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  • अदालत ने दिया अनोखा आदेश: याचिका बहाल, आश्रम में एक घंटे सेवा की शर्त

    अदालत ने दिया अनोखा आदेश: याचिका बहाल, आश्रम में एक घंटे सेवा की शर्त


    नई दिल्ली। मध्यप्रदेश की Madhya Pradesh High Court की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्णय देते हुए साफ किया है कि वकील की गलती की सजा याचिकाकर्ता को नहीं दी जा सकती। इस फैसले ने न्याय के साथ मानवीय दृष्टिकोण और सामाजिक जिम्मेदारी का अनोखा संतुलन पेश किया है।

    क्या था मामला?
    यह मामला गोविंद स्वरूप श्रीवास्तव की याचिका से जुड़ा था, जिसे सुनवाई के दौरान उनके वकील के अनुपस्थित रहने के कारण खारिज कर दिया गया था। इसके बाद याचिका बहाल करने के लिए दिया गया आवेदन भी सिंगल बेंच द्वारा निरस्त कर दिया गया था।
    हालांकि, इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला डिवीजन बेंच के सामने पहुंचा, जहां पूरी परिस्थितियों का दोबारा परीक्षण किया गया।

    डिवीजन बेंच ने दिया राहत भरा फैसला
    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के वकील किसी अन्य अदालत में व्यस्त होने के कारण उपस्थित नहीं हो सके थे। ऐसे में याचिकाकर्ता को इसका नुकसान उठाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
    अदालत ने पूर्व आदेशों को निरस्त करते हुए याचिका को पुनः बहाल करने के निर्देश दिए, जिससे याचिकाकर्ता को बड़ी राहत मिली।

    ‘सजा’ नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी की अनोखी शर्त
    हालांकि कोर्ट ने याचिका बहाल करते समय एक अनोखी शर्त भी रखी। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता या उसका वकील Madhav Andh Ashram जाकर कम से कम 2000 रुपये की खाद्य सामग्री दान करे और वहां रहने वाले बच्चों व जरूरतमंदों के साथ कम से कम एक घंटा समय बिताए।

    ‘सोशल ऑडिट’ को बढ़ावा देने की पहल
    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शर्त किसी प्रकार की सजा नहीं है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का एक प्रयास है। अदालत ने ‘सोशल ऑडिट’ की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज के जागरूक नागरिकों को समय-समय पर ऐसे संस्थानों का दौरा करना चाहिए, ताकि वहां की व्यवस्थाओं और जरूरतों को समझकर सुधार लाया जा सके।

    न्याय के साथ सामाजिक संदेश
    इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि न्याय सिर्फ कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोर्ट का यह दृष्टिकोण न्याय व्यवस्था में एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

  • कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, अगली सुनवाई तक स्टे

    कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, अगली सुनवाई तक स्टे


    भोपाल। मध्यप्रदेश के कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। अदालत ने उन्हें अगली सुनवाई तक स्टे रोक प्रदान किया है। मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को होगी। मुकेश मल्होत्रा की पैरवी वरिष्ठ वकील एवं राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने की।

    इससे पहले ग्वालियर हाईकोर्ट ने मुकेश मल्होत्रा के चुनाव को शून्य घोषित किया था। हाईकोर्ट ने उन्हें 15 दिन का समय दिया था, ताकि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें। बीते 9 मार्च को हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ चुनावी हलफनामे में क्रिमिनल केस छुपाने के आरोपों के चलते यह आदेश दिया था।

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद, मुकेश मल्होत्रा राज्यसभा चुनाव में वोट नहीं कर पाएंगे, उन्हें मानदेय भी नहीं मिलेगा। हालांकि, वे विधानसभा की कार्यवाही में शामिल हो सकेंगे। याचिका जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच में सुनी गई। इस निर्णय से यह मामला फिलहाल स्थगित हुआ है और 23 जुलाई की अगली सुनवाई तक मुकेश मल्होत्रा के खिलाफ हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगी रहेगी।

  • हाईकोर्ट का अहम आदेश: महिला को सुरक्षा के साथ ससुराल भेजा, पति-ससुर को सम्मानजनक व्यवहार की सख्त हिदायत

    हाईकोर्ट का अहम आदेश: महिला को सुरक्षा के साथ ससुराल भेजा, पति-ससुर को सम्मानजनक व्यवहार की सख्त हिदायत


    ग्वालियर। पारिवारिक विवाद से जुड़े एक मामले में बुधवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अहम आदेश देते हुए एक महिला को सुरक्षा व्यवस्था के साथ उसके ससुराल लौटने की अनुमति दी। अदालत ने साथ ही महिला के पति और ससुर को स्पष्ट निर्देश दिए कि वे उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार करें और किसी भी प्रकार की प्रताड़ना न करें। कोर्ट ने महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था भी लागू की है।

    यह मामला हैबियस कॉर्पस याचिका के रूप में अदालत के सामने आया था। याचिकाकर्ता प्रदीप राठौर ने कोर्ट में आरोप लगाया था कि उसकी बहन प्रियंका राठौर को उसके पति नरेंद्र राठौर और ससुर द्वारा मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। साथ ही यह भी कहा गया कि परिवार के लोगों को उससे संपर्क करने नहीं दिया जा रहा था, जिसके चलते मामला अदालत तक पहुंचा।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने महिला, उसके पति और अन्य संबंधित पक्षों को अदालत में पेश होने के निर्देश दिए थे। सुनवाई के दौरान सभी पक्ष अदालत में उपस्थित हुए और जजों ने महिला सहित सभी की बात विस्तार से सुनी।

    सुनवाई के दौरान प्रियंका राठौर ने अदालत के सामने गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि पति और ससुर अक्सर उन्हें परेशान करते हैं और कई बार विवाद की स्थिति बन जाती है। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि एक बार उसके पति ने उसे सीढ़ियों से धक्का देने की कोशिश भी की थी, जिससे वह काफी भयभीत हो गई थी।

    हालांकि, महिला ने अदालत को यह भी बताया कि उसका 8 वर्षीय बेटा है और वह अपने बेटे के भविष्य और परिवार को बचाने की कोशिश करना चाहती है। इसी कारण उसने फिलहाल ससुराल वापस जाकर रिश्तों को सुधारने और विवाद सुलझाने का एक मौका देने की इच्छा जताई।

    दूसरी ओर, महिला के पति नरेंद्र राठौर, जो एक बैंक में मार्केटिंग से जुड़े कार्य करते हैं, ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे भविष्य में अपनी पत्नी के साथ सम्मानजनक व्यवहार करेंगे और उसे किसी प्रकार की हानि नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि वे परिवार को साथ लेकर चलना चाहते हैं।

    महिला की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए अदालत ने एक विशेष व्यवस्था भी की है। कोर्ट ने सरकारी अधिवक्ता अंजली ज्ञानानी और जनकगंज थाने की महिला आरक्षक अंतिमा तिवारी तथा आरती लोधी को छह महीने के लिए “शौर्य दीदी” के रूप में नियुक्त किया है। इनकी जिम्मेदारी होगी कि वे समय-समय पर महिला से संपर्क कर उसकी स्थिति की जानकारी लें और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करें।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि महिला के साथ किसी प्रकार की प्रताड़ना या दुर्व्यवहार की शिकायत सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई करनी होगी।

    इस आदेश को घरेलू विवाद के मामलों में महिला सुरक्षा और पारिवारिक समाधान के संतुलन के रूप में देखा जा रहा है, जहां अदालत ने एक ओर महिला की सुरक्षा सुनिश्चित की है तो दूसरी ओर परिवार को भी संबंध सुधारने का अवसर दिया है।

  • विजयपुर से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा का चुनाव रद्द, रामनिवास रावत बने नए MLA

    विजयपुर से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा का चुनाव रद्द, रामनिवास रावत बने नए MLA


    ग्वालियर  ग्वालियर हाईकोर्ट ने विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा का चुनाव रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट के जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया ने यह फैसला बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री रामनिवास रावत की याचिका पर सुनाया। अब विजयपुर का नया MLA रामनिवास रावत होंगे।

    रामनिवास रावत की याचिका में आरोप था कि मुकेश मल्होत्रा ने 2024 के उपचुनाव के नामांकन में अपने खिलाफ दर्ज 6 में से 4 क्रिमिनल केस छिपाए थे। केवल दो केस की जानकारी दी गई थी। हाईकोर्ट ने पाया कि उम्मीदवार ने हलफनामे में आवश्यक जानकारी छिपाई थी, इसलिए उनका चुनाव रद्द कर दिया गया और दूसरे नंबर पर रहे रावत को विजयपुर का MLA घोषित किया गया।

    इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और विश्वास जताया कि जनता फिर कांग्रेस को भारी वोटों से विजयी बनाएगी। वहीं सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा ने कहा कि केवल कुछ जानकारी गलत दी गई थी, इसका मतलब चुनाव में धांधली नहीं हुई। वे अपील करेंगे और विश्वास है कि मुकेश मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलेगी।

