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  • आज सोम प्रदोष व्रत: भगवान शिव के अभिषेक का शुभ मुहूर्त शाम 6:29 से 8:53 बजे तक

    आज सोम प्रदोष व्रत: भगवान शिव के अभिषेक का शुभ मुहूर्त शाम 6:29 से 8:53 बजे तक

    नई दिल्ली । 16 मार्च को सोम प्रदोष व्रत मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जब प्रदोष व्रत सोमवार को पड़ता है तो इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है और इसका महत्व और बढ़ जाता है। इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा आने की मान्यता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। पंचांग के अनुसार आज प्रदोष काल में पूजा और अभिषेक का शुभ समय शाम 6:29 बजे से रात 8:53 बजे तक रहेगा। इस दौरान विधि-विधान से अभिषेक करने से भक्तों को विशेष आशीर्वाद मिलने की मान्यता है।

    अभिषेक करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना जरूरी माना गया है। शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते समय उसका चिकना भाग ऊपर की ओर रखना चाहिए। भगवान शिव को कुमकुम और हल्दी अर्पित नहीं की जाती। पूजा के दौरान मन को शांत रखकर श्रद्धा और सकारात्मक भाव से भगवान शिव का स्मरण करना चाहिए।

    परंपरा के अनुसार इस दिन व्रत रखकर शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और जल से अभिषेक किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को दीर्घायु, आरोग्य, धन-धान्य और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: जानिए 9 दिनों में किस दिन कौन सा रंग पहनना है शुभ, पूरी लिस्ट यहां देखें

    चैत्र नवरात्रि 2026: जानिए 9 दिनों में किस दिन कौन सा रंग पहनना है शुभ, पूरी लिस्ट यहां देखें


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व बेहद श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से हो रही है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में मां दुर्गा के नौ अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त इन दिनों व्रत रखते हैं पूजा अर्चना करते हैं और मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न धार्मिक नियमों का पालन करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में हर दिन एक विशेष रंग पहनने की परंपरा भी है। माना जाता है कि उस दिन से जुड़े शुभ रंग को पहनने से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    नवरात्रि का पहला दिन सफेद

    नवरात्रि के पहले दिन का रंग सफेद माना जाता है। यह पवित्रता शांति और नई शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री मानी जाती हैं।

    दूसरा दिन लाल

    नवरात्रि के दूसरे दिन लाल रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह रंग प्रेम शक्ति और उत्साह का प्रतीक है। इस दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है जो तपस्या और भक्ति की देवी मानी जाती हैं।

    तीसरा दिन रॉयल ब्लू
    तीसरे दिन का रंग रॉयल ब्लू होता है। यह दिव्य ऊर्जा स्थिरता और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है जिनका स्वरूप साहस और वीरता का प्रतीक है।

    चौथा दिन पीला

    नवरात्रि के चौथे दिन पीला रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह उत्साह उल्लास और सकारात्मकता का प्रतीक है। इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है जिन्हें ब्रह्मांड की सृष्टि करने वाली देवी माना जाता है।

    पाँचवाँ दिन हरा

    पाँचवें दिन का रंग हरा होता है जो उर्वरता विकास और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन देवी स्कंदमाता की पूजा की जाती है जो भगवान कार्तिकेय की माता हैं।

    छठवाँ दिन ग्रे

    छठे दिन स्लेटी यानी ग्रे रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह संतुलन शक्ति और धैर्य का प्रतीक है। इस दिन देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है जिन्हें शक्ति और साहस की देवी माना जाता है।

    सातवाँ दिन नारंगी

    सातवें दिन का रंग नारंगी है जो ऊर्जा उत्साह और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है जो दुर्गा का उग्र रूप मानी जाती हैं और बुराई का नाश करती हैं।

    आठवाँ दिन पीकॉक ग्रीन

    आठवें दिन का रंग पीकॉक ग्रीन यानी मोर हरा होता है। यह सुंदरता शालीनता और सकारात्मकता का प्रतीक है। इस दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है जिन्हें पवित्रता और शांति की देवी माना जाता है।

