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  • भोलेनाथ को प्रसन्न करने का सरल उपाय, सावन में रोज शिवलिंग पर अर्पित करें यह पवित्र वस्तु

    भोलेनाथ को प्रसन्न करने का सरल उपाय, सावन में रोज शिवलिंग पर अर्पित करें यह पवित्र वस्तु


    नई दिल्ली। सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पूरे महीने में श्रद्धा और नियमपूर्वक महादेव की पूजा करने से जीवन की अनेक बाधाएं दूर हो सकती हैं और सुख समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस वर्ष सावन 30 जुलाई से 28 अगस्त तक रहेगा और इस दौरान देशभर के शिवालयों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा और भक्ति से शीघ्र प्रसन्न होकर मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष का पान भगवान शिव ने संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए किया था। विष की तीव्रता को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था। तभी से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। धार्मिक मान्यता है कि शिवलिंग पर जल अर्पित करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    सावन के प्रत्येक सोमवार का व्रत अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि किसी कारणवश व्रत रखना संभव न हो तो प्रतिदिन भगवान शिव के मंदिर जाकर शिवलिंग पर एक लोटा स्वच्छ जल और बेलपत्र अवश्य अर्पित करना चाहिए। बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और आस्था के साथ बेलपत्र अर्पित करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। यदि जल के स्थान पर दूध से अभिषेक करना चाहें तो किया जा सकता है लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार दूध चढ़ाने के लिए तांबे के पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए।

    जल या दूध अर्पित करने के बाद शिव पंचाक्षर मंत्र अथवा ओम नमः शिवाय मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे मन एकाग्र होता है और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसके अलावा सावन में भगवान शिव का चंदन दही शहद घी और पंचामृत से अभिषेक करने की भी परंपरा है। धतूरा भांग आक के फूल और भस्म भी भगवान शिव को अर्पित किए जाते हैं जिन्हें उनकी प्रिय सामग्री माना गया है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार सावन का महीना चातुर्मास के अंतर्गत आता है और इस अवधि में भगवान शिव की विशेष आराधना का महत्व बढ़ जाता है। जिन लोगों के विवाह में बाधा आ रही हो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हों आयु को लेकर चिंता हो या कुंडली में ग्रह दोष हों उन्हें विशेष रूप से इस महीने शिव पूजा करने की सलाह दी जाती है। कई लोग इस दौरान महामृत्युंजय मंत्र का जाप और रुद्राभिषेक भी कराते हैं।

    सावन में पूजा के साथ साथ सात्विक जीवनशैली अपनाने पर भी विशेष जोर दिया जाता है। इस दौरान तामसिक भोजन से बचने और शुद्ध सात्विक आहार ग्रहण करने की सलाह दी जाती है। पत्तेदार सब्जियों का सेवन सीमित रखने और भोजन को अच्छी तरह पकाकर खाने की परंपरा भी बताई जाती है। नियमित रूप से गुनगुना पानी पीना और स्वच्छता का ध्यान रखना भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सच्ची श्रद्धा सादगी और भक्ति के साथ की गई शिव आराधना सबसे अधिक फलदायी मानी जाती है। इसलिए सावन के इस पावन महीने में यदि नियमित रूप से भगवान शिव का स्मरण किया जाए और शिवलिंग पर जल तथा बेलपत्र अर्पित किए जाएं तो जीवन में सकारात्मक बदलाव आने की मान्यता है। हालांकि यह सभी बातें धार्मिक आस्था और परंपराओं पर आधारित हैं और इन्हें श्रद्धा के भाव से ही देखा जाना चाहिए।

  • शुक्रवार का व्रत कैसे करें सुबह से शाम तक जानें पूजा का सही नियम शुभ मुहूर्त और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय

    शुक्रवार का व्रत कैसे करें सुबह से शाम तक जानें पूजा का सही नियम शुभ मुहूर्त और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय


    नई दिल्ली।  सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन धन की देवी माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत तथा पूजा करने से घर में सुख समृद्धि धन वैभव और खुशहाली का वास होता है। माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए केवल पूजा करना ही पर्याप्त नहीं माना गया है बल्कि मन की पवित्रता सच्ची श्रद्धा और सात्विक आचरण भी उतना ही आवश्यक माना जाता है। इसलिए शुक्रवार का व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आत्मअनुशासन और सकारात्मक जीवनशैली का भी प्रतीक माना जाता है।

    शुक्रवार के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करें। माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ आसन पर स्थापित करें। पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाएं और धूप अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद माता को सफेद पुष्प कमल का फूल यदि उपलब्ध हो तो अवश्य अर्पित करें। चावल हल्दी कुमकुम और अक्षत अर्पित कर श्रद्धा से पूजा करें।

    पूजन के दौरान श्री सूक्त कनकधारा स्तोत्र लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम या लक्ष्मी मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि समय कम हो तो कम से कम 108 बार ओम श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का जप अवश्य करें। इसके बाद माता लक्ष्मी की आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों को आरती में शामिल करें। माना जाता है कि सामूहिक पूजा से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर सात्विक भोजन का पालन करते हैं। कई लोग केवल फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग एक समय बिना लहसुन और प्याज का भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान क्रोध झूठ अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि माता लक्ष्मी स्वच्छता शांति और सदाचार से प्रसन्न होती हैं इसलिए घर और मन दोनों को निर्मल रखना जरूरी माना गया है।

    शुक्रवार के दिन सफेद रंग की मिठाई खीर मखाने की खीर मिश्री बताशे या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद प्रसाद परिवार और जरूरतमंद लोगों में बांटना भी पुण्यदायी माना गया है। यदि संभव हो तो किसी गरीब जरूरतमंद महिला या कन्या को सफेद वस्त्र चावल दूध चीनी या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें। इससे माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार के दिन घर में साफ सफाई बनाए रखना टूटे बर्तन और बेकार वस्तुओं को हटाना तथा शाम के समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है और आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलते हैं। इसके साथ ही अनावश्यक खर्च से बचना और आय के साधनों का सम्मान करना भी माता लक्ष्मी की कृपा बनाए रखने का महत्वपूर्ण उपाय माना गया है।

    मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा विश्वास और नियमपूर्वक लगातार शुक्रवार का व्रत करता है उसके जीवन में आर्थिक परेशानियां धीरे धीरे दूर होने लगती हैं और परिवार में सुख शांति तथा समृद्धि का वातावरण बनता है। हालांकि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है और इसका पालन श्रद्धा तथा विश्वास के साथ ही करना चाहिए।

  • गुरु पूर्णिमा 2026 आज ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अबूझ मुहूर्त तक करें भगवान विष्णु और गुरु की आराधना जानें संपूर्ण पूजा विधि

    गुरु पूर्णिमा 2026 आज ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अबूझ मुहूर्त तक करें भगवान विष्णु और गुरु की आराधना जानें संपूर्ण पूजा विधि


    नई दिल्ली । आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है। यह दिन केवल गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर नहीं बल्कि आत्मचिंतन ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का भी पर्व माना जाता है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई की शाम से प्रारंभ होकर 29 जुलाई की रात्रि तक रहेगी इसलिए उदया तिथि के आधार पर आज गुरु पूर्णिमा का व्रत और पूजन किया जा रहा है।

    धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन किया और महाभारत सहित अनेक महान ग्रंथों की रचना की। इसी कारण गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन अपने गुरु माता पिता शिक्षकों और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी लोगों का सम्मान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    इस बार गुरु पूर्णिमा पर कई शुभ योग भी बन रहे हैं जिन्हें अत्यंत फलदायी माना गया है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि में विराजमान हैं जिससे इस पर्व का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे शुभ संयोग में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से सुख समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

