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  • उज्जैन सिंहस्थ 2028 में 40 करोड़ श्रद्धालुओं के भोजन की तैयारी, 15 जिलों में होगी सब्जियों और फूलों की खेती

    उज्जैन सिंहस्थ 2028 में 40 करोड़ श्रद्धालुओं के भोजन की तैयारी, 15 जिलों में होगी सब्जियों और फूलों की खेती


    मध्य प्रदेश: के उज्जैन में वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ महापर्व के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए अभी से तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। 60 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में करीब 40 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के आने से भोजन, सब्जियों और पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाले फूलों की मांग भी काफी बढ़ने की संभावना है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए उद्यानिकी विभाग ने दो साल का रोडमैप तैयार किया है। इसके तहत प्रदेश के 15 जिलों में क्लस्टर मॉडल के माध्यम से सब्जियों और फूलों का अतिरिक्त उत्पादन किया जाएगा।

    योजना के अनुसार, करीब 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 8 हजार हेक्टेयर में सब्जियां और 8 हजार हेक्टेयर में फूल उगाए जाएंगे। इस पहल से लगभग 20 हजार किसानों को जोड़ने की योजना है। इसका उद्देश्य आयोजन के दौरान मांग के अनुरूप उत्पादन सुनिश्चित करना और श्रद्धालुओं की जरूरतों के लिए पर्याप्त कृषि उपज उपलब्ध कराना है।

    क्लस्टर मॉडल के तहत एक क्षेत्र के कई किसान आपसी समन्वय से निर्धारित मांग के अनुसार फसलें उगाएंगे। इससे विभाग को पहले से जानकारी मिल सकेगी कि किस इलाके में कौन-सी फसल कितने क्षेत्र में लगाई गई है और उससे कितनी पैदावार मिलने की संभावना है। सामान्य तौर पर किसान स्थानीय बाजार और अपनी सुविधा के अनुसार फसल चुनते हैं, लेकिन इस योजना में सिंहस्थ के दौरान होने वाली मांग को ध्यान में रखकर उत्पादन पर जोर दिया जाएगा।

    सब्जियों के अतिरिक्त उत्पादन के लिए उज्जैन संभाग के सात जिलों को शामिल किया गया है। इनमें उज्जैन, आगर-मालवा, शाजापुर, देवास, रतलाम, नीमच और मंदसौर शामिल हैं। इन जिलों में दो साल के भीतर 8 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में हाइब्रिड सब्जियों की खेती विकसित करने की योजना है। इसके लिए किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने और उपयुक्त फसल का चयन करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

    फूलों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आठ जिलों में उत्पादन बढ़ाया जाएगा। इनमें उज्जैन, इंदौर, देवास, आगर-मालवा, खंडवा, छतरपुर, मैहर और दतिया शामिल हैं। सिंहस्थ के दौरान मंदिरों, अखाड़ों, आश्रमों और पूजा-पाठ के लिए फूलों की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए इन जिलों में 8 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में फूलों की खेती विकसित की जाएगी।

    उज्जैन में गेंदे और गुलाब की खेती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। गेंदा उत्पादन के लिए लगभग 4,200 हेक्टेयर क्षेत्र में 25 क्लस्टर बनाने की योजना है, जिनसे 240 गांव जुड़ेंगे। वहीं, गुलाब की खेती का क्षेत्र बढ़ाकर 250 हेक्टेयर से अधिक करने का लक्ष्य है। इसके अलावा उज्जैन में करीब 19 एकड़ जमीन पर फूलों की खेती के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया जाएगा। यहां किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले पौधे, नई तकनीक और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की योजना है। इससे फूलों के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता और परिवहन खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।

    खेती बढ़ाने के साथ खेतों से ताजी सब्जियां समय पर उज्जैन पहुंचाना भी बड़ी चुनौती होगी। सब्जियां जल्दी खराब होती हैं, इसलिए योजना में खेतों के पास संग्रह केंद्र, छंटाई, श्रेणीकरण, पैकिंग और जरूरत के अनुसार शीतगृह विकसित करने पर ध्यान दिया जा रहा है। रोजाना की मांग और आपूर्ति का डिजिटल रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    उद्यानिकी विभाग के उपसंचालक के.एस. मंडलोई के अनुसार, आयोजन से दो साल पहले ही किसानों की पहचान कर उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके साथ ही 15 जिलों को जोड़कर ऐसी आपूर्ति व्यवस्था तैयार करने की योजना है, जिससे किसी एक क्षेत्र में मौसम, बीमारी या कीट के कारण फसल खराब होने पर दूसरे जिले से आपूर्ति बढ़ाई जा सके। इस तरह सिंहस्थ के दौरान सब्जियों और फूलों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए उत्पादन से लेकर परिवहन तक की तैयारी की जा रही है।

  • हिमाचल के सिंदूरी अनार दुबई पहुंचे, किसानों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमाई बढ़ाने का नया रास्ता

    हिमाचल के सिंदूरी अनार दुबई पहुंचे, किसानों के लिए खुलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमाई बढ़ाने का नया रास्ता