    नौवाँ दिन गुलाबी

    नवरात्रि के अंतिम दिन गुलाबी रंग पहनना शुभ माना जाता है। यह प्रेम करुणा और सद्भाव का प्रतीक है। इस दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है जो भक्तों को ज्ञान सिद्धि और सफलता का आशीर्वाद देती हैं। इस प्रकार नवरात्रि के नौ दिनों में निर्धारित रंग पहनकर मां दुर्गा की पूजा करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति सकारात्मक ऊर्जा और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: कलश स्थापना के साथ घर लाएं ये 5 शुभ चीजें, मां दुर्गा की कृपा से दूर होगी आर्थिक तंगी

    चैत्र नवरात्रि 2026: कलश स्थापना के साथ घर लाएं ये 5 शुभ चीजें, मां दुर्गा की कृपा से दूर होगी आर्थिक तंगी


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र महीने का विशेष महत्व माना जाता है। इस महीने में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार आते हैं जिनमें चैत्र नवरात्रि का स्थान सबसे खास है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि का आरंभ 19 मार्च से होने जा रहा है। नवरात्रि के नौ दिनों में भक्तगण मां दुर्गा के नौ अलग अलग स्वरूपों की पूजा अर्चना करते हैं और उपवास रखकर देवी की आराधना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा भूमिलोक पर आती हैं और नौ दिनों तक भक्तों के बीच निवास करती हैं। यही कारण है कि इस अवधि में देवी को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा पाठ भजन कीर्तन और मंदिरों में भव्य सजावट की जाती है।

    ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ कुछ शुभ वस्तुएं घर लाना बेहद फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इन पवित्र चीजों को घर में लाने और पूजा करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है सोई हुई किस्मत जागती है और घर में सुख समृद्धि का वास होता है।

    सबसे पहले केला का पेड़ लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि आपके घर में पहले से केला का पेड़ नहीं है तो नवरात्रि के पहले दिन इसे लगाना अच्छा माना जाता है। हिंदू धर्म में केला का पेड़ पूजनीय माना जाता है और इसकी पूजा करने से घर में समृद्धि सुख और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    इसके साथ ही लाल गुड़हल का फूल भी विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा को लाल गुड़हल का फूल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि यह फूल देवी मां को अत्यंत प्रिय है और इसे चढ़ाने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

    नवरात्रि के अवसर पर हरसिंगार का पौधा घर में लगाना भी शुभ माना जाता है। यह पौधा सुख शांति और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसे घर में लगाने से परिवार में समृद्धि और सकारात्मक वातावरण बना रहता है।

    इसी प्रकार शंखपुष्पी का फूल भी देवी मां को अर्पित करने के लिए शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि के पहले दिन देवी को शंखपुष्पी का फूल चढ़ाने से भक्तों की हर कामना पूर्ण होती है और जीवन में सफलता के मार्ग खुलते हैं।

    इसके अलावा तुलसी का पौधा भी बेहद पवित्र माना जाता है। अगर घर में तुलसी का पौधा नहीं है तो नवरात्रि के शुभ अवसर पर इसे लगाना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। तुलसी की प्रतिदिन पूजा और जल अर्पित करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और देवी देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार चैत्र नवरात्रि के पहले दिन इन पवित्र चीजों को घर में लाकर विधि विधान से पूजा करने से जीवन में सुख समृद्धि शांति और खुशहाली का वास होता है तथा मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

  • आखिर क्यों महादेव ने काटा ब्रह्मा जी का पांचवां सिर? सृष्टि के रचयिता की एक भूल और पौराणिक कथा का रहस्य

    आखिर क्यों महादेव ने काटा ब्रह्मा जी का पांचवां सिर? सृष्टि के रचयिता की एक भूल और पौराणिक कथा का रहस्य


