Tag: DRDO

  • आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान

    आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान


    नई दिल्ली ।
    भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में व्यापक बदलाव और तेज प्रगति का साक्षी बना है। स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार और नीतिगत सुधारों के बल पर देश ने न केवल अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत किया है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह वृद्धि देश की रक्षा निर्माण क्षमता और वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है।

    रक्षा क्षेत्र में यह बदलाव आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर लागू की गई विभिन्न नीतियों का परिणाम माना जा रहा है। पिछले वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। रक्षा खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप रक्षा निर्माण से जुड़ी गतिविधियों में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला।

    आज भारत के रक्षा उत्पादों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है। यह स्थिति उस समय से बिल्कुल अलग है जब देश मुख्य रूप से रक्षा आयात पर निर्भर माना जाता था। अब स्वदेशी रूप से विकसित सैन्य उपकरण, हथियार प्रणालियां और रक्षा तकनीकें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत की तकनीकी क्षमता और उत्पादन गुणवत्ता में बढ़ते विश्वास का संकेत है।

    रक्षा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ने से नई तकनीकों के विकास को गति मिली है। अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों, निगरानी तकनीकों और आधुनिक सैन्य उपकरणों के निर्माण में अनुसंधान की भूमिका लगातार बढ़ी है। इसी कारण देश की रक्षा आवश्यकताओं को स्वदेशी स्तर पर पूरा करने की क्षमता मजबूत हुई है।

    रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि ने भी इस परिवर्तन को गति प्रदान की है। पिछले दशक में रक्षा क्षेत्र के लिए वित्तीय आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है, जिससे सैन्य आधुनिकीकरण, अनुसंधान परियोजनाओं और उत्पादन क्षमताओं को मजबूती मिली है। रक्षा उत्पादन का कुल मूल्य भी कई गुना बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है। इससे रक्षा उद्योग से जुड़े हजारों उद्यमों और रोजगार अवसरों को भी लाभ मिला है।

    सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का एक हिस्सा निजी क्षेत्र और नवाचार आधारित संस्थाओं के लिए खोला गया है। इससे नई तकनीकों के विकास और रक्षा क्षेत्र में उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला है। विशेषज्ञ इसे रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं।

    इसके साथ ही परीक्षण और अनुसंधान सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाकर निजी कंपनियों को भी रक्षा तकनीकों के विकास में सहयोग प्रदान किया गया है। इससे रक्षा उत्पादन का दायरा केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है। इस मॉडल ने देश में रक्षा निर्माण क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा निर्यात में हुई तेज वृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखती है। इससे भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, सामरिक साझेदारियां और रक्षा कूटनीति को मजबूती मिली है। आने वाले वर्षों में स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और उत्पादन पर आधारित यह मॉडल भारत को वैश्विक रक्षा उद्योग के प्रमुख देशों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • सरकारी नौकरी अलर्ट: DRDO-RAC ने निकाली साइंटिस्ट भर्ती, 19 जून तक करें आवेदन, जानें पूरी प्रक्रिया

    सरकारी नौकरी अलर्ट: DRDO-RAC ने निकाली साइंटिस्ट भर्ती, 19 जून तक करें आवेदन, जानें पूरी प्रक्रिया


    नई दिल्ली ।
    देश की रक्षा अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी प्रमुख संस्था डीआरडीओ-आरएसी ने वैज्ञानिक पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो इंजीनियरिंग और विज्ञान क्षेत्र में करियर बनाने वाले युवाओं के लिए एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। इस भर्ती अभियान के तहत कुल 33 पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी, जिनमें वैज्ञानिक-ई, वैज्ञानिक-डी और वैज्ञानिक-सी स्तर के पद शामिल हैं। आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और योग्य उम्मीदवार निर्धारित अंतिम तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

