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  • नवरात्र के तीसरे दिन और गणगौर का महत्व..

    नवरात्र के तीसरे दिन और गणगौर का महत्व..


    नई दिल्ली:शक्ति की उपासना के पर्व नवरात्रि का तीसरा दिन इस बार और भी खास बन गया है क्योंकि इसी दिन तृतीया तिथि पर प्रसिद्ध पर्व गणगौर भी मनाया जा रहा है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

    गणगौर का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से है। इस दिन शिवजी को ईसर और माता पार्वती को गौरा या गवरजा के रूप में पूजा जाता है। गण का अर्थ भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती होता है। यह पर्व विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र सहित कई हिस्सों में बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है और विवाहित महिलाओं को सुख, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में स्थिरता का आशीर्वाद मिलता है। महिलाएं पूरे मनोभाव से व्रत रखकर माता गौरा की पूजा करती हैं और अपने परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

    पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 24 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 33 मिनट पर होगा। शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि रात 11 बजकर 56 मिनट तक प्रभावी रहेगी। नक्षत्र अश्विनी दिनभर रहेगा और यह 22 मार्च की देर रात तक प्रभावी रहेगा। वहीं, योग इन्द्र शाम 7 बजकर 1 मिनट तक रहेगा और करण तैतिल दोपहर 1 बजकर 14 मिनट तक रहेगा।

    शुभ मुहूर्त की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 49 मिनट से 5 बजकर 37 मिनट तक रहेगा, जो ध्यान और साधना के लिए सर्वोत्तम समय माना जाता है। इसके अलावा अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 4 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 32 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक रहेगा, जिसे धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उत्तम समय माना जाता है। अमृत काल शाम 5 बजकर 58 मिनट से 7 बजकर 27 मिनट तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

    हालांकि, कुछ समय ऐसे भी होते हैं जिनमें शुभ कार्य करने से बचना चाहिए। इस दिन राहुकाल सुबह 9 बजकर 26 मिनट से 10 बजकर 57 मिनट तक रहेगा, यमगंड दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 31 मिनट तक और गुलिक काल सुबह 6 बजकर 24 मिनट से 7 बजकर 55 मिनट तक रहेगा। इन समयों में कोई भी नया कार्य, यात्रा या महत्वपूर्ण निर्णय लेना शुभ नहीं माना जाता।

    नवरात्र का यह तीसरा दिन आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां मां गौरा और भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है, वहीं दूसरी ओर पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त का पालन कर जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सफलता प्राप्त की जा सकती है। यह दिन भक्ति, आस्था और संस्कारों का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

  • चैत्र नवरात्र: पालकी पर आगमन और हाथी पर प्रस्थान के संकेत..

    चैत्र नवरात्र: पालकी पर आगमन और हाथी पर प्रस्थान के संकेत..

    नई दिल्ली: देशभर में मनाए जाने वाले पावन पर्व चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से माना जाता है। यह पर्व न केवल शक्ति की उपासना का प्रतीक है, बल्कि नए हिंदू वर्ष की शुरुआत और जीवन में आने वाले बदलावों के संकेत भी देता है। इस वर्ष 19 मार्च से नवरात्र की शुरुआत हुई है और श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना में लीन हैं।

    मान्यता है कि नवरात्र में माता दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी आने वाले समय के संकेत देती है। इस बार मां जगदम्बा का आगमन गुरुवार के दिन पालकी पर हुआ है। शास्त्रों के अनुसार, पालकी पर आगमन को सामान्यतः शुभ संकेत नहीं माना जाता। इसे प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक अस्थिरता या आर्थिक चुनौतियों का संकेत माना जाता है। गुरुवार के दिन आगमन को लेकर यह भी माना जाता है कि यह समय कुछ सावधानियों और सतर्कता की मांग करता है।

    हालांकि, इस वर्ष मां का प्रस्थान शुक्रवार को हाथी पर होगा, जो अत्यंत शुभ माना जाता है। हाथी स्थिरता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, जब मां हाथी पर सवार होकर प्रस्थान करती हैं, तो यह संकेत देता है कि आने वाला समय सुख, शांति और आर्थिक स्थिरता लेकर आएगा। यह स्थिति जीवन में संतुलन और प्रगति का संकेत भी मानी जाती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान की सवारी सप्ताह के दिन के अनुसार बदलती रहती है और हर सवारी का अलग महत्व होता है। उदाहरण के लिए, रविवार और सोमवार को प्रस्थान होने पर मां की सवारी भैंसा मानी जाती है, जिसे अशुभ माना जाता है क्योंकि यह रोग और शोक का प्रतीक है। वहीं, मंगलवार और शनिवार को प्रस्थान होने पर सवारी मुर्गा होती है, जो कुछ स्थानों पर महामारी या जनहानि का संकेत माना जाता है।

