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  • चीन-अमेरिका शक्ति संतुलन पर नई बहस, ट्रंप-शी मुलाकात के बाद बदले वैश्विक समीकरण; भारत की रणनीति पर बढ़ी चर्चा

    चीन-अमेरिका शक्ति संतुलन पर नई बहस, ट्रंप-शी मुलाकात के बाद बदले वैश्विक समीकरण; भारत की रणनीति पर बढ़ी चर्चा




    नई दिल्ली। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर वैश्विक राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। हालिया ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था (Multipolar World) की ओर बढ़ रही है, जहां चीन अब अमेरिका को खुली चुनौती देता दिखाई दे रहा है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा से यह संकेत मिला कि व्यापार, तकनीक और रणनीतिक मुद्दों पर अमेरिका चीन पर निर्णायक दबाव बनाने में अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। वहीं शी जिनपिंग ने “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” का जिक्र कर यह संकेत देने की कोशिश की कि चीन खुद को अब उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है।

    हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार यह भी मानते हैं कि अमेरिका का प्रभाव तुरंत खत्म होने वाला नहीं है। अमेरिका अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय रूप से दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में बना हुआ है, जबकि चीन को भी आर्थिक सुस्ती, सप्लाई चेन और जनसंख्या गिरावट जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

    इस पूरे बदलते समीकरण में भारत की भूमिका को बेहद अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत आने वाले दशकों में अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने वाली बड़ी शक्ति बन सकता है। यूरोप, रूस और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ भारत के संबंध भी आने वाले समय में उसकी रणनीतिक स्थिति तय करेंगे।

    विदेश नीति विश्लेषकों के अनुसार, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अमेरिका और चीन दोनों के साथ अपने हितों का संतुलन बनाए रखते हुए आर्थिक और सामरिक रूप से खुद को मजबूत करे।

  • ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख

    ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर बेहद सख्त और विवादित बयान दिया है। फ्लोरिडा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा, क्योंकि यह पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि मिडिल ईस्ट को उन्होंने एक बड़े परमाणु संकट से बचाया है।

    ईरान को परमाणु हथियार से रोकने पर जोर

    ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो ईरान के पास परमाणु हथियार होते और इसका असर इजराइल, यूरोप और पूरे मिडिल ईस्ट पर विनाशकारी हो सकता था। उनके मुताबिक, हम ऐसे लोगों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं जाने दे सकते जिन्हें वह ‘पागल’ बता रहे हैं।

    उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को बातचीत से पहले अपने एनरिच्ड यूरेनियम को सौंपना होगा, तभी किसी भी तरह की डिप्लोमैटिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

    ईरान के प्रस्ताव पर असहमति

    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, ईरान ने हाल ही में जो नया प्रस्ताव भेजा था, उसमें परमाणु कार्यक्रम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। इसी बात से ट्रंप प्रशासन असंतुष्ट है। वहीं ईरान का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि परमाणु मुद्दे पर बाद में बातचीत की जा सकती है।ट्रंप का रुख है कि दोनों मुद्दों को एक साथ हल किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग।

    सैन्य कार्रवाई पर भी सख्त संकेत

    ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने ऐसे मांग करने वालों को “देशभक्त नहीं” बताया। यह बयान अमेरिकी राजनीतिक हलकों में नए विवाद को जन्म दे सकता है।

    मिडिल ईस्ट तनाव और वैश्विक असर

    अमेरिका ने दावा किया है कि ईरान से जुड़े तनाव के चलते होर्मुज जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही करीब 90% तक कम हो गई है। पहले जहां रोजाना लगभग 130 जहाज गुजरते थे, अब यह संख्या 10 से भी कम रह गई है। इस स्थिति ने वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर असर डाला है।

    इसके अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी कंपनियां ईरान को इस क्षेत्र से गुजरने के लिए वित्तीय सहायता देंगी, उन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, चाहे वह सहायता किसी चैरिटी के नाम पर ही क्यों न हो।

    स्थिति अभी भी तनावपूर्ण

    व्हाइट हाउस ने हालांकि यह भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में कुछ हद तक कमी आई है, लेकिन अमेरिकी सेना अभी भी क्षेत्र में सक्रिय है। इसी बीच ट्रंप प्रशासन लगातार यह संदेश दे रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार किसी भी कीमत पर नहीं मिलने दिए जाएंगे।

  • मध्य पूर्व तनाव के बीच यूएन महासचिव का बड़ा बयान अकेले अमेरिका से नहीं सुलझेगा संकट

