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  • होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों पर संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता

    होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों पर संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता


    नई दिल्ली ।
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हालिया हमलों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। भारत ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में भारतीय नागरिकों और नाविकों की सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नौवहन को बिना किसी बाधा के बहाल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। भारत ने कहा कि क्षेत्र में जारी अस्थिरता न केवल वैश्विक व्यापार बल्कि लाखों लोगों की सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकती है।

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बहस के दौरान भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि पश्चिम एशिया भारत के लिए रणनीतिक, आर्थिक और मानवीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में एक करोड़ से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं, इसलिए वहां की सुरक्षा स्थिति भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आग्रह किया।

    भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य में हाल के दिनों में कई वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की। भारतीय प्रतिनिधि ने विशेष रूप से उन जहाजों का उल्लेख किया जिन पर भारतीय नाविक सवार थे और जो हमलों से प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं में कई भारतीय नागरिक घायल हुए हैं, जिनमें कुछ गंभीर रूप से घायल बताए गए हैं। इसके अलावा एक भारतीय नागरिक की मृत्यु और एक अन्य के लापता होने की जानकारी भी सामने आई है, जिसे भारत ने अत्यंत गंभीर विषय बताया।

    राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इन मार्गों पर किसी भी प्रकार का हमला पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने सभी संबंधित पक्षों से अपील की कि समुद्री मार्गों पर सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम तत्काल उठाए जाएं, ताकि व्यापारिक गतिविधियां सामान्य रूप से जारी रह सकें।

    भारत ने यह भी कहा कि हाल के समय में संघर्ष में अस्थायी विराम के संकेत मिले थे, लेकिन उसके बाद दोबारा हिंसक घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली है। इस स्थिति को चिंताजनक बताते हुए भारत ने कूटनीतिक संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया। भारतीय पक्ष का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी देशों को जिम्मेदारी के साथ सहयोग करना होगा।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत ने दोहराया कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों, सुरक्षित समुद्री परिवहन और वैश्विक शांति के पक्ष में है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्दोष नागरिकों और समुद्री कर्मियों पर होने वाले हमले किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किए जा सकते। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि समुद्री सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय है और इसके लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

    भारत ने अपने वक्तव्य में यह संदेश भी दिया कि पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता बनाए रखना पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में है। भारत ने उम्मीद जताई कि संबंधित पक्ष संयम और संवाद का रास्ता अपनाएंगे, जिससे तनाव कम होगा, समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित बनेंगे और क्षेत्र में सामान्य स्थिति जल्द बहाल हो सकेगी। भारत ने स्पष्ट किया कि विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वह हर आवश्यक कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।

  • होर्मुज और लाल सागर में बढ़ते तनाव से भारतीय कारोबार पर खतरा, निर्यात-आयात कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका

    होर्मुज और लाल सागर में बढ़ते तनाव से भारतीय कारोबार पर खतरा, निर्यात-आयात कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक व्यापार के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो भारतीय निर्यातकों और आयातकों की लागत बढ़ सकती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव उन छोटे और मझोले कारोबारियों पर पड़ने की संभावना है, जिनके लिए बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचाना आसान नहीं होता।

    रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कच्चे तेल के आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसके अलावा एलएनजी और एलपीजी जैसी ऊर्जा आपूर्ति भी काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर करती है। ऐसे में इस समुद्री रास्ते पर किसी भी तरह का व्यवधान देश की ऊर्जा सुरक्षा और आयात लागत दोनों को प्रभावित कर सकता है।

