Tag: food safety

  • लो भई! ‘ब्रश से रंगे जा रहे समोसे’ वाले वीडियो ने मचाई हलचल, लेकिन सच निकला कुछ और

    लो भई! ‘ब्रश से रंगे जा रहे समोसे’ वाले वीडियो ने मचाई हलचल, लेकिन सच निकला कुछ और

     
    नई दिल्ली। भारत में समोसा सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि लोगों की पसंद और स्वाद का हिस्सा है। ऐसे में जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक व्यक्ति समोसे जैसी दिखने वाली वस्तुओं पर ब्रश से रंग लगाता नजर आया, तो लोगों के बीच हड़कंप मच गया। वीडियो शेयर करने वालों ने दावा किया कि बाजार में बेचने से पहले समोसों को रंगा जा रहा है। वीडियो देखते ही कई लोगों ने खाद्य पदार्थों में मिलावट और गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई। कुछ यूजर्स ने इसे फूड सेफ्टी का गंभीर मामला बताया, जबकि कई लोगों ने मजाकिया अंदाज में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अब समोसे पर भी भरोसा करना मुश्किल हो गया है।

    वीडियो में आखिर दिखा क्या?
    वायरल क्लिप में एक व्यक्ति जमीन पर बैठा दिखाई देता है। उसके आसपास बड़ी संख्या में त्रिकोण आकार की वस्तुएं रखी होती हैं, जो पहली नजर में समोसे जैसी लगती हैं। कुछ का रंग हल्का होता है, जबकि कुछ बिल्कुल तले हुए सुनहरे समोसे जैसे दिखाई देते हैं। व्यक्ति हाथ में ब्रश लेकर उन पर रंग लगाता नजर आता है। पास में अलग-अलग रंगों से भरे छोटे बर्तन भी दिखाई देते हैं। यही दृश्य देखकर लोगों ने मान लिया कि ये खाने वाले समोसे हैं और उन्हें आकर्षक बनाने के लिए रंगा जा रहा है।

    सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस
    वीडियो वायरल होते ही सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। एक वर्ग ने इसे मिलावट का उदाहरण बताया, जबकि दूसरे वर्ग ने इस दावे पर सवाल उठाए। कई लोगों ने कहा कि बिना पूरी जानकारी के किसी वीडियो पर विश्वास करना सही नहीं है। कुछ यूजर्स ने ध्यान दिलाया कि जिस तरीके से रंग भरा जा रहा है, वह किसी कलाकार के काम जैसा लग रहा है, न कि खाद्य सामग्री तैयार करने जैसा।

    क्या थे ये असली समोसे?
    बाद में कई सोशल मीडिया यूजर्स ने स्पष्ट किया कि वीडियो में दिखाई दे रही वस्तुएं खाने के लिए नहीं थीं। उनका दावा था कि ये मिट्टी, क्ले, प्लास्टर या अन्य सामग्री से बने सजावटी मॉडल थे, जिन्हें वास्तविक समोसे जैसा रूप देने के लिए रंगा जा रहा था। कई लोगों ने बताया कि बाजार में सजावट, विज्ञापन, फोटोशूट और डिस्प्ले के लिए नकली खाद्य मॉडल बनाए जाते हैं। वीडियो में दिखाई गई वस्तुएं भी संभवतः उसी प्रकार की थीं।

    वायरल कंटेंट से सीख
    यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाला हर वीडियो पूरी सच्चाई नहीं बताता। कई बार अधूरी जानकारी या गलत दावों के साथ साझा किए गए वीडियो लोगों में भ्रम पैदा कर देते हैं।

    विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी वायरल वीडियो को देखकर तुरंत निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके स्रोत और तथ्यों की जांच करना जरूरी है। डिजिटल युग में जागरूकता और तथ्य जांच (फैक्ट चेक) पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

  • जंग लगे चाकू और ब्लेड के इस्तेमाल पर एफएसएसएआई सख्त, खाद्य कारोबारियों को जारी किए नए निर्देश

    जंग लगे चाकू और ब्लेड के इस्तेमाल पर एफएसएसएआई सख्त, खाद्य कारोबारियों को जारी किए नए निर्देश


    नई दिल्ली । देशभर में खाद्य सुरक्षा मानकों को और अधिक मजबूत बनाने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने खाद्य कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि अब खाद्य पदार्थों की तैयारी, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और अन्य संबंधित कार्यों में केवल फूड-ग्रेड तथा जंग-रोधी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जंग लगे, टूटे-फूटे या क्षतिग्रस्त उपकरणों के उपयोग को खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताते हुए इसे तत्काल बंद करने के निर्देश दिए गए हैं।