    गुरु पूर्णिमा के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थान को शुद्ध करें और भगवान विष्णु मां लक्ष्मी तथा अपने गुरु का स्मरण करें। यदि गुरु प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हों तो उनका आशीर्वाद लें। यदि संभव न हो तो उनके चित्र के समक्ष दीपक जलाकर पुष्प अर्पित करें और श्रद्धा के साथ प्रणाम करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीले पुष्प तुलसी दल फल और पंचामृत अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम अथवा ॐ नमो नारायणाय मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    इस दिन दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र फल छाता जल पात्र या धार्मिक ग्रंथों का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। ब्राह्मणों और गुरुजनों का सम्मान कर उन्हें दक्षिणा देना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा और सेवा से जीवन में आने वाली अनेक बाधाएं दूर होती हैं तथा ज्ञान और विवेक का प्रकाश मिलता है।

    गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमें जीवन में मार्गदर्शन देने वाले हर व्यक्ति के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देती है। माता पिता शिक्षक आध्यात्मिक गुरु और वे सभी लोग जिन्होंने कठिन समय में सही दिशा दिखाई उन्हें सम्मान देना ही इस पर्व का वास्तविक संदेश है।

    धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा भाव से की गई पूजा साधना जप तप और दान का कई गुना फल प्राप्त होता है। इसलिए आज के दिन अहंकार त्यागकर विनम्रता अपनाएं गुरु का आशीर्वाद लें और भगवान श्रीहरि की आराधना कर जीवन में सुख शांति समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करें।

  • योगिनी एकादशी का महापर्व कब रखें व्रत 9 या 10 जुलाई उदया तिथि का भ्रम हुआ दूर जानें लक्ष्मी नारायण की कृपा पाने का शुभ समय

    योगिनी एकादशी का महापर्व कब रखें व्रत 9 या 10 जुलाई उदया तिथि का भ्रम हुआ दूर जानें लक्ष्मी नारायण की कृपा पाने का शुभ समय

    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक माह आने वाली दोनों एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती हैं और श्रद्धालु पूरे विधि विधान के साथ इनका पालन करते हैं। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी को विशेष रूप से पापों के नाश और सुख समृद्धि प्रदान करने वाला व्रत माना गया है। इस बार योगिनी एकादशी को लेकर लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि व्रत 9 जुलाई को रखा जाए या फिर 10 जुलाई को। धार्मिक मान्यताओं और पंचांग के अनुसार इस बार उदया तिथि के आधार पर व्रत 10 जुलाई शुक्रवार को रखा जाएगा।

    पंचांग के अनुसार आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 9 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 45 मिनट से होगा जबकि इसका समापन 10 जुलाई को दोपहर 1 बजकर 20 मिनट पर होगा। चूंकि व्रत के लिए उदया तिथि का विशेष महत्व माना जाता है इसलिए योगिनी एकादशी का व्रत 10 जुलाई को करना धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ और मान्य रहेगा।

    इस वर्ष योगिनी एकादशी कई शुभ और कल्याणकारी संयोगों के साथ आ रही है। इस दिन सुकर्मा योग और धृति योग का निर्माण हो रहा है जो धार्मिक कार्यों और भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। इतना ही नहीं शुक्रवार के दिन एकादशी होने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त होने का दुर्लभ अवसर भी बन रहा है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति से लक्ष्मी नारायण की पूजा करने वाले भक्तों के जीवन में धन समृद्धि सुख शांति और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है।

    योगिनी एकादशी का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है बल्कि इसे आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का पर्व भी माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति के जाने अनजाने में हुए पापों का नाश होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में आने वाली अनेक बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख समृद्धि तथा खुशहाली बनी रहती है। ऐसा भी कहा गया है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने वाला व्यक्ति सांसारिक सुखों का आनंद लेने के बाद अंत में मोक्ष की प्राप्ति करता है।

