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  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से रात 8 बजे मिलेंगे INDIA ब्लॉक के 10 सांसद, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त पर रखेंगे अपना पक्ष

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से रात 8 बजे मिलेंगे INDIA ब्लॉक के 10 सांसद, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त पर रखेंगे अपना पक्ष

    नई दिल्ली । मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक के प्रतिनिधिमंडल को शुक्रवार, 9 अक्टूबर की रात 8 बजे मुलाकात का समय दिया है। विपक्षी सांसद इस बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में संशोधन और मतदाताओं के नाम हटाए जाने से जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंताएं राष्ट्रपति के सामने रखेंगे। दिल्ली में पिछले चार दिनों से विपक्षी दलों का प्रदर्शन जारी है।

    मुलाकात के लिए शुरुआत में 15 सांसदों के प्रतिनिधिमंडल का समय मांगा गया था, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति से मिलने के लिए 10 सांसदों को समय दिया गया है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बताया कि राष्ट्रपति से मुलाकात का पहला अनुरोध 2 अक्टूबर को भेजा गया था। विपक्षी दल चाहते हैं कि SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े सवालों पर राष्ट्रपति को अपनी बात बताई जाए। शुक्रवार रात होने वाली बैठक में प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों और चिंताओं को सामने रखेगा।

    INDIA ब्लॉक के दल SIR प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि मतदाता सूची में संशोधन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए हैं, जिससे उनके मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची में किए गए बदलावों और नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ भाजपा ने चुनावी प्रक्रिया में पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है।

    विपक्ष का प्रदर्शन 6 अक्टूबर को उस समय तेज हुआ, जब INDIA ब्लॉक के सांसदों ने चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च करने की कोशिश की। पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें आगे बढ़ने से रोका। इस दौरान राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसदों को हिरासत में लिया गया। अगले दिन, 7 अक्टूबर को भी सांसदों ने विरोध प्रदर्शन जारी रखा और जंतर-मंतर की ओर बढ़ने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें आगे जाने से रोक दिया। इन घटनाओं के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारी सांसदों के बीच तनाव की स्थिति बनी।

    8 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं ने राजघाट पर प्रदर्शन किया और महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान भी SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दे उठाए गए। प्रदर्शन के साथ-साथ विपक्षी दलों के नेताओं ने अपनी आगे की रणनीति पर भी चर्चा की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने लगातार दो दिनों तक विपक्षी सांसदों के लिए दिल्ली में दोपहर के भोजन की बैठक आयोजित की। 7 अक्टूबर को सांसद जनपथ स्थित सागर रत्ना रेस्टोरेंट में जुटे, जबकि 8 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के मोएट्स रेस्टोरेंट में बैठक हुई। इन बैठकों के बाद सांसद प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे।

    7 अक्टूबर की बैठक में समाजवादी पार्टी के सांसद शामिल नहीं हुए थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सपा की ओर से समय पर सूचना नहीं मिलने की बात कही गई थी। कांग्रेस ने कहा था कि सभी विपक्षी दलों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन कम समय मिलने के कारण कुछ दल अपने प्रतिनिधि नहीं भेज सके। अगले दिन समाजवादी पार्टी के सांसद भी बैठक और प्रदर्शन में शामिल हुए।

    प्रदर्शन के दौरान पुलिस और विपक्षी सांसदों के बीच हुए टकराव से जुड़े मामलों में प्राथमिकी दर्ज किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। इनमें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कुछ नेताओं पर पुलिसकर्मियों के साथ कथित मारपीट और सरकारी कामकाज में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए हैं। इन मामलों की जांच जारी है। प्राथमिकी दर्ज होना आरोपों के साबित होने का प्रमाण नहीं है। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ होने वाली बैठक पर नजरें टिकी हैं। विपक्षी सांसदों की कोशिश होगी कि वे मतदाता सूची, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े अपने सवाल राष्ट्रपति के समक्ष रखें।

  • चुनाव आयोग से मुलाकात पर EC का बयान, बोला- किसी दल से मिलने में आपत्ति नहीं, तय प्रक्रिया के तहत मांगा जाए समय

    चुनाव आयोग से मुलाकात पर EC का बयान, बोला- किसी दल से मिलने में आपत्ति नहीं, तय प्रक्रिया के तहत मांगा जाए समय