    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश के किसानों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपज पहुंचाने का एक नया अवसर सामने आया है। राज्य के कुल्लू में पैदा होने वाले सिंदूरी अनारों की 1.3 मीट्रिक टन खेप सफलतापूर्वक दुबई भेजी गई है। इस निर्यात से भारतीय कृषि उत्पादों को विदेशी बाजारों में पहचान दिलाने और स्थानीय किसानों को व्यापक बाजार से जोड़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार, 22 अक्टूबर को इस उपलब्धि की जानकारी दी।

    इस खेप का निर्यात कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के सहयोग से किया गया। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय कृषि उपज को वैश्विक खरीदारों तक पहुंचाना है। विदेशों में भारतीय फलों की मांग और बाजार तक सीधी पहुंच बढ़ने से किसानों को अपनी उपज के लिए नए खरीदार मिल सकते हैं। हालांकि, किसानों की आय पर इसका वास्तविक प्रभाव निर्यात की निरंतरता, बाजार की मांग, कीमतों और आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

    कुल्लू के सिंदूरी अनारों का दुबई पहुंचना हिमाचल प्रदेश की कृषि उपज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। विदेशी बाजार में उत्पाद पहुंचाने के लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग, भंडारण, परिवहन और समय पर आपूर्ति जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी होता है। यदि ऐसे निर्यात नियमित रूप से आगे बढ़ते हैं, तो स्थानीय उत्पादकों और उनसे जुड़े कारोबारियों को अपने व्यापार का विस्तार करने का अवसर मिल सकता है।

    कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अन्य राज्यों में भी प्रयास किए जा रहे हैं। इसी महीने की शुरुआत में एपीडा ने हरियाणा के सोनीपत से कनाडा के लिए 24 मीट्रिक टन जमे हुए खाद्य उत्पादों की खेप भेजने में सहायता की थी। इस खेप में हरी मटर, मिश्रित सब्जियां, मटर और गाजर, स्वीट कॉर्न तथा समोसे जैसे उत्पाद शामिल थे। यह निर्यात किसान उत्पादक संगठनों के नेतृत्व में किया गया था। निर्यात करने वाली इकाई को एपीडा की वित्तीय सहायता योजना से भी मदद मिली।

    इन पहलों के जरिए कृषि और खाद्य उत्पादों के कारोबार से जुड़े छोटे उत्पादकों तथा संगठनों को विदेशी बाजारों तक पहुंचने में सहायता देने का प्रयास किया जा रहा है। किसान उत्पादक संगठन सामूहिक रूप से उपज जुटाने, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने और बड़े खरीदारों की जरूरतों के अनुसार आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वित्तीय सहायता और निर्यात संबंधी मार्गदर्शन से ऐसी इकाइयों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी आसान हो सकती है।

    इस बीच, मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए के लाभों को कारोबारियों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से जागरूकता गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं। गांधीनगर में हुई राज्यस्तरीय कार्यशाला में 200 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें राज्य सरकार के अधिकारी, निर्यात संवर्धन परिषदों के प्रतिनिधि और निर्यातक शामिल थे। कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को मुक्त व्यापार समझौतों के तहत उपलब्ध अवसरों की जानकारी देना था।

    पीयूष गोयल ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय कारोबारियों और निर्यातकों की भागीदारी बढ़ाने से एफटीए का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इससे भारत के कुल निर्यात में गुजरात की हिस्सेदारी बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

    मंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में हुए मुक्त व्यापार समझौतों ने भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोले हैं। सरकार का जोर इन समझौतों का लाभ किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और छोटे कारोबारियों तक पहुंचाने पर है, ताकि देश में बने उत्पादों को वैश्विक बाजारों में अधिक अवसर मिल सकें।

    गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की ओर से स्थानीय कारोबारियों को नए निर्यात बाजार तलाशने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयासों की भी सराहना की गई। केंद्र सरकार के वाणिज्य विभाग की योजना राज्यों के साथ मिलकर ऐसी और पहल आयोजित करने की है। इससे राज्यों को अपनी विशिष्ट निर्यात क्षमता पहचानने, मुक्त व्यापार समझौतों का लाभ उठाने और देश के निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिलने की उम्मीद है।

  • भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय निर्यात को 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच और किसानों को नए अवसर

    भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता लागू, भारतीय निर्यात को 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच और किसानों को नए अवसर


    नई दिल्ली ।
    भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 से लागू हो गया है। इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी। इसका लाभ विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), किसानों, महिलाओं, युवाओं और श्रम-प्रधान उद्योगों को मिलने की उम्मीद है। समझौते में व्यापार के अवसर बढ़ाने के साथ भारत के संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हितों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया गया है।

    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच से भारतीय कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर मिलेगा। उनके अनुसार, इस समझौते से पेशेवरों के लिए भी नए अवसर खुलेंगे और भारत के मूलभूत हित सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने इसे दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया।

    कृषि क्षेत्र को लेकर मंत्री ने कहा कि भारतीय किसानों को फल, सब्जियां, मसाले और अन्य कृषि उत्पादों के लिए न्यूजीलैंड में बाजार के नए अवसर मिलेंगे। इसके साथ ही उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय मजबूत करने और उनकी आजीविका बेहतर बनाने के लिए आपसी सहयोग को प्रोत्साहन मिलेगा। हालांकि, डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को समझौते में पूरी तरह संरक्षण दिया गया है। इससे व्यापार विस्तार के साथ किसानों के हितों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई है।

    भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए भी इस समझौते को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पीयूष गोयल ने महाराष्ट्र के पुणे में निर्मित जेसीबी मशीन की न्यूजीलैंड को पहली खेप के निर्यात को हरी झंडी दिखाई। उन्होंने कहा कि न्यूजीलैंड में निर्मित भारतीय मशीनों का इस्तेमाल बढ़ना देश के विनिर्माण उद्योग के लिए नए अवसरों का संकेत है। इससे भारतीय उत्पादों को विदेशी बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, मुक्त व्यापार समझौते केवल आयात-निर्यात शुल्क घटाने तक सीमित नहीं होते। ये व्यापार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखलाओं के बेहतर एकीकरण के माध्यम से दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी को मजबूत करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समझौतों से नियामकीय मंजूरियों की प्रक्रिया आसान होती है और दोनों देशों के बीच कारोबार करना अधिक सुविधाजनक बनता है।

    सरकार का अनुमान है कि भारत-न्यूजीलैंड एफटीए आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके अतिरिक्त, यह समझौता कृषि, विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और स्टार्टअप सहित विभिन्न क्षेत्रों में न्यूजीलैंड से भारत में 20 अरब डॉलर तक के निवेश का रास्ता खोल सकता है। इससे कारोबारी सहयोग और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

    सेवा क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी, पेशेवर सेवाओं, निर्माण, पर्यटन और दृश्य-श्रव्य सेवाओं से जुड़ी भारतीय कंपनियों को न्यूजीलैंड के बाजार में अवसर मिलेंगे। इन क्षेत्रों में बाजार तक पहुंच बढ़ने से भारतीय सेवा प्रदाताओं को अंतरराष्ट्रीय कारोबार का विस्तार करने में मदद मिल सकती है।

    दवा और चिकित्सा उपकरण उद्योग के लिए भी समझौते में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। न्यूजीलैंड अब वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त नियामकों की ओर से जारी निरीक्षण मंजूरियों को स्वीकार करेगा। इससे भारतीय फार्मास्यूटिकल और मेडिकल डिवाइस निर्यातकों के लिए नियामकीय अनुपालन का बोझ कम हो सकता है और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। कुल मिलाकर, इस समझौते का उद्देश्य भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार, निवेश और पेशेवर सहयोग को व्यापक बनाना है, जबकि भारत के संवेदनशील क्षेत्रों के हितों को सुरक्षित रखना भी इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।

  • मध्य प्रदेश में बिजली संकट गहराया, किसानों को 10 घंटे के वादे के बदले सिर्फ 2 घंटे आपूर्ति का आरोप

    मध्य प्रदेश में बिजली संकट गहराया, किसानों को 10 घंटे के वादे के बदले सिर्फ 2 घंटे आपूर्ति का आरोप

    मध्य प्रदेश: में बिजली की मांग बढ़ने और उत्पादन प्रभावित होने के बीच बिजली आपूर्ति का मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। प्रदेश में खेती और सिंचाई के लिए बिजली की जरूरत बढ़ी है। इसी बीच कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि किसानों को निर्धारित समय के अनुसार बिजली नहीं मिल रही है। पार्टी का कहना है कि कई क्षेत्रों में किसानों को प्रतिदिन मुश्किल से दो घंटे बिजली मिल पा रही है, जबकि खेती और सिंचाई के लिए 10 घंटे बिजली देने का वादा किया गया था।

    प्रदेश में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने पंजाब और उत्तर प्रदेश से बिजली मांगी है। बिजली उत्पादन पर असर पड़ने और बोवनी में देरी के कारण मांग बढ़ने की बात सामने आई है। ऐसे हालात में बिजली की उपलब्धता और नियमित आपूर्ति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। किसानों के साथ घरेलू उपभोक्ता भी बिजली कटौती से प्रभावित हो रहे हैं।

    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने बिजली संकट को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि किसान गंभीर बिजली संकट का सामना कर रहे हैं। खेती के काम और सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली नहीं मिलने से उनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं। किसानों को जरूरत के मुताबिक बिजली उपलब्ध नहीं होने पर खेतों में सिंचाई का काम प्रभावित हो रहा है। इससे कृषि कार्यों को समय पर पूरा करने में भी परेशानी आ सकती है।

    पटवारी ने यह भी कहा कि बिजली की समस्या केवल किसानों तक सीमित नहीं है। आम लोगों को भी अघोषित बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश के कई इलाकों में 10-10 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायतें सामने आने का दावा किया गया है। इस वजह से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के घरेलू उपभोक्ताओं की रोजमर्रा की जरूरतें प्रभावित हो रही हैं।

    बिजली की अनियमित आपूर्ति से ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के अलावा पेयजल व्यवस्था पर भी असर पड़ने की बात कही गई है। बार-बार बिजली जाने से छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को भी कामकाज में परेशानी होती है। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की नियमित उपलब्धता जरूरी है, लेकिन लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने से दैनिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

