Tag: Donald Trump

  • भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी नए दौर में प्रवेश करने को तैयार, ट्रेड एग्रीमेंट पर तेज हुई बातचीत

    भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी नए दौर में प्रवेश करने को तैयार, ट्रेड एग्रीमेंट पर तेज हुई बातचीत


    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर गतिविधियां तेज हो गई हैं। हाल ही में फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक सहयोग को नई गति मिली है। अब इस दिशा में अगला महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर इस सप्ताह नई दिल्ली पहुंच रहे हैं जहां वे केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और अन्य वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों के साथ कई दौर की महत्वपूर्ण बैठकें करेंगे।

    भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने बताया कि जी7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच व्यापार क्षेत्रीय सुरक्षा और गहरी आर्थिक साझेदारी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा हुई थी। उनके अनुसार दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाया जाए तथा व्यापारिक सहयोग के नए अवसरों को बढ़ावा दिया जाए।

    इसी कड़ी में अब दोनों देशों के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में बातचीत तेज हो गई है। लंबे समय से चल रही वार्ताओं के बाद दोनों पक्षों का मानना है कि समझौता लगभग तैयार है और अब केवल कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अंतिम सहमति बनना बाकी है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा कि वे नई दिल्ली में जैमीसन ग्रीर के स्वागत के लिए उत्साहित हैं और व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए पीयूष गोयल के साथ कई महत्वपूर्ण बैठकें निर्धारित की गई हैं।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय के अनुसार जैमीसन ग्रीर भारत दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में ऐतिहासिक भारत-अमेरिका संयुक्त बयान और अंतरिम व्यापार समझौते से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होगी। यह दौरा फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू की गई व्यापक व्यापार वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।

    हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने भी संकेत दिया था कि भारत और अमेरिका व्यापार समझौते पर सहमति बनने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। जी7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और जल्द ही महत्वपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं।

    भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत होते रहे हैं। तकनीक मैन्युफैक्चरिंग ऊर्जा फार्मास्यूटिकल्स रक्षा और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित व्यापार समझौता लागू होने के बाद निवेश बढ़ेगा व्यापारिक बाधाएं कम होंगी और दोनों देशों के उद्योगों को नए अवसर मिलेंगे।

    भारत दौरे के बाद जैमीसन ग्रीर उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद जाएंगे जहां वे वहां के वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। हालांकि फिलहाल सबसे अधिक ध्यान नई दिल्ली में होने वाली उन बैठकों पर है जिनसे भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    दोनों देशों की सरकारें इस समझौते को केवल व्यापार तक सीमित नहीं मानतीं बल्कि इसे रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले कदम के रूप में देख रही हैं। यही कारण है कि नई दिल्ली में होने वाली ये बैठकें वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक हलकों में भी विशेष महत्व रखती हैं।

  • ट्रंप बनाम मेलोनी: फोटो विवाद के बाद ईरान मुद्दे पर आमने-सामने आए अमेरिका और इटली

    ट्रंप बनाम मेलोनी: फोटो विवाद के बाद ईरान मुद्दे पर आमने-सामने आए अमेरिका और इटली


    नई दिल्ली । अमेरिका और इटली के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर नई टिप्पणी करते हुए ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उससे जुड़े सुरक्षा खतरों के मुद्दे पर इटली के रुख पर सवाल उठाए हैं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि नाटो पर खरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद इटली और उसकी प्रधानमंत्री ईरान से जुड़े गंभीर परमाणु खतरे के मुद्दे पर अमेरिका के साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में कहा कि दशकों से अमेरिका अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है लेकिन जब वैश्विक सुरक्षा और ईरान के परमाणु खतरे जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों की बात आती है तो कुछ सहयोगी देश अपेक्षित समर्थन नहीं देते। उन्होंने कहा कि यह स्थिति चिंता का विषय है और इससे साझेदारी की गंभीरता पर सवाल खड़े होते हैं।

    ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हाल ही में जी7 शिखर सम्मेलन को लेकर उनके और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच जुबानी जंग देखने को मिली थी। ट्रंप ने दावा किया था कि जी7 सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए बार-बार आग्रह किया था। इस बयान के सामने आने के बाद इटली में राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

    प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने ट्रंप के दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि न तो वह और न ही इटली कभी किसी के सामने गिड़गिड़ाते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ट्रंप की बातें पूरी तरह काल्पनिक हैं और उन्हें समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के नेताओं के बारे में इस तरह की टिप्पणियां क्यों करते हैं।

    मेलोनी ने आगे कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं लेकिन किसी लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित नेता का सार्वजनिक रूप से अपमान करना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को अपने सहयोगियों के बजाय पश्चिमी देशों के विरोधियों के प्रति अधिक सख्त रवैया अपनाना चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप और मेलोनी के बीच बढ़ती बयानबाजी केवल व्यक्तिगत मतभेदों तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे वैश्विक सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग प्राथमिकताएं भी दिखाई देती हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका लंबे समय से कड़ा रुख अपनाता रहा है जबकि यूरोपीय देशों का दृष्टिकोण कई बार अधिक संतुलित और कूटनीतिक रहा है।

    हालांकि अमेरिका और इटली नाटो के महत्वपूर्ण सदस्य हैं और कई वैश्विक मुद्दों पर एक-दूसरे के करीबी सहयोगी माने जाते हैं लेकिन हालिया घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच कुछ विषयों पर उभरते मतभेदों को सार्वजनिक रूप से सामने ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बढ़ी यह तल्खी कूटनीतिक स्तर पर किस दिशा में आगे बढ़ती है।

  • ईरान समझौते की कमान जेडी वेंस के हाथ: अमेरिकी राजनीति में बढ़ा कद, जोखिम भी उतना ही बड़ा

    ईरान समझौते की कमान जेडी वेंस के हाथ: अमेरिकी राजनीति में बढ़ा कद, जोखिम भी उतना ही बड़ा

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक वार्ता ने वैश्विक राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अब अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान के साथ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश में वेंस न केवल प्रमुख वार्ताकार बनकर उभरे हैं बल्कि इस पहल की सफलता और असफलता दोनों का राजनीतिक भार भी उनके कंधों पर आ गया है।

    स्विट्जरलैंड में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चल रही बातचीत को ट्रंप प्रशासन एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देख रहा है। अमेरिकी नेतृत्व का मानना है कि यदि यह पहल सफल होती है तो मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा बदलाव संभव हो सकता है। इसी कारण जेडी वेंस को इस पूरी प्रक्रिया का प्रमुख चेहरा बनाया गया है।

    वेंस ने हाल ही में कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों का एक नया अध्याय शुरू हो। उनका कहना था कि यदि ईरान क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों और परमाणु हथियारों की महत्वाकांक्षा से पीछे हटता है तो अमेरिका भी संबंधों को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार है। इस बयान ने साफ संकेत दिया कि ट्रंप प्रशासन टकराव के बजाय संवाद के रास्ते को प्राथमिकता देना चाहता है।

    पिछले कुछ सप्ताहों में जेडी वेंस की भूमिका और प्रभाव दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। विदेश मंत्री समेत कई वरिष्ठ अधिकारी जहां अपेक्षाकृत कम सक्रिय दिखाई दिए वहीं वेंस लगातार सरकार का पक्ष रखते हुए वार्ता को आगे बढ़ाने में जुटे रहे। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से उनकी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि यदि बातचीत सफल रही तो उसका श्रेय वह स्वयं लेंगे और यदि विफल रही तो दोष वेंस को देंगे। हालांकि यह टिप्पणी हल्के अंदाज में की गई थी लेकिन इससे इस वार्ता में वेंस की केंद्रीय भूमिका स्पष्ट हो जाती है।

