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  • देश की अथर्व्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास….2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च में होगा 93% हिस्सा

    देश की अथर्व्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास….2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च में होगा 93% हिस्सा


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) आने वाले सालों में किसके दम पर आगे बढ़ेगी? इसका जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने कहा है कि भारत का मिडिल क्लास (मध्यम वर्ग) ही देश की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा इंजन बनने जा रहा है। उन्होंने बताया कि 2036 तक भारत के मिडिल क्लास और उच्च-मध्यम वर्ग (Slightly Affluent Population) का देश के कुल उपभोक्ता खर्च (Consumer Spending) में 93% हिस्सा होगा, यानी अगले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा ताकत इसी वर्ग की बढ़ती खरीदारी और खर्च से मिलेगी।

    फ्रांस के Aix-Marseille यूनिवर्सिटी में आयोजित प्रतिष्ठित आर्थिक सम्मेलन Rencontres Économiques d’Aix-en-Provence को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश का मजबूत घरेलू उपभोग (Domestic Consumption) है, जिसे मिडिल क्लास लगातार आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि जब लोग ज्यादा खर्च करते हैं, तो उद्योगों का उत्पादन बढ़ता है, रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था को नई गति मिलती है।

    निर्मला सीतारमण के अनुसार, वर्तमान में भारत की लगभग 31% आबादी मिडिल क्लास में आती है। OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) के अनुमान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2030 से 2035 के बीच भारत दुनिया में मिडिल क्लास आबादी के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ सकता है। उन्होंने बताया कि साल 1995 से 2021 के बीच भारत का मिडिल क्लास औसतन 6.3% सालाना की दर से बढ़ा है और आने वाले सालों में यह रफ्तार और तेज होने की उम्मीद है।

    वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार की वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion), जनकल्याण योजनाओं और आर्थिक सुधारों ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालकर मिडिल क्लास तक पहुंचने में मदद की है। उनके मुताबिक, अब तक 24.8 करोड़ (248 मिलियन) लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) से बाहर आए हैं। इसके अलावा डिजिटल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और आसान लोन सिस्टम ने लोगों की आर्थिक क्षमता को मजबूत किया है। वहीं, कई वस्तुओं पर GST दरों में कमी से भी घरेलू खर्च बढ़ाने में मदद मिली है।

    निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा कि अब आर्थिक विकास केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या चेन्नई जैसे महानगरों तक सीमित नहीं है। टियर-2 और टियर-3 शहर भी तेजी से आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र बन रहे हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अनुमान के अनुसार, आने वाले सालों में 500 से अधिक भारतीय शहर नए आर्थिक हब के रूप में उभर सकते हैं। इससे देशभर में रोजगार, निवेश और उपभोग के नए अवसर पैदा होंगे।

    वित्त मंत्री ने भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्षमता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत का कुशल युवा वर्ग तेजी से AI तकनीक अपना रहा है और उद्योगों को भी AI आधारित समाधान उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने बताया कि देश के MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) सेक्टर का लगभग 40% निर्यात होता है और इनमें से कई कंपनियां अब AI आधारित बिजनेस मॉडल अपना रही हैं। इससे नए रोजगार और तकनीकी विकास को भी बढ़ावा मिल रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज दुनिया में सबसे अधिक AI ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और डेटा सेंटर्स वाले प्रमुख देशों में शामिल हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण देश की बड़ी और कुशल तकनीकी कार्यबल है, जो वैश्विक कंपनियों की जरूरतों को पूरा कर रही है।

    वित्त मंत्री का मानना है कि आने वाले सालों में भारत की आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा आधार उसका तेजी से बढ़ता मिडिल क्लास होगा। अगर मौजूदा रफ्तार बनी रहती है, तो 2036 तक देश की लगभग 93% उपभोक्ता खरीदारी इसी वर्ग से आएगी, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभेगी।

  • भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है, लेकिन दीर्घकालिक और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता बनी हुई है। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि देश ने आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, फिर भी विकास की इस गति को स्थायी बनाए रखने के लिए आत्मसंतोष की बजाय निरंतर सुधार, नवाचार और संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना होगा।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी बड़ी और जटिल अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर हासिल करना पर्याप्त नहीं होता। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और विकास समावेशी तथा टिकाऊ स्वरूप ग्रहण करे। उन्होंने कहा कि मजबूत संस्थानों, प्रभावी नीतियों और सक्षम प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बिना दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

    सीतारमण ने कहा कि भारत वर्तमान में कई आर्थिक संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन यह स्थिति स्थायी रूप से सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती। उनके अनुसार समय-समय पर नीतियों का मूल्यांकन करना और उन क्षेत्रों की पहचान करना आवश्यक है जहां सुधार की गुंजाइश अभी भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि बदलती घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतिगत ढांचे को लगातार अद्यतन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    वित्त मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि विकास को गति देने के लिए देश की उत्पादन क्षमता, कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है, लेकिन कुछ सेक्टर ऐसे भी हैं जिन्हें अतिरिक्त नीति समर्थन और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। विशेष रूप से जटिल विनिर्माण, मध्यवर्ती उत्पादों और विशिष्ट सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में नई रणनीतियों की जरूरत महसूस की जा रही है।

    उन्होंने कहा कि लंबे समय से जिन चुनौतियों पर चर्चा होती रही है, अब उनके व्यावहारिक समाधान तलाशने का समय है। इसके लिए बेहतर क्रियान्वयन, संस्थागत क्षमता निर्माण और आवश्यकतानुसार नई नीतियों का निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरकार लगातार इस दिशा में काम कर रही है ताकि भविष्य की आर्थिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

    वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए सीतारमण ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में भारत को भी अपनी नीतियों को लचीला और परिस्थितियों के अनुरूप बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया स्वतः संचालित नहीं होती, बल्कि इसके लिए निरंतर निगरानी, सुधार और दूरदर्शी योजना की आवश्यकता होती है।

    कोविड-19 महामारी के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महामारी से जुड़े कुछ असर अब भी आर्थिक योजना और अपेक्षाओं को प्रभावित करते हैं। हालांकि वर्तमान समय में किसी बड़े व्यवधान की आशंका नहीं है, फिर भी सरकार संभावित जोखिमों पर नजर बनाए हुए है और आवश्यक तैयारियां कर रही है।

    वित्त मंत्री ने मौसम संबंधी चुनौतियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कमजोर मानसून की संभावना को ध्यान में रखते हुए सरकार पहले से तैयारी कर रही है। कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और कुछ इलाकों में अत्यधिक वर्षा की आशंका को देखते हुए संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

    उन्होंने विश्वास जताया कि उचित नीतियों, मजबूत संस्थागत ढांचे और निरंतर सुधारों के माध्यम से भारत अपनी दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को और अधिक सशक्त बना सकेगा तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा।

  • RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन सीएस शेट्टी ने ब्याज दरों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में ब्याज दरों में किसी प्रकार का बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए अधिक लाभदायक रहेगा। उनके अनुसार इस समय नीतिगत दरों में स्थिरता बनाए रखने से आर्थिक गतिविधियों को संतुलित समर्थन मिलेगा और विकास की रफ्तार भी बनी रहेगी। बाजार की सामान्य धारणा भी यही संकेत देती है कि आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना केंद्रीय बैंक की प्रमुख जिम्मेदारी होती है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर रखना एक व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरें उद्योग, कारोबार और उपभोक्ताओं को स्पष्ट संकेत देती हैं, जिससे निवेश और ऋण गतिविधियों को निरंतरता मिलती है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था इस समय सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और इसे स्थिर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।

    एसबीआई चेयरमैन ने निवेशकों को सलाह देते हुए कहा कि शेयर बाजार में होने वाले रोजाना उतार-चढ़ाव को लेकर अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक ताकत उसकी दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता में निहित है। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, डिजिटल क्रांति, वित्तीय समावेशन और तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि निवेशकों को अल्पकालिक बाजार गतिविधियों के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं पर ध्यान देना चाहिए।