    विश्लेषण में कहा गया है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों समुद्री मार्ग एक साथ प्रभावित होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेज़ी से बढ़ सकती हैं। इससे ईंधन महंगा होने के साथ-साथ परिवहन, विनिर्माण और ऊर्जा आधारित उद्योगों की लागत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा असर महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर भी देखने को मिल सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक समुद्री परिवहन पहले से ही दबाव में है। यदि जहाजों को वैकल्पिक मार्गों से होकर लंबी दूरी तय करनी पड़ी, तो सामान की डिलीवरी में दो से तीन सप्ताह तक अतिरिक्त समय लग सकता है। इससे मालभाड़ा, समुद्री बीमा प्रीमियम और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी अन्य लागतों में भी बढ़ोतरी होने की संभावना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र के अलावा ऑटोमोबाइल, रसायन, उर्वरक, धातु और विनिर्माण जैसे उद्योग भी इस स्थिति से प्रभावित हो सकते हैं। कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत कंपनियों के परिचालन खर्च को बढ़ाएगी, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आएगा। साथ ही सप्लाई चेन में देरी होने से उत्पादन और वितरण की गति भी प्रभावित हो सकती है।

    रिपोर्ट के अनुसार बड़ी कंपनियां अपने विविध आपूर्ति स्रोतों, बेहतर वित्तीय क्षमता और मजबूत वैश्विक नेटवर्क के कारण ऐसे झटकों का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर सकती हैं। वहीं छोटे और मझोले उद्यमों के सामने कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ने, नकदी प्रवाह पर दबाव और लाभप्रदता में कमी जैसी चुनौतियां अधिक गंभीर रूप से सामने आ सकती हैं।

    विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यदि समुद्री मार्गों में व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर भी दिखाई देगा। ऐसे हालात में कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत, बेहतर जोखिम प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स रणनीति अपनाने की आवश्यकता होगी, ताकि संभावित आर्थिक झटकों के प्रभाव को कम किया जा सके।

  • ईरानी जहाज पर कथित यूक्रेनी हमले से बढ़ा तनाव, अराघची और लावरोव ने फोन पर साझा की रणनीतिक चिंता

    ईरानी जहाज पर कथित यूक्रेनी हमले से बढ़ा तनाव, अराघची और लावरोव ने फोन पर साझा की रणनीतिक चिंता

    नई दिल्ली । कैस्पियन सागर में एक ईरानी वाणिज्यिक जहाज पर हुए कथित हमले के बाद पश्चिम एशिया और यूरोपीय क्षेत्र में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस घटनाक्रम के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने फोन पर बातचीत कर सुरक्षा स्थिति, क्षेत्रीय तनाव और आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श किया। दोनों नेताओं ने हमले की निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।

    ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, अराघची ने बातचीत के दौरान कहा कि किसी भी संप्रभु देश के वाणिज्यिक जहाज को निशाना बनाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने इस घटना को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताते हुए कहा कि ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और समुद्री हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार रखता है। उनका कहना था कि ऐसे हमलों को अनदेखा नहीं किया जा सकता और जिम्मेदार पक्षों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

    रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कथित हमले की आलोचना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं रूस और ईरान के बीच विकसित हो रहे व्यापारिक और समुद्री संपर्क मार्गों के लिए भी जोखिम पैदा करती हैं। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करना क्षेत्रीय और वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

    बातचीत के दौरान दोनों विदेश मंत्रियों ने हाल के क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर भी चर्चा की। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी सुरक्षा स्थिति और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का भी उल्लेख किया गया। दोनों पक्षों ने माना कि मौजूदा परिस्थितियों में कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत करना और तनाव को नियंत्रित करने के लिए संवाद बनाए रखना आवश्यक है।

    ईरानी विदेश मंत्री ने इससे पहले यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास के साथ भी टेलीफोन पर बातचीत की थी। इस दौरान उन्होंने कथित हमले की निंदा करते हुए यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस घटना की निष्पक्ष जांच कराने तथा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने की अपील की। दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी चर्चा की।

    ईरान ने इस मामले को लेकर तेहरान में यूक्रेन के प्रभारी राजनयिक को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, संबंधित अधिकारी को विरोध पत्र सौंपते हुए घटना पर ईरान की कड़ी आपत्ति से अवगत कराया गया। मंत्रालय का कहना है कि कथित हमला स्थानीय समयानुसार शनिवार तड़के हुआ, जिसमें जहाज को नुकसान पहुंचा और एक नाविक की मृत्यु हो गई।

