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  • डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा

    डीआरडीओ की विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय उद्योगों को मिलेगी, रक्षा उत्पादन और सेनाओं की युद्धक तैयारी को बढ़ावा


    नई दिल्ली ।भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ द्वारा विकसित सभी पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय उद्योगों को हस्तांतरित करने की मंजूरी दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की इस मंजूरी के बाद निर्धारित योग्यता और आवश्यक मानकों को पूरा करने वाली भारतीय कंपनियां इन मिसाइल प्रणालियों का देश में उत्पादन कर सकेंगी।

    इस फैसले का सीधा असर भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता पर पड़ने की उम्मीद है। अब तक मिसाइल प्रणालियों के अनुसंधान, विकास और तकनीकी परीक्षण में डीआरडीओ की प्रमुख भूमिका रही है। नई व्यवस्था के तहत विकसित और निर्धारित मानकों पर खरी उतरने वाली तकनीक को उद्योगों तक पहुंचाया जाएगा, जिससे अनुसंधान से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

    रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल देश में हथियारों का इस्तेमाल करने या तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उत्पादन क्षमता, आपूर्ति श्रृंखला, जरूरी कलपुर्जों की उपलब्धता और तकनीकी विशेषज्ञता का घरेलू स्तर पर मजबूत होना भी जरूरी है। मिसाइल तकनीक के हस्तांतरण से इन सभी क्षेत्रों में भारतीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है।

    इस व्यवस्था के तहत योग्य कंपनियां डीआरडीओ की विकसित तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मिसाइल प्रणालियों के औद्योगिक उत्पादन में भूमिका निभाएंगी। इससे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक प्रणालियों की आपूर्ति को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाने में मदद मिल सकती है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी प्रगति होने की उम्मीद है।

    इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू रक्षा क्षेत्र की आपूर्ति श्रृंखला में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए अवसर बढ़ना है। मिसाइल निर्माण केवल मुख्य प्रणाली तैयार करने तक सीमित नहीं होता। इसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष सामग्री, सेंसर, संचार प्रणालियों, यांत्रिक हिस्सों और अन्य तकनीकी घटकों की जरूरत होती है। ऐसे में बड़ी कंपनियों के साथ छोटे और मध्यम भारतीय उद्यम भी उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं।

    सरकार की व्यापक रणनीति देश में ऐसा रक्षा औद्योगिक आधार तैयार करने की है, जिसमें अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल हो। डीआरडीओ नई और उन्नत सैन्य तकनीकों के अनुसंधान एवं विकास पर अधिक ध्यान दे सकता है, जबकि पहले से विकसित तकनीकों को औद्योगिक उत्पादन में बदलने की जिम्मेदारी प्रमाणित भारतीय कंपनियां संभाल सकती हैं।

    इससे नई सैन्य तकनीक विकसित होने और उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपलब्ध कराने के बीच लगने वाले समय को कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है। भारतीय उद्योगों को तकनीकी क्षमता विकसित करने और रक्षा उत्पादन में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

    भारत पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ाने और सैन्य उपकरणों के घरेलू निर्माण को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों तक पहुंचाने का यह निर्णय उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण, तकनीकी क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर, डीआरडीओ की विकसित मिसाइल तकनीक को भारतीय उद्योगों के लिए उपलब्ध कराने से अनुसंधान और उत्पादन के बीच की दूरी कम करने का प्रयास किया गया है। यह कदम भारतीय कंपनियों और एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने के साथ देश की रक्षा आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • बर्फीले क्षेत्रों में तैनात सैनिकों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक स्मार्ट वर्दी विकसित करने की दिशा में रक्षा अनुसंधान संस्थान का बड़ा कदम

    बर्फीले क्षेत्रों में तैनात सैनिकों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक स्मार्ट वर्दी विकसित करने की दिशा में रक्षा अनुसंधान संस्थान का बड़ा कदम

    नई दिल्ली । अत्यधिक ऊंचाई और शून्य से नीचे के तापमान वाले सीमावर्ती बर्फीले क्षेत्रों में तैनात भारतीय सैनिकों की सुरक्षा को अधिक सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से एक विशेष तकनीक पर काम शुरू किया गया है। हिमस्खलन और बर्फीले तूफानों जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जवानों की स्थिति का सटीक पता लगाने के लिए अत्याधुनिक स्मार्ट वर्दी का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत रक्षा अनुसंधान से जुड़ी कानपुर स्थित प्रयोगशाला और उत्तर प्रदेश टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी संस्थान ने संयुक्त रूप से शोध और अनुसंधान की प्रक्रिया शुरू की है। यह नई व्यवस्था विषम परिस्थितियों में राहत और बचाव कार्यों को अत्यधिक तीव्र और सटीक बनाने में मददगार साबित होगी।

