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  • 2026 को लेकर भविष्यमालिका की भविष्यवाणी पर मचा बवाल: सोशल मीडिया दावों और वैश्विक हालातों के बीच बढ़ी चर्चा

    2026 को लेकर भविष्यमालिका की भविष्यवाणी पर मचा बवाल: सोशल मीडिया दावों और वैश्विक हालातों के बीच बढ़ी चर्चा



    नई दिल्ली। सोशल मीडिया और कुछ अनौपचारिक रिपोर्ट्स में भविष्यमालिका की कथित भविष्यवाणियों को लेकर 2026-27 के दौरान बड़े वैश्विक बदलाव, आर्थिक संकट और युद्ध जैसी स्थितियों के दावे किए जा रहे हैं। इन दावों को हाल के अंतरराष्ट्रीय हालात और महंगाई जैसी आर्थिक चुनौतियों से जोड़कर वायरल किया जा रहा है, लेकिन इनकी कोई वैज्ञानिक या आधिकारिक पुष्टि मौजूद नहीं है।

    वहीं भारत सरकार या प्रधानमंत्री की ओर से 2026 को लेकर सोने की खरीद, पेट्रोल-डीजल खर्च या घरेलू बचत जैसी किसी विशेष अपील का कोई आधिकारिक बयान सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किया गया है। ऐसे दावे अक्सर सोशल मीडिया पर संदर्भ से हटकर फैलाए जाते हैं, जिससे भ्रम की स्थिति बनती है।

    वर्तमान समय में दुनिया भर में महंगाई, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव जरूर देखा जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन्हें किसी “भविष्यवाणी” से जोड़कर देखना सही नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति पर असर ठोस नीतियों, युद्धों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर निर्भर करता है, न कि धार्मिक या पारंपरिक भविष्यवाणियों पर।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ऐसी भविष्यवाणियां अक्सर प्रतीकात्मक या आस्था पर आधारित होती हैं, जिनका उद्देश्य भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी करना नहीं होता। इसलिए इन्हें वास्तविक घटनाओं के रूप में प्रस्तुत करना गलत सूचना को बढ़ावा दे सकता है।

    फिलहाल यह पूरा मामला सोशल मीडिया दावों, धार्मिक मान्यताओं और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों की चर्चाओं के बीच उलझा हुआ है, जिसकी सत्यता को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

  • विकास की रफ्तार का मंत्र: MSME सेक्टर को मजबूत ट्रेड स्किल से जोड़ने की जरूरत..

    विकास की रफ्तार का मंत्र: MSME सेक्टर को मजबूत ट्रेड स्किल से जोड़ने की जरूरत..

    नई दिल्ली । भारत की आर्थिक दिशा और भविष्य की विकास रणनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है, जिसमें देश के सूक्ष्म उद्यमों को विकास की रीढ़ बताया गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत की दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि सूक्ष्म और लघु उद्यमों को किस हद तक सक्षम, प्रशिक्षित और प्रतिस्पर्धी बनाया जाता है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में केवल बड़े उद्योग ही नहीं, बल्कि छोटे स्तर के उद्यम भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। दुनिया भर में कई छोटे उद्यम तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और भारत को भी इसी दिशा में अपने सूक्ष्म उद्यमों को तैयार करना होगा।

    उनके अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था की असली ताकत जमीनी स्तर पर काम करने वाले छोटे उद्यमों में छिपी है। ये उद्यम न केवल रोजगार पैदा करते हैं, बल्कि उत्पादन और सेवा क्षेत्र को भी मजबूत आधार देते हैं। यदि इन्हें सही प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग मिले, तो ये देश की विकास दर को नई ऊंचाई तक ले जा सकते हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि केवल उद्यमियों को ही नहीं, बल्कि उनके कर्मचारियों को भी लगातार अपने कौशल में सुधार करना चाहिए। चाहे वह अकाउंटिंग हो, मानव संसाधन प्रबंधन हो या इन्वेंट्री से जुड़ा काम, हर क्षेत्र में दक्षता बढ़ाने की जरूरत है। इससे न केवल कार्यक्षमता में सुधार होगा बल्कि व्यवसायों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ेगी।

