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  • ऊर्जा सुरक्षा की नई राह सागर अदाणी बोले तेज विद्युतीकरण ही भारत के आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत

    ऊर्जा सुरक्षा की नई राह सागर अदाणी बोले तेज विद्युतीकरण ही भारत के आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत


    नई दिल्ली । ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अब तेजी से विद्युतीकरण सबसे प्रभावी समाधान बनकर उभर रहा है। अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सागर अदाणी ने कहा कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो भरोसेमंद किफायती और चौबीसों घंटे स्वच्छ बिजली उपलब्ध करा सके। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा के साथ आधुनिक ऊर्जा भंडारण तकनीकों का विस्तार बेहद जरूरी है।

    लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के दौरान आयोजित अदाणी ग्रीन एनर्जी डायलॉग में सागर अदाणी ने कहा कि दुनिया के सामने ऊर्जा सुरक्षा वहनीयता और पर्यावरण संरक्षण जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। इन तीनों समस्याओं का सबसे मजबूत समाधान तेजी से बढ़ता विद्युतीकरण है। उनका कहना था कि जो देश दीर्घकालिक आर्थिक विकास और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं उन्हें अब इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे।

    उन्होंने बताया कि केवल सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन पर्याप्त नहीं है बल्कि इन्हें बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम और पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ना भी आवश्यक है। इससे स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता हर समय सुनिश्चित की जा सकती है और बिजली आपूर्ति अधिक स्थिर तथा विश्वसनीय बनती है।

    सागर अदाणी ने कहा कि अदाणी ग्रीन इसी सोच के साथ वर्ष 2030 तक 50 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रही है। गुजरात के खावड़ा में दुनिया का सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा पार्क विकसित किया जा रहा है जहां बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण तकनीकों को भी शामिल किया जा रहा है। इससे भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।

    इस कार्यक्रम में दुनिया भर के नीति निर्माता निवेशक उद्योग विशेषज्ञ और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन को तेज करने के लिए निवेश नई नीतियों और मजबूत बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाकर ही कम कार्बन अर्थव्यवस्था की दिशा में तेज बदलाव संभव होगा।

    एनर्जी ट्रांजिशन्स कमीशन के सह अध्यक्ष लॉर्ड अडेयर टर्नर ने कहा कि यदि दुनिया को शून्य उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था बनानी है तो बिजली उत्पादन को अधिकतम स्तर तक स्वच्छ और कार्बन मुक्त बनाना होगा। उन्होंने कहा कि सड़क परिवहन भवनों की ऊर्जा जरूरतों और औद्योगिक क्षेत्रों में विद्युतीकरण अब आर्थिक रूप से भी लाभदायक साबित हो रहा है।

    अदाणी समूह आने वाले वर्षों में ऊर्जा परिवर्तन और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 100 अरब डॉलर से अधिक निवेश करने की योजना पर काम कर रहा है। समूह ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा भंडारण ट्रांसमिशन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक औद्योगिक तकनीकों में भी निवेश बढ़ा रहा है। हाल ही में समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी ने भी परमाणु ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण को मिलाकर विविध ऊर्जा पोर्टफोलियो विकसित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। उनका मानना है कि यही मॉडल भविष्य में भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित किफायती और पर्यावरण अनुकूल तरीके से पूरा करेगा।

  • 2030 तक 50 गीगावाट का लक्ष्य: स्वच्छ ऊर्जा और स्टोरेज से बदलेगा भविष्य, सागर अदाणी का बड़ा विजन

    2030 तक 50 गीगावाट का लक्ष्य: स्वच्छ ऊर्जा और स्टोरेज से बदलेगा भविष्य, सागर अदाणी का बड़ा विजन


    नई दिल्ली । ऊर्जा सुरक्षा और सतत आर्थिक विकास आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं। ऐसे समय में स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक तकनीकों पर आधारित ऊर्जा व्यवस्था भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत बनती जा रही है। इसी दिशा में अदाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सागर अदाणी ने कहा है कि तेजी से बढ़ता विद्युतीकरण ही ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और आर्थिक विकास को नई गति देने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उनका मानना है कि नवीकरणीय ऊर्जा को आधुनिक ऊर्जा भंडारण तकनीकों के साथ जोड़कर ही चौबीसों घंटे भरोसेमंद और किफायती स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है।

    लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के दौरान लंदन के साइंस म्यूजियम में आयोजित पहले अदाणी ग्रीन एनर्जी डायलॉग में सागर अदाणी ने वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा, ऊर्जा की किफायत और पर्यावरणीय स्थिरता तीनों चुनौतियों का समाधान बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण के जरिए संभव है। जो देश मजबूत अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहते हैं उनके लिए यह अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।

    सागर अदाणी ने कहा कि केवल सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन पर्याप्त नहीं है। इन स्रोतों को बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम और पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ना बेहद जरूरी है। इससे स्वच्छ ऊर्जा को लगातार और भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध कराया जा सकता है। उन्होंने बताया कि अदाणी ग्रीन एनर्जी वर्ष 2030 तक 50 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रही है। गुजरात के खावड़ा में विकसित हो रहा विशाल नवीकरणीय ऊर्जा पार्क इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है जहां बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण सुविधाओं को भी शामिल किया जा रहा है।

    इस अंतरराष्ट्रीय संवाद में नीति निर्माता, निवेशक, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और जलवायु विशेषज्ञ शामिल हुए। सभी ने इस बात पर जोर दिया कि ऊर्जा परिवर्तन को गति देने के लिए मजबूत नीतियों, आधुनिक बुनियादी ढांचे और बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। कार्यक्रम में यह भी रेखांकित किया गया कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए देशों के बीच सहयोग और तकनीकी साझेदारी बेहद महत्वपूर्ण है।

    एनर्जी ट्रांजिशन्स कमीशन के सह-अध्यक्ष लॉर्ड अडेयर टर्नर ने कहा कि यदि दुनिया को शून्य उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है तो बिजली आधारित व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी। उनके अनुसार सड़क परिवहन, भवनों की हीटिंग और औद्योगिक प्रक्रियाओं में विद्युतीकरण पहले से ही आर्थिक रूप से लाभदायक साबित हो रहा है। वहीं नई तकनीकों की मदद से भारी उद्योगों में भी स्वच्छ बिजली का उपयोग तेजी से बढ़ाया जा सकता है।

    एम्बिशन लूप के सह-संस्थापक और यूके क्लाइमेट चेंज कमेटी के अध्यक्ष नाइजेल टॉपिंग ने कहा कि बिजली उत्पादन को कार्बन मुक्त बनाने के साथ-साथ उन क्षेत्रों का भी तेजी से विद्युतीकरण करना होगा जो अभी तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक बिजली ग्रिड और घटती तकनीकी लागत बड़े निवेश आकर्षित करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    अदाणी समूह ऊर्जा परिवर्तन और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 100 अरब डॉलर से अधिक निवेश करने की प्रतिबद्धता जता चुका है। समूह नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण, बिजली ट्रांसमिशन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और नई औद्योगिक तकनीकों में लगातार निवेश कर रहा है। हाल ही में समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी ने भी विविध ऊर्जा पोर्टफोलियो विकसित करने और 10 गीगावाट तक परमाणु ऊर्जा क्षमता स्थापित करने की योजना की घोषणा करते हुए भरोसेमंद और कम कार्बन ऊर्जा भविष्य की दिशा में समूह की दीर्घकालिक रणनीति को दोहराया।

  • ट्रंप के दबाव का भारत ने दिया रणनीतिक जवाब: दुनिया भर में बनाए नए साझेदार, घटाई निर्भरता

    ट्रंप के दबाव का भारत ने दिया रणनीतिक जवाब: दुनिया भर में बनाए नए साझेदार, घटाई निर्भरता


