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  • ओमिक्रॉन का नया सब वैरिएंट RF.5 चर्चा में कितना खतरनाक है नया कोविड स्ट्रेन क्या कहते हैं विशेषज्ञ

    ओमिक्रॉन का नया सब वैरिएंट RF.5 चर्चा में कितना खतरनाक है नया कोविड स्ट्रेन क्या कहते हैं विशेषज्ञ


    नई दिल्ली। देश में एक बार फिर कोविड-19 के नए मामलों के बीच ओमिक्रॉन के सब वैरिएंट RF.5 की पहचान ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी बढ़ा दी है। आंध्र प्रदेश में चार संक्रमित नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग के दौरान इस नए सब वैरिएंट की पुष्टि हुई है। इसके बाद स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल घबराने की आवश्यकता नहीं है लेकिन सावधानी और सतर्कता बनाए रखना बेहद जरूरी है।

    जानकारी के अनुसार आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले से कोविड-19 के चार पॉजिटिव नमूनों को जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए पुणे स्थित वायरोलॉजी प्रयोगशाला भेजा गया था। जांच में इन सभी नमूनों में ओमिक्रॉन परिवार के RF.5 सब वैरिएंट की मौजूदगी पाई गई। राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि संक्रमित मरीजों की निगरानी की जा रही है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक RF.5 कोई पूरी तरह नया वायरस नहीं बल्कि ओमिक्रॉन परिवार का ही एक विकसित सब वैरिएंट है। यह प्राकृतिक रूप से विकसित हुआ है और अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी उत्पत्ति पहले से मौजूद ओमिक्रॉन लाइनिएज के विकासक्रम से हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस वैरिएंट की निगरानी कर रहा है क्योंकि इसके मामले पहले सिंगापुर और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों में भी सामने आ चुके हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक उपलब्ध आंकड़ों से ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है कि RF.5 व्यापक स्तर पर पहले के ओमिक्रॉन वैरिएंट की तुलना में बहुत अधिक गंभीर बीमारी फैला रहा है। हालांकि इसकी संक्रमण क्षमता और व्यवहार को लेकर लगातार अध्ययन जारी हैं। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को सतर्क रहने और कोविड संबंधी सावधानियों का पालन करने की सलाह दे रही हैं।

    RF.5 के लक्षण भी काफी हद तक ओमिक्रॉन के अन्य सब वैरिएंट जैसे बताए जा रहे हैं। संक्रमित व्यक्ति में गले में खराश खांसी बुखार सिरदर्द शरीर में दर्द थकान और कुछ मामलों में नाक बंद होने जैसी शिकायतें हो सकती हैं। अधिकांश मरीजों में लक्षण हल्के रहते हैं लेकिन बुजुर्गों गर्भवती महिलाओं गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड से बचाव के लिए पहले अपनाए गए उपाय आज भी प्रभावी हैं। नियमित रूप से साबुन से हाथ धोना या अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर का उपयोग करना भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनना और खांसी या बुखार जैसे लक्षण दिखाई देने पर दूसरों से दूरी बनाए रखना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति में लगातार बुखार सांस लेने में तकलीफ या गंभीर लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक स्वास्थ्य एजेंसियों द्वारा जारी जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है। विशेषज्ञों का कहना है कि सतर्कता जरूरी है लेकिन बिना पुष्टि वाली खबरों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। समय पर जांच उपचार और आवश्यक सावधानियां अपनाकर कोविड संक्रमण के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • हार्ट फेलियर के हर मरीज पर एक जैसी दवा नहीं करती असर नई स्टडी ने इलाज को लेकर बदली सोच

    हार्ट फेलियर के हर मरीज पर एक जैसी दवा नहीं करती असर नई स्टडी ने इलाज को लेकर बदली सोच

    नई दिल्ली । हार्ट फेलियर दुनिया की सबसे गंभीर हृदय संबंधी बीमारियों में से एक मानी जाती है और हर साल लाखों लोग इसकी चपेट में आते हैं। अब इस बीमारी के इलाज को लेकर सामने आई नई रिसर्च ने डॉक्टरों और मरीजों दोनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि हार्ट फेलियर के सभी मरीजों पर एक जैसी दवा समान रूप से प्रभावी नहीं होती। यही वजह है कि भविष्य में मरीजों की स्थिति के अनुसार अलग अलग उपचार पद्धति अपनाने की जरूरत और भी अधिक महसूस की जा रही है।

