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  • प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई मजबूती को देखते हुए प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल की खुदरा कीमतों में कटौती करने का निर्णय लिया है। कंपनियों द्वारा की गई इस कटौती के तहत पेट्रोल के दामों में औसतन 56 पैसे प्रति लीटर की कमी दर्ज की गई है। नई दरें मध्यरात्रि से देश भर में प्रभावी हो जाएंगी, जिससे वाहन चालकों और आम जनता को कुछ हद तक आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।

    कीमतों में संशोधन के बाद देश की राजधानी दिल्ली में इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की नई दरें 67.90 रुपये प्रति लीटर तय की गई हैं, जो इससे पहले 68.46 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर दर्ज की जा रही थीं। देश की अन्य प्रमुख तेल विपणन कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन द्वारा भी इसी तर्ज पर अपने खुदरा मूल्यों में संशोधन किया जाता है। स्थानीय करों और भिन्न व्यवस्थाओं के कारण अलग-अलग कंपनियों के आउटलेट पर कीमतों में एक से दो पैसे का मामूली अंतर देखा जा सकता है।

    तेल कंपनियों द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विभिन्न राज्यों में स्थानीय करों और वैट की दरों के आधार पर अलग-अलग शहरों में कटौती की राशि भिन्न रखी गई है। वित्तीय राजधानी मुंबई में पेट्रोल के दामों में 71 पैसे प्रति लीटर की कमी की गई है, जिसके बाद वहां नया मूल्य 74.43 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा। इसी प्रकार कोलकाता में 70 पैसे प्रति लीटर की कटौती के साथ नई दर 75.44 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में 71 पैसे की कमी के साथ नया दाम 71.48 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है।

    उल्लेखनीय है कि प्रशासनिक सुधारों के तहत पेट्रोल के मूल्य निर्धारण को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था, जिससे तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत और विनिमय दर के अनुरूप कीमतें तय करने का अधिकार मिला है। इससे पहले जून माह के अंत में पेट्रोल की दरों में 70 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी।

    तेल विपणन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में सुधार दर्ज किया गया है, जिसके कारण आयात लागत पर आंशिक राहत मिली है। हालांकि, वैश्विक बाजार में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। कंपनियों का कहना है कि पूर्ण स्वतंत्रता मिलने के बावजूद बाजार की अनिश्चितताओं के कारण लागत के अनुपात में दरें नहीं बढ़ाई जा सकी थीं, जिससे चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनियों को संभावित राजस्व में काफी घाटे का सामना करना पड़ा है।

  • बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत

    बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत


    नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती और उपभोग में बढ़ोतरी का असर अब सरकार के राजस्व पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जुलाई 2026 में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संग्रह 15.4 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी के साथ 2.11 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया। यह पिछले 14 महीनों की सबसे तेज वृद्धि है और चालू वित्त वर्ष 2026-27 में दूसरी बार ऐसा हुआ है जब मासिक जीएसटी कलेक्शन दो लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार करने में सफल रहा है। यह आंकड़ा देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों मजबूत खपत और बेहतर टैक्स अनुपालन का संकेत माना जा रहा है।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई के दौरान घरेलू जीएसटी राजस्व 10.1 प्रतिशत बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपए हो गया जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.31 लाख करोड़ रुपए था। वहीं आयात पर मिलने वाले जीएसटी राजस्व में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई और इसमें 28.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आयात से प्राप्त जीएसटी संग्रह बढ़कर 66 हजार 511 करोड़ रुपए पहुंच गया। घरेलू और आयात दोनों स्रोतों से मजबूत राजस्व मिलने के कारण कुल सकल जीएसटी संग्रह 2.11 लाख करोड़ रुपए के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया।

    सरकार ने बताया कि जुलाई के दौरान जीएसटी रिफंड में भी वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में रिफंड 13.1 प्रतिशत बढ़कर 29 हजार 968 करोड़ रुपए रहा। रिफंड समायोजित करने के बाद सरकार का शुद्ध जीएसटी राजस्व 1.81 लाख करोड़ रुपए रहा जो पिछले वर्ष की तुलना में 15.8 प्रतिशत अधिक है। घरेलू शुद्ध राजस्व 10.5 प्रतिशत बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि सीमा शुल्क से प्राप्त शुद्ध जीएसटी राजस्व में 30.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई और यह 54 हजार 223 करोड़ रुपए हो गया।

    चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों अप्रैल से जुलाई के दौरान भी सरकार का कर संग्रह लगातार मजबूत बना हुआ है। इस अवधि में कुल सकल जीएसटी संग्रह 10.1 प्रतिशत बढ़कर 8.43 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 7.66 लाख करोड़ रुपए था। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार लगातार बनी हुई है और कर संग्रह में भी इसका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।

    इससे पहले जून 2026 में भी जीएसटी संग्रह 13.9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.94 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया था। उस समय भी आयात से मिलने वाले राजस्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लगातार दो महीनों से मजबूत कर संग्रह यह संकेत देता है कि देश में उत्पादन व्यापार और उपभोग की गतिविधियां गति पकड़ रही हैं।

    एसबीआई रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि जीएसटी संग्रह और बेसिक एक्साइज ड्यूटी में राज्यों की हिस्सेदारी को एक साथ देखा जाए तो वित्त वर्ष 2026-27 में राज्यों को पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.43 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि आने वाले महीनों में जीएसटी संग्रह और मजबूत हो सकता है तथा पूरे वित्त वर्ष के दौरान इसमें 8 से 9 प्रतिशत की वृद्धि बनी रहने की संभावना है।

    रिपोर्ट के मुताबिक हाल के महीनों में जीएसटी संग्रह की रफ्तार में जो हल्की नरमी देखने को मिली थी उसका प्रमुख कारण जीएसटी दरों का युक्तिकरण था जिसकी पहले से संभावना जताई जा रही थी। अब आर्थिक गतिविधियों में तेजी और कर संग्रह में लगातार सुधार से यह उम्मीद बढ़ गई है कि वित्त वर्ष के शेष महीनों में भी सरकार का राजस्व मजबूत रहेगा और इससे केंद्र तथा राज्यों दोनों की वित्तीय स्थिति को मजबूती मिलेगी।

  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार मजबूत होता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 682.2354 अरब डॉलर पर पहुंच गया। लगातार दूसरे सप्ताह दर्ज हुई इस वृद्धि को देश की बाहरी आर्थिक स्थिति के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इससे पहले 17 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। लगातार दो सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में हुई वृद्धि से यह संकेत मिल रहा है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी भारत की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार का क्रम जारी है।

    केंद्रीय बैंक के अनुसार, इस दौरान स्वर्ण भंडार के मूल्य में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। समीक्षा अवधि में गोल्ड रिजर्व 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा मानी जाने वाली विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां भी 4.873 अरब डॉलर बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गईं। यह बढ़ोतरी देश की समग्र वित्तीय मजबूती का संकेत देती है।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में केवल अमेरिकी डॉलर ही नहीं बल्कि यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है। इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाले बदलाव वैश्विक मुद्रा बाजार की गतिविधियों से भी प्रभावित होते हैं।

    हालांकि इस अवधि में स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (एसडीआर) में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यह 5.3 करोड़ डॉलर घटकर 18.617 अरब डॉलर रह गया। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य प्रमुख घटकों में हुई वृद्धि के कारण कुल भंडार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली।

    वर्ष 2026 की शुरुआत में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना था। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते रुपये पर भी दबाव देखा गया, जिसके बाद बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया था। इसके कारण कुछ सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दर्ज की गई थी।

    उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.494 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद आई गिरावट से अब धीरे-धीरे उबरने का क्रम जारी है और हाल के सप्ताहों में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है।

    आरबीआई का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखना नहीं है, बल्कि केवल बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना है। आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होता है। इससे आयात भुगतान, बाहरी ऋण दायित्वों का निर्वहन और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौरान वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। हालिया बढ़ोतरी को भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के रूप में देखा जा रहा है।

  • कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । भारतीय बुलियन और सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में लगातार आ रही गिरावट ने निवेशकों और खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष की शुरुआत में सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद अब सोने के दामों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। रिकॉर्ड स्तर से करीब 37 हजार रुपये प्रति दस ग्राम की गिरावट के बाद बाजार में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या यह नए निवेश का सही समय है या अभी कीमतों में और सुधार देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक बाजार के रुझानों का सीधा असर घरेलू सर्राफा बाजार पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनावों, कच्चे तेल की अनिश्चित कीमतों और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की सख्त मौद्रिक नीतियों के कारण सोने की वैश्विक दरों पर लगातार दबाव बना हुआ है। जनवरी महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,602 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने वाला सोना अब घटकर करीब 4,040 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। इसी के प्रभाव से भारतीय बाजार में भी कीमतें एक लाख अस्सी हजार रुपये के पीक स्तर से गिरकर एक लाख तैंतालीस हजार रुपये प्रति दस ग्राम के स्तर पर आ गई हैं।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सोने की कीमतों में इस नरमी का मुख्य कारण केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियां हैं। अमेरिका में महंगाई पर नियंत्रण के लिए अपनाई जा रही कड़ी मौद्रिक नीतियों और ब्याज दरों में कटौती की संभावना न के बराबर होने के कारण निवेशक फिक्स्ड रिटर्न देने वाले अन्य वित्तीय साधनों की ओर रुख कर रहे हैं। चूंकि सोना कोई प्रत्यक्ष ब्याज या लाभांश प्रदान नहीं करता, इसलिए उच्च ब्याज दर के दौर में इसकी मांग पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।

    बाजार के दीर्घकालिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि सोने ने ऐतिहासिक रूप से निवेशकों को सुरक्षित और आकर्षक रिटर्न दिया है। पिछले तीन दशकों के दौरान इस पीली धातु के मूल्यों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। यद्यपि अल्पकालिक अवधि में भू-राजनीतिक बदलावों और आर्थिक नीतियों के कारण इसमें बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक नजरिए से इसे हमेशा से एक मजबूत परिसंपत्ति माना जाता रहा है।

    बाजार विश्लेषकों का सुझाव है कि जो निवेशक अपने पोर्टफोलियो में सोने को शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए एकमुश्त निवेश के बजाय व्यवस्थित तरीके से किस्तों में खरीदारी करना अधिक जोखिम-रहित रणनीति हो सकती है। आने वाले समय में वैश्विक बाजार के रुझानों और नीतिगत निर्णयों के आधार पर कीमतों में सीमित दायरे का उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • वैश्विक तनाव के बीच सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से 393 अंक फिसला, निफ्टी भी बढ़त गंवाकर बंद

    वैश्विक तनाव के बीच सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से 393 अंक फिसला, निफ्टी भी बढ़त गंवाकर बंद

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार उतार-चढ़ाव भरे कारोबार के बाद लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ। शुरुआती कारोबार में निवेशकों की खरीदारी से बाजार में अच्छी तेजी देखने को मिली, लेकिन दिन के दूसरे हिस्से में मुनाफावसूली हावी होने से अधिकांश बढ़त खत्म हो गई। कारोबार समाप्त होने पर बीएसई सेंसेक्स 1.44 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,186.87 अंक पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50 सूचकांक 5.75 अंक की गिरावट के साथ 24,072.75 अंक पर बंद हुआ।

    कारोबार की शुरुआत सकारात्मक रही। सेंसेक्स करीब 203 अंकों की बढ़त के साथ खुला और दिन के दौरान 77,579.69 अंक के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया। हालांकि बाद में बिकवाली बढ़ने से यह अपने इंट्रा-डे हाई से करीब 393 अंक नीचे फिसलकर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी भी शुरुआती मजबूती के साथ 24,186.50 अंक तक पहुंचा, लेकिन अंतिम घंटों में मुनाफावसूली के चलते अपनी अधिकांश बढ़त गंवा बैठा।

    बाजार की व्यापक तस्वीर मिश्रित रही। कारोबार के दौरान लगभग 1,947 शेयरों में तेजी दर्ज की गई, जबकि 2,119 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए और 194 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.41 प्रतिशत और स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 0.10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी।

    सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला सेक्टर रहा, जिसमें 1.48 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इसके अलावा मीडिया, आईटी, ऑटो, एफएमसीजी और फार्मा शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर रियल्टी, पीएसयू बैंक, मेटल, प्राइवेट बैंक और बैंकिंग शेयरों पर दबाव बना रहा। रियल्टी इंडेक्स में सबसे अधिक करीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    निफ्टी 50 के प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में एचसीएल टेक, इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो), विप्रो, मारुति सुजुकी, बजाज फाइनेंस और महिंद्रा एंड महिंद्रा शामिल रहे। वहीं इटरनल, एसबीआई लाइफ, बजाज फिनसर्व, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और एचडीएफसी बैंक के शेयरों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और एशियाई बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के कारण निवेशक पूरे सत्र के दौरान सतर्क बने रहे। महंगाई से जुड़ी चिंताओं का असर विशेष रूप से बैंकिंग और रियल्टी शेयरों पर देखने को मिला। हालांकि कुछ पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर आयात शुल्क दोबारा लागू होने और चुनिंदा कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों के चलते केमिकल सेक्टर में मजबूती बनी रही।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर कंपनियों के तिमाही परिणाम, प्रबंधन की भविष्य की रणनीति, मानसून की प्रगति, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम पर रहेगी। यही कारक निकट भविष्य में भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • PAK की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट .. बलूचिस्तान ने किया आजादी का ऐलान, संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी

    PAK की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट .. बलूचिस्तान ने किया आजादी का ऐलान, संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी


    इस्लामाबाद।
    बलूचिस्तान (Balochistan) की प्राकृतिक गैस, कोयला, खनिज और रेयर अर्थ पर निर्भर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था (Pakistan Economy) इस वक्त अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। जिस इलाके को पाकिस्तान लंबे समय से अपना आर्थिक इंजन मानता रहा, उसी बलूचिस्तान ने अब न सिर्फ आजादी का ऐलान (Declaration of Independence) कर दिया है, बल्कि अपनी संसाधनों की आपूर्ति भी पूरी तरह रोक दी है। दरअसल, बलूचिस्तान प्रांत में मंगलवार को स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन कट गई है। क्षेत्र में लगे पूर्ण शटडाउन और ट्रांसपोर्ट ब्लॉकेड ने पंजाब की औद्योगिक इकाइयों को घुटनों पर ला दिया है। अगर यही हालात रहे तो संभव है कि पाकिस्तान कटोरा लेकर घूमने के लायक भी नहीं बचेगा।

    पंजाब के प्रमुख बिजनेस लीडर्स ने चेतावनी दी है कि अगर यह संकट लंबा खिंचा तो इसका असर किसी सक्रिय युद्ध से भी कहीं ज्यादा विनाशकारी साबित हो सकता है। पंजाब चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और अन्य प्रमुख बिजनेस संगठनों के प्रतिनिधियों ने लाहौर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने बलूचिस्तान पर निर्भरता को लेकर गंभीर चिंता जताई। बिजनेस लीडर्स के अनुसार, पाकिस्तान की अधिकांश भारी उद्योगों की ऊर्जा आपूर्ति, कच्चा माल और खनिज बलूचिस्तान के रास्ते ही आते हैं। शटडाउन के कारण यह पूरी सप्लाई चेन थम गई है।


    LNG और कोयला आपूर्ति पूरी तरह बंद

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्योगपतियों ने विस्तार से बताया कि लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और कोयला मुख्य रूप से बलूचिस्तान के बंदरगाहों और खदानों से पंजाब भेजा जाता है। अब दोनों क्षेत्रों के बीच सभी तरह के एक्सपोर्ट और ट्रांसपोर्ट रुक गए हैं। एक प्रमुख इंडस्ट्री लीडर ने कहा कि हमारी फैक्टरियां अब ईंधन के बिना चल नहीं सकतीं। कई प्लांट्स पहले ही बंद हो चुके हैं या उत्पादन आधा कर दिया गया है। अगर यह स्थिति 10-15 दिन और चली तो पूरे पंजाब में बड़े पैमाने पर छंटनी शुरू हो जाएगी। उन्होंने शहबाज शरीफ सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि लंबे समय तक रुकावट बनी रही तो न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन ठप होगा, बल्कि बेरोजगारी बढ़ने से सामाजिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है।