    व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप जलाकर पीले फूल तुलसी दल फल और पंचामृत अर्पित करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम श्री विष्णु चालीसा और एकादशी व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। दिनभर सात्विक आचरण रखते हुए भगवान के नाम का स्मरण करना चाहिए और जरूरतमंद लोगों को अन्न वस्त्र या धन का दान करने से भी विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

    योगिनी एकादशी व्रत का पारण 11 जुलाई शनिवार को किया जाएगा। पारण का शुभ समय सुबह 5 बजकर 32 मिनट से सुबह 8 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार द्वादशी तिथि के भीतर ही व्रत का पारण करना आवश्यक माना गया है। समय पर पारण करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

    धार्मिक दृष्टि से योगिनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आत्मसंयम भक्ति सेवा और सकारात्मक जीवन का संदेश देने वाला पावन पर्व है। यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन किया जाए तो भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि और मानसिक शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • मई का अंतिम प्रदोष व्रत 28 मई को, प्रदोष काल में करें शिव पूजा, मिलेगा विशेष फल

    मई का अंतिम प्रदोष व्रत 28 मई को, प्रदोष काल में करें शिव पूजा, मिलेगा विशेष फल


    नई दिल्ली । मई 2026 का आखिरी प्रदोष व्रत बेहद खास माना जा रहा है। इस बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि गुरुवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है, लेकिन गुरुवार के संयोग के कारण इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का भी विशेष महत्व बढ़ जाता है। माना जाता है कि इस व्रत को विधि-विधान से करने पर शिवजी और विष्णुजी दोनों की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन के दुख और बाधाएं दूर होती हैं।

    पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तिथि का आरंभ 28 मई 2026 गुरुवार सुबह 7 बजकर 58 मिनट पर होगा। वहीं यह तिथि 29 मई शुक्रवार सुबह 9 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। प्रदोष काल के आधार पर व्रत और पूजा 28 मई को ही की जाएगी। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जा रहा है।

    हिंदू धर्म में प्रदोष काल का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान शिव की पूजा करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। इस बार प्रदोष काल 28 मई को शाम 6 बजकर 12 मिनट से रात 7 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। सूर्यास्त का समय शाम 7 बजकर 12 मिनट बताया गया है। सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और बाद का समय प्रदोष काल माना जाता है।

    गुरु प्रदोष व्रत की पूजा के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर को साफ कर चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़कें और घी का दीपक जलाएं।

    शाम के समय प्रदोष काल में शिव मंदिर जाकर भगवान शिव का जल, दूध, दही, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें और चंदन लगाएं। इसके बाद शिव मंत्रों का जप करें तथा प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती कर भोग अर्पित करें और प्रसाद परिवार में बांटें।

    चूंकि यह व्रत गुरुवार को पड़ रहा है, इसलिए भगवान विष्णु की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। विष्णुजी के सामने घी का दीपक जलाकर उनकी आराधना करने से सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहती है।

  • अयोध्या में राम दरबार की पहली वर्षगांठ पर भक्ति का महासागर, मंगला आरती से गूंजा मंदिर परिसर

    अयोध्या में राम दरबार की पहली वर्षगांठ पर भक्ति का महासागर, मंगला आरती से गूंजा मंदिर परिसर

    नई दिल्ली। अयोध्या में राम मंदिर परिसर स्थित राम दरबार की प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के माहौल में मनाई जा रही है। सुबह मंगला आरती के साथ शुरू हुए कार्यक्रमों का सिलसिला देर रात तक जारी रहेगा। पूरे मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया है और देशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं, संतों और धर्माचार्यों की मौजूदगी से अयोध्या पूरी तरह राममय नजर आ रही है।

    सुबह 4 बजे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान जी का विशेष अभिषेक किया गया। शंख, घंटों और घड़ियाल की गूंज के बीच मंदिर परिसर “जय श्रीराम” के उद्घोष से गूंज उठा। संत-महंत और श्रद्धालु हाथ जोड़कर पूजा-अर्चना में शामिल हुए और पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