    किसानों के लिए सिंचाई के समय बिजली उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है। यदि जरूरत के अनुसार बिजली नहीं मिलती, तो फसलों की बढ़वार और उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इससे किसानों की आमदनी और आर्थिक स्थिति पर भी दबाव पड़ सकता है। खेती की बढ़ती लागत और अन्य चुनौतियों के बीच बिजली की कमी किसानों के लिए अतिरिक्त परेशानी बन सकती है।

    कांग्रेस ने सरकार से सवाल किया है कि किसानों को तय समय के मुताबिक बिजली क्यों नहीं मिल रही है और घरेलू उपभोक्ताओं को अघोषित कटौती से राहत कब मिलेगी। पार्टी ने नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग उठाई है। साथ ही, बिजली कटौती होने पर उसकी पूर्व सूचना देने और कटौती के कारणों की जानकारी सार्वजनिक करने की जरूरत पर जोर दिया है।

    बिजली की मांग और उपलब्धता के बीच बने अंतर को दूर करना सरकार के सामने चुनौती है। ऐसे में किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने और घरेलू उपभोक्ताओं की परेशानी कम करने का मुद्दा अहम बना हुआ है। फिलहाल, बिजली संकट को लेकर कांग्रेस ने सरकार से जवाब मांगा है और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है।

  • नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में बॉलीवुड सितारों की गैरमौजूदगी पर भड़के प्रवीण तारडे, बोले- नाना से बड़ा नहीं बॉलीवुड

    नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में बॉलीवुड सितारों की गैरमौजूदगी पर भड़के प्रवीण तारडे, बोले- नाना से बड़ा नहीं बॉलीवुड


    नई दिल्ली:
    नाना पाटेकर के अंतिम संस्कार में बॉलीवुड के कई कलाकारों की गैरमौजूदगी को लेकर मराठी अभिनेता और निर्देशक प्रवीण तारडे ने नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि जो लोग नाना पाटेकर को अपना दोस्त मानते थे, उन्हें उनके अंतिम संस्कार में जरूर पहुंचना चाहिए था। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिल्मी सितारों के नहीं आने से नाना पाटेकर की महानता कम नहीं होती। उनके मुताबिक, अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में किसानों का शामिल होना इस बात का प्रमाण था कि अभिनेता का जुड़ाव केवल फिल्मी दुनिया तक सीमित नहीं था।

    नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को गोवा में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत में शोक की लहर फैल गई। उनका अंतिम संस्कार पुणे के पास स्थित उनके पैतृक गांव डोणजे में उनके फार्महाउस पर किया गया। इस दौरान परिवार के सदस्यों, राजनीतिक हस्तियों, सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों और मनोरंजन जगत की कुछ हस्तियों ने उन्हें अंतिम विदाई दी। हालांकि, बॉलीवुड के कई चर्चित कलाकारों की सीमित मौजूदगी चर्चा का विषय बन गई।

    प्रवीण तारडे ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि नाना पाटेकर का कद किसी फिल्म उद्योग या सितारों की उपस्थिति से तय नहीं होता। उन्होंने अंतिम संस्कार में पहुंचे किसानों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उनके अनुसार, महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों से किसान नाना को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। तारडे ने किसानों के पसीने और मिट्टी से जुड़े जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उनके लिए किसानों का सम्मान फिल्मी दुनिया के बड़े नामों से भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने नाना के ग्रामीण जीवन और किसानों के साथ उनके संबंधों को उनकी पहचान का अहम हिस्सा बताया।

    तारडे ने कहा कि नाना पाटेकर ने खुद को केवल बॉलीवुड के अभिनेता के रूप में पेश नहीं किया। वह अपनी पहचान किसान के रूप में भी बताते थे। इसी वजह से उनके अंतिम संस्कार में किसानों की बड़ी संख्या में मौजूदगी को तारडे ने खास महत्व दिया। उन्होंने कहा कि नाना का लोगों से जुड़ाव और उनके प्रति सम्मान उनकी वास्तविक विरासत को दर्शाता है। उनके मुताबिक, अभिनेता की लोकप्रियता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि अंतिम संस्कार में कितने फिल्मी सितारे पहुंचे।

    हालांकि, प्रवीण तारडे ने बॉलीवुड के कुछ लोगों की गैरमौजूदगी पर शिकायत भी जताई। उन्होंने कहा कि कम से कम उन लोगों को जरूर आना चाहिए था, जिन्हें नाना अपना दोस्त मानते थे। उन्होंने जैकी श्रॉफ और सुरेश वाडकर का उल्लेख करते हुए बताया कि ये दोनों नाना को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे। तारडे ने मुंबई में किसी कम चर्चित कलाकार के निधन पर लोगों के बड़ी संख्या में पहुंचने और नाना के अंतिम संस्कार में सीमित बॉलीवुड मौजूदगी के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए।

    नाना पाटेकर का अभिनय करियर हिंदी और मराठी सिनेमा में लंबे समय तक प्रभावशाली रहा। फिल्मों के अलावा वह किसानों और ग्रामीण समुदायों से जुड़े सामाजिक कार्यों के लिए भी पहचाने जाते थे। उनके अंतिम संस्कार में किसानों की बड़ी मौजूदगी ने उनके इस जुड़ाव को फिर चर्चा में ला दिया। प्रवीण तारडे की नाराजगी के बावजूद उनका कहना था कि बॉलीवुड के सितारों की गैरमौजूदगी से नाना का सम्मान कम नहीं होता। उनके लिए अभिनेता को अंतिम विदाई देने पहुंचे किसान ही उनकी लोकप्रियता और लोगों के साथ उनके गहरे संबंधों की महत्वपूर्ण तस्वीर थे।

