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  • मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव ट्रंप का बड़ा दावा ईरान के पास समझौते के अलावा कोई विकल्प नहीं अमेरिका पूरी तरह तैयार

    मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव ट्रंप का बड़ा दावा ईरान के पास समझौते के अलावा कोई विकल्प नहीं अमेरिका पूरी तरह तैयार


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव गहराता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान के पास समझौते के अलावा अब कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है लेकिन उनकी पहली प्राथमिकता अब भी कूटनीतिक समाधान और बातचीत ही है। ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर मध्य पूर्व की सुरक्षा और वैश्विक राजनीति को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    व्हाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है और वाशिंगटन हर परिस्थिति के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो मौजूदा सैन्य अभियान को और तेज किया जा सकता है लेकिन अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने पर सहमत हो जाता है तो बातचीत के जरिए समाधान निकालना सबसे बेहतर रास्ता होगा। उनके मुताबिक अमेरिका की नीति स्पष्ट है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे।

    ट्रंप ने कहा कि फिलहाल दो रास्ते खुले हैं। पहला रास्ता सैन्य कार्रवाई का है जिसमें अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकता है जबकि दूसरा रास्ता बातचीत और समझौते का है। उन्होंने दावा किया कि ईरान पहले की तुलना में अब ज्यादा गंभीरता से वार्ता कर रहा है हालांकि उन्होंने यह भी माना कि किसी अंतिम समझौते की अभी कोई गारंटी नहीं है। उनके अनुसार हालात लगातार बदल रहे हैं और आने वाले समय में तस्वीर और साफ होगी।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि यदि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में कोई कदम बढ़ाया तो अमेरिका पहले से कहीं अधिक कड़ी कार्रवाई करेगा। उन्होंने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। ट्रंप का कहना था कि अमेरिका इस मामले में किसी भी तरह का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं है।

    उन्होंने जानकारी दी कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस विदेश मंत्री मार्को रुबियो और प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी ईरानी प्रतिनिधियों के साथ लगातार संपर्क में हैं। ट्रंप के मुताबिक कूटनीतिक प्रयास जारी हैं और अमेरिका बातचीत के सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि यदि वार्ता विफल होती है तो सैन्य विकल्प पूरी तरह तैयार रहेगा।

    अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका की पिछली सैन्य कार्रवाइयों से ईरान की सैन्य क्षमता को बड़ा नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि ईरान के कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया जिससे उसकी ताकत काफी कमजोर हुई है। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका के दबाव अभियान ने पूरे क्षेत्र का रणनीतिक संतुलन बदल दिया है और अब ईरान पहले जैसी स्थिति में नहीं है।

    रूस और चीन की संभावित भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों ने फिलहाल किसी बड़े स्तर पर ईरान के समर्थन में हस्तक्षेप नहीं किया है। उन्होंने दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि वे इस विवाद में सीधे तौर पर शामिल नहीं होंगे। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान के इन दोनों देशों के साथ लंबे समय से संबंध रहे हैं।

    ट्रंप ने अपने पिछले सैन्य अभियानों का बचाव करते हुए कहा कि इन्हीं कदमों की वजह से ईरान परमाणु हथियार हासिल करने में सफल नहीं हो पाया। उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि अमेरिका ने समय रहते कार्रवाई नहीं की होती तो क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी। उनके अनुसार अमेरिका का उद्देश्य युद्ध नहीं बल्कि स्थायी शांति और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना है।

    दूसरी ओर ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसका मकसद परमाणु हथियार बनाना नहीं है। इसके बावजूद अमेरिका और कई पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताते रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच जारी बातचीत और संभावित समझौता पूरी दुनिया की नजरों का केंद्र बना रहेगा।

  • विश्व कप फाइनल में खेल के साथ दिखेगी सियासी हलचल, ट्रंप करेंगे स्पेनिश प्रधानमंत्री की मेजबानी, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति ने बनाई दूरी

    विश्व कप फाइनल में खेल के साथ दिखेगी सियासी हलचल, ट्रंप करेंगे स्पेनिश प्रधानमंत्री की मेजबानी, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति ने बनाई दूरी


