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  • मां दुर्गा की बिंदी के नीचे क्यों बनाई जाती है मकड़ी और उसका जाल? जानिए महामाया, मोह-माया और इस अनोखी परंपरा का धार्मिक रहस्य

    मां दुर्गा की बिंदी के नीचे क्यों बनाई जाती है मकड़ी और उसका जाल? जानिए महामाया, मोह-माया और इस अनोखी परंपरा का धार्मिक रहस्य


    नई दिल्ली ।
    शारदीय नवरात्र का पावन पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करने के बाद विजयादशमी के दिन देवी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु भावुक मन से मां को विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की प्रार्थना करते हैं। इस साल मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन 20 अक्टूबर को किया जाएगा। देश के विभिन्न हिस्सों में इस परंपरा को धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है।

    मां दुर्गा की प्रतिमाओं में कई ऐसी विशेषताएं होती हैं, जिनका संबंध धार्मिक मान्यताओं और प्रतीकों से माना जाता है। इन्हीं में से एक है देवी के माथे पर बिंदी के ठीक नीचे दिखाई देने वाली मकड़ी और उसका जाल। कुछ पारंपरिक प्रतिमाओं में नजर आने वाली यह आकृति सामान्य सजावट भर नहीं मानी जाती, बल्कि इसके पीछे एक विशेष धार्मिक अर्थ जुड़ा हुआ है। यह परंपरा डाकर साज से जुड़ी प्रतिमाओं की सजावट में देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकड़ी का जाल देवी की महामाया शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

    महामाया का अर्थ उस दिव्य शक्ति से लगाया जाता है, जो अपनी माया के माध्यम से संसार का संचालन करती है। इस मान्यता में मकड़ी और उसके जाल को जीवन तथा संसार की जटिलताओं को समझाने वाले प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

    मकड़ी को महामाया से क्यों जोड़ते हैं?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकड़ी अपने भीतर से जाल बनाती है और फिर उसी जाल के बीच रहती है। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य के जीवन को समझने का प्रयास किया जाता है। इंसान भी अपने जीवन में परिवार, रिश्तों, इच्छाओं और जिम्मेदारियों के बीच एक व्यवस्था बनाता है। समय बीतने के साथ वह इन्हीं संबंधों और इच्छाओं में इस तरह उलझ सकता है कि उसके लिए उनसे अलग होकर सोचना मुश्किल हो जाता है।

    मकड़ी के जाल को इसी सांसारिक उलझन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिस प्रकार मकड़ी जाल का निर्माण करती है, उसी तरह देवी की शक्ति से इस संसार की माया का संचालन होता है। इसलिए मकड़ी और उसके जाल को मां दुर्गा की महामाया शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। प्रतिमा में यह प्रतीक मनुष्य को संसार की प्रकृति और मोह-माया के प्रभाव की याद दिलाता है।

    अपने जाल में कभी नहीं फंसती मकड़ी
    मकड़ी से जुड़ी इस धार्मिक व्याख्या का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह अपना जाल बनाती है, लेकिन सामान्यतः उसमें स्वयं नहीं फंसती। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य को मोह-माया से बचने का संदेश दिया जाता है। पैसा, परिवार, रिश्ते और जिम्मेदारियां जीवन के आवश्यक हिस्से हैं, लेकिन इनके प्रति अत्यधिक मोह व्यक्ति को मानसिक रूप से उलझा सकता है।

    इस मान्यता के अनुसार, मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन में संतुलन बनाए रखना चाहिए। सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाना जरूरी है, लेकिन उनमें इतना नहीं उलझना चाहिए कि व्यक्ति स्वयं को ही भूल जाए। इस प्रकार मकड़ी का प्रतीक जीवन में संतुलन, विवेक और मोह से दूरी बनाए रखने की सीख से जुड़ता है।

    दुर्गा विसर्जन कब और किस मुहूर्त में होगा?
    पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। इस अवधि में विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा और मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की परंपरा निभाई जाएगी।

    बताए गए शुभ मुहूर्त के अनुसार, 20 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से दोपहर 3 बजकर 30 मिनट तक दुर्गा विसर्जन किया जा सकेगा। इस अवधि में श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार किसी भी समय देवी की प्रतिमा का विसर्जन कर सकते हैं। विसर्जन के दौरान भक्त मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की कामना करते हैं।

  • कोलकाता दुर्गा पूजा भगदड़ में 19 मौतों के बाद भाजपा विधायक सजल घोष के ‘नसीब’ वाले बयान पर विवाद

    कोलकाता दुर्गा पूजा भगदड़ में 19 मौतों के बाद भाजपा विधायक सजल घोष के ‘नसीब’ वाले बयान पर विवाद

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ के दौरान 19 लोगों की मौत के बाद राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। इस हादसे पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक सजल घोष के बयान को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने घटना पर दुख जताते हुए कहा कि कोई नहीं जानता कि रात में क्या हो सकता है। उन्होंने हादसे को नसीब से जोड़ते हुए यह भी कहा कि कोई भी व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकती।

