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  • अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन ने बनाया नया रिकॉर्ड, 23 प्रतिशत की छलांग के साथ सरकारी खजाने में आए 2.31 लाख करोड़

    अक्टूबर में जीएसटी कलेक्शन ने बनाया नया रिकॉर्ड, 23 प्रतिशत की छलांग के साथ सरकारी खजाने में आए 2.31 लाख करोड़

    नई दिल्ली ।देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह के मोर्चे पर अक्टूबर 2026 में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान सकल जीएसटी कलेक्शन सालाना आधार पर 22.9 प्रतिशत उछलकर 2.31 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। पिछले साल अक्टूबर 2025 में यह आंकड़ा 1.88 लाख करोड़ रुपये था। ताजा आंकड़े देश में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार और आयात से मिलने वाले कर राजस्व में बढ़ोतरी को दर्शाते हैं।

    रिफंड की राशि घटाने के बाद अक्टूबर में शुद्ध जीएसटी राजस्व 25.6 प्रतिशत बढ़कर 2.03 लाख करोड़ रुपये हो गया। एक साल पहले इसी महीने में यह 1.61 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। सकल और शुद्ध दोनों तरह के राजस्व में हुई वृद्धि से कर संग्रह में मजबूती का संकेत मिला है।

    अक्टूबर के दौरान घरेलू जीएसटी संग्रह में 15.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 1.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके मुकाबले आयात से प्राप्त जीएसटी राजस्व में कहीं अधिक तेजी देखने को मिली। आयात पर मिलने वाला कर 42.2 प्रतिशत बढ़कर 72,246 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल अक्टूबर में इस मद से 50,796 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था।

    घरेलू जीएसटी संग्रह में केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) का योगदान 42,935 करोड़ रुपये रहा। राज्य वस्तु एवं सेवा कर (एसजीएसटी) के रूप में 51,340 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जबकि एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) का घरेलू संग्रह 64,769 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। आयात से प्राप्त आईजीएसटी में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई, जिसने कुल कर संग्रह को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले सात महीनों यानी अप्रैल से अक्टूबर के दौरान भी जीएसटी संग्रह में सकारात्मक रुझान बना रहा। इस अवधि में सकल जीएसटी कलेक्शन 13.2 प्रतिशत बढ़कर 14.77 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 13.05 लाख करोड़ रुपये था। वहीं, शुद्ध जीएसटी राजस्व 12.6 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12.69 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि एक साल पहले यह 11.27 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था।

    अक्टूबर में जीएसटी रिफंड की राशि में भी बढ़ोतरी हुई। कुल रिफंड 6.5 प्रतिशत बढ़कर 27,934 करोड़ रुपये रहा, जबकि अक्टूबर 2025 में यह 26,225 करोड़ रुपये था। घरेलू कारोबार से संबंधित रिफंड 9.8 प्रतिशत बढ़कर 14,007 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, आईसीईजीएटीई के माध्यम से संसाधित निर्यात रिफंड 3.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 13,927 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

    रिफंड को समायोजित करने के बाद घरेलू शुद्ध जीएसटी संग्रह 16.4 प्रतिशत बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। दूसरी ओर, कस्टम्स से जुड़े शुद्ध जीएसटी राजस्व में 56.2 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई और यह 58,319 करोड़ रुपये रहा। इससे आयात पर मिलने वाले कर राजस्व की मजबूत स्थिति सामने आई।

    अप्रैल से अक्टूबर 2026 के बीच कुल जीएसटी रिफंड 16.9 प्रतिशत बढ़कर 2.08 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसमें घरेलू रिफंड 19.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.18 लाख करोड़ रुपये और आयात से जुड़े रिफंड 13.4 प्रतिशत बढ़कर 89,733 करोड़ रुपये रहे। इस तरह चालू वित्त वर्ष के शुरुआती सात महीनों में जीएसटी संग्रह और रिफंड दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

  • राहुल गांधी की रैली पर व्यापारियों की चिंता बरकरार, दिल्ली में 10 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान

    राहुल गांधी की रैली पर व्यापारियों की चिंता बरकरार, दिल्ली में 10 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान

    नई दिल्ली । दिल्ली में 1 नवंबर को प्रस्तावित इंडिया गठबंधन की रैली को लेकर व्यापारिक संगठनों की चिंता बढ़ गई है। व्यापारियों ने एक बार फिर कार्यक्रम की तारीख बदलने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि दिवाली के आसपास चल रहे खरीदारी के महत्वपूर्ण सीजन में रैली आयोजित होने से राजधानी के प्रमुख बाजारों में कारोबार प्रभावित हो सकता है। व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (सीटीआई) ने आशंका जताई है कि स्थिति गंभीर होने पर व्यापारियों को करीब 10,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    यह मांग ऐसे समय आई है, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया है कि रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली आयोजित करने का उनका इरादा बरकरार है। सीटीआई ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भी पत्र की प्रति भेजकर अनुरोध किया है कि वह इस मुद्दे पर इंडिया गठबंधन के दूसरे सहयोगी दलों के साथ चर्चा करें। संगठन का कहना है कि रैली के आयोजन और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर बाजारों में कारोबार करने वाले व्यापारी असमंजस में हैं।