    एफएसएसएआई के अनुसार हाल के दिनों में ऐसी कई रिपोर्टें सामने आई थीं, जिनमें कुछ खाद्य कारोबारी जंग लगे, खराब, टूटे हुए, पेंट किए गए या अनुपयोगी हो चुके कटिंग टूल्स का उपयोग करते पाए गए। इन उपकरणों के इस्तेमाल से खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीव संबंधी दूषण (कंटैमिनेशन) का खतरा बढ़ जाता है, जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

    प्राधिकरण ने कहा कि खाद्य व्यवसायों में उपयोग होने वाले सभी उपकरण, बर्तन और खाद्य संपर्क सतहें फूड-ग्रेड, विषमुक्त और जंग-रोधी सामग्री से निर्मित होना अनिवार्य है। यह व्यवस्था न केवल खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

    एफएसएसएआई ने अपने निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया है कि सभी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों की नियमित जांच की जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि उनमें जंग, दरार, टूट-फूट, पेंट उखड़ना या किसी प्रकार की क्षति न हो। यदि किसी उपकरण में ऐसी कोई खराबी पाई जाती है, जिससे खाद्य पदार्थ दूषित होने की आशंका हो, तो उसे तुरंत उपयोग से हटाया जाए और उसकी जगह नया उपकरण लगाया जाए।

    खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत उपकरणों की नियमित सफाई, सैनिटाइजेशन और आवश्यकता पड़ने पर स्टरलाइजेशन भी अनिवार्य बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य उद्योग में स्वच्छ उपकरणों का उपयोग खाद्य जनित बीमारियों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए यह केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

    एफएसएसएआई ने यह भी कहा कि यह निर्देश ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (लाइसेंसिंग एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ फूड बिजनेस) रेगुलेशंस, 2011’ के तहत निर्धारित स्वच्छता और हाइजीन मानकों के अनुरूप हैं। इन नियमों का पालन सभी खाद्य कारोबारियों के लिए अनिवार्य है।

    प्राधिकरण ने कारोबारियों को चेतावनी दी है कि यदि किसी प्रतिष्ठान में जंग लगे या अनुपयुक्त उपकरणों का उपयोग पाया जाता है तो उसके खिलाफ ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006’ के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें जुर्माना सहित अन्य कानूनी प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं।

    एफएसएसएआई का मानना है कि इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन से खाद्य सुरक्षा के स्तर में सुधार होगा और उपभोक्ताओं को अधिक सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे।

  • भोपाल के रेस्टोरेंट में सेंडविच से निकली मरी हुई मक्खी, ग्राहक ने की शिकायत; फूड सेफ्टी विभाग करेगा जांच

    भोपाल के रेस्टोरेंट में सेंडविच से निकली मरी हुई मक्खी, ग्राहक ने की शिकायत; फूड सेफ्टी विभाग करेगा जांच


    भोपाल  राजधानी भोपाल में खाद्य सुरक्षा को लेकर एक चिंताजनक मामला सामने आया है। शहर के प्लेटिनम प्लाजा स्थित एक रेस्टोरेंट में परोसे गए चीज सेंडविच में मरी हुई मक्खी मिलने की शिकायत ने ग्राहकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। मामले की शिकायत फूड सेफ्टी विभाग तक पहुंच चुकी है और विभाग द्वारा जांच की तैयारी की जा रही है।

    जानकारी के अनुसार अशोका गार्डन निवासी शोभा अहिरवार 15 जून को दोपहर करीब 12:30 बजे प्लेटिनम प्लाजा स्थित शर्मा चाइनिज फास्ट फूड रेस्टोरेंट पहुंची थीं। यहां उन्होंने चीज सेंडविच ऑर्डर किया। शोभा का आरोप है कि सेंडविच खाते समय उन्हें उसमें कोई कीड़ा दिखाई दिया। जब उन्होंने उसे ध्यान से देखा तो वह मरी हुई मक्खी निकली। इस घटना के बाद उन्होंने तत्काल रेस्टोरेंट के कर्मचारियों को इसकी जानकारी दी।

    ग्राहक का कहना है कि खाने जैसी संवेदनशील चीज में इस तरह की लापरवाही सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। उनका आरोप है कि शिकायत के बावजूद रेस्टोरेंट प्रबंधन ने मामले को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद उन्होंने पूरे मामले की शिकायत फूड एंड सेफ्टी विभाग को ई-मेल के माध्यम से भेजी और कार्रवाई की मांग की।

