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  • कब मनाई जाएगी गुरु पूर्णिमा? जानें तिथि, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व

    कब मनाई जाएगी गुरु पूर्णिमा? जानें तिथि, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है। यह पर्व गुरु, शिक्षक और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। यह पावन अवसर हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को आता है। शास्त्रों में इसे आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और वेद व्यास जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने चारों वेदों का संकलन और वर्गीकरण कर मानव समाज को ज्ञान की अमूल्य धरोहर दी। इसके अलावा महाभारत और श्रीमद्भागवत जैसे महान ग्रंथों की रचना भी उनके द्वारा की गई मानी जाती है। इसी कारण उन्हें आदि गुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है और उनके प्रति आस्था व्यक्त करते हुए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

    गुरु पूर्णिमा 2026 की तिथि
    पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 28 जुलाई को शाम 6 बजकर 18 मिनट पर होगी।
    पूर्णिमा तिथि का समापन 29 जुलाई 2026 को रात 8 बजकर 5 मिनट पर होगा।
    उदया तिथि के आधार पर गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई 2026 (बुधवार) को मनाया जाएगा।

    गुरु पूर्णिमा का महत्व
    गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि जीवन में ज्ञान और अनुशासन के महत्व को समझने का अवसर भी है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

    मान्यता है कि इस दिन गुरु की पूजा करने से जीवन में ज्ञान, विवेक और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह दिन आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    गुरु पूर्णिमा के दिन क्या करें
    – अपने गुरु या मार्गदर्शक का सम्मान करें और उनका आशीर्वाद लें
    – गुरु पूजन कर उन्हें श्रद्धा अनुसार दक्षिणा या उपहार अर्पित करें
    – जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें
    – श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें
    – भगवान विष्णु की आराधना और स्मरण करें
    – ध्यान, जप और सत्संग के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त करें
    – जीवन में ज्ञान, विनम्रता और सदाचार अपनाने का संकल्प लें

    नोट : यह जानकारी पंचांग, धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक स्रोतों पर आधारित है।

  • बुढ़वा मंगल पर बजरंगबली को बेहद प्रिय हैं ये पांच विशेष चीजें, शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों से राहत मिलने की है मान्यता

    बुढ़वा मंगल पर बजरंगबली को बेहद प्रिय हैं ये पांच विशेष चीजें, शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों से राहत मिलने की है मान्यता

    नई दिल्ली । उत्तर भारत की सनातन धार्मिक परंपराओं में ज्येष्ठ महीने के मंगलवार का एक बेहद विशिष्ट और पावन महत्व माना गया है, जिन्हें आम बोलचाल में बड़ा मंगल या बुढ़वा मंगल के नाम से पुकारा जाता है। ज्येष्ठ महीना अब अपने समापन की ओर अग्रसर है और आज यानी १६ जून २०२६ को इस पावन महीने का सातवां बड़ा मंगल पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस साल ज्येष्ठ मास के दौरान अधिकमास का विशेष संयोग बनने के कारण कुल आठ बड़े मंगल पड़ रहे हैं, जिसके चलते आज के सातवें बड़े मंगल का महत्व ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कहीं अधिक बढ़ गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर व्रत रखने और पूरी निष्ठा से संकटमोचन की उपासना करने से बजरंगबली अपने भक्तों पर अटूट कृपा बरसाते हैं।

    ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों के अनुसार, बड़े मंगल के दिन की गई पूजा न केवल जीवन के संकटों को टालती है, बल्कि इससे कुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति भी बेहद मजबूत और शुभ होती है। इसके अतिरिक्त, जो जातक वर्तमान समय में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के बुरे दौर और कष्टों से गुजर रहे हैं, उनके लिए भी आज के दिन हनुमान जी की आराधना करना अचूक और राहत देने वाला माना गया है। इस पावन अवसर पर पूजा और आरती के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष और कल्याणकारी मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं, जिनमें सुबह ०५:४५ बजे से ०७:२५ बजे तक अमृत काल का श्रेष्ठ समय रहा, जबकि दोपहर ११:५० बजे से १२:४५ बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा और शाम को संध्या आरती के लिए ०६:३० बजे से ०७:४५ बजे तक का समय सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

