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  • मई का अंतिम प्रदोष व्रत 28 मई को, प्रदोष काल में करें शिव पूजा, मिलेगा विशेष फल

    मई का अंतिम प्रदोष व्रत 28 मई को, प्रदोष काल में करें शिव पूजा, मिलेगा विशेष फल


    नई दिल्ली । मई 2026 का आखिरी प्रदोष व्रत बेहद खास माना जा रहा है। इस बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि गुरुवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है, लेकिन गुरुवार के संयोग के कारण इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का भी विशेष महत्व बढ़ जाता है। माना जाता है कि इस व्रत को विधि-विधान से करने पर शिवजी और विष्णुजी दोनों की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन के दुख और बाधाएं दूर होती हैं।

    पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तिथि का आरंभ 28 मई 2026 गुरुवार सुबह 7 बजकर 58 मिनट पर होगा। वहीं यह तिथि 29 मई शुक्रवार सुबह 9 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। प्रदोष काल के आधार पर व्रत और पूजा 28 मई को ही की जाएगी। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जा रहा है।

    हिंदू धर्म में प्रदोष काल का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान शिव की पूजा करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। इस बार प्रदोष काल 28 मई को शाम 6 बजकर 12 मिनट से रात 7 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। सूर्यास्त का समय शाम 7 बजकर 12 मिनट बताया गया है। सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और बाद का समय प्रदोष काल माना जाता है।

    गुरु प्रदोष व्रत की पूजा के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर को साफ कर चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़कें और घी का दीपक जलाएं।

    शाम के समय प्रदोष काल में शिव मंदिर जाकर भगवान शिव का जल, दूध, दही, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें और चंदन लगाएं। इसके बाद शिव मंत्रों का जप करें तथा प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती कर भोग अर्पित करें और प्रसाद परिवार में बांटें।

    चूंकि यह व्रत गुरुवार को पड़ रहा है, इसलिए भगवान विष्णु की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। विष्णुजी के सामने घी का दीपक जलाकर उनकी आराधना करने से सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहती है।

  • अयोध्या में राम दरबार की पहली वर्षगांठ पर भक्ति का महासागर, मंगला आरती से गूंजा मंदिर परिसर

    अयोध्या में राम दरबार की पहली वर्षगांठ पर भक्ति का महासागर, मंगला आरती से गूंजा मंदिर परिसर

    नई दिल्ली। अयोध्या में राम मंदिर परिसर स्थित राम दरबार की प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के माहौल में मनाई जा रही है। सुबह मंगला आरती के साथ शुरू हुए कार्यक्रमों का सिलसिला देर रात तक जारी रहेगा। पूरे मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया है और देशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं, संतों और धर्माचार्यों की मौजूदगी से अयोध्या पूरी तरह राममय नजर आ रही है।

    सुबह 4 बजे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान जी का विशेष अभिषेक किया गया। शंख, घंटों और घड़ियाल की गूंज के बीच मंदिर परिसर “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा। संत-महंत और श्रद्धालु हाथ जोड़कर पूजा-अर्चना में शामिल हुए और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

    अभिषेक के बाद भगवान को पीतांबर वस्त्र धारण कराए गए और विशेष श्रृंगार किया गया। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और राम नाम संकीर्तन का दौर लगातार जारी है। श्रद्धालु भजनों पर झूमते नजर आए। दोपहर में भगवान श्रीराम को 56 भोग अर्पित किया जाएगा, जिसमें देशभर के पारंपरिक व्यंजन शामिल रहेंगे।

    कार्यक्रम के दौरान कथा व्यास सत्यनारायण दास और शिवम पांडेय भगवान श्रीराम की लीलाओं का वर्णन करेंगे। वहीं दक्षिण भारत से आए कलाकार सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए रामभक्ति का रंग और गहरा करेंगे।

    शाम को मां सरयू की 5051 बत्तियों से भव्य महाआरती होगी, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। सरयू तट पर फूल बंगला झांकी भी सजाई जाएगी, जो आकर्षण का केंद्र रहेगी। शाम 5 बजे से 7 बजे तक भजन संध्या का आयोजन भी किया जाएगा।