    इस विचार को उद्योग जगत के अन्य विशेषज्ञों ने भी महत्वपूर्ण बताया है। उनका मानना है कि भारत की आर्थिक संरचना में सूक्ष्म और लघु उद्यम एक मजबूत आधार की तरह हैं, जो न केवल ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को जोड़ते हैं बल्कि सामाजिक स्थिरता में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि कौशल, नवाचार और तकनीक के सही उपयोग पर निर्भर करेगी। यदि छोटे उद्यमों को सही दिशा दी जाए, तो वे बड़े उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो सकते हैं और देश की आर्थिक मजबूती को बढ़ा सकते हैं।

    सरकार की ओर से भी हाल के समय में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिनमें वित्तीय सहायता और ऋण गारंटी जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसका उद्देश्य छोटे उद्यमों को आर्थिक जोखिम से सुरक्षित रखते हुए उन्हें विस्तार का अवसर देना है।

    कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि भारत की विकास यात्रा में सूक्ष्म उद्यमों की भूमिका आने वाले वर्षों में और भी महत्वपूर्ण होने वाली है। यदि इन उद्यमों को सही प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और वित्तीय समर्थन मिलता है, तो यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत और स्थायी विकास की दिशा में ले जा सकता है।

  • अर्थव्यवस्था को बचाने की कवायद… जानें सोना और तेल के इस्तेमाल में कटौती की अपील का क्या है मकसद?

    अर्थव्यवस्था को बचाने की कवायद… जानें सोना और तेल के इस्तेमाल में कटौती की अपील का क्या है मकसद?


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में संघर्ष से वैश्विक आपूर्ति शृंखला (Global Supply Chain) में आई रुकावट और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) सुरक्षित रखने के लिए सोने, पेट्रोल-डीजल और खाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती की पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की अपील पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अपील का मुख्य मकसद डॉलर की मांग कम करना, रुपये को मजबूत करना और अर्थव्यवस्था को संभावित झटकों से बचाना है। विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ती आयात लागत और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव से दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत तेल का शुद्ध आयातक है और तेल की 89 फीसदी जरूरतें बाहरी स्रोतों से पूरी करता है और इसके लिए उसे अब ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।


    6 अरब डॉलर का सोना हर माह खरीदता है भारत

    भारत सोने का उत्पादक नहीं है। पिछले वर्ष अकेले सोने पर करीब 72 अरब डॉलर खर्च किए गए। यानी, हर माह छह अरब डॉलर। उपभोक्ता आयात और एक आरक्षित संपत्ति के रूप में सोने की दोहरी भूमिका स्थिति को और जटिल बना देती है। आरबीआई तेजी से सोना जमा कर रहा है। एक साल में उसने लंदन से 168 टन सोना खरीदा है, जिससे मार्च तक उसके पास 880 टन सोना हो गया है। भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की 16% हिस्सेदारी है, जो पिछले वर्ष के 10% से अधिक है। हालांकि, घरेलू सोने की खरीद का आर्थिक असर अलग होता है।

    आरबीआई के रिजर्व प्रबंधन कार्यों के विपरीत आयातित सोने की उपभोक्ता मांग अर्थव्यवस्था में डॉलर के प्रवाह को सीधे तौर पर बढ़ा देती है। इसलिए, बड़े पैमाने पर सोने के आयात से चालू खाता घाटे पर दबाव बढ़ सकता है और डॉलर की मांग बढ़ सकती है। इससे समय के साथ रुपया कमजोर पड़ सकता है। जैसे-जैसे डॉलर बाहर जाता है, रुपया कमजोर होता जाता है, सोना और भी महंगा हो जाता है। इससे दुष्चक्र पैदा हो जाता है, जिसमें भारतीय उपभोक्ता सोने के लिए अधिक रुपये चुकाता है, क्योंकि सोने की पिछली खरीद ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया होता है।