    उत्तर भारत, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और उसके आस-पास के तमाम क्षेत्रों में बड़े मंगल के अवसर पर एक बहुत ही भव्य सांस्कृतिक व धार्मिक नजारा देखने को मिलता है। इस दिन जगह-जगह विशाल भंडारों का आयोजन करने, भीषण गर्मी के इस मौसम में राहगीरों को ठंडा शरबत व पानी पिलाने तथा सामूहिक रूप से सुंदरकांड का पाठ करने की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा रही है। सुबह से ही तमाम प्रमुख हनुमान मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है, जहां विशेष पूजा-अर्चना, भव्य श्रृंगार और कीर्तन के कार्यक्रम अनवरत रूप से चल रहे हैं। धर्म-शास्त्रों के अनुसार, आज के दिन बजरंगबली को उनकी कुछ बेहद प्रिय चीजें अर्पित करने से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं स्वतः ही दूर हो जाती हैं।

    शास्त्रों में वर्णित इन पांच प्रमुख चीजों में सबसे पहला स्थान लाल फूलों का है, जिसके तहत हनुमान जी को गुड़हल या गुलाब के लाल पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। दूसरी प्रमुख सामग्री चोला है, जिसमें चमेली के तेल में केसरिया सिंदूर मिलाकर प्रभु के चरणों से शुरुआत करते हुए चोला चढ़ाया जाता है और अंत में वही सिंदूर माथे पर लगाया जाता है। इसके अलावा, बजरंगबली को बनारसी पान पर कत्था, गुलकंद, सौंफ और इलायची रखकर मीठे पान का बीड़ा अर्पित करने से जीवन की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, ध्यान रहे कि इस पान में चूना या सुपारी बिल्कुल न हो। चौथी और पांचवीं चीज के रूप में हनुमान जी को बूंदी या बेसन के लड्डू तथा आटे, शुद्ध घी और गुड़ से बने पारंपरिक चूरमे या मीठी रोटी का भोग लगाने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

  • सोमवती अमावस्या पर भूलकर भी न करें इन 5 विशेष वस्तुओं का दान: पुण्य की जगह लग सकता है दोष, घर में आ सकती है दरिद्रता

    सोमवती अमावस्या पर भूलकर भी न करें इन 5 विशेष वस्तुओं का दान: पुण्य की जगह लग सकता है दोष, घर में आ सकती है दरिद्रता

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में अमावस्या तिथि को पितरों के तर्पण, पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य के लिए बेहद पवित्र और फलदायी माना गया है। इस वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या सोमवार के दिन पड़ने के कारण यह सोमवती अमावस्या का विशेष योग बना रही है। इस बार की सोमवती अमावस्या ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन कई बड़े और दुर्लभ ग्रहों के संयोग बन रहे हैं। जहां एक ओर सूर्य देव वृषभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं जिससे वृषभ संक्रांति का निर्माण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ज्येष्ठ अधिक मास का समापन भी इसी दिन हो रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस सोमवती अमावस्या पर वृद्धि योग, सर्वार्थसिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का एक साथ त्रिवेणी संगम हो रहा है। इस दौरान सूर्य देव की कृपा से युक्त वृद्धि योग और शाम तक रहने वाले सर्वार्थसिद्धि व अमृत सिद्धि योग में किए गए कार्यों को अक्षय फल देने वाला माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस शुभ बेला में किए गए दान से कुंडली के विभिन्न ग्रहों की पीड़ा शांत होती है और जीवन से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। हालांकि, ज्योतिषियों का कहना है कि अमावस्या के दिन दान करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतना अनिवार्य है, क्योंकि गलत चीजों का दान पुण्य की जगह दोष का भागी बना सकता है।