    इसके अलावा राम मंदिर परिसर स्थित मां दुर्गा मंदिर के शिखर पर 29 मई को ध्वजारोहण कार्यक्रम आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में साध्वी ऋतम्भरा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। दुर्गा वाहिनी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से जुड़ी पदाधिकारी भी आयोजन में मौजूद रहेंगी।

    राम दरबार की पहली वर्षगांठ पर अयोध्या में श्रद्धा, संस्कृति और सनातन परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

  • वैशाख विनायक चतुर्थी 2026: आज गणेश पूजा का शुभ संयोग, बनेंगे सुख-समृद्धि के योग

    वैशाख विनायक चतुर्थी 2026: आज गणेश पूजा का शुभ संयोग, बनेंगे सुख-समृद्धि के योग


    नई दिल्ली। आज 20 अप्रैल 2026 को वैशाख माह की विनायक चतुर्थी का पावन व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। हर माह शुक्ल और कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी तिथि पर भक्त गणपति बप्पा की पूजा कर जीवन के कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं। वैशाख मास की यह विनायक चतुर्थी विशेष रूप से फलदायी मानी गई है क्योंकि इस दिन शोभन योग का भी शुभ संयोग बन रहा है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शोभन योग में की गई पूजा-अर्चना का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस योग में भगवान गणेश की विधिवत आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि, सफलता और स्थिरता के योग बनते हैं। साथ ही यह माना जाता है कि इस दिन की गई पूजा से सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं और रुके हुए कार्य भी पूरे होने लगते हैं।

    धार्मिक शास्त्रों के अनुसार विनायक चतुर्थी व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है जिन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और बुद्धि, विवेक, मान-सम्मान तथा समृद्धि में वृद्धि होती है।

    ऐसा भी माना जाता है कि जो लोग लगातार असफलताओं का सामना कर रहे होते हैं उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। गणपति की कृपा से जीवन में नई दिशा और सफलता के मार्ग खुलते हैं। घर-परिवार में सुख-शांति का वातावरण बनता है और मांगलिक कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।

    विनायक चतुर्थी की पूजा विधि भी अत्यंत सरल मानी गई है। इस दिन प्रातः स्नान कर घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। लाल वस्त्र बिछाकर गणपति को विराजमान किया जाता है और गंगाजल से संकल्प लेकर पूजा प्रारंभ की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश को दूर्वा, मोदक, लड्डू और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। धूप-दीप जलाकर विधिवत आराधना की जाती है और गणेश मंत्रों का जाप तथा गणेश चालीसा का पाठ किया जाता है।

    शाम के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है जिसे पारण कहा जाता है। इस पूरी विधि से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल लेकर आती है। कुल मिलाकर विनायक चतुर्थी का यह पावन अवसर भक्तों के लिए भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ समय माना जाता है।

  • ज्येष्ठ मास 2026: स्नान-दान और भक्ति का पर्व, जानें धार्मिक महत्व और बड़ा मंगल परंपरा

    ज्येष्ठ मास 2026: स्नान-दान और भक्ति का पर्व, जानें धार्मिक महत्व और बड़ा मंगल परंपरा


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास को अत्यंत पवित्र और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ मास की शुरुआत 2 मई से हो रही है और इसका समापन 29 जून को होगा। इस बार विशेष संयोग यह है कि ज्येष्ठ मास में अधिक मास का योग बन रहा है, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह संयोग धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का समय कहा गया है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास में स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व होता है। इस अवधि में किए गए पुण्य कार्यों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार इस महीने में जप, तप और पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की वृद्धि होती है। विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना इस मास में अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

    ज्येष्ठ मास की एक प्रमुख विशेषता बड़ा मंगल है। इस महीने के प्रत्येक मंगलवार को बड़ा मंगल के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ माह के मंगलवार को ही भगवान श्रीराम और हनुमान जी की पहली भेंट हुई थी। इसी कारण इस दिन हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त इस दिन हनुमान जी को बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।

    मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमान जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े कार्य भी बनने लगते हैं। इस दौरान सत्तू, जल, अन्न और धन का दान करना भी अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। दान करने से न केवल धार्मिक फल की प्राप्ति होती है बल्कि धन-समृद्धि के योग भी मजबूत होते हैं।

    ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह महीना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है क्योंकि अधिक मास के संयोग में किए गए धार्मिक कार्यों का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ, हवन और भक्ति कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

    कुल मिलाकर ज्येष्ठ मास केवल एक धार्मिक अवधि नहीं बल्कि आत्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जन का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान की गई साधना और भक्ति जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।

  • हनुमान जयंती 2026 पर करें ये चमत्कारी उपाय बजरंगबली की कृपा से हर संकट होगा दूर

    हनुमान जयंती 2026 पर करें ये चमत्कारी उपाय बजरंगबली की कृपा से हर संकट होगा दूर

    नई दिल्ली। हनुमान जयंती का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह दिन भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखता है और इसे संकटों को दूर करने वाला दिन माना जाता है। चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि पर आने वाला यह पर्व भक्तों के लिए एक ऐसा अवसर होता है जब सच्चे मन से की गई पूजा और उपाय जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली की आराधना करने से भय बाधाएं और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती हैं। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होता है जो मानसिक तनाव आर्थिक परेशानी या किसी प्रकार की रुकावट का सामना कर रहे हैं। इस दिन किए गए सरल लेकिन प्रभावी उपाय व्यक्ति के जीवन में साहस ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार करते हैं।

    हनुमान जयंती के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद भगवान हनुमान की पूजा करनी चाहिए। मंदिर जाकर या घर में ही उनकी प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करने से मन की अशांति दूर होती है और मानसिक शक्ति बढ़ती है।

    इस दिन राम नाम का जप करना भी बेहद फलदायी माना जाता है क्योंकि भगवान हनुमान को भगवान राम का परम भक्त माना जाता है। श्रीराम के नाम का स्मरण करने से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्त यदि संभव हो तो इस दिन व्रत रखकर पूरे दिन सात्विक आहार का पालन करें और शाम को विधिपूर्वक पूजा अर्चना करें।

    हनुमान जयंती पर जरूरतमंदों को भोजन कराना और दान करना भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। खासकर बंदरों को गुड़ और चना खिलाना शुभ फल देता है और इसे संकटों से मुक्ति का एक सरल उपाय माना जाता है। इसके अलावा पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने और हनुमान मंदिर में जाकर प्रसाद चढ़ाने से भी जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि हनुमान जी को प्रसन्न करना कठिन नहीं है बल्कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास ही उनकी कृपा पाने का सबसे बड़ा माध्यम है। इसलिए इस दिन किए गए छोटे छोटे उपाय भी बड़े परिणाम दे सकते हैं।

    हनुमान जयंती केवल एक पर्व नहीं बल्कि आत्मबल और विश्वास को मजबूत करने का दिन है। यह हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी साहस और भक्ति के बल पर हर समस्या का समाधान संभव है। यदि इस दिन पूरे मन से बजरंगबली की आराधना की जाए तो जीवन में आने वाले संकटों से राहत मिल सकती है और सफलता के नए रास्ते खुल सकते हैं।

  • Chaitra Purnima 2026: शुभ योगों के साथ खास पूर्णिमा, जानें पूजा और व्रत का सही समय

    Chaitra Purnima 2026: शुभ योगों के साथ खास पूर्णिमा, जानें पूजा और व्रत का सही समय


    नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली पूर्णिमा को चैत्र पूर्णिमा कहा जाता है। यह तिथि धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इस दिन स्नान, दान, जप और तप करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। साल 2026 में चैत्र पूर्णिमा 1 और 2 अप्रैल को पड़ रही है, जिससे लोगों के मन में यह सवाल है कि व्रत और अनुष्ठान के लिए कौन सा दिन श्रेष्ठ रहेगा।

    चैत्र पूर्णिमा तिथि का समय


    द्रिक पंचांग के अनुसार

    पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 1 अप्रैल सुबह 7:06 बजे

    पूर्णिमा तिथि समाप्त: 2 अप्रैल सुबह 7:41 बजे

    कब करें स्नान और दान
    हिंदू धर्म में उदयतिथि का विशेष महत्व होता है।

    1 अप्रैल को पूर्णिमा सूर्योदय के बाद शुरू हो रही है

    2 अप्रैल को सूर्योदय के समय पूर्णिमा विद्यमान रहेगी

    इसी कारण 2 अप्रैल को स्नान और दान करना अधिक शुभ माना गया है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान, जरूरतमंदों को दान और धार्मिक कार्य करना विशेष फलदायी होता है।