    नई दिल्ली ।
    फीफा विश्व कप 2026 का फाइनल मुकाबला खेल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बनने जा रहा है। न्यूयॉर्क के मेटलाइफ स्टेडियम में होने वाले इस मुकाबले में जहां मैदान पर स्पेन और अर्जेंटीना विश्व खिताब के लिए आमने-सामने होंगे, वहीं स्टेडियम के वीआईपी क्षेत्र में विश्व नेताओं की मौजूदगी वैश्विक राजनीति के कई दिलचस्प पहलुओं को सामने लाएगी। इस आयोजन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका भी विशेष रूप से चर्चा में है, क्योंकि उन्हें ऐसे नेता की मेजबानी करनी है जिनके साथ उनके संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं।

    स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज अपनी राष्ट्रीय टीम का उत्साह बढ़ाने के लिए अमेरिका पहुंच रहे हैं। उनके साथ स्पेन के शाही परिवार के सदस्य भी मौजूद रहेंगे। ट्रंप और सांचेज के बीच विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। रक्षा व्यय, नाटो की भूमिका, मध्य पूर्व की स्थिति और अन्य वैश्विक विषयों पर दोनों नेताओं की सार्वजनिक टिप्पणियां कई बार चर्चा का विषय बन चुकी हैं। ऐसे में विश्व कप फाइनल के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात केवल औपचारिक नहीं बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    यदि स्पेन खिताब जीतता है तो पुरस्कार वितरण समारोह में ट्रंप की मौजूदगी और स्पेनिश प्रतिनिधिमंडल के साथ उनका मंच साझा करना भी विशेष महत्व रखेगा। ऐसे अवसर पर खेल और कूटनीति का संगम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतीकात्मक संदेश देने वाला माना जाता है। यही कारण है कि इस मुलाकात पर राजनीतिक विश्लेषकों और वैश्विक मीडिया की विशेष नजर बनी हुई है।

    दूसरी ओर अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेविएर मिलेई ने विश्व कप फाइनल में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया है। उनके इस फैसले के पीछे कोई आधिकारिक कार्यक्रम या राजनीतिक कारण नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अंधविश्वास बताया जा रहा है। मिलेई का मानना है कि जिस तरह उन्होंने अब तक अपनी टीम के सभी मुकाबले अपने आधिकारिक आवास से एक निश्चित स्थान पर बैठकर देखे हैं, उसी क्रम को बनाए रखना टीम के लिए शुभ साबित हुआ है। उनका विश्वास है कि यदि वे इस परंपरा को बदलेंगे तो टीम के प्रदर्शन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

    मिलेई ने यह भी बताया कि प्रतियोगिता के दौरान उन्होंने एक विशेष जैकेट पहनने की आदत भी नहीं बदली है। उनका मानना है कि यह क्रम टीम की जीत से जुड़ गया है और फाइनल जैसे महत्वपूर्ण मुकाबले से पहले वह किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं करना चाहते। अर्जेंटीना में खेल से जुड़े ऐसे व्यक्तिगत विश्वास और परंपराएं पहले भी चर्चा का विषय रही हैं और कई खेल प्रेमी इन्हें टीम के सौभाग्य से जोड़कर देखते हैं।

    अर्जेंटीना के राजनीतिक इतिहास में भी यह धारणा समय-समय पर सामने आती रही है कि मौजूदा राष्ट्रपति का स्टेडियम में उपस्थित होना टीम के लिए शुभ नहीं माना जाता। इसी पृष्ठभूमि में मिलेई ने अपने पूर्व निर्धारित तरीके से ही फाइनल देखने का निर्णय लिया है। हालांकि इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अपनी मान्यता में कोई बदलाव नहीं करेंगे।

    विश्व कप फाइनल इस बार केवल खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों, राजनीतिक संकेतों और व्यक्तिगत मान्यताओं का भी अनूठा संगम बन गया है। मैदान पर खिलाड़ियों का प्रदर्शन जितना महत्वपूर्ण होगा, उतनी ही चर्चा विश्व नेताओं की मौजूदगी, उनकी मुलाकातों और उनसे जुड़े प्रतीकात्मक संदेशों की भी रहने की संभावना है।