    सुरक्षा और ट्रैकिंग प्रणाली को मजबूत करने के लिए तैयार की जा रही इस वर्दी में विशेष कंडक्टिव इंक की मदद से इलेक्ट्रॉनिक सर्किट प्रिंट किए जा रहे हैं। इन परिपथों को माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक चिप, जीपीएस मॉड्यूल और विभिन्न प्रकार के संवेदनशील सेंसरों से जोड़ा जा रहा है। पूरी तकनीकी व्यवस्था को कपड़े की परतों के भीतर ही इस तरह समाहित किया जाएगा कि सैनिक को अतिरिक्त वजन का अहसास न हो। इस पहनावे को मोड़ने, धुलाई करने या दैनिक उपयोग में लाने पर भी इसकी कार्यक्षमता और सर्किट की गुणवत्ता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिससे सैनिक हर स्थिति में जुड़े रहेंगे।

    आपात स्थिति में यदि कोई जवान ग्लेशियर या भारी बर्फ की परतों के नीचे दब जाता है, तो वर्दी में मौजूद प्रणाली सक्रिय होकर बचाव दल को लगातार लोकेशन सिग्नल भेजती रहेगी। इससे रेस्क्यू टीम को विस्तृत और अनिश्चित इलाके में समय गंवाने के बजाय सीधे लक्षित स्थान तक पहुंचने में सफलता मिलेगी। पूर्व की घटनाओं में बर्फ में फंसे जवानों तक पहुंचने में कई बार काफी समय लग जाता था, लेकिन इस नई व्यवस्था से खोज अभियान की गति कई गुना बढ़ जाएगी, जिससे जान-माल के नुकसान को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकेगा।

    तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार प्रारंभिक चरण में प्राथमिक ध्यान सटीक लोकेशन ट्रैकिंग पर केंद्रित किया गया है। हालांकि भविष्य के अनुसंधान चरण में इसमें शरीर का तापमान, हृदय गति और अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक स्वास्थ्य संकेतकों को मापने की सुविधाएं जोड़ने की योजना भी शामिल है। सियाचिन, लद्दाख और पूर्वोत्तर के अति-ऊंचे क्षेत्रों में तैनात सैन्य बलों के लिए यह तकनीकी विकास एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। दोनों संस्थानों द्वारा इस तकनीक का प्रोटोटाइप परीक्षण सफल रहने के बाद इसे व्यापक स्तर पर अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे।

  • इंडोनेशिया के साथ रक्षा समझौतों का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, वैश्विक स्तर पर बढ़ी भारतीय रक्षा तकनीक की साख

    इंडोनेशिया के साथ रक्षा समझौतों का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, वैश्विक स्तर पर बढ़ी भारतीय रक्षा तकनीक की साख

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 136वें एपिसोड में भारत की बढ़ती रक्षा क्षमताओं और स्वदेशी रक्षा तकनीक पर दुनिया के बढ़ते विश्वास का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रक्षा उत्पादन, रक्षा निर्यात और मित्र देशों के साथ रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में भारत लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में हुई अपनी इंडोनेशिया यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों से जुड़े महत्वपूर्ण समझौते भारत की रक्षा तकनीक पर वैश्विक भरोसे को दर्शाते हैं।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का रक्षा क्षेत्र अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश स्वदेशी तकनीक के दम पर मित्र देशों के लिए भी एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार बनकर उभर रहा है। उन्होंने कहा कि आधुनिक रक्षा उपकरणों के विकास और निर्यात में भारत की बढ़ती भागीदारी आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता को भी मजबूत कर रही है।

