामने घरेलू आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को संतुलित करने की चुनौती भी रहेगी। अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच ब्राजील अपनी आर्थिक निर्भरता कम करने और स्वतंत्र व्यापार नीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।

    लैटिन अमेरिका के दो बड़े देशों ब्राजील और मैक्सिको में वाम-मध्य विचारधारा के नेता सत्ता में हैं। लूला की जीत से क्षेत्रीय राजनीति में इन सरकारों की भूमिका पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है।

    फ्लेवियो बोल्सोनारो ने नतीजे को चुनौती देने की बात कही

    चुनाव में हार के बाद फ्लेवियो बोल्सोनारो ने परिणाम स्वीकार करने से इनकार करते हुए चुनाव रद्द कराने की मांग करने की बात कही। उन्होंने मतदान का समय दो घंटे बढ़ाए जाने पर आपत्ति जताई। यह फैसला मतदान के दिन आखिरी समय में लिया गया था, जिसके बाद चुनाव प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

    हालांकि, ब्राजील के चुनावी न्यायालय ने लूला की जीत की आधिकारिक घोषणा कर दी है। चुनाव परिणाम को चुनौती देने की फ्लेवियो की घोषणा के बाद अब इस मामले में संभावित कानूनी प्रक्रिया पर नजर रहेगी।

    लूला की जीत के साथ ब्राजील में अगले चार साल के लिए राजनीतिक दिशा तय हो गई है। उनकी सरकार के सामने आर्थिक विकास, सामाजिक नीतियों, अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े मुद्दे अहम रहेंगे।

  • ईरान के बाद क्यूबा पर ट्रंप का बड़ा दांव! बोले समझौता कराने भेजेंगे मार्को रुबियो CIA के साथ मिलकर बदलाव लाने की अपील

    ईरान के बाद क्यूबा पर ट्रंप का बड़ा दांव! बोले समझौता कराने भेजेंगे मार्को रुबियो CIA के साथ मिलकर बदलाव लाने की अपील


    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के बाद क्यूबा को लेकर अपनी रणनीति के संकेत देकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान से निपटने के बाद अमेरिका क्यूबा के मामले पर ध्यान देगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि क्यूबा के साथ समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इस बयान के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिका अब क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में है या दोनों देशों के बीच किसी नए समझौते का रास्ता खुलने वाला है।

    फ्लोरिडा में एक रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान से लौटते समय वे क्यूबा के मामले को देखेंगे। उनके इस बयान को क्यूबा के साथ संभावित समझौते की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। ट्रंप पहले भी क्यूबा के साथ समझौता होने की संभावना जता चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि दोनों देशों के बीच जल्द समझौता हो सकता है और इसके लिए सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि अभी तक किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका किन शर्तों पर क्यूबा के साथ बातचीत आगे बढ़ाना चाहता है।

    इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। रुबियो ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर क्यूबा के लोगों को संबोधित करते हुए बदलाव की अपील की। उन्होंने कहा कि जो लोग क्यूबा में बदलाव चाहते हैं उनके लिए यह सही समय है। रुबियो ने क्यूबा की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए टूटे वादों भ्रष्टाचार और कुछ चुनिंदा लोगों की सुख सुविधाओं का जिक्र किया। उनके बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन क्यूबा की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के लिए दबाव बनाने की रणनीति पर विचार कर रहा है।

    रुबियो के बयान में CIA के साथ गुप्त साझेदारी का जिक्र भी चर्चा का विषय बना है। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने क्यूबा में बदलाव चाहने वाले लोगों से अमेरिकी खुफिया एजेंसी के साथ सहयोग करने की अपील की। इस बयान को लेकर कई सवाल खड़े हो सकते हैं क्योंकि किसी दूसरे देश के आंतरिक राजनीतिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का मुद्दा संवेदनशील माना जाता है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि इस कथित सहयोग का स्वरूप क्या होगा और क्या इसके तहत कोई औपचारिक पहल की जा रही है।

    क्यूबा और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। अमेरिका छह दशक से अधिक समय से क्यूबा पर विभिन्न प्रतिबंध लगाता रहा है। इस साल की शुरुआत में लगाए गए तेल प्रतिबंधों के बाद क्यूबा की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ने की बात सामने आई है। वहां ईंधन की कमी और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण बिजली कटौती जैसी समस्याएं भी बनी हुई हैं। इन परिस्थितियों में अमेरिकी दबाव क्यूबा की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जिंदगी पर असर डाल सकता है।

    क्यूबा पर अमेरिकी दबाव बढ़ने की एक अन्य वजह वेनेजुएला से जुड़े घटनाक्रम को भी माना जा रहा है। खबर के मुताबिक वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना द्वारा पकड़े जाने के बाद क्यूबा को लेकर ट्रंप प्रशासन का रुख और सख्त हुआ है। हालांकि अमेरिका की आगे की कार्रवाई को लेकर अभी कोई स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई है।

    दूसरी ओर क्यूबा के विदेश मंत्री पहले ही संयुक्त राष्ट्र महासभा में कह चुके हैं कि उनका देश अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तैयार है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत की संभावनाओं पर नजर रहेगी। फिलहाल ट्रंप के बयान और रुबियो की अपील ने क्यूबा को अमेरिकी विदेश नीति के केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि ईरान के मुद्दे के बाद अमेरिका वास्तव में बातचीत का रास्ता अपनाता है या क्यूबा पर प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव को और तेज करता है।

  • ट्रंप की ईरान पर फिर हमले की धमकी, तेहरान की चेतावनी- समुद्र के नीचे इंटरनेट केबल काट देंगे

    ट्रंप की ईरान पर फिर हमले की धमकी, तेहरान की चेतावनी- समुद्र के नीचे इंटरनेट केबल काट देंगे


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई के संकेत के बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान पर फिर हमला कर सकता है। इसके जवाब में ईरानी सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका और इजराइल ने दोबारा हमला किया, तो ईरान खाड़ी में समुद्र के नीचे बिछी संचार केबल को निशाना बना सकता है। इससे क्षेत्र में इंटरनेट कनेक्टिविटी और वैश्विक कारोबार प्रभावित होने का खतरा है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दो वरिष्ठ ईरानी सुरक्षा अधिकारियों ने समुद्र के नीचे बिछी संचार केबल को निशाना बनाने की योजना की जानकारी दी है। एक अधिकारी ने कहा कि ईरान पर हमला होने की स्थिति में समुद्र के नीचे की केबल और सैन्य ठिकानों समेत कोई भी जगह सुरक्षित नहीं रहेगी। अधिकारी ने दावा किया कि ईरान की इन केबल तक पहुंच है और वह उन्हें नष्ट कर सकता है।

    ट्रंप बोले- एक और ‘लिटिल एपिक फ्यूरी’ कर सकते हैं

    ट्रंप ने शुक्रवार को फ्लोरिडा में एक रैली के दौरान कहा कि अमेरिका एक और ‘लिटिल एपिक फ्यूरी’ कर सकता है। यह नाम 28 फरवरी को शुरू हुए ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के लिए इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि नई कार्रवाई कब और किस तरह की हो सकती है।

    इससे पहले भी ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका युद्ध को बहुत जल्दी खत्म कर सकता है। हालांकि, उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या युद्ध को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए या फिर इसे धीरे-धीरे कमजोर पड़ने देना चाहिए। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका के पास संघर्ष खत्म करने की क्षमता है, लेकिन यह फैसला करना बाकी है कि ऐसा कब किया जाए।

    उन्होंने यह भी दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही जारी है और अमेरिका को वह सब मिल रहा है, जिसकी उसे जरूरत है।

    ट्रंप पहले भी युद्ध के उद्देश्यों और उसकी समयसीमा को लेकर अलग-अलग बयान दे चुके हैं। इसी महीने उन्होंने कहा था कि अगले महीने होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले अमेरिका ईरान पर हमला नहीं करेगा। इन चुनावों में अमेरिकी संसद पर नियंत्रण को लेकर फैसला होना है।

    तुर्की और फ्रांस ने नई सैन्य कार्रवाई से किया आगाह

    ईरान पर दोबारा हमले की आशंका के बीच कई देशों ने तनाव कम करने की अपील की है। शुक्रवार को इस्तांबुल में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, मिस्र, पाकिस्तान, सऊदी अरब और इटली के प्रतिनिधियों की बैठक हुई।

    तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा कि ईरान पर नया हमला तनाव बढ़ा सकता है और युद्ध पूरे क्षेत्र में फैलने का खतरा है। उन्होंने संघर्ष खत्म करने के लिए बातचीत और कूटनीति को जरूरी बताया।

    फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बारो ने भी नई सैन्य कार्रवाई से बचने की चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से किसी को फायदा नहीं होगा और इसका तेल की कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    वहीं, जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने कहा कि जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ईरान के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, ताकि वह परमाणु हथियार हासिल न करे।

    होर्मुज के नीचे मौजूद 7 इंटरनेट केबल निशाने पर

    ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के राजनीतिक मामलों के उप प्रमुख यदोल्लाह जावानी ने भी चेतावनी दी है कि अगर ईरान के बुनियादी ढांचे पर हमला हुआ, तो ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य के नीचे मौजूद सात प्रमुख इंटरनेट केबल को निशाना बना सकता है।

    समुद्र के नीचे बिछी केबल वैश्विक इंटरनेट व्यवस्था की रीढ़ हैं। इनके जरिए दुनिया के करीब 99 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक का संचार होता है। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य से अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा गुजरता है। इसके बावजूद इस क्षेत्र में कई केबल कटने से इंटरनेट सेवाओं और संचार व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

    केबल क्षतिग्रस्त होने पर इंटरनेट की रफ्तार धीमी हो सकती है। इसके अलावा वित्तीय लेनदेन, ऑनलाइन कारोबार और क्लाउड सेवाओं में भी बाधा आने की आशंका है। असर कितना व्यापक होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इंटरनेट ट्रैफिक को वैकल्पिक नेटवर्क पर कितनी जल्दी भेजा जा सकता है और उन नेटवर्क में कितनी अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध है।

    युद्ध की स्थिति में केबल की मरम्मत भी मुश्किल हो सकती है। समुद्री क्षेत्र में सुरक्षा जोखिम, बीमा लागत में बढ़ोतरी और मरम्मत के लिए अनुमति मिलने में देरी से बहाली का काम प्रभावित हो सकता है।

    खाड़ी देशों के टेक्नोलॉजी निवेश पर भी खतरा

    खाड़ी के देश तेल पर अपनी निर्भरता कम करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बड़े केंद्र बनने के लिए तकनीकी बुनियादी ढांचे में भारी निवेश कर रहे हैं। अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ उनकी साझेदारी भी बढ़ी है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में ईरान के हमलों के दौरान संयुक्त अरब अमीरात में अमेजन वेब सर्विसेज की दो सुविधाओं को नुकसान पहुंचने की बात कही गई थी। बहरीन में भी उसकी एक सुविधा के पास बुनियादी ढांचे को नुकसान हुआ था।

    हालांकि, इंटरनेट ट्रैफिक के लिए जमीन के रास्ते वैकल्पिक नेटवर्क मौजूद हैं। खाड़ी देशों की सरकारें और अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियां कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए नए बुनियादी ढांचे में निवेश कर रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने 2030 तक मध्य पूर्व में समुद्र के नीचे और जमीन के रास्ते कनेक्टिविटी पर 40 करोड़ डॉलर से अधिक निवेश करने की योजना बनाई है।

    फिलहाल, अमेरिका की ओर से संभावित नई सैन्य कार्रवाई और ईरान की चेतावनी ने क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक इंटरनेट और कारोबारी नेटवर्क पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

  • गल्फ ऑफ अमेरिका के बाद अब न्यू मैक्सिको का नाम बदलने की तैयारी, ट्रंप बोले- ‘न्यू अमेरिका’ कर देना चाहिए

    गल्फ ऑफ अमेरिका के बाद अब न्यू मैक्सिको का नाम बदलने की तैयारी, ट्रंप बोले- ‘न्यू अमेरिका’ कर देना चाहिए


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर जगहों के नाम बदलने को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने अमेरिकी राज्य न्यू मैक्सिको का नाम बदलकर ‘न्यू अमेरिका’ करने की मांग की है। ट्रंप ने सोमवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि राज्य का नाम तुरंत बदल देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि अमेरिका, मैक्सिको नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका है।

    ट्रंप का तर्क है कि नाम बदलने से न्यू मैक्सिको की पहचान और प्रतिष्ठा बढ़ेगी। उन्होंने यह दावा भी किया कि इससे राज्य के लोगों के घरों की कीमत और उनकी आमदनी में इजाफा हो सकता है। अपने पोस्ट में उन्होंने न्यू मैक्सिको के चुनावों पर भी तंज कसा और कहा कि नाम बदलने से शायद वहां के चुनाव भी ईमानदार हो जाएं। हालांकि, नाम बदलने से संपत्ति की कीमतों या आय में बढ़ोतरी होने के उनके दावे के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है।

    सितंबर में भी उठाई थी मांग
    ट्रंप इससे पहले सितंबर में भी न्यू मैक्सिको का नाम ‘न्यू अमेरिका’ करने की बात कह चुके हैं। उस समय उन्होंने सोशल मीडिया पर एक ऐसा नक्शा साझा किया था, जिसमें राज्य का नाम बदला हुआ दिखाया गया था। उन्होंने एक वीडियो में भी ‘न्यू अमेरिका’ नाम का इस्तेमाल किया था।

    हालांकि, ट्रंप के इस प्रस्ताव को राज्य की गवर्नर मिशेल लुजान ग्रिशम का समर्थन नहीं मिला। उन्होंने इसका विरोध करते हुए कहा था कि न्यू मैक्सिको का नाम उसके इतिहास से जुड़ा है और इस मुद्दे पर बहस नहीं होनी चाहिए।

    क्या राष्ट्रपति अकेले बदल सकते हैं राज्य का नाम?
    ट्रंप की मांग के बावजूद न्यू मैक्सिको का आधिकारिक नाम बदलना उनके अकेले के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इसके लिए राज्य की संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसमें राज्य की विधायिका की मंजूरी और मतदाताओं की सहमति की आवश्यकता हो सकती है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति संघीय सरकारी विभागों को किसी राज्य के लिए नया नाम इस्तेमाल करने का निर्देश दे सकते हैं, लेकिन ऐसा करने भर से राज्य का आधिकारिक नाम नहीं बदल जाता। इसलिए ‘न्यू अमेरिका’ नाम फिलहाल ट्रंप का प्रस्ताव है, आधिकारिक बदलाव नहीं।

    गल्फ ऑफ अमेरिका से माउंट मैकिनले तक नाम बदलने की पहल
    ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में कई भौगोलिक नामों को बदलने की पहल कर चुके हैं। जनवरी 2025 में उन्होंने गल्फ ऑफ मेक्सिको का नाम अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने का आदेश दिया था। इसी दौरान अलास्का की प्रमुख चोटी डेनाली का नाम बदलकर फिर से ‘माउंट मैकिनले’ कर दिया गया।

    अगस्त 2026 में लेक ओंटारियो का नाम अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘लेक अमेरिका’ करने का आदेश दिए जाने की बात भी सामने आई। इसके अलावा ट्रंप अटलांटिक या प्रशांत महासागर का नाम बदलने का विचार भी जता चुके हैं। उन्होंने प्रशांत महासागर के लिए ‘ट्रंप ओशन’ या ‘ओशन ऑफ द अमेरिकाज’ जैसे नाम सुझाए थे।

    न्यू मैक्सिको का नाम बदलने की नई मांग भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। हालांकि, इस प्रस्ताव का भविष्य राज्य की संवैधानिक प्रक्रिया और वहां के राजनीतिक समर्थन पर निर्भर करेगा।

  • फ्रांस में हिंसक प्रदर्शन से बिगड़े हालात, ट्रंप ने मैक्रों से सीमाएं बंद करने को कहा, वेंस ने भी उठाए सवाल

    फ्रांस में हिंसक प्रदर्शन से बिगड़े हालात, ट्रंप ने मैक्रों से सीमाएं बंद करने को कहा, वेंस ने भी उठाए सवाल

    नई दिल्ली । फ्रांस में महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी सेवाओं की स्थिति को लेकर शुरू हुए विरोध प्रदर्शन हिंसक घटनाओं में बदल गए हैं। 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के बाद 18 अक्टूबर को देश के कई हिस्सों में तोड़फोड़, दुकानों में लूटपाट और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इन घटनाओं के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस की स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से देश की सीमाएं बंद करने की अपील की। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी फ्रांस में हुई हिंसा को लेकर वहां की सरकारों की नीतियों और विविधता से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए हैं।

    ट्रंप ने फ्रांस में हो रही घटनाओं को लेकर कहा कि देश में बाहर से आने वाले ऐसे लोगों की वजह से हालात बिगड़ रहे हैं, जिनके दिलों में नफरत है। उन्होंने फ्रांस को एक महान देश बताते हुए कहा कि इस तरह की परिस्थितियां देश को कमजोर कर सकती हैं। ट्रंप ने मैक्रों से आग्रह किया कि बहुत देर होने से पहले सीमाओं को बंद कर नियंत्रण स्थापित किया जाए। उनके बयान के बाद फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों और आव्रजन नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

    इससे पहले ट्रंप ने फ्रांस की क्रांति से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए मजाकिया अंदाज में कहा था कि फ्रांस क्रांति के लिए प्रसिद्ध है और लोग वहां जाकर क्रांति में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, हिंसक घटनाओं के बाद उनका रुख अधिक सख्त नजर आया। उन्होंने मौजूदा स्थिति को फ्रांस के लिए गंभीर बताते हुए सीमाओं पर नियंत्रण को जरूरी बताया।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी फ्रांस में हुई हिंसा पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की उदारवादी सरकारों ने दया और विविधता के नाम पर तीसरी दुनिया के लोगों को फ्रांस सहित दूसरे देशों में आने दिया, लेकिन उनके समाज में घुलने-मिलने और अनुकूलता से जुड़े बुनियादी सवालों को नजरअंदाज किया गया। वेंस के अनुसार, सरकारों को पहले ही संभावित समस्याओं को लेकर चेतावनी दी गई थी, लेकिन समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए।

    लिमोजेस शहर के ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगने की घटना का उल्लेख करते हुए वेंस ने चिंता जताई। यह इमारत करीब 143 साल पुरानी है और आग के कारण इसका कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। वेंस ने उम्मीद जताई कि फ्रांस इस स्थिति पर काबू पाएगा और अपनी ऐतिहासिक इमारतों को आगे होने वाले नुकसान से बचा सकेगा। उन्होंने अमेरिकी नागरिकों से भी फ्रांस में हो रही घटनाओं पर ध्यान देने की अपील की।

    फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों का मुख्य कारण महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं और सरकारी सेवाओं की खराब स्थिति बताई गई है। इन मुद्दों को लेकर छात्र, ट्रेड यूनियन और अन्य समूह सड़कों पर उतरे थे। फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में करीब 5 लाख 50 हजार लोग शामिल हुए। वहीं, आयोजकों ने प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग 8 लाख बताई। इस तरह प्रदर्शनों में शामिल लोगों की संख्या को लेकर सरकारी आंकड़ों और आयोजकों के दावों में अंतर सामने आया।

    प्रदर्शन शुरुआत में आर्थिक परेशानियों और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर किए गए थे, लेकिन बाद में कई जगहों पर स्थिति हिंसक हो गई। कुछ समूहों की पुलिस के साथ झड़प हुई, दुकानों में लूटपाट की गई और कई शहरों में इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया। अधिकारियों के मुताबिक, घटनाओं के बाद करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। हिंसा के दौरान सैकड़ों पुलिसकर्मी और आपातकालीन सेवाओं से जुड़े कर्मचारी भी घायल हुए।