  • ट्रंप की ईरान को दोटूक चेतावनी, हत्या की साजिश पर 'अभूतपूर्व सैन्य जवाब' का दावा, बातचीत की सहमति के बीच फिर बढ़ा मध्य-पूर्व का तनाव

    ट्रंप की ईरान को दोटूक चेतावनी, हत्या की साजिश पर 'अभूतपूर्व सैन्य जवाब' का दावा, बातचीत की सहमति के बीच फिर बढ़ा मध्य-पूर्व का तनाव


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर बेहद सख्त बयान देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की हत्या की साजिश सफल होती है तो अमेरिका ऐसा सैन्य जवाब देगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच हाल के दिनों में सैन्य गतिविधियां और कूटनीतिक बयानबाजी लगातार बढ़ रही है।

    ट्रंप ने कहा कि ईरान से जुड़ा खतरा कोई नया विषय नहीं है, बल्कि कई वर्षों से इस प्रकार की आशंकाएं सामने आती रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल ऐसी कोई नई खुफिया जानकारी उपलब्ध नहीं है जो उनकी हत्या की किसी ताजा साजिश की पुष्टि करती हो, लेकिन संभावित खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही की गुंजाइश नहीं होती और अमेरिका हर परिस्थिति के लिए तैयार है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत आगे बढ़ाने की इच्छा जताई है और इस पर सहमति भी बनी है। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि पहले जैसा युद्धविराम अब प्रभावी नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार हालात बदल चुके हैं और आगे की बातचीत पूरी तरह परिस्थितियों तथा ईरान के व्यवहार पर निर्भर करेगी। इस बयान ने संकेत दिया है कि कूटनीतिक संवाद और सैन्य तैयारी दोनों समानांतर रूप से आगे बढ़ सकते हैं।

    हालिया घटनाओं ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा कर दिया है। क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक गतिविधियों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के आसपास हुई घटनाओं के बाद अमेरिका ने ईरान से जुड़े कई रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई की, जिसके बाद क्षेत्रीय स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई। इसके जवाब में ईरान की ओर से भी अमेरिकी हितों को निशाना बनाने के आरोप लगाए गए, जिससे पूरे मध्य-पूर्व में अस्थिरता की आशंकाएं बढ़ गई हैं।

    अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान पर समुद्री गतिविधियों को प्रभावित करने और हालिया समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों या समुद्री यातायात को बाधित करने का प्रयास किया गया तो अमेरिका पहले से अधिक कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान केवल राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि रणनीतिक संकेत भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों को लेकर किसी भी स्तर तक जाने की नीति पर कायम है। दूसरी ओर ईरान के साथ संभावित वार्ता की संभावना यह भी दर्शाती है कि दोनों पक्ष तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते। आने वाले दिनों में दोनों देशों की गतिविधियां केवल मध्य-पूर्व ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विश्व राजनीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में दुनिया की निगाहें अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी रहेंगी।

  • इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच इजरायल की एक खुफिया रिपोर्ट ने नई अंतरराष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने अमेरिका के साथ साझा की गई एक खुफिया जानकारी में दावा किया है कि ईरान ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित योजना बनाई थी। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसके बावजूद इस रिपोर्ट ने सुरक्षा और कूटनीतिक स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसियां लंबे समय से ईरान की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं। इसी निगरानी के दौरान जुटाई गई जानकारी अमेरिका के साथ साझा की गई, जिसके बाद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के बीच इस मामले को लेकर सतर्कता बढ़ गई है। माना जा रहा है कि इस तरह की खुफिया सूचनाएं क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य की रणनीतिक नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस प्रकार के दावों को विश्वसनीय माना जाता है तो इसका असर अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य में होने वाली किसी भी संभावित कूटनीतिक पहल पर पड़ सकता है। हालांकि अब तक किसी भी संबंधित एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं की है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को अभी खुफिया इनपुट के रूप में ही देखा जा रहा है।