    नई दिल्ली । चुनाव आयोग और विपक्षी नेताओं के बीच मुलाकात को लेकर मंगलवार को गतिरोध की स्थिति बनी रही। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और चुनाव आयोग से मुलाकात कर अपनी बात रखने की मांग कर रहे थे। इसी बीच चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि उसे किसी भी राजनीतिक दल के सदस्यों से मिलने में कोई आपत्ति नहीं है। आयोग के मुताबिक, राजनीतिक दलों के साथ बैठक के लिए वर्ष 2025 में एक निर्धारित प्रक्रिया और प्रोटोकॉल बनाया गया है, जिसके तहत बैठक के लिए पहले समय मांगा जाना और उसका उद्देश्य बताना जरूरी है।

    आयोग ने कहा कि मंगलवार शाम चार बजे तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से बैठक के लिए समय नहीं मांगा था। आयोग के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान उसे जानकारी मिली थी कि कुछ सांसद चुनाव आयोग से मिलना चाहते हैं। इसके बाद करीब चार बजे दिल्ली पुलिस के माध्यम से सूचना मिली कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल आयोग से मिलकर ज्ञापन सौंपना चाहता है। आयोग ने इस अनुरोध पर विचार किया।

    चुनाव आयोग के मुताबिक, वर्ष 2025 में राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधिमंडलों के साथ बैठक के लिए प्रक्रिया तय की गई थी। इसके अनुसार किसी राजनीतिक दल या कई दलों के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल को आयोग से मिलने के लिए उसके अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए समय लेना होता है। बैठक का समय दोनों पक्षों की सहमति से तय किया जाता है। आयोग ने कहा कि यह नियमित प्रक्रिया है और सभी राजनीतिक दलों को इसके बारे में जानकारी दी गई है।

    आयोग ने बताया कि राहुल गांधी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल के संबंध में बाद में दिल्ली पुलिस की ओर से जानकारी दी गई कि करीब 240 सांसद बैठक करना चाहते हैं। आयोग के अनुसार, प्रस्तावित बैठक का स्थान संसद भवन एनेक्सी बताया गया। यह व्यवस्था तय प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं थी, क्योंकि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों के साथ बैठक के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी है। आयोग ने इस अनुरोध को असामान्य मानते हुए स्वीकार नहीं किया।

    इसके साथ ही चुनाव आयोग ने सांसदों का ज्ञापन लेने के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था भी सुझाई। आयोग की ओर से कहा गया कि उसका सबसे वरिष्ठ अधिकारी बैठक स्थल पर जाकर सांसदों से ज्ञापन प्राप्त कर सकता है। हालांकि, प्रदर्शनकारी सांसदों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि वह राजनीतिक दलों के साथ बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन बैठक निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए।

    विपक्षी नेताओं का कहना था कि वे चुनाव आयोग से मिलकर अपनी बात रखना चाहते हैं और जब तक मुलाकात के लिए बुलावा नहीं आता, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा। दूसरी ओर आयोग ने बैठक के लिए औपचारिक प्रक्रिया और तय प्रोटोकॉल का हवाला दिया। इस घटनाक्रम में मुख्य विवाद बैठक की इच्छा को लेकर नहीं, बल्कि समय मांगने की प्रक्रिया और प्रस्तावित बैठक स्थल को लेकर सामने आया। आयोग ने दोहराया कि किसी भी राजनीतिक दल से मुलाकात पर उसे कोई आपत्ति नहीं है और तय नियमों के तहत बैठक का अनुरोध किया जा सकता है।

  • ज्ञानेश कुमार 10 अक्टूबर से पहले दे सकते हैं इस्तीफा? सौरभ भारद्वाज के दावे से चुनाव आयोग और SIR विवाद पर बढ़ी सियासी हलचल

    ज्ञानेश कुमार 10 अक्टूबर से पहले दे सकते हैं इस्तीफा? सौरभ भारद्वाज के दावे से चुनाव आयोग और SIR विवाद पर बढ़ी सियासी हलचल


    नई दिल्ली ।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने दावा किया है कि उनके पास मौजूद जानकारी के अनुसार ज्ञानेश कुमार 10 अक्टूबर से पहले अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। हालांकि, यह अभी केवल भारद्वाज का दावा है और इस संबंध में चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    सौरभ भारद्वाज ने अपने सूत्रों के हवाले से यह दावा किया है। उनके मुताबिक, उन्हें जानकारी मिली है कि मुख्य चुनाव आयुक्त 10 अक्टूबर से पहले अपने पद से हट सकते हैं। इस दावे के बाद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। भारद्वाज की ओर से अपने दावे के समर्थन में इससे अधिक जानकारी नहीं दी गई है।