    सीएस शेट्टी ने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याएं और तकनीकी परिवर्तन जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत एक स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में आर्थिक सुधारों और निवेश के अनुकूल वातावरण ने भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

    डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने भारत की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आज देश की सबसे बड़ी तकनीकी सफलताओं में शामिल है। हर महीने अरबों डिजिटल लेनदेन यूपीआई के माध्यम से किए जा रहे हैं, जिससे नकदी पर निर्भरता कम हुई है और भुगतान प्रणाली अधिक तेज, सुरक्षित तथा पारदर्शी बनी है। उन्होंने बताया कि एसबीआई की डिजिटल सेवाओं की सफलता उसकी मजबूत तकनीकी संरचना और ग्राहकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।

    उन्होंने वित्तीय समावेशन में जनधन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार ‘जेएएम ट्रिनिटी’ ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में अहम योगदान दिया है। इसके साथ ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) प्रणाली ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद की है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और विभिन्न योजनाओं में होने वाली संभावित अनियमितताओं में कमी आई है।

    भारत की भविष्य की विकास यात्रा पर बात करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि आने वाले वर्षों में देश को बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी। उन्होंने बताया कि बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा परिवर्तन, शहरी विकास, एमएसएमई और नवाचार जैसे क्षेत्रों में विशाल निवेश अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बनेंगे।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर भी उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उनका मानना है कि भारत एआई तकनीक के उपयोग और विस्तार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन सकता है। उन्होंने बताया कि एसबीआई पहले से कई बैंकिंग सेवाओं में एआई आधारित प्रणालियों का उपयोग कर रहा है और इसके लिए जिम्मेदार तथा सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने हेतु विशेष ढांचा भी विकसित किया गया है।

    कर्ज की मांग के संबंध में उन्होंने कहा कि छोटे और मध्यम उद्योगों सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऋण की मांग मजबूत बनी हुई है। बैंक लगातार उद्यमियों और व्यवसायों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही बैंक विलय एवं अधिग्रहण से जुड़े वित्तपोषण के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत की मजबूत आर्थिक नींव, डिजिटल प्रगति और निवेश क्षमता देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में मदद करेगी।

  • मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    नई दिल्ली । मई माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है, जो अर्थव्यवस्था में मांग और कर अनुपालन की मजबूती को दर्शाती है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के बावजूद भारत का सकल जीएसटी संग्रह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के स्तर के करीब पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब कई वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।
    आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 1,94,184 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 1,88,172 करोड़ रुपये की तुलना में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वहीं शुद्ध जीएसटी राजस्व 1,66,904 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जिसमें 3.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हुई है। रिफंड को समायोजित करने के बाद राजस्व वृद्धि लगभग 9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो कर संग्रह प्रणाली की मजबूती का संकेत है।

    महीने के दौरान रिफंड की राशि भी बढ़कर 27,281 करोड़ रुपये रही, हालांकि इसके बावजूद कुल राजस्व में सकारात्मक रुझान देखने को मिला। घरेलू कर संग्रह में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन आयात से प्राप्त कर राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि ने कुल आंकड़ों को संतुलित बनाए रखा। आयात आधारित जीएसटी संग्रह 19.1 प्रतिशत बढ़कर 59,654 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो वैश्विक व्यापार गतिविधियों में मजबूती और आयात मांग में सुधार का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति घरेलू खपत और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतरता को दर्शाती है।

    वहीं दूसरी ओर घरेलू जीएसटी संग्रह 1,34,530 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 2.6 प्रतिशत की कमी देखी गई, लेकिन सेवा क्षेत्र और वस्तु श्रेणियों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सेवा क्षेत्र में 22.2 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि और वस्तु श्रेणियों में सकारात्मक रुझान यह दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत आधारित विकास मॉडल मजबूत स्थिति में है। सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों की व्यापकता को दर्शाता है।