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। जनवरी 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। उस घटना के बाद कई बार दोनों देशों के बीच तीखे बयान, प्रतिबंध और सैन्य गतिविधियां देखने को मिली हैं। डोनाल्ड ट्रंप भी पहले सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि उन्हें ईरान से खतरा हो सकता है, हालांकि उन्होंने ऐसे खतरों को लेकर चिंता व्यक्त नहीं की थी।

    हाल के सप्ताहों में क्षेत्र में संघर्षविराम की कोशिशों के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं। विभिन्न सैन्य गतिविधियों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है। इससे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। कई देशों ने संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान पर जोर देने की आवश्यकता भी दोहराई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिम एशिया की परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल इजरायल के इस दावे की आधिकारिक पुष्टि या स्वतंत्र सत्यापन सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में संबंधित देशों की प्रतिक्रियाओं और आधिकारिक जांच के बाद ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कूटनीतिक संवाद और संयम ही क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम साबित हो सकता है।

  • अंकारा NATO शिखर सम्मेलन में कई बड़े फैसले, रक्षा बजट बढ़ाने, यूक्रेन सहायता और ईरान पर सख्त रुख के बीच ट्रंप ने फिर उठाया ग्रीनलैंड का मुद्दा

    अंकारा NATO शिखर सम्मेलन में कई बड़े फैसले, रक्षा बजट बढ़ाने, यूक्रेन सहायता और ईरान पर सख्त रुख के बीच ट्रंप ने फिर उठाया ग्रीनलैंड का मुद्दा

    नई दिल्ली । तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित दो दिवसीय उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) शिखर सम्मेलन कई महत्वपूर्ण निर्णयों और राजनीतिक संदेशों के साथ संपन्न हुआ। बैठक के दौरान सदस्य देशों ने रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने, यूक्रेन को निरंतर सहायता जारी रखने और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक रणनीति पर सहमति जताई। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान, ग्रीनलैंड और सहयोगी देशों को लेकर दिए गए बयानों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ समझौते को समाप्त मानते हुए तेहरान के नेतृत्व पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ईरान को किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जा सकते। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की संभावना कम दिखाई देती है। NATO के संयुक्त घोषणापत्र में भी ईरान से अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने का आग्रह किया गया और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की प्रतिबद्धता दोहराई गई।

    शिखर सम्मेलन में रक्षा खर्च बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुख एजेंडा रहा। सदस्य देशों ने अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने, आधुनिक हथियार प्रणालियों, हवाई एवं मिसाइल रक्षा, मानव रहित तकनीकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और खुफिया क्षमताओं के विकास पर निवेश बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। गठबंधन का उद्देश्य बदलते सुरक्षा वातावरण के अनुरूप अपनी सामूहिक रक्षा क्षमता को और प्रभावी बनाना है। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सभी सदस्य देश अभी निर्धारित रक्षा व्यय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में इस दिशा में प्रयास तेज करने का भरोसा जताया गया।

    यूक्रेन को लेकर भी NATO ने अपना समर्थन दोहराया। सम्मेलन में सदस्य देशों ने सैन्य उपकरण, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए आने वाले वर्षों तक सहयोग बनाए रखने का आश्वासन दिया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने सम्मेलन के दौरान कई नेताओं से मुलाकात कर अतिरिक्त सहयोग की मांग रखी। अमेरिका ने भी यूक्रेन की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए, जिससे संघर्ष के बीच कीव को महत्वपूर्ण समर्थन मिलने की उम्मीद है।

    सम्मेलन के दौरान ग्रीनलैंड का मुद्दा भी एक बार फिर चर्चा में रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्व पर जोर देते हुए अपने पुराने रुख को दोहराया। दूसरी ओर डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड उसके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है और उसके भविष्य का निर्णय स्थानीय जनता तथा डेनमार्क के संवैधानिक ढांचे के अनुसार ही होगा। यूरोपीय पक्ष ने भी इस विषय पर डेनमार्क के रुख का समर्थन किया।

    बैठक के दौरान सहयोगी देशों के बीच रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर भी व्यापक विचार-विमर्श हुआ। कुछ मुद्दों पर मतभेद सामने आने के बावजूद सदस्य देशों ने सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई। विश्लेषकों का मानना है कि इस शिखर सम्मेलन के फैसले आने वाले समय में यूरोप, मध्य पूर्व और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा रणनीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।