    मुकेश मल्होत्रा ने 2 मई 2024 को कांग्रेस जॉइन की थी। इसके पहले वे बीजेपी में सक्रिय रहे और सहारिया प्राधिकरण के अध्यक्ष एवं दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री भी रहे। 2023 के विधानसभा चुनाव में वे निर्दलीय उम्मीदवार थे और आदिवासी वोट बैंक के बल पर विजयपुर सीट से 45 हजार वोटों से जीते थे।

    ग्वालियर हाईकोर्ट ने उपचुनाव में सभी उम्मीदवारों को नोटिस जारी किया और हलफनामे में जानकारी छिपाने का मामला सामने आने पर जांच की। यह मामला उम्मीदवारों द्वारा हलफनामे में क्रिमिनल रिकॉर्ड छिपाने से जुड़ी गंभीर कानूनी चेतावनी साबित हुआ।

  • पोस्त भूसी तस्करी मामले में ग्वालियर HC ने उठाया कड़ा कदम, जांच अधिकारियों पर कार्रवाई

    पोस्त भूसी तस्करी मामले में ग्वालियर HC ने उठाया कड़ा कदम, जांच अधिकारियों पर कार्रवाई


    ग्वालियर। ग्वालियर हाईकोर्ट ने शिवपुरी के एक एनडीपीएस मामले में पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद शिवपुरी एसपी अमन सिंह राठौड़ ने तत्काल प्रभाव से देहात थाना प्रभारी समेत पांच अधिकारियों को लाइन अटैच कर दिया। यह मामला 1209 किलो पोस्त भूसी की तस्करी से जुड़ा है जिसमें थाने से 62 सैंपल बैग गायब होने की गंभीर जानकारी सामने आई।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जांच सच्चाई सामने लाने के बजाय उसे छिपाने जैसी प्रतीत हो रही है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कई मामलों में पुलिस केवल ड्राइवर या कैरियर तक कार्रवाई सीमित कर देती है, जबकि तस्करी के मुख्य सरगना तक पहुंचने का प्रयास नहीं किया जाता। हाईकोर्ट ने इसे गंभीर जांचीय कमी मानते हुए कड़ा रुख अपनाया।

    यह मामला इंदौर से चंडीगढ़ भेजी जा रही 1209 किलो पोस्त भूसी की जब्ती से संबंधित है। अदालत ने पाया कि न तो माल भेजने वालों की समुचित जांच हुई और न ही प्राप्तकर्ताओं की भूमिका स्पष्ट की गई। सबसे गंभीर पहलू यह रहा कि जब्त मादक पदार्थ से जुड़े 62 सैंपल बैग थाने से गायब पाए गए। पुलिस ने 17 जनवरी 2025 को सामग्री के निस्तारण का हवाला दिया, जबकि सैंपल बैग उपलब्ध नहीं थे और ट्रायल कोर्ट में जब्त सामग्री प्रस्तुत भी नहीं की गई।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि उस समय पदस्थ थाना प्रभारी और जांच अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच शुरू की जाए तथा जांच पूरी होने तक उन्हें किसी थाने का प्रभार न दिया जाए। कोर्ट ने तीन माह के भीतर शपथपत्र के साथ विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा। साथ ही प्रमुख सचिव गृह, डीजीपी भोपाल और एडीजी नारकोटिक्स इंदौर को यह निर्देश भी दिए गए कि सभी जिलों में एनडीपीएस मामलों में ‘एपेक्स परपेरेटर्स’ की पहचान और कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अगली सुनवाई 25 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है।

    एसपी राठौड़ ने देहात थाना प्रभारी जितेंद्र मावई, उप निरीक्षक राघवेंद्र यादव और हरिशंकर शर्मा को लाइन अटैच किया है। इसके अतिरिक्त बालाघाट में पदस्थ उप निरीक्षक अंकित उपाध्याय और राजगढ़ में पदस्थ निरीक्षक मनीष शर्मा पर भी समान कार्रवाई की गई है। दो संबंधित अधिकारी पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

    इस मामले में विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस एक्ट, शिवपुरी ने 26 सितंबर 2025 को आरोपी जगशीर को धारा 8/15सी के तहत दोषी ठहराते हुए 15 वर्ष के कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। बाद में सजा स्थगन संबंधी अर्जी वापस ले ली गई।