    कब रखें व्रत


    पूर्णिमा व्रत आमतौर पर चंद्रोदय के आधार पर रखा जाता है।

    1 अप्रैल को चंद्रोदय शाम 6:11 बजे होगा

    2 अप्रैल को चंद्रोदय प्रतिपदा तिथि में होगा

    इसलिए चैत्र पूर्णिमा का व्रत 1 अप्रैल 2026 को रखा जाएगा।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    1 अप्रैल (व्रत और पूजा के लिए)

    भगवान सत्यनारायण पूजा समय: सुबह 6:11 से 9:18 बजे

    शाम को सूर्यास्त (6:39 बजे) के बाद प्रदोष काल में मां लक्ष्मी की पूजा करें

    रात में चंद्रमा को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है

    2 अप्रैल (स्नान और दान के लिए)

    ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:38 से 5:24

    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 से 12:50

    शुभ योगों का संयोग

    1 अप्रैल को कई शुभ योग बन रहे हैं:

    रवि योग: सुबह 6:11 से शाम 4:17

    सर्वार्थ सिद्धि योग: शाम 4:17 से अगले दिन सुबह 6:10 तक

    वृद्धि योग: दोपहर 2:51 तक

    इसके बाद ध्रुव योग शुरू होगा

    ये सभी योग पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।

    चैत्र पूर्णिमा का महत्व

    चैत्र पूर्णिमा के दिन व्रत रखने, स्नान और दान करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। साथ ही सत्यनारायण कथा करने का भी विशेष महत्व होता है।

  • नवरात्र के तीसरे दिन और गणगौर का महत्व..

    नवरात्र के तीसरे दिन और गणगौर का महत्व..


    नई दिल्ली:शक्ति की उपासना के पर्व नवरात्रि का तीसरा दिन इस बार और भी खास बन गया है क्योंकि इसी दिन तृतीया तिथि पर प्रसिद्ध पर्व गणगौर भी मनाया जा रहा है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

    गणगौर का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से है। इस दिन शिवजी को ईसर और माता पार्वती को गौरा या गवरजा के रूप में पूजा जाता है। गण का अर्थ भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती होता है। यह पर्व विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र सहित कई हिस्सों में बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है और विवाहित महिलाओं को सुख, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में स्थिरता का आशीर्वाद मिलता है। महिलाएं पूरे मनोभाव से व्रत रखकर माता गौरा की पूजा करती हैं और अपने परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

    पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 24 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 33 मिनट पर होगा। शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि रात 11 बजकर 56 मिनट तक प्रभावी रहेगी। नक्षत्र अश्विनी दिनभर रहेगा और यह 22 मार्च की देर रात तक प्रभावी रहेगा। वहीं, योग इन्द्र शाम 7 बजकर 1 मिनट तक रहेगा और करण तैतिल दोपहर 1 बजकर 14 मिनट तक रहेगा।

    शुभ मुहूर्त की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 49 मिनट से 5 बजकर 37 मिनट तक रहेगा, जो ध्यान और साधना के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता है। इसके अलावा अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 4 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 32 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक रहेगा, जिसे धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उत्तम समय माना जाता है। अमृत काल शाम 5 बजकर 58 मिनट से 7 बजकर 27 मिनट तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

    हालांकि, कुछ समय ऐसे भी होते हैं जिनमें शुभ कार्य करने से बचना चाहिए। इस दिन राहुकाल सुबह 9 बजकर 26 मिनट से 10 बजकर 57 मिनट तक रहेगा, यमगंड दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 31 मिनट तक और गुलिक काल सुबह 6 बजकर 24 मिनट से 7 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। इन समयों में कोई भी नया कार्य, यात्रा या महत्वपूर्ण निर्णय लेना शुभ नहीं माना जाता।

    नवरात्र का यह तीसरा दिन आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां मां गौरा और भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है, वहीं दूसरी ओर पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त का पालन कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सफलता प्राप्त की जा सकती है। यह दिन भक्ति, आस्था और संस्कारों का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

  • चैत्र नवरात्र: पालकी पर आगमन और हाथी पर प्रस्थान के संकेत..

