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  • मासूमों पर कहर बन रहा Chandipura Virus समय रहते पहचान और बचाव ही है सबसे बड़ा हथियार

    मासूमों पर कहर बन रहा Chandipura Virus समय रहते पहचान और बचाव ही है सबसे बड़ा हथियार


    नई दिल्ली। बरसात के मौसम में वायरल संक्रमण और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। ऐसे समय में Chandipura Virus ने एक बार फिर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। देश के कुछ राज्यों में इस वायरस के मामले सामने आने के बाद खासतौर पर छोटे बच्चों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि यह वायरस सामान्य संक्रमण की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक हो सकता है क्योंकि यह सीधे दिमाग और नर्वस सिस्टम पर असर डालता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार Chandipura Virus किसी खास उम्र के बच्चों को चुनकर हमला नहीं करता लेकिन पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों का शरीर और उनका नर्वस सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता। यही वजह है कि उनका शरीर इस संक्रमण से होने वाले नुकसान का प्रभावी ढंग से मुकाबला नहीं कर पाता। इस उम्र में दिमाग की सुरक्षा करने वाली ब्लड ब्रेन बैरियर नामक परत भी पूरी तरह मजबूत नहीं होती। ऐसे में वायरस आसानी से दिमाग तक पहुंच सकता है और वहां सूजन पैदा कर गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

    डॉक्टर बताते हैं कि बचपन के शुरुआती वर्षों में मस्तिष्क का विकास बहुत तेजी से होता है। यदि इसी दौरान कोई गंभीर संक्रमण दिमाग को प्रभावित कर दे तो बच्चे के बोलने चलने सीखने और मानसिक विकास पर स्थायी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि Chandipura Virus को बच्चों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है और इसके लक्षण दिखते ही तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी होता है।

    इस वायरस के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई देते हैं। तेज बुखार सिरदर्द उल्टी शरीर में कमजोरी और बेचैनी इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं। कई मामलों में कुछ ही घंटों के भीतर बच्चे को दौरे पड़ना बेहोशी आना या मानसिक भ्रम जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं। यदि समय पर इलाज न मिले तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार Chandipura Virus मुख्य रूप से संक्रमित सैंड फ्लाई और कुछ अन्य कीटों के काटने से फैलता है। बरसात के मौसम में इन कीटों की संख्या बढ़ने से संक्रमण का खतरा भी अधिक हो जाता है। इसलिए बच्चों को साफ और सुरक्षित वातावरण में रखना बेहद जरूरी है।

    बचाव के लिए घर और आसपास साफ सफाई बनाए रखना सबसे जरूरी कदम माना जाता है। बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाना मच्छरदानी का उपयोग करना और कीटों से बचाव के लिए आवश्यक उपाय अपनाना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। घर के आसपास पानी जमा नहीं होने देना और स्वच्छ वातावरण बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

    फिलहाल इस वायरस का कोई विशेष एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समय पर पहचान और अस्पताल में उचित उपचार ही मरीज की जान बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि किसी बच्चे को तेज बुखार के साथ उल्टी बेहोशी दौरे या असामान्य व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई दें तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता और समय पर उपचार से इस वायरस से होने वाले गंभीर नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसलिए बरसात के मौसम में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर विशेष सतर्कता बरतना बेहद आवश्यक है।

  • बहन से मुलाकात के बाद लौट रहा था युवक, रास्ते में चलती बाइक से गिरा, अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने मृत घोषित किया

    बहन से मुलाकात के बाद लौट रहा था युवक, रास्ते में चलती बाइक से गिरा, अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने मृत घोषित किया


    देवास देवास में बुधवार को एक दुखद घटना सामने आई जहां बहन से मुलाकात कर घर लौट रहे 30 वर्षीय युवक की चलती बाइक से गिरने के बाद मौत हो गई। प्रारंभिक जांच में डॉक्टरों ने साइलेंट हार्ट अटैक की आशंका जताई है। हालांकि मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। घटना के बाद परिवार में मातम पसरा हुआ है जबकि युवक के दोस्तों के भी अस्पताल पहुंचने से माहौल गमगीन हो गया।

    जानकारी के अनुसार मानकुंड निवासी धर्मेंद्र मालवीय एक निजी कंपनी में कार्यरत था। बुधवार को वह अपनी बहन से मिलने देवास आया था। परिजनों के मुताबिक मुलाकात के बाद वह बाइक से अपने घर लौट रहा था। घर से कुछ ही दूरी पर पहुंचने के दौरान अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया और वह चलती बाइक से सड़क पर गिर पड़ा। आसपास मौजूद लोगों और परिजनों ने उसे तुरंत संभाला लेकिन वह बेसुध अवस्था में था।

    घटना के तुरंत बाद परिजन धर्मेंद्र को उपचार के लिए जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। अस्पताल में डॉक्टरों ने उसकी जांच की लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अचानक हुई इस घटना से परिवार और परिचितों को गहरा सदमा लगा है।

    जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. कमल प्रजापति के अनुसार प्रथम दृष्टया मामला साइलेंट हार्ट अटैक का प्रतीत हो रहा है। कई बार व्यक्ति को बिना किसी स्पष्ट लक्षण के हार्ट अटैक आ जाता है जिससे वह अचानक बेहोश होकर गिर सकता है। हालांकि डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि अभी यह केवल प्रारंभिक आशंका है और मौत के वास्तविक कारण की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद ही की जाएगी। जांच के लिए विसरा भी सुरक्षित रख लिया गया है ताकि आवश्यकता पड़ने पर विस्तृत परीक्षण किया जा सके।

    परिजनों ने बताया कि धर्मेंद्र की शादी करीब चार से पांच वर्ष पहले हुई थी और वह निजी कंपनी में नौकरी कर परिवार का पालन-पोषण कर रहा था। उसकी अचानक मौत से परिवार पूरी तरह टूट गया है। घटना की सूचना मिलते ही इंदौर से उसके कई मित्र भी जिला अस्पताल पहुंच गए और परिजनों को सांत्वना दी।

    पुलिस ने मामले में मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि युवक की मौत साइलेंट हार्ट अटैक से हुई या इसके पीछे कोई अन्य चिकित्सीय कारण था। फिलहाल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच कर रहे हैं।

  • डिस्को किंग बप्पी लहरी की मौत का सच, अस्पताल से घर लौटने के बाद कैसे बिगड़ी तबीयत और क्या है स्लीप एपनिया

    डिस्को किंग बप्पी लहरी की मौत का सच, अस्पताल से घर लौटने के बाद कैसे बिगड़ी तबीयत और क्या है स्लीप एपनिया


    नई दिल्ली। बॉलीवुड में डिस्को संगीत को नई पहचान देने वाले मशहूर संगीतकार और गायक बप्पी लहरी आज भी अपने सदाबहार गीतों की वजह से लोगों के दिलों में जिंदा हैं। वर्ष 2022 में उनका निधन संगीत प्रेमियों के लिए बड़ा झटका था। अस्पताल से घर लौटने के कुछ ही घंटों बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और फिर उन्हें दोबारा अस्पताल ले जाना पड़ा जहां डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। उनकी मौत के बाद ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया नाम की बीमारी एक बार फिर चर्चा में आई।

    बप्पी लहरी का जन्म 27 नवंबर 1952 को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में हुआ था। संगीत उन्हें विरासत में मिला था। बचपन से ही उन्होंने तबला बजाना सीख लिया और युवावस्था में संगीत की दुनिया में कदम रखा। सत्तर और अस्सी के दशक में उन्होंने बॉलीवुड को डिस्को संगीत का नया दौर दिया। डिस्को डांसर, शराबी, डांस डांस और नमक हलाल जैसी फिल्मों के गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।

    अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बप्पी लहरी कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनका वजन अधिक था और इसी वजह से उन्हें ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की समस्या थी। इसके अलावा उन्हें सीने में संक्रमण भी हो गया था जिसके कारण जनवरी 2022 में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। करीब तीन सप्ताह तक इलाज चलने के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ और 14 फरवरी 2022 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

    घर लौटने के बाद उन्होंने लंबे समय बाद परिवार के साथ समय बिताया। अगले दिन 15 फरवरी को दिनभर परिवार उनके साथ रहा। रात में उन्होंने परिवार के साथ भोजन किया लेकिन कुछ ही देर बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें गंभीर हृदय संबंधी जटिलता हुई है। तमाम कोशिशों के बावजूद रात लगभग 11 बजकर 44 मिनट पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। चिकित्सकों के अनुसार उनकी पहले से मौजूद ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की समस्या और अन्य स्वास्थ्य जटिलताएं उनकी स्थिति को गंभीर बनाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल थीं।

    ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें सोते समय गले की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं और सांस लेने का रास्ता बार बार बंद होने लगता है। इससे व्यक्ति की सांस कुछ सेकंड के लिए रुक सकती है और फिर दोबारा शुरू होती है। पूरी रात यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जा सकती है जिससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। लगातार खर्राटे आना, नींद के दौरान सांस रुकना, सुबह सिरदर्द होना, दिनभर थकान महसूस होना और अत्यधिक नींद आना इसके प्रमुख लक्षण माने जाते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार मोटापा, मोटी गर्दन, बढ़ती उम्र और कुछ अन्य स्वास्थ्य समस्याएं इस बीमारी का जोखिम बढ़ा सकती हैं। समय पर इलाज न होने पर हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह, स्ट्रोक, अनियमित धड़कन और हृदय रोग जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति में लंबे समय तक तेज खर्राटे, सांस रुकने या अत्यधिक थकान जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।