    खनिज और कच्चे माल की कमी

    बिजनेस प्रतिनिधियों ने बताया कि डुकी, चागई और अन्य खनिज क्षेत्रों से कोयला, क्रोमाइट, कॉपर और अन्य जरूरी इंडस्ट्रियल इनपुट्स की आपूर्ति रोक दी गई है। ट्रांसपोटर्स हड़ताल पर हैं क्योंकि राज्य उच्च मार्गों पर उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दी जा रही। नतीजतन, फैक्टरियों तक कच्चा माल नहीं पहुंच पा रहा। टेक्सटाइल, सीमेंट, फर्टिलाइजर, स्टील और पावर सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया गया कि कई यूनिट्स में उत्पादन 40-60 प्रतिशत तक कम हो गया है।


    बलूचिस्तान पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़

    बलूच नेता मीर यार बलूच द्वारा शेयर किए गए वीडियो और उनके बयानों में कहा गया है कि बलूचिस्तान सोना, प्राकृतिक गैस, तांबा, क्रोमाइट और रेयर अर्थ का विशाल भंडार है। अगर बलूचिस्तान इन संसाधनों पर अपना पूर्ण नियंत्रण वापस ले लेता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगेगा। मीर यार बलूच ने कहा कि हम जिसे ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ कह रहे हैं, वहां स्थिति धीरे-धीरे बलूच मुक्ति सेनाओं के नियंत्रण में आ रही है। हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का फायदा अपने लोगों को देना चाहते हैं, न कि पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार को।

    दूसरी ओर एक आर्थिक विशेषज्ञ ने कहा कि बलूचिस्तान पाकिस्तान की जीडीपी में सीधे-सीधे योगदान नहीं देता दिखता, लेकिन उसकी सप्लाई चेन पूरे देश की रीढ़ है। इन संसाधनों के बिना पाकिस्तानी सरकार दिवालिया होकर टूट जाएगी। यही कारण है कि पंजाब के बिजनेसमैनों ने सरकार से तुरंत बातचीत शुरू करने और बलूचिस्तान में शांति बहाल करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यह अब सिर्फ सुरक्षा मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का संकट बन चुका है।

  • अब घरों में रखा सोना आएगा अर्थव्यवस्था के काम, सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन 2.0' प्रस्ताव पर कर रही विचार

    अब घरों में रखा सोना आएगा अर्थव्यवस्था के काम, सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन 2.0' प्रस्ताव पर कर रही विचार


    नई दिल्ली। भारतीय परिवारों के घरों और लॉकरों में वर्षों से सुरक्षित रखे सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार एक नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। सराफा कारोबारियों की ओर से तैयार किए गए इस प्रस्ताव को ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम 2.0’ नाम दिया गया है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो घरेलू स्तर पर मौजूद सोने का बड़ा हिस्सा बाजार में वापस आ सकता है, जिससे सोने के आयात पर निर्भरता कम होने के साथ अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    शुरुआती लक्ष्य 200 टन सोना बाजार में लाने का
    सराफा संगठनों द्वारा सरकार को सौंपे गए प्रस्ताव के अनुसार, योजना के पहले चरण में देशभर के घरों में रखा करीब 200 टन सोना औपचारिक व्यवस्था में लाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे घरेलू मांग का कुछ हिस्सा देश के भीतर उपलब्ध सोने से पूरा किया जा सकेगा और विदेशों से सोना आयात करने की आवश्यकता कम हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा की बचत होने की संभावना भी जताई गई है।

    पुरानी योजना से कैसे होगी अलग?
    इससे पहले लागू की गई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी, क्योंकि लोग सीधे बैंकों के माध्यम से प्रक्रिया अपनाने में सहज महसूस नहीं करते थे।

    नए प्रस्ताव में व्यवस्था को अधिक आसान बनाने की बात कही गई है। इसके तहत ग्राहक अपने पुराने या अनुपयोगी आभूषण लेकर सीधे बैंक जाने के बजाय पंजीकृत ज्वेलर्स के पास पहुंच सकेंगे। ज्वेलर गहनों को गलाकर उनकी शुद्धता का आकलन करेगा और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन्हें बैंक में जमा कराया जाएगा।