    नई दिल्ली । वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के तेजी से बदलते परिदृश्य में भारत ने अपनी विदेश और आर्थिक नीति को नई दिशा देते हुए एक ऐसी रणनीति अपनाई है जिसने उसे अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं के बीच भी मजबूत स्थिति में बनाए रखा है। अमेरिका की बदलती नीतियों, व्यापारिक दबावों और वैश्विक संघर्षों के दौर में भारत ने किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय विविधीकरण यानी डायवर्सिफिकेशन को अपनी रणनीति का प्रमुख आधार बनाया है।

    अमेरिका लंबे समय से भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई ऐसे फैसले सामने आए जिन्होंने भारतीय हितों को प्रभावित किया। एच-1बी वीजा नियमों को सख्त करने की घोषणा, प्रवासन नीतियों में बदलाव और व्यापारिक मोर्चे पर टैरिफ जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौतियां पैदा कीं। हालांकि भारत ने इन चुनौतियों का जवाब किसी टकराव या प्रतिक्रिया की राजनीति से नहीं बल्कि दूरदर्शी रणनीतिक योजना के जरिए दिया।

    भारत ने सबसे पहले ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में अपनी निर्भरता को व्यापक रूप से फैलाया। पहले जहां भारत की तेल जरूरतें मुख्य रूप से पश्चिम एशिया पर निर्भर थीं, वहीं अब रूस, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से ऊर्जा आयात का नेटवर्क विकसित किया गया है। वेनेजुएला के साथ भी सहयोग की संभावनाओं पर काम चल रहा है। इस रणनीति का लाभ हाल के अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में सफल रहा।

    स्वास्थ्य और फार्मा क्षेत्र में भी भारत ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मेडिकल उपकरणों और तकनीकी स्वास्थ्य संसाधनों के लिए चीन पर निर्भरता कम करते हुए अमेरिका, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया और इजरायल जैसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाया गया। साथ ही मेक इन इंडिया अभियान के तहत देश में मेडिकल डिवाइस पार्क विकसित किए गए हैं। फार्मास्युटिकल उद्योग में एपीआई यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट के लिए लंबे समय तक चीन पर निर्भर रहने वाला भारत अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों के साथ साझेदारी को मजबूत कर रहा है।

    तकनीक और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी छलांग लगाई है। ताइवान, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर के साथ सहयोग के जरिए भारत अपने इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप निर्माण क्षेत्र को मजबूत करने में जुटा है। गुजरात और असम में स्थापित की जा रही सेमीकंडक्टर परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य भारत को वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना है।

    रक्षा क्षेत्र में भारत ने संतुलित कूटनीति का परिचय देते हुए अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ फ्रांस, रूस, इजरायल और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ भी रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखा है। इससे भारत को रक्षा उपकरणों और तकनीक के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर होने से बचने में मदद मिली है।

    व्यापार और निवेश के क्षेत्र में भी भारत ने बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ सीईपीए, ऑस्ट्रेलिया के साथ ईसीटीए, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की दिशा में प्रगति तथा खाड़ी देशों के साथ निवेश साझेदारी इस रणनीति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इसके अलावा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा जैसी पहलें भारत की वैश्विक आर्थिक पहुंच को और मजबूत कर रही हैं।

    स्पष्ट है कि बदलते वैश्विक माहौल में भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित कूटनीति और विविधीकरण को अपनी नीति का आधार बनाया है। यही वजह है कि वैश्विक संकटों और महाशक्तियों के दबाव के बावजूद भारत न केवल अपनी आर्थिक और सामरिक स्थिति को मजबूत बनाए हुए है बल्कि विश्व मंच पर एक विश्वसनीय और आत्मनिर्भर शक्ति के रूप में भी उभर रहा है।

  • होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का बड़ा कदम, संसद में कानून पर मतदान के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी चिंता

    होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का बड़ा कदम, संसद में कानून पर मतदान के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा और समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मध्य पूर्व क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति को प्रभावित करने वाले इस जलमार्ग के प्रबंधन से जुड़े विधेयक पर ईरान की संसद में आज मतदान किया गया। यह प्रस्ताव इस मार्ग के संचालन को कानूनी रूप देने और नियंत्रण व्यवस्था को और सख्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल बढ़ गई है, क्योंकि यह समुद्री मार्ग दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है।

    सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित कानून का उद्देश्य होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की निगरानी और प्रबंधन के लिए स्पष्ट ढांचा तैयार करना है। इस मार्ग से वैश्विक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की बड़ी मात्रा में आपूर्ति होती है, जिसके कारण इसे दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में गिना जाता है। ईरान लंबे समय से इस क्षेत्र में अपने अधिकार और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की बात करता रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे वैश्विक व्यापार के लिए साझा मार्ग मानता है।

    संसद में हुई इस वोटिंग के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले समय में ईरान इस जलमार्ग पर शुल्क आधारित व्यवस्था या अतिरिक्त नियंत्रण लागू कर सकता है, जिसे कुछ विशेषज्ञ अनौपचारिक रूप से “टोल व्यवस्था” के रूप में भी देख रहे हैं। हालांकि आधिकारिक स्तर पर इसे समुद्री सुरक्षा और प्रशासनिक नियंत्रण का हिस्सा बताया जा रहा है। यदि इस तरह की व्यवस्था लागू होती है तो इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति श्रृंखला और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है।

    वैश्विक स्तर पर इस घटनाक्रम को लेकर चिंता का माहौल है। कई देशों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की सख्ती या नियंत्रण बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पैदा हो सकती है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा संभालता है, इसलिए यहां होने वाला कोई भी बदलाव सीधे अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आपूर्ति व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण इस मुद्दे पर कूटनीतिक स्तर पर निगरानी और बातचीत की संभावना भी बनी हुई है।

    ईरान का पक्ष है कि वह अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के कदम क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा सकते हैं और वैश्विक व्यापार प्रवाह पर असर डाल सकते हैं। हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में सुरक्षा घटनाओं और तनाव की स्थिति पहले भी देखी गई है, जिससे इसकी संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।

    अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि संसद में पारित इस प्रस्ताव के बाद ईरान इसे किस तरह लागू करता है और क्या यह वास्तव में किसी प्रकार की शुल्क प्रणाली या नए नियंत्रण ढांचे का रूप लेता है, या फिर यह केवल प्रशासनिक और सुरक्षा सुधार तक सीमित रहता है।

  • कोयला गैसीकरण को लेकर बड़ा कदम, 37,500 करोड़ की योजना के तहत निवेश और रोजगार सृजन को मिलेगा बढ़ावा

    कोयला गैसीकरण को लेकर बड़ा कदम, 37,500 करोड़ की योजना के तहत निवेश और रोजगार सृजन को मिलेगा बढ़ावा

    नई दिल्ली । भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने सतही कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। इसी क्रम में गुरुवार को एक राष्ट्रीय स्तर का रोड शो आयोजित किया जाएगा, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र में निवेश, तकनीक और साझेदारी को प्रोत्साहित करना है। यह पहल कोयला संसाधनों के अधिक कुशल और पर्यावरण-अनुकूल उपयोग को बढ़ावा देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। सरकार का मानना है कि गैसीकरण तकनीक के माध्यम से देश के विशाल कोयला भंडार का बेहतर उपयोग किया जा सकता है और आयात पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    कोयला मंत्रालय के अनुसार इस योजना का कुल वित्तीय परिव्यय 37,500 करोड़ रुपये रखा गया है। इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक लगभग 10 करोड़ टन कोयले के गैसीकरण को सुनिश्चित करना है। इस पहल से न केवल ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती मिलेगी, बल्कि एलएनजी, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों के आयात पर निर्भरता में भी कमी आने की संभावना है। सरकार का आकलन है कि यह कदम देश की ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा देगा और घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ाएगा।

    इस योजना के तहत लगभग 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आकर्षित होने की उम्मीद जताई गई है। इससे कोयला उत्पादक क्षेत्रों में लगभग 25 बड़ी परियोजनाओं का विकास हो सकता है, जिनसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 50 हजार रोजगार के अवसर उत्पन्न होने का अनुमान है। इसके अलावा, 75 मिलियन टन कोयला और लिग्नाइट के उपयोग से प्रतिवर्ष लगभग 6,300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होने की संभावना जताई गई है। साथ ही जीएसटी और अन्य करों के माध्यम से भी सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी।