    जिस 10 अक्टूबर की तारीख का जिक्र सौरभ भारद्वाज ने किया है, उसी दिन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया है। पार्टी लंबे समय से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाती रही है। सीजेपी की ओर से ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR पर रोक की मांग की जा रही है। पार्टी का कहना है कि इन मुद्दों के समाधान के बिना चुनाव व्यवस्था को लेकर सवाल बने रहेंगे।

    मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विवाद में SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का मुद्दा भी प्रमुख है। बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में विपक्षी दल SIR की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने के दौरान गड़बड़ी की आशंका है। वहीं, आयोग अपनी तय प्रक्रिया का हवाला देता रहा है।

    इसी विवाद के बीच चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर भी सवाल उठे हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों के दौरान 14 मौकों पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की राय ज्ञानेश कुमार से अलग रही। इस दावे को लेकर चुनाव आयोग के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर चर्चा तेज हुई है।

    सीजेपी ने चुनाव आयुक्तों के बीच कथित मतभेद के मुद्दे को भी गंभीर बताया है। पार्टी ने इस मामले में जांच की मांग की है और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई है। वहीं, SIR को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं और मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ी को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच सौरभ भारद्वाज का 10 अक्टूबर से पहले ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का दावा सामने आया है। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि मुख्य चुनाव आयुक्त वास्तव में अपने पद से इस्तीफा देंगे या नहीं। चुनाव आयोग की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में फिलहाल इस्तीफे की बात सौरभ भारद्वाज के दावे तक ही सीमित है।

    10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन और SIR को लेकर जारी विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे से जुड़ा यह दावा राजनीतिक चर्चा का नया मुद्दा बन गया है। इस मामले में आगे की स्थिति ज्ञानेश कुमार के किसी आधिकारिक निर्णय या चुनाव आयोग की ओर से सामने आने वाली जानकारी से स्पष्ट होगी।

  • राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार पर हमला, बोले- हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय; चुनाव आयोग के बाहर विपक्ष का धरना

    राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार पर हमला, बोले- हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय; चुनाव आयोग के बाहर विपक्ष का धरना

    नई दिल्ली। विपक्षी गठबंधन के सांसदों ने मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे समेत अन्य मांगों को लेकर संसद भवन परिसर से चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के सांसद चुनाव आयोग मुख्यालय, निर्वाचन सदन की तरफ बढ़े, लेकिन पुलिस ने उन्हें पार्लियामेंट स्ट्रीट पर रोक दिया। इसके बाद सांसद वहीं सड़क पर बैठ गए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर धरना शुरू कर दिया। सांसदों को नीति आयोग कार्यालय के सामने रोका गया, जो नीति आयोग और आकाशवाणी भवन के बीच चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित है।

    प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के आरएसएस यूनिफॉर्म वाले कटआउट लिए और नारे लगाए। इनमें ‘बीजेपी है सीईसी है’, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ और ‘डेमोक्रेसी बिकाऊ नहीं है’ जैसे नारे शामिल थे। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ज्ञानेश कुमार को संबोधित करते हुए लिखा, ‘ज्ञानेश, यह हो गया भाई। इस्तीफा देने का समय आ गया है।’ मार्च में तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ ब्रायन, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और सीपीआई (एम) नेता जॉन ब्रिटास समेत कई सांसद शामिल हुए। सांसदों के पहुंचने से काफी पहले संसद और चुनाव आयोग मुख्यालय के अंदर तथा आसपास भारी सुरक्षा तैनात कर दी गई थी और बैरिकेडिंग की गई थी।

    मार्च से पहले विपक्षी सांसदों ने सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज की। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आरोप लगाया कि कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के प्रति लोगों का भरोसा कम हुआ है। उन्होंने कहा कि जिस संस्था पर पूरा देश भरोसा करता है और गर्व महसूस करता है, उसकी निष्पक्षता पर पहले कभी सवाल नहीं उठाए गए, लेकिन एक व्यक्ति ने उस भरोसे को तोड़ दिया है। उन्होंने एक पूरे नेक्सस के साथ काम करने का भी आरोप लगाया और कहा कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार से सवाल करेगा और बीजेपी के मुख्यमंत्री जवाब देना शुरू करेंगे।