    ईरानी विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से भी इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि देश अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों पर दृढ़ रुख अपनाएगा। दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम पर यूक्रेन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावों के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें संभावित कूटनीतिक कदमों और आगे की जांच पर टिकी हुई हैं। यह घटनाक्रम पहले से संवेदनशील क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव में नरमी से कच्चे तेल में बड़ी गिरावट, वैश्विक बाजार में ब्रेंट और WTI करीब 5% टूटे

    अमेरिका-ईरान तनाव में नरमी से कच्चे तेल में बड़ी गिरावट, वैश्विक बाजार में ब्रेंट और WTI करीब 5% टूटे


    नई दिल्ली । 
    अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव में फिलहाल नरमी आने के संकेतों का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत देखने को मिला। सोमवार को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई और प्रमुख तेल बेंचमार्क लगभग पांच प्रतिशत तक टूट गए। निवेशकों ने तनाव कम होने की संभावना के बीच मुनाफावसूली की, जिससे पिछले कुछ सप्ताह की तेज बढ़त के बाद बाजार में दबाव बढ़ गया।

    कारोबार के शुरुआती घंटों में अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 4.8 प्रतिशत गिरकर लगभग 87.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) कच्चा तेल भी करीब 5.09 प्रतिशत टूटकर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया। एक ही कारोबारी सत्र में आई यह गिरावट हाल के समय की बड़ी गिरावटों में शामिल रही।

    बाजार में नरमी की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियों में विराम की संभावना रही। ईरान की ओर से यह संकेत दिए गए कि यदि अमेरिका सैन्य अभियान आगे नहीं बढ़ाता है तो वह भी जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा। इस घटनाक्रम के बाद निवेशकों को लगा कि पश्चिम एशिया में तनाव फिलहाल और नहीं बढ़ेगा, जिससे तेल आपूर्ति पर तत्काल संकट की आशंका कुछ कम हुई है।

    हालांकि मौजूदा गिरावट के बावजूद ऊर्जा बाजार पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं पहुंचा है। पिछले तीन सप्ताह के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया था। उस दौरान ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था। बाजार को आशंका थी कि संघर्ष बढ़ने पर हॉर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जलमार्ग जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ता।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ताजा गिरावट के बावजूद भू-राजनीतिक जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। हाल के दिनों में लाल सागर क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों को लेकर बढ़ी गतिविधियों ने बाजार की चिंता को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया है। यदि क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में दोबारा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

    बाजार विश्लेषकों के अनुसार, जुलाई महीने के दौरान आई तेज गिरावट के बावजूद कच्चे तेल की कीमतें अभी भी महीने की शुरुआत की तुलना में काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि आपूर्ति से जुड़े जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं और वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सामान्य आवाजाही अभी पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी है। इसलिए निवेशकों की नजर अब भी पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर बनी हुई है।

    कच्चे तेल की कीमतों में नरमी का असर विदेशी मुद्रा बाजार पर भी दिखाई दिया। सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर खुला। शुरुआती कारोबार में रुपया पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में 41 पैसे की मजबूती के साथ 96.15 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका सकारात्मक प्रभाव तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति पर भी पड़ सकता है।

    आने वाले दिनों में वैश्विक निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान संबंधों, पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और प्रमुख समुद्री मार्गों पर तेल आपूर्ति की सामान्य स्थिति पर रहेगी। इन कारकों के आधार पर ही कच्चे तेल की कीमतों की अगली दिशा तय होने की संभावना है।

  • होर्मुज के बाद लाल सागर में भी बढ़ा तनाव….. फिर भी Crude Oil की कीमतों में बड़ी गिरावट

    होर्मुज के बाद लाल सागर में भी बढ़ा तनाव….. फिर भी Crude Oil की कीमतों में बड़ी गिरावट


    नई दिल्ली।
    ग्लोबल ऑयल सप्लाई के दो अहम रास्ते तनाव में फंसे हुए हैं. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी कर रखी है. जबकि हूती विद्रोहियों ने लाल सागर का टेंशन बढ़ा दिया है. तनाव के बीच भी कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखी गई है. जो तेल 101 डॉ लर प्रति बैरल के आंकड़े को फिर से छू चुका था,वो गिरकर 98.38 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच चुका है।