    आयात में बढ़ोतरी से बढ़ रहा दबाव

    थिंक टैंक वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल (जीटीआरआई) ने पीएम की अपील का समर्थन करते हुए कहा कि सोने के आयात में हो रही भारी बढ़ोतरी विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रही है और व्यापार असंतुलन को बढ़ा रही है। जीटीआरआई के अनुसार, भारत के गोल्ड बार का आयात 2022 में 36.5 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 58.9 अरब डॉलर हो गया। थिंक टैंक ने सरकार से आग्रह किया है कि विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रखने के लिए, भारत-यूएई मुक्त व्यापार समझौते के तहत कीमती धातुओं पर दी जाने वाली रियायतों की समीक्षा करे। हाल में सोने के आयात में हुई बढ़ोतरी में इसकी बड़ी भूमिका रही है। अमीरात से 2022 में जहां गोल्ड बार का आयात 2.9 अरब डॉलर था, वहीं 2025 में यह बढ़कर 16.5 अरब डॉलर हो गया।


    89% तेल का आयात करता है भारत

    तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भी डॉलर के बाहर जाने में वृद्धि के रूप में सामने आता है। हालांकि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर रखी गई हैं, पर इसकी भरपाई सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने की है। इन कंपनियों को खुदरा कीमत और आयात कीमत के बीच के अंतर का सामना करना पड़ा है और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उछाल के कारण इन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) को एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर भी नुकसान हो रहा है, जिससे उन पर दबाव और बढ़ गया है। इसे देखते हुए कि सरकार ने ओएमसी को इन नुकसानों की भरपाई करने की कोई योजना नहीं होने का संकेत दिया है, कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद है और कंपनियां खुद भी इस तरह के बदलाव के लिए जोर दे रही हैं। हालांकि, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी कुछ ही दिनों में पूरी आपूर्ति शृंखला में फैल जाती है।


    खाद्य तेल : विकल्प सीमित थाली की बढ़ती जा रही लागत

    भारत खाने के तेल की जरूरतों के लिए आयात पर बहुत निर्भर है, खासकर इंडोनेशिया और मलयेशिया से पाम तेल तथा रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी का तेल मंगाता है। पीएम मोदी ने कहा था कि यदि हर घर खाने के तेल का इस्तेमाल कम कर दे, तो राष्ट्रीय खजाने के साथ परिवार की सेहत भी सुधरेगी। सोने की खरीद टाला जा सकता है या सैद्धांतिक रूप से ईंधन की बचत की जा सकती है, लेकिन खाने के तेल के विकल्प सीमित हैं। यह रोजमर्रा की आवश्यक चीज है। रुपये की गिरावट से यह समस्या और भी बढ़ गई है। कमजोर रुपया आयातित तेल के हर लीटर की कीमत बढ़ा देता है और खाने के तेल की कीमतों में हुई यह बढ़ोतरी आपूर्ति शृंखला के जरिये तेजी से उपभोक्ता की थाली तक पहुंच जाती है। घरेलू स्तर पर उपलब्ध सरसों के तेल जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इनका उत्पादन इतनी तेजी से नहीं बढ़ाया जा सकता कि ये आयात की जगह ले सकें।


    रासायनिक उर्वरक : बढ़ रहीं कीमतें, खाने-पीने की वस्तुओं पर असर

    प. एशिया आपूर्ति मार्गों में भारी रुकावट की वजह से आयात किए गए यूरिया की कीमत फरवरी में 508 डॉलर से बढ़कर 935 डॉलर प्रति टन हो गई है। इसी तरह, डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की कीमत पिछले साल के 680 डॉलर से बढ़कर 925 डॉलर प्रति टन होने की उम्मीद है। अमोनिया की कीमतें भी 435 डॉलर से बढ़कर 850–900 डॉलर प्रति टन हो गई हैं, जो दोगुनी से भी अधिक हैं। यूरिया आयात का लगभग 75% हिस्सा खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों से आता है।

    खाद के घरेलू उत्पादन को भी झटका लगा है। खाड़ी से एलएनजी की आपूर्ति में रुकावटों के कारण मार्च में यूरिया का उत्पादन 25 लाख टन की सामान्य मासिक दर के मुकाबले घटकर 15 लाख टन रह गया। जून में स्टॉक की पर्याप्त भरपाई नहीं हुई, तो खेती में इस्तेमाल चीजों की बढ़ी लागत का असर खाद्य वस्तुओं पर पड़ेगा।


    यूरिया आयात का 75% हिस्सा जीसीसी से आता है

    घरेलू यूरिया प्लांट फीडस्टॉक के तौर पर एलएनजी पर निर्भर रहते हैं, जिसका 60% से अधिक हिस्सा कतर, यूएई व ओमान से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आयात किया जाता है। इस मार्ग में बाधा ने उर्वरक आयात को प्रभावित किया। खरीफ मौसम के लिए 194 लाख टन यूरिया की जरूरत है, जबकि अप्रैल में स्टॉक केवल 55 लाख टन था।

  • एशिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा तेल संकट का असर…. हो सकता है 1970 जैसा बदलाव!

    एशिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा तेल संकट का असर…. हो सकता है 1970 जैसा बदलाव!


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया संकट (West Asia crisis.) और तेल की कीमतों (Oil prices) में उछाल का असर अब धीरे-धीरे एशिया की अर्थव्यवस्थाओं (Economies of Asia.) और आम लोगों की जिंदगी पर दिखने लगा है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह बदलाव वैसा ही हो सकता है जैसा 1970 के दशक के तेल संकट के बाद यूरोप में देखने को मिला था, जब पूरी ऊर्जा व्यवस्था ही बदल गई थी।

    1970 का सबक: कैसे यूरोप ने तेल पर निर्भरता घटाई
    1973 और 1979 के तेल संकट के बाद शुरुआत में अनुमान था कि यूरोप पहले की तरह ही तेल पर निर्भर रहेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। महंगे कच्चे तेल ने यूरोप को गैस और परमाणु ऊर्जा की ओर धकेल दिया। नतीजा यह हुआ कि 1980 के दशक तक तेल की खपत गिर गई और गैस का इस्तेमाल दोगुना हो गया।


    अब एशिया में दिख रहे वही संकेत

    आज एशिया भी उसी मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। दुनिया का 80% से ज्यादा तेल-गैस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर एशिया जाता है, लेकिन इस रूट पर तनाव और सप्लाई बाधित होने से कीमतें बढ़ रही हैं और देशों की निर्भरता संकट बनती जा रही है।

    जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश पहले से ही आयात पर निर्भर हैं, जबकि वियतनाम, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी अब नेट इंपोर्टर बन चुके हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और थाईलैंड में घरेलू गैस उत्पादन घट रहा है, जिससे महंगे आयात पर निर्भरता बढ़ रही है।


    आम लोगों पर सीधा असर

    ऊर्जा महंगी होने का असर सीधे आम आदमी पर दिख रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया में खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हैं। कई देशों में हवाई यात्रा महंगी हो गई है, एयरलाइंस ने उड़ानें कम कर दी हैं।

    इस्लामाबाद में एक गैसोलीन स्टेशन पर ग्राहकों की कतार। पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल की कीमतें बढ़ा दीं। पाकिस्तान, श्रीलंका और फिलीपींस में फ्यूल बचाने के लिए चार दिन का वर्क वीक लागू किया गया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी किसानों पर असर दिख रहा है, जहां फर्टिलाइजर महंगे हो रहे हैं और लागत बढ़ रही है।


    क्लीन एनर्जी की ओर तेज रुख

    इस संकट का सबसे बड़ा असर यह है कि अब क्लीन एनर्जी की ओर तेजी से रुख बढ़ रहा है। भारत में LPG की कमी के चलते लोग इंडक्शन चूल्हों की ओर जा रहे हैं। एशिया के कई देशों में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की मांग तेजी से बढ़ी है। थाईलैंड और सिंगापुर जैसे बाजारों में EV की हिस्सेदारी 50% तक पहुंच गई है। सोलर एनर्जी में भी बूम देखने को मिल रहा है। फिलीपींस, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में सोलर इंस्टॉलेशन तेजी से बढ़ रहे हैं।

    OPEC से UAE का बाहर होना बना नया ट्रिगर: ओपेक से यूएई के बाहर होने का फैसला तेल बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है। इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ेगा और आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ेगा। क्या तेल की मांग घटने की शुरुआत हो चुकी है: एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर यह संकट लंबा चलता है, तो एशिया में तेल की मांग पर बड़ा असर पड़ सकता है। जैसे यूरोप में 1970 के बाद तेल की मांग कभी पहले जैसी नहीं रही, वैसे ही एशिया में भी बड़ा बदलाव संभव है।

  • नए उपाध्यक्ष के तौर पर सक्रिय हुए अशोक लाहिड़ी, पीएम से मुलाकात में विकास एजेंडे पर चर्चा..

