Tag: hinduism

  • भगवान श्रीकृष्ण का 16,108 रानियों से विवाह: नारी अस्मिता और समाज के लिए एक अद्भुत लीला

    भगवान श्रीकृष्ण का 16,108 रानियों से विवाह: नारी अस्मिता और समाज के लिए एक अद्भुत लीला


    नई दिल्ली । भगवान श्रीकृष्ण का जीवन अनेक रहस्यों और शिक्षाओं से भरा हुआ है। उनकी प्रत्येक घटना गहरे आध्यात्मिक और नैतिक संदेश देती है। इनमें से एक प्रमुख घटना उनके द्वारा 16,108 रानियों से विवाह करने की है, जिसे अक्सर लोग एक सामान्य विवाह कथा मान लेते हैं, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ और उद्देश्य कहीं अधिक गहरा है। श्रीकृष्ण ने जिन 16,108 रानियों से विवाह किया, वह केवल एक व्यक्तिगत या भौतिक लीलाओं का हिस्सा नहीं था। इसके पीछे एक गहरा संदेश है, जो नारी अस्मिता, समाज में समानता, और न्याय की रक्षा से जुड़ा है। इस घटना का प्रमुख उद्देश्य इन 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराना था, जिनकी मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध किया और उन्हें सम्मान प्रदान किया।

    8 प्रमुख रानियाँ और उनके प्रतीक

    श्रीकृष्ण की 8 प्रमुख रानियों को ‘अष्टभार्या’ कहा जाता है। ये रानियाँ विभिन्न गुणों और शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती थीं रुक्मिणी साक्षात लक्ष्मी देवी का स्वरूप जो समृद्धि और वैभव की प्रतीक थीं। सत्यभामा एक महान योद्धा और पराक्रमी जिनका जन्म सत्राजित के घर हुआ था। जाम्बवती जाम्बवंत की पुत्री, जो बल और साहस का प्रतीक थीं। कालिंदी सूर्यपुत्री, यमुना की देवी, जो जल तत्व और जीवन के प्रवाह का प्रतीक थीं। मित्रबिन्दा जो मित्रता और सौहार्द की प्रतीक थीं। सत्या सत्य और धर्म की आस्था रखने वाली। भद्रा जो शांति और संतुलन की प्रतीक थीं। लक्ष्मणा जो विवेक और आदर्श का पालन करने वाली थीं।

    16,100 रानियों का उद्धार

    इसके अलावा, श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं से विवाह किया जिनका अपहरण असुर राजा नरकासुर ने किया था। नरकासुर एक अत्याचारी और दुराचारी राजा था, जिसने इन कन्याओं को बंदी बना लिया था और उन्हें अपमानित किया था। श्रीकृष्ण ने इस असुर का वध किया और इन कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कराकर उनका सम्मान बढ़ाया। जब इन कन्याओं ने श्रीकृष्ण से आशीर्वाद मांगा, तो उन्होंने उन्हें अपनी पतिव्रता रानियों की तरह सम्मान दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने न केवल इन कन्याओं को सामाजिक सम्मान प्रदान किया बल्कि यह भी प्रमाणित किया कि एक सशक्त और स्वतंत्र नारी को सम्मान मिलना चाहिए और उसकी अस्मिता का हनन किसी भी परिस्थिति में नहीं होना चाहिए।

    आध्यात्मिक संदेश

    श्रीकृष्ण की यह लीला सामाजिक न्याय और समानता का प्रतीक मानी जाती है। उनका विवाह इन 16,100 रानियों से यह दिखाता है कि वह हर एक व्यक्ति की अस्मिता और सम्मान की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध थे। यह संदेश हमें बताता है कि समाज में सभी व्यक्तियों को बराबरी का दर्जा और सम्मान मिलना चाहिए चाहे वह पुरुष हो या महिला। श्रीकृष्ण का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि सच्चे प्रेम और त्याग की कोई सीमा नहीं होती। उनका यह विवाह केवल एक पौराणिक घटना नहीं बल्कि एक गहरी सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षा का प्रतीक है।

