Tag: Global Oil Market

  • ट्रम्प का दावा- ईरान की कमर तोड़ी, जंग जल्द खत्म होगी: हमलों से तबाह हुए सैन्य ठिकाने, तेल संकट से दुनिया में मचा हड़कंप

    ट्रम्प का दावा- ईरान की कमर तोड़ी, जंग जल्द खत्म होगी: हमलों से तबाह हुए सैन्य ठिकाने, तेल संकट से दुनिया में मचा हड़कंप



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान उम्मीद से ज्यादा सफल रहा है और यह युद्ध जल्द खत्म हो सकता है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के बाद ईरान में कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकाने तबाह हो चुके हैं और अब वहां हमला करने के लिए लगभग कुछ भी नहीं बचा है। ट्रम्प के मुताबिक शुरुआती सैन्य योजना करीब छह हफ्तों की थी, लेकिन अमेरिकी सेना ने तय समय से पहले ही कई बड़े लक्ष्य हासिल कर लिए हैं।

    इधर युद्ध के असर से वैश्विक ऊर्जा बाजार भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी International Energy Agency (IEA) ने घोषणा की है कि उसके 32 सदस्य देश अपने आपातकालीन भंडार से करीब 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल बाजार में जारी करेंगे। एजेंसी के कार्यकारी निदेशक Fatih Birol के अनुसार यह फैसला तेल आपूर्ति में आई भारी बाधा को कम करने के लिए लिया गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद फारस की खाड़ी का अहम समुद्री मार्ग Strait of Hormuz बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की आपूर्ति होती है। बताया जा रहा है कि युद्ध के बाद इस मार्ग से तेल निर्यात पहले के मुकाबले 10 प्रतिशत से भी कम रह गया है।

    दूसरी ओर ईरान ने भी युद्ध के गंभीर मानवीय नुकसान का दावा किया है। ईरान के शिक्षा मंत्री Alireza Kazemi ने कहा कि अमेरिका और इजराइल के हमलों में अब तक 206 छात्र और शिक्षक मारे गए हैं और 161 लोग घायल हुए हैं। वहीं मीनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल पर हुए मिसाइल हमले को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है। इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

    युद्ध के कारण तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 21 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल की औसत कीमत 3.58 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जबकि डीजल भी तेजी से महंगा हुआ है।

    इस बीच ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। ईरान के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर वे Strait of Hormuz को बंद भी कर सकते हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच कई देशों में सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। स्पेन ने इजराइल से अपना राजदूत वापस बुला लिया है, जबकि क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कुल मिलाकर यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक असर वाला संकट बनता जा रहा है।

  • मिडिल ईस्ट जंग से बदला वैश्विक तेल समीकरण: रूस की चांदी, चीन को 400 अरब डॉलर का झटका

    मिडिल ईस्ट जंग से बदला वैश्विक तेल समीकरण: रूस की चांदी, चीन को 400 अरब डॉलर का झटका


    नई दिल्‍ली । मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के खतरे ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव ला दिया है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से आसमान छू रही हैं शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी जा रही है और कई देशों में ऊर्जा संकट की आशंका गहराने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो दुनिया के कई हिस्सों में महंगाई और खाद्य संकट भी गहरा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा फायदा रूस को होता दिखाई दे रहा है जबकि चीन को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

    दरअसल ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पाबंदी लगाने की आशंका और क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल पर संकट गहराने के बाद कई देशों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू कर दी है। इसका सीधा फायदा रूस को मिला है। यूक्रेन युद्ध के बाद जिन पश्चिमी देशों ने रूस के तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था अब वही देश वैश्विक सप्लाई को स्थिर रखने के लिए रूसी तेल की ओर रुख कर रहे हैं।

    यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। उस समय रूस को अपने तेल पर भारी छूट देकर बाजार बनाए रखना पड़ा था। भारत और चीन जैसे देशों ने इस मौके का फायदा उठाते हुए रूस से सस्ते दामों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीदा। हालांकि बाद में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर 25 प्रतिशत तक टैरिफ भी लगाया था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट संकट के कारण हालात पूरी तरह बदल गए हैं।