    इसके विपरीत, बुधवार और शुक्रवार को मां की सवारी हाथी मानी जाती है, जो बेहद शुभ संकेत देता है और जीवन में सुख-समृद्धि, स्थिरता और उन्नति का प्रतीक होता है। गुरुवार को प्रस्थान होने पर मां मनुष्य के कंधे पर सवार होकर जाती हैं, जिसे भक्त और देवी के बीच विशेष आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

    विगत वर्ष 2025 की शारदीय नवरात्रि में भी मां का आगमन हाथी पर हुआ था, जो शुभ संकेत था, लेकिन प्रस्थान गुरुवार को भक्तों के कंधे पर हुआ था, जो संतुलन और मिश्रित परिणामों का संकेत माना गया।

     नवरात्रि में मां के आगमन और प्रस्थान की सवारी को भविष्य के संकेत के रूप में देखा जाता है। इस वर्ष जहां पालकी पर आगमन कुछ सावधानी बरतने का संदेश देता है, वहीं हाथी पर प्रस्थान आने वाले समय में स्थिरता और सकारात्मकता की उम्मीद जगाता है। यह पर्व न केवल आस्था और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि जीवन में संतुलन और चेतना का संदेश भी देता है।

  • महाकाल भस्म आरती 24 फरवरी: उज्जैन में भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार और भव्य आराधना

    महाकाल भस्म आरती 24 फरवरी: उज्जैन में भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार और भव्य आराधना


    उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध Mahakaleshwar Temple में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि मंगलवार तड़के 4 बजे मंदिर के कपाट खोले गए। इस अवसर पर महाकाल भस्म आरती का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार किया गया। मंदिर के पट खुलने के साथ ही पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन किया और भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक संपन्न हुआ।

    भगवान महाकाल का मनोहारी श्रृंगार चंदन के त्रिपुंड, त्रिनेत्र और भांग के साथ किया गया। भस्म अर्पण से पहले प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया गया और मंत्रोच्चार के बीच भगवान का ध्यान किया गया। कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढंककर भस्म रमाई गई। इसके बाद शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल, रुद्राक्ष की माला और पुष्पों की मालाएं अर्पित की गईं। आभूषणों और सुगंधित पुष्पों से भगवान का अलंकरण किया गया।

    अल सुबह भस्म आरती में सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने बाबा महाकाल के दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया। भक्त नंदी महाराज का दर्शन कर उनके कान के समीप जाकर अपनी मनोकामनाओं के पूर्ण होने का आशीर्वाद प्राप्त करते रहे। इस दौरान पूरा मंदिर बाबा महाकाल की जयकारों से गुंजायमान रहा। भक्तजन मंत्रोच्चार और भक्ति रस में डूबकर भगवान के चरणों में अपने मन की शांति और आशीर्वाद के लिए उपस्थित रहे।

    मंदिर में भक्तों की उपस्थिति ने माहौल को और भी आध्यात्मिक और भव्य बना दिया। पंचामृत अभिषेक और भस्म आरती का अनुभव श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत अद्भुत और प्रेरक रहा। भक्तों ने पूजा में अपनी श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ भाग लिया और महाकाल का दर्शन करके आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया। इस अवसर ने मंदिर और श्रद्धालुओं के बीच गहरा आध्यात्मिक संबंध और भक्ति भाव का अद्वितीय अनुभव प्रस्तुत किया।

    श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती का यह आयोजन न केवल भव्य था बल्कि भक्तों के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व से परिपूर्ण रहा। भक्तजन यहाँ अपने मनोकामनाओं की पूर्ति, जीवन में सुख-शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्ति के लिए हर वर्ष इस भव्य आरती में भाग लेते हैं।

  • विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय

    विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय


    नई दिल्ली । विजया एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और विशेष रूप से सफलता विजय बाधाओं पर जीत और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए मनाई जाती है। 2026 में विजया एकादशी का धार्मिक महत्व और तारीख सभी भक्तों के लिए निश्चित हो चुकी है जिसे जानकर आप सही विधि और मुहूर्त के अनुसार व्रत रख सकते हैं।

    विजया एकादशी व्रत की सही तारीख और समय

    इस वर्ष विजया एकादशी शुक्रवार 13 फरवरी 2026 को है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 फरवरी दोपहर 12:22 बजे से शुरू होकर 13 फरवरी दोपहर 02:25 बजे तक रहेगी। व्रत का पारण द्वादशी को व्रत खोलना 14 फरवरी 2026 शनिवार की सुबह लगभग 07:00 से 09:14 बजे तक किया जाएगा।

    क्यों है यह एकादशी महत्वपूर्ण?
    विजया एकादशी का अर्थ ही विजय होता है। पुराणों के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु की विशेष कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाने वाला माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों शत्रुओं बाधाओं या नकारात्मक परिस्थितियों का सामना कर रहा है तो इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत रखने से सफलता और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। यही कारण है कि यह एकादशी वैदिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है।
    व्रत कैसे रखें
    विजया एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर व्यक्ति स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि स्वास्थ्य अनुकूल हो तो केवल जल का सेवन कर व्रत रखा जाए; लेकिन अगर स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार भी किया जा सकता है। व्रत के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन करने से व्रत की सिद्धि और अधिक होती है।
    ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय यह सबसे सरल और प्रभावशाली मंत्र है जिसका जाप श्रद्धा से करने पर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