    अभिषेक के बाद भगवान को पीतांबर वस्त्र धारण कराए गए और विशेष श्रृंगार किया गया। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और राम नाम संकीर्तन का दौर लगातार जारी है। श्रद्धालु भजनों पर झूमते नजर आए। दोपहर में भगवान श्रीराम को 56 भोग अर्पित किया जाएगा, जिसमें देशभर के पारंपरिक व्यंजन शामिल रहेंगे।

    कार्यक्रम के दौरान कथा व्यास सत्यनारायण दास और शिवम पांडेय भगवान श्रीराम की लीलाओं का वर्णन करेंगे। वहीं दक्षिण भारत से आए कलाकार सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए रामभक्ति का रंग और गहरा करेंगे।

    शाम को मां सरयू की 5051 बत्तियों से भव्य महाआरती होगी, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। सरयू तट पर फूल बंगला झांकी भी सजाई जाएगी, जो आकर्षण का केंद्र रहेगी। शाम 5 बजे से 7 बजे तक भजन संध्या का आयोजन भी किया जाएगा।

    इसके अलावा राम मंदिर परिसर स्थित मां दुर्गा मंदिर के शिखर पर 29 मई को ध्वजारोहण कार्यक्रम आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में साध्वी ऋतम्भरा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। दुर्गा वाहिनी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से जुड़ी पदाधिकारी भी आयोजन में मौजूद रहेंगी।

    राम दरबार की पहली वर्षगांठ पर अयोध्या में श्रद्धा, संस्कृति और सनातन परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

  • वैशाख विनायक चतुर्थी 2026: आज गणेश पूजा का शुभ संयोग, बनेंगे सुख-समृद्धि के योग

    वैशाख विनायक चतुर्थी 2026: आज गणेश पूजा का शुभ संयोग, बनेंगे सुख-समृद्धि के योग


    नई दिल्ली। आज 20 अप्रैल 2026 को वैशाख माह की विनायक चतुर्थी का पावन व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। हर माह शुक्ल और कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी तिथि पर भक्त गणपति बप्पा की पूजा कर जीवन के कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं। वैशाख मास की यह विनायक चतुर्थी विशेष रूप से फलदायी मानी गई है क्योंकि इस दिन शोभन योग का भी शुभ संयोग बन रहा है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शोभन योग में की गई पूजा-अर्चना का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस योग में भगवान गणेश की विधिवत आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि, सफलता और स्थिरता के योग बनते हैं। साथ ही यह माना जाता है कि इस दिन की गई पूजा से सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं और रुके हुए कार्य भी पूरे होने लगते हैं।

    धार्मिक शास्त्रों के अनुसार विनायक चतुर्थी व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है जिन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और बुद्धि, विवेक, मान-सम्मान तथा समृद्धि में वृद्धि होती है।

    ऐसा भी माना जाता है कि जो लोग लगातार असफलताओं का सामना कर रहे होते हैं उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। गणपति की कृपा से जीवन में नई दिशा और सफलता के मार्ग खुलते हैं। घर-परिवार में सुख-शांति का वातावरण बनता है और मांगलिक कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।

    विनायक चतुर्थी की पूजा विधि भी अत्यंत सरल मानी गई है। इस दिन प्रातः स्नान कर घर के मंदिर को स्वच्छ कर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। लाल वस्त्र बिछाकर गणपति को विराजमान किया जाता है और गंगाजल से संकल्प लेकर पूजा प्रारंभ की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश को दूर्वा, मोदक, लड्डू और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। धूप-दीप जलाकर विधिवत आराधना की जाती है और गणेश मंत्रों का जाप तथा गणेश चालीसा का पाठ किया जाता है।