    ग्वालियर हाईकोर्ट की यह कार्रवाई न केवल शिवपुरी पुलिस के लिए चेतावनी है बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में एनडीपीएस मामलों में जांच की गंभीरता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकती है। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि जांच अधिकारी केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए काम नहीं कर सकते, बल्कि तस्करी के असली सरगनाओं तक पहुंचने का प्रयास करना अनिवार्य है।

  • मुरैना महिला एसआई को हाईकोर्ट से झटका, एडवोकेट सुसाइड केस में अग्रिम जमानत खारिज

    मुरैना महिला एसआई को हाईकोर्ट से झटका, एडवोकेट सुसाइड केस में अग्रिम जमानत खारिज


    ग्वालियर। हाईकोर्ट ने मुरैना की महिला सब इंस्पेक्टर प्रीति जादौन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामला एडवोकेट मृत्युंजय सिंह चौहान की आत्महत्या से जुड़ा है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया मामले में केवल निजी तनाव नहीं बल्कि धमकी और पद के दुरुपयोग के गंभीर संकेत मिलते हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी एक सेवारत पुलिस अधिकारी है और उससे कानून के पालन की अपेक्षा अधिक रहती है।

    हाईकोर्ट ने आदेश में स्पष्ट किया कि घटना के कुछ ही दिनों बाद मृतक द्वारा आत्महत्या करना अभियोजन पक्ष के तर्क को मजबूत करता है। कोर्ट ने यह भी देखा कि गवाहों को प्रभावित करने और कथित घटनास्थल से हथियार की बरामदगी न होने के कारण हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।मामला मुरैना के सिविल लाइन थाने में पदस्थ एसआई प्रीति जादौन और उनके मंगेतर ग्वालियर निवासी एडवोकेट मृत्युंजय सिंह चौहान से जुड़ा है। 14-15 दिसंबर 2025 की रात मृत्युंजय ने गोला का मंदिर थाना क्षेत्र स्थित अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना की जानकारी 15 दिसंबर को सामने आई थी।

    पुलिस जांच में सामने आया कि 12 दिसंबर को मृतक मुरैना पुलिस लाइन स्थित प्रीति जादौन के सरकारी क्वार्टर पहुंचे थे। वहां मृतक ने एक आवेदन लिखा जिसे जांच एजेंसियां अघोषित सुसाइड नोट मान रही हैं। आवेदन में आरोप था कि महिला एसआई और क्वार्टर में मौजूद आरक्षक अराफात खान ने उनके साथ मारपीट की। मृतक ने इस घटना की शिकायत सिविल लाइन और सिटी कोतवाली थाने में दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन उल्टे महिला एसआई के प्रभाव के चलते उनके खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर दी गई।

    हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मामला निजी संबंधों में तनाव का है और मृतक ने जबरन सरकारी आवास में प्रवेश किया। हालांकि शासकीय अधिवक्ता ने मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड, टावर लोकेशन, ऑडियो वीडियो साक्ष्य और मृतक की मां के बयान को आधार बनाकर आरोपों की पुष्टि की। कोर्ट ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

    इस बीच, ग्वालियर पुलिस द्वारा की गई दबिश के दौरान एसआई प्रीति जादौन और आरक्षक अराफात खान अपने आवास से अनुपस्थित पाए गए। पुलिस की तलाश जारी है और मामला न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • बलात्कार पीड़िता को हाईकोर्ट से बड़ी राहत ग्वालियर खंडपीठ ने IG को दिए सुरक्षा निर्देश

    बलात्कार पीड़िता को हाईकोर्ट से बड़ी राहत ग्वालियर खंडपीठ ने IG को दिए सुरक्षा निर्देश


    ग्वालियर हाईकोर्ट खंडपीठ ने एक बलात्कार पीड़िता को राहत देते हुए उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने ग्वालियर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को आदेश दिया है कि ट्रायल समाप्त होने तक पीड़िता सहित सभी गवाहों को पूर्ण सुरक्षा मुहैया कराई जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी है।