    हार्ट फेलियर ऐसी स्थिति होती है जब हृदय शरीर की जरूरत के अनुसार पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप नहीं कर पाता। इसके कारण मरीज को सांस लेने में कठिनाई जल्दी थकान पैरों और टखनों में सूजन तथा सामान्य दैनिक कार्य करने में परेशानी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समय रहते सही उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि हार्ट फेलियर के भी अलग अलग प्रकार होते हैं। एक स्थिति में हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और पर्याप्त ताकत से रक्त नहीं पंप कर पातीं। दूसरी स्थिति में हृदय की पंपिंग क्षमता सामान्य दिखाई देती है लेकिन उसकी मांसपेशियां कठोर हो जाती हैं जिससे हर धड़कन के बीच पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं भर पाता। इसी प्रकार के मरीजों पर नई रिसर्च केंद्रित रही।

    अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्मोंट के शोधकर्ताओं ने इस विषय पर विस्तृत अध्ययन किया। रिसर्च के दौरान हजारों मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड और उपचार के परिणामों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि जिन मरीजों का हृदय कठोर हो चुका था और जो बीटा ब्लॉकर दवाएं ले रहे थे उनमें हार्ट फेलियर बिगड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती होने का खतरा अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। यह निष्कर्ष इस बात की ओर इशारा करता है कि कमजोर हृदय वाले मरीजों के लिए लाभकारी मानी जाने वाली दवाएं हर प्रकार के हार्ट फेलियर मरीज के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं हो सकतीं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बीटा ब्लॉकर दवाएं हृदय की धड़कन को धीमा कर दिल पर दबाव कम करती हैं लेकिन जिन मरीजों का हृदय पहले से कठोर हो चुका हो उनमें इससे हृदय के भीतर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में शरीर में पानी जमा होना सांस फूलना और सूजन जैसी समस्याएं अधिक बढ़ सकती हैं।

    हालांकि डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन का मतलब यह नहीं है कि मरीज अपनी दवा खुद बंद कर दें। बीटा ब्लॉकर दवाओं का उपयोग केवल हार्ट फेलियर ही नहीं बल्कि हाई ब्लड प्रेशर अनियमित धड़कन और हार्ट अटैक के बाद भी किया जाता है। इसलिए किसी भी प्रकार का बदलाव केवल विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह पर ही किया जाना चाहिए।

    नई रिसर्च ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में हार्ट फेलियर के इलाज में व्यक्तिगत चिकित्सा पद्धति यानी हर मरीज की स्थिति के अनुसार दवा और उपचार तय करना अधिक महत्वपूर्ण होगा। इससे बेहतर परिणाम मिलने की संभावना बढ़ेगी और मरीजों की जीवन गुणवत्ता में भी सुधार आ सकेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच नियमित दवा स्वस्थ जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह का पालन ही इस गंभीर बीमारी से बचाव और बेहतर उपचार की सबसे मजबूत कुंजी है।

  • एचआईवी का नया हॉटस्पॉट बनता पंजाब! युवाओं में बढ़ रहे संक्रमण ने बढ़ाई चिंता जीएमसी जम्मू की लैब पर बढ़ा दबाव

    एचआईवी का नया हॉटस्पॉट बनता पंजाब! युवाओं में बढ़ रहे संक्रमण ने बढ़ाई चिंता जीएमसी जम्मू की लैब पर बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली । पंजाब में एचआईवी संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि राज्य को संक्रमण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाने लगा है। बीते पांच महीनों के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब के आठ जिलों से हर महीने करीब 2500 एचआईवी जांच के नमूने राजकीय मेडिकल कॉलेज जीएमसी जम्मू की अत्याधुनिक वायरोलॉजी लैब भेजे जा रहे हैं। यहां जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट संबंधित जिलों को भेजी जाती है। लगातार बढ़ती जांच और सामने आ रहे मामलों ने संकेत दिया है कि संक्रमण की चुनौती अब पहले से कहीं अधिक गंभीर होती जा रही है।