    इंडोनेशिया के साथ हुए समझौतों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि दोनों देशों ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल से जुड़े महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने के लिए भी दोनों देशों ने साझा रूपरेखा तैयार की है। उन्होंने कहा कि इस तरह के समझौते भारत की तकनीकी क्षमता और वैश्विक विश्वसनीयता को नई पहचान दे रहे हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर वर्ष 1999 के युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि भी अर्पित की। उन्होंने कहा कि 26 जुलाई हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है, क्योंकि इसी दिन भारतीय सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों में अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए कारगिल की चोटियों पर विजय प्राप्त की थी। उन्होंने कहा कि देश अपने वीर सैनिकों के बलिदान को कभी नहीं भूल सकता और नई पीढ़ी तक उनकी गाथाएं पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

    उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य से इस वर्ष विशेष ‘शौर्य विजय यात्रा’ का आयोजन किया गया है। यह मोटरसाइकिल अभियान राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, नई दिल्ली से शुरू होकर कारगिल युद्ध स्मारक, द्रास तक पहुंचेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह अभियान देशवासियों को सैनिकों के बलिदान और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाने का माध्यम बनेगा।

    प्रधानमंत्री ने भारतीय नौसेना में शामिल आधुनिक युद्धपोत आईएनएस महेंद्रगिरी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह युद्धपोत भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है तथा इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है। उनके अनुसार यह भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का सशक्त उदाहरण है।

    उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट प्रणाली और अन्य स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इन उपलब्धियों के पीछे भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की वर्षों की मेहनत और नवाचार की भावना है। उन्होंने हाल में सफल रहे स्वदेशी मिसाइल परीक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत लगातार अपनी रक्षा तैयारियों को आधुनिक और सशक्त बना रहा है।

    प्रधानमंत्री ने देशवासियों से कारगिल विजय दिवस के अवसर पर वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देने और सुरक्षित, सक्षम तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के संकल्प को और मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत अपने सैनिकों के साहस और स्वदेशी तकनीक की शक्ति के बल पर वैश्विक मंच पर नई पहचान बना रहा है।

  • भारत की स्वदेशी Astra Mk1 मिसाइल को मिला पहला विदेशी खरीदार, इंडोनेशिया सौदे से वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ी भारतीय तकनीक की ताकत

    भारत की स्वदेशी Astra Mk1 मिसाइल को मिला पहला विदेशी खरीदार, इंडोनेशिया सौदे से वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ी भारतीय तकनीक की ताकत


    नई दिल्ली ।
    भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता मिलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सामने आया है। इंडोनेशिया भारत द्वारा विकसित Astra Mk1 मिसाइल खरीदने वाला पहला विदेशी देश बनने जा रहा है। इस संभावित रक्षा सौदे को केवल हथियार निर्यात के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय रक्षा अनुसंधान और स्वदेशी सैन्य तकनीक पर बढ़ते वैश्विक विश्वास के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इससे भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और निर्यात संभावनाओं को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    Astra Mk1 एक आधुनिक बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है, जिसे ऐसे हवाई मुकाबलों के लिए विकसित किया गया है जहां पायलट को दुश्मन का विमान आंखों से दिखाई भी नहीं देता। यह मिसाइल रडार और उन्नत सेंसर प्रणाली की सहायता से लंबी दूरी पर लक्ष्य की पहचान कर उसे सटीक रूप से नष्ट करने में सक्षम है। आधुनिक वायु युद्ध में ऐसी मिसाइलों को निर्णायक बढ़त देने वाली तकनीक माना जाता है।

    इस प्रकार की मिसाइल का संचालन पूरी तरह अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों पर आधारित होता है। लड़ाकू विमान पहले अपने रडार से लक्ष्य की पहचान करता है और उसके बाद मिसाइल को निर्धारित दिशा में प्रक्षेपित किया जाता है। उड़ान के अंतिम चरण में मिसाइल का सक्रिय रडार सीकर स्वयं लक्ष्य का पीछा करते हुए उसे भेदता है। यही कारण है कि वर्तमान समय के हवाई संघर्षों में पायलट कई बार एक-दूसरे को देखे बिना ही मुकाबला पूरा कर लेते हैं।

    रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित Astra Mk1 भारत की पहली स्वदेशी बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। इसकी मारक क्षमता लगभग 110 किलोमीटर तक मानी जाती है, हालांकि यह दूरी प्रक्षेपण की स्थिति और ऊंचाई पर निर्भर करती है। यह ध्वनि की गति से चार गुना अधिक रफ्तार से उड़ सकती है तथा इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी लक्ष्य को सटीक रूप से भेदने की क्षमता रखती है। दिन और रात के साथ विभिन्न मौसम परिस्थितियों में भी इसका प्रभावी संचालन संभव है।

