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  • अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार

    अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ नजर आने लगा है। लगातार तीसरे दिन कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती सख्ती और जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। इसी के चलते ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

    फरवरी से अब तक 50% से ज्यादा महंगा हुआ तेल

    विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। फरवरी से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं पिछले सप्ताह ही कीमतों में करीब 8 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया था।

    ट्रंप चाहते हैं कि ईरान जल्द समझौते के लिए तैयार हो जाए। माना जा रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएं कम हो सकती हैं और तेल परिवहन सामान्य हो सकता है।

    ट्रंप ने दी सख्त चेतावनी

    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि तेहरान के पास समय बहुत कम है और उसे जल्द फैसला लेना होगा। ट्रंप ने कहा कि ईरान को केवल एक परमाणु साइट संचालित करने की अनुमति होगी, जबकि बाकी साइटों को बंद करना पड़ेगा।

    इसके अलावा ट्रंप ने हाई एनरिच्ड यूरेनियम का भंडार अमेरिका को सौंपने की बात कही। उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका ईरान की विदेशों में फ्रीज की गई संपत्तियों का बड़ा हिस्सा जारी नहीं करेगा।

    ईरान ने भी दी जवाबी धमकी

    ट्रंप के बयान के बाद ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ईरानी सैन्य प्रवक्ता अबोलफजल शेकर्ची ने कहा कि यदि ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी संसाधनों और ठिकानों को निशाना बनाने में देर नहीं लगेगी।

    यूएई के न्यूक्लियर प्लांट के पास ड्रोन हमला

    इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अल धफरा क्षेत्र स्थित बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के बाहरी हिस्से में ड्रोन हमला होने की खबर सामने आई है। हमले के बाद इलाके में आग लग गई, हालांकि सुरक्षा और दमकल टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक, इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

  • तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल

    तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल


    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है जहां United Arab Emirates ने 1 मई से OPEC से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासतौर पर भारत जैसे आयातक देशों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

    भारत के पूर्व राजदूत Navdeep Singh Suri के मुताबिक यूएई का यह फैसला अचानक नहीं है बल्कि पिछले पांच वर्षों से इसकी तैयारी चल रही थी। उनका कहना है कि यूएई लंबे समय से ओपेक द्वारा तय किए गए उत्पादन कोटे से असंतुष्ट था। शुरुआत में उसे करीब 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन की अनुमति थी जिसे बाद में बढ़ाकर 3.4 मिलियन बैरल किया गया लेकिन यह भी उसकी बढ़ती क्षमता के अनुरूप नहीं था।

    सूरी ने बताया कि यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी तेल उत्पादन क्षमता में भारी निवेश किया है और वह जल्द ही 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन करने की स्थिति में पहुंच सकता है। ऐसे में वह ओपेक के कड़े नियमों और सऊदी अरब के प्रभाव वाले फैसलों से मुक्त होकर अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चाहता है। यही वजह है कि उसने स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

    हालांकि इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत देखने को मिल सकता है। मौजूदा समय में Strait of Hormuz में तनाव और रुकावट के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है जिससे कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर होना बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आने वाले समय में होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सामान्य होती है और तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से शुरू हो जाती है तो यूएई का अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इससे भारत जैसे देशों को राहत मिल सकती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं।

    लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा खतरा भी सामने आता है। ओपेक लंबे समय से तेल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है जिससे कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। यदि यूएई जैसे बड़े उत्पादक देश इस संगठन से बाहर निकलते हैं तो ओपेक की पकड़ कमजोर हो सकती है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच Iran और United States के बीच जारी तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पूर्व राजदूत सूरी ने स्पष्ट कहा कि इन हालातों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उनका मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और आपूर्ति में रुकावट वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

    कुल मिलाकर यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देश इस फैसले के बाद क्या रणनीति अपनाते हैं और बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • क्या है OPEC और क्यों इससे अलग हो रहा UAE, समझें तेल की दुनिया का बड़ा खेल

    क्या है OPEC और क्यों इससे अलग हो रहा UAE, समझें तेल की दुनिया का बड़ा खेल

    नई दिल्ली । नई दिल्ली में वैश्विक तेल बाजार को लेकर एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है जब संयुक्त अरब अमीरात ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक से खुद को अलग करने का ऐलान कर दिया है 1 मई से यूएई इस संगठन का हिस्सा नहीं रहेगा इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है

    ओपेक दरअसल दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक अंतर सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना 14 सितंबर 1960 को बगदाद में की गई थी इसका उद्देश्य वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखना और सदस्य देशों के बीच उत्पादन तथा कीमतों को संतुलित रखना है शुरुआत में इसमें पांच देश शामिल थे जिनमें ईरान इराक कुवैत सऊदी अरब और वेनेजुएला शामिल थे समय के साथ यह संगठन विस्तार पाकर करीब 12 देशों तक पहुंच गया

    ओपेक की खासियत यह है कि इसके सदस्य देश मिलकर तय करते हैं कि बाजार में कितना तेल उत्पादन होगा ताकि कीमतें संतुलित रहें अगर उत्पादन ज्यादा होता है तो कीमतें गिरती हैं और कम उत्पादन से कीमतें बढ़ जाती हैं ऐसे में ओपेक वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है

    यूएई के इस फैसले के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और खासकर ईरान के साथ टकराव के बाद खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक मतभेद सामने आए हैं इसके अलावा यूएई लंबे समय से अपने तेल उत्पादन को बढ़ाना चाहता है जबकि ओपेक के अंदर खासकर सऊदी अरब उत्पादन को सीमित रखने की नीति पर जोर देता रहा है

    यूएई ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश रहा है लेकिन कोटा सिस्टम के कारण वह अपनी पूरी क्षमता के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रहा था ऐसे में संगठन से बाहर होने के बाद अब उसे अपनी रणनीति के अनुसार उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की स्वतंत्रता मिल जाएगी

    इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ना तय माना जा रहा है विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूएई उत्पादन बढ़ाता है तो बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों में गिरावट आ सकती है इसका सीधा फायदा भारत जैसे देशों को मिल सकता है जो बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं सस्ती कीमतों पर तेल मिलने से महंगाई पर भी नियंत्रण संभव है

    हालांकि इस कदम से ओपेक की एकजुटता और खासकर सऊदी अरब की नेतृत्व भूमिका कमजोर हो सकती है साथ ही बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है ओपेक के अलावा ओपेक प्लस नाम का एक व्यापक समूह भी है जिसमें रूस सहित कई अन्य देश शामिल हैं जो मिलकर तेल उत्पादन पर प्रभाव डालते हैं ऐसे में यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा संतुलन को किस दिशा में ले जाएगा यह देखना अहम होगा

  • वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर कई देशों में 85 प्रतिशत तक उछाल के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत

    वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर कई देशों में 85 प्रतिशत तक उछाल के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत

    नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जहां कई देशों में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है वहीं भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में वृद्धि दर्ज की जा रही है इसके बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत मिलती नजर आ रही है

    दुनिया के कई हिस्सों में ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाला है आंकड़ों के अनुसार यूएई में डीजल की कीमतों में लगभग 85 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी डीजल की कीमतें 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ी हैं वहीं कनाडा पाकिस्तान फ्रांस श्रीलंका और ब्रिटेन जैसे देशों में यह वृद्धि 35 से 50 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से भू राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण मानी जा रही है

    पेट्रोल की कीमतों का रुझान भी इसी प्रकार का रहा है पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतों में सबसे अधिक लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है जबकि अमेरिका और यूएई में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है अन्य देशों जैसे कनाडा श्रीलंका और चीन में भी पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है हालांकि ब्राजील और रूस जैसे देशों में यह वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है

    इसके विपरीत भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें वर्ष की शुरुआत के स्तर पर ही स्थिर बनी हुई हैं डीजल की कीमत लगभग 87 रुपए प्रति लीटर और पेट्रोल की कीमत करीब 94 रुपए प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है यह स्थिरता ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता अपने चरम पर है और कई देश महंगाई के दबाव से जूझ रहे हैं

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कीमतों को नियंत्रित रखने में सरकारी नीतियों और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की रणनीति का महत्वपूर्ण योगदान है तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से ईंधन की खरीद इस तरह कर रही हैं जिससे खुदरा कीमतों को स्थिर रखा जा सके हालांकि इसके चलते कंपनियों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है

    आर्थिक विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ती हैं तो भारतीय तेल कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है अनुमान के अनुसार यदि कीमतें 135 से 165 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती हैं तो पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 18 रुपए और डीजल पर लगभग 35 रुपए तक का नुकसान हो सकता है इसके अलावा कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से लागत में करीब 6 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हो सकती है

    कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि जहां वैश्विक बाजार में अस्थिरता और महंगाई का दबाव बढ़ रहा है वहीं भारत में संतुलित नीतियों और प्रबंधन के चलते ईंधन की कीमतों को स्थिर बनाए रखने में सफलता मिली है यह न केवल उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है बल्कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक साबित हो रही है

  • होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट

    होर्मुज तनाव के बीच अमेरिका ने बदला रुख, रूसी तेल खरीद पर फिर मिली अस्थायी छूट


    नई दिल्‍ली । ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के बीच अमेरिका ने अपने रुख में बदलाव करते हुए बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने रूसी तेल की खरीद पर एक बार फिर अस्थायी छूट दे दी है। खास बात यह है कि यह निर्णय उस घोषणा के दो दिन बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि इस राहत को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

    एक महीने के लिए मिली नई छूट

    अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 17 अप्रैल से लागू नया नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके तहत देशों को 16 मई तक रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति दी गई है। यानी लगभग एक महीने तक समुद्र में लोड किए गए रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। इससे पहले दी गई 30 दिन की छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी और संकेत मिल रहे थे कि अब अमेरिका सख्ती अपनाएगा, लेकिन बदलते हालात ने फैसले को भी बदल दिया।

    क्या वजह रही इस फैसले की?
    ईरान के साथ टकराव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। इस रूट पर खतरा बढ़ने से तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। ऐसे में अमेरिका के सामने चुनौती थी कि सप्लाई घटने से कीमतें और न बढ़ जाएं, जिसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता। इसी वजह से ट्रंप प्रशासन ने बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए यह अस्थायी राहत देने का फैसला किया।

    रूस के राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रिएव के अनुसार, पहले दी गई छूट से लगभग 100 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल बाजार में आ सकता था, जो एक दिन की वैश्विक खपत के बराबर है। नई छूट से भी सप्लाई को सहारा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    सहयोगी देशों की नाराजगी बढ़ी

    अमेरिका के इस कदम से उसके सहयोगी देशों में असंतोष बढ़ सकता है। यूरोप लगातार रूस पर कड़े प्रतिबंध बनाए रखने के पक्ष में रहा है। यूरोपीय यूनियन की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल रूस पर नरमी दिखाने का समय नहीं है। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला पश्चिमी देशों की एकजुट रणनीति को कमजोर कर सकता है और यूक्रेन युद्ध से जुड़ी नीतियों पर सवाल खड़े कर सकता है।

    तेल बाजार को मिली राहत
    इस घोषणा के बाद तेल बाजार में कुछ राहत देखने को मिली है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 9% गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई, जो पिछले एक महीने का न्यूनतम स्तर है। इस गिरावट की एक वजह यह भी है कि ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि सीजफायर के दौरान होर्मुज स्ट्रेट को व्यावसायिक जहाजों के लिए खोल दिया गया है।

  • ईरान-US युद्ध का असर, आम उपभोक्ताओं को राहत, लेकिन तेल कंपनियों को हो रहा नुकसान

    ईरान-US युद्ध का असर, आम उपभोक्ताओं को राहत, लेकिन तेल कंपनियों को हो रहा नुकसान

    नई दिल्ली। ईरान-अमेरिका युद्ध का असर वैश्विक तेल बाजार पर दिख रहा है, लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल राहत बनी हुई है। कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम डबल हो गए हैं। इसके बावजूद भारत में रिटेल कीमतें स्थिर हैं, जिससे तेल कंपनियों की सेहत पर दबाव बढ़ गया है।

    3 अप्रैल सुबह 6 बजे के रेट के अनुसार दिल्ली में इंडियन ऑयल के पंप पर साधारण पेट्रोल ₹94.77 और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर बिक रहा है। XP95 पेट्रोल ₹101.89 और XG डीजल ₹91.49 प्रति लीटर की दर पर उपलब्ध हैं।

    कंपनियों को हो रहा भारी नुकसान

    पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, फिलहाल पेट्रोल पर कंपनियों को प्रति लीटर लगभग ₹24 और डीजल पर करीब ₹104 का नुकसान हो रहा है। इस अंतर को “अंडर-रिकवरी” कहा जाता है, जिसे कंपनियां अपने मुनाफे से पूरा कर रही हैं।

    सरकार ने क्यों नहीं बढ़ाए दाम?
    उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की और तेल कंपनियों को भी कीमतें स्थिर रखने का भार दिया। युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमतें 65 डॉलर प्रति बैरल थीं, जो अब 100 डॉलर के पार जा चुकी हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है।

    सप्लाई पूरी तरह सुरक्षित

    देशभर में फ्यूल सप्लाई सामान्य है। सरकार ने अगले 60 दिनों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर दी है। रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल और अन्य उपोत्पादों की कमी नहीं है।

    वैश्विक पेट्रोल-डीजल दामों में भारी उछाल

    पेट्रोल – म्यांमार 100%, फिलीपींस 71.6%, मलेशिया 52.4%, ऑस्ट्रेलिया 46.5%, UAE 40.8%
    डीजल – म्यांमार 119.9%, लाओस 117.5%, फिलीपींस 111%, कंबोडिया 92%, वियतनाम 91.3%, UAE 86.1%

  • अमेरिका के ईरान तेल निर्यात पर अस्थायी पाबंदी हटाने पर भारत को राहत, वैश्विक तेल संकट हो सकता है कम

    अमेरिका के ईरान तेल निर्यात पर अस्थायी पाबंदी हटाने पर भारत को राहत, वैश्विक तेल संकट हो सकता है कम

    नई दिल्ली। अमेरिका द्वारा ईरान के तेल निर्यात पर अस्थायी पाबंदी हटाने का ऐलान किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक तेल संकट में कुछ राहत मिल सकती है। सीमित समय के लिए यह कदम अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को कम करने में मदद कर सकता है और भारत को ऊर्जा संकट से निपटने में कुछ राहत मिल सकती है।

    भारत की रिफाइनरियों की तैयारी

    भारत की तेल रिफाइनरियों के पास उच्च तकनीक और लॉजिस्टिक क्षमता है जिससे वे कच्चे तेल को प्रोसेस करने में कुशल हैं। हाल के वर्षों में ये रिफाइनरियां रूसी तेल को प्रोसेस करने में भी बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय फिलहाल अमेरिका की ओर से स्पष्ट शर्तों का इंतजार कर रहा है। इसके बाद ही भारत की रिफाइनरियां खरीद का अंतिम निर्णय लेंगी।

    ईरानी तेल की स्थिति और भारत की लाभकारी स्थिति
    इस समय ईरान के 140 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल समुद्र में जहाजों पर हैं जिनमें बड़ा हिस्सा चीन के लिए निर्धारित है। शेष मात्रा अन्य देशों के लिए उपलब्ध है। भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है क्योंकि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारतीय तेल टैंकरों को गुजरने की अनुमति दी है। वर्तमान में कच्चे तेल के दाम 156 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं।

    भारत का ईरान से तेल आयात इतिहास

    भारत अपनी ऊर्जा का लगभग 85 प्रतिशत विभिन्न देशों से आयात करता है। वर्ष 2018-19 में भारत के कुल क्रूड ऑयल आयात में ईरान की हिस्सेदारी 10.6 प्रतिशत थी। 2019 में अमेरिका द्वारा ईरान पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत का आयात घटा और अब सीमित मात्रा में ही ईरान से आयात होता है। साल 2025 में ईरान से भारत का आयात केवल 0.44 बिलियन डॉलर रहा जबकि ईरान का भारत को निर्यात 1.24 बिलियन डॉलर रहा।

  • आपूर्ति संकट की आशंका से कच्चे तेल में उछाल, Brent Crude करीब 3% चढ़ा

    आपूर्ति संकट की आशंका से कच्चे तेल में उछाल, Brent Crude करीब 3% चढ़ा


    नई दिल्ली।  वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मंगलवार को जबरदस्त उछाल देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड करीब 2.81% की तेजी के साथ 103.03 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 2.80% बढ़कर 95.03 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता नजर आया। यह तेजी से ऐसे समय आया है जब वैश्विक बाजार पहले से ही अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है और निवेशक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंतित हैं।

    होर्मुज जलदमरूमध्य बना संकट की जड़

    कच्चे तेल की कीमतों में उछाल की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना है। यह फारस की खाड़ी में स्थित एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के कुल कच्चे तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा चढ़ता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी तरह की मौजूदगी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बड़ा खतरा बन जाती है। मौजूदा हालात में ईरान और यूनाइटेड स्टेट्स और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस मार्ग पर असर पड़ा है, जिससे सप्लाई बाधित हुई है।

    एक महीने में 50% से ज्यादा बढ़ने का दा
    विशेषज्ञों के अनुसार, बीते एक महीने में कच्चे तेल की सप्लाई में 50% से ज्यादा की तेजी से दर्ज की जा चुकी है। इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और सप्लाई बढ़ने पर खतरा है। इस तेजी का सीधा असर वैश्विक महंगाई और ट्रांसपोर्टेशन लागत पर पड़ सकता है, जिससे कई देशों की इकोनॉमी प्रभावित होने की आशंका है।

    भारत ने तेज की कूटनीतिक कोशिशें
    भारत ने स्थिति को संभालने के लिए सक्रिय कदम उठाए हैं। भारत लगातार ईरान से बातचीत कर रहा है ताकि होर्मुज मार्ग से भारतीय जहाजों की आवाजाही बहाल हो सके।

    इसी कोशिश के तहत ईरान ने दो भारतीय एलपीजी जहाजों—शिवालिक और नंदा देवी-को लौटने की अनुमति दे दी है।

    शिवालिक गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर डॉक कर चुका है

    नंदा देवी कांडला पोर्ट पर पहुंचने वाला है

    इससे देश में एलपीजी सप्लाई को राहत मिलने की उम्मीद है।

    से भी आ रहा बड़ा बहाव

    इसके अलावा यूनाइटेड अरब अमीरात से भारतीय जहाज ‘जग लाडकी’ 80,000 टन से ज़्यादा कच्चा तेल लेकर भारत के लिए रवाना हो चुका है। यह खेप इस हफ़्ते भारत पहुंचने की उम्मीद है, जिससे घरेलू सप्लाई में और बढ़ोतरी होगी।

    एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़
    विश्लेषकों का दबाव है कि खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल के आयात पर ज़्यादा निर्भरता के कारण भारत समेत एशियाई देश इस संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित हो सकते हैं। ऊर्जा दरों में तेज़ी से महंगाई, ट्रांसपोर्टेशन लागत और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन पर दबाव बढ़ सकता है।

    आगे क्या
    अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति सामान्य नहीं होती है, तो कच्चे तेल की दरों में और उछाल देखने को मिल सकता है। अगर बाज़ार की नज़र पश्चिम एशिया के हालात और वैश्विक सप्लाई पर बनी हुई है। इस बीच, सरकारें और कंपनियां वैकल्पिक सेवाओं चेन और रणनीतियों पर काम कर रही हैं ताकि ऊर्जा संकट के प्रभाव को कम किया जा सके।

  • ट्रम्प का दावा- ईरान की कमर तोड़ी, जंग जल्द खत्म होगी: हमलों से तबाह हुए सैन्य ठिकाने, तेल संकट से दुनिया में मचा हड़कंप

    ट्रम्प का दावा- ईरान की कमर तोड़ी, जंग जल्द खत्म होगी: हमलों से तबाह हुए सैन्य ठिकाने, तेल संकट से दुनिया में मचा हड़कंप



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान उम्मीद से ज्यादा सफल रहा है और यह युद्ध जल्द खत्म हो सकता है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के बाद ईरान में कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकाने तबाह हो चुके हैं और अब वहां हमला करने के लिए लगभग कुछ भी नहीं बचा है। ट्रम्प के मुताबिक शुरुआती सैन्य योजना करीब छह हफ्तों की थी, लेकिन अमेरिकी सेना ने तय समय से पहले ही कई बड़े लक्ष्य हासिल कर लिए हैं।

    इधर युद्ध के असर से वैश्विक ऊर्जा बाजार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी International Energy Agency (IEA) ने घोषणा की है कि उसके 32 सदस्य देश अपने आपातकालीन भंडार से करीब 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल बाजार में जारी करेंगे। एजेंसी के कार्यकारी निदेशक Fatih Birol के अनुसार यह फैसला तेल आपूर्ति में आई भारी बाधा को कम करने के लिए लिया गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद फारस की खाड़ी का अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की आपूर्ति होती है। बताया जा रहा है कि युद्ध के बाद इस मार्ग से तेल निर्यात पहले के मुकाबले 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है।

