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  • इंटर्न डॉक्टरों के प्रदर्शन का बड़ा असर: गांधी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सेवाएं भी बंद मरीजों की बढ़ी परेशानी

    इंटर्न डॉक्टरों के प्रदर्शन का बड़ा असर: गांधी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सेवाएं भी बंद मरीजों की बढ़ी परेशानी


    भोपाल। गांधी मेडिकल कॉलेज में इंटर्न डॉक्टरों की हड़ताल का असर अब स्वास्थ्य सेवाओं पर साफ दिखाई देने लगा है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे इंटर्न डॉक्टरों ने अस्पताल की कई सेवाओं से दूरी बना ली है। हालात यहां तक पहुंच गए कि इमरजेंसी सेवाएं भी प्रभावित हुईं। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ा। अचानक सेवाओं के प्रभावित होने से अस्पताल परिसर में अफरा तफरी का माहौल बन गया।

    इंटर्न डॉक्टर लंबे समय से अपने स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा स्टाइपेंड उनकी जिम्मेदारियों और काम के मुकाबले काफी कम है। डॉक्टरों का तर्क है कि इंटर्नशिप के दौरान उन्हें अस्पताल में नियमित रूप से मरीजों की देखभाल करनी पड़ती है। ओपीडी से लेकर वार्ड और इमरजेंसी तक अलग अलग जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। इसके बावजूद उन्हें मिलने वाला स्टाइपेंड उनकी जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। इसी मांग को लेकर डॉक्टरों ने काम बंद आंदोलन का रास्ता अपनाया है।

    प्रदर्शन के बीच गांधी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सेवाओं के प्रभावित होने की जानकारी सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन में भी हलचल बढ़ गई। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए किसी भी तरह की देरी गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है। ऐसे में डॉक्टरों के काम से अलग होने के कारण मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ गई। कई लोग इलाज और चिकित्सकीय सलाह के लिए अस्पताल पहुंचे लेकिन सेवाओं के प्रभावित होने से उन्हें इंतजार करना पड़ा।

    मामले की जानकारी डीन डॉ. झारोकर मालवीय ने दी। उन्होंने बताया कि इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन और सेवाओं के प्रभावित होने की स्थिति सामने आई है। डॉक्टरों की मांगों को लेकर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के स्तर पर बातचीत का दौर भी चल रहा है। हालांकि आंदोलनकारी डॉक्टर अपनी मांगों पर स्पष्ट निर्णय चाहते हैं और इसी वजह से विरोध लगातार जारी है।

    इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि वे अपनी मांगों को लेकर कई बार जिम्मेदार अधिकारियों तक बात पहुंचा चुके हैं। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से अब आंदोलन खत्म नहीं होगा। डॉक्टर स्टाइपेंड में उचित बढ़ोतरी के साथ अपनी दूसरी मांगों पर भी ठोस कार्रवाई चाहते हैं। जब तक उन्हें संतोषजनक फैसला नहीं मिलता तब तक आंदोलन जारी रखने की बात कही जा रही है।

    गांधी मेडिकल कॉलेज में सेवाओं के प्रभावित होने का सीधा असर आम मरीजों पर पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में डॉक्टरों की हड़ताल लंबी खिंचने पर मरीजों की परेशानी और बढ़ सकती है। अस्पताल प्रबंधन के सामने चुनौती यह है कि आंदोलन के बीच जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं को किस तरह सुचारू रखा जाए।

    फिलहाल इंटर्न डॉक्टर अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं। वहीं अस्पताल प्रशासन भी स्थिति को संभालने और मरीजों को जरूरी उपचार उपलब्ध कराने की कोशिश में जुटा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और डॉक्टरों के बीच बातचीत से कोई ठोस समाधान निकलता है या नहीं। अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो गांधी मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सेवाओं पर संकट और गहरा सकता है।

  • कैंसर की समय रहते होगी पहचान, जीएमसी भोपाल ने बनाया AI आधारित स्क्रीनिंग सिस्टम, भारत सरकार ने दिया पेटेंट

    कैंसर की समय रहते होगी पहचान, जीएमसी भोपाल ने बनाया AI आधारित स्क्रीनिंग सिस्टम, भारत सरकार ने दिया पेटेंट


    मध्यप्रदेश । देश में तेजी से बढ़ रहे मुख कैंसर की चुनौती से निपटने के लिए मध्यप्रदेश से एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। गांधी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है जो शुरुआती चरण में ही ओरल कैंसर की पहचान करने में सक्षम होगी। इस नवाचार के तहत तैयार किए गए ओरल कैंसर स्क्रीनिंग डिवाइस के डिजाइन को भारत सरकार ने पेटेंट प्रदान किया है। इसके साथ ही महाविद्यालय के डेंटल सर्जरी विभाग ने मुख आरोग्य नाम का एक स्मार्ट मोबाइल ऐप भी विकसित किया है जो मरीज के मुंह की तस्वीरों का एआई तकनीक से विश्लेषण कर कैंसर के संभावित लक्षणों की पहचान करेगा।

    यह तकनीक प्रदेश में अपनी तरह की पहली पहल मानी जा रही है और भविष्य में मुख कैंसर की स्क्रीनिंग व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। खास बात यह है कि इस तकनीक का लाभ केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों तक भी पहुंचेगा।

    मुख आरोग्य ऐप को विशेष रूप से आशा कार्यकर्ताओं सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों के उपयोग के लिए तैयार किया गया है। इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के मुंह की शुरुआती जांच आसानी से की जा सकेगी। यदि किसी व्यक्ति में कैंसर के संभावित लक्षण दिखाई देते हैं तो ऐप तुरंत उसे विशेषज्ञ अस्पताल में रेफर करने की सुविधा भी देगा। इससे बीमारी की पहचान और इलाज के बीच होने वाली देरी काफी कम हो सकेगी।

    भारत में हर वर्ष लगभग डेढ़ लाख नए ओरल कैंसर के मामले सामने आते हैं। मध्यप्रदेश में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है और पुरुषों में इसकी घटना दर करीब 25 प्रति लाख आबादी दर्ज की गई है। भोपाल उन शहरों में शामिल है जहां मुख कैंसर का बोझ अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब कैंसर काफी बढ़ चुका होता है जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है। ऐसे में शुरुआती पहचान मरीज की जान बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    डेंटल सर्जरी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अनुज भार्गव ने बताया कि मोबाइल ऐप मरीज के मुंह के भीतर मौजूद घावों और संदिग्ध लक्षणों की तस्वीरों का विश्लेषण करता है। इसके बाद एआई आधारित प्रणाली यह आकलन करती है कि कैंसर की आशंका है या नहीं। यदि रिपोर्ट संदिग्ध आती है तो मरीज को तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सकों के पास भेजने की व्यवस्था भी ऐप के माध्यम से की गई है। उनका कहना है कि शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान होने पर इलाज अधिक प्रभावी कम जटिल और कम खर्चीला होता है जबकि मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाती है।

    डॉ. अनुज भार्गव ने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य केवल नई तकनीक विकसित करना नहीं बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को स्वास्थ्य सेवाओं की अंतिम पंक्ति तक पहुंचाना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में यह ऐप प्रदेश के सभी जिलों में उपयोग होगा। इससे बड़ी संख्या में स्क्रीनिंग डेटा एकत्र होगा जिससे एआई मॉडल और अधिक सटीक बनेगा तथा भविष्य में आम लोगों को इसका व्यापक लाभ मिलेगा।

    यह अनुसंधान महाविद्यालय की अधिष्ठाता डॉ. कविता ऐन सिंह के मार्गदर्शन में पूरा हुआ। परियोजना के विकास में डॉ. ऋचा शर्मा और डॉ. अनिमेष बड़ोदिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश में ओरल कैंसर की शुरुआती पहचान और समय पर उपचार की दिशा में एक नई क्रांति साबित हो सकती है।

  • MP में एलपीजी संकट: रायसेन में चक्काजाम, भोपाल में डॉक्टरों को भूखे पेट ड्यूटी का खतरा

    MP में एलपीजी संकट: रायसेन में चक्काजाम, भोपाल में डॉक्टरों को भूखे पेट ड्यूटी का खतरा


    भोपाल। मध्य प्रदेश में एलपीजी संकट लगातार गहराता जा रहा है। प्रदेश के 50 हजार से ज्यादा होटल और रेस्टॉरेंट पिछले पांच दिनों से कॉमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई न मिलने से जूझ रहे हैं। कई होटलों में केवल 24 घंटे का स्टॉक बचा है, जिससे खान-पान व्यवस्था ठप होने के कगार पर है। लोग वैकल्पिक तौर पर इंडक्शन और डीजल भट्ठियों का सहारा ले रहे हैं, लेकिन घरेलू रसोई और हॉस्पिटल किचन की समस्याएं और भयावह हो गई हैं।

    सबसे ज्यादा उग्र स्थिति रायसेन में देखने को मिली। सागर रोड स्थित गैस एजेंसी पर सुबह 5 बजे से कतार में खड़े सैकड़ों लोगों का धैर्य जवाब दे गया। सुबह 10 बजे तक एजेंसी नहीं खुली तो लोगों ने खाली सिलेंडर सड़क पर रखकर चक्काजाम कर दिया। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल थीं। एक महिला ने कहा, “मैं सुबह 7 बजे ही घर का सारा काम छोड़ एजेंसी पहुंच गई थी। घर में न चाय बनी, न बच्चों के लिए खाना। खाली सिलेंडर लेकर दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।”

    रायसेन में चक्काजाम की सूचना पर एसडीएम और तहसीलदार भारी पुलिस बल के साथ पहुंचे और उपभोक्ताओं को समझाइश देकर शांत किया। प्रदर्शन के कारण सागर रोड पर लंबी वाहनों की कतारें लग गईं और आवागमन बाधित रहा। एजेंसी संचालक का कहना है कि भोपाल से आ रहा सिलेंडर ट्रक रास्ते में पंक्चर हो गया था, इसलिए डिलीवरी में देरी हुई। प्रशासन ने आश्वासन दिया कि ट्रक पहुंचते ही वितरण शुरू कर दिया जाएगा।

    राजधानी भोपाल में भी हालात गंभीर हैं। गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) में एलपीजी संकट के कारण हॉस्टल मेस, जेडीए कैंटीन और मरीजों के सेंट्रलाइज्ड किचन की प्रोडक्शन क्षमता 50% तक घट गई है। मेस संचालकों को कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिल रहे, बुकिंग पर 25 दिन की वेटिंग दी जा रही है। वैकल्पिक उपाय के तौर पर डीजल भट्ठियों का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन उन पर चाय और रोटी बनाना संभव नहीं।

    संकट बढ़ता रहा तो रेजिडेंट डॉक्टरों को खाली पेट ड्यूटी करनी पड़ सकती है, जिसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा। एलपीजी संकट ने राज्य में खाद्य सुरक्षा, रेस्टॉरेंट व्यवसाय और हॉस्पिटल संचालन को सीधे प्रभावित कर दिया है।