क्या था मामला?
यह मामला गोविंद स्वरूप श्रीवास्तव की याचिका से जुड़ा था, जिसे सुनवाई के दौरान उनके वकील के अनुपस्थित रहने के कारण खारिज कर दिया गया था। इसके बाद याचिका बहाल करने के लिए दिया गया आवेदन भी सिंगल बेंच द्वारा निरस्त कर दिया गया था।
हालांकि, इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला डिवीजन बेंच के सामने पहुंचा, जहां पूरी परिस्थितियों का दोबारा परीक्षण किया गया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के वकील किसी अन्य अदालत में व्यस्त होने के कारण उपस्थित नहीं हो सके थे। ऐसे में याचिकाकर्ता को इसका नुकसान उठाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने पूर्व आदेशों को निरस्त करते हुए याचिका को पुनः बहाल करने के निर्देश दिए, जिससे याचिकाकर्ता को बड़ी राहत मिली।
‘सजा’ नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी की अनोखी शर्त
हालांकि कोर्ट ने याचिका बहाल करते समय एक अनोखी शर्त भी रखी। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता या उसका वकील Madhav Andh Ashram जाकर कम से कम 2000 रुपये की खाद्य सामग्री दान करे और वहां रहने वाले बच्चों व जरूरतमंदों के साथ कम से कम एक घंटा समय बिताए।
‘सोशल ऑडिट’ को बढ़ावा देने की पहल
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शर्त किसी प्रकार की सजा नहीं है, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का एक प्रयास है। अदालत ने ‘सोशल ऑडिट’ की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज के जागरूक नागरिकों को समय-समय पर ऐसे संस्थानों का दौरा करना चाहिए, ताकि वहां की व्यवस्थाओं और जरूरतों को समझकर सुधार लाया जा सके।
न्याय के साथ सामाजिक संदेश
इस फैसले ने यह संदेश दिया है कि न्याय सिर्फ कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोर्ट का यह दृष्टिकोण न्याय व्यवस्था में एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