  • नाना पाटेकर ने किसानों के परिवारों के लिए छोड़ दी थी 1.5 करोड़ की कार, मदद के लिए बांटने को दिए थे चेक

    नाना पाटेकर ने किसानों के परिवारों के लिए छोड़ दी थी 1.5 करोड़ की कार, मदद के लिए बांटने को दिए थे चेक

    नई दिल्ली: अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर के साथ उनके अभिनय करियर के अलावा सामाजिक कार्यों से जुड़े कई किस्से भी चर्चा में हैं। किसानों और उनके परिवारों की मदद से जुड़ा ऐसा ही एक प्रसंग सामने आया है। लेखक रणबीर पुष्प ने एक बातचीत में नाना पाटेकर के बारे में बताते हुए कहा था कि उनके बारे में लोगों ने कई बार गलत राय बनाई। उन्होंने उन दावों को भी गलत बताया था, जिनमें नाना पाटेकर के गुस्सैल स्वभाव की वजह से प्रोड्यूसर्स को नुकसान होने की बात कही जाती थी। इसी बातचीत में उन्होंने नाना के किसानों के प्रति संवेदनशील रवैये से जुड़ा एक किस्सा साझा किया था।

    रणबीर पुष्प के मुताबिक, एक दिन नाना पाटेकर न्यूज देख रहे थे। इस दौरान उन्होंने किसानों की आत्महत्या से जुड़ी खबर देखी, जिसमें एक पूरा परिवार शोक में डूबा हुआ था। उस समय नाना अगले दिन करीब 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने वाले थे और खरीदारी से जुड़ी सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। लेकिन किसानों के परिवार की स्थिति देखने के बाद उन्होंने अपना फैसला बदल दिया। उन्होंने तुरंत अपने दोस्त को फोन किया और कहा कि 15-15 हजार रुपये के चेक बनवाकर सभी किसानों को बांट दिए जाएं। इस किस्से के जरिए उनके किसानों के प्रति लगाव और जरूरतमंद परिवारों की मदद करने की सोच का उल्लेख किया गया था।

    नाना पाटेकर सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे और उन्होंने NAAM फाउंडेशन की स्थापना की थी। किसानों की परेशानियों और उनके परिवारों की स्थिति को लेकर उनकी चिंता का जिक्र कई बार किया गया है। रणबीर पुष्प ने इसी संदर्भ में कहा था कि जो व्यक्ति किसानों के दुख को देखकर अपनी 1.5 करोड़ रुपये की कार खरीदने का फैसला बदल सकता है, वह किसी का बुरा कैसे सोच सकता है। किसानों के परिवारों की मदद से जुड़ा यह किस्सा नाना पाटेकर के सामाजिक सरोकारों को सामने रखता है।

    नाना पाटेकर के गुस्से से जुड़ा एक और किस्सा भी इसी बातचीत में बताया गया था। रणबीर पुष्प के मुताबिक, एक बार नाना ने किसी व्यक्ति को कार से प्लास्टिक की बोतल बाहर फेंकते हुए देखा। उन्होंने अपनी कार रोककर उस बोतल को उठाया। इसके बाद उन्होंने उस व्यक्ति की कार रुकवाई और शीशा नीचे करने को कहा। नाना ने उससे सवाल किया कि देश को साफ रखने की जिम्मेदारी किसकी है। उन्होंने गांधीजी का जिक्र करते हुए कहा था कि गांधीजी चले गए हैं, लेकिन लोग अब भी इस धरती पर हैं और एक नागरिक के तौर पर देश को साफ रखना उनकी जिम्मेदारी है। इस घटना में उनका गुस्सा सार्वजनिक जगहों पर स्वच्छता और नागरिक जिम्मेदारी को लेकर था।

    नाना पाटेकर ने 75 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। गुरुवार सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया, जिसके बाद उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की कोशिश की और करीब 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा के एक चर्चित अभिनेता का करियर समाप्त हुआ। नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उन्होंने 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अभिनय की शुरुआत की और आगे चलकर हिंदी तथा मराठी फिल्मों में पहचान बनाई। उन्होंने अपने करियर में तीन नेशनल अवॉर्ड जीते थे और 2013 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। ‘परिंदा’, ‘तिरंगा’, ‘वेलकम’, ‘अपहरण’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों में उनके काम को जाना जाता है।

  • मध्यप्रदेश में MSP पर खरीफ फसलों की खरीद की तैयारी, 3 लाख 5 हजार से अधिक किसानों का पंजीयन, जानें जरूरी नियम

    मध्यप्रदेश में MSP पर खरीफ फसलों की खरीद की तैयारी, 3 लाख 5 हजार से अधिक किसानों का पंजीयन, जानें जरूरी नियम