    शास्त्रों के अनुसार, सोमवती अमावस्या पर वस्त्र दान महादान की श्रेणी में आता है, लेकिन इस दिन किसी को भी फटे, मैले या अत्यंत पुराने वस्त्र देने से बचना चाहिए। ऐसी अनुपयोगी वस्तुओं का दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति नहीं होती और मानसिक तनाव बढ़ता है। इसी प्रकार, पितरों की तृप्ति के लिए अन्न दान का विशेष महत्व है, परंतु दान में दिया जाने वाला अनाज पूरी तरह साफ, शुद्ध और खाने योग्य होना चाहिए। कीड़े लगे या पूरी तरह बेकार हो चुके अनाज का दान करने से पूर्वज रुष्ट हो जाते हैं, जिससे परिवार को पितृदोष का सामना करना पड़ सकता है।

    इस पावन तिथि पर नमक के दान को भी पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, अमावस्या के दिन किसी अन्य व्यक्ति को नमक का दान करने से घर की संचित लक्ष्मी चली जाती है और परिवार में दरिद्रता का वास होने लगता है। इसके साथ ही, इस दिन शनि देव से जुड़ी धातु यानी लोहे का दान भी सामान्य लोगों को नहीं करना चाहिए। लोहे के साथ-साथ इस दिन सरसों के तेल का दान करने से भी बचने की सलाह दी जाती है, हालांकि सरसों के तेल का उपयोग पूजा-पाठ और दीप प्रज्वलन के लिए किया जा सकता है।

    अक्सर देखा जाता है कि लोग अपने घरों में पड़े फटे-पुराने या टूटे हुए जूते-चप्पल अमावस्या के दिन किसी जरूरतमंद को दे देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सोमवती अमावस्या जैसी पवित्र तिथि पर फटे या अनुपयोगी जूते-चप्पल दान करने से कुंडली में शनि देव का अशुभ प्रभाव तेजी से बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में बड़ी बाधाओं और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, इस महासंयोग पर केवल साफ, उपयोगी और सात्विक वस्तुओं का ही दान करना श्रेयस्कर रहता है।

  • काहिरा हवाई अड्डे पर जब उमड़ा था 'महानायक' के प्रशंसकों का जनसैलाब: खुद अमिताभ बच्चन ने 1991 के उस दौर को बताया था 'राष्ट्रीय संकट'

    काहिरा हवाई अड्डे पर जब उमड़ा था 'महानायक' के प्रशंसकों का जनसैलाब: खुद अमिताभ बच्चन ने 1991 के उस दौर को बताया था 'राष्ट्रीय संकट'

    नई दिल्ली । बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता केवल भारत की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके प्रशंसकों की संख्या करोड़ों में है। अस्सी के दशक में जब इंटरनेट और सोशल मीडिया का नामोनिशान नहीं था, तब भी सात समंदर पार मिडिल ईस्ट के देशों में उनकी दीवानगी चरम पर थी। विशेष रूप से मिस्र यानी इजिप्ट में अमिताभ बच्चन को लेकर ऐसा असाधारण क्रेज देखा गया कि वहां की तात्कालिक सरकार के लिए यह चिंता का विषय बन गया था और अंततः उन्हें एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाना पड़ा था।

    साल 1980 के दौर में मिस्र के सिनेमाघरों में जब भी अमिताभ बच्चन की कोई फिल्म लगती थी, तो टिकट खिड़कियों पर मील लंबी लाइनें लग जाती थीं। इस अभूतपूर्व दीवानगी का सीधा नुकसान मिस्र के स्थानीय फिल्म उद्योग को उठाना पड़ रहा था क्योंकि वहां के क्षेत्रीय सिनेमाघरों में दर्शकों की भारी कमी हो गई थी और सन्नाटा पसरने लगा था। अपनी घरेलू फिल्म इंडस्ट्री को मंदी से उबारने और उसे संरक्षण देने के उद्देश्य से मिस्र की सरकार ने एक कड़ा आर्थिक और सांस्कृतिक फैसला लेते हुए अमिताभ बच्चन की फिल्मों के प्रदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था।