    सजल घोष ने कहा कि ऐसी घटनाओं में गलतियां हो सकती हैं और किसी भी व्यवस्था को सौ फीसदी सुरक्षित नहीं माना जा सकता। उन्होंने अपने बयान में कहा कि यह नसीब की बात है और कोई नहीं बता सकता कि रात में क्या होने वाला है। उनके इस बयान के बाद हादसे के समय की व्यवस्थाओं और जिम्मेदारी को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    विधायक ने कहा कि किसी दुर्घटना को पूरी तरह रोक पाना हमेशा संभव नहीं होता। उन्होंने अमेरिका में राष्ट्रपति की सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि वहां भी सुरक्षा व्यवस्था हर परिस्थिति में पूरी तरह सफल नहीं रही है। उन्होंने भारत के दो प्रधानमंत्रियों की मौत का उल्लेख करते हुए कहा कि गलतियां हो जाती हैं और दुर्घटनाओं को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं दी जा सकती।

    सजल घोष ने यह भी कहा कि अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि चोरबागान पंडाल में हुई भगदड़ के लिए गलती किस स्तर पर हुई। उनके मुताबिक, अगर बारिश नहीं हुई होती तो संभव है कि ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। उन्होंने किसी तरह की जानकारी छिपाने की कोशिश किए जाने की बात से भी इनकार किया। हालांकि, हादसे के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के तथ्यों के आधार पर ही सामने आ सकेगा।

    घटना के बाद सात लोगों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान, उनकी भूमिका और उन पर लगाए गए आरोपों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है। मामले में आगे की कार्रवाई और जांच के निष्कर्षों को लेकर स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

    विधायक ने पीड़ित परिवारों को दी जा रही आर्थिक सहायता का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मृतकों में से दो लोग उनके विधानसभा क्षेत्र के निवासी थे। उनके अनुसार, राज्य सरकार ने प्रत्येक मृतक के परिवार को 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का आश्वासन दिया है। इसके अलावा घायलों को पांच लाख रुपये की सहायता और उनके इलाज का पूरा खर्च उठाने की बात कही गई है।

    इस हादसे ने दुर्गा पूजा पंडालों में भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा इंतजाम और आपात स्थिति से निपटने की तैयारियों पर भी सवाल खड़े किए हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने वाले आयोजनों में प्रवेश और निकास की व्यवस्था, भीड़ की निगरानी तथा मौसम से जुड़ी परिस्थितियों को संभालना महत्वपूर्ण होता है। हालांकि, चोरबागान पंडाल में इन व्यवस्थाओं में कहां कमी रही, इसकी पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।

    सजल घोष के बयान को लेकर उठे विवाद के बीच हादसे में जान गंवाने वाले लोगों और घायल हुए श्रद्धालुओं की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है। परिवारों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा के साथ-साथ दुर्घटना के कारणों और जिम्मेदारी से जुड़े सवालों के जवाब सामने आना बाकी हैं। जांच से जुड़े तथ्यों के स्पष्ट होने के बाद ही यह निर्धारित हो सकेगा कि भगदड़ किन परिस्थितियों में हुई और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए किन कदमों की आवश्यकता है।

  • कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल भगदड़ में 19 मौतें, सात गिरफ्तार, धारा 163 लागू और आयोजनों पर बढ़ी सख्ती

    कोलकाता दुर्गा पूजा पंडाल भगदड़ में 19 मौतें, सात गिरफ्तार, धारा 163 लागू और आयोजनों पर बढ़ी सख्ती


    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दुर्गा पूजा पंडाल में हुई भगदड़ के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। उत्तर कोलकाता के मुक्तारामबाबू स्ट्रीट स्थित चोरबागान सार्वजनीन दुर्गा पूजा पंडाल में शनिवार रात हुए हादसे में 19 लोगों की मौत हो गई, जबकि 25 लोग घायल हुए हैं। घटना के बाद पुलिस ने पंडाल समिति से जुड़े सात लोगों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा भीड़भाड़ वाले कई पूजा आयोजनों को अस्थायी रूप से पंडाल बंद रखने की सलाह दी गई है।

    हादसे के समय बारिश हो रही थी। इसी दौरान पंडाल में अचानक भीड़ का दबाव बढ़ने से भगदड़ मच गई। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के अनुसार, मृतकों में 13 महिलाएं और एक बच्चा शामिल हैं। उन्होंने बताया कि 19 में से 17 लोगों की मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार जारी है। घायलों में 24 लोगों की हालत खतरे से बाहर बताई गई, जबकि एक व्यक्ति की स्थिति गंभीर बनी हुई है।

    घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने पंडाल समिति से जुड़े 12 लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की। इसके बाद सात लोगों को गिरफ्तार किया गया। राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित करने की बात कही है। प्रशासन हादसे के बाद सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा कर रहा है और शहर के विभिन्न पूजा पंडालों में भीड़ प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    कोलकाता में दुर्गा पूजा के अवसर पर करीब 3,500 पंडाल लगाए गए हैं। वहीं, पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 58,000 पूजा आयोजनों की बात कही गई है। ऐसे में प्रशासन के सामने श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती है। पुलिस कई पंडालों का निरीक्षण कर रही है और भीड़भाड़ वाले आयोजनों को आवश्यक सावधानियां बरतने के निर्देश दिए जा रहे हैं।