    ग्राहकों को मिल सकती हैं गोल्ड यूनिट्स
    प्रस्ताव के मुताबिक, जमा किए गए सोने के बदले ग्राहक के बैंक खाते में उसी मूल्य के बराबर गोल्ड यूनिट्स क्रेडिट की जा सकती हैं। इससे लोग पुराने डिजाइनों के गहनों का बेहतर उपयोग कर सकेंगे और अपनी पसंद के नए आभूषण खरीदने का विकल्प भी मिलेगा। वहीं ज्वेलरी उद्योग को अपेक्षाकृत कम लागत पर कच्चे माल के रूप में सोना उपलब्ध होने की संभावना है।

    टैक्स नियमों को लेकर भी राहत की उम्मीद
    योजना के मसौदे में प्रक्रिया को पारदर्शी रखने और लोगों की टैक्स संबंधी आशंकाओं को कम करने पर भी जोर दिया गया है। मौजूदा आयकर नियमों के अनुसार, विवाहित महिला के पास 500 ग्राम, अविवाहित महिला के पास 250 ग्राम और पुरुष के पास 100 ग्राम तक सोना रखने पर सामान्य परिस्थितियों में राहत का प्रावधान है। हालांकि, अंतिम स्थिति संबंधित नियमों और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।

    सरकार की मंजूरी का इंतजार
    फिलहाल केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। हालांकि, सराफा बाजार इस पहल को सकारात्मक मान रहा है। कारोबारियों का मानना है कि यदि यह योजना लागू होती है तो घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा जा सकेगा। इससे न केवल गोल्ड मार्केट को नई गति मिल सकती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलने की संभावना है।

  • फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…

    फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…


    नई दिल्ली। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल फ्रांस पर बढ़ता सार्वजनिक कर्ज चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते प्रभावी वित्तीय सुधार नहीं किए, तो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में आ सकती है। बढ़ती उधारी लागत और राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर निवेशकों और अर्थशास्त्रियों ने भी चिंता जताई है।

    फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज फिलहाल करीब 3.5 ट्रिलियन यूरो तक पहुंच चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों के कारण राजकोषीय सुधारों की संभावना कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में कर्ज का बोझ और बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।

    ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ से बढ़ सकती है मुश्किल
    अर्थशास्त्रियों ने फ्रांस के सामने ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ का खतरा बताया है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जब सरकारी बॉन्ड पर चुकाई जाने वाली ब्याज दर आर्थिक विकास की गति से अधिक हो जाती है। इससे सरकार का कर्ज लगातार बढ़ता जाता है और अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में उसका बोझ तेजी से बढ़ने लगता है। यदि सरकार लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष (प्राइमरी सरप्लस) हासिल नहीं कर पाती, तो इस स्थिति से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है।

    2050 तक GDP के 203% तक पहुंच सकता है कर्ज
    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मौजूदा हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ तो फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज वर्ष 2050 तक उसकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 203 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह चेतावनी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के महासचिव मैथियास कोरमैन के हालिया बयान के आधार पर दी गई है। अनुमान है कि वर्ष 2029 तक केवल ब्याज भुगतान का खर्च ही लगभग 100 अरब यूरो तक पहुंच सकता है।

    निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों की बढ़ी चिंता
    क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सारा कार्लसन ने भी कहा है कि सार्वजनिक कर्ज पर बढ़ता ब्याज भुगतान फ्रांस के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक बन सकता है। वहीं निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली ने वित्तीय जोखिमों का हवाला देते हुए अपने ग्राहकों को फ्रांसीसी सरकारी कर्ज में निवेश कम करने की सलाह दी है।

    कोविड के बाद भी कम नहीं हुआ कर्ज
    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष की पहली तिमाही में फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज 3.5 ट्रिलियन यूरो (करीब 4 ट्रिलियन डॉलर) से अधिक हो गया, जो देश की GDP का 117.5 प्रतिशत है। फ्रांस की ऑडिट संस्था कोर्ट डेस कॉम्प्टेस के मुताबिक यह स्तर कोविड-19 महामारी के दौरान बने रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है। संस्था का कहना है कि यूरोजोन में फ्रांस ऐसा प्रमुख देश है, जिसने महामारी के बाद अपने कर्ज के बोझ को उल्लेखनीय रूप से कम नहीं किया।

    ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ा खर्च
    वर्ष 2025 में फ्रांस ने अपने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए करीब 66 अरब यूरो खर्च किए, जो शिक्षा और रक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बजट से भी अधिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2029 तक यह राशि बढ़कर 100 अरब यूरो तक पहुंच सकती है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेज आर्थिक विकास या लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष के जरिए इस संकट से बाहर निकला जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसे संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट डेस कॉम्प्टेस की वरिष्ठ अधिकारी कैरिन कैम्बी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो फ्रांस कर्ज के ब्याज के बढ़ते बोझ तले दब सकता है और इस स्थिति से बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं।

    चुनाव से पहले बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
    बढ़ता सार्वजनिक कर्ज अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले फ्रांस की राजनीति का भी अहम मुद्दा बन गया है। प्रमुख सेंट्रिस्ट नेता एडुआर्ड फिलिप और गैब्रियल अट्टल ने इसे अपने चुनावी एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बनाया है। वहीं सांसद केविन मौविएक्स का कहना है कि कर्ज का बढ़ता स्तर गंभीर चेतावनी है और यदि सुधार में देर की गई तो इसके परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

  • देश की अथर्व्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास….2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च में होगा 93% हिस्सा

    देश की अथर्व्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास….2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च में होगा 93% हिस्सा


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) आने वाले सालों में किसके दम पर आगे बढ़ेगी? इसका जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने कहा है कि भारत का मिडिल क्लास (मध्यम वर्ग) ही देश की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा इंजन बनने जा रहा है। उन्होंने बताया कि 2036 तक भारत के मिडिल क्लास और उच्च-मध्यम वर्ग (Slightly Affluent Population) का देश के कुल उपभोक्ता खर्च (Consumer Spending) में 93% हिस्सा होगा, यानी अगले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा ताकत इसी वर्ग की बढ़ती खरीदारी और खर्च से मिलेगी।

    फ्रांस के Aix-Marseille यूनिवर्सिटी में आयोजित प्रतिष्ठित आर्थिक सम्मेलन Rencontres Économiques d’Aix-en-Provence को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश का मजबूत घरेलू उपभोग (Domestic Consumption) है, जिसे मिडिल क्लास लगातार आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि जब लोग ज्यादा खर्च करते हैं, तो उद्योगों का उत्पादन बढ़ता है, रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था को नई गति मिलती है।

    निर्मला सीतारमण के अनुसार, वर्तमान में भारत की लगभग 31% आबादी मिडिल क्लास में आती है। OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) के अनुमान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2030 से 2035 के बीच भारत दुनिया में मिडिल क्लास आबादी के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ सकता है। उन्होंने बताया कि साल 1995 से 2021 के बीच भारत का मिडिल क्लास औसतन 6.3% सालाना की दर से बढ़ा है और आने वाले सालों में यह रफ्तार और तेज होने की उम्मीद है।

    वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार की वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion), जनकल्याण योजनाओं और आर्थिक सुधारों ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालकर मिडिल क्लास तक पहुंचने में मदद की है। उनके मुताबिक, अब तक 24.8 करोड़ (248 मिलियन) लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) से बाहर आए हैं। इसके अलावा डिजिटल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और आसान लोन सिस्टम ने लोगों की आर्थिक क्षमता को मजबूत किया है। वहीं, कई वस्तुओं पर GST दरों में कमी से भी घरेलू खर्च बढ़ाने में मदद मिली है।

    निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा कि अब आर्थिक विकास केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या चेन्नई जैसे महानगरों तक सीमित नहीं है। टियर-2 और टियर-3 शहर भी तेजी से आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र बन रहे हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अनुमान के अनुसार, आने वाले सालों में 500 से अधिक भारतीय शहर नए आर्थिक हब के रूप में उभर सकते हैं। इससे देशभर में रोजगार, निवेश और उपभोग के नए अवसर पैदा होंगे।