    शोभा अहिरवार ने बताया कि उन्होंने सेंडविच के लिए 219 रुपए का भुगतान किया था। हालांकि उनका कहना है कि मुद्दा पैसों का नहीं बल्कि खाद्य गुणवत्ता और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य का है। उन्होंने सेंडविच में मिली मक्खी के फोटो और वीडियो भी रिकॉर्ड किए, जिन्हें शिकायत के साथ विभाग को उपलब्ध कराया गया है।

    दूसरी ओर, मामले पर रेस्टोरेंट की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। बिल पर दर्ज मोबाइल नंबर पर संपर्क करने पर कैशियर सौरभ भीमरे ने बताया कि सोमवार को ग्राहक की शिकायत प्राप्त हुई थी। उन्होंने कहा कि रेस्टोरेंट में खाद्य सामग्री तैयार करने के दौरान साफ-सफाई और गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाता है। उनके अनुसार मक्खी सेंडविच तक कैसे पहुंची, इसकी जानकारी फिलहाल नहीं है। हालांकि ग्राहक की शिकायत को गंभीरता से सुना गया और उनकी बात पर ध्यान दिया गया है।

    अब इस पूरे मामले में फूड सेफ्टी विभाग की भूमिका अहम हो गई है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच की जाएगी। जांच के दौरान रेस्टोरेंट की स्वच्छता व्यवस्था, खाद्य सामग्री के रखरखाव, किचन की स्थिति और खाद्य सुरक्षा मानकों के पालन की पड़ताल की जा सकती है। यदि जांच में किसी प्रकार की लापरवाही या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित प्रतिष्ठान के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई भी की जा सकती है।

    यह घटना एक बार फिर खाद्य प्रतिष्ठानों में स्वच्छता और गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता को उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाने-पीने की वस्तुओं में इस प्रकार की गड़बड़ी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। ऐसे मामलों में त्वरित जांच और प्रभावी कार्रवाई से ही लोगों का भरोसा कायम रखा जा सकता है। फिलहाल सभी की नजरें फूड सेफ्टी विभाग की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो इस मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करेगी।

  • नोएडा में पिज्जा शॉप पर बड़ा बवाल: थूककर खाना बनाने का आरोप, मालिक गिरफ्तार; वायरल वीडियो से मचा हड़कंप

    नोएडा में पिज्जा शॉप पर बड़ा बवाल: थूककर खाना बनाने का आरोप, मालिक गिरफ्तार; वायरल वीडियो से मचा हड़कंप



    नई दिल्ली। नोएडा के सेक्टर-22 स्थित चौड़ा गांव में एक पिज्जा शॉप को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में दुकान पर काम करने वाले शख्स मुजम्मिल पर पिज्जा तैयार करने के दौरान कथित तौर पर अनुचित व्यवहार करने का आरोप लगा है। वीडियो सामने आने के बाद इलाके में गुस्सा भड़क गया और लोगों ने मौके पर पहुंचकर हंगामा किया।

    जानकारी के मुताबिक, वायरल वीडियो में मुजम्मिल नाम का व्यक्ति पिज्जा तैयार करते समय संदिग्ध हरकत करता दिखाई दे रहा है। हालांकि आरोपी का दावा है कि वह आटे से धूल हटाने के लिए फूंक मार रहा था, लेकिन वीडियो के आधार पर स्थानीय लोगों और कुछ संगठनों ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कार्रवाई की मांग की।

    मामला बढ़ने पर पुलिस ने तत्काल संज्ञान लेते हुए आरोपी को हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि वीडियो की फॉरेंसिक जांच और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    घटना के बाद स्थानीय लोगों में रोष है और वे खाद्य सुरक्षा व स्वच्छता नियमों के सख्त पालन की मांग कर रहे हैं। वहीं प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और अगर कोई दोषी पाया गया तो कड़ी कार्रवाई होगी।

  • राजगढ़ में मिलावट और स्वास्थ्य संकट पर सांसद की चेतावनी, 27 बच्चों में गंभीर बीमारी का दावा

    राजगढ़ में मिलावट और स्वास्थ्य संकट पर सांसद की चेतावनी, 27 बच्चों में गंभीर बीमारी का दावा

    राजगढ़ में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान सामने आए बयान ने पूरे क्षेत्र में स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चर्चा छेड़ दी है। इस कार्यक्रम में सांसद रोडमल नागर ने अपने संबोधन के दौरान मिलावटी खाद्य पदार्थों, नकली दूध और खेती में बढ़ते रासायनिक उपयोग को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, यह स्थिति केवल एक सामाजिक समस्या नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ गंभीर संकट बनती जा रही है।