    हादसे के बाद कोलकाता के कुछ इलाकों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 लागू की गई है। यह प्रतिबंध 18 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक तीन दिनों के लिए प्रभावी रहेगा। आदेश के तहत कोलकाता मेडिकल कॉलेज और आसपास के क्षेत्रों सहित निर्धारित इलाकों में रैली, सभा, जुलूस, धरना और प्रदर्शन पर रोक लगाई गई है। प्रशासन ने यह कदम सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने, शांति भंग होने और सुरक्षा संबंधी जोखिमों की आशंका को देखते हुए उठाया है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह रविवार सुबह घायलों से मिलने उस अस्पताल पहुंचे, जहां भगदड़ में घायल लोगों का इलाज किया जा रहा है। उनके साथ मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। इससे पहले शाह ने कालीघाट मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। हादसे के बाद उन्होंने दुर्गा पूजा पंडालों में जाने का अपना निर्धारित कार्यक्रम रद्द कर दिया।

    मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिवारों और घायलों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा भी की। उन्होंने बताया कि मृतकों के 19 परिवारों को प्रत्येक को 25 लाख रुपये मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। घायलों के इलाज का पूरा खर्च सरकार उठाएगी। इसके अलावा प्रत्येक घायल को पांच लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने की घोषणा की गई है। मुख्यमंत्री ने बताया कि वह 13 पीड़ित परिवारों से व्यक्तिगत रूप से मिल चुके हैं और उन्हें सरकार की ओर से हरसंभव सहायता का भरोसा दिया है।

    मुख्यमंत्री ने राज्य के सभी दुर्गा पूजा आयोजकों से सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करने की अपील की है। उन्होंने पर्याप्त रोशनी, प्रवेश और निकास के उचित रास्ते, भीड़ नियंत्रण तथा पुलिस और अग्निशमन विभाग के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया। हादसे के बाद प्रशासन का मुख्य ध्यान पूजा स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने पर है।

  • शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पौराणिक कथा, प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

    शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पौराणिक कथा, प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन 13 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी की आराधना से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति में साहस, धैर्य तथा एकाग्रता का भाव विकसित होता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है। आज की व्यस्त दिनचर्या में कामकाज का दबाव और एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाने की चुनौती लोगों के मानसिक तनाव को बढ़ा सकती है। ऐसे में भक्त मां चंद्रघंटा की पूजा करके मानसिक शांति और सकारात्मकता की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है। देवीभागवत पुराण में उनके स्वरूप का वर्णन मिलता है। उनका शरीर स्वर्ण के समान चमकदार बताया गया है। मां की दस भुजाएं हैं और वे सिंह पर सवार रहती हैं। उनकी भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। देवी का यह रूप सौम्यता और वीरता का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना में भक्त शक्ति, साहस और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

    पौराणिक कथा के अनुसार, जब महिषासुर नामक दैत्य का अत्याचार बढ़ने लगा और देवताओं को परेशान किया जाने लगा, तब मां दुर्गा ने दुष्ट शक्तियों का मुकाबला करने के लिए चंद्रघंटा का स्वरूप धारण किया। मान्यता है कि देवी के घंटे की भयानक ध्वनि से दैत्यों में भय फैल गया और बुरी शक्तियों का नाश हुआ। इसी कारण उनके घंटे को नकारात्मक शक्तियों को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का प्रतीक माना जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह संदेश भी देता है कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

    नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा है। भक्त माता को मखाने या केसर की खीर, पेड़े, रबड़ी और मेवों से बनी मिठाइयां अर्पित कर सकते हैं। फूलों में कमल और सफेद या पीली चमेली को प्रिय माना जाता है। इसके अलावा लाल गुलाब, गेंदा और पीले रंग के फूल भी पूजा में चढ़ाए जा सकते हैं। पूजन के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ रखें। इसके बाद मां की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक और धूप जलाएं, फूल अर्पित करें तथा दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। श्रद्धापूर्वक आरती करें और पूजा के दौरान मन को शांत रखने का प्रयास करें।

    मां चंद्रघंटा की आराधना में मंत्र जाप का भी विशेष महत्व माना जाता है। भक्त देवी का ध्यान करते हुए ‘ॐ देवी चंद्रघण्टायै नमः॥’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। उनका ध्यान मंत्र है, ‘पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥’ इसका भावार्थ है कि श्रेष्ठ सिंह पर सवार, दुष्टों के संहार के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली और चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध देवी भक्त पर अपनी कृपा बनाए रखें।

    पूजा के दौरान क्रोध, कटुता और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। घर और पूजा स्थल में स्वच्छता बनाए रखें तथा बासी फूलों को जमा न होने दें। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नवरात्रि में सात्विक भोजन करने और शराब तथा मांसाहार से दूर रहने की सलाह दी जाती है। मां चंद्रघंटा की आराधना का संदेश है कि कामकाज के दबाव और जीवन की कठिनाइयों के बीच भी शांत मन से निर्णय लेना चाहिए। घर और कार्यस्थल पर अनावश्यक शोर से बचना, दूसरों का सम्मान करना और धैर्य बनाए रखना जीवन में संतुलन स्थापित करने में मदद कर सकता है।