    26 जुलाई को कच्चे तेल की कीमत (Crude Oil Price) में बड़ी गिरावट देखने को मिली. कच्चा तेल 2.29 डॉलर तक गिर गया. इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 2.29 फीसदी की गिरावट के साथ 98.38 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. इसी तरह से WTI 1.87 फीसदी फिसलकर 90.47 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

    क्यों गिरा कच्चे तेल का भाव ?
    अमेरिका-ईरान युद्ध (America-Iran War) की वजह से होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता बंद है. इस रास्ते से दुनिया के 20 फीसदी तेल सप्लाई का आयात-निर्यात होता है. होर्मुज पर पहरा जारी ही है, इस बीच लाल सागर में भी टेंशन बढ़ गई है.यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच सीधा टकराव बढ़ गया है. हूतियों ने लाल सागर में सऊदी के कार्गों को निशाना बनाया, जिसके बाद से बदले की कार्रवाई करते हुए सऊदी अरब ने हूतियों के नियंत्रण वाले यमन के हुदैदाह शहर में हवाई हमले किए. दूसरी ओर अमेरिका की ओर से हूती विद्रोहियों और ईरान दोनों को चेतावनी दी जा रही है. इस टेंशन ने कच्चे तेल की सप्लाई पर खतरा पैदा कर दिया है।


    क्यों गिरा कच्चा तेल?

    दरअसल 13 दिन की बमबारी के बाद ट्रंप ने ईरान (Iran) में अचानक हमला रोक दिया है.अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक बड़ा फैसला लेते हुए ईरान पर नए सैन्य हमलों को फिलहाल रोक दिया है. ओमान की ओर से मध्यस्थता किए जाने के बाद ये फैसला लिया गया है. होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने और तनाव कम करने को लेकर बातचीत फिर से शुरू हुई है. माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच युद्ध खत्म करने पर सहमति बन सकती है. अगर ऐसा होता है, तो तेल सप्लाई फिर से जारी हो सकेगी और कच्चे तेल के दाम गिरेंगे. इस खबर ने तेल की कीमतों में तेजी पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है।


    भारत में पेट्रोल-डीजल की आज की कीमत क्या है ?

    भारत में पेट्रोल डीजल के दाम में फिलहाल कोई बदलाव नहीं हुआ है. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी तेल कंपनियों के घाटे को बढ़ा रही है. पहले ही पेट्रोल-डीजल (Petrol and Diesel) के दाम बढ़ाए जा चुके हैं. देश के 4 महानगरों में पेट्रोल-डीजल की कीमत कुछ इस तरह से है…
    – नई दिल्ली: पेट्रोल ₹102.12, डीजल ₹95.20
    – मुंबई: पेट्रोल ₹111.21, डीजल ₹97.83
    – कोलकाता: पेट्रोल ₹113.51, डीजल ₹99.82
    – चेन्नई: पेट्रोल ₹108.01, डीजल ₹99.55

  • मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान

    मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिका ने लगातार 10वीं रात ईरान के विभिन्न सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और तेज होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका उपयोग क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा सकता है। इस घटनाक्रम ने पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है।

    अमेरिकी सैन्य कमान का कहना है कि हालिया अभियान के दौरान ईरान के सैन्य कमांड सेंटर, मिसाइल और ड्रोन लॉन्च साइट्स, समुद्री ठिकानों तथा वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया। अमेरिका का दावा है कि इन हमलों का मकसद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समुद्री मार्गों पर किसी भी संभावित खतरे को कम करना है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल माना जाता है।