    बप्पी लहरी ने अपने संगीत से भारतीय सिनेमा को अनगिनत यादगार गीत दिए। उनकी जिंदगी यह भी याद दिलाती है कि गंभीर बीमारियों के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच, सही इलाज और स्वस्थ जीवनशैली कई गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • राजबाड़ा बाजार में अचानक बिगड़ी तबीयत, देवास से खरीदारी करने आए व्यक्ति ने अस्पताल में तोड़ा दम

    राजबाड़ा बाजार में अचानक बिगड़ी तबीयत, देवास से खरीदारी करने आए व्यक्ति ने अस्पताल में तोड़ा दम


    इंदौर ।  इंदौर के व्यस्त राजबाड़ा बाजार में उस समय अफरा तफरी का माहौल बन गया जब देवास जिले के बागली से खरीदारी करने आए 50 वर्षीय व्यक्ति की अचानक तबीयत बिगड़ गई और कुछ ही देर बाद उनकी मौत हो गई। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार डॉक्टरों ने हार्ट अटैक की आशंका जताई है जबकि मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद होगी। इस घटना ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि हृदय संबंधी समस्याएं बिना किसी बड़े संकेत के भी अचानक सामने आ सकती हैं।

    मृतक की पहचान विक्रम पुत्र नाथूलाल चौहान निवासी बागली जिला देवास के रूप में हुई है। बताया गया कि वह अपने एक रिश्तेदार के साथ घरेलू खरीदारी के लिए इंदौर आए थे। दोनों राजबाड़ा क्षेत्र में अलग अलग दुकानों पर सामान खरीद रहे थे। इसी दौरान विक्रम एक दुकान पर बैठे हुए थे तभी उन्हें अचानक घबराहट महसूस हुई। आसपास मौजूद लोगों के अनुसार कुछ ही क्षणों में उनकी तबीयत और बिगड़ गई और वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े।

    घटना होते ही वहां मौजूद लोगों ने तुरंत मानवता का परिचय दिया और बिना समय गंवाए उन्हें ऑटो की मदद से महाराजा यशवंतराव अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में डॉक्टरों ने तत्काल जांच की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। शुरुआती जांच में मौत की वजह हार्ट अटैक मानी जा रही है हालांकि पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक अंतिम कारण पर कुछ भी कहने से इनकार किया है।

    घटना की सूचना मिलते ही सराफा थाना पुलिस अस्पताल पहुंची और आवश्यक कानूनी कार्रवाई शुरू की। पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद ही मौत के कारणों की आधिकारिक पुष्टि की जाएगी। यदि किसी अन्य चिकित्सकीय कारण का पता चलता है तो उसी के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    परिजनों के अनुसार विक्रम सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए थे और बागली क्षेत्र में एक गैर सरकारी संस्था के साथ काम करते थे। उनका व्यवहार मिलनसार था और समाज सेवा में उनकी सक्रिय भूमिका रही थी। परिवार में पत्नी चार बच्चे और अन्य सदस्य हैं। अचानक हुई इस घटना से पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। जैसे ही मौत की खबर गांव पहुंची परिवार और परिचितों में शोक की लहर दौड़ गई।

    चिकित्सकों का कहना है कि लगातार बढ़ती भागदौड़ तनाव अनियमित दिनचर्या और हृदय रोगों के प्रति लापरवाही के कारण इस तरह की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। यदि किसी व्यक्ति को अचानक सीने में दर्द घबराहट सांस लेने में तकलीफ अत्यधिक पसीना या बेहोशी जैसे लक्षण महसूस हों तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना बेहद जरूरी है। समय पर इलाज मिलने से कई मामलों में मरीज की जान बचाई जा सकती है।

    यह दुखद घटना एक बार फिर स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की जरूरत को रेखांकित करती है। नियमित स्वास्थ्य जांच संतुलित जीवनशैली और समय पर चिकित्सा सलाह हृदय संबंधी गंभीर जोखिमों को काफी हद तक कम कर सकती है। वहीं सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद लोगों की तत्परता भी आपातकालीन परिस्थितियों में किसी की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • वजन घटाने का शॉर्टकट पड़ सकता है भारी सस्ता हुआ सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन बिना डॉक्टर सलाह इस्तेमाल से बढ़ीं स्वास्थ्य समस्याएं

    वजन घटाने का शॉर्टकट पड़ सकता है भारी सस्ता हुआ सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन बिना डॉक्टर सलाह इस्तेमाल से बढ़ीं स्वास्थ्य समस्याएं


    नई दिल्ली । वजन कम करने की बढ़ती होड़ और सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे फिटनेस ट्रेंड के बीच डायबिटीज और मोटापे के इलाज में इस्तेमाल होने वाला सेमाग्लूटाइड आधारित इंजेक्शन अब नई चिंता का कारण बन गया है। पहले यह इंजेक्शन केवल विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में गंभीर मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों को दिया जाता था लेकिन इसकी कीमत कम होने के बाद अब बड़ी संख्या में लोग केवल पतला दिखने की चाह में बिना चिकित्सकीय सलाह इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकती है।