  • मध्य प्रदेश के कायमोर प्लांट में अदाणी सीमेंट ने 15,000 सीमेंट बैग से बनाई मां दुर्गा की 70 फीट ऊंची आकृति

    मध्य प्रदेश के कायमोर प्लांट में अदाणी सीमेंट ने 15,000 सीमेंट बैग से बनाई मां दुर्गा की 70 फीट ऊंची आकृति


    नई दिल्ली ।
    नवरात्रि और दुर्गा पूजा 2026 के अवसर पर अदाणी सीमेंट ने मध्य प्रदेश के कायमोर प्लांट में मां दुर्गा को समर्पित एक अनूठी कलाकृति तैयार की है। 15,000 सीमेंट बैग की मदद से बनाई गई इस विशाल आकृति के माध्यम से आस्था, शक्ति और विश्वास का संदेश देने का प्रयास किया गया है। कंपनी की इस पहल को ‘जहां विश्वास, वहां शक्ति’ नाम दिया गया है। इस रचना की खासियत इसका आकार और इसे तैयार करने का तरीका है, जिसमें हजारों सीमेंट बैग मिलकर देवी दुर्गा की एक विशाल छवि बनाते हैं।

    यह कलाकृति 70 फीट लंबी और 70 फीट चौड़े क्षेत्र में तैयार की गई है। इसमें अंबुजा सीमेंट और एसीसी के बैगों का इस्तेमाल करते हुए कुल 750 टन सीमेंट का प्रतीकात्मक उपयोग किया गया। इस पूरी रचना को आकार देने में लगभग 12,600 मानव-घंटों का सामूहिक श्रम लगा। कर्मचारियों ने सीमेंट बैगों को निर्धारित स्थानों पर व्यवस्थित करके देवी की आकृति तैयार की। इस प्रक्रिया में अलग-अलग बैगों को इस तरह रखा गया कि वे मिलकर एक संपूर्ण और स्पष्ट छवि का रूप ले सकें।

    इस स्थापना की सबसे खास बात यह है कि जमीन से देखने पर सीमेंट के बैग अलग-अलग इकाइयों की तरह नजर आते हैं, लेकिन ऊंचाई से देखने पर उनका संयोजन मां दुर्गा की विशाल आकृति में बदल जाता है। इस कलाकृति में देवी का मुकुट, आंखें, दस भुजाएं और उनका व्यापक स्वरूप बारीकी से उकेरा गया है। अलग-अलग हिस्सों में व्यवस्थित किए गए बैगों के माध्यम से देवी की पूरी छवि तैयार की गई है। इस तरह यह रचना छोटे-छोटे तत्वों के सामूहिक संयोजन से एक बड़ी कलात्मक प्रस्तुति बनाने का उदाहरण पेश करती है।

    कंपनी ने कलाकृति को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया और उसके अंतिम स्वरूप को एक डिजिटल फिल्म में दर्ज किया है। इसमें शुरुआत में कर्मचारियों को जमीन पर सीमेंट बैग व्यवस्थित करते हुए दिखाया गया है। इसके बाद कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है और अलग-अलग बैगों से बनी मां दुर्गा की पूरी आकृति सामने आती है। इस फिल्म में निर्माण प्रक्रिया के साथ कलाकृति का हवाई दृश्य भी शामिल किया गया है। इसे डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया पर साझा करने की योजना है।

    अदाणी सीमेंट के अनुसार, इस अभियान में उसके दो प्रमुख ब्रांड अंबुजा सीमेंट और एसीसी को एक साझा रचनात्मक मंच पर प्रस्तुत किया गया है। अभियान में ‘शक्ति’ को अंबुजा सीमेंट की मजबूती के वादे से जोड़ा गया है, जबकि ‘विश्वास’ एसीसी की नौ दशकों पुरानी विश्वसनीयता और विरासत का प्रतीक है। मां दुर्गा की छवि को इस प्रस्तुति का केंद्र बनाया गया है, जिन्हें शक्ति, संरक्षण और आस्था का प्रतीक माना जाता है।

    कंपनी का कहना है कि इस पहल के जरिए सीमेंट को केवल भवन और बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़ी सामग्री के रूप में नहीं, बल्कि विश्वास, शक्ति और समर्पण जैसी भावनाओं से जोड़कर भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। नवरात्रि और दुर्गा पूजा के अवसर पर तैयार की गई यह कलाकृति परंपरा और सामूहिक प्रयास के महत्व को रेखांकित करती है। साथ ही, यह अंबुजा सीमेंट और एसीसी की पहचान को एक साथ सामने लाने का माध्यम भी बनी है।

  • नवरात्रि में माता रानी के स्वागत के लिए प्लेलिस्ट में शामिल करें ये 12 भजन, पूजा से लेकर माता की चौकी तक छाएगा भक्तिमय माहौल

    नवरात्रि में माता रानी के स्वागत के लिए प्लेलिस्ट में शामिल करें ये 12 भजन, पूजा से लेकर माता की चौकी तक छाएगा भक्तिमय माहौल