    भारतीय वायुसेना ने Astra Mk1 को अपने प्रमुख लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत किया है। भविष्य में इसे नए स्वदेशी और उन्नत लड़ाकू विमानों के साथ भी उपयोग में लाने की योजना है। इससे भारतीय वायुसेना की लंबी दूरी की हवाई मारक क्षमता और अधिक मजबूत होगी तथा स्वदेशी हथियार प्रणालियों पर निर्भरता भी बढ़ेगी।

    दुनिया के कुछ ही देशों के पास इस श्रेणी की अत्याधुनिक एयर-टू-एयर मिसाइल विकसित करने की क्षमता है। ऐसे में Astra Mk1 का निर्यात भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में स्थापित करता है जो न केवल उन्नत रक्षा तकनीक विकसित करते हैं, बल्कि वैश्विक बाजार में उसका सफल निर्यात भी कर सकते हैं। यह उपलब्धि भारतीय रक्षा उद्योग की तकनीकी परिपक्वता और आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।

    इंडोनेशिया के लिए यह मिसाइल उसकी हवाई सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशाल समुद्री क्षेत्र और विस्तृत हवाई सीमाओं वाले देश के रूप में उसे लंबी दूरी से संभावित खतरों का मुकाबला करने वाली आधुनिक हथियार प्रणाली की आवश्यकता है। वहीं भारत के लिए यह सौदा रक्षा निर्यात बढ़ाने, स्वदेशी तकनीक को वैश्विक पहचान दिलाने और रणनीतिक साझेदार देशों के साथ रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकता है।

  • भारत-इंडोनेशिया रक्षा साझेदारी को नई मजबूती, ब्रह्मोस मिसाइल आपूर्ति समझौते से स्वदेशी रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा प्रोत्साहन

    भारत-इंडोनेशिया रक्षा साझेदारी को नई मजबूती, ब्रह्मोस मिसाइल आपूर्ति समझौते से स्वदेशी रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा प्रोत्साहन

    नई दिल्ली । भारत और इंडोनेशिया ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देते हुए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण समझौता किया है। इस करार को भारत के रक्षा निर्यात, स्वदेशी सैन्य तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है। समझौते के साथ दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, औद्योगिक सहयोग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी संबंधों को और मजबूत बनाने पर सहमति जताई है।

    यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान संपन्न हुआ, जो उनके तीन देशों के विदेश दौरे का पहला चरण है। इस अवसर पर दोनों देशों के बीच कई रणनीतिक और आर्थिक समझौतों को अंतिम रूप दिया गया। ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति के साथ भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    समझौते के तहत इंडोनेशिया भारत में विकसित ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली की खरीद भी करेगा। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित यह मिसाइल ‘बियॉन्ड विजुअल रेंज’ क्षमता से लैस है और आधुनिक हवाई युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह तेजी से दिशा बदलने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों को लक्ष्य बनाकर उन्हें प्रभावी ढंग से निष्क्रिय करने में सक्षम मानी जाती है।

    जानकारी के अनुसार भारत भविष्य में इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल की अतिरिक्त बैटरियां भी उपलब्ध करा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह भारत के रक्षा निर्यात कार्यक्रम को और मजबूती देगा तथा स्वदेशी रक्षा उद्योग के लिए नए अवसर तैयार करेगा। हाल के वर्षों में भारत ने रक्षा उपकरणों के निर्यात को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया है और कई मित्र देशों के साथ इस दिशा में सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास को इस साझेदारी की सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा, सुरक्षा और समुद्री सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। उनके अनुसार नए समझौतों से रक्षा आदान-प्रदान, आपदा प्रबंधन, औद्योगिक सहयोग और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक सहयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।

    रक्षा क्षेत्र के अलावा दोनों देशों ने स्वास्थ्य, खनिज संसाधन और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। भारत की गुणवत्तापूर्ण और किफायती दवाओं की उपलब्धता इंडोनेशिया में और आसान बनाने पर सहमति बनी है। साथ ही डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण एवं क्षमता विकास में भी भारत सहयोग करेगा, जिससे स्वास्थ्य क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे।