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और शिव का विशेष महत्व माना जाता है। इनमें ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। आम तौर पर हम उन्हें चार मुखों वाले चतुर्मुख रूप में देखते हैं, लेकिन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुरुआत में ब्रह्मा जी के पांच मुख हुआ करते थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार उनकी एक भूल के कारण भगवान शिव ने उनका पांचवां सिर कटवा दिया, जिसके बाद वे चतुर्मुख रूप में ही पूजे जाने लगे।

    इस कथा का उल्लेख Shiva Purana में मिलता है। इसके अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा जी ने Satarupa नाम की एक अत्यंत सुंदर स्त्री की रचना की। सतरूपा अत्यंत तेजस्वी और मनमोहक रूप वाली थीं। कथा के अनुसार उनके सौंदर्य को देखकर स्वयं ब्रह्मा जी भी आकर्षित हो गए।

    बताया जाता है कि जब सतरूपा को यह आभास हुआ कि ब्रह्मा जी की दृष्टि उन पर है, तो उन्होंने उनसे बचने के लिए अलग-अलग दिशाओं में जाना शुरू कर दिया। सतरूपा जब जिस दिशा में जातीं, ब्रह्मा जी उन्हें देखने के लिए उसी दिशा में अपना एक मुख प्रकट कर लेते। इस तरह उन्होंने चारों दिशाओं में देखने के लिए चार मुख बना लिए। लेकिन जब सतरूपा आकाश की ओर बढ़ीं, तब ब्रह्मा जी ने ऊपर की ओर देखने के लिए अपना पांचवां मुख भी प्रकट कर लिया।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह आचरण मर्यादा के विरुद्ध माना गया, क्योंकि सतरूपा उनकी ही रचना थीं और उन्हें मानस पुत्री के समान माना जाता था। यह सब देखकर Shiva अत्यंत क्रोधित हो गए। धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए उन्होंने अपने उग्र स्वरूप Kala Bhairava को प्रकट किया और ब्रह्मा जी को दंड देने का आदेश दिया।

    महादेव के आदेश पर काल भैरव ने तुरंत ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जो ऊपर की ओर था। इसी घटना के बाद से ब्रह्मा जी के केवल चार मुख ही रह गए और वे चतुर्मुख रूप में ही जाने जाने लगे। बाद में ब्रह्मा जी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार इस घटना का एक और प्रभाव यह भी माना जाता है कि ब्रह्मा जी की पूजा अन्य देवताओं की तुलना में बहुत कम होती है। कहा जाता है कि बाद में Saraswati के श्राप के कारण भी उनकी व्यापक पूजा नहीं हो पाई।

    हालांकि भारत में एक ऐसा स्थान है जहां ब्रह्मा जी का प्रमुख और प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर ब्रह्मा मंदिर में है, जो पुष्कर, राजस्थान में स्थित है। यह मंदिर ब्रह्मा जी के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक माना जाता है, जहां हर साल हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस तरह यह पौराणिक कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग ही नहीं, बल्कि मर्यादा, संयम और धर्म के महत्व का संदेश भी देती है।

  • नवरात्रि में मुख्य द्वार पर करें ये आसान वास्तु उपाय, घर में आएगी सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि

    नवरात्रि में मुख्य द्वार पर करें ये आसान वास्तु उपाय, घर में आएगी सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि


    नई दिल्‍ली । चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म में शक्ति साधना और मां दुर्गा की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से शुरू हो रही है और नौ दिनों तक भक्त पूरे श्रद्धा भाव से देवी की पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय न केवल पूजा और व्रत का होता है बल्कि घर के वातावरण को शुद्ध और सकारात्मक बनाने का भी उत्तम अवसर माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का मुख्य द्वार ऊर्जा के प्रवेश का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। यहीं से सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की ऊर्जा घर में प्रवेश करती हैं। इसलिए नवरात्रि के दौरान मुख्य द्वार को साफ सुथरा पवित्र और शुभ प्रतीकों से सजाना विशेष रूप से लाभकारी माना गया है।