  • गरुड़ पुराण के अनुसार बेटी का जन्म: सौभाग्य और सात्विकता का प्रतीक

    गरुड़ पुराण के अनुसार बेटी का जन्म: सौभाग्य और सात्विकता का प्रतीक


    नई दिल्ली । गरुड़ पुराण के अनुसार घर में बेटी का जन्म केवल एक शारीरिक घटना नहीं बल्कि यह पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों और परिवार के भाग्य का परिणाम होता है। इस पुराण के अनुसार, अगर किसी परिवार में बेटी का जन्म होता है तो यह संकेत होता है कि उस परिवार में माता लक्ष्मी का वास है, और यह घर सात्विकता, प्रेम और पुण्य से परिपूर्ण होता है।
    जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि किन घरों में कन्या का जन्म होता है तो भगवान श्री कृष्ण ने उत्तर दिया कि यदि किसी घर में पुत्र का जन्म होता है तो यह उसका भाग्य है लेकिन यदि पुत्री का जन्म होता है तो वह उस घर का सौभाग्य होता है। यानी बेटे का जन्म भाग्य से निर्धारित होता है परंतु बेटी का जन्म एक विशेष सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
    गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि एक घर में बेटी का जन्म उसी परिवार में होता है जहाँ शुद्धता सात्विकता और प्रेम का वातावरण होता है। यह घर अपने अच्छे कर्मों के कारण इस पुण्य लाभ को प्राप्त करते हैं।दूसरी ओर यह भी माना जाता है कि एक घर में जहां बेटी का जन्म होता है, वहां परिवार को आर्थिक समृद्धि सुख-शांति और सुखी जीवन का आशीर्वाद मिलता है। इसीलिए भारत में प्राचीन समय से ही बेटी को लक्ष्मी का रूप माना जाता है।
    कहा जाता है कि भाग्य से बेटे होते हैं, लेकिन सौभाग्य से बेटियां होती हैं। यह कहावत इस बात को पूरी तरह से व्यक्त करती है कि बेटियां घर में आने से न केवल परिवार को मानसिक शांति मिलती है, बल्कि एक प्रकार का आत्मिक शुद्धिकरण भी होता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, कन्या का जन्म उस परिवार में होता है जहाँ पूर्वजन्मों के पुण्य और अच्छे कर्म होते हैं। यह परिवार अपने कर्मों के कारण ही इस सौभाग्य को प्राप्त करता है और ऐसे घरों में माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी होता है।
    इस पुराण के अनुसार, एक बेटी का जन्म घर में खुशियाँ और समृद्धि लेकर आता है। यह दर्शाता है कि जीवन का असली सुख केवल भौतिक संपत्ति में नहीं, बल्कि मानसिक शांति, प्रेम, और सौभाग्य में छिपा होता है। इस प्रकार, गरुड़ पुराण के उपदेशों को समझकर हम यह जान सकते हैं कि बेटियों का जन्म एक भाग्यशाली और पवित्र घटना है। यह समाज के लिए एक संदेश है कि हमें बेटियों को समान सम्मान और प्रेम देना चाहिए, क्योंकि वे न केवल हमारे जीवन में खुशियाँ लाती हैं, बल्कि हमारे कर्मों का फल भी होती हैं।

  • अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम

    अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम


    नई दिल्ली । अघोरी बाबा हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमयी और कठिन आध्यात्मिक पंथों में से एक माने जाते हैं। भगवान शिव के भैरव रूप के उपासक अघोरी अपनी कठोर साधना भूत-प्रेत से संबंधित क्रियाओं और सनातन मार्ग से अलग हटकर जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो घोर न हो यानी एक ऐसा व्यक्ति जो संसार की जटिलताओं से ऊपर उठकर अत्यधिक सरल और सहज जीवन जीता हो। हालांकि इस सहजता तक पहुंचने का मार्ग अत्यंत कठिन है और इसके लिए एक कठोर साधना की आवश्यकता होती है।