    मध्य पूर्व तनाव के बीच यूएन महासचिव का बड़ा बयान अकेले अमेरिका से नहीं सुलझेगा संकट


    नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वैश्विक शांति और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है उन्होंने खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट में जारी संकट और डोनाल्ड ट्रंप की बोर्ड ऑफ पीस पहल पर सवाल उठाते हुए इसे मौजूदा हालात के लिए पर्याप्त नहीं बताया

    ब्रुसेल्स में यूरोपीय काउंसिल की एक अहम बैठक के दौरान गुटेरेस ने कहा कि ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता को गंभीर खतरे में डाल दिया है उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे जटिल संकटों का समाधान किसी एक देश या व्यक्ति के प्रयासों से नहीं बल्कि बहुपक्षीय सहयोग से ही संभव है

    गुटेरेस ने स्पष्ट किया कि उन्होंने हालिया तनाव के बाद ट्रंप से सीधे बातचीत नहीं की है हालांकि उनकी चर्चा अमेरिकी प्रशासन के अन्य अधिकारियों से जरूर हुई है उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र लगातार खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के संपर्क में है ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके

    होर्मुज स्ट्रेट के महत्व को रेखांकित करते हुए गुटेरेस ने कहा कि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम मार्ग है और यहां किसी भी तरह का व्यवधान पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित और सुचारु बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है

    उन्होंने अतीत का उदाहरण देते हुए ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव का जिक्र किया जिसके तहत रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के दौरान खाद्यान्न और उर्वरकों के निर्यात को संभव बनाया गया था हालांकि बाद में यह समझौता ज्यादा समय तक टिक नहीं सका फिर भी यह बहुपक्षीय प्रयासों की प्रभावशीलता का एक उदाहरण माना जाता है

    ट्रंप की बोर्ड ऑफ पीस पहल पर टिप्पणी करते हुए गुटेरेस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस पहल के साथ सहयोग कर रहा है लेकिन केवल एकतरफा दृष्टिकोण इतने बड़े और जटिल संकट का समाधान नहीं कर सकता उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का पालन किसी भी शांति प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है

    उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में यह पहल काफी हद तक एक व्यक्तिगत परियोजना के रूप में दिखाई दे रही है जिसमें व्यापक वैश्विक भागीदारी की कमी है ऐसे में स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि सभी संबंधित पक्षों को साथ लाया जाए और संवाद के जरिए समाधान खोजा जाए

  • भारत-अमेरिका महा-डील: वाशिंगटन से आएंगे 'खतरनाक' हथियार, टैरिफ युद्ध खत्म होने के बाद रक्षा संबंधों में नई गर्मी

    भारत-अमेरिका महा-डील: वाशिंगटन से आएंगे 'खतरनाक' हथियार, टैरिफ युद्ध खत्म होने के बाद रक्षा संबंधों में नई गर्मी


    नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच हाल ही में हुई ऐतिहासिक ट्रेड डील ने दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों में नई गर्मजोशी भर दी है। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वाशिंगटन अब भारत को और भी खतरनाक हथियार प्रणालियों की आपूर्ति करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इस कदम का सीधा उद्देश्य भारत की रक्षा क्षमता और सैन्य आधुनिकीकरण को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत करना है। यह महत्वपूर्ण विकास ऐसे समय में हुआ है, जब पिछले कुछ वर्षों में दोनों महाशक्तियों के बीच रणनीति और व्यापार को लेकर कई उतार-चढ़ाव देखे गए थे।

    पिछले कुछ समय में राष्ट्रपति ट्रंप के शासनकाल के दौरान भारत और अमेरिका के संबंधों में काफी ठंडापन महसूस किया गया था। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर कड़ी टिप्पणियां की थीं और कई कड़े अमेरिकी टैरिफ भारत पर थोप दिए थे, जिससे आपसी सहयोग पर दबाव बढ़ गया था। लेकिन नई ट्रेड डील के बाद हालात तेजी से बदलते दिख रहे हैं। अमेरिका ने भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत के भारी टैरिफ को घटाकर अब मात्र 18 प्रतिशत कर दिया है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत है। इसके बदले में भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की संभावना जताई है।

    अमेरिकी विदेश विभाग में एशियाई मामलों के सहायक सचिव पॉल कपूर ने आधिकारिक पुष्टि की है कि दोनों देश रक्षा संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि अमेरिका और भारत अधिक उन्नत हथियार प्रणालियों की खरीद पर चर्चा कर रहे हैं, जिससे न केवल भारत की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि अमेरिका में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। यह सप्लाई श्रृंखला दोनों देशों के बीच एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारी को दर्शाती है, जिसमें ऊर्जा उत्पादों से लेकर उच्च तकनीक वाले सैन्य उपकरणों तक सब कुछ शामिल है।