    भारत और इंडोनेशिया ने आवश्यक खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए स्टील, मिनरल्स और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसके अलावा भारत इंडोनेशिया को विशेष इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन विकसित करने और चुनावी प्रौद्योगिकी से जुड़ा तकनीकी सहयोग भी उपलब्ध कराएगा। इन पहलों को दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

    यात्रा के दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक एवं सैन्य सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्णा ऑफ द रिपब्लिक ऑफ इंडोनेशिया’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उन व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने असाधारण योगदान और उत्कृष्ट सेवाएं दी हों। इस सम्मान को भारत और इंडोनेशिया के बीच मजबूत होते संबंधों तथा पारस्परिक विश्वास का प्रतीक माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस और ‘अस्त्र’ जैसी स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का निर्यात भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता और वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ती उपस्थिति को और मजबूत करेगा। साथ ही यह समझौता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों के रणनीतिक सहयोग को नई दिशा देने के साथ भारत के घरेलू रक्षा उद्योग, अनुसंधान और विनिर्माण क्षेत्र के लिए भी दीर्घकालिक अवसरों का मार्ग प्रशस्त करेगा।

  • आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान

    आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान


    नई दिल्ली ।
    भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में व्यापक बदलाव और तेज प्रगति का साक्षी बना है। स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार और नीतिगत सुधारों के बल पर देश ने न केवल अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत किया है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह वृद्धि देश की रक्षा निर्माण क्षमता और वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है।

    रक्षा क्षेत्र में यह बदलाव आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर लागू की गई विभिन्न नीतियों का परिणाम माना जा रहा है। पिछले वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। रक्षा खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप रक्षा निर्माण से जुड़ी गतिविधियों में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला।

    आज भारत के रक्षा उत्पादों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है। यह स्थिति उस समय से बिल्कुल अलग है जब देश मुख्य रूप से रक्षा आयात पर निर्भर माना जाता था। अब स्वदेशी रूप से विकसित सैन्य उपकरण, हथियार प्रणालियां और रक्षा तकनीकें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत की तकनीकी क्षमता और उत्पादन गुणवत्ता में बढ़ते विश्वास का संकेत है।

    रक्षा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ने से नई तकनीकों के विकास को गति मिली है। अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों, निगरानी तकनीकों और आधुनिक सैन्य उपकरणों के निर्माण में अनुसंधान की भूमिका लगातार बढ़ी है। इसी कारण देश की रक्षा आवश्यकताओं को स्वदेशी स्तर पर पूरा करने की क्षमता मजबूत हुई है।

    रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि ने भी इस परिवर्तन को गति प्रदान की है। पिछले दशक में रक्षा क्षेत्र के लिए वित्तीय आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है, जिससे सैन्य आधुनिकीकरण, अनुसंधान परियोजनाओं और उत्पादन क्षमताओं को मजबूती मिली है। रक्षा उत्पादन का कुल मूल्य भी कई गुना बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है। इससे रक्षा उद्योग से जुड़े हजारों उद्यमों और रोजगार अवसरों को भी लाभ मिला है।

    सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का एक हिस्सा निजी क्षेत्र और नवाचार आधारित संस्थाओं के लिए खोला गया है। इससे नई तकनीकों के विकास और रक्षा क्षेत्र में उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला है। विशेषज्ञ इसे रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं।

    इसके साथ ही परीक्षण और अनुसंधान सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाकर निजी कंपनियों को भी रक्षा तकनीकों के विकास में सहयोग प्रदान किया गया है। इससे रक्षा उत्पादन का दायरा केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है। इस मॉडल ने देश में रक्षा निर्माण क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा निर्यात में हुई तेज वृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखती है। इससे भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, सामरिक साझेदारियां और रक्षा कूटनीति को मजबूती मिली है। आने वाले वर्षों में स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और उत्पादन पर आधारित यह मॉडल भारत को वैश्विक रक्षा उद्योग के प्रमुख देशों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • सरकारी नौकरी अलर्ट: DRDO-RAC ने निकाली साइंटिस्ट भर्ती, 19 जून तक करें आवेदन, जानें पूरी प्रक्रिया

    सरकारी नौकरी अलर्ट: DRDO-RAC ने निकाली साइंटिस्ट भर्ती, 19 जून तक करें आवेदन, जानें पूरी प्रक्रिया