    मध्यप्रदेश।
    में खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के तहत समर्थन मूल्य पर धान, ज्वार और बाजरा उपार्जन के लिए किसानों का पंजीयन जारी है। अब तक 3 लाख 5 हजार 82 किसान अपना पंजीयन करा चुके हैं। किसान 10 अक्टूबर तक पंजीयन करा सकते हैं। खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने किसानों से निर्धारित समय सीमा में पंजीयन कराने का आह्वान किया है, ताकि उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो। पंजीयन व्यवस्था को किसानों के लिए सहज और सुगम बनाया गया है और प्रदेश में 1100 से अधिक पंजीयन केंद्र बनाए गए हैं।

    अब तक जबलपुर संभाग में 1 लाख 47 हजार 824, रीवा संभाग में 94 हजार 384, शहडोल संभाग में 21 हजार 456, नर्मदापुरम संभाग में 16 हजार 398, सागर संभाग में 16 हजार 155 और भोपाल संभाग में 8 हजार 599 किसानों ने पंजीयन कराया है। किसानों के लिए नि:शुल्क पंजीयन की व्यवस्था ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और तहसील कार्यालयों में स्थापित सुविधा केंद्रों के अलावा सहकारी समितियों तथा सहकारी विपणन संस्थाओं द्वारा संचालित पंजीयन केंद्रों पर की गई है।

    सशुल्क पंजीयन की सुविधा एमपी ऑनलाइन कियोस्क, कॉमन सर्विस सेंटर कियोस्क, लोक सेवा केंद्र और निजी व्यक्तियों द्वारा संचालित साइबर कैफे पर उपलब्ध है। प्रति पंजीयन 50 रुपये से अधिक शुल्क नहीं लिया जा सकेगा। पंजीयन के दौरान किसान के भूमि संबंधी दस्तावेज, आधार कार्ड और अन्य फोटो पहचान पत्रों का समुचित परीक्षण कर उनका रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। सिकमी, बटाईदार, कोटवार और वन पट्टाधारी किसानों के लिए पंजीयन की सुविधा केवल सहकारी समिति एवं सहकारी विपणन संस्था द्वारा संचालित पंजीयन केंद्रों पर उपलब्ध होगी। इन श्रेणियों के सभी किसानों का सत्यापन राजस्व विभाग द्वारा किया जाएगा।

    किसानों की सुविधा के लिए जिला और तहसील स्तर पर स्थापित आधार पंजीयन केंद्रों को भी क्रियाशील रखने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि किसान अपना मोबाइल नंबर और बायोमेट्रिक अपडेट करा सकें। इस काम के लिए पोस्ट ऑफिस में संचालित आधार सुविधा केंद्र का भी उपयोग किया जा सकता है। आधार नंबर को बैंक खाते से लिंक कराने के लिए बैंकों के साथ समन्वय किया जाएगा। किसान के आधार लिंक बैंक खाते के सत्यापन के लिए पंजीयन के दौरान ही मध्यप्रदेश राज्य आपूर्ति निगम द्वारा ई-उपार्जन और जेआईटी पोर्टल के माध्यम से एक रुपये का लेनदेन कराया जाएगा।

    पंजीयन कराने और फसल बेचने के लिए आधार नंबर का वेरिफिकेशन अनिवार्य होगा। यह सत्यापन आधार से लिंक मोबाइल नंबर पर प्राप्त ओटीपी या बायोमेट्रिक डिवाइस के माध्यम से किया जा सकेगा। किसान का पंजीयन तभी होगा, जब उसके भू-अभिलेख के खाते और खसरे में दर्ज नाम का मिलान आधार कार्ड में दर्ज नाम से होगा। नाम में अंतर होने पर पंजीयन का सत्यापन तहसील कार्यालय से कराया जाएगा और सत्यापन के बाद ही ऐसा पंजीयन मान्य होगा।

  • हरियाणा के पानीपत में किसानों को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने जमीन का मुआवजा 40 से बढ़ाकर 78 लाख किया

    हरियाणा के पानीपत में किसानों को बड़ी राहत, हाई कोर्ट ने जमीन का मुआवजा 40 से बढ़ाकर 78 लाख किया


    नई दिल्ली । पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पानीपत के सिवाह गांव में भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामले में जमीन मालिकों को राहत देते हुए अधिग्रहित भूमि का बाजार मूल्य 78 लाख रुपये प्रति एकड़ निर्धारित किया है। यह जमीन 25 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई थी। पहले भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने इसका मुआवजा 40 लाख रुपये प्रति एकड़ तय किया था।

    भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 2013 में शुरू हुई थी। 28 फरवरी 2013 को भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा चार के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। इसके बाद 16 अप्रैल 2013 को धारा छह के तहत अगली अधिसूचना जारी हुई। 26 सितंबर 2013 को भूमि अधिग्रहण कलेक्टर ने अधिग्रहित जमीन का बाजार मूल्य 40 लाख रुपये प्रति एकड़ निर्धारित किया था।

    मुआवजे की इस राशि से असंतुष्ट जमीन मालिकों ने इसे बढ़ाने की मांग की और मामला अदालत तक पहुंचा। संदर्भ अदालत ने 23 जनवरी 2017 को जमीन का बाजार मूल्य बढ़ाकर 64 लाख 64 हजार 102 रुपये प्रति एकड़ कर दिया था। इसके बाद भी मुआवजे को लेकर विवाद जारी रहा और मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