    सीपीआई सांसद पी संदोष कुमार ने कहा कि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से वोटर रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दौरान फॉर्म 6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को लेकर विपक्ष की आपत्तियां मजबूत हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 26 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि फॉर्म 6 से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है, जबकि उनके मुताबिक यह बयान गुमराह करने वाला साबित हुआ है। सीपीआई नेता ने सीईसी को ‘धोखेबाज चुनाव कमिश्नर’ कहा और दावा किया कि विपक्षी पार्टियां 2025 से इन नियमों के खिलाफ आंदोलन कर रही हैं तथा अपना आंदोलन और तेज करेंगी।

    शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने भी मार्च से पहले बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सांसद शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहते थे और वे देश के नागरिक होने के साथ संसद के सदस्य भी हैं। राउत ने सवाल किया कि उन्हें रोकने के लिए इतनी बड़ी फोर्स की क्या जरूरत है और कहा कि उनके पास हथियार नहीं हैं। उन्होंने बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स और सीआईएसएफ के जवानों की तैनाती तथा मंत्रियों के घरों के बाहर सुरक्षा बढ़ाए जाने का दावा किया। राउत ने फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट की स्थिति को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सीईसी को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि उसने फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए वर्जन को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह पता लगाने के लिए चुनाव आयोग के रिकॉर्ड की जांच करने की बात कही कि क्या बदलाव किए गए थे और उन्हें किसने मंजूरी दी थी। यह टिप्पणी ज्ञानेश कुमार के कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई। 26 सितंबर के बयान में आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। यह विरोध एसआईआर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और तीन सदस्यों वाले आयोग के भीतर मतभेदों की खबरों को लेकर विपक्ष के अभियान के बीच हुआ। चुनाव आयोग ने आयोग में बंटवारे के सुझावों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े फैसले एकमत से लिए गए थे।

  • चुनाव आयोग विवाद पर भाजपा का पलटवार, संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर उठाए सवाल

    चुनाव आयोग विवाद पर भाजपा का पलटवार, संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी ने आयोग का बचाव किया है। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग विषयों पर होने वाली चर्चा और असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

    विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों के बीच पिछले करीब 10 महीनों में 14 मौकों पर आधिकारिक आपत्तियों और पत्राचार की बात सामने आई है। इन मामलों में SIR, नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6, मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में नाम हटाने से संबंधित विषय शामिल बताए गए हैं। आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।

    संबित पात्रा ने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच संवाद और अलग-अलग विचार सामने आना अपने आप में किसी संस्थागत संकट का प्रमाण नहीं है। उनके मुताबिक, किसी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले चर्चा, विचार-विमर्श और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक प्रक्रिया है। भाजपा ने विपक्ष के उस तर्क को भी खारिज किया जिसमें आयोग के भीतर मतभेदों को उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल के तौर पर पेश किया जा रहा है।

    भाजपा नेता ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनावी राजनीति में अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद विपक्षी दल लगातार संवैधानिक संस्थाओं को विवाद में खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव हारने के बाद संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाना कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक शैली रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप मतदाताओं के जनादेश पर भी सवाल खड़ा करते हैं।

    विवाद के बीच पश्चिम बंगाल की विधानसभा सीटों के आंकड़ों का भी भाजपा ने उल्लेख किया। संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष भाजपा पर मतदाता सूची में नाम हटाकर चुनावी लाभ लेने का आरोप लगाता है, लेकिन जिन 20 विधानसभा सीटों पर सबसे अधिक मतदाता नाम हटाए जाने की बात सामने आई, उनमें 13 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जबकि भाजपा छह सीटों पर विजयी रही। इन 20 सीटों में एक सीट कांग्रेस के खाते में भी गई।

    भाजपा ने इन आंकड़ों के जरिए विपक्ष के उन आरोपों पर सवाल उठाया जिनमें मतदाता सूची में बदलाव को सीधे भाजपा के चुनावी लाभ से जोड़ने की बात कही जा रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि मतदाता नाम हटाए जाने की प्रक्रिया से भाजपा को सीधा लाभ हुआ होता, तो सबसे अधिक नाम हटने वाली सभी सीटों पर चुनावी परिणाम एक ही दिशा में नहीं होते।

    दूसरी ओर, विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता, मतदाता सूची में बदलाव और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आयोग के भीतर आयुक्तों के बीच हुई आपत्तियों और संवाद को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज है। आयोग की ओर से अपने फैसलों को सामूहिक मंजूरी से लिया गया बताया गया है।