    वित्त मंत्री ने भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्षमता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत का कुशल युवा वर्ग तेजी से AI तकनीक अपना रहा है और उद्योगों को भी AI आधारित समाधान उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने बताया कि देश के MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) सेक्टर का लगभग 40% निर्यात होता है और इनमें से कई कंपनियां अब AI आधारित बिजनेस मॉडल अपना रही हैं। इससे नए रोजगार और तकनीकी विकास को भी बढ़ावा मिल रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज दुनिया में सबसे अधिक AI ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और डेटा सेंटर्स वाले प्रमुख देशों में शामिल हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण देश की बड़ी और कुशल तकनीकी कार्यबल है, जो वैश्विक कंपनियों की जरूरतों को पूरा कर रही है।

    वित्त मंत्री का मानना है कि आने वाले सालों में भारत की आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा आधार उसका तेजी से बढ़ता मिडिल क्लास होगा। अगर मौजूदा रफ्तार बनी रहती है, तो 2036 तक देश की लगभग 93% उपभोक्ता खरीदारी इसी वर्ग से आएगी, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभेगी।

  • भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है, लेकिन दीर्घकालिक और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता बनी हुई है। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि देश ने आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, फिर भी विकास की इस गति को स्थायी बनाए रखने के लिए आत्मसंतोष की बजाय निरंतर सुधार, नवाचार और संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना होगा।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी बड़ी और जटिल अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर हासिल करना पर्याप्त नहीं होता। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और विकास समावेशी तथा टिकाऊ स्वरूप ग्रहण करे। उन्होंने कहा कि मजबूत संस्थानों, प्रभावी नीतियों और सक्षम प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बिना दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

    सीतारमण ने कहा कि भारत वर्तमान में कई आर्थिक संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन यह स्थिति स्थायी रूप से सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती। उनके अनुसार समय-समय पर नीतियों का मूल्यांकन करना और उन क्षेत्रों की पहचान करना आवश्यक है जहां सुधार की गुंजाइश अभी भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि बदलती घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतिगत ढांचे को लगातार अद्यतन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    वित्त मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि विकास को गति देने के लिए देश की उत्पादन क्षमता, कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है, लेकिन कुछ सेक्टर ऐसे भी हैं जिन्हें अतिरिक्त नीति समर्थन और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। विशेष रूप से जटिल विनिर्माण, मध्यवर्ती उत्पादों और विशिष्ट सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में नई रणनीतियों की जरूरत महसूस की जा रही है।

    उन्होंने कहा कि लंबे समय से जिन चुनौतियों पर चर्चा होती रही है, अब उनके व्यावहारिक समाधान तलाशने का समय है। इसके लिए बेहतर क्रियान्वयन, संस्थागत क्षमता निर्माण और आवश्यकतानुसार नई नीतियों का निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरकार लगातार इस दिशा में काम कर रही है ताकि भविष्य की आर्थिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

    वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए सीतारमण ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में भारत को भी अपनी नीतियों को लचीला और परिस्थितियों के अनुरूप बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया स्वतः संचालित नहीं होती, बल्कि इसके लिए निरंतर निगरानी, सुधार और दूरदर्शी योजना की आवश्यकता होती है।

    कोविड-19 महामारी के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महामारी से जुड़े कुछ असर अब भी आर्थिक योजना और अपेक्षाओं को प्रभावित करते हैं। हालांकि वर्तमान समय में किसी बड़े व्यवधान की आशंका नहीं है, फिर भी सरकार संभावित जोखिमों पर नजर बनाए हुए है और आवश्यक तैयारियां कर रही है।

    वित्त मंत्री ने मौसम संबंधी चुनौतियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कमजोर मानसून की संभावना को ध्यान में रखते हुए सरकार पहले से तैयारी कर रही है। कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और कुछ इलाकों में अत्यधिक वर्षा की आशंका को देखते हुए संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

    उन्होंने विश्वास जताया कि उचित नीतियों, मजबूत संस्थागत ढांचे और निरंतर सुधारों के माध्यम से भारत अपनी दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को और अधिक सशक्त बना सकेगा तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा।