कैंसर की समय रहते होगी पहचान, जीएमसी भोपाल ने बनाया AI आधारित स्क्रीनिंग सिस्टम, भारत सरकार ने दिया पेटेंट


मध्यप्रदेश । देश में तेजी से बढ़ रहे मुख कैंसर की चुनौती से निपटने के लिए मध्यप्रदेश से एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। गांधी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है जो शुरुआती चरण में ही ओरल कैंसर की पहचान करने में सक्षम होगी। इस नवाचार के तहत तैयार किए गए ओरल कैंसर स्क्रीनिंग डिवाइस के डिजाइन को भारत सरकार ने पेटेंट प्रदान किया है। इसके साथ ही महाविद्यालय के डेंटल सर्जरी विभाग ने मुख आरोग्य नाम का एक स्मार्ट मोबाइल ऐप भी विकसित किया है जो मरीज के मुंह की तस्वीरों का एआई तकनीक से विश्लेषण कर कैंसर के संभावित लक्षणों की पहचान करेगा।

यह तकनीक प्रदेश में अपनी तरह की पहली पहल मानी जा रही है और भविष्य में मुख कैंसर की स्क्रीनिंग व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकती है। खास बात यह है कि इस तकनीक का लाभ केवल बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों तक भी पहुंचेगा।

मुख आरोग्य ऐप को विशेष रूप से आशा कार्यकर्ताओं सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों के उपयोग के लिए तैयार किया गया है। इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के मुंह की शुरुआती जांच आसानी से की जा सकेगी। यदि किसी व्यक्ति में कैंसर के संभावित लक्षण दिखाई देते हैं तो ऐप तुरंत उसे विशेषज्ञ अस्पताल में रेफर करने की सुविधा भी देगा। इससे बीमारी की पहचान और इलाज के बीच होने वाली देरी काफी कम हो सकेगी।

भारत में हर वर्ष लगभग डेढ़ लाख नए ओरल कैंसर के मामले सामने आते हैं। मध्यप्रदेश में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है और पुरुषों में इसकी घटना दर करीब 25 प्रति लाख आबादी दर्ज की गई है। भोपाल उन शहरों में शामिल है जहां मुख कैंसर का बोझ अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब कैंसर काफी बढ़ चुका होता है जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है। ऐसे में शुरुआती पहचान मरीज की जान बचाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

डेंटल सर्जरी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अनुज भार्गव ने बताया कि मोबाइल ऐप मरीज के मुंह के भीतर मौजूद घावों और संदिग्ध लक्षणों की तस्वीरों का विश्लेषण करता है। इसके बाद एआई आधारित प्रणाली यह आकलन करती है कि कैंसर की आशंका है या नहीं। यदि रिपोर्ट संदिग्ध आती है तो मरीज को तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सकों के पास भेजने की व्यवस्था भी ऐप के माध्यम से की गई है। उनका कहना है कि शुरुआती चरण में कैंसर की पहचान होने पर इलाज अधिक प्रभावी कम जटिल और कम खर्चीला होता है जबकि मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाती है।

डॉ. अनुज भार्गव ने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य केवल नई तकनीक विकसित करना नहीं बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को स्वास्थ्य सेवाओं की अंतिम पंक्ति तक पहुंचाना है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में यह ऐप प्रदेश के सभी जिलों में उपयोग होगा। इससे बड़ी संख्या में स्क्रीनिंग डेटा एकत्र होगा जिससे एआई मॉडल और अधिक सटीक बनेगा तथा भविष्य में आम लोगों को इसका व्यापक लाभ मिलेगा।

यह अनुसंधान महाविद्यालय की अधिष्ठाता डॉ. कविता ऐन सिंह के मार्गदर्शन में पूरा हुआ। परियोजना के विकास में डॉ. ऋचा शर्मा और डॉ. अनिमेष बड़ोदिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश में ओरल कैंसर की शुरुआती पहचान और समय पर उपचार की दिशा में एक नई क्रांति साबित हो सकती है।