    मार्च 2026 में सेमाग्लूटाइड का पेटेंट समाप्त होने के बाद इसके जेनेरिक संस्करण बाजार में उपलब्ध होने लगे। पहले जहां इसका प्री फिल्ड पेन लगभग 20 हजार रुपए में मिलता था वहीं अब इसकी कीमत घटकर करीब 1500 रुपए रह गई है। कीमत में आई इस बड़ी गिरावट के बाद इसकी मांग में अचानक कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अनुसार पहले जहां हर महीने लगभग 4 हजार इंजेक्शन की मांग रहती थी वहीं अब यह संख्या बढ़कर करीब 19 हजार प्रति माह तक पहुंच गई है।

    चिकित्सकों का कहना है कि सेमाग्लूटाइड मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में प्रभावी दवा है लेकिन इसका उपयोग केवल विशेषज्ञ की सलाह और नियमित चिकित्सकीय निगरानी में ही किया जाना चाहिए। एंडोक्राइन विशेषज्ञ डॉ. मनुज शर्मा के अनुसार यह दवा मरीज की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए धीरे धीरे निर्धारित खुराक में शुरू की जाती है। बिना जांच और सही डोज के इसका उपयोग गंभीर दुष्प्रभाव पैदा कर सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस इंजेक्शन के शुरुआती दुष्प्रभावों में मतली उल्टी पेट भरा भरा महसूस होना कब्ज दस्त और कमजोरी जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। कुछ मामलों में शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन पित्ताशय में पथरी पित्ताशय की सूजन और अग्न्याशय में सूजन जैसी गंभीर जटिलताएं भी सामने आ सकती हैं। यही कारण है कि डॉक्टर लगातार लोगों से बिना चिकित्सकीय सलाह इस दवा का उपयोग नहीं करने की अपील कर रहे हैं।

    भोपाल के अस्पतालों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां लोग केवल जल्दी वजन कम करने की इच्छा से यह इंजेक्शन लेने लगे। एक 27 वर्षीय युवती ने शादी से पहले तेजी से वजन घटाने के लिए इसका उपयोग शुरू किया लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद तेज पेट दर्द उल्टी और गंभीर डिहाइड्रेशन के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। जांच में पित्ताशय में पथरी और शरीर में पानी की गंभीर कमी पाई गई जिसके बाद लंबे इलाज से उसकी स्थिति सामान्य हो सकी।

    इसी तरह 34 वर्षीय एक महिला ने सोशल मीडिया से प्रभावित होकर बिना डॉक्टर की सलाह तीन महीने तक यह इंजेक्शन लिया। इस दौरान उसका वजन लगभग 14 किलो कम हो गया लेकिन लगातार कमजोरी और उल्टी की शिकायत शुरू हो गई। चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टरों ने तुरंत इंजेक्शन बंद कराया और उपचार शुरू किया।

    सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव रघुवंशी का कहना है कि सेमाग्लूटाइड हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त दवा नहीं है। इसे शुरू करने से पहले मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री मोटापे की गंभीरता अन्य बीमारियों और संभावित जोखिमों का विस्तृत मूल्यांकन आवश्यक होता है। केवल वजन घटाने या आकर्षक दिखने के उद्देश्य से इसका उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ जीवनशैली संतुलित आहार नियमित व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह के साथ किया गया उपचार ही सुरक्षित और स्थायी तरीके से वजन नियंत्रित करने का सबसे बेहतर विकल्प है। किसी भी दवा को सोशल मीडिया के ट्रेंड या दूसरों की सलाह पर लेने के बजाय हमेशा योग्य चिकित्सक से परामर्श करना जरूरी है।

  • टीबी समझकर शुरू कर दी दवा, निकली फेफड़ों की दूसरी बीमारी, डॉक्टरों ने बताई सही जांच की अहमियत

    टीबी समझकर शुरू कर दी दवा, निकली फेफड़ों की दूसरी बीमारी, डॉक्टरों ने बताई सही जांच की अहमियत


    नई दिल्ली । टीबी यानी क्षय रोग आज भी देश के सामने एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी के इलाज में सबसे बड़ी गलती बिना पुष्टि के दवा शुरू कर देना है। केवल एक्स-रे में दिखाई देने वाले धब्बों या सामान्य लक्षणों के आधार पर टीबी का इलाज शुरू करना मरीज के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इससे न केवल वास्तविक बीमारी का इलाज देर से शुरू होता है बल्कि अनावश्यक दवाओं के दुष्प्रभाव भी झेलने पड़ सकते हैं। लखनऊ के सिविल अस्पताल में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां मरीजों को टीबी समझकर दवा दी गई लेकिन विस्तृत जांच में बीमारी कुछ और निकली।