    नए उपाध्यक्ष के तौर पर सक्रिय हुए अशोक लाहिड़ी, पीएम से मुलाकात में विकास एजेंडे पर चर्चा..

    नई दिल्ली। नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभालने के बाद वरिष्ठ अर्थशास्त्री अशोक लाहिड़ी ने राजधानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यह मुलाकात पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद हुई एक महत्वपूर्ण औपचारिक बैठक मानी जा रही है, जिसमें देश की आर्थिक नीतियों और विकास योजनाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों पर विचार-विमर्श की संभावना रही।

    अशोक लाहिड़ी लंबे समय से भारत की आर्थिक नीति निर्माण प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं और उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। उनके अनुभव को देखते हुए नीति आयोग में उनकी नियुक्ति को सरकार के आर्थिक दृष्टिकोण को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

    इस नई जिम्मेदारी के साथ नीति आयोग में कार्यशैली और प्राथमिकताओं में भी बदलाव की उम्मीद की जा रही है। सरकार का फोकस इस समय विकास, निवेश और आर्थिक सुधारों को गति देने पर है, ऐसे में लाहिड़ी की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    लाहिड़ी का करियर चार दशकों से अधिक का रहा है, जिसमें उन्होंने मुख्य आर्थिक सलाहकार और विभिन्न वैश्विक वित्तीय संस्थानों के साथ काम किया है। उनकी विशेषज्ञता खास तौर पर वित्तीय नीति और मैक्रो-इकोनॉमिक प्लानिंग में मानी जाती है।

    उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब देश तेजी से बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल के बीच अपनी विकास रणनीतियों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। इस संदर्भ में नीति आयोग में उनकी भूमिका नीति निर्माण को और अधिक व्यावहारिक और डेटा आधारित बनाने में मदद कर सकती है।

    प्रधानमंत्री से उनकी यह मुलाकात केवल औपचारिकता नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे आने वाले समय की नीति दिशा और प्राथमिकताओं के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

  • भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 703 अरब डॉलर के पार, आरबीआई के आंकड़े जारी..

    भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 703 अरब डॉलर के पार, आरबीआई के आंकड़े जारी..


    नई दिल्ली।पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक सकारात्मक खबर सामने आई है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 703.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी हाल के सप्ताह में दर्ज की गई है, जिसमें भंडार में लगभग 2.3 अरब डॉलर की वृद्धि देखी गई है। यह संकेत देता है कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद देश की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पिछले कुछ महीनों से इसमें उतार-चढ़ाव देखा जा रहा था। वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता के कारण पहले भंडार पर दबाव बना था, जिससे इसमें गिरावट भी दर्ज की गई थी। हालांकि हाल के आंकड़े बताते हैं कि स्थिति अब धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ रही है।

    कुछ समय पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अपने रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया था, लेकिन उसके बाद वैश्विक तनाव और मुद्रा बाजार में बदलाव के चलते इसमें कमी आई थी। अब फिर से इसमें सुधार देखने को मिल रहा है, जो आर्थिक स्थिरता के लिहाज से एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इस दौरान देश के सोने के भंडार में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह 122 अरब डॉलर से अधिक के स्तर पर पहुंच गया है। इसके अलावा विशेष आहरण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की स्थिति में भी हल्का सुधार देखने को मिला है। ये सभी संकेत मिलकर देश की बाहरी आर्थिक मजबूती को दर्शाते हैं।

    विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार होता है। यह आयात भुगतान, विदेशी व्यापार और मुद्रा स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। मजबूत भंडार से देश को वैश्विक झटकों का सामना करने की क्षमता मिलती है और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होता है।

    हालिया बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि वैश्विक दबाव के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति स्थिर बनी हुई है और धीरे-धीरे और मजबूत हो रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार में यह सुधार आर्थिक संतुलन की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

  • विकसित भारत’ के लिए नई वित्तीय रूपरेखा: बैंकिंग सेक्टर को मजबूत बनाने को बनेगी हाई-लेवल कमिटी

    विकसित भारत’ के लिए नई वित्तीय रूपरेखा: बैंकिंग सेक्टर को मजबूत बनाने को बनेगी हाई-लेवल कमिटी