    अमेरिका ने यह भी दावा किया कि उसकी सैन्य गतिविधियों के कारण हॉर्मुज से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित नहीं हुई है। अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ समय में अमेरिकी बलों ने सैकड़ों वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित रूप से इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने में सहायता प्रदान की है। इसके साथ ही करोड़ों बैरल कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी दावा किया गया है। ऊर्जा बाजारों और वैश्विक व्यापार के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख दोहराया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी अमेरिकी सैनिक को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका जवाब बेहद सख्त और कई गुना अधिक होगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं और किसी भी हमले का जवाब पूरी ताकत के साथ दिया जाएगा। उनके इस बयान को क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने दावा किया है कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई उसके सैन्य अभियान के तहत की गई, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। दोनों देशों की ओर से लगातार सामने आ रहे सैन्य दावों और जवाबी कार्रवाइयों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका को और बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रही तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और कच्चे तेल की कीमतों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे समय में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस बढ़ते संघर्ष को रोकने में सफल होंगे या फिर क्षेत्र में तनाव और अधिक गंभीर रूप लेगा।

  • हर्मुज जलडमरूमध्य से परमाणु ठिकानों तक बढ़ा युद्ध का दायरा, अमेरिकी हमलों और ईरानी जवाबी कार्रवाई ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर गहरा संकट खड़ा किया

    हर्मुज जलडमरूमध्य से परमाणु ठिकानों तक बढ़ा युद्ध का दायरा, अमेरिकी हमलों और ईरानी जवाबी कार्रवाई ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर गहरा संकट खड़ा किया

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रह गया है। पश्चिम एशिया के कई देशों में बढ़ती सैन्य गतिविधियों, समुद्री मार्गों पर सुरक्षा चुनौतियों और लगातार हो रहे हमलों ने पूरे क्षेत्र की स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। सोमवार को ओमान के तट के पास स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हर्मुज जलडमरूमध्य के निकट एक व्यावसायिक जहाज में आग लगने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार को लेकर आशंकाओं को और बढ़ा दिया।

    हर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में जहाज में आग लगने की घटना के बाद विभिन्न देशों ने हालात पर नजर तेज कर दी है। फिलहाल आग लगने के कारणों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में पहले से जारी सैन्य तनाव के बीच इस घटना को गंभीर सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

    इसी दौरान अमेरिका ने ईरान के भीतर अपने सैन्य अभियान को और तेज कर दिया है। अमेरिकी कार्रवाई लगातार कई दिनों से जारी है और इसमें केवल सैन्य ठिकानों ही नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व वाले ढांचों को भी निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इन अभियानों का उद्देश्य उन क्षमताओं को कमजोर करना है जिनका उपयोग क्षेत्र में व्यावसायिक जहाजों, सैन्य प्रतिष्ठानों और नागरिक हितों के खिलाफ किया जा सकता है।

    संघर्ष के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी एक निर्माणाधीन परियोजना भी हमलों की चपेट में आ गई। ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन ने दावा किया कि दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में स्थित दारखोविन परमाणु ऊर्जा परियोजना की निर्माण साइट पर हवाई हमला किया गया। हालांकि संबंधित अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी ने स्पष्ट किया कि यह परियोजना अभी शुरुआती चरण में थी और वहां किसी प्रकार की परमाणु सामग्री मौजूद नहीं थी। इसके बावजूद इस घटना ने परमाणु सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    सैन्य टकराव का असर अमेरिकी सैनिकों पर भी लगातार दिखाई दे रहा है। हालिया घटनाओं में एक अमेरिकी सैनिक की मौत की पुष्टि हुई है। बताया गया कि यह घटना इराक में एक ड्रोन अभियान के दौरान नियंत्रित विस्फोट के समय हुई। इससे पहले भी संघर्ष के दौरान कई अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने की खबरें सामने आ चुकी हैं, जिससे अभियान की गंभीरता और जोखिम दोनों बढ़ गए हैं।

    अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य प्रतिक्रिया तेज कर दी है। जॉर्डन, कुवैत और आसपास के क्षेत्रों की ओर मिसाइलों तथा ड्रोन से हमले किए जाने की जानकारी सामने आई है। जॉर्डन ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने कई मिसाइलों को बीच रास्ते में ही नष्ट कर दिया। वहीं कुवैत में ऊर्जा और जल आपूर्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण संयंत्र पर लगातार दूसरे दिन हमला होने से वहां आवश्यक सेवाओं को लेकर चिंता बढ़ गई है।