    ऐसा ही एक मामला राजधानी के अहिमामऊ निवासी 46 वर्षीय प्रेमचंद का सामने आया। उन्हें लगातार खांसी सांस फूलने और वजन कम होने की शिकायत थी। एक निजी चिकित्सक ने एक्स-रे में फेफड़ों पर धब्बे देखकर टीबी की दवा शुरू कर दी। करीब एक सप्ताह तक दवा लेने के बावजूद उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ। बाद में सिविल अस्पताल में विस्तृत जांच कराई गई तो पता चला कि उन्हें टीबी नहीं बल्कि फेफड़ों में गांठ यानी लंग नोड्यूल की समस्या है। इसके बाद तुरंत टीबी की दवा बंद कर सही बीमारी का उपचार शुरू किया गया।

    वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष दुबे का कहना है कि एक्स-रे में दिखाई देने वाला हर धब्बा टीबी का संकेत नहीं होता। कई बार फेफड़ों का कैंसर ब्रोंकाइटिस अस्थमा या लंग नोड्यूल जैसी बीमारियां भी एक्स-रे में लगभग वैसी ही दिखाई देती हैं। उनके अनुसार लगभग 30 प्रतिशत मामलों में केवल एक्स-रे के आधार पर किया गया आकलन गलत साबित हो सकता है। इसलिए टीबी की पुष्टि के लिए बलगम जांच सीबीनॉट जीन एक्सपर्ट सीटी स्कैन और मरीज की पूरी चिकित्सीय पृष्ठभूमि का मूल्यांकन करना बेहद जरूरी होता है। सभी जांचों के बाद ही उपचार शुरू किया जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों के मुताबिक समय पर सही जांच होने से टीबी का इलाज अब पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हो गया है। वर्तमान में टीबी से ठीक होने की दर 90 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद यदि मरीज बीच में दवा छोड़ देता है तो बीमारी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी में बदल सकती है जिसका इलाज अधिक कठिन और लंबा होता है। यदि इसका भी उपचार अधूरा छोड़ दिया जाए तो एक्सटेंसिव ड्रग रेजिस्टेंट टीबी जैसी गंभीर स्थिति विकसित हो सकती है जिसका इलाज करीब दो वर्ष तक चल सकता है।

    डॉ. दुबे बताते हैं कि टीबी का जीवाणु परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलने की क्षमता रखता है। दवाओं से अधिकांश सक्रिय जीवाणु नष्ट हो जाते हैं लेकिन कुछ सुप्त अवस्था में मौजूद जीवाणु शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर होने पर फिर सक्रिय हो सकते हैं। यही वजह है कि डॉक्टर द्वारा निर्धारित पूरी अवधि तक नियमित रूप से दवा लेना बेहद जरूरी होता है।

    टीबी का संक्रमण मरीज के खांसने या छींकने से हवा में फैलने वाली संक्रमित बूंदों के माध्यम से फैलता है। बंद अंधेरे और नम वातावरण में यह जीवाणु लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है। बिना मास्क और पर्याप्त दूरी के लंबे समय तक संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए समय पर जांच उपचार और सावधानी न केवल मरीज बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान नशीले पदार्थों का सेवन कुपोषण मधुमेह एचआईवी कैंसर एनीमिया और कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों में टीबी का खतरा अधिक रहता है। यदि किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय तक लगातार खांसी बुखार वजन कम होना भूख न लगना या बलगम में खून आने जैसी शिकायत हो तो तुरंत सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में जाकर टीबी की जांच करानी चाहिए। सरकार टीबी मरीजों को उपचार के दौरान हर महीने पोषण सहायता भी उपलब्ध कराती है ताकि इलाज नियमित रूप से जारी रखा जा सके।

    इसी बीच आधुनिक चिकित्सा तकनीक भी टीबी और फेफड़ों की अन्य बीमारियों की सटीक पहचान में मददगार साबित हो रही है। एंडोब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड तकनीक के जरिए बिना किसी बड़ी सर्जरी के फेफड़ों के अंदर की जांच संभव हो गई है जिससे टीबी फेफड़ों के कैंसर और लिम्फ नोड्स से जुड़ी बीमारियों का शुरुआती चरण में ही सही पता लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही जांच समय पर इलाज और जागरूकता ही टीबी मुक्त भारत की दिशा में सबसे प्रभावी कदम साबित होंगे।

  • क्या अब डेंगू से नहीं जाएगी जान भारत की पहली QDENGA वैक्सीन पर जानिए कैसे करती है काम और कितनी है प्रभावी

    क्या अब डेंगू से नहीं जाएगी जान भारत की पहली QDENGA वैक्सीन पर जानिए कैसे करती है काम और कितनी है प्रभावी