    नवरात्रि के दिनों में घर के मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का तोरण लगाना बेहद शुभ माना जाता है। हिंदू परंपरा में तोरण को मंगल और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि आम के पत्तों का तोरण लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश रुक जाता है। इसके साथ ही मुख्य द्वार को नियमित रूप से साफ रखना और उसे सजाकर रखना भी जरूरी माना जाता है क्योंकि स्वच्छता को भी शुभता का प्रतीक माना जाता है।

    वास्तु शास्त्र के अनुसार नवरात्रि के दौरान स्नान के बाद मुख्य द्वार के दोनों ओर कुमकुम या हल्दी से स्वास्तिक का चिन्ह बनाना भी अत्यंत शुभ होता है। स्वास्तिक को सनातन परंपरा में मंगल सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही एक ओर शुभ और दूसरी ओर लाभ लिखने की परंपरा भी है। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और परिवार में सुख समृद्धि का वातावरण बनता है।

    नवरात्रि के नौ दिनों में मुख्य द्वार के अंदर की ओर आते हुए माता लक्ष्मी के छोटे छोटे चरण चिह्न बनाना भी शुभ माना जाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से इस बात का संकेत देता है कि घर में धन सौभाग्य और समृद्धि का आगमन हो रहा है। कई लोग चावल के आटे कुमकुम या रंगोली से ये चरण चिह्न बनाते हैं जिससे घर का वातावरण और भी पवित्र और आकर्षक बन जाता है।

    इसके अलावा वास्तु शास्त्र में एक और सरल उपाय बताया गया है। एक तांबे के बर्तन में साफ पानी भरकर उसमें गुलाब की पंखुड़ियां डालकर मुख्य द्वार के पास रखना शुभ माना जाता है। गुलाब की सुगंध और जल दोनों मिलकर वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और घर में शांति तथा सुख का भाव बढ़ाते हैं।

    नवरात्रि के दौरान सूर्यास्त के बाद मुख्य द्वार के पास घी का दीपक जलाने की परंपरा भी बहुत शुभ मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दीपक का प्रकाश नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में दिव्यता तथा सकारात्मकता का वातावरण बनाता है। कहा जाता है कि जब घर का मुख्य द्वार शुभ प्रतीकों दीपक की रोशनी और स्वच्छता से सुसज्जित रहता है तो वहां मां दुर्गा और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और परिवार में सुख शांति तथा समृद्धि का वास होता है।

  • भगवान श्रीकृष्ण का 16,108 रानियों से विवाह: नारी अस्मिता और समाज के लिए एक अद्भुत लीला

    भगवान श्रीकृष्ण का 16,108 रानियों से विवाह: नारी अस्मिता और समाज के लिए एक अद्भुत लीला


    नई दिल्ली । भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अनेक रहस्यों और शिक्षाओं से भरा हुआ है। उनकी प्रत्येक घटना गहरे आध्यात्मिक और नैतिक संदेश देती है। इनमें से एक प्रमुख घटना उनके द्वारा 16,108 रानियों से विवाह करने की है, जिसे अक्सर लोग एक सामान्य विवाह कथा मान लेते हैं, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ और उद्देश्य कहीं अधिक गहरा है। श्रीकृष्ण ने जिन 16,108 रानियों से विवाह किया, वह केवल एक व्यक्तिगत या भौतिक लीलाओं का हिस्सा नहीं था। इसके पीछे एक गहरा संदेश है, जो नारी अस्मिता, समाज में समानता, और न्याय की रक्षा से जुड़ा है। इस घटना का प्रमुख उद्देश्य इन 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराना था, जिनकी मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध किया और उन्हें सम्मान प्रदान किया।