    नई दिल्ली ।
    देश की रक्षा अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी प्रमुख संस्था डीआरडीओ-आरएसी ने वैज्ञानिक पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो इंजीनियरिंग और विज्ञान क्षेत्र में करियर बनाने वाले युवाओं के लिए एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। इस भर्ती अभियान के तहत कुल 33 पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी, जिनमें वैज्ञानिक-ई, वैज्ञानिक-डी और वैज्ञानिक-सी स्तर के पद शामिल हैं। आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और योग्य उम्मीदवार निर्धारित अंतिम तिथि तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

    इस भर्ती में विभिन्न तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों के लिए पदों का वितरण किया गया है। वैज्ञानिक-ई के दो पदों में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार इंजीनियरिंग तथा मैकेनिकल, प्रोडक्शन और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिए अवसर उपलब्ध हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक-डी के 11 पद कंप्यूटर विज्ञान, एयरोस्पेस, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, भौतिकी, रासायनिक इंजीनियरिंग और अन्य संबंधित क्षेत्रों के लिए निर्धारित किए गए हैं। वहीं वैज्ञानिक-सी के 20 पदों में इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर साइंस, गणित, समुद्र विज्ञान, रिमोट सेंसिंग, फार्माकोलॉजी, फिजियोलॉजी और अन्य वैज्ञानिक विषयों से जुड़े उम्मीदवारों को मौका दिया गया है।

    इन पदों के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के पास संबंधित विषय में इंजीनियरिंग या विज्ञान में प्रथम श्रेणी स्नातक या मास्टर डिग्री होना अनिवार्य है। इसके साथ ही उम्मीदवारों के पास निर्धारित क्षेत्र में अनुभव और अन्य आवश्यक योग्यताएं भी होनी चाहिए, जो पद के अनुसार अलग-अलग तय की गई हैं। आयु सीमा की बात करें तो अधिकतम आयु 35 से 45 वर्ष के बीच निर्धारित की गई है, जिसकी गणना आवेदन की अंतिम तिथि के आधार पर की जाएगी। आरक्षित श्रेणियों के उम्मीदवारों को सरकारी नियमों के अनुसार आयु सीमा में छूट प्रदान की जाएगी।

    चयन प्रक्रिया में उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्टिंग के बाद व्यक्तिगत साक्षात्कार, दस्तावेज़ सत्यापन और अन्य मूल्यांकन चरणों से गुजरना होगा। अंतिम चयन पूरी तरह से उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और इंटरव्यू प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को पद के अनुसार आकर्षक वेतनमान प्रदान किया जाएगा, जो लगभग 67,700 रुपये से लेकर 1,23,100 रुपये प्रति माह तक होगा। यह वेतन सरकारी वैज्ञानिक पदों के स्तर के अनुसार तय किया गया है और इसके साथ अन्य भत्ते भी लागू हो सकते हैं।

    आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन माध्यम से की जा रही है। उम्मीदवारों को निर्धारित समय सीमा के भीतर आधिकारिक पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रेशन करना होगा और सभी आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने होंगे। सामान्य, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस श्रेणी के पुरुष उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 100 रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि एससी, एसटी, दिव्यांग और महिला उम्मीदवारों को शुल्क में छूट दी गई है।

    इस भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 19 जून तय की गई है और उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अंतिम समय का इंतजार किए बिना समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें। यह अवसर उन युवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो देश की रक्षा अनुसंधान परियोजनाओं में वैज्ञानिक के रूप में योगदान देना चाहते हैं और एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में करियर बनाना चाहते हैं।

  • पंचकुला के रामगढ़ रेंज में DRDO का हाई-पावर बम परीक्षण, 2 किमी क्षेत्र ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित

    पंचकुला के रामगढ़ रेंज में DRDO का हाई-पावर बम परीक्षण, 2 किमी क्षेत्र ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित

    नई दिल्ली । हरियाणा के पंचकुला जिले में सुरक्षा और वैज्ञानिक परीक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण गतिविधि के तहत रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) 31 मई को रामगढ़ रेंज में हाई-पावर बम का परीक्षण करने जा रहा है। इस परीक्षण को लेकर स्थानीय प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है और आसपास के गांवों के लिए विशेष सुरक्षा एडवाइजरी जारी की गई है। यह परीक्षण DRDO की प्रतिष्ठित प्रयोगशाला टर्मिनल बैलिस्टिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा किया जा रहा है, जो देश में हथियारों, विस्फोटकों और गोला-बारूद की जांच एवं विकास से जुड़ी प्रमुख इकाई मानी जाती है।