    फिलहाल SIR, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग के भीतर हुई चर्चाओं को लेकर राजनीतिक टकराव जारी है। भाजपा इन घटनाओं को संस्थागत संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है, जबकि विपक्ष इन्हीं घटनाक्रमों के आधार पर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है।

  • दिल्ली SIR में आडवाणी और जयशंकर समेत कई प्रमुख नामों को नोटिस, खरगे ने प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    दिल्ली SIR में आडवाणी और जयशंकर समेत कई प्रमुख नामों को नोटिस, खरगे ने प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल


    नई दिल्ली ।
    दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। इस प्रक्रिया के तहत पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू समेत कई प्रमुख मतदाताओं को विवरणों में विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए गए हैं।

    चुनावी अधिकारियों के अनुसार, दिल्ली में SIR के तहत 33.13 लाख से अधिक मतदाताओं को उनके विवरण में मिली विसंगतियों के संबंध में नोटिस भेजे गए हैं। इनमें कई मामलों में मौजूदा विवरणों का वर्ष 2002 के पिछले गहन पुनरीक्षण के रिकॉर्ड से मेल नहीं होना सामने आया है। नोटिस जारी होने का अर्थ सीधे तौर पर मतदाता सूची से नाम हटाया जाना नहीं है।

    इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। खरगे ने कहा कि बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया अब दिल्ली तक पहुंच गई है और प्रमुख लोगों को नोटिस मिलने के बाद यह स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस इस प्रक्रिया को शुरुआत से ही त्रुटिपूर्ण क्यों बता रही थी।

    खरगे ने SIR को ‘फ्रैंकनस्टीन मॉन्स्टर’ बताते हुए कहा कि जिस प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस पहले से सवाल उठाती रही है, वह अब उन्हीं लोगों को प्रभावित कर रही है, जिनके राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रहे हैं। उन्होंने इस संदर्भ में लालकृष्ण आडवाणी, एस. जयशंकर और अन्य प्रमुख लोगों को मिले नोटिस का उल्लेख किया।

    उन्होंने यह भी कहा कि पहले भारत रत्न से सम्मानित वैज्ञानिक और पूर्व नौसेना प्रमुख जैसे लोगों को भी नोटिस जारी किए जा चुके हैं। खरगे ने सवाल उठाया कि जब प्रमुख लोगों के मतदाता विवरण में भी विसंगतियां पाई जा रही हैं, तो SIR की प्रक्रिया को किस तरह देखा जाना चाहिए।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने चुनाव आयोग की ओर से ‘VIP’ या ‘मार्क्ड’ मतदाताओं के संदर्भ का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि क्या देश की सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार व्यवस्था में अब VIP मतदाता और सामान्य मतदाता जैसी अलग-अलग श्रेणियां बनाई जा रही हैं।

    खरगे ने संविधान में निहित ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या किसी विशेष श्रेणी के मतदाता को अलग महत्व दिया जा सकता है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि सभी नागरिकों का मताधिकार समान है तो मतदाता सूची की जांच और उससे जुड़े संचार में अलग-अलग व्यवहार क्यों दिखाई देता है।

    उन्होंने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों का भी उल्लेख किया। खरगे के मुताबिक, जिन मामलों में अपील पर फैसला हो चुका है, उनमें 93 प्रतिशत मामलों में अपील करने वालों के पक्ष में निर्णय हुआ है। उनके अनुसार, इससे 1,13,943 लोगों के दोबारा मतदाता सूची में शामिल होने का रास्ता साफ हुआ है।

    खरगे ने SIR के पहले तीन चरणों से जुड़े आंकड़ों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13.8 करोड़ मतदाता सूची से बाहर हुए, जो 94.78 करोड़ मतदाताओं की कुल संख्या का लगभग 14.61 प्रतिशत है।

    हालांकि, SIR के तहत नोटिस मिलने को लेकर चुनावी प्रक्रिया में यह स्पष्ट किया गया है कि नोटिस अंतिम कार्रवाई नहीं है। संबंधित मतदाताओं को अपने दस्तावेज और जवाब प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है। दस्तावेजों के सत्यापन और आपत्तियों पर विचार के बाद ही मतदाता सूची में अंतिम निर्णय लिया जाता है।

    दिल्ली में SIR को लेकर जारी यह विवाद अब मतदाता सूची के सत्यापन, दस्तावेजों की जांच, मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे मुद्दों तक पहुंच गया है। एक तरफ कांग्रेस ने प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं, वहीं चुनावी प्रक्रिया के तहत नोटिस को विवरणों के सत्यापन का हिस्सा बताया जा रहा है।