    लिमोजेस में ऐतिहासिक सिटी हॉल को नुकसान पहुंचने की घटना ने स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट किया है। विरोध प्रदर्शनों के पीछे आर्थिक और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतें हैं, जबकि अमेरिकी नेतृत्व ने आव्रजन और विविधता की नीतियों को लेकर अलग दृष्टिकोण सामने रखा है। फिलहाल फ्रांस में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं और हिंसक घटनाओं के बाद स्थिति को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।

  • भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल

    भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल


    नई दिल्ली। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की रणनीति को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन का रुख चर्चा में है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश रूसी तेल खरीदने के लिए भारत और चीन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाएं, लेकिन उसके सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। बेसेंट ने इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका अकेले प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए।

    अमेरिकी टीवी चैनल NBC के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में बातचीत के दौरान बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देश एक ओर रूस के खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर रूसी ऊर्जा का आयात भी जारी रखते हैं। उनके मुताबिक, इस तरह के आयात से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिलती है।

    ‘अकेला अमेरिका ही प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए?’

    बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यूरोपीय देश खुद रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं, तो अमेरिका ही इस दिशा में अकेले कदम क्यों उठाए।

    अमेरिकी वित्त मंत्री ने यूरोप के ऊर्जा आयात को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन की तुलना में रूस और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अधिक पैसा दिया है। बेसेंट के अनुसार, अमेरिका करीब 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें लगभग 1.8 अरब डॉलर का उर्वरक शामिल है। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों का रूसी उत्पादों का आयात अमेरिका के मुकाबले करीब दस गुना है।

    प्रतिबंधों और टैरिफ पर 60 दिनों की अस्थायी छूट

    अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक, रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत अन्य देशों पर टैरिफ से जुड़ी छूट को 60 दिनों के लिए अस्थायी रूप से दिया गया है। इसका उद्देश्य इन उपायों के आर्थिक प्रभाव का आकलन करना है।

    वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ‘लिंडसे ओ’ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ के तहत राष्ट्रपति को परिस्थितियों का आकलन करने की छूट है। बेसेंट के मुताबिक, शुक्रवार को राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश के जरिए 60 दिनों की छूट दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे स्थायी रूप से प्रतिबंध हटाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और उज्बेकिस्तान की छह दिवसीय यात्रा पर रवाना होने से पहले पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति इन 60 दिनों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है।

    रुबियो ने इस दौरान ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव, सऊदी अरब में हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध का भी उल्लेख किया।

    ट्रंप ने फैसले को बताया था अमेरिका और दुनिया के लिए अच्छा

    शुक्रवार को मियामी के पास मार-ए-लागो रिसॉर्ट में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव किया था। उन्होंने इसे अमेरिका और दुनिया, दोनों के लिए अच्छा निर्णय बताया। हालांकि, इस कदम को लेकर अमेरिकी राजनीति में विरोध भी सामने आया है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसदों ने फैसले पर सवाल उठाए हैं।

    भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने सोशल मीडिया पर कहा कि ट्रंप का कदम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राहत देने और यूक्रेन को पीछे छोड़ने जैसा है। वहीं, सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी ट्रंप प्रशासन के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि सहयोगियों की ढिलाई की कीमत अमेरिका और उसके साझेदारों को चुकानी पड़ रही है।

    रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद ऐसे समय सामने आए हैं, जब यूक्रेन युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है। फिलहाल 60 दिनों की अस्थायी छूट के बाद अमेरिकी प्रशासन की अगली रणनीति पर नजर रहेगी।

  • 50 राज्य और हजारों काउंटी, क्या अमेरिकी चुनाव में धांधली करना वाकई असंभव है, जानिए पेपर ट्रेल का सुरक्षा कवच

    50 राज्य और हजारों काउंटी, क्या अमेरिकी चुनाव में धांधली करना वाकई असंभव है, जानिए पेपर ट्रेल का सुरक्षा कवच