    यह आदेश न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसे और उसके परिवार को लगातार धमकियां मिल रही हैं और पुलिस ने प्रारंभिक स्तर पर एफआईआर दर्ज करने में लापरवाही बरती। पीड़िता ने हाईकोर्ट का रुख कर सुरक्षा की मांग की थी ताकि वह बिना भय के न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सके।याचिकाकर्ता के अनुसार वह एक गंभीर आपराधिक मामले में पीड़िता है और आरोपी पक्ष की ओर से लगातार दबाव और धमकियां मिल रही हैं। एफआईआर दर्ज होने के बाद भी हालात नहीं बदले और पीड़िता व उसके परिवार में भय का माहौल बना रहा। ऐसे में हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त आदेश दिए कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित होना न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए अनिवार्य है।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर गवाह सुरक्षित नहीं होंगे तो ट्रायल पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। किसी भी आपराधिक मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई तभी संभव है जब पीड़ित और गवाह बिना भय दबाव या प्रलोभन के बयान दे सकें। हाईकोर्ट ने IG को निर्देश दिए कि वे स्वयं या किसी सक्षम वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करें।

    हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में पीड़िता की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और सुरक्षा में कोई चूक हुई तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। आवश्यक होने पर अतिरिक्त सुरक्षात्मक कदम उठाने का भी आदेश दिया गया है।इसके पहले भी हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश दिए थे लेकिन याचिकाकर्ता ने बताया कि जमीनी स्तर पर उन आदेशों का प्रभावी पालन नहीं हुआ था। लगातार मिल रही धमकियों के कारण पीड़िता और उसके परिवार में डर का माहौल बना हुआ था जिससे ट्रायल प्रभावित होने का खतरा था।

    अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस प्रशासन पर यह जिम्मेदारी है कि पीड़िता, उसके परिवार और सभी गवाहों की सुरक्षा के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं। ट्रायल सत्र न्यायालय में जारी है और हाईकोर्ट के निर्देशों के पालन की रिपोर्ट नियमित रूप से दी जाएगी।यह फैसला न केवल पीड़िता के लिए राहत लेकर आया है बल्कि यह संदेश भी देता है कि न्याय प्रक्रिया में किसी भी स्थिति में डर और दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन का कर्तव्य है।

  • अंबेडकर पोस्टर प्रकरण: अनिल मिश्रा को हाईकोर्ट से जमानत, तत्काल रिहाई..

    अंबेडकर पोस्टर प्रकरण: अनिल मिश्रा को हाईकोर्ट से जमानत, तत्काल रिहाई..


    ग्वालियर। हाईकोर्ट ने डॉ. भीमराव अंबेडकर का पोस्टर जलाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए एडवोकेट अनिल मिश्रा को बड़ी राहत दी है। सुनवाई के बाद अदालत ने उन्हें एक लाख रुपये के पर्सनल बॉन्ड और समान राशि की जमानत पर तत्काल रिहा करने का आदेश जारी किया। चार दिनों से न्यायिक हिरासत में बंद मिश्रा की रिहाई अब सुनिश्चित हो गई है यह मामला ग्वालियर से जुड़ा है, जहां सोशल मीडिया पर कथित पोस्टर जलाने की घटना के बाद साइबर थाना पुलिस ने कार्रवाई की। इस प्रकरण में अनिल मिश्रा समेत आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी और उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

    हाईकोर्ट ने पुलिस कार्रवाई पर जताई आपत्ति

    सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि एफआईआर में उल्लिखित तथ्यों के आधार पर अनिल मिश्रा को नोटिस देकर पूछताछ की जा सकती थी। हिरासत लेना अंतिम विकल्प होना चाहिए था, जबकि इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी से पहले वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी की गई, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा संवेदनशील विषय है।न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया। इसी आधार पर जमानत प्रदान की गई। हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि अन्य सह-आरोपियों को भी राहत मिल सकती है, बशर्ते उनके मामलों में परिस्थितियां समान हों।

    एफआईआर रद्द करने की मांग पर अलग सुनवाई
    अनिल मिश्रा की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि दर्ज एफआईआर कानूनन टिकाऊ नहीं है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर निरस्त करने की मांग को अलग प्रक्रिया के तहत सुना जाएगा। फिलहाल केवल जमानत याचिका पर निर्णय लेते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया गया।

    पुलिस जांच जारी

    ग्वालियर साइबर पुलिस का कहना है कि प्रकरण की जांच अभी भी जारी है और सोशल मीडिया से जुड़े तकनीकी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। हालांकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस को अपनी कार्यप्रणाली पर जवाबदेह रहना होगा।

    कानूनी हलकों में चर्चा

    इस फैसले के बाद प्रदेश के कानूनी और अधिवक्ता समुदाय में चर्चा तेज हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी की वैधानिक सीमाओं को रेखांकित करता है। पुलिस को यह संदेश जाता है कि संवेदनशील मामलों में भी कानून की प्रक्रिया से समझौता नहीं किया जा सकता।