    प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार यह परीक्षण पूरी तरह से नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाएगा और इसका उद्देश्य रक्षा प्रणाली को और अधिक मजबूत एवं सुरक्षित बनाना है। परीक्षण के दौरान संभावित खतरे को देखते हुए रामगढ़ रेंज के आसपास के लगभग दो किलोमीटर के दायरे को ‘स्प्लिंटर डेंजर जोन’ घोषित किया गया है। इसका मतलब है कि इस क्षेत्र में बम विस्फोट के दौरान निकलने वाले टुकड़े और प्रभावी दबाव से किसी भी तरह की जनहानि या नुकसान से बचाव के लिए प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।

    स्थानीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि परीक्षण के दौरान बम के टुकड़े लगभग 1.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक जा सकते हैं, इसलिए सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। इस वजह से प्रभावित क्षेत्र के सभी गांवों को अलर्ट पर रखा गया है और लोगों से अपील की गई है कि परीक्षण के निर्धारित समय के दौरान वे अपने घरों के अंदर ही रहें और किसी भी प्रकार की खुले स्थानों पर आवाजाही से बचें। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह एक नियमित और वैज्ञानिक परीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए पूरे क्षेत्र में कड़ी निगरानी की जाएगी और भारतीय वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी भी इस परीक्षण की मॉनिटरिंग के लिए मौजूद रहेंगे। सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर पूरे क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित बनाया गया है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।

    प्रशासन ने विशेष रूप से भानू और बिल्ला गांवों के निवासियों को सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा आसरेवाली, नाग्गल, मोगीनंद, किशनगढ़ और रामगढ़ नगर परिषद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अन्य गांवों के लोगों को भी सतर्क रहने और अनावश्यक आवाजाही से बचने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने साफ किया है कि यह परीक्षण देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है और इसमें सभी सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

    स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है। पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती और निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गई है ताकि परीक्षण प्रक्रिया शांतिपूर्ण और सुरक्षित तरीके से पूरी हो सके।

  • सुपर सुखोई से दुश्मनों में खौफ, भारत के Su-30MKI बनेंगे 4.7 जेनरेशन के घातक फाइटर जेट

    सुपर सुखोई से दुश्मनों में खौफ, भारत के Su-30MKI बनेंगे 4.7 जेनरेशन के घातक फाइटर जेट




    नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना अपने सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमानों को बड़े अपग्रेड के जरिए “सुपर सुखोई” में बदलने जा रही है। नए रडार, AI सिस्टम और ताकतवर इंजन से लैस ये विमान पाकिस्तान के F-16 और JF-17 के लिए बड़ी चुनौती बनेंगे।

    भारतीय वायुसेना अब अपनी ताकत को नई ऊंचाई देने की तैयारी में जुट गई है। देश के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमानों में शामिल Sukhoi Su-30MKI को बड़े अपग्रेड के जरिए “सुपर सुखोई” बनाया जाएगाभारतीय वायुसेना अब अपनी ताकत को नई ऊंचाई देने की तैयारी में जुट गई है। देश के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमानों में शामिल Sukhoi Su-30MKI को बड़े अपग्रेड के जरिए “सुपर सुखोई” बनाया जाएगा। इस मेगा प्रोजेक्ट के बाद भारतीय फाइटर जेट्स पहले से ज्यादा आधुनिक, घातक और हाईटेक बन जाएंगे। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अपग्रेड के बाद ये विमान पाकिस्तान के F-16 Fighting Falcon और JF-17 Thunder लड़ाकू विमानों पर भारी पड़ेंगे।

    भारतीय वायुसेना के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में रूस के साथ फ्रांस और इजरायल की तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। अपग्रेडेशन के तहत सुखोई विमानों के रडार, एवियोनिक्स, हथियार प्रणाली और इंजन को पूरी तरह आधुनिक बनाया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे विमान की ऑपरेशनल लाइफ करीब 30 साल तक बढ़ जाएगी।

    रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इस अपग्रेड के बाद सुखोई Su-30MKI को 4.7 जेनरेशन क्षमता वाला फाइटर जेट माना जाएगा। इसकी सबसे बड़ी ताकत भारत में विकसित “विरूपाक्ष” AESA रडार होगा, जिसे DRDO ने तैयार किया है। यह रडार 200 किलोमीटर से ज्यादा दूरी से दुश्मन के स्टील्थ विमानों का पता लगाने में सक्षम बताया जा रहा है।