    अघोरी बनने के लिए 12 वर्षों की कठिन तपस्या

    अघोरी बनने के लिए सबसे पहली शर्त है 12 वर्षों की तपस्या। यह तपस्या किसी साधारण साधना से कहीं अधिक कठोर होती है। अघोरी बनने के इच्छुक व्यक्ति को पहले अपने गुरु के पास जाकर उनका दीक्षा ग्रहण करना होता है। इस दौरान गुरु के मार्गदर्शन में शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर कठिन साधनाएं की जाती हैं। अघोरी बनने के इस रास्ते में व्यक्ति को अपने शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने की अत्यधिक कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। गुरु की उपस्थिति में 12 साल की साधना के दौरान, अघोरी ने अपनी चेतना को शुद्ध करने के लिए व्रत, उपवास और अन्य कठिन तपों का पालन करना होता है। यह तपस्या आत्मा को शुद्ध करने और शिव भक्ति में गहरे उतरने के लिए की जाती है।

    सांसारिक मृत्यु और नया जन्म

    अघोरी बनने से पूर्व व्यक्ति को एक मानसिक और शारीरिक मृत्यु का अनुभव करना होता है। इसका अर्थ है कि वह अपने परिवार और समाज के लिए पूरी तरह से मृत हो चुका है और उसे एक नए जन्म की आवश्यकता होती है। यह मृत्यु एक प्रकार का ‘पिंडदान’ होती है जिसमें व्यक्ति अपने पुराने अहंकार और सांसारिक आकर्षण को छोड़कर केवल शिव भक्ति की ओर अग्रसर होता है। अघोरी बनने के बाद उनका जीवन पूरी तरह से गुरु और शिव की सेवा में समर्पित हो जाता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों और साधनाओं में कोई भी परंपरागत या सामाजिक बंधन नहीं होते। वे अपने मार्ग में जाने वाले हर कार्य को भैरव रूप में स्वीकार करते हैं।

    अघोरी जीवन के 5 कठिन नियम

    शरीर की तपस्या: अघोरी के लिए शरीर केवल एक माध्यम होता है, और इसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाता है। शरीर को संयमित और तपस्वी जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है। सांसारिक मोह-माया से दूर रहना: अघोरी के लिए यह आवश्यक है कि वह सांसारिक सुख-साधनों से दूर रहे। उन्हें अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों से कोई आकर्षण नहीं होता। मृत्यु और जीवन के बीच की सीमा को समझना: अघोरी प्राचीन परंपराओं के अनुसार मृत्यु को एक प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं और वे उसे शिव के रूप में स्वीकार करते हैं। इसके कारण वे शवों के पास बैठकर साधना करते हैं और शमशान भूमि को भी अपने साधना स्थल के रूप में चुनते हैं।

    नकारात्मक ऊर्जा से संवाद अघोरी अक्सर भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से संवाद करते हैं। इसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और सच्चे शिव दर्शन को प्राप्त करना होता है। निर्विकल्प समर्पण: अघोरी बाबा के लिए समर्पण सबसे बड़ा साधना है। उन्हें अपने जीवन में कोई दुराव या स्वार्थ नहीं होता वे पूर्ण रूप से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। घोरी बनने की साधना को आम तौर पर एक अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन इसके जरिए व्यक्ति अपनी आत्मा की शुद्धि और शिव के निकटता प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें शरीर, मन, और आत्मा की पूरी तपस्या और बलिदान शामिल होता है।

  • घर में गंगाजल रखते समय न करें ये गलतियां जानें सही तरीका

    घर में गंगाजल रखते समय न करें ये गलतियां जानें सही तरीका


    नई दिल्ली । गंगाजल को हिंदू धर्म में अत्यधिक पवित्र और शुद्ध माना जाता है। इसे देवी गंगा का स्वरूप माना जाता है, और यह घर में शुद्धता और आशीर्वाद लाने के लिए रखा जाता है। मगर गंगाजल को सही विधि से रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि अगर इसे गलत तरीके से रखा जाए तो इसके आध्यात्मिक प्रभाव में कमी आ सकती है। आइए जानते हैं कि घर में गंगाजल रखने का सही तरीका क्या है और कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए।