    अंकारा शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में NATO अपने रक्षा ढांचे को अधिक आधुनिक और सक्षम बनाने के साथ-साथ यूक्रेन जैसे साझेदार देशों के समर्थन तथा क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

  • सीजफायर टूटते ही फिर भड़की जंग, अमेरिकी हमलों के बाद ईरान का पलटवार, बहरीन और कुवैत में सैन्य ठिकाने बने निशाना

    सीजफायर टूटते ही फिर भड़की जंग, अमेरिकी हमलों के बाद ईरान का पलटवार, बहरीन और कुवैत में सैन्य ठिकाने बने निशाना

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। हालिया संघर्षविराम समाप्त होने के बाद दोनों देशों ने लगातार दूसरे दिन एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की है। अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर हमले किए जाने के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को मिसाइलों और ड्रोन के जरिए निशाना बनाने का दावा किया है। इस घटनाक्रम ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं।

    अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, हालिया अभियान का उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वहां जहाजों पर हो रहे कथित हमलों को रोकना था। इसी रणनीति के तहत उत्तरी ईरान के एक महत्वपूर्ण रेलवे पुल और कुछ अन्य सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इन ठिकानों का उपयोग सैन्य रसद और मिसाइल संचालन के लिए किया जा रहा था।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हालिया घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि समुद्री मार्गों या अमेरिकी हितों पर हमले जारी रहे तो सैन्य कार्रवाई और तेज की जा सकती है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसकी कार्रवाई क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की रक्षा के उद्देश्य से की जा रही है।

    दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिकी हमलों के जवाब में खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया। कुवैत की सेना ने पुष्टि की कि उसके वायु रक्षा तंत्र ने मिसाइलों और ड्रोन से जुड़े हमलों को रोकने की कार्रवाई की। सैन्य अधिकारियों के अनुसार, कई धमाकों की आवाजें वायु रक्षा प्रणाली द्वारा किए गए अवरोधन अभियान के दौरान सुनाई दीं। हालांकि अधिकारियों ने हमलों की उत्पत्ति या संभावित नुकसान के बारे में विस्तृत जानकारी साझा नहीं की है।

    बहरीन में भी स्थिति तनावपूर्ण रही। वहां के गृह मंत्रालय ने हवाई हमले की चेतावनी देने वाले सायरन बजने की पुष्टि की और नागरिकों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की। सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। स्थानीय स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त कर दिया गया है ताकि किसी भी संभावित खतरे से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।

    लगातार दूसरे दिन हुई इस सैन्य कार्रवाई ने पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता की आशंका बढ़ा दी है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। कई देशों ने स्थिति पर नजर बनाए रखी है और संयम बरतने की अपील की है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रहती है तो क्षेत्रीय तनाव और गहरा सकता है। हालांकि कूटनीतिक स्तर पर तनाव कम करने की संभावनाएं भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर टिकी हुई है, क्योंकि इन घटनाओं का प्रभाव केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।

  • ईरान मुद्दे पर मतभेद के बावजूद इटली की प्रधानमंत्री की तारीफ, डोनाल्ड ट्रंप बोले- मेलोनी मुझे बहुत पसंद, रिश्तों में आई नरमी के संकेत

    ईरान मुद्दे पर मतभेद के बावजूद इटली की प्रधानमंत्री की तारीफ, डोनाल्ड ट्रंप बोले- मेलोनी मुझे बहुत पसंद, रिश्तों में आई नरमी के संकेत


    नई दिल्ली ।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ हाल के मतभेदों को स्वीकार करते हुए उनके प्रति सकारात्मक रुख भी जाहिर किया है। उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़े मुद्दे पर दोनों देशों के बीच असहमति जरूर रही, लेकिन इसके बावजूद वह मेलोनी को पसंद करते हैं और उन्हें एक अच्छी नेता मानते हैं। ट्रंप के इस बयान को दोनों नेताओं के संबंधों में नरमी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    तुर्की की राजधानी अंकारा में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय बैठक के दौरान पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान से जुड़े घटनाक्रम के दौरान इटली ने अमेरिका की अपेक्षित मदद नहीं की, जिससे दोनों नेताओं के रिश्तों में कुछ तनाव पैदा हुआ था। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हाल के दिनों में दोनों के बीच बातचीत सकारात्मक रही है और संबंधों में सुधार की संभावना बनी हुई है।