    चैत्र नवरात्र: पालकी पर आगमन और हाथी पर प्रस्थान के संकेत..

    नई दिल्ली: देशभर में मनाए जाने वाले पावन पर्व चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से माना जाता है। यह पर्व न केवल शक्ति की उपासना का प्रतीक है, बल्कि नए हिंदू वर्ष की शुरुआत और जीवन में आने वाले बदलावों के संकेत भी देता है। इस वर्ष 19 मार्च से नवरात्र की शुरुआत हुई है और श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना में लीन हैं।

    मान्यता है कि नवरात्र में माता दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी आने वाले समय के संकेत देती है। इस बार मां जगदम्बा का आगमन गुरुवार के दिन पालकी पर हुआ है। शास्त्रों के अनुसार, पालकी पर आगमन को सामान्यतः शुभ संकेत नहीं माना जाता। इसे प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक अस्थिरता या आर्थिक चुनौतियों का संकेत माना जाता है। गुरुवार के दिन आगमन को लेकर यह भी माना जाता है कि यह समय कुछ सावधानियों और सतर्कता की मांग करता है।

    हालांकि, इस वर्ष मां का प्रस्थान शुक्रवार को हाथी पर होगा, जो अत्यंत शुभ माना जाता है। हाथी स्थिरता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, जब मां हाथी पर सवार होकर प्रस्थान करती हैं, तो यह संकेत देता है कि आने वाला समय सुख, शांति और आर्थिक स्थिरता लेकर आएगा। यह स्थिति जीवन में संतुलन और प्रगति का संकेत भी मानी जाती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी सप्ताह के दिन के अनुसार बदलती रहती है और हर सवारी का अलग महत्व होता है। उदाहरण के लिए, रविवार और सोमवार को प्रस्थान होने पर मां की सवारी भैंसा मानी जाती है, जिसे अशुभ माना जाता है क्योंकि यह रोग और शोक का प्रतीक है। वहीं, मंगलवार और शनिवार को प्रस्थान होने पर सवारी मुर्गा होती है, जो कुछ स्थानों पर महामारी या जनहानि का संकेत माना जाता है।

    इसके विपरीत, बुधवार और शुक्रवार को मां की सवारी हाथी मानी जाती है, जो बेहद शुभ संकेत देता है और जीवन में सुख-समृद्धि, स्थिरता और उन्नति का प्रतीक होता है। गुरुवार को प्रस्थान होने पर मां मनुष्य के कंधे पर सवार होकर जाती हैं, जिसे भक्त और देवी के बीच विशेष आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

    विगत वर्ष 2025 की शारदीय नवरात्रि में भी मां का आगमन हाथी पर हुआ था, जो शुभ संकेत था, लेकिन प्रस्थान गुरुवार को भक्तों के कंधे पर हुआ था, जो संतुलन और मिश्रित परिणामों का संकेत माना गया।

     नवरात्रि में मां के आगमन और प्रस्थान की सवारी को भविष्य के संकेत के रूप में देखा जाता है। इस वर्ष जहां पालकी पर आगमन कुछ सावधानी बरतने का संदेश देता है, वहीं हाथी पर प्रस्थान आने वाले समय में स्थिरता और सकारात्मकता की उम्मीद जगाता है। यह पर्व न केवल आस्था और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि जीवन में संतुलन और चेतना का संदेश भी देता है।

  • महाकाल भस्म आरती 24 फरवरी: उज्जैन में भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार और भव्य आराधना

    महाकाल भस्म आरती 24 फरवरी: उज्जैन में भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार और भव्य आराधना


    उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध Mahakaleshwar Temple में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि मंगलवार तड़के 4 बजे मंदिर के कपाट खोले गए। इस अवसर पर महाकाल भस्म आरती का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार किया गया। मंदिर के पट खुलने के साथ ही पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन किया और भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक संपन्न हुआ।