    सुपर सुखोई में AI आधारित नया एवियोनिक्स सिस्टम भी लगाया जाएगा, जिससे युद्ध के दौरान पायलट को रियल टाइम डेटा और बेहतर टारगेटिंग सपोर्ट मिलेगा। पुराने डिजिटल सिस्टम की जगह अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर टेक्नोलॉजी दी जाएगी। इससे विमान की सर्वाइवल क्षमता और मारक ताकत दोनों बढ़ेंगी।

    सिर्फ रडार ही नहीं, बल्कि सुखोई का इंजन भी बदला जा सकता है। मौजूदा AL-31FP इंजन की जगह ज्यादा ताकतवर AL-41F-1S इंजन लगाने पर चर्चा चल रही है। यही इंजन रूस के आधुनिक Su-35 फाइटर जेट में इस्तेमाल होता है। नए इंजन से विमान को ज्यादा स्पीड, बेहतर कंट्रोल और भारी हथियार ले जाने की क्षमता मिलेगी।

    इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी HAL को दी गई है। पहले चरण में 84 सुखोई विमानों को अपग्रेड किया जाएगा, जबकि बाद में करीब 200 और विमानों को आधुनिक बनाया जाएगा। उम्मीद है कि 2030 तक सुपर सुखोई पूरी तरह भारतीय वायुसेना का हिस्सा बन जाएंगे।

    विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान लगातार अपने एयर फोर्स बेड़े को आधुनिक बना रहे हैं। ऐसे में भारत का सुपर सुखोई प्रोजेक्ट सिर्फ अपग्रेड नहीं, बल्कि भविष्य की एयर वॉरफेयर रणनीति का बड़ा कदम माना जा रहा है।

  • भारत के ‘रहस्यमयी’ मिसाइल टेस्ट से चीन-पाकिस्तान में खलबली, अग्नि-6 की ताकत ने बढ़ाई टेंशन

    भारत के ‘रहस्यमयी’ मिसाइल टेस्ट से चीन-पाकिस्तान में खलबली, अग्नि-6 की ताकत ने बढ़ाई टेंशन



    नई दिल्ली। भारत ने ओडिशा तट से एक बेहद शक्तिशाली इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का गुप्त परीक्षण कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। माना जा रहा है कि यह परीक्षण अग्नि-6 या उससे जुड़ी किसी एडवांस हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी का हिस्सा हो सकता है। हालांकि DRDO ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की सामरिक ताकत में बड़ा कदम मान रहे हैं।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है और इसकी रेंज हजारों किलोमीटर तक हो सकती है। परीक्षण के बाद चीन और पाकिस्तान में बेचैनी बढ़ गई है। खासतौर पर पाकिस्तान की चिंता इस बात को लेकर बताई जा रही है कि भारत अब ऐसी मिसाइल तकनीक की तरफ बढ़ रहा है, जिसे रोक पाना लगभग नामुमकिन माना जाता है।

    रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बैलिस्टिक मिसाइलें इतनी तेज और एडवांस हैं कि मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए उन्हें इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि भारत की रणनीतिक क्षमता को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा है।

    बताया जा रहा है कि मिसाइल ने हाइपरसोनिक री-एंट्री प्रोफाइल के साथ उड़ान भरी और इसकी गति मैक-5 से ज्यादा हो सकती है। सोशल मीडिया पर बांग्लादेश और पूर्वी भारत के कई इलाकों से आसमान में तेज रफ्तार रोशनी जैसी वस्तु के वीडियो भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मिसाइल की पैंतरेबाजी क्षमता इसे और खतरनाक बनाती है।

    विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान के खिलाफ इतनी लंबी दूरी की मिसाइल की जरूरत नहीं है, इसलिए इस परीक्षण का मुख्य संदेश चीन को माना जा रहा है। भारत अब ऐसी क्षमता विकसित कर रहा है, जिससे चीन के भीतर मौजूद सामरिक और सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सके।

    रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि अगर यह वास्तव में MIRV तकनीक या अग्नि-6 से जुड़ा परीक्षण है, तो यह चीन की मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इससे भारत की ‘सटीक और तेज जवाब’ वाली सैन्य रणनीति को नई ताकत मिलेगी।