    इस सरकारी प्रतिबंध के बावजूद वहां के आम नागरिकों के दिलों से अमिताभ बच्चन का जादू कम नहीं किया जा सका। मिस्र के लोग उनकी फिल्में देखने के लिए नए-नए रास्ते निकालने लगे और वहां के छोटे-छोटे निजी थिएटरों व बंद कमरों में चोरी-छिपे इन फिल्मों का प्रदर्शन किया जाने लगा। उस दौर में जिन लोगों के पास फिल्में देखने के साधन या टेप रिकॉर्डर उपलब्ध नहीं थे, वे हर गुरुवार को स्थानीय कैफे में बड़ी संख्या में एकत्र होते थे और केवल अमिताभ बच्चन की फिल्मों के ऑडियो गाने सुनकर ही अपनी दीवानगी पूरी किया करते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि मिस्र की एक स्थानीय फिल्म में अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म ‘गिरफ्तार’ के एक मुख्य दृश्य को हूबहू कॉपी किया गया था।

    मिस्र में अमिताभ बच्चन के इस दबदबे का सबसे बड़ा नजारा साल 1991 में देखने को मिला जब वे काहिरा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए अफ्रीकी महाद्वीप पहुंचे थे। काहिरा हवाई अड्डे पर उनके स्वागत और एक झलक पाने के लिए इतनी विशाल और बेकाबू भीड़ उमड़ पड़ी कि वहां की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। हवाई अड्डे से लेकर शहर की सड़कों तक हालात इस कदर बेकाबू हो गए थे कि खुद अमिताभ बच्चन ने बाद में अपने एक साक्षात्कार में उस माहौल को एक ‘राष्ट्रीय संकट’ जैसी स्थिति के रूप में याद किया था।

    जिस देश की सरकार ने कभी अपनी स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री के अस्तित्व को बचाने के लिए अमिताभ बच्चन की फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया था, उसी देश को आखिरकार वैश्विक कला और उनके अभिनय के सामने नतमस्तक होना पड़ा। इस ऐतिहासिक दीवानगी और सांस्कृतिक प्रभाव को स्वीकार करते हुए मिस्र सरकार ने साल 2001 में अमिताभ बच्चन को आधिकारिक तौर पर आमंत्रित किया। वहां उन्हें सिनेमा जगत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक ‘एक्टर ऑफ द सेंचुरी’ के खिताब से नवाजा गया, जो यह साबित करता है कि कला को किसी भी देश की भौगोलिक और प्रशासनिक सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।

  • श्रद्धा और आस्था के साथ बरेली में मनाया गया वट सावित्री पर्व, सुहागिन महिलाओं ने की पूजा-अर्चना

    श्रद्धा और आस्था के साथ बरेली में मनाया गया वट सावित्री पर्व, सुहागिन महिलाओं ने की पूजा-अर्चना




    बरेली । बरेली में शनिवार को वट सावित्री व्रत पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए व्रत रखा और पारंपरिक विधि-विधान से वट वृक्ष की पूजा की। सुबह से ही शहर के मंदिरों और बरगद के पेड़ों के पास महिलाओं की भीड़ देखने को मिली।

    शहर के अलखनाथ मंदिर, त्रिवटीनाथ मंदिर, धोपेश्वरनाथ मंदिर और तपेश्वरनाथ मंदिर सहित कई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं ने वट वृक्ष की पूजा की। इसके अलावा बन्नूवाल नगर, मॉडल टाउन और अन्य कॉलोनियों में भी सामूहिक रूप से वट सावित्री पूजन किया गया। 16 श्रृंगार में सजी महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर परंपराओं का पालन किया और अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना की।