    इस रोड शो का उद्देश्य केवल निवेश आकर्षित करना ही नहीं है, बल्कि एक मजबूत कोयला गैसीकरण इकोसिस्टम विकसित करना भी है। इसमें नीति निर्माता, उद्योग जगत के प्रतिनिधि, निवेशक, प्रौद्योगिकी प्रदाता और वित्तीय संस्थान एक साथ मिलकर इस क्षेत्र के भविष्य की रणनीति पर चर्चा करेंगे। सरकार चाहती है कि भारत में इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए ताकि ऊर्जा उत्पादन को अधिक स्वच्छ, कुशल और आर्थिक रूप से व्यवहारिक बनाया जा सके।

    कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री G. Kishan Reddy और केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री Satish Chandra Dubey सहित मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। इस आयोजन को नीति और उद्योग जगत के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा संरचना को अधिक आत्मनिर्भर बनाने में भूमिका निभा सकता है।

    सरकार का कहना है कि यह पहल देश के कोयला और लिग्नाइट संसाधनों के वैज्ञानिक और औद्योगिक उपयोग को नई गति देगी, जिससे न केवल ऊर्जा क्षेत्र मजबूत होगा बल्कि भारत की वैश्विक ऊर्जा प्रतिस्पर्धा में स्थिति भी बेहतर होगी।

  • पीएम मोदी की उच्चस्तरीय मंत्रिपरिषद बैठक शुरू, पश्चिम एशिया संकट और कैबिनेट फेरबदल पर नजर

    पीएम मोदी की उच्चस्तरीय मंत्रिपरिषद बैठक शुरू, पश्चिम एशिया संकट और कैबिनेट फेरबदल पर नजर



    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में दिल्ली के सेवा तीर्थ में मंत्रिपरिषद की अहम बैठक शुरू हो गई है। यह इस साल की पहली बड़ी कैबिनेट बैठक मानी जा रही है, जो ऐसे समय पर हो रही है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक हालात को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

    सूत्रों के अनुसार, इस उच्चस्तरीय बैठक में सभी कैबिनेट मंत्री, स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री और अन्य राज्य मंत्री शामिल हुए हैं। सरकार ने पहले ही सभी मंत्रियों को राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद रहने के निर्देश दिए थे। बैठक शाम 5 बजे शुरू हुई और इसमें शासन के प्रदर्शन, नीतियों के क्रियान्वयन और विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा की जा रही है।

    किन मुद्दों पर चर्चा संभव
    बैठक में सरकार की प्रमुख योजनाओं की प्रगति, उनके प्रभाव और जनता तक पहुंच को लेकर विस्तृत समीक्षा होने की संभावना है। साथ ही विभिन्न मंत्रालयों के प्रदर्शन और अब तक लिए गए नीतिगत फैसलों के नतीजों पर भी चर्चा की जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक हालात खासकर तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों पर भी सरकार की नजर बनी हुई है। इसी वजह से आर्थिक स्थिरता और ईंधन आपूर्ति जैसे मुद्दे बैठक के एजेंडे में शामिल बताए जा रहे हैं।

    विदेश यात्रा के बाद अहम बैठक
    यह बैठक ऐसे समय पर हो रही है जब प्रधानमंत्री हाल ही में अपनी पांच देशों की कूटनीतिक यात्रा पूरी कर लौटे हैं। इस दौरे में उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य ऊर्जा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और वैश्विक आर्थिक रिश्तों को मजबूत करना बताया गया है।

  • देश में ईंधन की कोई कमी नहीं: पेट्रोल-डीजल और एलपीजी सप्लाई सामान्य, सरकार ने दिए स्थिति स्पष्ट करने के संकेत