    सांसद ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में गांव और शहर दोनों ही क्षेत्रों में मिलावट का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने विशेष रूप से दूध और दैनिक उपयोग की सब्जियों में हो रही कथित मिलावट का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रवृत्ति लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल रही है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ स्थानों पर फसलों को जल्दी तैयार करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए अनावश्यक रसायनों का उपयोग किया जा रहा है, जो लंबे समय में मिट्टी और मानव शरीर दोनों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।

    अपने संबोधन के दौरान उन्होंने एक गंभीर दावा करते हुए बताया कि उनकी कॉलोनी में पिछले चार वर्षों में 27 बच्चों को ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ा है। इस बयान ने वहां मौजूद लोगों को चिंतित कर दिया और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर ध्यान आकर्षित किया। हालांकि इस दावे को लेकर किसी भी प्रकार की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इसने स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सुरक्षा और पर्यावरणीय कारणों पर बहस को जरूर तेज कर दिया है।

    सांसद ने आगे कहा कि मिलावट का यह बढ़ता कारोबार केवल आर्थिक लालच का परिणाम है, जो समाज के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। उन्होंने लोगों से अपील की कि यदि कहीं भी नकली दूध या मिलावटी खाद्य पदार्थ बनाए जाने की जानकारी मिले तो उसे तुरंत प्रशासन तक पहुंचाया जाए ताकि इस पर रोक लगाई जा सके। उन्होंने कहा कि इस समस्या को केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि समाज को भी जिम्मेदारी निभानी होगी।

    उन्होंने सब्जियों और दालों में होने वाली कथित मिलावट पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, आज के समय में कुछ उत्पादों को तेजी से बढ़ाने के लिए असामान्य तरीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे आम जनता के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि बाजार में उपलब्ध कई खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर अब सवाल उठने लगे हैं, जो एक गंभीर स्थिति को दर्शाता है।

    कृषि क्षेत्र पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि किसान अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक खाद और यूरिया का अत्यधिक उपयोग कर रहे हैं, जिससे भूमि की गुणवत्ता धीरे-धीरे खराब हो रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में खेती की जमीन की उत्पादकता और स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    पूरे बयान के बाद क्षेत्र में मिलावट, स्वास्थ्य और कृषि पद्धतियों को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। एक ओर जहां लोग इन मुद्दों पर चिंता जता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि इन दावों की वास्तविकता और वैज्ञानिक आधार पर आगे क्या स्थिति सामने आती है।

  • MP में मिलावट का डर: दूध, घी, मसाले समेत रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ फेल, ग्वालियर नंबर वन

    MP में मिलावट का डर: दूध, घी, मसाले समेत रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ फेल, ग्वालियर नंबर वन


    भोपाल । मध्य प्रदेश में खाद्य सुरक्षा का अलर्ट जारी हो गया है। राज्य के खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जांच में खुलासा हुआ है कि पिछले तीन सालों में लगभग 2000 से ज्यादा फूड सैंपल फेल पाए गए हैं। इनमें दूध, मावा, पनीर, घी, मिठाई, मसाले और तेल जैसे रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थ शामिल हैं।

    मिली जानकारी के अनुसार, मोबाइल वैन के जरिए एक लाख सैंपल लिए गए, जिनमें डेयरी उत्पाद सबसे ज्यादा मिलावटी पाए गए। मिठाइयों जैसे जलेबी, लड्डू, बर्फी, गजक और नमकीन में भी मिलावट पाई गई। मसालों में लाल मिर्च, धनिया पाउडर, हल्दी और सोयाबीन तेल के कई सैंपल फेल हुए हैं।

    मिलावट में ग्वालियर जिला सबसे ऊपर है। यहां दो हजार सैंपल में से लगभग 420 सैंपल फेल पाए गए। अन्य जिलों में स्थिति इस प्रकार है: गुना 110, उज्जैन 95, भिंड 90, बुरहानपुर और जबलपुर 75-75, शाजापुर 70, खरगोन 65, सीहोर 55, धार 40, राजगढ़ 35, नीमच 30, नरसिंहपुर 28 और अन्य जिले भी इस सूची में शामिल हैं।

    कहां कौन से सैंपल फेल हुए हैं, इसका विवरण भी सामने आया है। ग्वालियर में दूध, दही, पनीर, घी, मिक्स्ड मिल्क, गजक, मावा बर्फी, मालाई बर्फी, चावल और आटा फेल पाए गए। इंदौर में लस्सी, मिल्क केक, मावा कतली, पनीर, इडली और सांभर फेल हुए। शाजापुर में दूध, घी, पनीर, मावा, बेसन, लाल मिर्च पाउडर और कुकिंग ऑयल फेल पाए गए।