    दूसरी ओर इस समझौते को लेकर अमेरिकी राजनीति में तीखी बहस भी छिड़ गई है। डेमोक्रेटिक नेताओं ने इसे ईरान के प्रति अत्यधिक नरम रुख बताते हुए आलोचना की है। उनका मानना है कि इससे ईरान को आर्थिक और रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं रिपब्लिकन पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेताओं ने भी चिंता जताई है कि अतिरिक्त संसाधनों का उपयोग ईरान अपनी सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने में कर सकता है।

    आलोचनाओं के बावजूद ट्रंप प्रशासन इस पहल को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि मान रहा है। प्रशासन का तर्क है कि वर्षों से जमे गतिरोध को तोड़ते हुए पहली बार उच्च स्तर पर प्रत्यक्ष संवाद स्थापित हुआ है। अधिकारियों का मानना है कि बातचीत के जरिए स्थायी समाधान तलाशने का प्रयास किया जाना चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले 60 दिन जेडी वेंस के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं। यदि वार्ता सकारात्मक परिणाम देती है तो उनकी छवि एक प्रभावशाली कूटनीतिक नेता और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के जानकार राजनेता के रूप में मजबूत होगी। वहीं यदि बातचीत विफल होती है तो उन्हें विपक्ष ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी के भीतर भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

    यही कारण है कि ईरान के साथ चल रही यह वार्ता केवल दो देशों के संबंधों तक सीमित नहीं रह गई है। इसके परिणाम अमेरिकी राजनीति और जेडी वेंस के भविष्य दोनों पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह पहल ऐतिहासिक सफलता साबित होगी या फिर अमेरिकी कूटनीति के लिए एक नई चुनौती बनकर सामने आएगी।

  • ट्रंप के दबाव का भारत ने दिया रणनीतिक जवाब: दुनिया भर में बनाए नए साझेदार, घटाई निर्भरता

    ट्रंप के दबाव का भारत ने दिया रणनीतिक जवाब: दुनिया भर में बनाए नए साझेदार, घटाई निर्भरता


    नई दिल्ली । वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के तेजी से बदलते परिदृश्य में भारत ने अपनी विदेश और आर्थिक नीति को नई दिशा देते हुए एक ऐसी रणनीति अपनाई है जिसने उसे अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं के बीच भी मजबूत स्थिति में बनाए रखा है। अमेरिका की बदलती नीतियों, व्यापारिक दबावों और वैश्विक संघर्षों के दौर में भारत ने किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय विविधीकरण यानी डायवर्सिफिकेशन को अपनी रणनीति का प्रमुख आधार बनाया है।

    अमेरिका लंबे समय से भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई ऐसे फैसले सामने आए जिन्होंने भारतीय हितों को प्रभावित किया। एच-1बी वीजा नियमों को सख्त करने की घोषणा, प्रवासन नीतियों में बदलाव और व्यापारिक मोर्चे पर टैरिफ जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौतियां पैदा कीं। हालांकि भारत ने इन चुनौतियों का जवाब किसी टकराव या प्रतिक्रिया की राजनीति से नहीं बल्कि दूरदर्शी रणनीतिक योजना के जरिए दिया।

    भारत ने सबसे पहले ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी निर्भरता को व्यापक रूप से फैलाया। पहले जहां भारत की तेल जरूरतें मुख्य रूप से पश्चिम एशिया पर निर्भर थीं, वहीं अब रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से ऊर्जा आयात का नेटवर्क विकसित किया गया है। वेनेजुएला के साथ भी सहयोग की संभावनाओं पर काम चल रहा है। इस रणनीति का लाभ हाल के अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में सफल रहा।

    स्वास्थ्य और फार्मा क्षेत्र में भी भारत ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मेडिकल उपकरणों और तकनीकी स्वास्थ्य संसाधनों के लिए चीन पर निर्भरता कम करते हुए अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और इजरायल जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाया गया। साथ ही मेक इन इंडिया अभियान के तहत देश में मेडिकल डिवाइस पार्क विकसित किए गए हैं। फार्मास्युटिकल उद्योग में एपीआई यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट के लिए लंबे समय तक चीन पर निर्भर रहने वाला भारत अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों के साथ साझेदारी को मजबूत कर रहा है।