    राहुल गांधी ने सोमवार को व्यापारियों को संबोधित करते हुए कहा था कि उनकी चिंताओं को सुना जा रहा है और उनकी परवाह की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकार ने मेट्रो बंद कर दी, सड़कों को सील कर दिया और राजधानी में लॉकडाउन जैसी स्थिति बना दी। उन्होंने यह भी कहा था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने पर विरोध प्रदर्शन 30 सेकंड में समाप्त हो सकता है। हालांकि, सीटीआई का कहना है कि इस बयान से व्यापारियों की व्यावहारिक चिंताएं दूर नहीं हुई हैं।

    सीटीआई के चेयरमैन बृजेश गोयल के मुताबिक, रामलीला मैदान के आसपास स्थित 20 प्रमुख बाजारों के व्यापारी रैली की घोषणा के बाद से चिंतित हैं। कारोबारियों के सवाल हैं कि क्या 31 अक्टूबर से ही बैरिकेडिंग शुरू हो जाएगी, क्या प्रमुख सड़कों पर यातायात प्रतिबंध लगाए जाएंगे और क्या ग्राहकों को बाजारों तक पहुंचने में परेशानी होगी। इन व्यवस्थाओं का असर खरीदारी और माल की आवाजाही पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    व्यापारियों ने रैली में शामिल होने वाले लोगों और वाहनों की संभावित संख्या पर भी सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यदि आयोजकों के अनुमान के मुताबिक रैली में 10 लाख लोग और 15,000 से 20,000 वाहन पहुंचते हैं, तो पार्किंग की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती होगी। सीटीआई का दावा है कि रामलीला मैदान के आसपास 200 वाहनों के लिए भी अधिकृत पार्किंग उपलब्ध नहीं है। संगठन के मुताबिक, इस आयोजन से करीब 21 प्रमुख बाजार सीधे प्रभावित हो सकते हैं।

    सीटीआई ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन का भी उल्लेख किया है। संगठन के अनुसार, उस कार्यक्रम में 3,000 से 4,000 लोग शामिल हुए थे, लेकिन इसके कारण मध्य दिल्ली के बड़े हिस्से में यातायात प्रतिबंध लगाए गए और व्यापारियों को लगभग 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। संगठन का अनुमान है कि 1 नवंबर को प्रस्तावित बड़ी रैली से पुरानी दिल्ली और मध्य दिल्ली में व्यापारिक गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।

    व्यापारियों ने सुझाव दिया है कि रैली को भाई दूज के बाद, यानी 10 नवंबर के बाद आयोजित किया जाए। यदि तारीख बदलना संभव नहीं है, तो कार्यक्रम को रामलीला मैदान के बजाय बुराड़ी ग्राउंड या जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में कराने पर विचार किया जाए। उनका तर्क है कि इससे आसपास के व्यावसायिक क्षेत्रों पर पड़ने वाला असर कम किया जा सकता है।

    कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव और भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने भी राहुल गांधी के बयान को व्यापारियों की चिंताओं का समाधान नहीं माना। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मेट्रो बंद करने और सड़कें सील करने की जरूरत पड़ी, तो प्रशासन ने ऐसा क्यों किया। उन्होंने कहा कि व्यापारियों की मुख्य चिंता त्योहारी सीजन में कारोबार को बड़े राजनीतिक आयोजनों के कारण होने वाले व्यवधान से बचाना है।

  • कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई वैश्विक बाजारों की चिंता, इंडियन बास्केट 120 डॉलर के करीब पहुंचने से बढ़ा दबाव

    कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई वैश्विक बाजारों की चिंता, इंडियन बास्केट 120 डॉलर के करीब पहुंचने से बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली ।
    वश्विक बाजारों में सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर अंतरराष्ट्रीय संकेतों के कारण निवेशकों की चिंता बनी रही। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि भारत के लिए महत्वपूर्ण इंडियन क्रूड बास्केट का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। महंगे तेल का असर भारत के आयात खर्च, महंगाई और तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर पड़ने की आशंका है।

    ब्रेंट क्रूड का भाव पिछले कारोबारी सत्र में बढ़कर 117.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। बाद में यह 116.72 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। सोमवार सुबह इसमें पिछले बंद स्तर के मुकाबले करीब 1.55 प्रतिशत की गिरावट आई और कीमत 114.91 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही। इसके बावजूद कच्चे तेल का भाव ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल और मई के दौरान भी तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंची थीं।

    अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड का भाव अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने की स्थिति में रहा है। सऊदी अरब में हूती हमलों के बाद तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने भी कीमतों को समर्थन दिया। सोमवार को भाव में नरमी आने के बावजूद आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं और वैश्विक परिस्थितियों के कारण बाजार पर दबाव बना हुआ है।

    भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की वास्तविक लागत भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 22 अक्टूबर को इंडियन क्रूड बास्केट का भाव 119.99 डॉलर प्रति बैरल दर्ज किया गया। अक्टूबर का औसत भाव भी लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल बताया गया है। इस स्तर पर कच्चे तेल की खरीद भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती है और रुपये तथा महंगाई पर दबाव डाल सकती है।