    शाम के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है जिसे पारण कहा जाता है। इस पूरी विधि से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल लेकर आती है। कुल मिलाकर विनायक चतुर्थी का यह पावन अवसर भक्तों के लिए भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ समय माना जाता है।

  • ज्येष्ठ मास 2026: स्नान-दान और भक्ति का पर्व, जानें धार्मिक महत्व और बड़ा मंगल परंपरा

    ज्येष्ठ मास 2026: स्नान-दान और भक्ति का पर्व, जानें धार्मिक महत्व और बड़ा मंगल परंपरा


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास को अत्यंत पवित्र और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ मास की शुरुआत 2 मई से हो रही है और इसका समापन 29 जून को होगा। इस बार विशेष संयोग यह है कि ज्येष्ठ मास में अधिक मास का योग बन रहा है, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। यह संयोग धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का समय कहा गया है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास में स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व होता है। इस अवधि में किए गए पुण्य कार्यों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार इस महीने में जप, तप और पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की वृद्धि होती है। विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना इस मास में अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

    ज्येष्ठ मास की एक प्रमुख विशेषता बड़ा मंगल है। इस महीने के प्रत्येक मंगलवार को बड़ा मंगल के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ माह के मंगलवार को ही भगवान श्रीराम और हनुमान जी की पहली भेंट हुई थी। इसी कारण इस दिन हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त इस दिन हनुमान जी को बूंदी के लड्डू का भोग लगाते हैं और संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।

    मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के मंगलवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ हनुमान जी की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े कार्य भी बनने लगते हैं। इस दौरान सत्तू, जल, अन्न और धन का दान करना भी अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। दान करने से न केवल धार्मिक फल की प्राप्ति होती है बल्कि धन-समृद्धि के योग भी मजबूत होते हैं।

    ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह महीना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है क्योंकि अधिक मास के संयोग में किए गए धार्मिक कार्यों का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यही कारण है कि इस अवधि में मंदिरों में विशेष पूजा-पाठ, हवन और भक्ति कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

    कुल मिलाकर ज्येष्ठ मास केवल एक धार्मिक अवधि नहीं बल्कि आत्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जन का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान की गई साधना और भक्ति जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।

  • हनुमान जयंती 2026 पर करें ये चमत्कारी उपाय बजरंगबली की कृपा से हर संकट होगा दूर

    हनुमान जयंती 2026 पर करें ये चमत्कारी उपाय बजरंगबली की कृपा से हर संकट होगा दूर

    नई दिल्ली। हनुमान जयंती का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह दिन भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखता है और इसे संकटों को दूर करने वाला दिन माना जाता है। चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि पर आने वाला यह पर्व भक्तों के लिए एक ऐसा अवसर होता है जब सच्चे मन से की गई पूजा और उपाय जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जयंती के दिन बजरंगबली की आराधना करने से भय बाधाएं और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती हैं। यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण होता है जो मानसिक तनाव आर्थिक परेशानी या किसी प्रकार की रुकावट का सामना कर रहे हैं। इस दिन किए गए सरल लेकिन प्रभावी उपाय व्यक्ति के जीवन में साहस ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार करते हैं।

    हनुमान जयंती के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद भगवान हनुमान की पूजा करनी चाहिए। मंदिर जाकर या घर में ही उनकी प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ करने से मन की अशांति दूर होती है और मानसिक शक्ति बढ़ती है।

    इस दिन राम नाम का जप करना भी बेहद फलदायी माना जाता है क्योंकि भगवान हनुमान को भगवान राम का परम भक्त माना जाता है। श्रीराम के नाम का स्मरण करने से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्त यदि संभव हो तो इस दिन व्रत रखकर पूरे दिन सात्विक आहार का पालन करें और शाम को विधिपूर्वक पूजा अर्चना करें।