    तकनीक और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। ताइवान, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के साथ सहयोग के जरिए भारत अपने इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप निर्माण क्षेत्र को मजबूत करने में जुटा है। गुजरात और असम में स्थापित की जा रही सेमीकंडक्टर परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।

    रक्षा क्षेत्र में भारत ने संतुलित कूटनीति का परिचय देते हुए अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ फ्रांस, रूस, इजरायल और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ भी रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखा है। इससे भारत को रक्षा उपकरणों और तकनीक के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर होने से बचने में मदद मिली है।

    व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी भारत ने बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ सीईपीए, ऑस्ट्रेलिया के साथ ईसीटीए, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की दिशा में प्रगति तथा खाड़ी देशों के साथ निवेश साझेदारी इस रणनीति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इसके अलावा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जैसी पहलें भारत की वैश्विक आर्थिक पहुंच को और मजबूत कर रही हैं।

    स्पष्ट है कि बदलते वैश्विक माहौल में भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित कूटनीति और विविधीकरण को अपनी नीति का आधार बनाया है। यही वजह है कि वैश्विक संकटों और महाशक्तियों के दबाव के बावजूद भारत न केवल अपनी आर्थिक और सामरिक स्थिति को मजबूत बनाए हुए है बल्कि विश्व मंच पर एक विश्वसनीय और आत्मनिर्भर शक्ति के रूप में भी उभर रहा है।

  • ट्रंप ने पीएम मोदी को बताया ‘महान और सख्त नेता’, भारत की आर्थिक तरक्की की भी की तारीफ

    ट्रंप ने पीएम मोदी को बताया ‘महान और सख्त नेता’, भारत की आर्थिक तरक्की की भी की तारीफ


    नई दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक रूप से सराहना की है। उन्होंने पीएम मोदी को महान नेता और बहुत सख्त इंसान बताते हुए उनकी नेतृत्व शैली और राजनीतिक क्षमता की प्रशंसा की। यह बयान उन्होंने अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू के दौरान दिया, जिसमें वैश्विक नेतृत्व, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर विस्तार से चर्चा हुई।

    इंटरव्यू के दौरान ट्रंप ने कहा कि दुनिया के चुनिंदा नेताओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे नेता हैं जिनकी वे सबसे अधिक इज्जत करते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी का लंबे समय से सत्ता में बने रहना और भारत जैसे विशाल लोकतंत्र का नेतृत्व करना उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ को दर्शाता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत जैसे देश में स्थिर नेतृत्व बनाए रखना आसान नहीं है, लेकिन पीएम मोदी ने यह काम सफलतापूर्वक किया है।

    ट्रंप ने आगे कहा कि पीएम मोदी बाहर से शांत स्वभाव के दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में वह बेहद दृढ़ और सख्त निर्णय लेने वाले नेता हैं। उनके अनुसार, यही संयोजन उन्हें एक प्रभावशाली वैश्विक नेता बनाता है। उन्होंने यह भी कहा कि नेतृत्व के उच्च स्तर पर पहुंचने के लिए बुद्धिमत्ता और कठोर निर्णय क्षमता दोनों जरूरी हैं, और मोदी में यह दोनों गुण मौजूद हैं।

    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत की आर्थिक प्रगति का भी उल्लेख किया और कहा कि हाल के वर्षों में भारत ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। उन्होंने पीएम मोदी की नीतियों को इस विकास का एक महत्वपूर्ण कारण बताया। ट्रंप ने यह भी कहा कि मोदी अक्सर शांति और कूटनीति को प्राथमिकता देते हैं, जो उनके नेतृत्व को और अधिक प्रभावी बनाता है।

    इंटरव्यू में ट्रंप ने वैश्विक नेताओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी तारीफ की और दोनों नेताओं को मजबूत नेतृत्व का उदाहरण बताया। हालांकि, उन्होंने विशेष रूप से पीएम मोदी को ऐसे नेताओं में शामिल किया जिनकी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सबसे अधिक पहचान और सम्मान है।

    गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं और लंबे समय से देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। उनके कार्यकाल के दौरान भारत ने आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत की वैश्विक पहचान मजबूत हुई है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी भूमिका लगातार बढ़ी है।

    भारत और अमेरिका के संबंधों में भी पिछले वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ा है। हाउडी मोदी और नमस्ते ट्रंप जैसे बड़े कार्यक्रमों ने दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत और कूटनीतिक संबंधों को भी विशेष पहचान दी थी। ट्रंप की यह ताजा टिप्पणी एक बार फिर भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक राजनीति में पीएम मोदी की भूमिका को चर्चा के केंद्र में ले आई है।

  • ट्रंप के दामाद की लग्जरी परियोजना पर अल्बानिया में विरोध, हजारों लोग सड़कों पर उतरे

    ट्रंप के दामाद की लग्जरी परियोजना पर अल्बानिया में विरोध, हजारों लोग सड़कों पर उतरे


    नई दिल्ली। अल्बानिया में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर की प्रस्तावित लग्जरी रिजॉर्ट परियोजना को लेकर विरोध तेज हो गया है। राजधानी तिराना में बुधवार को हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यह परियोजना पर्यावरण और राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

    करीब 5 अरब यूरो की लागत से प्रस्तावित यह परियोजना ज़्वेर्नेक (Zvernec) क्षेत्र के पास विकसित की जानी है। यह इलाका एक संरक्षित वेटलैंड के नजदीक स्थित है, जहां फ्लेमिंगो, सील और समुद्री कछुओं समेत कई दुर्लभ जीव-जंतु पाए जाते हैं। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर पर्यटन परियोजना शुरू होने से इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने “अल्बानिया इज नॉट फॉर सेल” और “न्यू अल्बानिया” जैसे नारे लगाए। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री एदी रामा के कार्यालय के बाहर एकत्र हुए और शहर के प्रमुख बुलेवार्ड पर लंबी रैली निकाली।

    प्रदर्शन में शामिल लिआंड लाकरोरी ने कहा कि ज़्वेर्नेक परियोजना को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। उनके अनुसार यह मामला पिछले 35 वर्षों से चली आ रही अपारदर्शी व्यवस्था का प्रतीक बन गया है और अब जनता बदलाव चाहती है।

    यह विवाद प्रधानमंत्री एदी रामा के लिए भी राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है। वर्ष 2013 से सत्ता में मौजूद रामा की सरकार पर विपक्ष और आलोचक भ्रष्टाचार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित न कर पाने तथा स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं में अपेक्षित सुधार नहीं करने के आरोप लगाते रहे हैं।

    हालांकि, प्रधानमंत्री रामा ने हाल ही में एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया कि परियोजना आगे बढ़ेगी और इसके क्रियान्वयन में सभी नियमों का पालन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लगातार कदम उठा रही है। रामा ने विशेष अभियोजन कार्यालय SPAK का उल्लेख करते हुए कहा कि इस संस्था ने हाल के वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच शुरू की है।

    इसके बावजूद सरकार के प्रति लोगों का अविश्वास कम नहीं हुआ है। इसी वर्ष भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उपप्रधानमंत्री बेलिंडा बल्लुकु के खिलाफ भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। बाद में उन्हें पद से हटा दिया गया, लेकिन जनता की नाराजगी बनी हुई है।

    प्रदर्शनकारी फैबियो ब्राकाज का कहना है कि देश लंबे समय से एक जैसी राजनीति देख रहा है और अब नागरिक बेहतर प्रशासन तथा अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।