    नई दिल्ली । नवरात्रि का पर्व आते ही घरों और मंदिरों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भक्त माता की चौकी सजाते हैं, कलश स्थापना की तैयारी करते हैं और अखंड ज्योत जलाकर मां का स्वागत करते हैं। इस दौरान भक्ति संगीत का भी विशेष महत्व होता है। माता रानी के भजन पूजा के माहौल को भक्तिमय बनाने के साथ श्रद्धालुओं को अपनी आस्था व्यक्त करने का अवसर देते हैं। सुबह की पूजा से लेकर शाम की आरती और भजन संध्या तक, मां के गीत उत्सव की रौनक बढ़ा सकते हैं।

    नवरात्रि के लिए भजनों की प्लेलिस्ट तैयार करते समय ऐसे गीत चुने जा सकते हैं, जिनमें मां की ममता, भक्तों के प्रति विश्वास, देवी की महिमा और उनके दरबार की सुंदरता का वर्णन हो। कुछ भजन भक्त और माता के रिश्ते को भावनात्मक रूप से व्यक्त करते हैं, जबकि कुछ गीत नवरात्रि के आगमन और उत्सव की उमंग से जुड़े हैं। इस अवसर पर पुराने और नए भक्ति गीतों को एक साथ सुनने का विकल्प भी रखा जा सकता है।

    इस सूची में पहला भजन ‘माई है ना’ है। मां को अपना सहारा मानने वाले भक्तों के लिए यह गीत खास भाव रखता है। इसे सुबह की पूजा या दिन की शुरुआत के समय सुना जा सकता है। दूसरा भजन ‘मेरी मां के बराबर कोई नहीं’ है, जिसे पायल देव ने गाया है। यह गीत मां की ममता और उनके प्रति श्रद्धा की भावना को व्यक्त करता है। तीसरा भजन ‘मैं बालक तू माता’ है। इसके बोल भक्त और माता के बीच अटूट संबंध को दर्शाते हैं। इस गीत का आधुनिक संस्करण भी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय है।

    चौथा गीत ‘मेरी माई जगदम्बा भवानी’ मां जगदम्बा की स्तुति से जुड़ा है। इसे प्लेलिस्ट में शामिल करके देवी के प्रति आस्था और श्रद्धा के भाव को स्थान दिया जा सकता है। पांचवां भजन ‘शेरावाली मां’ माता की स्तुति और उनके दरबार से जुड़ी भक्ति भावना को सामने लाता है। मां की सजावट, चुनरी और जयकारों के बीच इस तरह के गीत नवरात्रि के उत्सव के अनुकूल रहते हैं। छठा गीत ‘आई है नवरात्रि’ पर्व के आगमन की खुशी और उत्साह से जुड़ा है। इसे सुनकर पूजा की तैयारियों के दौरान उत्सवी माहौल बनाया जा सकता है।

    सातवां भजन ‘माई’ मां के दरबार में हाजिरी लगाने और उनके प्रति समर्पण व्यक्त करने की भावना से जुड़ा है। आठवां गीत ‘तेरे मंदिरों की शान निराली, री शेरावाली मां’ देवी के मंदिरों की सुंदरता, दरबार की रौनक और भक्तों की आस्था को केंद्र में रखता है। नौवां भजन ‘माता मेरी माता’ देवी के विभिन्न रूपों की महिमा का स्मरण कराने वाला गीत है। इन तीनों भजनों को माता की पूजा, भजन संध्या या घर में धार्मिक आयोजन के दौरान सुना जा सकता है।

    दसवां गीत ‘मैया का चोला है रंगला’ मां के श्रृंगार और रंग-बिरंगी चुनरी से जुड़े भावों को प्रस्तुत करता है। माता की चौकी सजाते समय या भजन संध्या में इसे शामिल किया जा सकता है। ग्यारहवां भजन ‘बिगड़ी मेरी बना दे’ मां के सामने अपनी परेशानियां रखने और उनसे सुख, शांति तथा साहस की कामना करने की भावना से जुड़ा है। बारहवां गीत ‘प्यारा सजा है तेरा द्वार’ माता के दरबार को सजाने और उनके स्वागत में भजन गाने की परंपरा से मेल खाता है। इसे कलश स्थापना, शाम की आरती या माता की चौकी से पहले सुना जा सकता है।

    नवरात्रि के नौ दिनों में इन 12 भजनों को अपनी पसंद के अनुसार प्लेलिस्ट में शामिल किया जा सकता है। सुबह की आरती, पूजा की तैयारी, माता की चौकी और शाम के धार्मिक आयोजन के लिए अलग-अलग गीत चुने जा सकते हैं। मां दुर्गा की स्तुति से जुड़े इन भजनों के माध्यम से परिवार के लोग एक साथ भक्ति के पल बिता सकते हैं और पर्व के दौरान श्रद्धा तथा उत्साह से भरा माहौल बना सकते हैं।

  • शारदीय नवरात्रि में नारंगी से पीकॉक ग्रीन तक नौ रंगों की परंपरा, जानें किस दिन किस देवी की पूजा होती है और क्या है रंगों का महत्व