    सही पात्र का चयन करें

    गंगाजल को हमेशा तांबे, पीतल, चांदी या कांच के बर्तन में ही रखें। ये सामग्री पवित्रता को बनाए रखने में मदद करती हैं। प्लास्टिक और लोहे के बर्तनों में गंगाजल रखना अशुद्ध माना जाता है। साथ ही, बर्तन को हमेशा साफ और गंगाजल के लिए ही इस्तेमाल करें, ताकि उसमें कोई और अशुद्धता न घुले।

    गंगाजल रखने की सही जगह

    गंगाजल को घर के मंदिर या पूजा स्थल में ही रखना चाहिए। इसे कभी भी जमीन पर नहीं रखें। गंगाजल रखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान पूजा का स्थान है, जहां नियमित रूप से श्रद्धा भाव से पूजा होती हो। बाथरूम, रसोई या शयनकक्ष में गंगाजल रखना गलत माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों को पवित्र नहीं माना जाता।

    ढककर रखें

    गंगाजल के पात्र को हमेशा ढककर रखें ताकि उसमें धूल या कोई भी अशुद्धता न जाए। ढक्कन साफ होना चाहिए और उसे नियमित रूप से धोकर रखना चाहिए। गंगाजल का शुद्धता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए इसे बिना ढके रखने से बचें।

    गंगाजल का उपयोग केवल पवित्र कार्यों के लिए करें

    गंगाजल का इस्तेमाल केवल पूजा, हवन, व्रत, संस्कार और शुद्धिकरण के लिए ही करना चाहिए। इसे किसी आम कार्य के लिए इस्तेमाल करना अनुचित होता है। साथ ही अशुद्ध अवस्था में या बिना स्नान किए गंगाजल को छूने से बचें। यह गंगाजल की पवित्रता को प्रभावित कर सकता है।

    बचा हुआ गंगाजल कैसे निपटान करें

    गंगाजल का नाली में बहाना कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह गंगाजल की पवित्रता के खिलाफ है। यदि गंगाजल बच जाए तो इसे पौधों की जड़ों में डाल सकते हैं, जो कि शुभ माना जाता है। इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पौधों की वृद्धि में भी मदद मिलती है। गंगाजल को घर में रखना एक पवित्र कार्य है और इसे सही तरीके से रखने से इसके आध्यात्मिक प्रभाव और शुद्धता में वृद्धि होती है। गंगाजल को सही पात्र में सही स्थान पर और सही तरीके से रखने से न केवल घर में शांति और सौभाग्य का वास होता है बल्कि इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भी बनी रहती है। इन सरल नियमों का पालन करके आप गंगाजल की महिमा और शक्ति का सही तरीके से अनुभव कर सकते हैं।

  • गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाशोत्सव पर प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन, देशवासियों को दी शुभकामनाएं

    गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाशोत्सव पर प्रधानमंत्री मोदी ने किया नमन, देशवासियों को दी शुभकामनाएं


    नई दिल्ली । पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक भावुक संदेश साझा किया। उन्होंने लिखाश्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पवित्र प्रकाश उत्सव पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। वे साहस करुणा और बलिदान की मूर्ति हैं। उनका जीवन और शिक्षाएं हमें सच्चाई न्याय धर्म के लिए खड़े होने और मानवीय गरिमा की रक्षा करने के लिए प्रेरित करती हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का विजन पीढ़ियों को सेवा और निस्वार्थ कर्तव्य के लिए मार्गदर्शन करता रहता है।