    गौरतलब है कि जैरेड कुशनर और उनकी पत्नी इवांका ट्रंप इस परियोजना के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। कुछ वर्ष पहले दोनों ने नौका यात्रा के दौरान अल्बानिया का दौरा किया था, जिसके बाद यहां निवेश की योजना बनाई गई। पिछले महीने निर्माण स्थल के आसपास बाड़ लगाए जाने के बाद स्थानीय लोगों का विरोध और तेज हो गया। बढ़ते दबाव के चलते बाड़ हटानी पड़ी, लेकिन परियोजना को लेकर विवाद अभी भी जारी है।

  • ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ

    ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ




    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य बनाने वाले अब्राहम समझौते का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस तरह का समझौता देश की बुनियादी विचारधारा से मेल नहीं खाता और पाकिस्तान फिलहाल इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगा।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब Donald Trump ने मध्य-पूर्व में चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच कई मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। अमेरिका चाहता है कि Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इजरायल के साथ संबंध सामान्य करें।

    सोमवार रात एक टीवी कार्यक्रम में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें नहीं लगता कि पाकिस्तान को ऐसे किसी समझौते का हिस्सा बनना चाहिए जो उसकी वैचारिक और राजनीतिक नीति के खिलाफ हो। उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान का पुराना रुख आज भी कायम है और जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

    पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल पर भरोसे का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन देशों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ स्थायी समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी साफ लिखा होता है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है।

    गौरतलब है कि अब्राहम अकॉर्ड 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुआ था। इसके तहत United Arab Emirates और Bahrain समेत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस समझौते का हिस्सा बने।

    ख्वाजा आसिफ पहले भी इजरायल के खिलाफ कड़े बयान दे चुके हैं। हाल ही में उन्होंने इजरायल को “इंसानियत के लिए अभिशाप” बताते हुए गाजा में कथित नरसंहार का आरोप लगाया था। पाकिस्तान सरकार का यह ताजा बयान संकेत देता है कि फिलहाल इस्लामाबाद अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

  • सऊदी-इजरायल संबंध: MBS के रुख को लेकर दावे तेज, अब्राहम अकॉर्ड पर फिर बढ़ी हलचल

    सऊदी-इजरायल संबंध: MBS के रुख को लेकर दावे तेज, अब्राहम अकॉर्ड पर फिर बढ़ी हलचल




    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) को लेकर इजरायल को मान्यता देने के दावों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी माइक इवांस के बयान के बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि MBS निजी बातचीत में इजरायल को मान्यता देने की इच्छा जता चुके हैं।

    इवांस के अनुसार, क्राउन प्रिंस ने कहा था कि वह इजरायल को मान्यता देने के पक्ष में हैं, लेकिन उनके पिता यानी सऊदी किंग सलमान के कारण यह निर्णय आगे नहीं बढ़ पा रहा है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    अब्राहम अकॉर्ड पर ट्रंप की सक्रियता
    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अब्राहम अकॉर्ड को विस्तार देने की कोशिशों में जुटे हैं। उन्होंने सऊदी अरब समेत कई मुस्लिम देशों पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव बढ़ाया है। ट्रंप का कहना है कि इससे मध्य-पूर्व में शांति की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।

    अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत 2020 में हुई थी, जब यूएई और बहरीन ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर सहमति जताई थी। बाद में मोरक्को, सूडान और कुछ अन्य देश भी इसमें शामिल हुए।

    सऊदी अरब का आधिकारिक रुख
    हालांकि सऊदी अरब की ओर से अब तक साफ कर दिया गया है कि जब तक फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह इजरायल को मान्यता नहीं देगा। रियाद का कहना है कि फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान ही किसी भी सामान्यीकरण की पहली शर्त है।

    राजनीतिक बयान और कूटनीतिक दबाव
    माइक इवांस ने दावा किया कि उन्होंने क्राउन प्रिंस के साथ लंबी बातचीत की थी, जिसमें इजरायल को लेकर सकारात्मक संकेत मिले थे। हालांकि इन दावों को लेकर कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है।दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन और उनके सहयोगी लगातार यह तर्क दे रहे हैं कि अब्राहम अकॉर्ड का विस्तार क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग के लिए जरूरी है।