    इस भर्ती में विभिन्न तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों के लिए पदों का वितरण किया गया है। वैज्ञानिक-ई के दो पदों में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार इंजीनियरिंग तथा मैकेनिकल, प्रोडक्शन और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिए अवसर उपलब्ध हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक-डी के 11 पद कंप्यूटर विज्ञान, एयरोस्पेस, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, भौतिकी, रासायनिक इंजीनियरिंग और अन्य संबंधित क्षेत्रों के लिए निर्धारित किए गए हैं। वहीं वैज्ञानिक-सी के 20 पदों में इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर साइंस, गणित, समुद्र विज्ञान, रिमोट सेंसिंग, फार्माकोलॉजी, फिजियोलॉजी और अन्य वैज्ञानिक विषयों से जुड़े उम्मीदवारों को मौका दिया गया है।

    इन पदों के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के पास संबंधित विषय में इंजीनियरिंग या विज्ञान में प्रथम श्रेणी स्नातक या मास्टर डिग्री होना अनिवार्य है। इसके साथ ही उम्मीदवारों के पास निर्धारित क्षेत्र में अनुभव और अन्य आवश्यक योग्यताएं भी होनी चाहिए, जो पद के अनुसार अलग-अलग तय की गई हैं। आयु सीमा की बात करें तो अधिकतम आयु 35 से 45 वर्ष के बीच निर्धारित की गई है, जिसकी गणना आवेदन की अंतिम तिथि के आधार पर की जाएगी। आरक्षित श्रेणियों के उम्मीदवारों को सरकारी नियमों के अनुसार आयु सीमा में छूट प्रदान की जाएगी।

    चयन प्रक्रिया में उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्टिंग के बाद व्यक्तिगत साक्षात्कार, दस्तावेज़ सत्यापन और अन्य मूल्यांकन चरणों से गुजरना होगा। अंतिम चयन पूरी तरह से उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और इंटरव्यू प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को पद के अनुसार आकर्षक वेतनमान प्रदान किया जाएगा, जो लगभग 67,700 रुपये से लेकर 1,23,100 रुपये प्रति माह तक होगा। यह वेतन सरकारी वैज्ञानिक पदों के स्तर के अनुसार तय किया गया है और इसके साथ अन्य भत्ते भी लागू हो सकते हैं।

    आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन माध्यम से की जा रही है। उम्मीदवारों को निर्धारित समय सीमा के भीतर आधिकारिक पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रेशन करना होगा और सभी आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने होंगे। सामान्य, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस श्रेणी के पुरुष उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 100 रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि एससी, एसटी, दिव्यांग और महिला उम्मीदवारों को शुल्क में छूट दी गई है।

    इस भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 19 जून तय की गई है और उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अंतिम समय का इंतजार किए बिना समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें। यह अवसर उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो देश की रक्षा अनुसंधान परियोजनाओं में वैज्ञानिक के रूप में योगदान देना चाहते हैं और एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में करियर बनाना चाहते हैं।

  • पंचकुला के रामगढ़ रेंज में DRDO का हाई-पावर बम परीक्षण, 2 किमी क्षेत्र ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित

    पंचकुला के रामगढ़ रेंज में DRDO का हाई-पावर बम परीक्षण, 2 किमी क्षेत्र ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित

    नई दिल्ली । हरियाणा के पंचकुला जिले में सुरक्षा और वैज्ञानिक परीक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण गतिविधि के तहत रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) 31 मई को रामगढ़ रेंज में हाई-पावर बम का परीक्षण करने जा रहा है। इस परीक्षण को लेकर स्थानीय प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है और आसपास के गांवों के लिए विशेष सुरक्षा एडवाइजरी जारी की गई है। यह परीक्षण DRDO की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला टर्मिनल बैलिस्टिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा किया जा रहा है, जो देश में हथियारों, विस्फोटकों और गोला-बारूद की जांच एवं विकास से जुड़ी प्रमुख इकाई मानी जाती है।

    प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार यह परीक्षण पूरी तरह से नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाएगा और इसका उद्देश्य रक्षा प्रणाली को और अधिक मजबूत एवं सुरक्षित बनाना है। परीक्षण के दौरान संभावित खतरे को देखते हुए रामगढ़ रेंज के आसपास के लगभग दो किलोमीटर के दायरे को ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित किया गया है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में बम विस्फोट के दौरान निकलने वाले टुकड़े और प्रभावी दबाव से किसी भी तरह की जनहानि या नुकसान से बचाव के लिए प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।