    8 प्रमुख रानियाँ और उनके प्रतीक

    श्रीकृष्ण की 8 प्रमुख रानियों को ‘अष्टभार्या’ कहा जाता है। ये रानियाँ विभिन्न गुणों और शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती थीं रुक्मिणी साक्षात लक्ष्मी देवी का स्वरूप जो समृद्धि और वैभव की प्रतीक थीं। सत्यभामा एक महान योद्धा और पराक्रमी जिनका जन्म सत्राजित के घर हुआ था। जाम्बवती जाम्बवंत की पुत्री, जो बल और साहस का प्रतीक थीं। कालिंदी सूर्यपुत्री, यमुना की देवी, जो जल तत्व और जीवन के प्रवाह का प्रतीक थीं। मित्रबिन्दा जो मित्रता और सौहार्द की प्रतीक थीं। सत्या सत्य और धर्म की आस्था रखने वाली। भद्रा जो शांति और संतुलन की प्रतीक थीं। लक्ष्मणा जो विवेक और आदर्श का पालन करने वाली थीं।

    16,100 रानियों का उद्धार

    इसके अलावा, श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं से विवाह किया जिनका अपहरण असुर राजा नरकासुर ने किया था। नरकासुर एक अत्याचारी और दुराचारी राजा था, जिसने इन कन्याओं को बंदी बना लिया था और उन्हें अपमानित किया था। श्रीकृष्ण ने इस असुर का वध किया और इन कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराकर उनका सम्मान बढ़ाया। जब इन कन्याओं ने श्रीकृष्ण से आशीर्वाद मांगा, तो उन्होंने उन्हें अपनी पतिव्रता रानियों की तरह सम्मान दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने न केवल इन कन्याओं को सामाजिक सम्मान प्रदान किया बल्कि यह भी प्रमाणित किया कि एक सशक्त और स्वतंत्र नारी को सम्मान मिलना चाहिए और उसकी अस्मिता का हनन किसी भी परिस्थिति में नहीं होना चाहिए।

    आध्यात्मिक संदेश

    श्रीकृष्ण की यह लीला सामाजिक न्याय और समानता का प्रतीक मानी जाती है। उनका विवाह इन 16,100 रानियों से यह दिखाता है कि वह हर एक व्यक्ति की अस्मिता और सम्मान की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध थे। यह संदेश हमें बताता है कि समाज में सभी व्यक्तियों को बराबरी का दर्जा और सम्मान मिलना चाहिए चाहे वह पुरुष हो या महिला। श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चे प्रेम और त्याग की कोई सीमा नहीं होती। उनका यह विवाह केवल एक पौराणिक घटना नहीं बल्कि एक गहरी सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रतीक है।