    उन्होंने इस साल की शुरुआत में तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब की अपनी यात्रा की कुछ यादगार तस्वीरें साझा कीं। इन तस्वीरों में प्रधानमंत्री को गुरुद्वारे में प्रार्थना करते जोड़ा साहिब के दर्शन करते और सेवादारों के साथ लंगर परोसते हुए देखा जा सकता है।दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं दी।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखाअन्याय और दमन के विरुद्ध चेतना जागृत करने वाले खालसा पंथ के संस्थापक सरबंस दानी साहिब-ए-कमाल श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पावन प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। उन्होंने आगे लिखागुरु साहिब का जीवन शौर्य त्याग और आध्यात्मिक उत्कर्ष का अद्वितीय समन्वय है। उन्होंने मानवता को यह संदेश दिया कि धर्म सत्य और मर्यादा की रक्षा हेतु सर्वस्व का समर्पण ही सर्वोच्च मानवीय कर्तव्य है। उनके आदर्श बलिदान और महान गुरु परंपरा के प्रति उनकी अडिग निष्ठा युगों-युगों तक समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करती रहेगी।

    सीएम रेखा गुप्ता ने दशम गुरु के चरणों के नमन करते हुए लिखाउनके सत्य सेवा और बलिदान के सिद्धांतों को जीवन में आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा है। गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। पटना साहिब वह पवित्र स्थल है जहां 1666 में गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की जो साहस समानता और न्याय का प्रतीक बना। मुगल अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने योद्धा बनकर संघर्ष किया और पांच प्यारों को अमृत छकाकर खालसा का जन्म दिया।

  • शनिवार पूजा शनि देव की टेढ़ी दृष्टि से बचने के लिए अपनाएं यह नियम

    शनिवार पूजा शनि देव की टेढ़ी दृष्टि से बचने के लिए अपनाएं यह नियम


    नई दिल्ली । शनिवार पूजा शनि की टेढ़ी दृष्टि से बचने के नियम धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि देव की दृष्टि काफी महत्वपूर्ण होती है. शनि संतुलन और न्याय का ग्रह है. ऐसे में अक्सर शनि की शक्ति को ना पहचानने वाले लोग शनि देव की टेढ़ी दृष्टि का शिकार हो जाते हैं.कहा जाता है कि शनि देव की टेढ़ी नजर उन लोगों पर पड़ती है जो बुरे कर्मों से लिपटे रहते हैं चाहे वो काम जाने-अनजाने ही क्यों ना हुई हो. ऐसे में आइए जानते हैं
    शनि देव की टेढ़ी दृष्टि से बचने के नियम
    .
    शनिवार के दिन गलती से भी तामसिक भोजन ना करें. खासतौर पर इस दिन मदिरापान और नशीली चीजों से परहेज करें. जीवन में ईमानदार बनें सत्य बोलें और बड़े बुजुर्गों को सम्मान दें. इसके अलावा शनि देव को प्रसन्न करने के लिए किसी भी तरह का गलत कार्य नहीं करना चाहिए. क्योंकि बुरे कर्मों पर शनि कंगाल बना देंगे.
    मान्यता है कि अगर आप शनि देव कृपा की पाना चाहते हैं तो उनकी आराधना शाम के समय करें क्योंकि शाम के वक्त शनि देव की पूजा ज्यादा फलदायी मानी जाती है. शनिवार के दिन शाम को सरसों के तेल का दीपक पीपल के नीचे जलाएं और 7 बार उसकी परिक्रमा करें.
    खासतौर पर इस दिन शनि चालीसा पाठ करें और शनि देव के मूल मंत्र ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ का जाप करें. आरती के साथ पूजा का समापन करें. मान्यता है कि 7 शनिवार ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं साथ ही उनकी टेढ़ी दृष्टि भी कभी नहीं पड़ती है.