  • बंगाल में SIR से जुड़ी 37 लाख से अधिक अपीलें लंबित, तेजी से निपटारे के लिए 42 चुनाव ट्रिब्यूनल की मांग

    बंगाल में SIR से जुड़ी 37 लाख से अधिक अपीलें लंबित, तेजी से निपटारे के लिए 42 चुनाव ट्रिब्यूनल की मांग

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया के बाद सामने आई अपीलों के निपटारे को लेकर लंबित मामलों की संख्या लगातार बड़ी बनी हुई है। राज्य में SIR से संबंधित कुल 38,20,683 अपीलें दाखिल की गई थीं। इनमें से अब तक करीब 1.02 लाख मामलों का ही निपटारा हो सका है, जबकि 37 लाख से अधिक अपीलें अभी लंबित हैं।

    लंबित मामलों की बड़ी संख्या को देखते हुए इनके निपटारे की गति बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। मौजूदा रफ्तार बनी रहने पर सभी लंबित अपीलों के निपटारे में लंबा समय लगने का अनुमान सामने आया है। इसी को ध्यान में रखते हुए चुनाव संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है।

    वर्तमान में पश्चिम बंगाल में इन अपीलों की सुनवाई के लिए 19 ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं। प्रस्ताव के अनुसार इनकी संख्या बढ़ाकर 42 किए जाने की जरूरत बताई गई है। इसका उद्देश्य लंबित मामलों की सुनवाई को तेज करना और बड़ी संख्या में जमा अपीलों का समयबद्ध तरीके से निपटारा करना है।

    लंबित अपीलों में बड़ी संख्या उन मामलों की है, जिनमें SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 22 लाख से अधिक अपीलें ऐसे मतदाताओं की ओर से दाखिल की गई हैं, जिनके नाम सूची से हटा दिए गए थे। इसके अलावा करीब 16 लाख अपीलें ऐसी हैं, जिनमें SIR के बाद मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने को चुनौती दी गई है।

    आंकड़ों के मुताबिक ट्रिब्यूनल के सामने पहुंची करीब 38 लाख अपीलों में 57 प्रतिशत से अधिक मामले मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़े हैं। इससे स्पष्ट है कि लंबित मामलों का बड़ा हिस्सा मतदाता सूची में नाम हटने से संबंधित विवादों से जुड़ा हुआ है।

    ट्रिब्यूनल की संख्या 42 करने के प्रस्ताव के पीछे एक प्रमुख आधार राज्य के संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या भी है। पश्चिम बंगाल में कुल 42 लोकसभा क्षेत्र हैं। प्रस्ताव के अनुसार प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के अनुरूप एक ट्रिब्यूनल होने से मामलों की सुनवाई और निपटारे की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित किया जा सकता है।

    SIR के बाद मतदाता सूची में नामों को लेकर दाखिल हुई अपीलों का निपटारा चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण है। बड़ी संख्या में लंबित मामलों के कारण सुनवाई की प्रक्रिया पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में अतिरिक्त ट्रिब्यूनल गठित करने का प्रस्ताव लंबित अपीलों के बोझ को कम करने और सुनवाई की गति बढ़ाने से जुड़ा है।

    यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चल रही SIR संबंधी कार्यवाही के संदर्भ में सामने आया है। लंबित अपीलों की संख्या, मौजूदा ट्रिब्यूनलों की क्षमता और मामलों के निपटारे की गति को देखते हुए संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। अब इस दिशा में आगे की प्रक्रिया और अदालत के समक्ष प्रस्ताव पर होने वाली कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।

  • TMC Symbol Row: उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग ने दोनों गुटों की दलीलें सुनीं, 16 सितंबर से पहले निर्णय की तैयारी

    TMC Symbol Row: उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग ने दोनों गुटों की दलीलें सुनीं, 16 सितंबर से पहले निर्णय की तैयारी

    नई दिल्ली ।तृणमूल कांग्रेस के नाम, लोगो और चुनाव चिह्न को लेकर ममता बनर्जी गुट और बागी गुट के बीच चल रही खींचतान के बीच चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों से चर्चा की। आयोग ने दोनों गुटों के पांच-पांच सदस्यों वाले प्रतिनिधिमंडल को दिल्ली बुलाया था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आयोग पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े दावों पर निर्णय ले सकता है।