  • अयोध्या में कब मनेगी राम नवमी जानिए तिथि मुहूर्त और सूर्य तिलक का समय

    अयोध्या में कब मनेगी राम नवमी जानिए तिथि मुहूर्त और सूर्य तिलक का समय


    नई दिल्ली । पूरे देश में राम नवमी को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं लेकिन इस वर्ष तिथि को लेकर लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। विशेष रूप से अयोध्या में इस पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में काफी उत्साह देखा जा रहा है क्योंकि यह भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है और यहां राम नवमी का उत्सव अत्यंत भव्य रूप में मनाया जाता है।

    पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 26 मार्च 2026 को सुबह 11 बजकर 46 मिनट पर प्रारंभ हो रही है और 27 मार्च 2026 को सुबह 10 बजकर 7 मिनट पर समाप्त होगी। भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था इसलिए कई श्रद्धालु 26 मार्च को भी राम नवमी मना रहे हैं। वहीं उदया तिथि के आधार पर 27 मार्च को भी इस पर्व का आयोजन किया जा रहा है जिससे लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

    धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अयोध्या में राम नवमी 27 मार्च 2026 शुक्रवार को मनाई जाएगी। इसी दिन राम मंदिर में रामलला का भव्य जन्मोत्सव आयोजित किया जाएगा। दोपहर 12 बजकर 27 मिनट पर मध्याह्न मुहूर्त में भगवान श्रीराम का जन्म उत्सव मनाया जाएगा जो इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है।

    राम नवमी के अवसर पर अयोध्या में एक विशेष आकर्षण सूर्य तिलक होता है। इस बार भी वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से सूर्य की किरणें सीधे भगवान राम के मस्तक पर पड़ेंगी और यह अद्भुत दृश्य लगभग चार से पांच मिनट तक दिखाई देगा। यह नजारा लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विज्ञान का अनूठा संगम होता है जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग अयोध्या पहुंचते हैं।

    राम नवमी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्म का प्रतीक है जो धर्म सत्य और मर्यादा के आदर्श माने जाते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में सत्य और धर्म का मार्ग ही सर्वोपरि है और अंततः अच्छाई की ही जीत होती है।

    अयोध्या में इस अवसर पर मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है और विशेष पूजा अर्चना भजन कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु बड़ी संख्या में सरयू नदी में स्नान कर भगवान राम के दर्शन करते हैं और अपने जीवन में सुख समृद्धि और शांति की कामना करते हैं।

    इस प्रकार राम नवमी 2026 का पर्व अयोध्या में 27 मार्च को अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाएगा। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि आस्था और संस्कृति का भी प्रतीक है जो हर भक्त के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा लेकर आता है।

  • भूटान का पारो फेस्टिवल संस्कृति आस्था और रंगों का अद्भुत उत्सव..

    भूटान का पारो फेस्टिवल संस्कृति आस्था और रंगों का अद्भुत उत्सव..

    नई दिल्ली:  भूटान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहार लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं और सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। इन्हीं में से सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध उत्सव है पारो त्शेचू फेस्टिवल

    यह उत्सव हर साल वसंत ऋतु में मनाया जाता है, आमतौर पर अप्रैल के शुरुआती दिनों में। इस वर्ष यह फेस्टिवल 29 मार्च से 2 अप्रैल तक आयोजित किया जा रहा है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भूटान की आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रदर्शन है

    पारो त्शेचू के दौरान भिक्षु और स्थानीय लोग पारंपरिक मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं और बौद्ध मंत्रों का जाप करते हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यताओं और कहानियों को दर्शाता है

    इस उत्सव में लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में शामिल होते हैं, जिससे पूरा वातावरण जीवंत और आकर्षक बन जाता है। यहां होने वाले मुखौटा नृत्य प्राचीन बौद्ध कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं

    इस फेस्टिवल में गुरु पद्मसंभव की कहानियों को भी दर्शाया जाता है, जिन्होंने भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। माना जाता है कि उन्होंने भूटान के सम्राट को ठीक करने में मदद की थी और इसी से तिब्बती बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई
     पारो त्शेचू फेस्टिवल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भूटान की संस्कृति, आस्था और विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाला एक भव्य उत्सव है