    स्थानीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि परीक्षण के दौरान बम के टुकड़े लगभग 1.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक जा सकते हैं, इसलिए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। इस वजह से प्रभावित क्षेत्र के सभी गांवों को अलर्ट पर रखा गया है और लोगों से अपील की गई है कि परीक्षण के निर्धारित समय के दौरान वे अपने घरों के अंदर ही रहें और किसी भी प्रकार की खुले स्थानों पर आवाजाही से बचें। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह एक नियमित और वैज्ञानिक परीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए पूरे क्षेत्र में कड़ी निगरानी की जाएगी और भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी भी इस परीक्षण की मॉनिटरिंग के लिए मौजूद रहेंगे। सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर पूरे क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित बनाया गया है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।

    प्रशासन ने विशेष रूप से भानू और बिल्ला गांवों के निवासियों को सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा आसरेवाली, नाग्गल, मोगीनंद, किशनगढ़ और रामगढ़ नगर परिषद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अन्य गांवों के लोगों को भी सतर्क रहने और अनावश्यक आवाजाही से बचने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने साफ किया है कि यह परीक्षण देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है और इसमें सभी सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

    स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है। पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती और निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गई है ताकि परीक्षण प्रक्रिया शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से पूरी हो सके।

  • सुपर सुखोई से दुश्मनों में खौफ, भारत के Su-30MKI बनेंगे 4.7 जेनरेशन के घातक फाइटर जेट

    सुपर सुखोई से दुश्मनों में खौफ, भारत के Su-30MKI बनेंगे 4.7 जेनरेशन के घातक फाइटर जेट




    नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना अपने सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमानों को बड़े अपग्रेड के जरिए “सुपर सुखोई” में बदलने जा रही है। नए रडार, AI सिस्टम और ताकतवर इंजन से लैस ये विमान पाकिस्तान के F-16 और JF-17 के लिए बड़ी चुनौती बनेंगे।

    भारतीय वायुसेना अब अपनी ताकत को नई ऊंचाई देने की तैयारी में जुट गई है। देश के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमानों में शामिल Sukhoi Su-30MKI को बड़े अपग्रेड के जरिए “सुपर सुखोई” बनाया जाएगाभारतीय वायुसेना अब अपनी ताकत को नई ऊंचाई देने की तैयारी में जुट गई है। देश के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमानों में शामिल Sukhoi Su-30MKI को बड़े अपग्रेड के जरिए “सुपर सुखोई” बनाया जाएगा। इस मेगा प्रोजेक्ट के बाद भारतीय फाइटर जेट्स पहले से ज्यादा आधुनिक, घातक और हाईटेक बन जाएंगे। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अपग्रेड के बाद ये विमान पाकिस्तान के F-16 Fighting Falcon और JF-17 Thunder लड़ाकू विमानों पर भारी पड़ेंगे।

    भारतीय वायुसेना के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में रूस के साथ फ्रांस और इजरायल की तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। अपग्रेडेशन के तहत सुखोई विमानों के रडार, एवियोनिक्स, हथियार प्रणाली और इंजन को पूरी तरह आधुनिक बनाया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे विमान की ऑपरेशनल लाइफ करीब 30 साल तक बढ़ जाएगी।

    रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इस अपग्रेड के बाद सुखोई Su-30MKI को 4.7 जेनरेशन क्षमता वाला फाइटर जेट माना जाएगा। इसकी सबसे बड़ी ताकत भारत में विकसित “विरूपाक्ष” AESA रडार होगा, जिसे DRDO ने तैयार किया है। यह रडार 200 किलोमीटर से ज्यादा दूरी से दुश्मन के स्टील्थ विमानों का पता लगाने में सक्षम बताया जा रहा है।

    सुपर सुखोई में AI आधारित नया एवियोनिक्स सिस्टम भी लगाया जाएगा, जिससे युद्ध के दौरान पायलट को रियल टाइम डेटा और बेहतर टारगेटिंग सपोर्ट मिलेगा। पुराने डिजिटल सिस्टम की जगह अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर टेक्नोलॉजी दी जाएगी। इससे विमान की सर्वाइवल क्षमता और मारक ताकत दोनों बढ़ेंगी।