    हनुमान जयंती पर जरूरतमंदों को भोजन कराना और दान करना भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। खासकर बंदरों को गुड़ और चना खिलाना शुभ फल देता है और इसे संकटों से मुक्ति का एक सरल उपाय माना जाता है। इसके अलावा पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने और हनुमान मंदिर में जाकर प्रसाद चढ़ाने से भी जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि हनुमान जी को प्रसन्न करना कठिन नहीं है बल्कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास ही उनकी कृपा पाने का सबसे बड़ा माध्यम है। इसलिए इस दिन किए गए छोटे छोटे उपाय भी बड़े परिणाम दे सकते हैं।

    हनुमान जयंती केवल एक पर्व नहीं बल्कि आत्मबल और विश्वास को मजबूत करने का दिन है। यह हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी साहस और भक्ति के बल पर हर समस्या का समाधान संभव है। यदि इस दिन पूरे मन से बजरंगबली की आराधना की जाए तो जीवन में आने वाले संकटों से राहत मिल सकती है और सफलता के नए रास्ते खुल सकते हैं।

  • Chaitra Purnima 2026: शुभ योगों के साथ खास पूर्णिमा, जानें पूजा और व्रत का सही समय

    Chaitra Purnima 2026: शुभ योगों के साथ खास पूर्णिमा, जानें पूजा और व्रत का सही समय


    नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली पूर्णिमा को चैत्र पूर्णिमा कहा जाता है। यह तिथि धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इस दिन स्नान, दान, जप और तप करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। साल 2026 में चैत्र पूर्णिमा 1 और 2 अप्रैल को पड़ रही है, जिससे लोगों के मन में यह सवाल है कि व्रत और अनुष्ठान के लिए कौन सा दिन श्रेष्ठ रहेगा।

    चैत्र पूर्णिमा तिथि का समय


    द्रिक पंचांग के अनुसार

    पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 1 अप्रैल सुबह 7:06 बजे

    पूर्णिमा तिथि समाप्त: 2 अप्रैल सुबह 7:41 बजे

    कब करें स्नान और दान
    हिंदू धर्म में उदयतिथि का विशेष महत्व होता है।

    1 अप्रैल को पूर्णिमा सूर्योदय के बाद शुरू हो रही है

    2 अप्रैल को सूर्योदय के समय पूर्णिमा विद्यमान रहेगी

    इसी कारण 2 अप्रैल को स्नान और दान करना अधिक शुभ माना गया है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान, जरूरतमंदों को दान और धार्मिक कार्य करना विशेष फलदायी होता है।

    कब रखें व्रत


    पूर्णिमा व्रत आमतौर पर चंद्रोदय के आधार पर रखा जाता है।

    1 अप्रैल को चंद्रोदय शाम 6:11 बजे होगा

    2 अप्रैल को चंद्रोदय प्रतिपदा तिथि में होगा

    इसलिए चैत्र पूर्णिमा का व्रत 1 अप्रैल 2026 को रखा जाएगा।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    1 अप्रैल (व्रत और पूजा के लिए)

    भगवान सत्यनारायण पूजा समय: सुबह 6:11 से 9:18 बजे

    शाम को सूर्यास्त (6:39 बजे) के बाद प्रदोष काल में मां लक्ष्मी की पूजा करें

    रात में चंद्रमा को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है

    2 अप्रैल (स्नान और दान के लिए)

    ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:38 से 5:24

    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 से 12:50

    शुभ योगों का संयोग

    1 अप्रैल को कई शुभ योग बन रहे हैं:

    रवि योग: सुबह 6:11 से शाम 4:17

    सर्वार्थ सिद्धि योग: शाम 4:17 से अगले दिन सुबह 6:10 तक

    वृद्धि योग: दोपहर 2:51 तक

    इसके बाद ध्रुव योग शुरू होगा

    ये सभी योग पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माने जाते हैं।

    चैत्र पूर्णिमा का महत्व

    चैत्र पूर्णिमा के दिन व्रत रखने, स्नान और दान करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। साथ ही सत्यनारायण कथा करने का भी विशेष महत्व होता है।