    जीएमसी जम्मू की माइक्रोबायोलॉजी लैब को इस वर्ष फरवरी में नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज की मान्यता मिलने के बाद इसकी जांच क्षमता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप कार्य करने वाली यह प्रदेश की पहली एनएबीएल मान्यता प्राप्त वायरोलॉजी लैब है। इसी वजह से पंजाब के होशियारपुर पठानकोट जालंधर रोपड़ मोगा बटाला नवांशहर और कपूरथला जैसे जिलों के एचआईवी जांच नमूनों की जिम्मेदारी भी इसी लैब को सौंपी गई है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जांच रिपोर्टों में सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि संक्रमण के मामलों में बड़ी संख्या 25 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की है। इसके अलावा महिलाओं और बच्चों में भी संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नशीले पदार्थों का इंजेक्शन के माध्यम से सेवन संक्रमण फैलने का एक प्रमुख कारण बनकर उभरा है। इसके साथ ही असुरक्षित यौन संबंध और समय पर जांच नहीं कराना भी संक्रमण बढ़ने की अहम वजह मानी जा रही है।

    अधिकारियों का कहना है कि जीएमसी जम्मू में केवल सैंपलों की जांच की जाती है जबकि संक्रमित मरीजों का उपचार पंजाब में ही किया जाता है। जांच के बाद रिपोर्ट संबंधित स्वास्थ्य विभाग को भेज दी जाती है ताकि समय पर इलाज शुरू किया जा सके और संक्रमण को आगे फैलने से रोका जा सके।

    एनएबीएल मान्यता मिलने के बाद जीएमसी जम्मू की जांच क्षमता में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां प्रतिदिन लगभग 90 नमूनों की जांच हो पाती थी वहीं अब आधुनिक तकनीक और नई सुविधाओं की मदद से 24 घंटे में 1200 से अधिक नमूनों की जांच संभव हो गई है। इससे न केवल जम्मू कश्मीर बल्कि दूसरे राज्यों के सैंपलों की भी तेजी से जांच की जा रही है। भविष्य में नई मशीनों के जुड़ने के बाद यह क्षमता और बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि एचआईवी जैसी गंभीर बीमारी से बचाव के लिए समय पर जांच जागरूकता और सुरक्षित व्यवहार सबसे प्रभावी उपाय हैं। साथ ही नशे की रोकथाम नियमित स्क्रीनिंग और स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना भी बेहद जरूरी है। यदि संक्रमण की बढ़ती रफ्तार को समय रहते नहीं रोका गया तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इसलिए सरकार स्वास्थ्य विभाग और समाज सभी को मिलकर जागरूकता अभियान तेज करने और जोखिम वाले समूहों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर विशेष ध्यान देना होगा।

  • NOTTO का बड़ा फैसला किडनी ट्रांसप्लांट अस्पतालों को वेबसाइट पर बताने होंगे सफलता दर और ग्राफ्ट फेलियर के आंकड़े

    NOTTO का बड़ा फैसला किडनी ट्रांसप्लांट अस्पतालों को वेबसाइट पर बताने होंगे सफलता दर और ग्राफ्ट फेलियर के आंकड़े


    नई दिल्ली। देश में किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। अब किडनी ट्रांसप्लांट करने वाले सभी अस्पतालों को अपने ट्रांसप्लांट के नतीजों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। इसके तहत मरीजों के जीवित रहने की दर मौत के मामले ग्राफ्ट फेलियर और अन्य दीर्घकालिक परिणामों का डेटा अस्पतालों की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाएगा ताकि मरीज और उनके परिजन सही जानकारी के आधार पर अस्पताल का चयन कर सकें।

    नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन यानी NOTTO ने देशभर के ट्रांसप्लांट सेंटरों को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं। यह फैसला ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और मरीजों को बेहतर जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लिया गया है। इससे पहले मरीजों को किसी अस्पताल की सफलता दर या लंबे समय के परिणामों की जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती थी।

    NOTTO के निदेशक डॉ. अनिल कुमार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सुनिश्चित करें कि प्रत्येक ट्रांसप्लांट अस्पताल अपनी वेबसाइट पर ट्रांसप्लांट के बाद के परिणाम प्रमुखता से प्रदर्शित करे। साथ ही सभी अस्पतालों को राष्ट्रीय ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट रजिस्ट्री में समय पर और पूर्ण फॉलोअप डेटा भी जमा करना होगा।