    दमोह में जलेबी, बेसन लड्डू, आलू मटर, चाउमीन, घी, पनीर और दही, भिंड में मालाई बर्फी, मावा पेड़ा, सौंफ और काली मिर्च, मुरैना में मावा, घी, पनीर, बेसन लड्डू, बूंदी लड्डू, धार में मावा, पनीर, धनिया पाउडर और पताशे, सागर में मोतीचूर लड्डू, रीवा में तुअर दाल और मिठाई, सिवनी में गुजिया, सेव और पनीर, नरसिंहपुर में दूध, खंडवा में गुड़ चिक्की, बैतूल में दही और काली मिर्च, सीहोर में खाने का तेल फेल पाया गया।

    खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने कहा है कि यह रिपोर्ट स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है। आम जनता को ऐसे उत्पादों से बचने और केवल प्रमाणित और सुरक्षित ब्रांड के खाद्य पदार्थ खरीदने की सलाह दी गई है।

  • काले प्लास्टिक के डिब्बों में रखा खाना कितना सुरक्षित? जानिए क्‍या कहते हैं एक्सपर्ट

    काले प्लास्टिक के डिब्बों में रखा खाना कितना सुरक्षित? जानिए क्‍या कहते हैं एक्सपर्ट


    नई दिल्ली। बीते 25 मार्च 2026 को राज्यसभा में जनहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी के सांसद घनश्याम तिवाड़ी ने ढाबों, होटलों और अन्य जगहों पर इस्तेमाल होने वाले काले प्लास्टिक कंटेनरों को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ये सामान्य प्लास्टिक नहीं होते, बल्कि इन्हें इलेक्ट्रॉनिक कचरे और अन्य बचे हुए प्लास्टिक से बनाया जाता है। उनका कहना था कि ऐसे डिब्बों में गर्म खाना रखने से माइक्रोप्लास्टिक कण भोजन में मिल सकते हैं। आइए जानते हैं इस पर विशेषज्ञों की राय।

    कैसे तैयार होता है यह प्लास्टिक

    रिपोर्ट्स के अनुसार, काले प्लास्टिक को बनाने में अक्सर ई-वेस्ट और इंडस्ट्रियल प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है। इसे आग से सुरक्षित बनाने के लिए डेकाबीडीई जैसे फ्लेम रिटार्डेंट केमिकल मिलाए जाते हैं। समस्या यह है कि ये केमिकल पूरी तरह प्लास्टिक में स्थिर नहीं रहते और गर्म होने पर खाने में घुल सकते हैं, खासकर जब भोजन गरम या तैलीय हो। इसके अलावा, इसमें BPA और फ्थेलेट्स जैसे रसायन भी पाए जाते हैं, जिन्हें हार्मोन प्रभावित करने वाले तत्व माना जाता है। बार-बार इस्तेमाल या गर्म करने पर ये रसायन शरीर में जमा हो सकते हैं और लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकते हैं।

    क्या कहते हैं विशेषज्ञ

    2024 में हुई एक स्टडी में 200 से अधिक ब्लैक प्लास्टिक प्रोडक्ट्स का परीक्षण किया गया, जिसमें करीब 85 प्रतिशत में टॉक्सिक फ्लेम रिटार्डेंट पाए गए। एक रिपोर्ट के मुताबिक डॉक्‍टरों का कहना है कि लंबे समय तक इन रसायनों के संपर्क में रहने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। वहीं BPA और फ्थेलेट्स हार्मोनल असंतुलन के साथ-साथ दिल की बीमारी, डायबिटीज और प्रजनन संबंधी समस्याओं का भी जोखिम है। इसके अलावा ब्लैक प्लास्टिक से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक शरीर में पहुंचकर टॉक्सिक लोड बढ़ा सकते हैं, जिससे भविष्य में कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

    किन लोगों को अधिक खतरा

    विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव ज्यादा गंभीर हो सकता है। हालांकि अभी तक इसका कैंसर से सीधा संबंध पूरी तरह साबित नहीं हुआ है, लेकिन इसके केमिकल्स को देखते हुए सावधानी बरतना जरूरी है। एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि काले प्लास्टिक की जगह कांच, स्टील या लकड़ी के बर्तनों का इस्तेमाल करें। खासतौर पर गर्म भोजन रखने के लिए प्लास्टिक से बचना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