  • मौत के बाद क्या होता है? 10 प्रमुख धर्मों की रहस्यमय मान्यताएं

    मौत के बाद क्या होता है? 10 प्रमुख धर्मों की रहस्यमय मान्यताएं

    नई दिल्ली/मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल इंसान के अस्तित्व से जुड़ा सबसे गहरा रहस्य है। अलग-अलग धर्म इस पर अलग-अलग विचार रखते हैं। विश्व में हजारों धर्म हैं, और लगभग हर धर्म में मृत्यु और उसके बाद की जीवन यात्रा पर अलग मान्यता मिलती है। यहाँ 10 प्रमुख धर्मों के दृष्टिकोण पर नजर डालते हैं।

    1. ईसाई धर्म
    ईसाई धर्म में मौत को अंत नहीं बल्कि नई शुरुआत माना जाता है। उनके अनुसार, हर जीव में आत्मा रहती है और मरने के बाद भगवान का न्याय होता है। अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग जाते हैं और पापी नर्क में जन्म लेते हैं।

    2. इस्लाम
    इस्लाम में मृत्यु से डरने की बजाय इसे स्वीकार करना सिखाया जाता है। मुस्लिम मानते हैं कि अल्लाह मृत्यु के समय फरिश्ते भेजते हैं और आत्मा की परीक्षा लेते हैं। पाक आत्मा को बरजख भेजा जाता है, जहां वह कयामत के दिन का इंतजार करती है।

    3. हिंदू धर्म

    हिंदू धर्म में मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को ‘संसार’ कहा जाता है। आत्मा कई जन्मों में नए शरीर में आती है- कभी इंसान तो कभी जानवर। मोक्ष प्राप्त करने पर पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है।

    4. बौद्ध धर्म

    बौद्ध धर्म में जीवन और मृत्यु सतत प्रक्रिया है। आत्मा मृत्यु के बाद अन्य जन्मों में जाती है। पुनर्जन्म का स्वरूप व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करता है।

    5. सिख धर्म

    सिख धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा कर्मों के आधार पर पुनर्जन्म प्राप्त करती है। भगवान का ध्यान और अहंकार पर नियंत्रण पाने से आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो सकती है।

    6. बहाई धर्म
    बहाई धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा जारी रहती है। शरीर मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन आत्मा स्वतंत्र और खुश रहती है। आत्मा की तरक्की में भगवान की कृपा और जीवित लोगों के नेक कर्म मदद करते हैं। मृत्यु को भय की चीज नहीं माना जाता।

    7. जैन धर्म

    जैन धर्म में आत्मा हमेशा जीवित रहती है। मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र केवल कर्मों से तय होता है। अहिंसा और अच्छे कर्म के माध्यम से आत्मा पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होती है।

    8. जोरोस्ट्रियन धर्म

    जोरोस्ट्रियन धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा का न्याय ‘चिनवट ब्रिज’ पर होता है। अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग जाते हैं और बुरे कर्म करने वाले नर्क में। अंततः सभी आत्माएं शुद्ध होकर भगवान के पास लौट जाती हैं।

    9. शिंटो धर्म जापान 

    शिंटो धर्म में आत्मा शरीर की मृत्यु के बाद जीवित रहती है और जिंदा लोगों की सहायता करती है। मरने के बाद व्यक्ति पवित्र आत्मा बन जाता है और परिवार और समुदाय की रक्षा करता है।

    10. अन्य प्राचीन और लोकधर्म

    अफ्रीकी, इंडिजिनस और अन्य लोकधर्मों में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा विभिन्न रूपों में देखी जाती है। कुछ में आत्मा पूर्वजों के साथ मिलती है, कुछ में जीवन और प्रकृति के चक्र में सम्मिलित होती है।
    मृत्यु के बाद जीवन को लेकर इन सभी धर्मों की मान्यताएं भले ही अलग हों, लेकिन एक साझा संदेश है: मृत्यु अंत नहीं, बल्कि नई यात्रा की शुरुआत है। चाहे स्वर्ग, नर्क या पुनर्जन्म हो, सभी धर्म आत्मा के महत्व और उसके कर्मों पर जोर देते हैं।

  • चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मां दुर्गा की पूजा से मिलेगा जीवन में सुख और समृद्धि चैत्रनवरात्रि2026

    चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मां दुर्गा की पूजा से मिलेगा जीवन में सुख और समृद्धि चैत्रनवरात्रि2026



    नई दिल्‍ली ।
    हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इसी माह से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से जहां नववर्ष 1 जनवरी को आता है वहीं हिंदू नववर्ष चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत भी होती है। यह एक प्रमुख धार्मिक पर्व है जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। चैत्र नवरात्रि का आयोजन विशेष रूप से शांति समृद्धि और सुख-शांति की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दौरान भक्त मां दुर्गा की उपासना के साथ-साथ व्रत भी रखते हैं ताकि उनका जीवन खुशहाल और समृद्ध हो सके।

    चैत्र नवरात्रि 2026: तिथि और अवधि

    चैत्र नवरात्रि 2026 का आरंभ 19 मार्च को होगा जो कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है। यह दिन विशेष रूप से कलश स्थापना के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसके बाद नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की उपासना का सिलसिला चलता है। नवमी तिथि 27 मार्च को आएगी और इसी दिन राम नवमी का पर्व भी मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से राम भक्तों द्वारा श्रीराम के जन्मोत्सव की पूजा की जाती है। चैत्र नवरात्रि की समाप्ति 27 मार्च को होगी। इस दिन विशेष रूप से दिनभर देवी पूजा की जाती है और उपवासी भक्तों द्वारा व्रत का पारण किया जाता है।

    चैत्र नवरात्रि 2026: कलश स्थापना मुहूर्त

    चैत्र नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से एक पवित्र मिट्टी के कलश को घर के पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है और फिर देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा शुरू होती है।

    19 मार्च 2026 को कलश स्थापना का मुहूर्त इस प्रकार है

    सुबह का मुहूर्त 06:00 AM – 06:45 AM
    दोपहर का मुहूर्त 11:30 AM – 12:15 PM
    सांयकाल का मुहूर्त 06:00 PM – 06:45 PM

    इन मुहूर्तों में से जो भी समय आपके लिए सुविधाजनक हो उस समय कलश स्थापना कीजिए। विशेष रूप से शुद्धि और पवित्रता का ध्यान रखें। पूजा के दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी दुर्गा की उपासना करें और व्रत का संकल्प लें।

    देवी पूजा और विशेष अनुष्ठान

    चैत्र नवरात्रि के दौरान प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है। इस प्रकार के अनुष्ठानों से मनुष्य को न केवल मानसिक शांति मिलती है बल्कि उसके जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान भी संभव होता है।

    प्रथम दिन 19 मार्च मां शैलपुत्री की पूजा होती है। दूसरे दिन 20 मार्च मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। तीसरे दिन 21 मार्च मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। चौथे दिन 22 मार्च मां कूष्मांडा की पूजा होती है पांचवे दिन 23 मार्च मां स्कंदमाता की पूजा होती है। छठे दिन 24 मार्च मां कात्यायनी की पूजा होती है। सातवे दिन 25 मार्च मां कालरात्रि की पूजा होती है। आठवे दिन 26 मार्च मां महागौरी की पूजा होती है नौवे दिन 27 मार्च मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है साथ ही साथ राम नवमी का पर्व मनाया जाता है। इन नौ दिनों में व्रति पूजा और उपासना से भक्तों को मानसिक शारीरिक और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

    चैत्र नवरात्रि 2026 का आरंभ 19 मार्च से हो रहा है और इसके साथ ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी होती है। यह समय देवी दुर्गा की उपासना व्रत और पूजा का होता है जिससे भक्त अपने जीवन में सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। कलश स्थापना के दौरान विशेष मुहूर्त का पालन करें और नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाएं। इस अवसर पर घर में मां दुर्गा का व्रत करना और उनकी पूजा करना निश्चित रूप से जीवन में सुख और शांति लेकर आता है।इस अवसर पर घर में मां दुर्गा का व्रत करना और उनकी पूजा करना निश्चित रूप से जीवन में सुख और शांति लेकर आता है।