  • Eid 2026: भारत में ईद-उल-फितर 21 मार्च को, पूरे 30 रोजे रखे गए

    Eid 2026: भारत में ईद-उल-फितर 21 मार्च को, पूरे 30 रोजे रखे गए


    नई दिल्ली। भारत में ईद उल फितर 2026 की तारीख तय हो गई है। इस बार रमजान के पूरे 30 रोजे रखे गए हैं। 20 मार्च को 30वां रोजा रखा गया और अगले दिन यानी 21 मार्च शनिवार को देशभर में ईद मनाई जाएगी। यह घोषणा धार्मिक कमेटी और जामा मस्जिद दिल्ली के नायब इमाम सैयद उसामा शाबान बुखारी ने की।

    भारत में ईद की तारीख चांद दिखने पर निर्भर करती है। इस बार 19 मार्च को शव्वाल का चांद नजर नहीं आया जिससे रमजान का आखिरी रोजा बढ़ गया। इसके बाद 20 मार्च को चांद देखने के बाद ईद 21 मार्च को मनाने का फैसला लिया गया। वहीं सऊदी अरब में 20 मार्च को ही ईद उल फितर मनाई जा रही है।

    ईद उल फितर का महत्व 

    ईद उल फितर इस्लाम धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। इसका मतलब है रोजा खोलने का त्योहार । यह रमजान के पूरे महीने रोजे रखने के बाद मनाया जाता है और अल्लाह का धन्यवाद अदा करने का अवसर होता है। यह पर्व खुशियों और भाईचारे का प्रतीक है।

    इतिहास में ईद उल फितर की शुरुआत 624 ईस्वी में पैगंबर हजरत मुहम्मद ने मदीना में की थी। हिजरत के बाद मुसलमानों ने पहला रमजान पूरा किया और तब ईद उल फितर और ईद उल अजहा दो पर्व तय किए गए। इस बार के ईद समारोह के लिए तैयारियां जोरों पर हैं। मस्जिदों और सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ की व्यवस्था की जा रही है। लोग अपने घरों में भी सजावट और ईद की मिठाइयों की तैयारी में जुटे हैं।

  • आज तीन पर्वों का संगम: गुड़ी पड़वा, नवरात्रि और उगादी से शुभारंभ होगा हिंदू नववर्ष

    आज तीन पर्वों का संगम: गुड़ी पड़वा, नवरात्रि और उगादी से शुभारंभ होगा हिंदू नववर्ष


    नई दिल्ली । आज हिंदू धर्म के लिए बेहद खास दिन है क्योंकि तीन महत्वपूर्ण पर्व गुड़ी पड़वा नवरात्रि और उगादी एक साथ मनाए जा रहे हैं। उत्तर भारत में यह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के रूप में नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है जबकि दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश तेलंगाना और कर्नाटक में इसे उगादी के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह दिन गुड़ी पड़वा के रूप में नववर्ष की शुरुआत का पर्व है।

    उगादी का महत्व

    उगादी का अर्थ है युग की शुरुआत और इसे प्रकृति के श्रृंगार और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी और समय की गणना भी इसी दिन से शुरू हुई थी। यह पर्व नए अवसर समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है।

    शुभ मुहूर्त

    चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि आज यानी 19 मार्च को सुबह 6:52 से शुरू होकर कल 20 मार्च को शाम 5:52 तक रहेगी। नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना का विशेष महत्व है। घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:52 से 8:08 बजे तक है जबकि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:22 से 1:11 बजे तक रहेगा।

    गुड़ी बांधने का समय

    महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के अवसर पर गुड़ी बांधने और ध्वज फहराने का शुभ मुहूर्त सुबह 5:15 से 7:57 बजे तक है। इस दिन लोग अपने घरों को सजाते हैं रंगोली बनाते हैं और विशेष पकवान तैयार करते हैं। गुड़ी पड़वा नई शुरुआत समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। आज का दिन तीनों पर्वों के संगम और नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है जो पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाएगा।