    सिर्फ रडार ही नहीं, बल्कि सुखोई का इंजन भी बदला जा सकता है। मौजूदा AL-31FP इंजन की जगह ज्यादा ताकतवर AL-41F-1S इंजन लगाने पर चर्चा चल रही है। यही इंजन रूस के आधुनिक Su-35 फाइटर जेट में इस्तेमाल होता है। नए इंजन से विमान को ज्यादा स्पीड, बेहतर कंट्रोल और भारी हथियार ले जाने की क्षमता मिलेगी।

    इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी HAL को दी गई है। पहले चरण में 84 सुखोई विमानों को अपग्रेड किया जाएगा, जबकि बाद में करीब 200 और विमानों को आधुनिक बनाया जाएगा। उम्मीद है कि 2030 तक सुपर सुखोई पूरी तरह भारतीय वायुसेना का हिस्सा बन जाएंगे।

    विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान लगातार अपने एयर फोर्स बेड़े को आधुनिक बना रहे हैं। ऐसे में भारत का सुपर सुखोई प्रोजेक्ट सिर्फ अपग्रेड नहीं, बल्कि भविष्य की एयर वॉरफेयर रणनीति का बड़ा कदम माना जा रहा है।

  • भारत के ‘रहस्यमयी’ मिसाइल टेस्ट से चीन-पाकिस्तान में खलबली, अग्नि-6 की ताकत ने बढ़ाई टेंशन

    भारत के ‘रहस्यमयी’ मिसाइल टेस्ट से चीन-पाकिस्तान में खलबली, अग्नि-6 की ताकत ने बढ़ाई टेंशन



    नई दिल्ली। भारत ने ओडिशा तट से एक बेहद शक्तिशाली इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का गुप्त परीक्षण कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। माना जा रहा है कि यह परीक्षण अग्नि-6 या उससे जुड़ी किसी एडवांस हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी का हिस्सा हो सकता है। हालांकि DRDO ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की सामरिक ताकत में बड़ा कदम मान रहे हैं।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है और इसकी रेंज हजारों किलोमीटर तक हो सकती है। परीक्षण के बाद चीन और पाकिस्तान में बेचैनी बढ़ गई है। खासतौर पर पाकिस्तान की चिंता इस बात को लेकर बताई जा रही है कि भारत अब ऐसी मिसाइल तकनीक की तरफ बढ़ रहा है, जिसे रोक पाना लगभग नामुमकिन माना जाता है।

    रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बैलिस्टिक मिसाइलें इतनी तेज और एडवांस हैं कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए उन्हें इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि भारत की रणनीतिक क्षमता को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा है।

    बताया जा रहा है कि मिसाइल ने हाइपरसोनिक री-एंट्री प्रोफाइल के साथ उड़ान भरी और इसकी गति मैक-5 से ज्यादा हो सकती है। सोशल मीडिया पर बांग्लादेश और पूर्वी भारत के कई इलाकों से आसमान में तेज रफ्तार रोशनी जैसी वस्तु के वीडियो भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मिसाइल की पैंतरेबाजी क्षमता इसे और खतरनाक बनाती है।

    विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान के खिलाफ इतनी लंबी दूरी की मिसाइल की जरूरत नहीं है, इसलिए इस परीक्षण का मुख्य संदेश चीन को माना जा रहा है। भारत अब ऐसी क्षमता विकसित कर रहा है, जिससे चीन के भीतर मौजूद सामरिक और सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सके।

    रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि अगर यह वास्तव में MIRV तकनीक या अग्नि-6 से जुड़ा परीक्षण है, तो यह चीन की मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इससे भारत की ‘सटीक और तेज जवाब’ वाली सैन्य रणनीति को नई ताकत मिलेगी।

  • 12,000 KM अग्नि-6 से हिला रणनीतिक संतुलन! भारत की मिसाइल ताकत पर पाक प्रोफेसर की तीखी टिप्पणी

    12,000 KM अग्नि-6 से हिला रणनीतिक संतुलन! भारत की मिसाइल ताकत पर पाक प्रोफेसर की तीखी टिप्पणी



