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  • ग्रीनलैंड तनाव में नरमी से बाजार को राहत, रुपये में स्थिरता की उम्मीद: डीबीएस बैंक रिपोर्ट

    ग्रीनलैंड तनाव में नरमी से बाजार को राहत, रुपये में स्थिरता की उम्मीद: डीबीएस बैंक रिपोर्ट


    नई दिल्ली।
    ग्रीनलैंड से जुड़े वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव में कमी आने के संकेतों ने वित्तीय बाजारों को राहत दी है। गुरुवार को जारी डीबीएस बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटनाक्रम से निवेशकों की धारणा में सुधार हुआ है और इसका सीधा असर मुद्रा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में रुपये में उतार-चढ़ाव बना रहेगा, लेकिन उसकी गिरावट की रफ्तार अब पहले जैसी तेज नहीं रहने की संभावना है।इसका शुरुआती असर गुरुवार के कारोबार में ही दिखा, जब रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर से संभलता नजर आया। शुरुआती सत्र में रुपया करीब 15 पैसे मजबूत होकर 91.50 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत है, हालांकि वैश्विक कारकों पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।

    डीबीएस बैंक की कार्यकारी निदेशक और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव ने रिपोर्ट में बताया कि पिछले एक साल से रुपये पर दबाव बना हुआ था। इसके पीछे वैश्विक और घरेलू दोनों तरह के कारण जिम्मेदार रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक वीआईएक्स इंडेक्स में आई तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि बाजार के लगभग सभी संकेतक कमजोरी के दौर से गुजर रहे थे। प्रतिकूल भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल ने इस दबाव को और बढ़ाया। ऐसे माहौल में ग्रीनलैंड से जुड़े तनाव में नरमी के संकेत बाजार के लिए बड़ी राहत के रूप में सामने आए हैं।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यूरोपीय संघ के साथ एक बड़े व्यापार समझौते को लेकर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं और इसकी औपचारिक घोषणा अगले सप्ताह हो सकती है। इसके साथ ही विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता को लेकर भी उत्साहजनक माहौल बना है। इन घटनाओं से बाजार में दोबारा उम्मीद जगी है और निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है।घरेलू मोर्चे पर देखा जाए तो रुपये पर दबाव ऐसे समय में बना, जब देश की आर्थिक स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। चालू वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में औसत आर्थिक वृद्धि दर करीब 8 प्रतिशत रही है। आने वाले वित्त वर्ष में भी इसके 7.5 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूती से आगे बढ़ रही है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर रुपया निर्यातकों को कुछ हद तक राहत देता है खासकर तब जब वैश्विक स्तर पर मांग में उतार-चढ़ाव हो। हालांकि इससे आयात महंगा होने और अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में असंतुलन की स्थिति भी पैदा हुई है।डीबीएस बैंक के अनुसार, देश का चालू खाता घाटा फिलहाल नियंत्रण में है और यह जीडीपी के 1.0 से 1.2 प्रतिशत के बीच रह सकता है। असली चिंता विदेशी पूंजी प्रवाह को लेकर है। वर्ष 2025 में शुद्ध पूंजी निकासी के बाद चालू वर्ष में इक्विटी बाजार से लगभग 3 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है। बॉन्ड बाजार में भी विदेशी निवेशकों की रुचि कमजोर बनी हुई है।

    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्थिति पिछले साल के मुकाबले बेहतर जरूर हुई है, लेकिन विदेशी कंपनियों द्वारा मुनाफा वापस ले जाने के कारण शुद्ध निवेश में अभी भी अंतर बना हुआ है। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि आने वाले केंद्रीय बजट में सरकारी खर्च का असर साफ दिखाई देगा, क्योंकि वित्त वर्ष 2027 तक केंद्र और राज्यों का कुल उधार बढ़ने की संभावना है।कुल मिलाकर ग्रीनलैंड से जुड़े तनाव में कमी ने बाजार को तात्कालिक राहत दी है और रुपये में स्थिरता की उम्मीद जगी है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक घटनाक्रम और पूंजी प्रवाह की दिशा पर ही बाजार की चाल निर्भर करेगी।

  • डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए गिरावट की बड़ी वजहें और बचाव के उपाय

    डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए गिरावट की बड़ी वजहें और बचाव के उपाय


    नई दिल्ली
    /भारतीय रुपया इन दिनों गंभीर दबाव में है और डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 91 के पार चला गया जिसने सरकार रिजर्व बैंक निवेशकों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह गिरावट किसी एक वजह से नहीं बल्कि घरेलू और वैश्विक कारकों के संयुक्त असर से हुई है। सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली माना जा रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशक FII भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से तेजी से पैसा निकाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से करीब 18 अरब डॉलर से अधिक निकाल चुके हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये की मांग कमजोर पड़ी है जिसका सीधा असर मुद्रा विनिमय दर पर दिख रहा है।

    दूसरा अहम कारण डॉलर की वैश्विक मजबूती है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों और मजबूत आर्थिक संकेतों के चलते डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं के मुकाबले मजबूत बना हुआ है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ता है तो वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका की ओर रुख करते हैं। इसका असर भारत जैसे देशों की मुद्रा पर पड़ता है।भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर कुछ उत्पादों में ऊंची टैरिफ दरें लगाए जाने से भारतीय सामानों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा घटी है। इससे निर्यात से होने वाली डॉलर की आमद सीमित हुई है और चालू खाते के घाटे की चिंता बढ़ी है।

    रुपये की गिरावट का असर आम आदमी की जिंदगी पर भी पड़ता है। कमजोर रुपये के कारण कच्चा तेल गैस इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने और महंगाई में दोबारा तेजी आने का खतरा रहता है जिसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ता है।तेल आयात भी रुपये की कमजोरी की एक बड़ी वजह है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है जो मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की गिरावट को थामने में भारतीय रिजर्व बैंक RBIकी भूमिका बेहद अहम है। आरबीआई जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर और तरलता का प्रबंधन कर रुपये की तेज गिरावट को रोक सकता है। हालांकि केंद्रीय बैंक आमतौर पर बहुत ज्यादा हस्तक्षेप से बचता है ताकि बाजार में अस्थिरता न बढ़े।लंबी अवधि में रुपये को स्थिर रखने के लिए सिर्फ मौद्रिक हस्तक्षेप काफी नहीं होगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश FDIऔर दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देना होगा। मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से डॉलर की स्थायी आमद होगी।

    निर्यात बढ़ाना भी रुपये को सहारा देने का एक अहम तरीका है। आईटी फार्मा इंजीनियरिंग और सेवा क्षेत्र के निर्यात में मजबूती आने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो सकता है। इसके साथ ही अमेरिका और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ संतुलित और स्पष्ट व्यापार समझौते विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ा सकते हैं।महंगाई पर नियंत्रण भी रुपये की स्थिरता के लिए जरूरी है। अगर महंगाई काबू में रहती है तो आरबीआई को नीतिगत समर्थन बनाए रखने में आसानी होती है और ब्याज दरों पर दबाव कम रहता है। मध्यम से लंबी अवधि में नीतिगत सुधार निवेश अनुकूल माहौल और निर्यात को बढ़ावा देने वाली रणनीतियां रुपये की गिरावट पर ब्रेक लगा सकती हैं।