    देश में ईंधन की कोई कमी नहीं: पेट्रोल-डीजल और एलपीजी सप्लाई सामान्य, सरकार ने दिए स्थिति स्पष्ट करने के संकेत

    नई दिल्ली । देश में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की उपलब्धता को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट की गई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार देश में ईंधन का पर्याप्त भंडार मौजूद है और आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह सामान्य रूप से काम कर रही है। किसी भी तरह की कमी या संकट की स्थिति से इनकार किया गया है।

    सरकारी अधिकारियों के अनुसार कुछ क्षेत्रों में पेट्रोल पंपों पर ईंधन की सीमित उपलब्धता या प्रतिबंध जैसी स्थिति देखने को मिली थी, लेकिन इसे दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि देश में ईंधन आपूर्ति प्रणाली मजबूत है और उपभोक्ताओं को नियमित रूप से पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

    कुछ स्थानों पर अचानक ईंधन की मांग बढ़ने के कारण अस्थायी दबाव की स्थिति बनी, जिसके पीछे कई कारण सामने आए हैं। बताया गया है कि कृषि कार्यों के चलते डीजल की मांग में बढ़ोतरी हुई है, जिससे कुछ क्षेत्रों में खपत बढ़ गई। इसके अलावा निजी क्षेत्र की कुछ कंपनियों द्वारा ईंधन की कीमतें अधिक रखने के कारण उपभोक्ताओं का रुझान सरकारी पेट्रोल पंपों की ओर बढ़ा है, जिससे वहां मांग अपेक्षाकृत अधिक हो गई।

    इसके साथ ही कमर्शियल और संस्थागत ईंधन उपयोग से जुड़ी मांग का घरेलू उपभोक्ता बाजार की ओर स्थानांतरण भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के आधार पर तय होने वाली इन श्रेणियों में फिलहाल कीमतें अपेक्षाकृत अधिक हैं, जिसके चलते उपभोक्ता सामान्य बाजार से ईंधन लेने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इन सभी कारणों ने मिलकर कुछ क्षेत्रों में मांग का दबाव बढ़ाया है, लेकिन सप्लाई व्यवस्था पर इसका कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ा है।

    सरकारी स्तर पर यह भी बताया गया कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने के लिए कच्चे तेल की खरीद रणनीति में विविधता लाई जा रही है। विशेष रूप से रूस जैसे स्रोतों से आयात बढ़ाया गया है, जिससे आपूर्ति स्थिर बनी रहे। हाल के समय में कच्चे तेल के आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो ऊर्जा जरूरतों को संतुलित रखने में मदद कर रही है।

    अधिकारियों के अनुसार मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के बावजूद ईंधन आपूर्ति श्रृंखला पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा है और सरकार लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। एलपीजी की आपूर्ति भी सामान्य बनी हुई है और घरेलू उपभोक्ताओं को नियमित रूप से गैस सिलेंडर की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है।

    कुल मिलाकर मौजूदा स्थिति में देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है और सरकार ने स्पष्ट किया है कि आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह स्थिर और नियंत्रण में है, जबकि मांग में आए उतार-चढ़ाव के कारणों को भी समय पर नियंत्रित किया जा रहा है।

  • UAE में PM मोदी का मेगा मिशन सफल! भारत को मिला तेल, LPG, AI और रक्षा ताकत का बड़ा भरोसा

    UAE में PM मोदी का मेगा मिशन सफल! भारत को मिला तेल, LPG, AI और रक्षा ताकत का बड़ा भरोसा


    नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी के संयुक्त अरब अमीरात दौरे ने भारत-UAE रिश्तों को नई मजबूती दी है। भले ही प्रधानमंत्री का यह दौरा सिर्फ चार घंटे का रहा, लेकिन इस दौरान हुए बड़े समझौते आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी सेक्टर पर गहरा असर डाल सकते हैं। अबूधाबी में प्रधानमंत्री मोदी और मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाहयान के बीच हुई बैठक में कई रणनीतिक समझौतों पर मुहर लगी।