    भगवान महाकाल का मनोहारी श्रृंगार चंदन के त्रिपुंड, त्रिनेत्र और भांग के साथ किया गया। भस्म अर्पण से पहले प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया गया और मंत्रोच्चार के बीच भगवान का ध्यान किया गया। कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढंककर भस्म रमाई गई। इसके बाद शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल, रुद्राक्ष की माला और पुष्पों की मालाएं अर्पित की गईं। आभूषणों और सुगंधित पुष्पों से भगवान का अलंकरण किया गया।

    अल सुबह भस्म आरती में सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने बाबा महाकाल के दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया। भक्त नंदी महाराज का दर्शन कर उनके कान के समीप जाकर अपनी मनोकामनाओं के पूर्ण होने का आशीर्वाद प्राप्त करते रहे। इस दौरान पूरा मंदिर बाबा महाकाल की जयकारों से गुंजायमान रहा। भक्तजन मंत्रोच्चार और भक्ति रस में डूबकर भगवान के चरणों में अपने मन की शांति और आशीर्वाद के लिए उपस्थित रहे।

    मंदिर में भक्तों की उपस्थिति ने माहौल को और भी आध्यात्मिक और भव्य बना दिया। पंचामृत अभिषेक और भस्म आरती का अनुभव श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत अद्भुत और प्रेरक रहा। भक्तों ने पूजा में अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ भाग लिया और महाकाल का दर्शन करके आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया। इस अवसर ने मंदिर और श्रद्धालुओं के बीच गहरा आध्यात्मिक संबंध और भक्ति भाव का अद्वितीय अनुभव प्रस्तुत किया।

    श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का यह आयोजन न केवल भव्य था बल्कि भक्तों के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व से परिपूर्ण रहा। भक्तजन यहाँ अपने मनोकामनाओं की पूर्ति, जीवन में सुख-शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्ति के लिए हर वर्ष इस भव्य आरती में भाग लेते हैं।

  • विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय

    विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय


    नई दिल्ली । विजया एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और विशेष रूप से सफलता विजय बाधाओं पर जीत और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए मनाई जाती है। 2026 में विजया एकादशी का धार्मिक महत्व और तारीख सभी भक्तों के लिए निश्चित हो चुकी है जिसे जानकर आप सही विधि और मुहूर्त के अनुसार व्रत रख सकते हैं।

    विजया एकादशी व्रत की सही तारीख और समय

    इस वर्ष विजया एकादशी शुक्रवार 13 फरवरी 2026 को है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 फरवरी दोपहर 12:22 बजे से शुरू होकर 13 फरवरी दोपहर 02:25 बजे तक रहेगी। व्रत का पारण द्वादशी को व्रत खोलना 14 फरवरी 2026 शनिवार की सुबह लगभग 07:00 से 09:14 बजे तक किया जाएगा।

    क्यों है यह एकादशी महत्वपूर्ण?
    विजया एकादशी का अर्थ ही विजय होता है। पुराणों के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु की विशेष कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाने वाला माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों शत्रुओं बाधाओं या नकारात्मक परिस्थितियों का सामना कर रहा है तो इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत रखने से सफलता और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। यही कारण है कि यह एकादशी वैदिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है।
    व्रत कैसे रखें
    विजया एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर व्यक्ति स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि स्वास्थ्य अनुकूल हो तो केवल जल का सेवन कर व्रत रखा जाए; लेकिन अगर स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार भी किया जा सकता है। व्रत के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन करने से व्रत की सिद्धि और अधिक होती है।
    ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय यह सबसे सरल और प्रभावशाली मंत्र है जिसका जाप श्रद्धा से करने पर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

    धार्मिक मान्यता:विजया एकादशी व्रत को श्रीराम ने लंका विजय से पहले किया था इसलिए इसे विजय-दायक व्रत के रूप में अत्यंत फलदायी माना जाता है। भक्तजन इस दिन भगवान विष्णु की पूजा फलाहार व भजन-कीर्तन के साथ व्रत रखते हैं और निरंतर मन में सकारात्मक ऊर्जा और विजय की भावना बनाए रखते हैं।