  • होर्मुज स्ट्रेट खुलने के संकेत, अमेरिका-ईरान समझौते की बढ़ी उम्मीद; दुनिया को मिल सकती है राहत

    होर्मुज स्ट्रेट खुलने के संकेत, अमेरिका-ईरान समझौते की बढ़ी उम्मीद; दुनिया को मिल सकती है राहत



    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में महीनों से जारी तनाव अब कम होता दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम और व्यापक समझौते को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देश एक संभावित डील के काफी करीब पहुंच चुके हैं। इसी बीच ईरान ने बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि अगर समझौता अंतिम रूप लेता है तो रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज स्ट्रेट में अगले 30 दिनों के भीतर जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो सकती है।

    दरअसल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर हमलों के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर पहुंच गया था। इसके बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर निगरानी और नियंत्रण सख्त कर दिया था, जिससे इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट आ गई। दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस सप्लाई इसी समुद्री रास्ते से गुजरती है, इसलिए इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी उथल-पुथल मच गई थी।

    ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार संभावित समझौते में युद्ध को खत्म करने, क्षेत्र में तनाव कम करने और समुद्री यातायात बहाल करने जैसे मुद्दों पर सहमति बनने की कोशिश हो रही है। ईरान ने संकेत दिए हैं कि यदि सभी पक्ष सहमत होते हैं तो एक महीने के भीतर जहाजों की आवाजाही युद्ध-पूर्व स्थिति में लौट सकती है।

    उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी हाल के दिनों में दावा कर चुके हैं कि ईरान के साथ समझौते को लेकर सकारात्मक प्रगति हुई है। हालांकि परमाणु कार्यक्रम और हाईली एनरिच्ड यूरेनियम जैसे मुद्दों पर अभी दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह सामान्य होता है तो इसका सबसे बड़ा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ेगा। इससे कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है और भारत समेत कई देशों को ऊर्जा संकट से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

  • ट्रंप का बड़ा दावा: ईरान से डील लगभग तय, खुल सकता है होर्मुज़ स्ट्रेट; मिडिल ईस्ट में शांति की उम्मीद बढ़ी

    ट्रंप का बड़ा दावा: ईरान से डील लगभग तय, खुल सकता है होर्मुज़ स्ट्रेट; मिडिल ईस्ट में शांति की उम्मीद बढ़ी

    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित शांति समझौते को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच डील “काफी हद तक तय” हो चुकी है और जल्द ही इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि अमेरिका, ईरान और मध्य-पूर्व के कई सहयोगी देशों के बीच शांति को लेकर महत्वपूर्ण बातचीत हुई है। उन्होंने बताया कि इस प्रस्तावित समझौते में होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा पूरी तरह खोलने का मुद्दा भी शामिल है, जिससे वैश्विक तेल और गैस सप्लाई पर पड़ा दबाव कम हो सकता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि उनकी इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू  से फोन पर सकारात्मक बातचीत हुई है।
    हालांकि ट्रंप ने समझौते की पूरी डिटेल साझा नहीं की, लेकिन साफ कहा कि किसी भी डील के तहत ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से पूरी तरह रोका जाएगा। दूसरी ओर ईरान ने संकेत दिए हैं कि बातचीत में कुछ नरमी जरूर आई है, लेकिन अभी मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच 14 बिंदुओं वाले एक ढांचे पर चर्चा चल रही है, जिसे अगले 30 से 60 दिनों में अंतिम समझौते की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने अमेरिका पर विरोधाभासी बयान देने का आरोप भी लगाया।
    गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर बड़े हमलों के बाद पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ गया था, जिसके जवाब में ईरान ने इजराइल और अमेरिकी सहयोगी देशों को निशाना बनाया था। अप्रैल की शुरुआत में युद्धविराम के बाद से दोनों देशों के बीच बैकडोर बातचीत जारी है और अब ट्रंप के ताजा बयान ने संभावित डील और होर्मुज़ स्ट्रेट खुलने की अटकलों को और तेज कर दिया है।