    तेल की मांग बढ़ने के साथ ही रूस ने अपने कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट को भी कम कर दिया है। पहले रूसी तेल पर 10 से 13 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट मिल रही थी लेकिन अब इसे घटाकर 4 से 5 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है। फरवरी में भारतीय कंपनी HPCL ने रूसी तेल के दो कार्गो 13 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर खरीदे थे लेकिन अब भारतीय रिफाइनरियों को इतनी बड़ी छूट मिलना मुश्किल माना जा रहा है। यही स्थिति अन्य देशों के साथ भी है। इससे साफ है कि बढ़ती मांग के कारण रूस का सरकारी खजाना तेजी से भर रहा है और उसका तेल फिर से वैश्विक बाजार में मजबूत स्थिति में आ गया है।

    दूसरी ओर इस युद्ध का सबसे बड़ा झटका चीन को लगा है। चीन लंबे समय से ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। आंकड़ों के मुताबिक ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा चीन ही खरीदता था। लेकिन युद्ध के बाद यह आपूर्ति लगभग ठप हो गई है जिससे चीन की ऊर्जा रणनीति को बड़ा झटका लगा है।

    इसके अलावा चीन और ईरान के बीच 2021 में हुई दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी भी संकट में पड़ती दिख रही है। इस समझौते के तहत चीन ने ईरान में इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा परियोजनाओं में लगभग 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। लेकिन अमेरिका-ईरान तनाव और संभावित सैन्य कार्रवाई के कारण यह पूरा निवेश अब खतरे में पड़ गया है। नतीजतन चीन को एक साथ दोहरा नुकसान झेलना पड़ रहा है—एक तरफ सस्ते तेल की आपूर्ति बंद हो गई है और दूसरी तरफ उसका विशाल निवेश भी फंसता नजर आ रहा है। इस तरह मिडिल ईस्ट की जंग ने वैश्विक तेल राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया है जहां रूस को अप्रत्याशित फायदा मिल रहा है और चीन के लिए स्थिति लगातार मुश्किल होती जा रही है।

  • मिडिल ईस्ट में बढ़ती आग, वैश्विक बाजार पर वार-क्रूड ऑयल की कीमतों में जोरदार तेजी

    मिडिल ईस्ट में बढ़ती आग, वैश्विक बाजार पर वार-क्रूड ऑयल की कीमतों में जोरदार तेजी

    नई दिल्ली। इजरायल-ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में 7 प्रतिशत से अधिक की तेज उछाल दर्ज की गई। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद निवेशकों ने संभावित आपूर्ति संकट का अंदेशा जताया, जिससे तेल के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई की ओर बढ़ने लगे।

    ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई में जोरदार तेजी
    अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude के वायदा भाव बढ़कर 82.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए, जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है। ब्रेंट 7.60 प्रतिशत चढ़कर 78.41 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। वहीं अमेरिकी West Texas Intermediate (डब्ल्यूटीआई) क्रूड के वायदा भाव 7.19 प्रतिशत उछलकर 71.86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट की आशंका
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, Iran ने रणनीतिक Strait of Hormuz से गुजरने वाले नौवहन को सीमित करने के संकेत दिए हैं। यह वही मार्ग है, जिससे दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। भारत के 40 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल का आयात भी इसी रास्ते से होता है। ऐसे में आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने बाजार में जोखिम प्रीमियम बढ़ा दिया है।

    ओपेक का दांव, क्या थमेगी रफ्तार?
    इसी बीच OPEC ने अगले महीने से उत्पादन बढ़ाने पर सहमति जताई है। सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व में सदस्य देश प्रतिदिन 2.06 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन करेंगे। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव गहराता है तो यह बढ़ोतरी कीमतों को स्थिर रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।

    भारत पर सीधा असर
    विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कीमतों में हर 1 डॉलर की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है। इससे महंगाई, चालू खाते का घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। अधिक तेल कीमतें परिवहन लागत, समुद्री बीमा और ऊर्जा आधारित उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती हैं।

    90 से 100 डॉलर का खतरा
    बाजार जानकारों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान जारी रहता है तो ब्रेंट 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकता है। व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति में यह 100 डॉलर के स्तर को भी पार कर सकता है। फिलहाल बाजार का रुख कंपनियों की तिमाही आय से ज्यादा तेल की चाल पर निर्भर नजर आ रहा है। तनाव कम होने, नेतृत्व पर स्पष्टता आने और समुद्री मार्ग सुरक्षित रहने की ठोस गारंटी मिलने तक तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।