    धार्मिक मान्यता:विजया एकादशी व्रत को श्रीराम ने लंका विजय से पहले किया था इसलिए इसे विजय-दायक व्रत के रूप में अत्यंत फलदायी माना जाता है। भक्तजन इस दिन भगवान विष्णु की पूजा फलाहार व भजन-कीर्तन के साथ व्रत रखते हैं और निरंतर मन में सकारात्मक ऊर्जा और विजय की भावना बनाए रखते हैं।

  • Saphala Ekadashi 2025: जानें सफला एकादशी के व्रत का महत्व, तारीख और जरूरी नियम

    Saphala Ekadashi 2025: जानें सफला एकादशी के व्रत का महत्व, तारीख और जरूरी नियम


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को विशेष और पवित्र माना गया है। भगवान विष्णु को समर्पित यह दिन भक्तों के लिए कल्याणकारी माना गया है। साल में कुल 24 एकादशी आती हैं और हर एकादशी आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ मानी जाती है। इन्हीं में से एक है-सफला एकादशी, जिसे पौष मास के कृष्ण पक्ष में रखा जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत व पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सफलता, सुख और समृद्धि आती है। 2025 में सफला एकादशी का व्रत शुभ योग में पड़ रहा है, इसलिए इसका महत्व और बढ़ जाता है।

    सफला एकादशी 2025 की तिथि और समय

    हिंदू पंचांग के अनुसार पौष मास की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि

    14 दिसंबर 2025 को रात 08:46 बजे शुरू होगी,

    और 15 दिसंबर 2025 को रात 10:09 बजे समाप्त होगी।

    पंचांग गणना के अनुसार सफला एकादशी व्रत 15 दिसंबर 2025 (सोमवार) को रखा जाएगा। द्वादशी तिथि में उपवास का पारण किया जाएगा।

    सफला एकादशी का महत्व

    सफला एकादशी का अर्थ है-“सफलता देने वाली एकादशी।” मान्यता है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा जीवन में रुके हुए कार्यों को गति देता है और हर प्रकार के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखता है, उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
    इस दिन भगवान विष्णु के पूजन का फल अनेक यज्ञों के समान बताया गया है। साथ ही यह व्रत साधक को मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

    क्या करें सफला एकादशी के दिन?

    सफला एकादशी के दिन कुछ खास नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। इनका पालन करने से व्रत का पूरा फल मिलता है-

    1. स्नान और संकल्प

    सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

    2. भगवान विष्णु की पूजा

    विष्णु भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।

    पीले फूल, फल, चंदन और तुलसी अर्पित करें।

    घर के पूजा स्थल में शांति और पवित्रता बनाए रखें।

    3. तुलसी पूजा

    तुलसी माता को भगवान विष्णु के पूजन का अनिवार्य अंग माना गया है।

    तुलसी चालीसा का पाठ करें।

    भगवान के भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करें।

    4. मंत्र जाप

    सफला एकादशी के दिन निम्न मंत्रों का जाप अत्यंत शुभ माना गया है-

    “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

    या फिर

    “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे…”

    5. ब्रह्मचर्य और संयम

    इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन, वाणी तथा व्यवहार से शुद्ध बने रहें।

    6. द्वादशी पर पारण

    व्रत का पारण द्वादशी तिथि में शुभ मुहूर्त पर ही किया जाना चाहिए।
    पारण से पहले –

    ब्राह्मणों, जरूरतमंदों या गरीबों को भोजन कराएं।

    अनाज, फल, तिल, वस्त्र आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है।

    क्या न करें सफला एकादशी को?

    व्रत का पूरा फल पाने के लिए इस दिन कुछ बातों का खास ध्यान रखना जरूरी है-

    1. चावल का सेवन न करें

    एकादशी पर चावल खाना धार्मिक रूप से वर्जित है।

    2. तामसिक भोजन से दूर रहें

    लहसुन, प्याज, मांसाहार, शराब आदि का सेवन वर्जित है।

    3. तुलसी पत्ती न तोड़ें

    एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना दोषकारी माना जाता है।

    4. साफ-सफाई से संबंधित कार्य न करें

    बाल, नाखून या दाढ़ी न कटवाएं।

    5. झूठ, निंदा और कलह से बचें

    किसी की बुराई न करें, झूठ न बोलें और विवाद से दूर रहें।

    निष्कर्ष

    सफला एकादशी आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी दिन है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना, व्रत और दान करने से जीवन में सफलता, शांति और समृद्धि का मार्ग खुलता है। सही नियमों का पालन करने से यह व्रत मनोवांछित फल प्रदान करता है।