    दूसरी ओर ईरान ने भी युद्ध के गंभीर मानवीय नुकसान का दावा किया है। ईरान के शिक्षा मंत्री Alireza Kazemi ने कहा कि अमेरिका और इजराइल के हमलों में अब तक 206 छात्र और शिक्षक मारे गए हैं और 161 लोग घायल हुए हैं। वहीं मीनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है। इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

    युद्ध के कारण तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 21 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल की औसत कीमत 3.58 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जबकि डीजल भी तेजी से महंगा हुआ है।

    इस बीच ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ईरान के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर वे Strait of Hormuz को बंद भी कर सकते हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच कई देशों में सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। स्पेन ने इजराइल से अपना राजदूत वापस बुला लिया है, जबकि क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कुल मिलाकर यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक असर वाला संकट बनता जा रहा है।

  • मिडिल ईस्ट जंग से बदला वैश्विक तेल समीकरण: रूस की चांदी, चीन को 400 अरब डॉलर का झटका

    मिडिल ईस्ट जंग से बदला वैश्विक तेल समीकरण: रूस की चांदी, चीन को 400 अरब डॉलर का झटका


    नई दिल्‍ली । मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के खतरे ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव ला दिया है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से आसमान छू रही हैं शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी जा रही है और कई देशों में ऊर्जा संकट की आशंका गहराने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो दुनिया के कई हिस्सों में महंगाई और खाद्य संकट भी गहरा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा फायदा रूस को होता दिखाई दे रहा है जबकि चीन को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

    दरअसल ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पाबंदी लगाने की आशंका और क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल पर संकट गहराने के बाद कई देशों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू कर दी है। इसका सीधा फायदा रूस को मिला है। यूक्रेन युद्ध के बाद जिन पश्चिमी देशों ने रूस के तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था अब वही देश वैश्विक सप्लाई को स्थिर रखने के लिए रूसी तेल की ओर रुख कर रहे हैं।

    यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। उस समय रूस को अपने तेल पर भारी छूट देकर बाजार बनाए रखना पड़ा था। भारत और चीन जैसे देशों ने इस मौके का फायदा उठाते हुए रूस से सस्ते दामों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीदा। हालांकि बाद में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर 25 प्रतिशत तक टैरिफ भी लगाया था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट संकट के कारण हालात पूरी तरह बदल गए हैं।

    तेल की मांग बढ़ने के साथ ही रूस ने अपने कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट को भी कम कर दिया है। पहले रूसी तेल पर 10 से 13 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट मिल रही थी लेकिन अब इसे घटाकर 4 से 5 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है। फरवरी में भारतीय कंपनी HPCL ने रूसी तेल के दो कार्गो 13 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर खरीदे थे लेकिन अब भारतीय रिफाइनरियों को इतनी बड़ी छूट मिलना मुश्किल माना जा रहा है। यही स्थिति अन्य देशों के साथ भी है। इससे साफ है कि बढ़ती मांग के कारण रूस का सरकारी खजाना तेजी से भर रहा है और उसका तेल फिर से वैश्विक बाजार में मजबूत स्थिति में आ गया है।

    दूसरी ओर इस युद्ध का सबसे बड़ा झटका चीन को लगा है। चीन लंबे समय से ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। आंकड़ों के मुताबिक ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा चीन ही खरीदता था। लेकिन युद्ध के बाद यह आपूर्ति लगभग ठप हो गई है जिससे चीन की ऊर्जा रणनीति को बड़ा झटका लगा है।

    इसके अलावा चीन और ईरान के बीच 2021 में हुई दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी भी संकट में पड़ती दिख रही है। इस समझौते के तहत चीन ने ईरान में इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा परियोजनाओं में लगभग 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। लेकिन अमेरिका-ईरान तनाव और संभावित सैन्य कार्रवाई के कारण यह पूरा निवेश अब खतरे में पड़ गया है। नतीजतन चीन को एक साथ दोहरा नुकसान झेलना पड़ रहा है—एक तरफ सस्ते तेल की आपूर्ति बंद हो गई है और दूसरी तरफ उसका विशाल निवेश भी फंसता नजर आ रहा है। इस तरह मिडिल ईस्ट की जंग ने वैश्विक तेल राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया है जहां रूस को अप्रत्याशित फायदा मिल रहा है और चीन के लिए स्थिति लगातार मुश्किल होती जा रही है।