    सबसे अहम समझौता रक्षा साझेदारी को लेकर हुआ। भारत और यूएई ने रणनीतिक रक्षा सहयोग के नए फ्रेमवर्क पर सहमति जताई है। इसके तहत दोनों देश रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन, खुफिया जानकारी साझा करने और आतंकवाद विरोधी अभियानों में साथ काम करेंगे। माना जा रहा है कि यह समझौता पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच बेहद महत्वपूर्ण है।

    ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारत को बड़ी राहत मिली है। दोनों देशों ने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और रसोई गैस सप्लाई को लेकर बड़े समझौते किए हैं। भारत की सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और एडीएनओसी के बीच हुए समझौते के तहत यूएई भारत को दीर्घकालिक और प्राथमिकता के आधार पर LPG सप्लाई करेगा। इससे भारत में गैस और ईंधन की सप्लाई स्थिर रहने में मदद मिलेगी, खासकर ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हैं।

    इसके अलावा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को लेकर हुए समझौते से भारत भविष्य की आपूर्ति बाधाओं से निपटने के लिए अपनी तैयारी और मजबूत कर सकेगा। ADNOC पहले से भारत के भूमिगत तेल भंडारों में निवेश कर रहा है और अब यह साझेदारी और गहरी होगी।

    समुद्री और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में भी बड़ी पहल हुई है। गुजरात के वडिनार में जहाज मरम्मत और शिप रिपेयर क्लस्टर विकसित करने के लिए MoU साइन किया गया है। इससे भारत को क्षेत्रीय समुद्री हब बनाने में मदद मिलेगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

    टेक्नोलॉजी सेक्टर में यूएई की कंपनी G42 ने भारत में 8 AI सुपर कंप्यूटर स्थापित करने का ऐलान किया है। यह प्रोजेक्ट भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमता को नई ऊंचाई देगा। प्रस्तावित सुपरकंप्यूटर भारत में रिसर्च, डेटा प्रोसेसिंग और AI मॉडल डेवलपमेंट को तेज करेंगे।

    इसके साथ ही UAE ने भारत में 5 अरब डॉलर निवेश का भी ऐलान किया है। यह निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग और हाउसिंग फाइनेंस सेक्टर में किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था और निवेश माहौल को मजबूती मिलेगी।

    कुल मिलाकर पीएम मोदी का UAE दौरा सिर्फ कूटनीतिक मुलाकात नहीं रहा, बल्कि ऊर्जा, रक्षा, AI और निवेश जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता साबित हुआ है।

  • ऊर्जा संकट के बीच PM मोदी का बड़ा कूटनीतिक मिशन: 5 देशों का दौरा, UAE से होगी शुरुआत

    ऊर्जा संकट के बीच PM मोदी का बड़ा कूटनीतिक मिशन: 5 देशों का दौरा, UAE से होगी शुरुआत



    नई दिल्ली।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 मई से 20 मई तक एक महत्वपूर्ण विदेश दौरे पर जा रहे हैं, जिसमें वे कुल 5 देशों UAE, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा करेंगे। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ा तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और आपूर्ति श्रृंखला पर असर डाल रहा है, ऐसे में इस यात्रा को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

    दौरे की शुरुआत 15 मई को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से होगी, जहां प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात करेंगे। इस बैठक में ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-UAE व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर चर्चा होगी। UAE भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और वहां लगभग 45 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो दोनों देशों के रिश्तों को और गहरा बनाते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा वैश्विक हालात में होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के बीच यह दौरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए पश्चिम एशिया में स्थिरता उसके लिए रणनीतिक प्राथमिकता है।

    इसके बाद प्रधानमंत्री 15 से 17 मई तक नीदरलैंड में रहेंगे, जहां वे प्रधानमंत्री रॉब जेटन, किंग विलेम-अलेक्जेंडर और क्वीन मैक्सिमा से मुलाकात करेंगे। इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और जल प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी।