  • ऑनलाइन खाने की गुणवत्ता पर फिर सवाल सागर के रेस्टोरेंट में छापा बासी पनीर और खराब सूप मिलने से मचा हड़कंप

    ऑनलाइन खाने की गुणवत्ता पर फिर सवाल सागर के रेस्टोरेंट में छापा बासी पनीर और खराब सूप मिलने से मचा हड़कंप


    मध्य प्रदेश के सागर शहर में ऑनलाइन मंगाए गए खाने की गुणवत्ता को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है जहां एक परिवार द्वारा ऑर्डर किए गए छोले कुलचे खाने के बाद बच्चों की तबीयत बिगड़ गई। घटना के बाद परिजनों ने भोजन की गुणवत्ता पर संदेह जताते हुए खाद्य विभाग से शिकायत की जिसके बाद विभाग की टीम ने संबंधित रेस्टोरेंट पर छापेमारी कर जांच की। जांच के दौरान किचन में कई तरह की अनियमितताएं सामने आईं और कुछ खाद्य सामग्री संदिग्ध अवस्था में पाई गई जिससे ऑनलाइन फूड डिलीवरी की सुरक्षा और गुणवत्ता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।

    जानकारी के अनुसार सागर निवासी अभिषेक अग्रवाल ने एक प्रसिद्ध रेस्टोरेंट से ऑनलाइन ऐप के माध्यम से छोले कुलचे का ऑर्डर दिया था। खाना घर पहुंचने के बाद बच्चों ने उसे खाया लेकिन कुछ ही समय बाद बच्चों को पेट दर्द और बेचैनी की शिकायत होने लगी। बच्चों की तबीयत अचानक बिगड़ने पर परिजनों को भोजन की गुणवत्ता पर शक हुआ। जब खाने की स्थिति को ध्यान से देखा गया तो उन्हें लगा कि खाना बासी हो सकता है। इसके बाद अभिषेक अग्रवाल ने बिना देर किए पूरे मामले की शिकायत खाद्य विभाग से की ताकि मामले की जांच हो सके और यदि किसी प्रकार की लापरवाही सामने आए तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सके।

    शिकायत मिलने के बाद खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम तुरंत सक्रिय हुई और सागर के सिविल लाइन क्षेत्र में स्थित सागर गैरे नामक रेस्टोरेंट पहुंचकर निरीक्षण किया। टीम ने किचन और स्टोर रूम की जांच की तो वहां कई गंभीर खामियां सामने आईं। अधिकारियों को किचन में साफ सफाई की स्थिति संतोषजनक नहीं लगी और खाद्य सामग्री को सुरक्षित रखने के मानकों का भी पालन नहीं किया जा रहा था। जांच के दौरान टीम को बासी पनीर खराब गुणवत्ता का हॉट एंड सॉर सूप और कुछ अन्य खाद्य पदार्थ संदिग्ध हालत में मिले। इसके अलावा किचन की स्वच्छता व्यवस्था भी मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई जिस पर अधिकारियों ने कड़ी नाराजगी जताई।

    खाद्य विभाग की टीम ने मौके से पनीर सूप और अन्य खाद्य सामग्री के सैंपल लिए हैं जिन्हें जांच के लिए भोपाल स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि प्रयोगशाला की रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि संबंधित खाद्य सामग्री मानकों के अनुरूप थी या नहीं। यदि जांच में खाद्य पदार्थ अमानक या असुरक्षित पाए जाते हैं तो संबंधित रेस्टोरेंट के खिलाफ खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी।

    इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता अभिषेक अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने बच्चों के लिए छोले कुलचे मंगवाए थे लेकिन खाना खाने के तुरंत बाद बच्चों की तबीयत खराब हो गई। उन्हें भोजन की स्थिति संदिग्ध लगी इसलिए उन्होंने तुरंत विभाग में शिकायत दर्ज कराई ताकि अन्य लोगों की सेहत को खतरा न हो और इस तरह की लापरवाही करने वालों पर कार्रवाई हो सके।

    खाद्य विभाग ने इस घटना के बाद आम नागरिकों से सतर्क रहने की अपील की है। विभाग का कहना है कि यदि किसी भी रेस्टोरेंट ढाबे या ऑनलाइन फूड डिलीवरी से मिलने वाले भोजन में बासीपन मिलावट या खराब गुणवत्ता का संदेह हो तो तुरंत इसकी जानकारी विभाग को दें ताकि समय रहते जांच कर कार्रवाई की जा सके और लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

  • साबरकांठा में ‘जहर का कारोबार’: डिटर्जेंट-यूरिया मिलाकर 5 साल से बन रहा था नकली दूध