    नई दिल्ली। भारत की रक्षा क्षमता को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस तेज हो गई है, खासकर जब लंबी दूरी की अगली पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल Agni-VI missile को लेकर चर्चाएं सामने आई हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख डॉ. समीर वी. कामत के बयान के बाद यह साफ हुआ है कि अगर सरकार मंजूरी देती है तो अग्नि-6 का परीक्षण पूरी तरह तैयार है। इसकी अनुमानित मारक क्षमता लगभग 12,000 किलोमीटर बताई जा रही है, जो इसे इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) श्रेणी में रखती है।

    इस मुद्दे पर पाकिस्तान मूल के स्कॉटलैंड स्थित ग्लासगो यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर Zafar Khan ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया और एक लेख में दावा किया कि पश्चिमी देश अक्सर पाकिस्तान की कथित लंबी दूरी की मिसाइल क्षमताओं पर चर्चा करते हैं, जबकि भारत की बढ़ती रणनीतिक ताकत पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।

    जफर खान का कहना है कि भारत की बढ़ती मिसाइल क्षमता सिर्फ रक्षा जरूरत नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन और वैश्विक रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का संकेत भी है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह के विकास से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संतुलन पर असर पड़ सकता है और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।

    हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का मिसाइल विकास कार्यक्रम पूरी तरह रक्षा और निवारक रणनीति (deterrence) पर आधारित है, जिसका उद्देश्य किसी भी संभावित खतरे से देश की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत पहले ही Agni-V missile जैसे सिस्टम का सफल परीक्षण कर चुका है, जिसकी रेंज चीन के बड़े हिस्से तक पहुंचने में सक्षम है।

    वहीं पाकिस्तान की ओर से आने वाली टिप्पणियों को रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि दक्षिण एशिया में दोनों देशों के बीच रक्षा संतुलन लगातार संवेदनशील बना हुआ है।

    कुल मिलाकर यह मामला केवल मिसाइल तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति, शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति से जुड़ा हुआ बड़ा मुद्दा बन गया है।

  • ड्रोन और AI बदल रहे जंग का खेल, राजनाथ सिंह की चेतावनी, भारत को रहना होगा हर हाल में तैयार

    ड्रोन और AI बदल रहे जंग का खेल, राजनाथ सिंह की चेतावनी, भारत को रहना होगा हर हाल में तैयार



    नई दिल्ली। देश के रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि दुनिया में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है और भारत को इसके लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा। प्रयागराज में आयोजित नॉर्थ टेक संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि आने वाले समय में जंग सिर्फ टैंक और मिसाइल से नहीं, बल्कि ड्रोन, सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लड़ी जाएगी।

    उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए बताया कि महज कुछ वर्षों में ही युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब छोटे-छोटे ड्रोन और स्मार्ट टेक्नोलॉजी बड़े हथियारों पर भारी पड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, आम इस्तेमाल की चीजें भी अब हथियार बनती जा रही हैं, जैसा कि मध्य पूर्व में हालिया हमलों में देखने को मिला।

    रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि भविष्य की जंग का फैसला मैदान में नहीं, बल्कि लैब और रिसर्च सेंटर में होगा। जो देश तकनीक में आगे रहेगा, वही युद्ध में बढ़त हासिल करेगा।

    सरकार के आत्मनिर्भर भारत मिशन का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि देश का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जबकि रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर पर है। यह दिखाता है कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है।

    रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की भूमिका की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि अब यह संस्था अकेले नहीं, बल्कि निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के साथ मिलकर काम कर रही है। DRDO ने अपने पेटेंट उद्योगों के लिए मुफ्त में खोल दिए हैं और टेस्टिंग सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे देश की टेक्नोलॉजी क्षमता और मजबूत होगी।

    राजनाथ सिंह ने उद्योग जगत से अपील की कि वे हाइपरसोनिक हथियार, डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स, क्वांटम टेक्नोलॉजी, AI और मशीन लर्निंग जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में तेजी से काम करें।

    कुल मिलाकर, उनका संदेश साफ है भविष्य की जंग पारंपरिक नहीं होगी और भारत को अभी से टेक्नोलॉजी के मोर्चे पर खुद को मजबूत करना होगा, तभी सुरक्षा और शक्ति दोनों कायम रह पाएंगे।