    नई दिल्ली। अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच निष्पक्ष मतदान और वोटों की सुरक्षा पर बहस छिड़ी हुई है। आशंकाएं जताई जा रही हैं कि क्या मौजूदा राजनीतिक माहौल में अमेरिकी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित रह पाएंगे। इस सवाल पर द न्यूयॉर्क टाइम्स ने चुनाव कानून प्रशासन और राजनीतिक रणनीतियों से जुड़े आठ विशेषज्ञों से चर्चा की। विशेषज्ञों की राय के मुताबिक अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में कई ऐसे सुरक्षा उपाय मौजूद हैं जो बड़े स्तर पर चुनावी धांधली करना बेहद कठिन बनाते हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की चुनाव प्रणाली का विकेंद्रीकरण उसकी सबसे बड़ी ताकत है। वहां चुनाव कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय काउंटी प्रशासन के पास होती है। राष्ट्रपति या संघीय सरकार सीधे तौर पर पूरे देश की चुनाव प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में नहीं ले सकती। अमेरिका के 50 राज्यों और हजारों स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों में मतदान की व्यवस्था संचालित होती है। ऐसे में किसी एक केंद्रीय स्तर से पूरी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करना आसान नहीं है। चुनाव अधिकारियों की भूमिका और स्थानीय स्तर पर निगरानी भी मतगणना की विश्वसनीयता बनाए रखने में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
    चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि चुनावी व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और वास्तविक प्रशासनिक अधिकारों के बीच अंतर समझना जरूरी है। विशेषज्ञ बॉब बाउर के अनुसार राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर कई बार बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए जाते हैं। वहीं बेन गिंसबर्ग का कहना है कि राष्ट्रपति के पास सीधे चुनाव संचालित करने की शक्ति नहीं है लेकिन उनके बयान जनता के बीच संदेह और अविश्वास जरूर पैदा कर सकते हैं। कानून के प्रोफेसर डेरेक मुलर के मुताबिक इतनी बड़ी और विकेंद्रीकृत व्यवस्था को एकतरफा तरीके से बदल पाना बेहद मुश्किल है। विशेषज्ञों ने इस बात पर भरोसा जताया कि चुनाव अधिकारी मतदाताओं के वोटों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    अमेरिकी चुनावों में पेपर ट्रेल यानी मतदान का सत्यापन योग्य रिकॉर्ड भी सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा है। जहां मतपत्रों का कागजी रिकॉर्ड उपलब्ध होता है वहां जरूरत पड़ने पर मशीनों से मिले नतीजों की दोबारा जांच की जा सकती है। ऑडिट और पुनर्गणना की प्रक्रिया से मतगणना में संभावित गलतियों का पता लगाने में मदद मिलती है। हालांकि अमेरिका में मतदान की तकनीक और नियम सभी राज्यों में एक जैसे नहीं हैं। इसलिए सुरक्षा उपायों की प्रकृति भी राज्य के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कागजी रिकॉर्ड चुनाव परिणामों की जांच को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद करता है।
    इसके बावजूद विशेषज्ञों ने कुछ गंभीर चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया है। बॉब बाउर के मुताबिक चुनाव अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे की धमकियां और संघीय एजेंसियों की संभावित भूमिका को लेकर बयानबाजी माहौल को तनावपूर्ण बना सकती है। एडवर्ड फोली ने बेहद करीबी चुनाव परिणामों की स्थिति में लंबे कानूनी विवाद की आशंका जताई। ऐसी परिस्थितियों में मतगणना और नतीजों की आधिकारिक पुष्टि में देरी हो सकती है। वनीता गुप्ता ने चिंता जताई कि यदि मतदाता चुनाव प्रणाली पर भरोसा खो देते हैं तो वे मतदान करने से पीछे हट सकते हैं। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी प्रभावित होने का खतरा रहता है।
    कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में डीपफेक वीडियो और भ्रामक सूचनाएं भी चुनावी प्रक्रिया के लिए चुनौती बन रही हैं। गलत जानकारी तेजी से फैलने से मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा हो सकता है और चुनाव अधिकारियों पर भरोसा कमजोर पड़ सकता है। विशेषज्ञों की राय का सार यह है कि अमेरिकी चुनाव प्रणाली में सुरक्षा के कई स्तर मौजूद हैं लेकिन किसी भी लोकतंत्र में पारदर्शिता जवाबदेही और मतदाताओं का विश्वास बनाए रखना जरूरी है। पेपर ट्रेल और विकेंद्रीकृत व्यवस्था चुनावों की विश्वसनीयता मजबूत कर सकते हैं लेकिन भ्रामक सूचनाओं और राजनीतिक तनाव से निपटने के लिए प्रशासनिक सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है।
  • इल्हान उमर के घर संघीय एजेंसियों की छापेमारी, ट्रंप ने बताया ‘बेईमान’, इमिग्रेशन फ्रॉड की जांच का दावा