    हाई कोर्ट के सामने जमीन मालिकों और राज्य सरकार, दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलों के समर्थन में बिक्री विलेख पेश किए। जमीन मालिकों की ओर से वर्ष 2010 से 2014 के बीच हुए कई जमीन सौदों के दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। इनमें कुछ लेन-देन में जमीन की कीमत करीब एक करोड़ रुपये प्रति एकड़ तक दर्ज थी।

    अदालत ने माना कि संबंधित अवधि के वास्तविक और तुलनीय बिक्री विलेख उपलब्ध होने की स्थिति में पुराने अवार्ड को केवल उसके आधार पर यांत्रिक तरीके से लागू करना उचित नहीं है। जमीन का बाजार मूल्य तय करते समय आसपास की जमीन के वास्तविक लेन-देन, उनकी तुलना और संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए कुछ बिक्री विलेखों में जमीन की कीमत 35 से 40 लाख रुपये प्रति एकड़ के बीच बताई गई थी। वहीं जमीन मालिकों द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों में इससे कहीं अधिक कीमत वाले सौदे सामने आए। अदालत ने उपलब्ध बिक्री विलेखों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद जमीन के उचित बाजार मूल्य का निर्धारण किया।

    अदालत ने अंततः अधिग्रहित जमीन का बाजार मूल्य 78 लाख रुपये प्रति एकड़ तय किया। इस तरह भूमि अधिग्रहण कलेक्टर द्वारा निर्धारित 40 लाख रुपये प्रति एकड़ की राशि की तुलना में बाजार मूल्य में 38 लाख रुपये प्रति एकड़ की बढ़ोतरी हुई।

    फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में मुआवजा तय करने के लिए किसी पुराने अवार्ड को हर मामले में सीधे आधार नहीं बनाया जा सकता। यदि संबंधित समय और क्षेत्र से जुड़े वास्तविक बिक्री विलेख उपलब्ध हैं, तो उनका उचित मूल्यांकन जरूरी है। इससे अधिग्रहित जमीन के वास्तविक बाजार मूल्य का अधिक उचित आकलन किया जा सकता है।

    इस फैसले के बाद सिवाह गांव की अधिग्रहित जमीन के लिए निर्धारित बाजार मूल्य 78 लाख रुपये प्रति एकड़ हो गया है। मामला 25 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण के उद्देश्य से की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़ा था।

  • कुणाल चौधरी ने छात्रों, किसानों और आम जनता के मुद्दों पर सरकार से मांगी जवाबदेही

    कुणाल चौधरी ने छात्रों, किसानों और आम जनता के मुद्दों पर सरकार से मांगी जवाबदेही

    मध्यप्रदेश: कांग्रेस के सचिव कुणाल चौधरी ने इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शामिल हुए छात्र-छात्राओं का आभार जताते हुए युवाओं और किसानों से जुड़े कई मुद्दे उठाए। उन्होंने कार्यक्रम की सफलता के लिए राहुल गांधी का भी आभार व्यक्त किया। चौधरी ने कहा कि युवाओं ने अपने भविष्य और अधिकारों से जुड़े सवाल मजबूती से सामने रखे हैं।

    उन्होंने कहा कि इंदौर की अर्थव्यवस्था में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन प्रदेश में पढ़े-लिखे युवा रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और वेतन से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उनका कहना था कि परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी का सीधा असर मेहनत करने वाले विद्यार्थियों और अभ्यर्थियों के भविष्य पर पड़ता है।

    चौधरी ने पेपर लीक के मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए बोर्ड बनाने और प्रभावित अभ्यर्थियों को मुआवजा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि युवाओं को बार-बार परीक्षा शुल्क भरकर परीक्षाओं की तैयारी करनी पड़ती है, लेकिन व्यवस्था की गलती सामने आने पर उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।

    उन्होंने कहा कि युवाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने पर कार्रवाई का सामना करने के बजाय उनकी समस्याओं का नीतिगत समाधान मिलना चाहिए। रोजगार और वेतन से जुड़े मामलों में सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

    चौधरी ने भागीरथपुरा मामले और छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौत के मुद्दे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने जिम्मेदारी तय करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की। साथ ही ड्रग से जुड़े मामलों में पूरे नेटवर्क की जांच करने तथा किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आने पर जवाबदेही तय करने की बात कही।

    सागर में जहरीली शराब से हुई मौतों का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि केवल छोटे आरोपियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। प्रशासनिक लापरवाही या सरकारी तंत्र की विफलता सामने आने पर संबंधित अधिकारियों और राजनीतिक स्तर पर भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने सरकारी धन के नुकसान की स्थिति में जिम्मेदार लोगों से उसकी वसूली की मांग की।

    भोपाल के 90 डिग्री ब्रिज से जुड़े मुद्दे पर भी चौधरी ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने कहा कि राजधानी से जुड़े महत्वपूर्ण अधोसंरचना संबंधी सवालों पर जनता को समयबद्ध जानकारी मिलनी चाहिए।