    इस पहल के पीछे संसद में उठाई गई चिंता भी अहम वजह रही। भाजपा सांसद कैप्टन बृजेश चौटा ने ट्रांसप्लांट के दीर्घकालिक परिणामों में पारदर्शिता की कमी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि आमतौर पर केवल सफल ट्रांसप्लांट की चर्चा होती है जबकि ग्राफ्ट फेलियर जटिलताओं और ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली मौतों के आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में मरीजों के लिए सही निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है।

    नई व्यवस्था के तहत अस्पतालों को मरीज और उनके परिजनों से सहमति लेने से पहले पूरी प्रक्रिया संभावित जोखिम और संभावित परिणामों की स्पष्ट जानकारी देना भी अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज पूरी जानकारी के साथ उपचार का फैसला लें।

    दिल्ली के एक वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अनुपम रॉय का मानना है कि ट्रांसप्लांट परिणामों को सार्वजनिक करना पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इन आंकड़ों को मरीजों की बीमारी की गंभीरता और जोखिम के स्तर को ध्यान में रखकर ही समझना चाहिए क्योंकि सभी मामलों की परिस्थितियां समान नहीं होतीं।

    फिलहाल देश के 824 ट्रांसप्लांट सेंटर राष्ट्रीय ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट रजिस्ट्री से जुड़े हुए हैं। इन सभी केंद्रों के लिए ट्रांसप्लांट और फॉलोअप से संबंधित जानकारी निर्धारित लॉगिन के माध्यम से दर्ज करना अनिवार्य है। NOTTO का मानना है कि इससे ट्रांसप्लांट परिणामों की निगरानी मजबूत होगी डेटा की विश्वसनीयता बढ़ेगी और भविष्य में स्वास्थ्य नीतियां तैयार करने में भी मदद मिलेगी।

    निर्धारित रिपोर्टिंग प्रणाली के तहत अस्पतालों को डिस्चार्ज के समय तथा छह महीने एक वर्ष तीन वर्ष और पांच वर्ष बाद मरीजों की स्थिति से संबंधित जानकारी देनी होगी। इसमें जीवित मरीजों की संख्या मौत के मामले ग्राफ्ट फेलियर और फॉलोअप से बाहर हुए मरीजों का पूरा विवरण शामिल रहेगा। इस नई व्यवस्था से किडनी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने के साथ मरीजों का भरोसा भी मजबूत होने की उम्मीद है।

  • अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योगी का संदेश, योग को बनाएं जीवनशैली का हिस्सा

    अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योगी का संदेश, योग को बनाएं जीवनशैली का हिस्सा


    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने योग को भारतीय संस्कृति और ऋषि परंपरा की अमूल्य धरोहर बताया और इसे जीवन का नियमित हिस्सा बनाने पर जोर दिया। झांसी में आयोजित सामूहिक योगाभ्यास कार्यक्रम में शामिल होते हुए उन्होंने कहा कि योग केवल एक दिन या किसी विशेष अवसर तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे दैनिक जीवनशैली में शामिल करना आवश्यक है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव है और योग इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने बताया कि भारतीय ऋषि परंपरा ने जो पर्व और परंपराएं विकसित की हैं, उनका उद्देश्य हमेशा प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन को संतुलित रखना रहा है। योग भी इसी सोच का विस्तार है, जो शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करता है।

    उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में बदलती जीवनशैली और बढ़ते तनाव के बीच योग और भी अधिक आवश्यक हो गया है। नियमित योगाभ्यास न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि मानसिक शांति और एकाग्रता को भी बढ़ाता है।

    कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने योगाभ्यास में हिस्सा लिया और विभिन्न आसनों का प्रदर्शन किया। इस मौके पर प्रशासनिक अधिकारी और स्थानीय नागरिक भी उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे योग को केवल कार्यक्रम या आयोजन तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं ताकि एक स्वस्थ और मजबूत समाज का निर्माण हो सके।

  • मिर्गी के दौरे में जूता या मोजा सुंघाना इलाज नहीं, जानिए क्या है सच्चाई और सही फर्स्ट एड

    मिर्गी के दौरे में जूता या मोजा सुंघाना इलाज नहीं, जानिए क्या है सच्चाई और सही फर्स्ट एड