    ट्रंप ने कहा कि जॉर्जिया मेलोनी एक अच्छी इंसान हैं और उनके साथ व्यक्तिगत स्तर पर उनके संबंध सकारात्मक रहे हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद जारी रहा। उनके अनुसार किसी एक मुद्दे पर असहमति का अर्थ यह नहीं है कि व्यापक द्विपक्षीय संबंध प्रभावित हो जाएं।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने बयान में दोहराया कि ईरान से जुड़े हालिया संकट के दौरान उन्होंने इटली से सहयोग की अपेक्षा की थी। उनका कहना था कि अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने से उन्हें निराशा हुई। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर इटली की सरकार पर किसी प्रकार का अत्यधिक दबाव नहीं बनाया और प्रत्येक देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होता है।

    पिछले कुछ सप्ताहों में दोनों नेताओं के संबंधों को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आई थीं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान, नाटो और अन्य वैश्विक मुद्दों को लेकर दोनों देशों की प्राथमिकताओं में अंतर दिखाई दिया था। इसके अलावा कुछ सार्वजनिक टिप्पणियों के बाद दोनों नेताओं के बीच दूरी बढ़ने की अटकलें भी लगाई जा रही थीं।

    जॉर्जिया मेलोनी को लंबे समय तक ट्रंप के करीबी सहयोगियों में गिना जाता रहा है। दोनों नेताओं के बीच कई वैश्विक मुद्दों पर पहले भी समान दृष्टिकोण देखने को मिला था। हालांकि हालिया घटनाक्रम के दौरान ईरान से जुड़े फैसलों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक रुख को लेकर दोनों के बीच मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए।

    विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के ताजा बयान का उद्देश्य मतभेदों को स्वीकार करने के साथ-साथ सहयोग की संभावनाओं को भी खुला रखना है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सहयोगी देशों के बीच कई मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण होना सामान्य माना जाता है, लेकिन संवाद और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना संबंधों की मजबूती के लिए महत्वपूर्ण होता है।

    आने वाले समय में अमेरिका और इटली के बीच रक्षा, व्यापार, नाटो सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर होने वाली बातचीत दोनों देशों के संबंधों की दिशा तय करेगी। फिलहाल ट्रंप के बयान से यह संकेत मिला है कि मतभेदों के बावजूद दोनों पक्ष संवाद बनाए रखने और भविष्य में सहयोग बढ़ाने की संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं।

  • अमेरिका-ईरान तनाव और गहराया, ट्रंप बोले- समझौते का दौर खत्म; मध्य पूर्व में बढ़ी नई टकराव की आशंका

    अमेरिका-ईरान तनाव और गहराया, ट्रंप बोले- समझौते का दौर खत्म; मध्य पूर्व में बढ़ी नई टकराव की आशंका

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह ईरान के साथ किसी भी नए समझौते के पक्ष में नहीं हैं और उनके अनुसार दोनों देशों के बीच समझौते की संभावना अब समाप्त हो चुकी है। ट्रंप के इस बयान ने पहले से तनावपूर्ण हालात के बीच नई कूटनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के नेतृत्व और उसकी नीतियों की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी नए समझौते की कोई आवश्यकता नहीं है और अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों तथा क्षेत्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देता रहेगा। उनके बयान को हाल के सैन्य घटनाक्रम और दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि हाल की घटनाओं के बाद उन्हें नहीं लगता कि संघर्ष विराम से जुड़े प्रयास प्रभावी रूप से लागू हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात यह दर्शाते हैं कि दोनों देशों के बीच विश्वास का स्तर काफी कमजोर हो चुका है। ऐसे में किसी नए समझौते की संभावना फिलहाल बेहद सीमित दिखाई देती है।

    हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियों में भी तेजी देखने को मिली है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसने क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों और समुद्री मार्गों की रक्षा के उद्देश्य से आवश्यक कार्रवाई की है। वहीं दूसरी ओर ईरान भी लगातार अपने रुख पर कायम है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और अधिक बढ़ गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बने हुए हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    ट्रंप ने अपनी टिप्पणी के दौरान नाटो और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर लगातार विचार कर रहा है। उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई विषयों पर नए सिरे से रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।

    मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों और ऊर्जा क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, निवेशकों की बढ़ती सतर्कता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया है। कई देशों ने स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखते हुए संयम और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि तनाव कम करने के लिए प्रभावी कूटनीतिक प्रयास नहीं किए गए, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में दुनिया की निगाहें दोनों देशों के अगले कदम और संभावित कूटनीतिक पहल पर टिकी हुई हैं।

  • अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

    अंकारा में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा मंथन, नाटो समिट में ट्रंप का फोकस रक्षा बजट, हथियार सहयोग और रूस-यूक्रेन युद्ध पर रहेगा

    नई दिल्ली। वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और बदलते भू-राजनीतिक हालात के बीच नाटो का आगामी शिखर सम्मेलन तुर्किए की राजधानी अंकारा में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी सबसे अधिक चर्चा में है। सम्मेलन के दौरान उनका मुख्य फोकस रक्षा खर्च बढ़ाने, सदस्य देशों के बीच जिम्मेदारियों के संतुलित बंटवारे और रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करने पर रहेगा। इसके साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं।

    ट्रंप सम्मेलन के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। दोनों नेताओं के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को लेकर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा ट्रंप यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से भी अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इन बैठकों में क्षेत्रीय संघर्षों, सुरक्षा सहयोग और भविष्य की रणनीति पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

    समिट के कार्यक्रम के अनुसार ट्रंप नाटो नेताओं के आधिकारिक स्वागत समारोह, सामूहिक फोटो सत्र और कार्यकारी बैठकों में हिस्सा लेंगे। सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष रक्षा और सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रस्तावों पर चर्चा करेंगे। समापन से पहले ट्रंप मीडिया को संबोधित करेंगे और उसके बाद अपनी निर्धारित द्विपक्षीय बैठकों को पूरा करेंगे।

    इस बार सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण विषय नाटो देशों द्वारा रक्षा बजट बढ़ाने की प्रतिबद्धता माना जा रहा है। पिछले वर्ष सदस्य देशों ने अपनी सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत रक्षा क्षेत्र पर खर्च करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया था। अब इस लक्ष्य की दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी। अमेरिका चाहता है कि सभी सदस्य देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए तय समयसीमा के भीतर रक्षा निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि करें।

    अमेरिकी पक्ष का मानना है कि यूरोप के कई देशों ने रक्षा खर्च बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। पोलैंड, नॉर्डिक देशों और बाल्टिक क्षेत्र के देशों को इस मामले में अग्रणी बताया जा रहा है, जबकि जर्मनी भी निर्धारित लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इसके बावजूद अमेरिका का मानना है कि सभी सदस्य देशों को समान रूप से जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि गठबंधन का सामूहिक सुरक्षा ढांचा और अधिक मजबूत बन सके।

    सम्मेलन में रक्षा उत्पादन बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के संयुक्त निर्माण पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। अमेरिका का उद्देश्य सहयोगी देशों के साथ आधुनिक हथियार प्रणालियों, रक्षा तकनीक और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। माना जा रहा है कि सम्मेलन के दौरान रक्षा क्षेत्र में कई बड़े निवेश और सैन्य खरीद से जुड़े समझौतों की घोषणा भी हो सकती है, जिनकी कुल कीमत अरबों डॉलर तक पहुंच सकती है।