    महंगे तेल का असर तेल विपणन कंपनियों की कमाई पर भी पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनियों को प्रतिदिन 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो रहा है। पेट्रोल पर करीब 8 रुपये और डीजल पर 9 रुपये प्रति लीटर का नुकसान बताया गया है। इसके अलावा, प्रत्येक एलपीजी सिलिंडर पर लगभग 300 रुपये की अंडर रिकवरी होने की जानकारी सामने आई है।

    त्योहारी मौसम में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की आशंका कम बताई जा रही है। हालांकि, यदि त्योहारों के बाद भी कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाने पर विचार कर सकती हैं। फिलहाल, खुदरा कीमतों में बदलाव को लेकर कोई निश्चित फैसला सामने नहीं आया है।

    अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। शुक्रवार को अमेरिकी बाजार में डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 652.82 अंक यानी करीब 1.23 प्रतिशत गिरकर 52,215.16 पर बंद हुआ। एसएंडपी 500 में 0.52 प्रतिशत और नैस्डैक कंपोजिट में 0.21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, सोमवार सुबह अमेरिकी वायदा बाजार में कुछ सुधार दिखाई दिया। डाउ जोन्स फ्यूचर्स 0.24 प्रतिशत बढ़कर 52,341.69 पर कारोबार कर रहा था।

    एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा। जापान के निक्केई 225 में करीब 0.26 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया के कोस्पी में 0.92 प्रतिशत, चीन के शंघाई कंपोजिट में 0.36 प्रतिशत और सिंगापुर के स्ट्रेट्स टाइम्स में 0.43 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, हांगकांग का हैंग सेंग 0.31 प्रतिशत ऊपर रहा।

    भारतीय बाजार के लिए शुरुआती संकेत लगभग सपाट रहे। सुबह 7:36 बजे गिफ्ट निफ्टी 22,599.50 पर था, जो पिछले बंद स्तर से 8.50 अंक यानी 0.04 प्रतिशत नीचे था। इस सप्ताह 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक भी निवेशकों के लिए अहम है। ऊंची ऊर्जा कीमतों के बीच ब्याज दरों और महंगाई पर फेड के रुख से वैश्विक बाजारों की आगे की दिशा प्रभावित हो सकती है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, आईएमएफ ने 2026 और 2027 के लिए विकास दर अनुमान 7% किया

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, आईएमएफ ने 2026 और 2027 के लिए विकास दर अनुमान 7% किया

    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की आशंकाओं, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव और व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने के बावजूद भारत प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे बना हुआ है। घरेलू मांग, सार्वजनिक निवेश, डिजिटल बदलाव और नीतिगत प्रबंधन को इस मजबूती के प्रमुख आधारों में गिना गया है।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख वैश्विक संस्थानों की ओर से भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के अनुमानों में संशोधन किया जाना देश की आर्थिक संभावनाओं को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2026 और 2027, दोनों वर्षों के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया है। इस अनुमान के आधार पर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति बनाए रख सकता है।

    भारत की आर्थिक मजबूती का एक बड़ा कारण उसका विशाल और विविध घरेलू बाजार है। घरेलू उपभोग, निजी निवेश और बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च मिलकर आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं। वैश्विक बाजारों में मांग कमजोर होने या अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अस्थिरता बढ़ने पर घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को सहारा प्रदान करती है। इससे बाहरी झटकों का प्रभाव सीमित करने में मदद मिलती है।

    निजी उपभोग का प्रभाव कई प्रमुख क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। ऑटोमोबाइल, आवास, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों को घरेलू मांग से समर्थन मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती आय, शहरीकरण, डिजिटल सेवाओं तक पहुंच और बेहतर कनेक्टिविटी लोगों की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। इन बदलावों से निवेश और नवाचार के लिए भी नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

    डिजिटल परिवर्तन भी भारत की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और प्रौद्योगिकी आधारित सरकारी सेवाओं ने लेन-देन को आसान बनाया है तथा लागत कम करने में मदद की है। डिजिटल माध्यमों के विस्तार से छोटे व्यवसायों को भी अपने स्थानीय बाजार से आगे बढ़कर व्यापक ग्राहक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिला है। इससे व्यापारिक गतिविधियों में तकनीक की भूमिका मजबूत हुई है।

    बुनियादी ढांचे में निवेश को भी आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। परिवहन, लॉजिस्टिक्स, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ी परियोजनाओं से वस्तुओं तथा सेवाओं की आवाजाही बेहतर हो रही है। बेहतर संपर्क व्यवस्था से बाजारों तक पहुंच का विस्तार होता है और कारोबार की लागत घटाने में मदद मिलती है। इसके साथ ही निर्यात में विविधता लाने, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।

    रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का निर्यात एक ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। वर्ष 2030 तक निर्यात को दो ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। विनिर्माण क्षेत्र ने भी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। ये आंकड़े उत्पादन और बाहरी व्यापार के क्षेत्र में विस्तार की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।