    वर्तमान रक्षा परिदृश्य की बात करें तो भारत ने 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही अमेरिका के साथ समुद्री निगरानी विमानों और अन्य बड़ी सैन्य प्रणालियों पर गहन चर्चा जारी है। हालांकि, इस सौदे में फिलहाल एफ-35 जैसे पांचवीं पीढ़ी के फाइटर विमानों की खरीद पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन अमेरिका लगातार भारत को अपने रक्षा खेमे में लाने के प्रयास कर रहा है। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अपनी जरूरतों के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ तकनीक का चयन कर रहा है।

    भारत के लिए यह संतुलन बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि रूस स्वतंत्रता के बाद से ही भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार रहा है। अमेरिका ने कई बार भारत को पूरी तरह अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की स्वायत्तता वाली विदेश नीति ने दोनों देशों के साथ संतुलन बनाए रखा है। इस नई डील के बाद यह साफ हो गया है कि भारत-अमेरिका रिश्तों में एक नया भरोसा पैदा हुआ है। यह समझौता न केवल सैन्य मोर्चे पर बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी भविष्य की सुनहरी तस्वीर पेश करता है, जहाँ दोनों देश मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना करेंगे।

  • सीजफायर में फिर फेल हुए डोनाल्ड ट्रंप, कंबोडिया ने बताया थाई सेना अभी भी हमलावर, बमबारी जारी

    सीजफायर में फिर फेल हुए डोनाल्ड ट्रंप, कंबोडिया ने बताया थाई सेना अभी भी हमलावर, बमबारी जारी


    नई दिल्‍ली । दुनिया में किन्हीं दो देशों के बीच युद्ध शुरू हो जाए और उसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump)दखल देने की कोशिश न करें ऐसा होना मुश्किल है। इस साल की शुरुआत में ट्रंप के दबाव में सीजफायर(Ceasefire) करने के लिए राजी हुए थाईलैंड (Thailand)और कंबोडिया (Cambodia)एक बार फिर से युद्ध में उलझ गए थे। हालांकि, ट्रंप ने एक बार फिर से सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि दोनों देश फिर से सीजफायर करने के लिए राजी हो गए हैं। ट्रंप के इस बयान के बाद भी थाईलैंड और कंबोडिया के नेताओं ने एक-दूसरे पर बमबारी जारी रखने का आरोप लगाया है।

    इस साल की शुरुआत में हुई भीषण लड़ाई के बाद दोनों ही देश मलेशिया और ट्रंप की मध्यस्थता के बाद सीजफायर पर पहुंचे थे। इसके बाद भी दोनों के बीच में हल्की झड़पें जारी थी। जुलाई में हुए इस सीजफायर में ट्रंप ने दोनों देशों को व्यापारिक विशेषाधिकार समाप्त करने की धमकी दी थी। इसके बाद दोनों ही देश शांति के लिए मान गए थे। ट्रंप ने इस युद्ध को सुलझाने का दावा करते हुए इसे भी अपने नोबेल जीतने की कोशिश में शामिल कर लिया था। लेकिन अभी फिर से इन दोनों देशों के बीच में हालात जरूरत से ज्यादा बिगड़ गए इसके बाद ट्रंप को दोबारा दोनों देशों के नेताओं से बात करनी पड़ी।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक थाई प्रधानमंत्री अनुतिन चर्नविरकुल और कंबोडियाई प्रधानमंत्री हुन मानेट के साथ बातचीत के बाद सोशल मीडिया पर यह घोषणा की। ट्रंप ने अपने ‘ट्रुथ सोशल’ हैंडल पर पोस्ट में कहा, ‘‘दोनों नेता आज शाम से हर तरह की गोलीबारी रोकने और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम की सहायता से मेरे साथ हुए मूल शांति समझौते को बहाल करने पर सहमत हो गए हैं। दोनों देश शांति और अमेरिका के साथ निरंतर व्यापार के लिए तैयार हैं।’’

    ट्रंप के इस दावे के बाद कंबोडिया की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया कि थाईलैंड अभी भी उनकी सीमा पर बम बरसा रहा है। कंबोडियाई रक्षा मंत्रायल की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि 13 दिसंबर 2025 को थाई सेना ने दो एफ-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर कई ठिकानों पर सात बम गिराए। थाई सेना ट्रंप की घोषणा के बाद भी बमबारी बंद नहीं कर रहा है।