    नई दिल्ली । भारत में आज भी मिर्गी के दौरे को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और घरेलू मान्यताएं प्रचलित हैं। जब किसी व्यक्ति को अचानक मिर्गी का दौरा पड़ता है तो आसपास मौजूद लोग अक्सर उसे जूता, चप्पल या मोजा सुंघाने लगते हैं। कुछ लोग मरीज के मुंह में चम्मच डालने या पानी पिलाने की भी कोशिश करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इन मान्यताओं को कई लोग उपचार का हिस्सा मानते हैं, लेकिन चिकित्सा विज्ञान इन तरीकों को पूरी तरह गलत और गैर-वैज्ञानिक बताता है।

    मिर्गी, जिसे चिकित्सकीय भाषा में Epilepsy कहा जाता है, दिमाग से जुड़ी एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। इसमें मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियां अचानक असामान्य हो जाती हैं, जिससे मरीज को झटके आने, बेहोशी, शरीर अकड़ने या कुछ समय तक एकटक देखने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। यह बीमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार मिर्गी का दौरा पड़ने पर जूता या मोजा सुंघाने की परंपरा का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। अधिकांश मामलों में मिर्गी का दौरा कुछ सेकंड से लेकर एक-दो मिनट के भीतर अपने आप समाप्त हो जाता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति को दौरे के दौरान जूता या मोजा सुंघाया जाए और थोड़ी देर बाद वह सामान्य हो जाए, तो लोग यह मान लेते हैं कि वह इसी कारण ठीक हुआ है। जबकि वास्तविकता यह है कि दौरा अपने प्राकृतिक समय के अनुसार समाप्त हुआ होता है।

    डॉक्टर बताते हैं कि मिर्गी के दौरान दिमाग की तंत्रिका कोशिकाएं यानी न्यूरॉन्स एक साथ अत्यधिक इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजने लगती हैं। इससे मस्तिष्क का सामान्य कार्य कुछ समय के लिए बाधित हो जाता है और व्यक्ति को दौरा पड़ सकता है। इस प्रक्रिया पर जूते, चप्पल या मोजे की गंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

    मिर्गी के कई कारण हो सकते हैं। सिर पर गंभीर चोट लगना, स्ट्रोक, दिमाग में संक्रमण, ऑक्सीजन की कमी, ब्रेन ट्यूमर, तेज बुखार, ब्लड शुगर का अत्यधिक कम या ज्यादा होना तथा कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकते हैं।

    मिर्गी के दौरे के दौरान मरीज में कई तरह के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इनमें अचानक बेहोश हो जाना, हाथ-पैरों में तेज झटके आना, शरीर अकड़ जाना, मुंह से झाग निकलना, जबड़े का जकड़ जाना, चक्कर खाकर गिरना या कुछ सेकंड तक बिना प्रतिक्रिया दिए एक दिशा में देखते रहना शामिल है। दौरे के बाद व्यक्ति भ्रमित या अत्यधिक थका हुआ महसूस कर सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि मिर्गी के दौरे के दौरान घबराने के बजाय सही प्राथमिक उपचार देना सबसे जरूरी है। मरीज को सुरक्षित स्थान पर करवट के बल लिटाना चाहिए ताकि मुंह में जमा लार या झाग बाहर निकल सके और सांस लेने में दिक्कत न हो। उसके आसपास मौजूद नुकीली या खतरनाक वस्तुओं को हटा देना चाहिए ताकि चोट का खतरा न रहे। यदि कपड़े बहुत तंग हों तो उन्हें ढीला कर देना चाहिए।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरीज के मुंह में कोई वस्तु नहीं डालनी चाहिए और न ही जबरन पानी पिलाने की कोशिश करनी चाहिए। यदि दौरा पांच मिनट से अधिक समय तक जारी रहे या बार-बार दौरे पड़ें, तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।

  • वायु प्रदूषण का दिमाग पर गंभीर असर: याददाश्त हो सकती है कमजोर, शोध में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा

    वायु प्रदूषण का दिमाग पर गंभीर असर: याददाश्त हो सकती है कमजोर, शोध में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा


    नई दिल्ली। वायु प्रदूषण को लेकर दुनिया भर में लगातार चिंता बढ़ती जा रही है। अब तक इसे मुख्य रूप से सांस संबंधी बीमारियों, हृदय रोगों और जीवन प्रत्याशा में कमी के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है, लेकिन हाल ही में सामने आए एक अध्ययन ने इसके एक और गंभीर प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रदूषित हवा का लंबे समय तक संपर्क मानव मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है और इससे याददाश्त कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है।

    अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले लोगों में संज्ञानात्मक क्षमता यानी सोचने, समझने, सीखने और याद रखने की शक्ति पर नकारात्मक असर देखा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रदूषण का प्रभाव इतना गहरा हो सकता है कि यह मस्तिष्क पर लगभग 10 वर्ष अतिरिक्त उम्र बढ़ने के समान असर डाल सकता है। यह निष्कर्ष विशेष रूप से उन लोगों के लिए चिंता का विषय है जो लंबे समय तक अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, जिन्हें पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) कहा जाता है, शरीर में प्रवेश कर रक्त प्रवाह के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं। ये कण सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव को बढ़ावा देते हैं, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसके परिणामस्वरूप याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और मानसिक कार्यक्षमता में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

    शोध में यह भी पाया गया कि वृद्ध लोगों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। हालांकि, युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में भी लगातार प्रदूषण के संपर्क से संज्ञानात्मक क्षमता में कमी के संकेत मिले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समस्या धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए कई बार लोग इसके शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते।

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वायु प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के मामले बढ़ सकते हैं। बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की संख्या में वृद्धि और औद्योगिक गतिविधियों के कारण कई शहरों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग प्रदूषण के अधिक स्तर वाले दिनों में बाहर निकलते समय मास्क का उपयोग करें, घरों और कार्यालयों में वेंटिलेशन का ध्यान रखें तथा जहां संभव हो, एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें। इसके अलावा पौधारोपण और प्रदूषण नियंत्रण के सामुदायिक प्रयास भी लंबे समय में सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं।

    शोधकर्ताओं का मानना है कि स्वच्छ हवा केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक और बौद्धिक क्षमता को सुरक्षित रखने के लिए भी आवश्यक है। यह अध्ययन इस बात की याद दिलाता है कि वायु प्रदूषण का असर हमारी सांसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे मस्तिष्क और भविष्य की मानसिक सेहत को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्वच्छ पर्यावरण की दिशा में किए गए प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

  • बार-बार थकान महसूस हो रही है? गर्मी में शरीर दे रहा है ये चेतावनी संकेत

    बार-बार थकान महसूस हो रही है? गर्मी में शरीर दे रहा है ये चेतावनी संकेत


    नई दिल्ली । भीषण गर्मी के बीच कई लोग लगातार थकान, कमजोरी और सांस फूलने जैसी समस्याओं से परेशान हो रहे हैं। अक्सर इसे मौसम का असर मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक यह केवल गर्मी की वजह नहीं, बल्कि शरीर में छिपी किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है।

    डिहाइड्रेशन बन रहा सबसे बड़ा कारण
    गर्मियों में पसीने के जरिए शरीर से पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स तेजी से बाहर निकल जाते हैं। अगर समय पर पानी न पिया जाए तो डिहाइड्रेशन हो सकता है, जिससे सिरदर्द, चक्कर आना, कमजोरी और लगातार थकान महसूस होने लगती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि प्यास लगने का इंतजार न करें, बल्कि थोड़ी-थोड़ी देर में पानी, नारियल पानी या नींबू पानी लेते रहें।

    खून की कमी यानी एनीमिया भी वजह
    लगातार थकान और कमजोरी का एक बड़ा कारण शरीर में आयरन की कमी यानी एनीमिया भी हो सकता है। खासकर महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है। इसमें ऑक्सीजन शरीर तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाती, जिससे जल्दी थकान, चक्कर आना, चेहरे पर पीलापन और हाथ-पैर ठंडे रहने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

    डायबिटीज और थायरॉयड का संकेत भी संभ
    डॉक्टरों के अनुसार अगर थकान के साथ ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना या अचानक वजन कम होना जैसे लक्षण दिखें, तो यह डायबिटीज का संकेत हो सकता है। वहीं थायरॉयड की समस्या में शरीर सुस्त रहता है और व्यक्ति हर समय थका हुआ महसूस करता है।