    रूस-यूक्रेन युद्ध भी सम्मेलन के सबसे अहम विषयों में रहेगा। ट्रंप और जेलेंस्की की प्रस्तावित बैठक में युद्ध समाप्त करने के संभावित विकल्पों और कूटनीतिक प्रयासों पर चर्चा होने की संभावना है। अमेरिका का कहना है कि युद्ध को जल्द समाप्त करना मानवीय और वैश्विक सुरक्षा दोनों दृष्टि से आवश्यक है। बैठक के बाद ट्रंप की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बातचीत हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बदली है और इसी कारण नाटो अपने रणनीतिक ढांचे में व्यापक बदलाव कर रहा है। ऐसे समय में अंकारा समिट को गठबंधन की भविष्य की रक्षा नीति, सामूहिक सुरक्षा और सदस्य देशों की साझा जिम्मेदारियों को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण सम्मेलन माना जा रहा है।

  • अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की रोक खारिज की, लाखों भारतीय परिवारों को बड़ी राहत

    अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की रोक खारिज की, लाखों भारतीय परिवारों को बड़ी राहत

    नई दिल्ली । अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने जन्म के आधार पर नागरिकता यानी बर्थराइट सिटिजनशिप को बरकरार रखते हुए ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास को खारिज कर दिया है, जिसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को नागरिकता देने पर रोक लगाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले अधिकांश बच्चों को नागरिकता का अधिकार प्राप्त रहेगा। इस फैसले को अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से दिए अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश के जरिए संविधान में प्रदत्त अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि जन्म के आधार पर नागरिकता का सिद्धांत अमेरिकी संविधान में स्पष्ट रूप से स्थापित है और इसमें बदलाव केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही संभव है। इस निर्णय के साथ ट्रंप प्रशासन का वह आदेश प्रभावी नहीं हो सका, जिसमें अवैध प्रवासियों और अस्थायी वीजा धारकों के अमेरिका में जन्मे बच्चों को नागरिकता से वंचित करने की बात कही गई थी।

    बर्थराइट सिटिजनशिप का आधार अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन है, जो वर्ष 1868 में लागू हुआ था। इसके अनुसार अमेरिका में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति, जो अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र में आता है, अमेरिकी नागरिक माना जाएगा। इसी प्रावधान को लेकर विवाद पैदा हुआ था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसे पूरी तरह वैध और प्रभावी माना है।

    अदालत ने अपने निर्णय में वर्ष 1898 के ऐतिहासिक वुंग किम आर्क मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में भी यह सिद्धांत स्थापित किया गया था कि अमेरिका में जन्म लेने वाला बच्चा अमेरिकी नागरिक होगा, भले ही उसके माता-पिता किसी अन्य देश के नागरिक हों। सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने कानूनी सिद्धांत को दोबारा स्वीकार करते हुए कहा कि संविधान की मूल भावना में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जा सकता।

    इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव उन लाखों विदेशी नागरिकों पर पड़ेगा जो अमेरिका में नौकरी, व्यवसाय या शिक्षा के उद्देश्य से रह रहे हैं। भारतीय समुदाय भी इससे सीधे तौर पर लाभान्वित होगा। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर एच-1बी, एल-1 और अन्य कार्य वीजा पर कार्यरत हैं, जबकि हजारों छात्र एफ-1 वीजा पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अब उनके अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता को लेकर किसी प्रकार की कानूनी अनिश्चितता नहीं रहेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीय परिवारों के लिए भी राहत लेकर आया है। हालांकि इस निर्णय का स्थायी निवास या वीजा प्रक्रिया पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका में जन्मे बच्चों की नागरिकता पहले की तरह सुरक्षित बनी रहेगी। इससे लंबे समय से अमेरिका में रह रहे भारतीय परिवारों की चिंता काफी हद तक कम होगी।

    हालांकि अदालत के इस फैसले के बाद भी बर्थ टूरिज्म यानी केवल बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के उद्देश्य से अमेरिका जाने की प्रवृत्ति को वैधता नहीं मिली है। अमेरिकी प्रशासन पहले की तरह वीजा नियमों और जांच प्रक्रिया के माध्यम से ऐसे मामलों पर सख्ती जारी रख सकेगा। वहीं कुछ राजनीतिक समूह भविष्य में संवैधानिक संशोधन की मांग उठा सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में जन्म के आधार पर नागरिकता का संवैधानिक प्रावधान पूरी तरह प्रभावी रहेगा।