    17 और 18 मई को प्रधानमंत्री मोदी स्वीडन का दौरा करेंगे, जहां तकनीक, नवाचार और ग्रीन एनर्जी पर बातचीत होने की संभावना है। इसके बाद 18 से 19 मई को वे नॉर्वे जाएंगे। नॉर्वे के ओस्लो में 19 मई को तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें ग्रीन ट्रांजिशन, ब्लू इकोनॉमी, रक्षा, अंतरिक्ष और नई तकनीक जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा।

    दौरे के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री 19 से 20 मई तक इटली में रहेंगे। यहां वे प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और राष्ट्रपति सर्जियो मातारेला से मुलाकात करेंगे। इस दौरान भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, रक्षा सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

    कुल मिलाकर यह 5 देशों का दौरा भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक साझेदारी को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब दुनिया भू-राजनीतिक और ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रही है।

  • ईरान युद्ध के बीच भारतीय सेना ने की ऊर्जा संकट से निपटने की तैयारी, बनाया ये प्लान..

    ईरान युद्ध के बीच भारतीय सेना ने की ऊर्जा संकट से निपटने की तैयारी, बनाया ये प्लान..

    नई दिल्ली। ईरान में जारी तनाव और संभावित तेल-गैस संकट के बीच भारतीय सेना ने ऊर्जा खपत को कम करने और वैकल्पिक संसाधनों को अपनाने के लिए बड़ा रणनीतिक प्लान तैयार किया है। सेना अब एलपीजी और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता घटाकर बायोगैस, सोलर और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रही है। यह योजना अगले महीने से मिशन मोड में लागू की जाएगी।

    फ्यूल बचाने के लिए नई रणनीति तैयार
    रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सेना ने बायोगैस स्टोव्स की खरीद का ऑर्डर जारी कर दिया है। इसके साथ ही जवानों की मूवमेंट को 400 किलोमीटर के दायरे तक सीमित करने की योजना बनाई गई है, ताकि ईंधन की खपत कम की जा सके। अधिकारियों का कहना है कि यह बदलाव बिना किसी ऑपरेशनल क्षमता को प्रभावित किए लागू किया जाएगा।

    वाहनों की पूलिंग और इलेक्ट्रिक विकल्पों पर जोर
    सेना अब वाहनों की पूलिंग सिस्टम को बढ़ावा दे रही है, यानी एक साथ कई कार्यों को एक यात्रा में पूरा करने की रणनीति अपनाई जा रही है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों और सीएनजी के उपयोग को भी बढ़ाने की योजना है। कुछ नियम पहले ही लागू हो चुके हैं, जबकि बाकी अगले एक-दो हफ्तों में लागू किए जाएंगे।

    हवाई गतिविधियों में भी कटौती
    फ्यूल बचाने के लिए सेना से जुड़ी कुछ उड़ानों को भी सीमित किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार यह कदम रणनीतिक जरूरतों को प्रभावित किए बिना ईंधन खपत कम करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।

    सौर और पवन ऊर्जा पर बड़ा फोक

    सेना की योजना आने वाले वर्षों में बड़े स्तर पर सोलर प्लांट और पवन चक्कियों की स्थापना करने की है। अनुमान के मुताबिक, सेना में रोजाना लगभग 1,56,000 किलो कुकिंग गैस की खपत होती है, जिसमें बायोगैस के इस्तेमाल से लगभग 20% तक बचत संभव है। वहीं, करीब 2 लाख वाहनों के चलते बड़ी मात्रा में ईंधन खर्च होता है।

    पांच साल का हरित ऊर्जा मिशन
    सेना का लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में खाली और उपयोग न हो रहे क्षेत्रों में सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स लगाए जाएं, जिससे ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सके और पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता घटे।

    होर्मुज जलमार्ग से गुजरता भारतीय टैंकर सुरक्षित

    इसी बीच एक अहम घटनाक्रम में भारतीय ध्वज वाला तेल टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित पार कर मुंबई की ओर बढ़ रहा है। यह वही संवेदनशील जलमार्ग है, जहां हाल ही में तनाव की स्थिति देखने को मिली थी। इस टैंकर पर 31 भारतीय नाविक सवार हैं और इसके 22 अप्रैल तक मुंबई पहुंचने की उम्मीद है।