  • आलोचना के बीच प्रशंसा: “ट्रंप नोबेल पुरस्कार के हकदार” – पूर्व अधिकारी का बयान

    आलोचना के बीच प्रशंसा: “ट्रंप नोबेल पुरस्कार के हकदार” – पूर्व अधिकारी का बयान


    नई दिल्‍ली । भारत-रूस कूटनीति को लेकर अमेरिका के पूर्व पेंटागन अधिकारी(Pentagon officials) ने अपने ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप(Donald Trump) पर कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन(Vladimir Putin) को नई दिल्ली में जो गर्मजोशी और सम्मान मिला, उसका श्रेय रूस नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जाता है। माइकल रुबिन (Michael Rubin)के अनुसार ट्रंप ने ही भारत और रूस को एक-दूसरे के और करीब धकेला, और इसके लिए वे नोबेल पुरस्कार के हकदार हैं।

    ट्रंप को दिया ‘नोबेल’ का सुझाव
    मीडिया से बातचीत में रुबिन ने कहा कि पुतिन की भारत यात्रा मॉस्को के नजरिए से बेहद सकारात्मक रही और भारत द्वारा दिया गया सम्मान दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिला। उन्होंने कहा- मैं यह तर्क दूंगा कि भारत और रूस को जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप ने एक-दूसरे के करीब लाया है, उसके लिए वे नोबेल पुरस्कार के हकदार हैं।

    रुबिन ने यह भी सवाल उठाया कि पुतिन की यात्रा के दौरान हुए समझौतों में से कितने वास्तविक सहयोग में तब्दील होंगे और कितने ऐसे हैं जो भारत की उस नाराजगी से उपजे हैं जो हाल के समय में ट्रंप के रवैये के कारण बनी है- चाहे वह पीएम मोदी के प्रति उनका व्यवहार हो या भारत के व्यापक हितों के प्रति उदासीनता।

    अमेरिका में दो धाराएं- ट्रंप का दावा’ बनाम ‘ट्रंप की अक्षमता
    रुबिन ने बताया कि अमेरिका में इस घटनाक्रम को लेकर दो बिल्कुल अलग नजरिए हैं। उन्होंने कहा, यदि आप डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक हैं, तो आप इसे ‘मैंने कहा था न’ वाले चश्मे से देखते हैं। लेकिन यदि आप उन 65 प्रतिशत अमेरिकियों में से हैं जो ट्रंप को पसंद नहीं करते, तो यह सब डोनाल्ड ट्रंप की भारी कूटनीतिक अक्षमता का नतीजा दिखता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रंप ने भारत-अमेरिका संबंधों को पीछे धकेल दिया और कई फैसले ऐसे लिए जिन पर पाकिस्तान, तुर्किये और कतर जैसी देशों की चापलूसी या कथित प्रलोभनों का असर दिखा।

    ट्रंप के दौर की तीखी आलोचना: ‘रणनीतिक नुकसान’
    रुबिन के अनुसार वॉशिंगटन के कई विशेषज्ञ इस बात से हैरान हैं कि ट्रंप ने कैसे अमेरिका–भारत की बढ़ती रणनीतिक एकजुटता को कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि ट्रंप इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे, बल्कि भारत–रूस निकटता को अपनी विदेश नीति की दूरदर्शिता साबित करने में इस्तेमाल करेंगे।

    ‘भारत को नसीहत देना बंद करे अमेरिका’
    पुतिन द्वारा भारत को निरंतर ऊर्जा आपूर्ति देने के वादे पर टिप्पणी करते हुए रुबिन ने कहा कि अमेरिका भारत की ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक अनिवार्यताओं को समझने में लगातार विफल रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीयों ने नरेंद्र मोदी को इसलिए चुना है कि वे भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व करें। भारत दुनिया की सबसे आबादी वाला देश है, जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा, और उसे ऊर्जा चाहिए। अमेरिका को भारत को लेक्चर देना बंद कर देना चाहिए।

    उन्होंने अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि स्वयं अमेरिका भी तब रूस से ऊर्जा खरीदता है जब विकल्प सीमित हों। रुबिन ने सवाल उठाया कि यदि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत रूसी ईंधन खरीदे, तो वह भारत को सस्ते दाम पर और पर्याप्त मात्रा में ईंधन उपलब्ध कराने के लिए क्या कर रहा है? उन्होंने तीखे अंदाज में कहा- यदि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, तो सबसे अच्छा यह होगा कि हम चुप रहें, क्योंकि भारत को अपनी सुरक्षा और जरूरतों को पहले रखना ही पड़ेगा।