    शारदीय नवरात्रि में नारंगी से पीकॉक ग्रीन तक नौ रंगों की परंपरा, जानें किस दिन किस देवी की पूजा होती है और क्या है रंगों का महत्व


    नई दिल्ली ।
    शारदीय नवरात्रि का पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ इस दौरान पारंपरिक कपड़े पहनने और हर दिन अलग रंग चुनने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। भक्त पूजा, गरबा और डांडिया जैसे आयोजनों के लिए अपने परिधानों की तैयारी पहले से करते हैं। नवरात्रि के प्रत्येक दिन को एक देवी स्वरूप से जोड़ा जाता है और प्रचलित रंगों की सूची में नारंगी, सफेद, लाल, रॉयल ब्लू, पीला, हरा, ग्रे, पर्पल और पीकॉक ग्रीन शामिल हैं। इन रंगों को उत्साह, शांति, शक्ति, प्रसन्नता और नई शुरुआत जैसे भावों से जोड़ा जाता है। हालांकि, रंगों का क्रम और उनसे जुड़ी मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार बदल सकती हैं। पूजा के लिए किसी विशेष रंग के कपड़े पहनना अनिवार्य नहीं है।

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन नारंगी रंग पहनने की परंपरा बताई जाती है। नारंगी रंग को उत्साह, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस अवसर पर नारंगी रंग की साड़ी, सूट या कुर्ता पहनकर पारंपरिक अंदाज अपना सकते हैं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है और सफेद रंग को इस दिन से जोड़ा जाता है। सफेद रंग शांति, सादगी और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सफेद सूट या साड़ी के साथ हल्की जूलरी पहनकर सादगी भरा उत्सवी लुक तैयार किया जा सकता है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन लाल रंग पहनने की परंपरा है। लाल रंग को शक्ति और साहस से जोड़कर देखा जाता है। लाल साड़ी, अनारकली सूट या अन्य पारंपरिक परिधान इस दिन के लिए चुने जा सकते हैं।

    नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है और प्रचलित सूची में रॉयल ब्लू रंग शामिल है। इस रंग को गहराई, स्थिरता और शांति से जोड़ा जाता है। भक्त नीले रंग का कुर्ता, साड़ी या लहंगा पहनकर उत्सव के अनुरूप अपना पहनावा चुन सकते हैं। पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है। इस दिन पीला रंग पहनने की परंपरा बताई गई है। पीले रंग को खुशहाली, प्रसन्नता और उमंग का प्रतीक माना जाता है। पीले रंग की कुर्ती, साड़ी या सूट पारंपरिक परिधान के विकल्प हो सकते हैं। छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है और हरे रंग को इस दिन से जोड़ा जाता है। हरा रंग प्रकृति, विकास और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर हरे रंग के परिधान पहनकर नवरात्रि के उत्सव में शामिल हुआ जा सकता है।

    सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन ग्रे रंग को प्रचलित रंगों की सूची में रखा गया है। ग्रे रंग को संतुलन और स्थिरता से जोड़ा जाता है। इस दिन ग्रे रंग की साड़ी या एथनिक सूट के साथ सिल्वर जूलरी पहनने का विकल्प चुना जा सकता है। आठवें दिन मां महागौरी की आराधना होती है और पर्पल यानी बैंगनी रंग इस दिन से संबंधित माना गया है। बैंगनी रंग को गरिमा, समृद्धि और भव्यता से जोड़ा जाता है। इस दिन बैंगनी साड़ी, सूट या लहंगा पहनकर उत्सवी लुक तैयार किया जा सकता है। नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन पीकॉक ग्रीन यानी मोरपंखी हरे रंग को प्रचलित रंगों की सूची में शामिल किया गया है। इस रंग की साड़ी, सूट या लहंगा पहनकर भक्त अंतिम दिन के उत्सव के लिए पारंपरिक पहनावा चुन सकते हैं।

    नवरात्रि में नौ रंगों के कपड़े पहनने की परंपरा का उद्देश्य त्योहार के उत्साह और देवी उपासना से जुड़े भावों को पहनावे के माध्यम से व्यक्त करना भी है। अलग-अलग रंगों को विशेष गुणों और प्रतीकों से जोड़ा जाता है। लाल रंग शक्ति, सफेद शांति और हरा रंग प्रकृति तथा विकास का प्रतीक माना जाता है। इसी तरह नारंगी को ऊर्जा, पीले को प्रसन्नता और बैंगनी को भव्यता से जोड़ा जाता है। हालांकि, इन रंगों की सूची हर जगह एक जैसी नहीं होती और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसमें बदलाव देखने को मिल सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान रंगों का चयन व्यक्तिगत पसंद, स्थानीय परंपरा और सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। मां दुर्गा की आराधना में श्रद्धा और पूजा का महत्व प्रमुख है; किसी खास रंग के कपड़े पहनना धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं माना जाता।

  • शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री

    शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का पर्व 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान घर में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इस दिन विधि-विधान से कलश स्थापित करने की परंपरा है।

    घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इन समयावधियों को ध्यान में रखकर पूजा की तैयारी कर सकते हैं। कलश स्थापना नवरात्रि की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इसके बाद भक्त मां दुर्गा की आराधना करते हुए नौ दिनों तक पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

    कलश स्थापना से पहले पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए। इसके लिए चौड़े मुंह वाला मिट्टी का पात्र, साफ मिट्टी, जौ, कलश, गंगाजल, शुद्ध पानी, सिक्का, सुपारी, साबुत चावल यानी अक्षत, दूर्वा, रोली और कलावा की जरूरत होती है। इसके साथ ही आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते और पानी वाला नारियल भी रखना चाहिए। पूजा के लिए लाल कपड़ा या चुनरी, फूल, फल, पान, इलायची, लौंग, घी का दीपक, मिठाई और बताशे भी उपयोगी सामग्री हैं।

    नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। फिर पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद माता रानी को फूल, चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। पूजा शुरू करने से पहले सभी आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रखना सुविधाजनक होता है।

    घटस्थापना की प्रक्रिया में सबसे पहले मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डालकर जौ बोए जाते हैं। इसके ऊपर मिट्टी की हल्की परत डालें और थोड़ा पानी छिड़कें। इसके बाद इस पात्र को पूजा स्थल पर रख दें। नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहना चाहिए, ताकि उनमें अंकुर निकल सकें। धार्मिक परंपरा में जौ बोने को समृद्धि और अच्छी फसल के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसे नई शुरुआत और खुशहाली से भी जोड़ा जाता है।

    इसके बाद कलश पर कलावा बांधें और उसमें गंगाजल तथा साफ पानी भरें। कलश में साबुत सुपारी, सिक्का, अक्षत और हल्दी की गांठ जैसी शुभ वस्तुएं रखी जा सकती हैं। फिर कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते सजाएं और उसके ऊपर नारियल स्थापित करें। तैयार कलश को जौ वाले पात्र के पास रखें। इसके बाद मां दुर्गा के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप, फूल, फल तथा मिठाई अर्पित करें। अंत में मां दुर्गा के मंत्रों का जाप कर आरती करें।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में बोए गए जौ का अच्छी तरह अंकुरित होना शुभ संकेत माना जाता है। जौ को समृद्धि और अच्छी फसल से जोड़ने की परंपरा के चलते घटस्थापना के दौरान इन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। इस प्रकार कलश स्थापना, जौ बोने और मां दुर्गा की पूजा के साथ नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व का आरंभ होता है।

  • शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से, हाथी पर मां दुर्गा का आगमन और 10 दिनों तक पूजा का कारण जानें

    शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से, हाथी पर मां दुर्गा का आगमन और 10 दिनों तक पूजा का कारण जानें

    नई दिल्ली । शारदीय नवरात्रि का पर्व इस साल 11 अक्टूबर 2026, रविवार से शुरू होगा। देशभर में इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाएगी। भक्त व्रत और साधना के साथ माता रानी से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करेंगे। इस बार नवरात्रि को लेकर खास बात यह है कि पर्व सामान्य नौ दिनों के बजाय 10 दिनों तक चलेगा। तिथियों में वृद्धि होने के कारण नवरात्रि की अवधि एक दिन बढ़ गई है और इसका समापन 20 अक्टूबर को विजयादशमी तथा दशहरा के साथ होगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि की शुरुआत जिस वार से होती है, उसके आधार पर मां दुर्गा के वाहन के आगमन की मान्यता जुड़ी होती है। इस बार नवरात्रि रविवार से शुरू हो रही है, इसलिए मां दुर्गा के हाथी पर आगमन की मान्यता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में हाथी को स्थिरता, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। माता के हाथी पर आने को अच्छी वर्षा और धन-धान्य में वृद्धि का संकेत भी माना जाता है।

    नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाएगी। इस दिन मां शैलपुत्री की पूजा होगी। घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक बताया गया है। भक्त इस दौरान विधि-विधान से कलश स्थापना कर नवरात्रि की पूजा की शुरुआत कर सकते हैं।

    इस बार 10 दिनों तक नवरात्रि चलने का कारण तिथियों में वृद्धि है। पंचांग के अनुसार सप्तमी तिथि दो दिन रहने के कारण पर्व की अवधि एक दिन बढ़ गई है। हालांकि नवरात्रि के धार्मिक आधार में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की ही पूजा की जाएगी। यानी पूजा के क्रम में नौ देवियों की आराधना ही रहेगी, लेकिन तिथियों की गणना के कारण नवरात्रि का पूरा पर्व 10 कैलेंडर दिनों में संपन्न होगा।

    11 अक्टूबर को प्रतिपदा के दिन मां शैलपुत्री की पूजा और घटस्थापना होगी। 12 अक्टूबर को द्वितीया पर मां ब्रह्मचारिणी, 13 अक्टूबर को तृतीया पर मां चंद्रघंटा और 14 अक्टूबर को चतुर्थी पर मां कूष्मांडा की आराधना होगी। 15 अक्टूबर को पंचमी के दिन मां स्कंदमाता और 16 अक्टूबर को षष्ठी पर मां कात्यायनी की पूजा की जाएगी।