    कुल मिलाकर, भारत की आर्थिक स्थिति को घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे के विकास, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और नीतिगत प्रबंधन से समर्थन मिल रहा है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक सुस्ती, ऊर्जा बाजारों की अस्थिरता और व्यापारिक तनाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे माहौल में भारत की घरेलू आर्थिक बुनियाद और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता आने वाले वर्षों में उसकी विकास गति बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती है।

  • भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    नई दिल्ली । भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में अक्टूबर 2026 के दौरान तेजी दर्ज की गई है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नए ऑर्डरों की बढ़ोतरी, घरेलू मांग में मजबूती और विदेशी बाजारों से मिले बेहतर कारोबार के कारण गतिविधियां चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं। अक्टूबर के शुरुआती सर्वेक्षण आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों में सुधार का लाभ मिला। इसके साथ ही उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर पड़ने वाले दबाव में भी नरमी दर्ज की गई, जबकि रोजगार वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी रही।

    अक्टूबर में एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स बढ़कर 56.7 पर पहुंच गया, जबकि सितंबर में यह 55.9 था। यह सूचकांक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की संयुक्त कारोबारी गतिविधियों का आकलन करता है। पीएमआई में 50 से ऊपर का स्तर गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है, जबकि इससे नीचे का स्तर संकुचन को दर्शाता है। अक्टूबर का आंकड़ा जून के बाद कारोबारी गतिविधियों में सबसे तेज वृद्धि का संकेत देता है।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने नए ऑर्डरों में बढ़ोतरी और कारोबारी परिस्थितियों में सुधार की जानकारी दी। घरेलू बाजार से मिलने वाली मांग के साथ विदेशी ग्राहकों की ओर से भी ऑर्डर बढ़े। विशेष रूप से निर्यात ऑर्डरों में पिछले छह महीनों की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। इससे भारतीय कंपनियों को उत्पादन और सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों में तेजी बनाए रखने में मदद मिली।

    विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और नए ऑर्डरों की वृद्धि सितंबर के आसपास बनी रही, लेकिन निर्यात मांग में तेजी अक्टूबर की प्रमुख विशेषता रही। भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, जून 2025 के बाद पहली बार निर्यात ऑर्डरों में इतनी मजबूत बढ़ोतरी देखी गई है। विदेशी बाजारों से मिले बेहतर संकेतों के बीच निर्माताओं ने कच्चे माल और तैयार उत्पादों का भंडार भी बढ़ाया। कंपनियों की यह गतिविधि बढ़ती मांग को पूरा करने की तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी आंकड़ों में राहत के संकेत मिले हैं। उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर दबाव लगातार कम होने की जानकारी सामने आई। लागत संबंधी दबाव में नरमी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उत्पादन और बिक्री से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि आने वाले महीनों में महंगाई किस स्तर पर रहेगी। फिलहाल सर्वेक्षण अक्टूबर के दौरान लागत और कीमतों से जुड़े दबावों में कमी का संकेत देता है।

    रोजगार के मामले में स्थिति अपेक्षाकृत मिश्रित रही। निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या बढ़ने की गति धीमी हुई। सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने लगातार नौ महीनों तक भर्ती बढ़ाने के बाद अक्टूबर में नई नियुक्तियों को लगभग रोक दिया। कंपनियों का मानना था कि मौजूदा कर्मचारियों की संख्या से कामकाज की जरूरतें पूरी हो रही हैं। वहीं, विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ा, लेकिन इसकी रफ्तार सीमित रही। इससे स्पष्ट होता है कि कारोबारी गतिविधियों में तेजी के बावजूद भर्ती में समान स्तर का विस्तार नहीं हुआ।

    सर्वेक्षण में लंबित कार्यभार में भी गिरावट दर्ज की गई। कंपनियों के पास पहले से जमा काम का स्तर लगातार तीसरी बार घटा और यह संयुक्त रूप से पिछले साढ़े छह वर्षों की सबसे तेज गिरावट रही। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लंबित काम को अपेक्षाकृत तेजी से पूरा कर पा रही हैं। अक्टूबर में विनिर्माण पीएमआई 54.9 दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र में लगातार विस्तार को दर्शाता है।

    कुल मिलाकर, अक्टूबर के शुरुआती पीएमआई आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के निजी क्षेत्र में मजबूत कारोबारी गति का संकेत देते हैं। घरेलू मांग, निर्यात ऑर्डरों और विनिर्माण गतिविधियों से विस्तार को सहारा मिला है। हालांकि, रोजगार वृद्धि की धीमी रफ्तार यह बताती है कि कारोबार में तेजी का लाभ सभी क्षेत्रों में नई नियुक्तियों के रूप में समान रूप से दिखाई नहीं दिया है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर जोर

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर जोर

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं और वित्तीय जोखिमों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में बनी हुई है। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने मंगलवार को कहा कि भारत का अनुभव बताता है कि मजबूत व्यापक आर्थिक आधार किसी देश को चुनौतीपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी स्थिरता और निरंतर विकास बनाए रखने में मदद कर सकता है। उन्होंने यह बात भारतीय रिजर्व बैंक के अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘संवाद 2026’ के दूसरे दिन वित्तीय स्थिरता पर आयोजित विशेष सत्र को संबोधित करते हुए कही।