    राज्यों के स्तर पर भी जीएसटी संग्रह में विविध प्रदर्शन देखने को मिला। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, तेलंगाना और हरियाणा जैसे राज्यों में कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से केरल और हरियाणा जैसे राज्यों ने दोहरे अंकों में वृद्धि के साथ बेहतर प्रदर्शन किया है। यह संकेत देता है कि राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं में भी गतिविधियां तेज हो रही हैं और कर आधार का विस्तार हो रहा है।

    वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में कुल सकल जीएसटी संग्रह 4.37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक है। इसी अवधि में शुद्ध राजस्व में भी 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल माह में भी रिकॉर्ड संग्रह देखने को मिला था, जो यह दर्शाता है कि लगातार दो महीनों से राजस्व वृद्धि का रुझान मजबूत बना हुआ है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रदर्शन वित्त वर्ष के निर्धारित कर लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित होगा और देश की आर्थिक स्थिरता को और मजबूत करेगा।

  • भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।

    वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है।

    महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है।

    विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।

  • पेट्रोल-डीजल पर ड्यूटी कटौती से सरकार पर बढ़ा आर्थिक दबाव: जनता को राहत देने की कीमत ₹1 लाख करोड़, वित्त मंत्री ने रखी बड़ी तस्वीर

    पेट्रोल-डीजल पर ड्यूटी कटौती से सरकार पर बढ़ा आर्थिक दबाव: जनता को राहत देने की कीमत ₹1 लाख करोड़, वित्त मंत्री ने रखी बड़ी तस्वीर


    नई दिल्ली। देश में बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच आम जनता को राहत देने के उद्देश्य से उठाए गए कदम का अब आर्थिक असर भी सामने आने लगा है। पेट्रोल और डीजल पर करों में कटौती के बाद जहां उपभोक्ताओं को कुछ राहत महसूस हुई है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है। आर्थिक मोर्चे पर यह फैसला एक संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें जनता को तत्काल राहत और राजस्व पर पड़ने वाले असर के बीच सरकार को संतुलन साधना पड़ रहा है।

    हाल के समय में वैश्विक हालातों ने ऊर्जा बाजारों पर गहरा असर डाला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए ऐसी परिस्थितियां अतिरिक्त चुनौती पैदा करती हैं। ऐसे समय में ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे आम आदमी और व्यापारिक गतिविधियों दोनों को प्रभावित करती हैं। इसी कारण सरकार ने कीमतों के दबाव को कम करने के लिए ईंधन पर लगने वाले करों में राहत देने का रास्ता चुना।

    सरकार के इस फैसले से देशभर में ईंधन की कीमतों पर कुछ हद तक नियंत्रण दिखाई दिया, जिससे परिवहन लागत और दैनिक खर्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की कोशिश की गई। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार की राहत का सीधा असर सरकारी आय पर भी पड़ता है। राजस्व में कमी का प्रभाव भविष्य की आर्थिक योजनाओं और विकास परियोजनाओं पर भी दिखाई दे सकता है। इसलिए ऐसे फैसले केवल उपभोक्ताओं को राहत देने तक सीमित नहीं होते बल्कि उनके दीर्घकालिक आर्थिक परिणाम भी होते हैं।

    वित्तीय मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मौजूदा आर्थिक चुनौतियां केवल घरेलू कारणों से नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित हैं। विदेशी बाजारों में लगातार हो रहे बदलाव, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मुद्रा बाजार की अस्थिरता जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहे हैं। ऐसे माहौल में नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे आम लोगों को राहत देने के साथ आर्थिक स्थिरता भी बनाए रखें।

    इसके अलावा उद्योग और व्यापार से जुड़े क्षेत्रों में भी समय पर भुगतान और वित्तीय अनुशासन पर जोर दिया जा रहा है। छोटे और मध्यम उद्योगों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, ताकि आर्थिक गतिविधियों की गति प्रभावित न हो। विशेषज्ञ मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल बड़े फैसलों से नहीं बल्कि छोटे स्तर पर वित्तीय अनुशासन बनाए रखने से भी तय होती है।