    किसानों के मुद्दे पर उन्होंने सोयाबीन की फसल में मौसम और बीमारी से हुए नुकसान का उल्लेख किया। चौधरी ने पीले मोजेक सहित फसल खराब होने की शिकायतों के बीच तत्काल सर्वे और प्रभावित किसानों को राहत देने की मांग की।

    उन्होंने एक बीघा में 12 क्विंटल सोयाबीन उत्पादन के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति खेतों में जाकर देखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई किसान कम उत्पादन और फसल खराब होने की शिकायत कर रहे हैं।

    सोयाबीन के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर चौधरी ने कहा कि सरकार ने 5,700 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की बात कही है, लेकिन किसानों को इससे कम कीमत पर उपज बेचने की स्थिति क्यों बन रही है। उन्होंने भावांतर योजना के पंजीयन, भुगतान और वास्तविक लाभ को लेकर भी स्पष्टता की मांग की।

    उन्होंने कहा कि सोयाबीन की कटाई शुरू होने से पहले प्रभावित क्षेत्रों का सर्वे होना जरूरी है। फसल कट जाने के बाद सर्वे होने पर वास्तविक नुकसान का आकलन मुश्किल हो सकता है। चौधरी ने उचित एमएसपी, समय पर सर्वे, फसल नुकसान का मुआवजा और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ सुनिश्चित करने की मांग की।

    चौधरी ने भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा पर भी आरोप लगाए और कहा कि नेताओं को विवाद और विभाजन के बजाय युवाओं, किसानों, रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जवाबदेही और कार्रवाई चाहती है।

  • उमरिया में 30 जंगली हाथियों का झुंड खेतों में घुसा, तीन एकड़ से ज्यादा फसल रौंदी, ग्रामीणों में फैली दहशत

    उमरिया में 30 जंगली हाथियों का झुंड खेतों में घुसा, तीन एकड़ से ज्यादा फसल रौंदी, ग्रामीणों में फैली दहशत

    मध्य प्रदेश: के उमरिया जिले के परासी महामन गांव में मंगलवार रात करीब 30 जंगली हाथियों के झुंड के खेतों में पहुंचने से ग्रामीणों में दहशत फैल गई। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के जंगलों से निकलकर आए हाथियों ने खेतों में खड़ी फसल को रौंद दिया। इस घटना में तीन एकड़ से अधिक क्षेत्र में लगी फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई।

    हाथियों के अचानक गांव के नजदीक पहुंचने की जानकारी मिलते ही इलाके में हड़कंप मच गया। ग्रामीणों ने हाथियों को आबादी और खेतों से दूर करने का प्रयास किया। सूचना मिलने के बाद बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की वन विभाग की टीम भी मौके पर पहुंची और स्थिति को संभालने में जुट गई।

    हाथियों के झुंड को जंगल की ओर वापस भेजने के लिए ग्रामीणों और वनकर्मियों ने मिलकर प्रयास किया। इस दौरान जोर-जोर से शोर किया गया और मिर्ची का तीखा धुआं किया गया। कई घंटे तक चले प्रयास के बाद हाथियों के झुंड को वापस जंगल की दिशा में मोड़ने में सफलता मिली।

    हाथियों के उत्पात से परासी और महामन गांव के किसानों की फसल को भारी नुकसान हुआ है। इस घटना में किसान बृजभूषण सिंह के परासी स्थित खेत और रामनरेश सिंह के महामन स्थित खेत की फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं। प्रभावित किसानों ने प्रशासन से फसल नुकसान का सर्वे कराने और उचित मुआवजा देने की मांग की है।

    ग्रामीणों के मुताबिक, हाथियों के बड़े झुंड के अचानक खेतों में पहुंचने से लोगों के बीच डर का माहौल बन गया। झुंड के वापस जंगल की ओर जाने के बाद भी ग्रामीणों की चिंता बनी हुई है, क्योंकि हाथियों के दोबारा खेतों और आबादी वाले इलाकों की तरफ आने की आशंका बनी हुई है।

    वन विभाग इस पूरे क्षेत्र में हाथियों की गतिविधियों पर नजर रख रहा है। विभाग के अधिकारियों के अनुसार, हाथियों को फिलहाल जंगल की ओर खदेड़ दिया गया है। इसके बाद भी उनकी आवाजाही पर निगरानी बनाए रखने के लिए वन अमला इलाके में लगातार गश्त कर रहा है।

    हाथियों का यह झुंड बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के जंगलों में रहता है। जंगल से सटे इलाकों में हाथियों की मौजूदगी के कारण आसपास के खेतों और रिहायशी क्षेत्रों में उनके पहुंचने का खतरा बना रहता है। इसी वजह से वन विभाग की टीम झुंड की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है, ताकि हाथियों की दोबारा आबादी की ओर आवाजाही को नियंत्रित किया जा सके।

    घटना के बाद किसानों के सामने फसल नुकसान की भरपाई का सवाल भी खड़ा हो गया है। प्रभावित किसानों ने प्रशासन से नुकसान का आकलन कराकर मुआवजा उपलब्ध कराने की मांग की है। वहीं वन विभाग की टीम हाथियों की गतिविधियों की निगरानी में जुटी है और इलाके में गश्त जारी रखे हुए है।