    साबरकांठा में ‘जहर का कारोबार’: डिटर्जेंट-यूरिया मिलाकर 5 साल से बन रहा था नकली दूध


    नई दिल्ली। गुजरात के साबरकांठा जिले में खाद्य सुरक्षा को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। यहां डिटर्जेंट, यूरिया और अन्य खतरनाक केमिकल का इस्तेमाल कर नकली दूध और छाछ बनाने वाली एक फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया गया है, जो पिछले करीब पांच वर्षों से अवैध रूप से संचालित हो रही थी। इस कार्रवाई में अधिकारियों ने करीब 71 लाख रुपये का सामान जब्त किया है और एक नाबालिग समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

    यह छापेमारी श्री सत्य डेयरी प्रोडक्ट्स नाम की यूनिट पर की गई, जहां कथित तौर पर पानी, मिल्क पाउडर, कास्टिक सोडा, रिफाइंड पामोलिन तेल, सोयाबीन तेल, डिटर्जेंट पाउडर और यूरिया खाद मिलाकर बड़े पैमाने पर नकली दूध तैयार किया जा रहा था। यह मिलावटी दूध आसपास के कई गांवों में पाउच में पैक कर सप्लाई किया जाता था, जिससे हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा था।

    300 लीटर असली दूध से बनाते थे 1800 लीटर नकली दूध

    जांच में सामने आया कि आरोपी बेहद संगठित तरीके से इस धंधे को चला रहे थे। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, आरोपी रोजाना लगभग 300 लीटर असली दूध का इस्तेमाल करते थे। इसमें विभिन्न केमिकल और पाउडर मिलाकर वे 1,700 से 1,800 लीटर तक नकली दूध तैयार कर लेते थे। यानी कम मात्रा में असली दूध को आधार बनाकर उसकी मात्रा छह गुना तक बढ़ा दी जाती थी। इसके बाद इस दूध को पाउच में पैक कर गांव-गांव पहुंचाया जाता था, जहां आम लोग इसे असली समझकर इस्तेमाल करते थे। इसी तरह मिलावटी छाछ भी तैयार की जाती थी, जिससे यह कारोबार और अधिक फैल गया था।

    छापे में मिली खतरनाक सामग्री

    लोकल क्राइम ब्रांच, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी FSL और फूड एंड ड्रग्स डिपार्टमेंट की संयुक्त टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर इस फैक्ट्री पर कार्रवाई की। तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में खतरनाक केमिकल और मिलावट में इस्तेमाल होने वाला सामान बरामद किया गया। जब्त किए गए सामान में 450 किलो व्हे पाउडर, 625 किलो स्किम्ड मिल्क पाउडर, 300 किलो प्रीमियम SMP पाउडर, यूरिया खाद, कास्टिक सोडा, डिटर्जेंट पाउडर, सोयाबीन तेल और पामोलिन तेल शामिल हैं। इसके अलावा मौके से 1,962 लीटर तैयार मिलावटी दूध और 1,180 लीटर मिलावटी छाछ भी बरामद की गई, जिन्हें बाजार में भेजने की तैयारी थी।  अधिकारियों के अनुसार, इन केमिकल्स का इस्तेमाल दूध की मोटाई, झाग और प्रोटीन की मात्रा को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए किया जाता था, ताकि देखने में यह असली लगे और ग्राहक आसानी से धोखा खा जाएं।

    स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक

    विशेषज्ञों का मानना है कि डिटर्जेंट, यूरिया और कास्टिक सोडा जैसे तत्वों का सेवन शरीर के लिए बेहद खतरनाक होता है। लंबे समय तक ऐसे मिलावटी दूध का सेवन करने से पेट, किडनी और लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह और भी ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है।

    पांच साल से चल रहा था गोरखधंधा

    जांच में यह भी सामने आया है कि यह फैक्ट्री करीब पांच वर्षों से लगातार चल रही थी। इतने लंबे समय तक इस यूनिट का संचालन होना इस बात का संकेत है कि यह नेटवर्क काफी संगठित और योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहा था। गांवों में इसकी नियमित सप्लाई के कारण इसका दायरा भी काफी बड़ा हो गया था। छापेमारी के दौरान फैक्ट्री से दूध बनाने और पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले कई उपकरण भी बरामद किए गए। अधिकारियों ने मौके पर ही यूनिट को सील कर दिया है और आगे की जांच शुरू कर दी गई है।