    नई दिल्ली । भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की दिशा में केंद्र सरकार अब बैंकिंग क्षेत्र को नई ऊंचाई देने की तैयारी में है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की है कि सरकार जल्द ही बैंकिंग सेक्टर के लिए एक हाई-लेवल कमिटी का गठन करेगी। इस कमिटी का उद्देश्य आने वाले वर्षों में देश की बढ़ती वित्तीय जरूरतों के अनुरूप बैंकिंग व्यवस्था को तैयार करना और उसे अधिक सक्षम, व्यापक और मजबूत बनाना होगा।

    दरअसल, जैसे-जैसे भारत तेजी से आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, उद्योग, स्टार्टअप और सामाजिक योजनाओं के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की जरूरत पड़ रही है। ऐसे में बैंकिंग सिस्टम को भी उसी गति से विकसित करना जरूरी है, ताकि वह देश की विकास यात्रा का मजबूत आधार बन सके। इसी उद्देश्य से यह कमिटी बैंकिंग सेक्टर की पूरी समीक्षा करेगी और यह तय करेगी कि आने वाले समय में उसे किस दिशा में आगे बढ़ाना है।

    वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारतका सपना केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि मजबूत वित्तीय ढांचे से पूरा होगा। इसके लिए पर्याप्त फंडिंग, क्रेडिट की उपलब्धता और बैंकिंग सुविधाओं का आम लोगों तक पहुंचना बेहद जरूरी है। कमिटी इसी बात का ब्लूप्रिंट तैयार करेगी कि बैंकिंग क्षेत्र कैसे देश की अगली विकास छलांग का साथ दे सकता है।

    इस प्रस्ताव का जिक्र 1 फरवरी 2026 को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 में भी किया गया था। बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कहा था कि विकसित भारत के लिए बैंकिंग पर हाई-लेवल कमिटीबनाई जाएगी, जो पूरे सेक्टर की समीक्षा करेगी और इसे भारत के अगले विकास चरण से जोड़ेगी। साथ ही यह सुनिश्चित करेगी कि वित्तीय स्थिरता, वित्तीय समावेशन और उपभोक्ता संरक्षण से कोई समझौता न हो।

    सरकार का फोकस केवल बड़े उद्योगों को फंडिंग देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि बैंकिंग सेवाएं देश के हर व्यक्ति तक पहुंचें। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारियों, महिलाओं और युवाओं को सस्ती और आसान वित्तीय सेवाएं मिलें, इसके लिए भी कमिटी सुझाव देगी। वित्त मंत्री ने कहा कि बैंकिंग को इतना बड़ा और सक्षम बनाना है कि वह देश की बढ़ती आर्थिक जरूरतों को पूरा कर सके और आम आदमी की पहुंच में भी बनी रहे।

    उन्होंने यह भी कहा कि विकसित भारत तक पहुंचने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की आवश्यकता होगी। इसके लिए बैंकिंग सिस्टम को मजबूत, लचीला और भविष्य के लिए तैयार बनाना जरूरी है। यही कारण है कि सरकार इस कमिटी का गठन जल्द से जल्द करने की दिशा में काम कर रही है।

    बजट में बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र को मजबूत बनाने की दिशा में कुछ शुरुआती कदम भी उठाए गए हैं। इसी कड़ी में पावर फाइनेंस कॉर्पोरेश PFC और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशनस REC जैसे बड़े पब्लिक सेक्टर एनबीएफसी को पुनर्गठित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका मकसद इन संस्थानों का आकार बढ़ाना और उनकी कार्यक्षमता को और बेहतर बनाना है, ताकि वे बड़े स्तर पर परियोजनाओं को फंडिंग दे सकें।

    हाल ही में PFC के बोर्ड ने REC के साथ मर्जर को सैद्धांतिक मंजूरी भी दे दी है। REC पहले से ही PFC की सब्सिडियरी है और दोनों ही नवरत्नश्रेणी की केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं, जो बिजली क्षेत्र की परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देती हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2019 में PFC ने सरकार से REC में 52.63 प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग 14,500 करोड़ रुपये में खरीदी थी, जिससे उसे प्रबंधन का नियंत्रण मिला था। अब यह कदम वित्तीय संस्थानों के समेकन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