  • गरुड़ पुराण के अनुसार बेटी का जन्म: सौभाग्य और सात्विकता का प्रतीक

    गरुड़ पुराण के अनुसार बेटी का जन्म: सौभाग्य और सात्विकता का प्रतीक


    नई दिल्ली । गरुड़ पुराण के अनुसार घर में बेटी का जन्म केवल एक शारीरिक घटना नहीं बल्कि यह पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों और परिवार के भाग्य का परिणाम होता है। इस पुराण के अनुसार, अगर किसी परिवार में बेटी का जन्म होता है तो यह संकेत होता है कि उस परिवार में माता लक्ष्मी का वास है, और यह घर सात्विकता, प्रेम और पुण्य से परिपूर्ण होता है।
    जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि किन घरों में कन्या का जन्म होता है तो भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया कि यदि किसी घर में पुत्र का जन्म होता है तो यह उसका भाग्य है लेकिन यदि पुत्री का जन्म होता है तो वह उस घर का सौभाग्य होता है। यानी बेटे का जन्म भाग्य से निर्धारित होता है परंतु बेटी का जन्म एक विशेष सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
    गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि एक घर में बेटी का जन्म उसी परिवार में होता है जहाँ शुद्धता सात्विकता और प्रेम का वातावरण होता है। यह घर अपने अच्छे कर्मों के कारण इस पुण्य लाभ को प्राप्त करते हैं।दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि एक घर में जहां बेटी का जन्म होता है, वहां परिवार को आर्थिक समृद्धि सुख-शांति और सुखी जीवन का आशीर्वाद मिलता है। इसीलिए भारत में प्राचीन समय से ही बेटी को लक्ष्मी का रूप माना जाता है।
    कहा जाता है कि भाग्य से बेटे होते हैं, लेकिन सौभाग्य से बेटियां होती हैं। यह कहावत इस बात को पूरी तरह से व्यक्त करती है कि बेटियां घर में आने से न केवल परिवार को मानसिक शांति मिलती है, बल्कि एक प्रकार का आत्मिक शुद्धिकरण भी होता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, कन्या का जन्म उस परिवार में होता है जहाँ पूर्वजन्मों के पुण्य और अच्छे कर्म होते हैं। यह परिवार अपने कर्मों के कारण ही इस सौभाग्य को प्राप्त करता है और ऐसे घरों में माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी होता है।
    इस पुराण के अनुसार, एक बेटी का जन्म घर में खुशियाँ और समृद्धि लेकर आता है। यह दर्शाता है कि जीवन का असली सुख केवल भौतिक संपत्ति में नहीं, बल्कि मानसिक शांति, प्रेम, और सौभाग्य में छिपा होता है। इस प्रकार, गरुड़ पुराण के उपदेशों को समझकर हम यह जान सकते हैं कि बेटियों का जन्म एक भाग्यशाली और पवित्र घटना है। यह समाज के लिए एक संदेश है कि हमें बेटियों को समान सम्मान और प्रेम देना चाहिए, क्योंकि वे न केवल हमारे जीवन में खुशियाँ लाती हैं, बल्कि हमारे कर्मों का फल भी होती हैं।

  • अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम

    अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम


    नई दिल्ली । अघोरी बाबा हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमयी और कठिन आध्यात्मिक पंथों में से एक माने जाते हैं। भगवान शिव के भैरव रूप के उपासक अघोरी अपनी कठोर साधना भूत-प्रेत से संबंधित क्रियाओं और सनातन मार्ग से अलग हटकर जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो घोर न हो यानी एक ऐसा व्यक्ति जो संसार की जटिलताओं से ऊपर उठकर अत्यधिक सरल और सहज जीवन जीता हो। हालांकि इस सहजता तक पहुंचने का मार्ग अत्यंत कठिन है और इसके लिए एक कठोर साधना की आवश्यकता होती है।

    अघोरी बनने के लिए 12 वर्षों की कठिन तपस्या

    अघोरी बनने के लिए सबसे पहली शर्त है 12 वर्षों की तपस्या। यह तपस्या किसी साधारण साधना से कहीं अधिक कठोर होती है। अघोरी बनने के इच्छुक व्यक्ति को पहले अपने गुरु के पास जाकर उनका दीक्षा ग्रहण करना होता है। इस दौरान गुरु के मार्गदर्शन में शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर कठिन साधनाएं की जाती हैं। अघोरी बनने के इस रास्ते में व्यक्ति को अपने शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने की अत्यधिक कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। गुरु की उपस्थिति में 12 साल की साधना के दौरान, अघोरी ने अपनी चेतना को शुद्ध करने के लिए व्रत, उपवास और अन्य कठिन तपों का पालन करना होता है। यह तपस्या आत्मा को शुद्ध करने और शिव भक्ति में गहरे उतरने के लिए की जाती है।