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम अपने साथ राहत लेकर आता है लेकिन इसी दौरान डेंगू जैसी गंभीर बीमारी का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। हर वर्ष लाखों लोग डेंगू की चपेट में आते हैं और कई मरीजों की जान भी चली जाती है। ऐसे समय में भारत के लिए बड़ी राहत की खबर यह है कि देश में पहली बार डेंगू से बचाव के लिए QDENGA वैक्सीन को मंजूरी मिल गई है। विशेषज्ञ इसे डेंगू के खिलाफ एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहे हैं क्योंकि यह बीमारी के गंभीर रूप और अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को काफी हद तक कम करने की क्षमता रखती है।

    QDENGA जापान की दवा कंपनी टाकेडा द्वारा विकसित एक लाइव एटेन्यूएटेड वैक्सीन है। इसमें डेंगू वायरस के कमजोर स्वरूप का उपयोग किया जाता है ताकि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचानकर उसके खिलाफ सुरक्षा विकसित कर सके। बाद में यदि वास्तविक डेंगू वायरस शरीर पर हमला करता है तो प्रतिरक्षा तंत्र तेजी से सक्रिय होकर गंभीर संक्रमण की आशंका को कम करने में मदद करता है।

    इस वैक्सीन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह डेंगू वायरस के चारों प्रमुख प्रकारों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से विकसित की गई है। पहले उपलब्ध कुछ वैक्सीन में टीकाकरण से पहले यह जांच जरूरी होती थी कि व्यक्ति को पहले डेंगू हुआ है या नहीं। लेकिन QDENGA के लिए ऐसी जांच आवश्यक नहीं है जिससे बड़े स्तर पर टीकाकरण करना अधिक आसान हो सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह वैक्सीन 6 वर्ष से 60 वर्ष तक की आयु के लोगों के लिए उपयुक्त मानी गई है। इसे दो डोज में लगाया जाता है और दोनों डोज के बीच लगभग तीन महीने का अंतर रखा जाता है। पहली डोज शरीर में प्रारंभिक प्रतिरक्षा तैयार करती है जबकि दूसरी डोज लंबे समय तक सुरक्षा को मजबूत बनाती है।

    क्लिनिकल परीक्षणों में इस वैक्सीन के उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। अध्ययनों के अनुसार इससे डेंगू के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा लगभग 84 प्रतिशत तक कम देखा गया जबकि संक्रमण का जोखिम भी काफी हद तक घटा। हालांकि यह वैक्सीन संक्रमण की पूरी तरह गारंटी नहीं देती लेकिन गंभीर बीमारी और मृत्यु के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    भारत में इसकी कीमत का आधिकारिक ऐलान अभी नहीं हुआ है लेकिन शुरुआती अनुमान के अनुसार इसकी एक डोज की कीमत लगभग चार से पांच हजार रुपये के बीच हो सकती है। शुरुआत में यह निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में उपलब्ध होने की संभावना है। भविष्य में इसे सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा या नहीं इस पर निर्णय बाद में लिया जाएगा।

    अच्छी बात यह भी है कि भारत की दवा कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज के साथ हुए समझौते के तहत भविष्य में इस वैक्सीन का निर्माण भारत में भी किया जाएगा। इससे इसकी उपलब्धता बढ़ने और कीमत कम होने की संभावना जताई जा रही है।

    हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि केवल वैक्सीन ही डेंगू की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है। मच्छरों की रोकथाम साफ सफाई घर और आसपास पानी जमा न होने देना पूरी बाजू के कपड़े पहनना मच्छरदानी और रिपेलेंट का उपयोग करना तथा बुखार आने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना आज भी उतना ही जरूरी है।

    डेंगू के खिलाफ यह वैक्सीन भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर है लेकिन इसके साथ जागरूकता और बचाव के उपाय अपनाना भी आवश्यक है। यदि टीकाकरण और मच्छर नियंत्रण दोनों पर समान रूप से ध्यान दिया जाए तो आने वाले वर्षों में डेंगू से होने वाले गंभीर मामलों और मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

  • ओमिक्रॉन का नया सब वैरिएंट RF.5 चर्चा में कितना खतरनाक है नया कोविड स्ट्रेन क्या कहते हैं विशेषज्ञ

    ओमिक्रॉन का नया सब वैरिएंट RF.5 चर्चा में कितना खतरनाक है नया कोविड स्ट्रेन क्या कहते हैं विशेषज्ञ


    नई दिल्ली। देश में एक बार फिर कोविड-19 के नए मामलों के बीच ओमिक्रॉन के सब वैरिएंट RF.5 की पहचान ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी बढ़ा दी है। आंध्र प्रदेश में चार संक्रमित नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग के दौरान इस नए सब वैरिएंट की पुष्टि हुई है। इसके बाद स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल घबराने की आवश्यकता नहीं है लेकिन सावधानी और सतर्कता बनाए रखना बेहद जरूरी है।