    नींद और तनाव भी बढ़ा रहे समस्या
    लगातार मोबाइल का इस्तेमाल, देर रात तक जागना और 6–7 घंटे से कम नींद लेना भी शरीर की ऊर्जा को कम करता है। इसके साथ तनाव और मानसिक दबाव शरीर को अंदर से कमजोर बना देते हैं, जिससे थकान और बढ़ जाती है।

    गलत खानपान भी बड़ी वजह
    गर्मियों में जंक फूड, ज्यादा तला-भुना खाना और मीठे ड्रिंक्स शरीर को अस्थायी राहत तो देते हैं, लेकिन पोषण नहीं देते। इसके बजाय हल्का, ताजा और पौष्टिक आहार जैसे फल, दही, सलाद और घर का खाना ज्यादा फायदेमंद होता है।

    कब हो जाएं सतर्क?
    अगर कई दिनों तक लगातार थकान बनी रहे, रोजमर्रा के काम करना मुश्किल लगे या कमजोरी बढ़ती जाए, तो इसे हल्के में न लें और डॉक्टर से जांच जरूर करवाएं। समय पर जांच और सही जीवनशैली अपनाकर कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।

  • मोटापा बन रहा बीमारियों का बड़ा कारण, रोजमर्रा की आदतों में बदलाव से करें नियंत्रण

    मोटापा बन रहा बीमारियों का बड़ा कारण, रोजमर्रा की आदतों में बदलाव से करें नियंत्रण


    नई दिल्ली । आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग सुविधाओं के पीछे इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना लगभग भूलते जा रहे हैं। यही कारण है कि मोटापा अब केवल दिखने या शरीर की बनावट से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। बदलती जीवनशैली असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि जब शरीर का वजन सामान्य सीमा से अधिक हो जाता है तो यह केवल शरीर में अतिरिक्त चर्बी ही नहीं बढ़ाता बल्कि शरीर के अंदरूनी तंत्र को भी प्रभावित करता है। मोटापे के कारण शरीर में आंतरिक सूजन बढ़ने लगती है जो धीरे धीरे इंसुलिन प्रतिरोध को जन्म देती है। यही स्थिति आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों का कारण बनती है जिनमें Type 2 Diabetes High Blood Pressure Thyroid Disease और धमनियों में ब्लॉकेज जैसी समस्याएं शामिल हैं। इसलिए विशेषज्ञ मोटापे को कई बीमारियों का प्रवेश द्वार भी मानते हैं।

    मोटापा बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण आज का बदलता खानपान है। फास्ट फूड जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक्स का अत्यधिक सेवन शरीर में अनावश्यक कैलोरी जमा कर देता है। इन खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व कम और वसा व चीनी की मात्रा अधिक होती है जो वजन तेजी से बढ़ाने का काम करते हैं। इसके अलावा लंबे समय तक बैठकर काम करने की आदत भी मोटापे को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है। ऑफिस में घंटों कंप्यूटर के सामने बैठना और बच्चों का खेल के मैदान के बजाय मोबाइल या टीवी पर समय बिताना शारीरिक सक्रियता को कम कर देता है जिससे शरीर की कैलोरी खर्च नहीं हो पाती।

    इसके साथ ही मानसिक तनाव और अनियमित नींद भी वजन बढ़ने का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं। जब व्यक्ति पर्याप्त नींद नहीं लेता या लगातार तनाव में रहता है तो शरीर का मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है और वजन बढ़ने लगता है। ऐसे में विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि मोटापे को नियंत्रित करने के लिए दवाइयों से अधिक जरूरी है कि लोग अपनी जीवनशैली और आदतों में बदलाव करें।

    मोटापा नियंत्रित करने के लिए रोजाना कम से कम 30 मिनट तक तेज चलना साइकिल चलाना या योग करना बेहद फायदेमंद माना जाता है। नियमित व्यायाम से शरीर की अतिरिक्त कैलोरी बर्न होती है और वजन नियंत्रित रहता है। इसके साथ ही आहार में भी बदलाव जरूरी है। घर का बना संतुलित और पौष्टिक भोजन हरी सब्जियां फल और साबुत अनाज को प्राथमिकता देनी चाहिए जबकि चीनी और तेल का सेवन कम करना चाहिए।

    विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाए खासकर बच्चों के लिए। उन्हें अधिक समय तक मोबाइल या कंप्यूटर पर बैठने के बजाय शारीरिक खेलों के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके अलावा रोजाना 7 से 8 घंटे की गहरी नींद लेना भी वजन नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छोटे छोटे बदलाव जैसे लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का उपयोग करना हर एक घंटे के बाद कुछ मिनट टहलना और दैनिक काम खुद करना भी शरीर को सक्रिय बनाए रखने में मदद करते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लोग समय रहते अपनी आदतों में सुधार कर लें तो मोटापे से बचना संभव है और इसके कारण होने वाली कई गंभीर बीमारियों के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • नहाते समय कान में चला गया पानी? घरेलू उपायों से मिल सकती है राहत, लापरवाही बढ़ा सकती है संक्रमण का खतरा

    नहाते समय कान में चला गया पानी? घरेलू उपायों से मिल सकती है राहत, लापरवाही बढ़ा सकती है संक्रमण का खतरा

    नई दिल्ली । नहाते समय या बाल धोते वक्त कान में पानी चला जाना एक आम समस्या हैजिसे अधिकतर लोग हल्के में ले लेते हैं। हालांकि डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह छोटी-सी परेशानी समय पर ध्यान न देने पर गंभीर रूप ले सकती है। कान में फंसा पानी न सिर्फ असहजता पैदा करता हैबल्कि संक्रमणदर्द और सुनने की क्षमता पर असर जैसी समस्याओं का कारण भी बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि सही और सुरक्षित तरीकों से ही इस समस्या से राहत पाई जाए। विशेषज्ञों के अनुसारजब नहाते समय तेज दबाव के साथ पानी कान में प्रवेश करता हैतो वह ईयर कैनाल में फंस सकता है। कान की बनावट और अंदर मौजूद ईयर वैक्स कान का मैल कई बार पानी को बाहर निकलने से रोक देता है।
    इससे कान भारी लगने लगता हैआवाजें साफ सुनाई नहीं देतीं और एक अजीब-सी झनझनाहट महसूस होती है। लंबे समय तक नमी बनी रहने से कान के अंदर गर्म और नम वातावरण बन जाता हैजो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल होता है। यही कारण है कि लापरवाही करने पर इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि सबसे आसान और सुरक्षित घरेलू उपाय गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटी) का इस्तेमाल करना है। जिस कान में पानी गया होउस तरफ सिर झुकाकर कुछ मिनट तक लेटना कई बार पानी को बाहर निकालने के लिए पर्याप्त होता है। इसी दौरान कान की लोब को हल्के से नीचे और बाहर की ओर खींचने से ईयर कैनाल सीधी होती है और फंसा हुआ पानी बाहर निकल सकता है।

    कुछ मामलों में हेयर ड्रायर का उपयोग भी मददगार हो सकता है। ड्रायर को कम गर्मी या ठंडी हवा के मोड पर रखकर कान से सुरक्षित दूरी पर इस्तेमाल किया जाए तो अंदर की नमी सूख सकती है। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ड्रायर को बहुत पास लाना या ज्यादा देर तक गर्म हवा देना नुकसानदेह हो सकता है। डॉक्टर साफ तौर पर बताते हैं कि कान में कॉटन बडपिनमाचिस की तीली या किसी भी नुकीली वस्तु का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे कान की अंदरूनी त्वचा को चोट लग सकती है और ईयर ड्रम के फटने का भी खतरा रहता है। इसी तरह जबरदस्ती फूंक मारना या किसी तरल पदार्थ को कान में डालना स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

    यदि 24 घंटे से अधिक समय तक कान में पानी भरा हुआ महसूस होदर्दखुजली या जलन शुरू हो जाएया कान से पीले रंग का स्राव निकलने लगेतो तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। जिन लोगों का पहले कान का ऑपरेशन हो चुका हो या जिनके कान के पर्दे में छेद की समस्या रही होउन्हें घरेलू उपाय करने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञों की सलाह है कि नहाते समय या तैराकी के दौरान ईयर प्लग का इस्तेमाल किया जाए। जरूरत पड़ने पर कॉटन पर हल्की वैसलीन लगाकर कान में रखा जा सकता हैताकि पानी अंदर न जाए। साथ ही बार-बार कान साफ करने की आदत से भी बचना चाहिएक्योंकि इससे ईयर वैक्स का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है।