    सांसारिक मृत्यु और नया जन्म

    अघोरी बनने से पूर्व व्यक्ति को एक मानसिक और शारीरिक मृत्यु का अनुभव करना होता है। इसका अर्थ है कि वह अपने परिवार और समाज के लिए पूरी तरह से मृत हो चुका है और उसे एक नए जन्म की आवश्यकता होती है। यह मृत्यु एक प्रकार का ‘पिंडदान’ होती है जिसमें व्यक्ति अपने पुराने अहंकार और सांसारिक आकर्षण को छोड़कर केवल शिव भक्ति की ओर अग्रसर होता है। अघोरी बनने के बाद उनका जीवन पूरी तरह से गुरु और शिव की सेवा में समर्पित हो जाता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों और साधनाओं में कोई भी परंपरागत या सामाजिक बंधन नहीं होते। वे अपने मार्ग में जाने वाले हर कार्य को भैरव रूप में स्वीकार करते हैं।

    अघोरी जीवन के 5 कठिन नियम

    शरीर की तपस्या: अघोरी के लिए शरीर केवल एक माध्यम होता है, और इसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाता है। शरीर को संयमित और तपस्वी जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है। सांसारिक मोह-माया से दूर रहना: अघोरी के लिए यह आवश्यक है कि वह सांसारिक सुख-साधनों से दूर रहे। उन्हें अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों से कोई आकर्षण नहीं होता। मृत्यु और जीवन के बीच की सीमा को समझना: अघोरी प्राचीन परंपराओं के अनुसार मृत्यु को एक प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं और वे उसे शिव के रूप में स्वीकार करते हैं। इसके कारण वे शवों के पास बैठकर साधना करते हैं और शमशान भूमि को भी अपने साधना स्थल के रूप में चुनते हैं।

    नकारात्मक ऊर्जा से संवाद अघोरी अक्सर भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से संवाद करते हैं। इसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और सच्चे शिव दर्शन को प्राप्त करना होता है। निर्विकल्प समर्पण: अघोरी बाबा के लिए समर्पण सबसे बड़ा साधना है। उन्हें अपने जीवन में कोई दुराव या स्वार्थ नहीं होता वे पूर्ण रूप से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। घोरी बनने की साधना को आम तौर पर एक अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन इसके जरिए व्यक्ति अपनी आत्मा की शुद्धि और शिव के निकटता प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें शरीर, मन, और आत्मा की पूरी तपस्या और बलिदान शामिल होता है।

  • घर में गंगाजल रखते समय न करें ये गलतियां जानें सही तरीका

    घर में गंगाजल रखते समय न करें ये गलतियां जानें सही तरीका


    नई दिल्ली । गंगाजल को हिंदू धर्म में अत्यधिक पवित्र और शुद्ध माना जाता है। इसे देवी गंगा का स्वरूप माना जाता है, और यह घर में शुद्धता और आशीर्वाद लाने के लिए रखा जाता है। मगर गंगाजल को सही विधि से रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि अगर इसे गलत तरीके से रखा जाए तो इसके आध्यात्मिक प्रभाव में कमी आ सकती है। आइए जानते हैं कि घर में गंगाजल रखने का सही तरीका क्या है और कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए।

    सही पात्र का चयन करें

    गंगाजल को हमेशा तांबे, पीतल, चांदी या कांच के बर्तन में ही रखें। ये सामग्री पवित्रता को बनाए रखने में मदद करती हैं। प्लास्टिक और लोहे के बर्तनों में गंगाजल रखना अशुद्ध माना जाता है। साथ ही, बर्तन को हमेशा साफ और गंगाजल के लिए ही इस्तेमाल करें, ताकि उसमें कोई और अशुद्धता न घुले।

    गंगाजल रखने की सही जगह

    गंगाजल को घर के मंदिर या पूजा स्थल में ही रखना चाहिए। इसे कभी भी जमीन पर नहीं रखें। गंगाजल रखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान पूजा का स्थान है, जहां नियमित रूप से श्रद्धा भाव से पूजा होती हो। बाथरूम, रसोई या शयनकक्ष में गंगाजल रखना गलत माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों को पवित्र नहीं माना जाता।