    दोनों प्रतिनिधिमंडलों के साथ बैठक राष्ट्रीय राजधानी स्थित इंडिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन मैनेजमेंट में हुई। बागी गुट के प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई ऋतब्रत बनर्जी ने की। इस गुट के साथ बैठक का समय शनिवार सुबह 11 बजे निर्धारित किया गया था। वहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के प्रतिनिधिमंडल के साथ दोपहर 12 बजे चर्चा का समय तय किया गया।

    चुनाव आयोग के सचिव अश्वनी कुमार मोहल ने 9 सितंबर को दोनों गुटों को बैठक के लिए संदेश भेजा था। बैठक के लिए भेजे गए संदेश में मुलाकात के एजेंडे का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। हालांकि, बैठक का मुख्य विषय दोनों पक्षों के पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर किए जा रहे दावों से संबंधित बताया गया।

    आयोग दोनों गुटों की ओर से प्रस्तुत किए गए तर्कों को सुनने के बाद इस संबंध में आगे का निर्णय ले सकता है। पार्टी के नाम, लोगो और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों पक्षों के दावों के बीच चुनाव आयोग की यह बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा उपचुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है।

    पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों नंदीग्राम और रेजिनगर में 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। नंदीग्राम पूर्वी मिदनापुर जिले में स्थित है। इन दोनों सीटों पर उपचुनाव के लिए आचार संहिता लागू हो चुकी है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर निर्धारित है।

    ऐसे में चुनाव आयोग को उपचुनाव की अंतिम नामांकन तारीख से पहले पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े मामले पर फैसला लेना होगा। दोनों गुटों के दावों को लेकर आयोग की ओर से होने वाला निर्णय आगामी चुनाव प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा।

    उपचुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां भी आगे बढ़ रही हैं। कांग्रेस ने नंदीग्राम और रेजिनगर दोनों विधानसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। वहीं हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने रेजिनगर विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी घोषित किया है।

    टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों पक्षों के बीच जारी विवाद के बीच आयोग की ओर से प्रतिनिधिमंडलों को अलग-अलग समय पर बुलाकर उनकी बात सुनी गई। अब दोनों पक्षों के दावों और उनके पक्ष में दिए गए तर्कों पर विचार करने के बाद चुनाव आयोग को अपना निर्णय लेना है।

    इस पूरे मामले में 16 सितंबर की नामांकन अंतिम तारीख महत्वपूर्ण है। इसके बाद 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है। इसलिए चुनाव आयोग के फैसले का सीधा संबंध आगामी उपचुनाव की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है।

  • राघव चड्ढा और AAP में वोटर लिस्ट विवाद, दिल्ली में नाम जुड़ने पर चड्ढा ने तंज के साथ आरोपों का दिया जवाब

    राघव चड्ढा और AAP में वोटर लिस्ट विवाद, दिल्ली में नाम जुड़ने पर चड्ढा ने तंज के साथ आरोपों का दिया जवाब

    नई दिल्ली ।पंजाब की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम हटने और दिल्ली की मतदाता सूची में नाम जुड़ने को लेकर बीजेपी सांसद राघव चड्ढा और आम आदमी पार्टी के बीच विवाद बढ़ गया है। आम आदमी पार्टी की ओर से सवाल उठाए जाने के बाद चड्ढा ने पलटवार करते हुए पार्टी पर तीखा तंज कसा। उन्होंने कहा कि AAP की हालत ऐसी हो गई है कि उन्हें सपने में भी वह भूत की तरह नजर आते हैं और पार्टी लगातार उनके नाम का जिक्र करती रहती है।

    राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी की स्थिति की तुलना एक ऐसी एक्स गर्लफ्रेंड से की, जिसे उसका बॉयफ्रेंड छोड़कर आगे बढ़ चुका है, लेकिन वह अब भी उसके प्यार में है। इसी दौरान उन्होंने तंज करते हुए कहा कि उन्हें डर है कि कहीं कोई दिलजला आशिक की तरह उनकी याद में अपनी नसें न काट ले। चड्ढा ने कहा कि उन्हें आम आदमी पार्टी की चिंता रहती है।

    दरअसल, पंजाब की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से अपना नाम गायब होने के बाद राघव चड्ढा ने नाराजगी जताई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि पंजाब की AAP सरकार ने राजनीतिक विद्वेष के कारण उनका नाम वोटर लिस्ट में शिफ्टेड कैटेगरी में डाल दिया। चड्ढा का कहना था कि पार्टी छोड़ने के बाद से AAP उन्हें लगातार निशाना बना रही है।