    जब वित्त मंत्री से पूछा गया कि क्या यह कमिटी भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मर्जर की भी सिफारिश कर सकती है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पहल को केवल मर्जर के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सेक्टर को इतना बड़ा और मजबूत बनाना है कि वह विकसित भारत की वित्तीय जरूरतों को आसानी से पूरा कर सके।

    उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मंत्रालय के भीतर इस दिशा में काफी काम पहले से चल रहा है और कई विचार सामने आ चुके हैं। अब यह कमिटी उन सभी पहलुओं का गहराई से अध्ययन कर आगे की रणनीति तय करेगी। माना जा रहा है कि बैंकिंग सेक्टर पहले से ही अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में है, ऐसे में यह सही समय है जब इसे अगले स्तर पर ले जाने की योजना बनाई जाए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, डिजिटल इकोनॉमी, मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप सेक्टर में पूंजी की मांग लगातार बढ़ेगी। ऐसे में बैंकिंग सिस्टम की क्षमता बढ़ाना समय की जरूरत है।

    हाई-लेवल कमिटी का गठन इसी सोच के साथ किया जा रहा है, ताकि बैंकिंग सेक्टर केवल पारंपरिक सेवाओं तक सीमित न रहे, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति का मुख्य इंजन बन सके। यह कमिटी इस बात पर भी ध्यान देगी कि वित्तीय स्थिरता बनी रहे और बैंकिंग सेवाओं का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।

  • शेयर बाजारों में गिरावट सेंसेक्स 250 अंक टूटा; निफ्टी भी गिरकर बंद हुआ

    शेयर बाजारों में गिरावट सेंसेक्स 250 अंक टूटा; निफ्टी भी गिरकर बंद हुआ


    नई दिल्ली । मंगलवार को शेयर बाजारों में गिरावट का रुख देखा गया। विदेशों से मिले मिश्रित संकेतों और घरेलू स्तर पर निवेशकों के बीच सतर्कता की भावना ने बाजार को दबाव में डाला। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 250.48 अंक यानी 0.30 प्रतिशत गिरकर 83 627.69 अंक पर बंद हुआ। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी-50 सूचकांक भी 57.95 अंक यानी 0.22 प्रतिशत गिरकर 25, 732.30 अंक पर रहा विदेशी बाजारों से मिले संकेतों में मिश्रित रुझान देखे गए जिससे घरेलू निवेशकों ने सतर्कता बरती। एशियाई और यूरोपीय बाजारों में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई जो भारतीय बाजारों पर असर डालने का कारण बनी। इसके अलावा घरेलू स्तर पर भी कुछ प्रमुख कंपनियों के तिमाही परिणामों को लेकर निवेशकों के बीच अनिश्चितता बनी रही जिससे बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ा।
    इस गिरावट के बावजूद विश्लेषकों का मानना है कि यह कोई लंबी अवधि की मंदी नहीं है। वे मानते हैं कि आगामी दिनों में बाजार में पुनः सुधार की संभावना हो सकती है खासकर अगर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियाँ बेहतर होती हैं। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे अपनी पोर्टफोलियो को सावधानीपूर्वक देखें और लंबी अवधि के लिए निवेश करें। वहीं कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी पहलू मजबूत हैं और आने वाले समय में सकारात्मक रुझान दिख सकते हैं। सरकार के आर्थिक सुधारों और कॉरपोरेट क्षेत्र में संभावित वृद्धि को ध्यान में रखते हुए बाजार में भी सुधार की उम्मीद है। हालांकि फिलहाल बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहेगा और निवेशकों को सतर्क रहना होगा।
    इसी के साथ मंगलवार को मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी हल्की गिरावट आई। मिडकैप इंडेक्स में 0.32 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.25 प्रतिशत की गिरावट आई। बैंकों और वित्तीय कंपनियों के शेयरों में भी दबाव देखा गया जबकि ऊर्जा और कच्चे तेल से संबंधित कंपनियों में कुछ राहत मिली। कुल मिलाकर मंगलवार का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजारों के लिए नकारात्मक रहा हालांकि आने वाले दिनों में कुछ सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे बाजार की मौजूदा स्थिति को समझते हुए अपने निवेश निर्णय लें और लघु अवधि के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए धैर्य रखें।