    अनुराधा ठाकुर के अनुसार, भारत की राजकोषीय स्थिति विश्वसनीय रही है। इसके साथ ही, मुद्रास्फीति को निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखने की लचीली व्यवस्था ने महंगाई को लेकर लोगों और बाजारों की अपेक्षाओं को स्थिर बनाए रखने में भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत मौजूदा चुनौतीपूर्ण वैश्विक हालात का सामना व्यापक आर्थिक स्थिरता की मजबूत स्थिति के साथ कर रहा है। उनके संबोधन में आर्थिक आधार को मजबूत बनाए रखने और बदलते वैश्विक वातावरण में स्थिरता कायम रखने के महत्व पर जोर दिया गया।

    संगोष्ठी में आयोजित पैनल चर्चा के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने वित्तीय स्थिरता को एक स्वतंत्र नीतिगत उद्देश्य के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी नीतियों का दायरा अब केवल अलग-अलग संस्थानों की स्थिति तक सीमित नहीं रह गया है। इसके बजाय पूरी वित्तीय प्रणाली की मजबूती पर ध्यान दिया जा रहा है। इस व्यापक दृष्टिकोण में बैंकों के साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों की भूमिका और उनसे जुड़े जोखिमों को भी शामिल किया गया है।

    चर्चा में शामिल विशेषज्ञों ने आगाह किया कि वित्तीय संकट अब पहले की तुलना में अधिक तेजी से सामने आ सकते हैं और उनकी गंभीरता भी बढ़ सकती है। ऐसे में वित्तीय प्रणाली की निगरानी, जोखिमों की समय रहते पहचान और संस्थानों की संकट से निपटने की क्षमता को मजबूत करना जरूरी है। पैनल के सदस्यों ने यह भी कहा कि वित्तीय क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देते समय पिछली आर्थिक मंदियों और संकटों से मिली सीख को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वित्तीय पुनर्गठन से पैदा होने वाले संभावित दुष्प्रभावों का आकलन भी नीतिगत फैसलों का हिस्सा होना चाहिए।

    वित्तीय स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों में जलवायु परिवर्तन के जोखिम, गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थों का बढ़ता प्रभाव, फिनटेक कंपनियों की भूमिका और मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन कारकों को वित्तीय नीतियों और जोखिम आकलन में उचित महत्व देना आवश्यक है। इसके अलावा, वित्तीय आंकड़ों को साझा करने में मौजूद कमियों को दूर करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एजेंटों के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़ी चिंताओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

    पैनल ने वित्तीय सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाने पर जोर देते हुए कहा कि केवल बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। कंपनियों और परिवारों की वित्तीय स्थिति भी ऐसी होनी चाहिए कि वे अचानक पैदा होने वाले आर्थिक झटकों का सामना कर सकें। इस दृष्टिकोण के तहत पूरी वित्तीय व्यवस्था की मजबूती और विभिन्न क्षेत्रों के बीच जोखिमों के प्रभाव को समझना महत्वपूर्ण माना गया।चर्चा में भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष अजय सेठ, भूटान की रॉयल मॉनेटरी अथॉरिटी की गवर्नर यांगचेन त्शोग्येल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अथानासियोस वाम्वाकिडिस और इनवेस्को के पॉल जैक्सन भी शामिल हुए।

    दो दिवसीय ‘संवाद 2026’ का उद्घाटन सोमवार को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने किया था। इस अवसर पर केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुख्य संबोधन दिया। आयोजन में विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों के गवर्नर, वरिष्ठ नीति निर्माता, अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ वैश्विक वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद चुनौतियों तथा संभावित अवसरों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

  • रुपए को मजबूती देने और विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए सरकार और आरबीआई के कदमों को एसोचैम का समर्थन

    रुपए को मजबूती देने और विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए सरकार और आरबीआई के कदमों को एसोचैम का समर्थन


    नई दिल्ली:  
    रुपए में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेश के रुझानों के बीच सरकार तथा भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से उठाए गए कदमों को उद्योग संगठन एसोचैम ने समर्थन दिया है। संगठन का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच रुपए को सहारा देने, निवेशकों का भरोसा मजबूत करने और दीर्घकालिक विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए किए जा रहे प्रयास सही दिशा में हैं। एसोचैम के मुताबिक, भारत की आर्थिक बुनियाद को मजबूत बनाए रखते हुए स्थायी पूंजी प्रवाह बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

    एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता के मौजूदा दौर में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार और आरबीआई के समन्वित प्रयास सराहनीय हैं। उन्होंने रुपए की दीर्घकालिक मजबूती को देश की आर्थिक स्थिति और लगातार विदेशी पूंजी आकर्षित करने की क्षमता से जोड़कर देखा। संगठन ने इस बात पर जोर दिया कि केवल अस्थायी पूंजी प्रवाह के बजाय लंबे समय तक टिकने वाले निवेश को बढ़ावा देना जरूरी है।

    मिंडा ने पूर्व आरबीआई गवर्नर डी. सुब्बाराव के विचारों का भी समर्थन किया। सुब्बाराव ने कहा था कि रुपए की दीर्घकालिक मजबूती अंततः भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद और निरंतर पूंजी प्रवाह आकर्षित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। एसोचैम अध्यक्ष के अनुसार, संगठन इस विचार से सहमत है और सरकार तथा आरबीआई की ओर से पहले ही उठाए गए कदमों को महत्वपूर्ण मानता है।

    एसोचैम ने दावा किया कि हाल में किए गए उपायों से रुपया अपने हालिया निचले स्तरों से उबरने में सफल रहा है। संगठन ने 31 अगस्त को समाप्त हुई 133 अरब डॉलर की एफसीएनआर (बी) मोबिलाइजेशन विंडो का भी उल्लेख किया। इस पहल को विदेशी मुद्रा जुटाने से जुड़े प्रयासों के संदर्भ में अहम बताया गया।

    संगठन के मुख्य अर्थशास्त्री एस.पी. शर्मा ने कहा कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है। इसके प्रमुख आधारों में पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आरबीआई का 7.1 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान और महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए अपनाई गई संतुलित मौद्रिक नीति शामिल हैं। उनके मुताबिक, ये कारक देश की आर्थिक स्थिरता को समर्थन देते हैं।

    एसोचैम ने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए वित्त मंत्रालय की ओर से हाल में घोषित कदमों का भी स्वागत किया। इनमें आयकर संशोधन अध्यादेश, 2026 शामिल है। इसके तहत 1 अप्रैल 2026 से सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी एफपीआई के निवेश पर मिलने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट का प्रावधान किया गया है। संगठन ने इसे विदेशी निवेश आकर्षित करने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम बताया।

    इसके अलावा, एसोचैम ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने वित्त वर्ष 2027-28 के बजट की तैयारी के दौरान दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर यानी एलटीसीजी और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी एसटीटी को लेकर निवेशकों की राय पर विचार करने की बात कही थी।

    हालांकि, संगठन ने कर व्यवस्था में और सुधार की जरूरत भी बताई। एसोचैम के अनुसार, कर ढांचे को अधिक तर्कसंगत बनाने, नियमों की व्याख्या सरल करने और दीर्घकालिक इक्विटी निवेश को प्रोत्साहित करने वाले उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। संगठन ने अल्पकालिक पूंजी प्रवाह की तुलना में लंबे समय तक बने रहने वाले निवेश को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

    एसोचैम ने कहा कि भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से वह सरकार, आरबीआई और बाजार नियामक सेबी के साथ मिलकर काम जारी रखेगा। संगठन का मानना है कि स्थिर आर्थिक नीतियां, स्पष्ट कर व्यवस्था और भरोसेमंद निवेश माहौल दीर्घकालिक विदेशी पूंजी आकर्षित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • भारत की आर्थिक प्रगति जश्न के काबिल, अगले वर्षों में भी सात प्रतिशत से अधिक विकास की उम्मीद

    भारत की आर्थिक प्रगति जश्न के काबिल, अगले वर्षों में भी सात प्रतिशत से अधिक विकास की उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत की आर्थिक प्रगति को पिछले एक दशक की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए शीर्ष अर्थशास्त्री क्युंघून किम ने कहा है कि देश की लगातार मजबूत आर्थिक वृद्धि और बेहतर होती आर्थिक स्थिति भविष्य के लिए आशावाद का आधार प्रदान करती है। उनके अनुसार, भारत के सामने अभी कई चुनौतियां हैं, लेकिन इसके बावजूद देश ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने कहा कि मध्यम अवधि में भी भारत के मजबूत विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं और यह उपलब्धि सराहना के साथ जश्न मनाने योग्य है।

    क्युंघून किम ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने विचारों में कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति को उसके आकार और आबादी के संदर्भ में समझना जरूरी है। करीब 1.4 अरब लोगों वाले देश के लिए लगातार मजबूत विकास दर हासिल करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक रूप से आगे बढ़ने की क्षमता और आने वाले वर्षों में विकास की संभावनाएं सकारात्मक बनी हुई हैं।

    उनकी यह टिप्पणी भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर वैश्विक संस्थानों के बदले आकलन के बीच आई है। एक दिन पहले उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक जैसे प्रमुख वैश्विक संस्थानों ने चालू वर्ष और अगले वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमानों को बढ़ाकर सात प्रतिशत से अधिक कर दिया है। उनके अनुसार, विभिन्न संस्थानों के अनुमानों में हुआ यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और विकास की संभावनाओं को दर्शाता है।

    किम ने कोविड-19 महामारी के बाद भारत की आर्थिक स्थिति में आए सुधार का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, महामारी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में 5.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि, इसके बाद अर्थव्यवस्था ने तेजी से वापसी की और वर्ष 2021 में 9.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। इसके बाद अगले चार वर्षों तक विकास दर सात प्रतिशत से ऊपर बनी रही। इस प्रदर्शन को उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।

    अर्थशास्त्री ने कहा कि लगातार बेहतर होते आर्थिक आंकड़ों के कारण उन्हें और कई अन्य अर्थशास्त्रियों को अपनी विकास दर संबंधी भविष्यवाणियों में बार-बार संशोधन करना पड़ा। हर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े उम्मीदों से बेहतर रहे। इसके परिणामस्वरूप भारत ने लगातार पांच वर्षों तक सात प्रतिशत से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर्ज की। उनके मुताबिक, यह प्रदर्शन वर्ष 2003 से 2007 के उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ था।

    किम ने वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर 7.83 प्रतिशत रहने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1960 के बाद किसी भी पांच वर्षीय अवधि में यह दूसरी सबसे ऊंची औसत वृद्धि दर है। इससे अधिक औसत वृद्धि केवल वर्ष 2003 से 2007 के दौरान दर्ज की गई थी, जब यह आंकड़ा 7.89 प्रतिशत रहा था। इस तुलना के जरिए उन्होंने भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि के महत्व को रेखांकित किया।

    भारत की अर्थव्यवस्था के आकार में आए बदलाव को भी किम ने अहम बताया। उनके अनुसार, वर्ष 2007 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार एक ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा अधिक था, जबकि अब यह चार ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच रही है। इसका अर्थ है कि आज समान विकास दर से होने वाला आर्थिक विस्तार दो दशक पहले की तुलना में कहीं बड़े पैमाने पर मूल्य सृजन करता है। किम ने कहा कि भारत की पिछले दशक की प्रगति और मध्यम अवधि में मजबूत विकास की संभावनाएं महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि देश के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • त्योहारों से पहले चीनी की बिक्री बढ़ाने की छूट, भारत की जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान

    त्योहारों से पहले चीनी की बिक्री बढ़ाने की छूट, भारत की जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन में बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने चीनी मिलों को अतिरिक्त बिक्री की अनुमति दी है। इस फैसले के तहत मिलें अक्टूबर 2026 में उत्पादित चीनी को अक्टूबर और नवंबर, दोनों महीनों में बेच सकेंगी। यह बिक्री उनके नियमित मासिक कोटे के अतिरिक्त होगी। सरकार के इस कदम का उद्देश्य त्योहारों के दौरान बाजार में आपूर्ति को सुचारू बनाए रखना और मांग के अनुरूप चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

    खाद्य मंत्रालय ने चीनी मिलों को जारी निर्देश में अक्टूबर में उत्पादित चीनी की दोनों महीनों में बिक्री की अनुमति दी है। सामान्य मासिक आवंटन के अलावा अतिरिक्त मात्रा बेचने की छूट से बाजार में आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। त्योहारों के दौरान चीनी की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। हालांकि, इस अतिरिक्त बिक्री की अनुमति से बाजार में कीमतों पर कितना असर पड़ेगा, इसकी जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।

    इस बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को लेकर भी सकारात्मक अनुमान सामने आया है। डेलॉयट इंडिया के आकलन के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.1 से 7.3 प्रतिशत के बीच रह सकती है। इस अनुमान के पीछे निजी निवेश में सुधार को एक प्रमुख कारण बताया गया है। निजी क्षेत्र की ओर से निवेश बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों और बाजार की मांग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है।

    आकलन के मुताबिक, अगले वित्त वर्ष 2027-28 में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मजबूत रह सकती है, हालांकि इसके कुछ धीमी रहने का अनुमान है। इस अवधि में जीडीपी वृद्धि दर 6.6 से 7 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना जताई गई है। यह अनुमान दर्शाता है कि आने वाले वित्त वर्षों में भी आर्थिक विस्तार जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन विकास की वास्तविक गति कई घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

    आर्थिक विकास के सामने कुछ जोखिम भी बताए गए हैं। इनमें भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आने वाली बाधाएं शामिल हैं। ऊर्जा की कीमतों में तेजी से उत्पादन और परिवहन की लागत प्रभावित हो सकती है। वहीं, वैश्विक व्यापार में रुकावटों का असर वस्तुओं की आपूर्ति और कारोबारी गतिविधियों पर पड़ सकता है। इन परिस्थितियों के कारण आर्थिक विकास के अनुमान में बदलाव की संभावना बनी रहती है।

    इसी बीच, केंद्र सरकार ने वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो यानी एफएसआईबी का नए सिरे से गठन किया है। पूर्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के सचिव एससीएल दास को ब्यूरो का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनका कार्यकाल अधिसूचना जारी होने की तारीख से तीन साल का होगा। एफएसआईबी सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में शीर्ष पदों पर नियुक्तियों के लिए सिफारिशें करता है। इस संस्था की भूमिका वित्तीय क्षेत्र में वरिष्ठ पदों पर चयन प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

    नए अध्यक्ष के साथ ब्यूरो में छह सदस्य भी शामिल किए गए हैं। इनमें भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक अरिजीत बसु, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व निदेशक सतीश काशीनाथ मराठे और पूर्व कार्यकारी निदेशक रमनाथन सुब्रमणियन शामिल हैं। इनके अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम के पूर्व प्रमुख सिद्धार्थ मोहंती, न्यू इंडिया एश्योरेंस की पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक नीरजा कपूर और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण की पूर्व सदस्य टीएल अलामेलु को भी सदस्य बनाया गया है।

    इस प्रकार, त्योहारी मांग को ध्यान में रखते हुए चीनी की अतिरिक्त बिक्री की अनुमति, आर्थिक विकास के अनुमान और वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो के नए गठन से जुड़े फैसले एक साथ सामने आए हैं। चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उठाया गया कदम निकट अवधि की बाजार मांग से जुड़ा है, जबकि जीडीपी वृद्धि के अनुमान और एफएसआईबी में नियुक्तियां अर्थव्यवस्था तथा वित्तीय संस्थानों से संबंधित व्यापक घटनाक्रम हैं।

  • वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध, व्यापारिक तनाव और बढ़ते कर्ज का खतरा, आईएमएफ ने आर्थिक स्थिरता को लेकर दी चेतावनी

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध, व्यापारिक तनाव और बढ़ते कर्ज का खतरा, आईएमएफ ने आर्थिक स्थिरता को लेकर दी चेतावनी

    नई दिल्ली । वैश्विक अर्थव्यवस्था ने हाल के आर्थिक झटकों का अनुमान से बेहतर सामना किया है, लेकिन आगे भी यही स्थिति बनी रहेगी, इसकी गारंटी नहीं है। युद्ध, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावट, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और भारी सार्वजनिक कर्ज वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की नीति-निर्धारक समिति ने इन चुनौतियों को लेकर चेतावनी देते हुए कहा है कि सरकारों को आने वाले समय में कई मोर्चों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

    बैंकॉक में आयोजित अपनी 54वीं बैठक के बाद शनिवार को जारी बयान में इंटरनेशनल मॉनेटरी एंड फाइनेंशियल कमिटी (आईएमएफसी) ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का मौजूदा प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है, लेकिन इसे स्थायी स्थिति मानना उचित नहीं होगा। समिति के मुताबिक, विभिन्न देशों की सरकारें एक साथ भू-राजनीतिक और वित्तीय चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है।

    समिति की अध्यक्षता सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान ने की। बयान में कहा गया कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों के कारण भारी मानवीय और आर्थिक नुकसान हो रहा है। इन परिस्थितियों का सबसे अधिक असर गरीब और कमजोर देशों पर पड़ रहा है। युद्धों के कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान पैदा हो सकता है, जिससे वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित होने के साथ उनकी कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

    भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई गई है। इसका असर ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति पर पड़ सकता है। समिति ने चेताया कि यदि ये बाधाएं बढ़ती हैं, तो पहले से मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे देशों में ऊर्जा और खाद्य असुरक्षा की समस्या गंभीर हो सकती है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार नीतियों और लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों के आर्थिक प्रभावों को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है।

    वित्तीय क्षेत्र में समिति ने सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले रिटर्न यानी सॉवरेन बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, सार्वजनिक कर्ज के भारी स्तर और पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की जरूरत को प्रमुख जोखिम बताया। इन परिस्थितियों में उन देशों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जिन्हें अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए लगातार उधार लेना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों तक सीमित पहुंच रखने वाली अर्थव्यवस्थाओं पर इसका दबाव अधिक पड़ सकता है।

    समिति ने उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों के बढ़ते आर्थिक प्रभावों पर भी चर्चा की। उसके अनुसार, तेजी से हो रही तकनीकी प्रगति निवेश और व्यापार को बढ़ावा देने के साथ उत्पादकता में सुधार कर सकती है। हालांकि, इन तकनीकों के आर्थिक और वित्तीय नतीजों को लेकर बनी अनिश्चितता मौजूदा कमजोरियों को बढ़ा सकती है। इसलिए तकनीकी बदलावों से मिलने वाले अवसरों के साथ उनसे जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए आईएमएफसी ने मजबूत व्यापक आर्थिक नीतियों, विश्वसनीय राजकोषीय ढांचे और सरकारों के बीच निरंतर सहयोग पर जोर दिया। समिति ने देशों से अपनी वित्तीय कमजोरियों को दूर करने, कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी निवेश जारी रखने का आग्रह किया। उसने यह भी कहा कि महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित रखने और आर्थिक नीतियों पर भरोसा बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।

    बयान में बैंकॉक ब्लूप्रिंट का स्वागत किया गया, जिसका उद्देश्य डिजिटल वित्तीय सेवाओं को अधिक सुरक्षित बनाना, साइबर सुरक्षा मजबूत करना और डिजिटल धोखाधड़ी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है। समिति ने वैश्विक आर्थिक असंतुलन, व्यापारिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को प्रभावित करने वाली विसंगतियों को दूर करने के लिए भी आपसी सहयोग की आवश्यकता बताई।

    इसके अलावा, सुरक्षित और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए आवागमन की स्वतंत्रता बनाए रखने पर जोर दिया गया। समिति ने संप्रभु ऋण पुनर्गठन की प्रक्रिया में सुधार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। विशेष रूप से कम आय वाले और कमजोर मध्यम आय वाले देशों के लिए कर्ज पुनर्गठन को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई। इसके तहत कर्ज लेने वालों और कर्ज देने वालों से अधिक पारदर्शिता बरतने तथा ऋण पुनर्गठन की व्यवस्थाओं को अधिक स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य बनाने का आह्वान किया गया।