    इस बीच ईंधन कीमतों में लगातार हो रहे बदलाव ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इसका सीधा असर भारत के ऊर्जा बाजार और आर्थिक स्थिति पर देखने को मिल सकता है। फिलहाल सरकार राहत और आर्थिक संतुलन के बीच रास्ता निकालने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।

  • पये की कमजोरी पर विशेषज्ञों की राय ने बढ़ाया भरोसा: अस्थिर वैश्विक माहौल खत्म होते ही दिख सकती है रिकवरी

    पये की कमजोरी पर विशेषज्ञों की राय ने बढ़ाया भरोसा: अस्थिर वैश्विक माहौल खत्म होते ही दिख सकती है रिकवरी


    नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में लगातार हो रहे बदलाव और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय रुपये की स्थिति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी ने बाजार और आम लोगों के बीच चिंता बढ़ाई है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को घबराहट के नजरिए से देखने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियां अस्थायी हैं और जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता कम होगी, भारतीय मुद्रा में भी धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि वैश्विक बाजार इस समय कई तरह के दबावों से गुजर रहे हैं। दुनिया के कई हिस्सों में जारी तनाव, बढ़ती आर्थिक चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताओं ने मुद्रा बाजार पर भी असर डाला है। ऐसे समय में किसी भी देश की मुद्रा पर दबाव बनना असामान्य नहीं माना जाता। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति अभी भी मजबूत है और अस्थायी उतार-चढ़ाव को स्थायी संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि डॉलर के मुकाबले रुपया मनोवैज्ञानिक स्तर तक भी पहुंचता है तो यह केवल एक आंकड़ा होगा, न कि किसी गंभीर आर्थिक संकट का संकेत। कई बार बाजार परिस्थितियों के अनुसार मुद्राएं अपने आप संतुलन बनाती हैं और ऐसी स्थितियों में अत्यधिक हस्तक्षेप लंबे समय में नुकसानदायक भी साबित हो सकता है। उनका मानना है कि बाजार आधारित समायोजन कई बार कृत्रिम नियंत्रण की तुलना में अधिक प्रभावी और टिकाऊ साबित होते हैं।

    इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि केंद्रीय संस्थाएं अत्यधिक दबाव बनाकर मुद्रा को एक तय स्तर पर रोकने की कोशिश करती हैं तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। आर्थिक नीतियों का उद्देश्य केवल तात्कालिक राहत देना नहीं बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता बनाए रखना भी होना चाहिए। इसलिए कई विशेषज्ञ विनिमय दर को अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया के अनुसार काम करने देने की बात कर रहे हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों को लेकर भी आर्थिक जगत में चर्चा बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि का असर घरेलू बाजारों पर धीरे-धीरे दिखाई देना स्वाभाविक माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी उत्पाद की कीमतों को लंबे समय तक कृत्रिम रूप से नियंत्रित रखना व्यवहारिक नहीं होता। बाजार की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप ही आर्थिक नीतियां अधिक प्रभावी साबित होती हैं।

    इसके अलावा विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए अल्पकालिक उपायों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आर्थिक जानकारों का कहना है कि ऐसे कदम शुरुआती राहत तो दे सकते हैं, लेकिन भविष्य में अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव भी पैदा कर सकते हैं। फिलहाल विशेषज्ञों की राय यही है कि मौजूदा हालात को धैर्य और संतुलन के साथ देखने की आवश्यकता है, क्योंकि वैश्विक परिस्थितियां सामान्य होते ही भारतीय रुपये में मजबूती की संभावना अभी भी बरकरार मानी जा रही है।

  • गोल्ड खरीदारी को लेकर बदल रही सोच: सर्वे में सामने आया पीएम मोदी की अपील का प्रभाव

    गोल्ड खरीदारी को लेकर बदल रही सोच: सर्वे में सामने आया पीएम मोदी की अपील का प्रभाव

    नई दिल्ली । देश में बढ़ती आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सोने की खरीदारी को लेकर लोगों की सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में हुए एक सर्वे में यह सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का असर अब आम लोगों के व्यवहार पर भी दिखाई देने लगा है। बड़ी संख्या में भारतीयों ने अगले एक साल तक गैर-जरूरी सोना खरीदने से बचने की बात कही है।

    कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और अनावश्यक सोने की खरीद पर नियंत्रण रखने की अपील की थी। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करना बताया गया था। अब एक सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है कि लोगों ने इस अपील को गंभीरता से लिया है और अपनी खरीदारी की आदतों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है।

    सर्वे में शामिल लोगों में से लगभग 61 प्रतिशत ने कहा कि वे अगले एक वर्ष तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी से बचने का प्रयास करेंगे। इनमें कई ऐसे लोग भी शामिल हैं जो नियमित रूप से सोना खरीदते रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक परिस्थितियों और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के चलते लोग अब खर्च को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं।

    भारत में सोने की खरीदारी केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और पारिवारिक महत्व भी काफी गहरा है। शादियों, त्योहारों और पारंपरिक आयोजनों में सोना खरीदना लंबे समय से भारतीय समाज का हिस्सा रहा है। इसके बावजूद सर्वे में बड़ी संख्या में लोगों का सोना खरीदने को लेकर संयम दिखाना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बीते वित्तीय वर्ष में भारत का सोना आयात बिल काफी बढ़ गया। वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में तेज उछाल के कारण आयात की कुल लागत रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई। हालांकि आयात की मात्रा में बहुत ज्यादा वृद्धि नहीं हुई, लेकिन ऊंची कीमतों ने विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पैदा किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग गैर-जरूरी सोना खरीदने में कमी करते हैं तो इससे देश की आर्थिक स्थिति को कुछ हद तक राहत मिल सकती है। विदेशी मुद्रा की बचत होने से आयात संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी और आर्थिक दबाव कम किया जा सकेगा।

    हालांकि सर्वे में यह भी सामने आया कि सभी लोग अपनी पारंपरिक आदतें बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। करीब 19 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे शादियों और पारिवारिक जरूरतों के लिए सोना खरीदना जारी रखेंगे। कई लोगों का यह भी मानना है कि आर्थिक अस्थिरता के दौर में सोना अब भी सबसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में से एक है।

    इस सर्वे ने यह साफ कर दिया है कि देश में आर्थिक मुद्दों को लेकर लोगों की जागरूकता बढ़ रही है और सरकारी अपीलों का असर अब आम नागरिकों की सोच और फैसलों में भी दिखाई देने लगा है।

  • पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ा उछाल, देशभर में बढ़ी महंगाई की मार..

    पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ा उछाल, देशभर में बढ़ी महंगाई की मार..


    नई दिल्ली । देश में एक बार फिर ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम जनता की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में जारी नई दरों के अनुसार पेट्रोल और डीजल के दामों में उल्लेखनीय इजाफा दर्ज किया गया है, जिससे परिवहन से लेकर दैनिक जीवन तक महंगाई का असर महसूस किया जा रहा है। बढ़ती कीमतों ने न केवल उपभोक्ताओं पर आर्थिक दबाव बढ़ाया है, बल्कि बाजार में अन्य वस्तुओं की लागत पर भी असर डालना शुरू कर दिया है।

    राजधानी दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में पेट्रोल और डीजल के नए रेट लागू हो गए हैं, जिसके बाद पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर 3.14 रुपये और डीजल की कीमत में 3.11 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम नए स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे रोजमर्रा की आवाजाही और परिवहन लागत में सीधा असर देखने को मिल रहा है।

    इसके साथ ही सीएनजी की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे सार्वजनिक परिवहन और निजी वाहनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति में अस्थिरता और उसकी बढ़ती कीमतों को माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल के दाम लंबे समय से ऊंचे बने हुए हैं, जिसका सीधा प्रभाव भारतीय बाजार पर पड़ रहा है।

    तेल कंपनियों का कहना है कि बढ़ती लागत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उन्हें भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा था, जिसके चलते कीमतों में संशोधन आवश्यक हो गया। विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की कीमतें लगातार उच्च स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे ईंधन के उत्पादन और वितरण की लागत में वृद्धि हो रही है। इसका प्रभाव अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है।

    सरकारी स्तर पर भी इस स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन की कीमतों में यह बढ़ोतरी मुद्रास्फीति को और बढ़ा सकती है। पहले से ही बढ़ती महंगाई से जूझ रही जनता के लिए यह एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ साबित हो सकता है। परिवहन लागत बढ़ने से सब्जियों, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

    इस बीच, रुपये की कमजोरी ने भी स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट के कारण आयातित कच्चा तेल और महंगा हो गया है। इससे तेल कंपनियों की लागत और बढ़ गई है और इसका सीधा असर खुदरा कीमतों पर देखने को मिल रहा है।

    आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में और उतार-चढ़ाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति, मुद्रा विनिमय दर और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव आने वाले दिनों में कीमतों की दिशा तय करेंगे। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए स्थिति अभी और चुनौतीपूर्ण बनी रह सकती है।

  • थोक महंगाई 8.3% पर पहुंची, कच्चे तेल ने बिगाड़ा आर्थिक संतुलन..

    थोक महंगाई 8.3% पर पहुंची, कच्चे तेल ने बिगाड़ा आर्थिक संतुलन..

    नई दिल्ली । अप्रैल महीने में देश की अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव एक बार फिर साफ तौर पर दिखाई दिया है। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर बढ़कर 8.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो पिछले महीने मार्च में 3.88 प्रतिशत थी। यह तेज बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि उत्पादन और आपूर्ति से जुड़ी लागतों में अचानक इजाफा हुआ है, जिसका सीधा असर बाजार की कीमतों पर पड़ा है।

    इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल और ऊर्जा से जुड़े उत्पादों की कीमतों में आई तेज उछाल को माना जा रहा है। खनिज तेल, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य ऊर्जा स्रोतों की लागत में बढ़ोतरी ने पूरी आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है। इसके साथ ही धातु और अन्य औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में भी तेजी देखी गई है, जिससे थोक स्तर पर महंगाई और बढ़ गई है।

    आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी में महंगाई दर लगभग 9.17 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि ईंधन और ऊर्जा से जुड़े सेक्टर में यह बढ़कर 24 प्रतिशत से अधिक हो गई है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाती है कि ऊर्जा क्षेत्र में लागत का दबाव सबसे ज्यादा रहा है। हालांकि, राहत की बात यह है कि खाद्य उत्पादों की महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रण में रही है, जो इस महीने लगभग 2.31 प्रतिशत के स्तर पर दर्ज की गई है।

    कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी वृद्धि ने थोक महंगाई को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। ऊर्जा आधारित उद्योगों में लागत बढ़ने से परिवहन, उत्पादन और वितरण सभी पर असर पड़ा है, जिसका असर अंततः उपभोक्ता बाजार तक पहुंचता है। इसी कारण आने वाले महीनों में खुदरा कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार खुदरा महंगाई दर में भी हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह अप्रैल में 3.48 प्रतिशत पर पहुंच गई है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भी कीमतों का दबाव अलग-अलग स्तर पर देखा गया है, जहां ग्रामीण इलाकों में महंगाई थोड़ी अधिक रही है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी मामूली बढ़ोतरी देखी गई है, जिससे आम उपभोक्ता पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता आने वाले समय में भी महंगाई को प्रभावित कर सकती है। ऊर्जा की लागत में लगातार बढ़ोतरी उत्पादन लागत को ऊपर ले जाती है, जिसका असर हर सेक्टर पर पड़ता है।

    इस बीच केंद्रीय बैंक ने आने वाले वित्तीय वर्षों के लिए महंगाई के अनुमान को लेकर संतुलित दृष्टिकोण रखा है और उम्मीद जताई है कि कृषि उत्पादन और आपूर्ति स्थिति में सुधार से खाद्य महंगाई को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने पूरी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है और आने वाले समय में इसके प्रभावों पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा, क्योंकि यह सीधे आम जनता की जेब पर असर डालता है।