    जानकारी के अनुसार आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले से कोविड-19 के चार पॉजिटिव नमूनों को जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए पुणे स्थित वायरोलॉजी प्रयोगशाला भेजा गया था। जांच में इन सभी नमूनों में ओमिक्रॉन परिवार के RF.5 सब वैरिएंट की मौजूदगी पाई गई। राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि संक्रमित मरीजों की निगरानी की जा रही है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक RF.5 कोई पूरी तरह नया वायरस नहीं बल्कि ओमिक्रॉन परिवार का ही एक विकसित सब वैरिएंट है। यह प्राकृतिक रूप से विकसित हुआ है और अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी उत्पत्ति पहले से मौजूद ओमिक्रॉन लाइनिएज के विकासक्रम से हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस वैरिएंट की निगरानी कर रहा है क्योंकि इसके मामले पहले सिंगापुर और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों में भी सामने आ चुके हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक उपलब्ध आंकड़ों से ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है कि RF.5 व्यापक स्तर पर पहले के ओमिक्रॉन वैरिएंट की तुलना में बहुत अधिक गंभीर बीमारी फैला रहा है। हालांकि इसकी संक्रमण क्षमता और व्यवहार को लेकर लगातार अध्ययन जारी हैं। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को सतर्क रहने और कोविड संबंधी सावधानियों का पालन करने की सलाह दे रही हैं।

    RF.5 के लक्षण भी काफी हद तक ओमिक्रॉन के अन्य सब वैरिएंट जैसे बताए जा रहे हैं। संक्रमित व्यक्ति में गले में खराश खांसी बुखार सिरदर्द शरीर में दर्द थकान और कुछ मामलों में नाक बंद होने जैसी शिकायतें हो सकती हैं। अधिकांश मरीजों में लक्षण हल्के रहते हैं लेकिन बुजुर्गों गर्भवती महिलाओं गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड से बचाव के लिए पहले अपनाए गए उपाय आज भी प्रभावी हैं। नियमित रूप से साबुन से हाथ धोना या अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर का उपयोग करना भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनना और खांसी या बुखार जैसे लक्षण दिखाई देने पर दूसरों से दूरी बनाए रखना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति में लगातार बुखार सांस लेने में तकलीफ या गंभीर लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा जारी जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है। विशेषज्ञों का कहना है कि सतर्कता जरूरी है लेकिन बिना पुष्टि वाली खबरों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। समय पर जांच उपचार और आवश्यक सावधानियां अपनाकर कोविड संक्रमण के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • हार्ट फेलियर के हर मरीज पर एक जैसी दवा नहीं करती असर नई स्टडी ने इलाज को लेकर बदली सोच

    हार्ट फेलियर के हर मरीज पर एक जैसी दवा नहीं करती असर नई स्टडी ने इलाज को लेकर बदली सोच

    नई दिल्ली । हार्ट फेलियर दुनिया की सबसे गंभीर हृदय संबंधी बीमारियों में से एक मानी जाती है और हर साल लाखों लोग इसकी चपेट में आते हैं। अब इस बीमारी के इलाज को लेकर सामने आई नई रिसर्च ने डॉक्टरों और मरीजों दोनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि हार्ट फेलियर के सभी मरीजों पर एक जैसी दवा समान रूप से प्रभावी नहीं होती। यही वजह है कि भविष्य में मरीजों की स्थिति के अनुसार अलग अलग उपचार पद्धति अपनाने की जरूरत और भी अधिक महसूस की जा रही है।

    हार्ट फेलियर ऐसी स्थिति होती है जब हृदय शरीर की जरूरत के अनुसार पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप नहीं कर पाता। इसके कारण मरीज को सांस लेने में कठिनाई जल्दी थकान पैरों और टखनों में सूजन तथा सामान्य दैनिक कार्य करने में परेशानी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समय रहते सही उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि हार्ट फेलियर के भी अलग अलग प्रकार होते हैं। एक स्थिति में हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और पर्याप्त ताकत से रक्त नहीं पंप कर पातीं। दूसरी स्थिति में हृदय की पंपिंग क्षमता सामान्य दिखाई देती है लेकिन उसकी मांसपेशियां कठोर हो जाती हैं जिससे हर धड़कन के बीच पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं भर पाता। इसी प्रकार के मरीजों पर नई रिसर्च केंद्रित रही।

    अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के शोधकर्ताओं ने इस विषय पर विस्तृत अध्ययन किया। रिसर्च के दौरान हजारों मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड और उपचार के परिणामों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि जिन मरीजों का हृदय कठोर हो चुका था और जो बीटा ब्लॉकर दवाएं ले रहे थे उनमें हार्ट फेलियर बिगड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। यह निष्कर्ष इस बात की ओर इशारा करता है कि कमजोर हृदय वाले मरीजों के लिए लाभकारी मानी जाने वाली दवाएं हर प्रकार के हार्ट फेलियर मरीज के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकतीं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बीटा ब्लॉकर दवाएं हृदय की धड़कन को धीमा कर दिल पर दबाव कम करती हैं लेकिन जिन मरीजों का हृदय पहले से कठोर हो चुका हो उनमें इससे हृदय के भीतर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में शरीर में पानी जमा होना सांस फूलना और सूजन जैसी समस्याएं अधिक बढ़ सकती हैं।