    ढककर रखें

    गंगाजल के पात्र को हमेशा ढककर रखें ताकि उसमें धूल या कोई भी अशुद्धता न जाए। ढक्कन साफ होना चाहिए और उसे नियमित रूप से धोकर रखना चाहिए। गंगाजल का शुद्धता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए इसे बिना ढके रखने से बचें।

    गंगाजल का उपयोग केवल पवित्र कार्यों के लिए करें

    गंगाजल का इस्तेमाल केवल पूजा, हवन, व्रत, संस्कार और शुद्धिकरण के लिए ही करना चाहिए। इसे किसी आम कार्य के लिए इस्तेमाल करना अनुचित होता है। साथ ही अशुद्ध अवस्था में या बिना स्नान किए गंगाजल को छूने से बचें। यह गंगाजल की पवित्रता को प्रभावित कर सकता है।

    बचा हुआ गंगाजल कैसे निपटान करें

    गंगाजल का नाली में बहाना कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गंगाजल की पवित्रता के खिलाफ है। यदि गंगाजल बच जाए तो इसे पौधों की जड़ों में डाल सकते हैं, जो कि शुभ माना जाता है। इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पौधों की वृद्धि में भी मदद मिलती है। गंगाजल को घर में रखना एक पवित्र कार्य है और इसे सही तरीके से रखने से इसके आध्यात्मिक प्रभाव और शुद्धता में वृद्धि होती है। गंगाजल को सही पात्र में सही स्थान पर और सही तरीके से रखने से न केवल घर में शांति और सौभाग्य का वास होता है बल्कि इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भी बनी रहती है। इन सरल नियमों का पालन करके आप गंगाजल की महिमा और शक्ति का सही तरीके से अनुभव कर सकते हैं।

  • गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाशोत्सव पर प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन, देशवासियों को दी शुभकामनाएं

    गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाशोत्सव पर प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन, देशवासियों को दी शुभकामनाएं


    नई दिल्ली । पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक भावुक संदेश साझा किया। उन्होंने लिखाश्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पवित्र प्रकाश उत्सव पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। वे साहस करुणा और बलिदान की मूर्ति हैं। उनका जीवन और शिक्षाएं हमें सच्चाई न्याय धर्म के लिए खड़े होने और मानवीय गरिमा की रक्षा करने के लिए प्रेरित करती हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का विजन पीढ़ियों को सेवा और निस्वार्थ कर्तव्य के लिए मार्गदर्शन करता रहता है।

    उन्होंने इस साल की शुरुआत में तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब की अपनी यात्रा की कुछ यादगार तस्वीरें साझा कीं। इन तस्वीरों में प्रधानमंत्री को गुरुद्वारे में प्रार्थना करते जोड़ा साहिब के दर्शन करते और सेवादारों के साथ लंगर परोसते हुए देखा जा सकता है।दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं दी।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखाअन्याय और दमन के विरुद्ध चेतना जागृत करने वाले खालसा पंथ के संस्थापक सरबंस दानी साहिब-ए-कमाल श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। उन्होंने आगे लिखागुरु साहिब का जीवन शौर्य त्याग और आध्यात्मिक उत्कर्ष का अद्वितीय समन्वय है। उन्होंने मानवता को यह संदेश दिया कि धर्म सत्य और मर्यादा की रक्षा हेतु सर्वस्व का समर्पण ही सर्वोच्च मानवीय कर्तव्य है। उनके आदर्श बलिदान और महान गुरु परंपरा के प्रति उनकी अडिग निष्ठा युगों-युगों तक समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करती रहेगी।

    सीएम रेखा गुप्ता ने दशम गुरु के चरणों के नमन करते हुए लिखाउनके सत्य सेवा और बलिदान के सिद्धांतों को जीवन में आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा है। गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। पटना साहिब वह पवित्र स्थल है जहां 1666 में गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की जो साहस समानता और न्याय का प्रतीक बना। मुगल अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने योद्धा बनकर संघर्ष किया और पांच प्यारों को अमृत छकाकर खालसा का जन्म दिया।