    एक नाबालिग समेत पांच गिरफ्तार

    इस मामले में एक नाबालिग सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस धंधे से और कौन-कौन लोग जुड़े हुए थे और सप्लाई चेन कितनी दूर तक फैली हुई थी। जांच के दौरान और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। साथ ही, जिन इलाकों में यह दूध सप्लाई किया गया, वहां लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

    मिलावट के खिलाफ सख्ती जारी

    फूड एंड ड्रग्स विभाग ने साफ किया है कि इस तरह की अवैध गतिविधियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जाएगा। खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी ताकि आम लोगों की सेहत से कोई समझौता न हो।

  • जरूरत की खबर: क्या आपकी सेहत के लिए सही है फ्रोजन मटर? जानें इसे खरीदने के 6 गोल्डन रूल्स और सही इस्तेमाल का तरीका

    जरूरत की खबर: क्या आपकी सेहत के लिए सही है फ्रोजन मटर? जानें इसे खरीदने के 6 गोल्डन रूल्स और सही इस्तेमाल का तरीका


    नई दिल्ली। सर्दियों के खत्म होते ही ताजी मटर बाजार से गायब होने लगती है, ऐसे में फ्रोजन मटर ही एकमात्र विकल्प बचती है। ‘रेडी-टू-यूज’ होने के कारण यह न केवल समय बचाती है, बल्कि छीलने के झंझट से भी मुक्ति दिलाती है। लेकिन क्या यह उतनी ही पौष्टिक है जितनी ताजी मटर? एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि सही तरीके से चुनी और इस्तेमाल की जाए, तो फ्रोजन मटर ताजी मटर का एक बेहतरीन और सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती है।

    फ्रोजन मटर: ताजी मटर से कितनी अलग?
    अक्सर लोग इसे ‘प्रोसेस्ड फूड’ मानकर घबराते हैं, लेकिन डॉ. अनु अग्रवाल बताती हैं कि फ्रोजन मटर को ‘ब्लांचिंग’ प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसमें मटर को पहले उबलते पानी में डाला जाता है और फिर तुरंत ठंडा कर फ्रीज किया जाता है। यह प्रक्रिया मटर के प्राकृतिक रंग, स्वाद और पोषक तत्वों को ‘लॉक’ कर देती है। कई मामलों में, फ्रोजन मटर उन ताजी मटर से बेहतर हो सकती है जो कई दिनों तक ट्रांसपोर्टेशन या धूप में रखी रहती हैं।

    खरीदते समय बरतें ये 6 सावधानियां
    बाजार से फ्रोजन मटर का पैकेट उठाते समय इन बातों का खास ख्याल रखें:पैकेट को हिलाकर देखें: मटर के दाने अलग-अलग महसूस होने चाहिए। यदि वे एक बड़े बर्फ के गोले की तरह जमे हुए हैं, तो इसका मतलब है कि पैकेट को पहले पिघलाया गया और फिर दोबारा फ्रीज किया गया है । ऐसे पैकेट न खरीदें। बर्फ की परत: अगर पैकेट के अंदर बहुत अधिक बर्फ जमी है, तो यह नमी और खराब स्टोरेज की निशानी है।

    एक्सपायरी डेट: हमेशा मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट चेक करें। फ्रोजन मटर आमतौर पर 6-12 महीने तक अच्छी रहती है। पैकेट की बनावट: पैकेट कहीं से फटा या ढीला नहीं होना चाहिए। सीलबंद पैकेट ही लें। रंग: दानों का रंग गहरा हरा होना चाहिए। यदि रंग हल्का पीला या सफेद पड़ रहा हो, तो मटर पुरानी हो सकती है। पिक-अप टाइम: ग्रोसरी शॉपिंग के दौरान फ्रोजन मटर सबसे अंत में उठाएं ताकि वह घर पहुँचने तक ज्यादा न पिघले।

    इस्तेमाल करने का सही तरीका

    डायरेक्ट कुकिंग न करें: फ्रोजन मटर को फ्रीजर से निकालकर सीधे गरम तेल या तड़के में न डालें।गुनगुना पानी: इस्तेमाल से 5-10 मिनट पहले मटर को सामान्य या गुनगुने पानी में भिगोकर रखें। इससे इसकी बर्फ पिघल जाएगी और यह अपनी प्राकृतिक कोमलता में आ जाएगी। ओवरकुकिंग से बचें: चूंकि फ्रोजन मटर पहले से ही ‘ब्लांच’ होती है, इसलिए इसे ताजी मटर की तुलना में बहुत कम पकाने की जरूरत होती है। ज्यादा पकाने से इसके विटामिन सी और बी-कॉम्प्लेक्स नष्ट हो सकते हैं।