    हालांकि डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि मरीज अपनी दवा खुद बंद कर दें। बीटा ब्लॉकर दवाओं का उपयोग केवल हार्ट फेलियर ही नहीं बल्कि हाई ब्लड प्रेशर अनियमित धड़कन और हार्ट अटैक के बाद भी किया जाता है। इसलिए किसी भी प्रकार का बदलाव केवल विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह पर ही किया जाना चाहिए।

    नई रिसर्च ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में हार्ट फेलियर के इलाज में व्यक्तिगत चिकित्सा पद्धति यानी हर मरीज की स्थिति के अनुसार दवा और उपचार तय करना अधिक महत्वपूर्ण होगा। इससे बेहतर परिणाम मिलने की संभावना बढ़ेगी और मरीजों की जीवन गुणवत्ता में भी सुधार आ सकेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच नियमित दवा स्वस्थ जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह का पालन ही इस गंभीर बीमारी से बचाव और बेहतर उपचार की सबसे मजबूत कुंजी है।

  • एचआईवी का नया हॉटस्पॉट बनता पंजाब! युवाओं में बढ़ रहे संक्रमण ने बढ़ाई चिंता जीएमसी जम्मू की लैब पर बढ़ा दबाव

    एचआईवी का नया हॉटस्पॉट बनता पंजाब! युवाओं में बढ़ रहे संक्रमण ने बढ़ाई चिंता जीएमसी जम्मू की लैब पर बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली । पंजाब में एचआईवी संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि राज्य को संक्रमण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाने लगा है। बीते पांच महीनों के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब के आठ जिलों से हर महीने करीब 2500 एचआईवी जांच के नमूने राजकीय मेडिकल कॉलेज जीएमसी जम्मू की अत्याधुनिक वायरोलॉजी लैब भेजे जा रहे हैं। यहां जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट संबंधित जिलों को भेजी जाती है। लगातार बढ़ती जांच और सामने आ रहे मामलों ने संकेत दिया है कि संक्रमण की चुनौती अब पहले से कहीं अधिक गंभीर होती जा रही है।

    जीएमसी जम्मू की माइक्रोबायोलॉजी लैब को इस वर्ष फरवरी में नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज की मान्यता मिलने के बाद इसकी जांच क्षमता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप कार्य करने वाली यह प्रदेश की पहली एनएबीएल मान्यता प्राप्त वायरोलॉजी लैब है। इसी वजह से पंजाब के होशियारपुर पठानकोट जालंधर रोपड़ मोगा बटाला नवांशहर और कपूरथला जैसे जिलों के एचआईवी जांच नमूनों की जिम्मेदारी भी इसी लैब को सौंपी गई है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जांच रिपोर्टों में सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि संक्रमण के मामलों में बड़ी संख्या 25 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की है। इसके अलावा महिलाओं और बच्चों में भी संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नशीले पदार्थों का इंजेक्शन के माध्यम से सेवन संक्रमण फैलने का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। इसके साथ ही असुरक्षित यौन संबंध और समय पर जांच नहीं कराना भी संक्रमण बढ़ने की अहम वजह मानी जा रही है।

    अधिकारियों का कहना है कि जीएमसी जम्मू में केवल सैंपलों की जांच की जाती है जबकि संक्रमित मरीजों का उपचार पंजाब में ही किया जाता है। जांच के बाद रिपोर्ट संबंधित स्वास्थ्य विभाग को भेज दी जाती है ताकि समय पर इलाज शुरू किया जा सके और संक्रमण को आगे फैलने से रोका जा सके।

    एनएबीएल मान्यता मिलने के बाद जीएमसी जम्मू की जांच क्षमता में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां प्रतिदिन लगभग 90 नमूनों की जांच हो पाती थी वहीं अब आधुनिक तकनीक और नई सुविधाओं की मदद से 24 घंटे में 1200 से अधिक नमूनों की जांच संभव हो गई है। इससे न केवल जम्मू कश्मीर बल्कि दूसरे राज्यों के सैंपलों की भी तेजी से जांच की जा रही है। भविष्य में नई मशीनों के जुड़ने के बाद यह क्षमता और बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एचआईवी जैसी गंभीर बीमारी से बचाव के लिए समय पर जांच जागरूकता और सुरक्षित व्यवहार सबसे प्रभावी उपाय हैं। साथ ही नशे की रोकथाम नियमित स्क्रीनिंग और स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना भी बेहद जरूरी है। यदि संक्रमण की बढ़ती रफ्तार को समय रहते नहीं रोका गया तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इसलिए सरकार स्वास्थ्य विभाग और समाज सभी को मिलकर जागरूकता अभियान तेज करने और जोखिम वाले समूहों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर विशेष ध्यान देना होगा।