  • शादी और त्योहार के लिए 5 शानदार बैंगल डिज़ाइन, साधारण सूट को बनाएं रॉयल

    शादी और त्योहार के लिए 5 शानदार बैंगल डिज़ाइन, साधारण सूट को बनाएं रॉयल


    नई दिल्ली । पारंपरिक लुक को खास बनाने में ज्वेलरी का हमेशा अहम रोल रहा है और खासकर बैंगल्स यानी चूड़ियां। ये न केवल हाथों की खूबसूरती बढ़ाती हैं बल्कि साधारण सूट या कुर्ती को भी एक डिजाइनर टच देती हैं। फैशन की दुनिया में नए ट्रेंड्स आते रहते हैं लेकिन पारंपरिक एथनिक स्टाइल का क्रेज कभी कम नहीं होता। आइए जानते हैं 5 लेटेस्ट बैंगल डिज़ाइन जो आपके लुक को रॉयल बना देंगे।

    ऑक्सीडाइज्ड सिल्वर बैंगल्स

    ऑक्सीडाइज्ड ज्वेलरी आजकल काफी ट्रेंड में है। अगर आप कॉटन कुर्ती या इंडो वेस्टर्न सूट पहन रही हैं तो चांदी जैसी दिखने वाली ऑक्सीडाइज्ड चूड़ियां बेस्ट ऑप्शन हैं। इन्हें आप जींस कुर्ती के साथ भी पहन सकती हैं। ये स्टाइलिश होने के साथ साथ आपको बोहेमियन और एथनिक लुक भी देती हैं।

    सिल्क थ्रेड बैंगल्स

    रेशमी धागों से बनी सिल्क थ्रेड बैंगल्स इन दिनों खासा ट्रेंड में हैं। इन्हें सूट के रंग के अनुसार कस्टमाइज कराना आसान है। मोती स्टोन और मिरर वर्क इन्हें हैवी सूट या छोटे फंक्शन के लिए परफेक्ट बनाता है। ये त्योहारों और हल्के समारोहों के लिए एक बेहतरीन चॉइस हैं।

    कश्मीरी बैंगल्स

    अगर आप कुछ यूनिक और कलात्मक पहनना पसंद करती हैं तो कश्मीरी बैंगल्स आपके लिए परफेक्ट हैं। इन पर की गई हैंड पेंटिंग और फ्लोरल डिज़ाइन इन्हें बाकी चूड़ियों से अलग बनाती हैं। अक्सर इन्हें स्टेटमेंट ज्वेलरी के तौर पर ही पहना जाता है।

    वेलवेट बैंगल्स

    सर्दियों और रात की शादियों के लिए वेलवेट बैंगल्स बेस्ट हैं। मखमली टेक्सचर और गहरा रंग साधारण सूट को भी रॉयल और महंगा लुक देता है। आजकल इन्हें पूरी कलाई भरकर पहनने के बजाय गोल्ड या कुंदन के कड़ों के बीच में सेट करके पहनना ट्रेंड में है।

    कुंदन और स्टोन वर्क वाले कड़े

    शादी या बड़ी पार्टी के लिए कुंदन और स्टोन वर्क वाले कड़े सबसे शानदार विकल्प हैं। इन्हें पूरी चूड़ियों के सेट के बजाय एक एक चौड़ा कड़ा दोनों हाथों में पहनना आजकल पसंद किया जाता है। अगर आपकी कुर्ती पर हैवी एम्ब्रॉयडरी है तो ये कड़े आपको रॉयल और क्लासी लुक देंगे।बैंगल्स सही डिजाइन और सेटिंग के साथ किसी भी लुक को हाई फैशन और रॉयल बना सकते हैं। चाहे त्योहार हो या शादी इन 5 बैंगल डिज़ाइनों से आपका सूट भी एथनिक और स्टाइलिश लगेगा।