    17 अक्टूबर को सप्तमी तिथि पर मां कालरात्रि की पूजा होगी। 18 अक्टूबर को महानिशा पूजा और दुर्गा अष्टमी होगी, जबकि सप्तमी तिथि भी जारी रहेगी। 19 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग रहेगा तथा इस दिन कन्या पूजन किया जाएगा। इसके बाद 20 अक्टूबर को नवमी तिथि के बाद विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा।

    शारदीय नवरात्रि को शक्ति की उपासना का प्रमुख पर्व माना जाता है। इन दिनों भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा के साथ व्रत और साधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी की आराधना से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख, शांति, समृद्धि तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नवरात्रि का समय आत्मसंयम, श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना के लिए भी विशेष माना जाता है। इस बार 10 दिनों तक चलने वाला यह पर्व 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ संपन्न होगा।

  • नवरात्रि के पहले दिन बदल सकता है इन 4 राशियों का समय, नौकरी, घर और शादी से जुड़े मिलेंगे खास संकेत

    नवरात्रि के पहले दिन बदल सकता है इन 4 राशियों का समय, नौकरी, घर और शादी से जुड़े मिलेंगे खास संकेत

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 11 अक्टूबर रविवार को होगा। इस दिन कलश स्थापना के साथ मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा का यह दिन चार राशियों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है। मेष, वृश्चिक, मकर और कुंभ राशि के जातकों के लिए इस दिन करियर, नौकरी, विवाह, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक जीवन से जुड़े सकारात्मक संकेत बताए गए हैं। इन राशियों के जातकों के कुछ लंबे समय से अधूरे सपने पूरे होने की संभावना भी जताई गई है।

    मेष राशि वालों के लिए नवरात्रि का पहला दिन करियर के लिहाज से महत्वपूर्ण रह सकता है। पद और प्रतिष्ठा में वृद्धि के संकेत हैं। प्रमोशन मिलने पर वर्तमान शहर से किसी दूसरे शहर में जाने की स्थिति बन सकती है। नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को भी नए शहर में अवसर मिल सकता है। परिवार में खुशहाली का माहौल रहेगा और परिजनों के साथ घूमने-फिरने का अवसर मिल सकता है। अविवाहित लोगों के विवाह की बात आगे बढ़ सकती है और शादी का सपना पूरा होने की संभावना है। सामाजिक संपर्क बढ़ाने से करियर में नए अवसर मिल सकते हैं।

    वृश्चिक राशि के जातकों के लिए यह दिन जीवन में सकारात्मक बदलाव लेकर आने वाला बताया गया है। लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का अंत हो सकता है और अपने लक्ष्य की दिशा में सफलता मिलने के संकेत हैं। इस दिन कोई ऐसी खुशखबरी या महत्वपूर्ण सूचना मिल सकती है, जिसका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। कार्यस्थल पर प्रभाव बढ़ेगा और लोग आपके काम से प्रभावित हो सकते हैं। प्रेम संबंध को विवाह में बदलने की इच्छा रखने वालों के लिए समय अनुकूल बताया गया है। परिवार की सहमति से लव मैरिज का रास्ता खुल सकता है। कुछ महीने पहले विवाह करने वाले लोगों के लिए संतान सुख के संकेत भी बताए गए हैं।

    मकर राशि वालों के लिए नवरात्रि का पहला दिन रुकावटों से राहत मिलने का संकेत दे रहा है। कामकाज में आने वाली बाधाएं दूर हो सकती हैं और बनाई गई योजनाओं के सफल होने की संभावना है। नौकरीपेशा लोगों को अपने क्षेत्र में लगातार मेहनत करनी होगी। जिस पद और आर्थिक लाभ की इच्छा है, उसे पाने की दिशा में सफलता मिल सकती है। नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों के लिए भी अवसर बनने के संकेत हैं। इसके अलावा विदेश में नौकरी या शिक्षा से संबंधित कोई प्रस्ताव मिलने की संभावना बताई गई है।

    कुंभ राशि के जातकों के लिए नवरात्रि का पहला दिन घर और आर्थिक मामलों से जुड़ी उम्मीदें पूरी होने का संकेत दे रहा है। लंबे समय से घर खरीदने का सपना देख रहे लोगों के लिए यह समय अनुकूल बताया गया है। आर्थिक स्थिति मजबूत होने से मकान खरीदने की योजना को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। करियर में भी आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे। अपने लक्ष्य के प्रति लगातार प्रयास और दृढ़ता बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा। पारिवारिक जीवन में सुख और शांति बनी रह सकती है।

    कुंभ राशि वालों के लिए वाणी और व्यवहार पर नियंत्रण रखना भी जरूरी बताया गया है। संयमित बातचीत और सकारात्मक व्यवहार से काम आसान हो सकते हैं। वहीं अन्य तीन राशियों के लिए भी नवरात्रि का पहला दिन अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़ने और लंबित इच्छाओं को पूरा करने की दिशा में अवसरों वाला बताया गया है। इन ज्योतिषीय संकेतों में नौकरी, करियर, विवाह, विदेश से जुड़े अवसर और घर खरीदने जैसे विषय प्रमुख हैं।