    इल्हान उमर के घर संघीय एजेंसियों की छापेमारी, ट्रंप ने बताया ‘बेईमान’, इमिग्रेशन फ्रॉड की जांच का दावा


    नई दिल्‍ली । अमेरिका में सांसद इल्हान उमर के वाशिंगटन स्थित घर पर संघीय एजेंसियों की कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उमर को ‘बेईमान’ और ‘बुरा इंसान’ बताते हुए कहा कि न्याय विभाग उनके मामले को देख रहा है। वहीं, उमर ने इस कार्रवाई को राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों का दुरुपयोग करने की कोशिश बताया है।

    अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, होमलैंड सिक्योरिटी इन्वेस्टिगेशंस (HSI) के एजेंटों ने अदालत से जारी वारंट के आधार पर यह कार्रवाई की। मामले से जुड़े एक व्यक्ति के मुताबिक, छापेमारी कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी की जांच का हिस्सा है। हालांकि, जांच के आरोपों को लेकर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

    ट्रंप पहले भी लगा चुके हैं आरोप

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी इल्हान उमर को लेकर तीखी टिप्पणियां कर चुके हैं। वह आरोप लगाते रहे हैं कि उमर अमेरिका में अवैध तरीके से आई थीं और देश में प्रवेश पाने के लिए उन्होंने अपने भाई से शादी की थी। इन आरोपों को लेकर ट्रंप कई बार उन पर तंज कस चुके हैं।

    अब घर पर संघीय एजेंसियों की कार्रवाई के बाद ट्रंप ने उमर को पूरी तरह बेईमान और बुरा इंसान बताया। उन्होंने कहा कि न्याय विभाग इस मामले को देख रहा है। हालांकि, ट्रंप की टिप्पणियां अपने आप में जांच के आरोपों को साबित नहीं करतीं।

    अदालत के वारंट पर हुई कार्रवाई

    अमेरिकी न्याय विभाग के प्रवक्ता ने पुष्टि की कि वाशिंगटन डीसी में विभाग की ओर से सुरक्षित किए गए अदालत के वारंट के तहत कार्रवाई की गई। इसे जारी संघीय जांच का हिस्सा बताया गया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को इल्हान उमर के घर के बाहर होमलैंड सिक्योरिटी इन्वेस्टिगेशंस की जैकेट पहने कई एजेंट दिखाई दिए। जांच से जुड़े एक व्यक्ति ने इसे कथित इमिग्रेशन फ्रॉड से संबंधित बताया है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में जांच के निष्कर्ष या आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है।

    इल्हान उमर बोलीं- राजनीतिक विरोधियों को बनाया जा रहा निशाना

    इल्हान उमर ने कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि वह ठीक हैं। उन्होंने ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

    उमर ने कहा कि पिछले दस वर्षों से ट्रंप उन्हें कथित तौर पर बेबुनियाद आरोपों और बदनाम करने वाले अभियानों के जरिए निशाना बनाते रहे हैं। उनके मुताबिक, घर पर हुई कार्रवाई राजनीतिक डराने-धमकाने की उसी कोशिश का नया कदम है। उन्होंने यह भी कहा कि वह चुप नहीं रहेंगी।

    इस घटनाक्रम ने अमेरिका में राजनीतिक टकराव को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। एक ओर न्याय विभाग ने कार्रवाई को जारी संघीय जांच का हिस्सा बताया है, वहीं उमर इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दे रही हैं। जांच के नतीजों से ही स्पष्ट हो सकेगा कि मामले में लगाए जा रहे आरोपों के समर्थन में क्या तथ्य सामने आते हैं।