    चड्ढा ने यह भी कहा था कि ऐसा लगता है कि वह अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को परेशान कर रहे हैं। उनके मुताबिक पार्टी के लोग दिन-रात उनके बारे में सोच रहे हैं और उन पर हमला करने की कोशिश कर रहे हैं।

    इसके बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की वोटर लिस्ट में राघव चड्ढा का नाम जुड़ने को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। AAP की दिल्ली इकाई के प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने कहा कि 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में राजिंदर नगर के संबंधित पोलिंग पार्ट में 746 मतदाता थे। बाद में राघव चड्ढा का नाम 747वें मतदाता के रूप में जुड़ा।

    सौरभ भारद्वाज के अनुसार राजिंदर नगर की मतदाता सूची में सीरियल नंबर 747 पर राघव चड्ढा, पिता सुनील चड्ढा और उम्र 37 साल दर्ज है। उन्होंने चड्ढा के तीन सितंबर के बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने पंजाब में दोबारा मतदाता के तौर पर पंजीकरण कराने की बात कही थी। भारद्वाज ने चुनाव आयोग से पूछा कि जब ड्राफ्ट सूची में 746 नाम थे तो 747वां नाम किस प्रक्रिया के तहत जोड़ा गया।

    AAP प्रवक्ता अनुराग ढांडा ने भी इस मामले में राघव चड्ढा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक चड्ढा ने 26 अगस्त को दिल्ली में वोट बनवाने के लिए फॉर्म-6 दाखिल किया था और दो सितंबर को उनका आवेदन मंजूर हो गया। ढांडा ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद तीन सितंबर को चड्ढा पंजाब सरकार पर उनका वोट कटवाने का आरोप लगा रहे थे।

    राघव चड्ढा ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया और कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग की सभी लागू गाइडलाइंस और तय प्रक्रिया का पालन किया है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने भी स्पष्ट किया कि उनका नाम नियमों के तहत जोड़ा गया। कार्यालय के मुताबिक 26 अगस्त को फॉर्म-6 के जरिए आवेदन किया गया था और सात दिन की अनिवार्य नोटिस अवधि पूरी होने के बाद दो सितंबर को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी ने आवेदन मंजूर किया।

    मुख्य निर्वाचन कार्यालय के अनुसार आवेदन मंजूर होने के बाद संबंधित नाम मसौदा मतदाता सूची की अंतिम क्रम संख्या के बाद डेटाबेस में दिखाई देता है। अंतिम मतदाता सूची पुनरीक्षण अवधि पूरी होने और सभी दावों तथा आपत्तियों के निपटारे के बाद प्रकाशित की जाएगी।

  • चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    नई दिल्ली । मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और अदालत के बीच महत्वपूर्ण बहस हुई। केंद्र सरकार ने चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार के प्रतिनिधियों पर विश्वास किया जाना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर भरोसे या अविश्वास का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया में न्याय, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का है।

    केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी को लेकर संदेह करना उचित नहीं है। सरकार ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य किसी गलत उद्देश्य से काम करेंगे। केंद्र का तर्क था कि चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना संसद की समझ और उसके बनाए कानून पर भी सवाल खड़ा करता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति की नीयत पर सवाल उठाना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे जनता के बीच निष्पक्षता और स्वतंत्रता का भरोसा कायम रहे। कोर्ट ने कहा कि चर्चा किसी व्यक्ति विशेष के विश्वास की नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था में निष्पक्षता दिखाई देने की है।

    केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किए जाने के तर्क पर भी सवाल उठाया। सरकार ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के निर्णय पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर अन्य संवैधानिक नियुक्तियों में भी बाहरी व्यक्तियों या पूर्व न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग उठ सकती है।

    वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2023 में बनाए गए कानून ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पुराने फैसले के प्रभाव को बदल दिया है। संविधान पीठ ने अपने एक फैसले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था सुझाई थी।

    इसके बाद संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया। याचिकाओं में इसी बदलाव को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।

    चुनाव आयोग देश में चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। ऐसे में उसके प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर होने वाली बहस का संबंध केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता के विश्वास से भी जुड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। अब आगे की सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया संवैधानिक सिद्धांतों और निष्पक्ष व्यवस्था के अनुरूप है या नहीं। इस मामले के फैसले का असर भविष्य में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।