    इन घटनाओं के बाद खाड़ी क्षेत्र के देशों ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल ने नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमलों की निंदा करते हुए क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर गंभीर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि बिजली, पानी और अन्य नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाए जाने से मानवीय संकट गहरा सकता है। लगातार बढ़ती सैन्य कार्रवाई, समुद्री सुरक्षा पर मंडराता खतरा और क्षेत्रीय देशों की सक्रिय भागीदारी यह संकेत दे रही है कि यदि हालात जल्द नहीं संभले तो पश्चिम एशिया का यह संघर्ष व्यापक अंतरराष्ट्रीय चुनौती का रूप ले सकता है।

  • ईरान पर अमेरिका की नई बमबारी से बढ़ा तनाव, तबरीज, बुशेहर और चाबहार बने निशाना, होर्मुज स्ट्रेट और बहरीन तक सुरक्षा अलर्ट से मचा हड़कंप

    ईरान पर अमेरिका की नई बमबारी से बढ़ा तनाव, तबरीज, बुशेहर और चाबहार बने निशाना, होर्मुज स्ट्रेट और बहरीन तक सुरक्षा अलर्ट से मचा हड़कंप

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव लगातार अधिक गंभीर होता जा रहा है। अमेरिका ने लगातार नौवीं रात ईरान के विभिन्न हिस्सों में नए हवाई हमले किए, जिससे पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद तनाव और बढ़ गया। इस अभियान के दौरान ईरान के कई रणनीतिक क्षेत्रों में विस्फोटों की खबरें सामने आईं, जबकि होर्मुज स्ट्रेट में एक व्यापारिक जहाज में आग लगने और बहरीन में सुरक्षा अलर्ट जारी होने से पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

    अमेरिकी सैन्य अभियान के तहत उत्तर-पश्चिमी ईरान के तबरीज सहित कई स्थानों को निशाना बनाया गया। इसके अलावा दक्षिणी प्रांतों होरमोज़गान और बुशेहर में भी तेज धमाकों की सूचना मिली। दक्षिण-पूर्वी शहर चाबहार में कई विस्फोट दर्ज किए गए, जिसके बाद आसपास के कोनारक क्षेत्र में ईरान ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय कर दिया। इससे स्पष्ट संकेत मिले कि संभावित नए हमलों की आशंका को देखते हुए ईरान अपनी सुरक्षा तैयारियों को लगातार मजबूत कर रहा है।

    अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनके जरिए वाणिज्यिक जहाजों और नागरिक नाविकों के लिए खतरा पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। इसी रणनीति के तहत लगातार कई दिनों से हवाई अभियान जारी रखा गया है। हालांकि इन हमलों के बाद ईरान की ओर से भी सुरक्षा व्यवस्था को उच्च स्तर पर बनाए रखा गया है।

    इसी दौरान होर्मुज स्ट्रेट से एक और चिंताजनक खबर सामने आई। ओमान के तट के निकट एक बड़े व्यापारिक जहाज में भीषण आग लग गई, जिससे समुद्री गतिविधियों को लेकर चिंता बढ़ गई। जहाज की पहचान और आग लगने के वास्तविक कारणों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। होर्मुज स्ट्रेट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है।

    क्षेत्रीय हालात को देखते हुए बहरीन की राजधानी मनामा स्थित अमेरिकी दूतावास ने भी सुरक्षा अलर्ट जारी किया है। दूतावास ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने, भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचने और स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने की सलाह दी है। संभावित सुरक्षा जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त एहतियाती कदम भी उठाए जा रहे हैं।

    लगातार बढ़ते सैन्य अभियानों और सुरक्षा तैयारियों के बीच पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के संकेत फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने में लगे हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर बनी हुई है कि आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में आगे बढ़ते हैं। यदि सैन्य कार्रवाई का यह सिलसिला जारी रहता है तो इसका असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और कूटनीतिक संतुलन पर भी व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में पूरी दुनिया की निगाहें इस संघर्ष के अगले घटनाक्रम और संभावित राजनीतिक समाधान पर टिकी हुई हैं।

  • ईरान-US संघर्ष खतरनाक मोड़ पर….. इस बार हॉर्मुज में तेल नहीं, पानी के लिए छिड़ी भीषण जंग

    ईरान-US संघर्ष खतरनाक मोड़ पर….. इस बार हॉर्मुज में तेल नहीं, पानी के लिए छिड़ी भीषण जंग


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच चल रहा सैन्य टकराव (Military confrontation) अब तेल के कुओं और सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। दोनों देशों के बीच जून में हुआ इस्लामाबाद समझौता (Islamabad Agreement) पूरी तरह से टूट चुका है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में फिर से भीषण जंग छिड़ गई है।

    इस बार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को घुटनों पर लाने के लिए पानी से जुड़े बुनियादी ढांचे यानी पानी के सप्लाई सिस्टम को अपना मुख्य निशाना बनाया है। पारंपरिक हवाई हमलों के साथ-साथ अब पानी साफ करने वाले प्लांटों को नष्ट करने की होड़ मची है, जिसने सीधे तौर पर आम नागरिकों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया है।


    पानी को क्यों बनाया जा रहा है युद्ध का नया मैदान?

    फारस की खाड़ी दुनिया के उन चुनिंदा हिस्सों में से है, जहां प्राकृतिक रूप से पीने का पानी न के बराबर है। ऐसे में पानी का उत्पादन और उसका वितरण सिस्टम किसी भी देश के वजूद के लिए सबसे संवेदनशील नस है।

    तेल रिफाइनरी या कच्चे तेल के जहाजों पर हमला करने से वैश्विक बाजार और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। लेकिन जब समंदर के खारे पानी को पीने लायक बनाने वाले डिसेलिनेशन प्लांट को तबाह किया जाता है, तो सीधे तौर पर आम जनता के सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो जाता है।

    ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इनमें से एक बड़ा हमला कुवैत के मुख्य बिजली उत्पादन और डिसेलिनेशन प्लांट पर हुआ। इस हमले से बिजली की कई इकाइयां ठप हो गईं और भयंकर आग लग गई। कुवैत सरकार को आपातकालीन योजनाएं लागू करनी पड़ीं और नागरिकों से पानी व बिजली का इस्तेमाल कम करने की अपील करनी पड़ी है।

    कुवैत अपनी जरूरत का 90 फीसदी पीने का पानी समंदर के पानी को साफ करके हासिल करता है। ऐसे में इन प्लांट्स पर होने वाले हमले देश की पूरी घरेलू जल आपूर्ति को पंगु बना सकते हैं। यह हमला दिखाता है कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश कितने संवेदनशील हैं, क्योंकि उनके ज्यादातर बड़े वॉटर प्लांट समुद्र तटों पर हैं, जो ईरानी मिसाइलों की सीधी जद में आते हैं।


    अमेरिका का पलटवार: ईरान के बुंजी गांव में प्लांट तबाह

    कुवैत पर हमले के लगभग साथ ही, अमेरिकी सेना ने भी अपनी रणनीति बदलते हुए सैन्य ठिकानों के अलावा नागरिक और लॉजिस्टिक्स सुविधाओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी होर्मोजगान प्रांत के बुंजी गांव में स्थित एक प्रमुख डिसेलिनेशन प्लांट पर हवाई हमला किया।

    होर्मोजगान वॉटर एंड वेस्टवॉटर कंपनी के मुताबिक, अमेरिकी हमले में प्लांट का पूरा फिल्ट्रेशन इक्विपमेंट (पानी छानने वाले उपकरण) और पंपिंग सिस्टम पूरी तरह तबाह हो गया है। इसके कारण भीषण गर्मी के इस मौसम में 20 से ज्यादा गांवों के लगभग 10,000 लोग बिना पीने के पानी के रहने को मजबूर हो गए हैं, जिससे इलाके में बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो गया है।

    इससे पहले भी युद्ध के दौरान कुवैत के ‘दोहा वेस्ट’ डिसेलिनेशन प्लांट को नुकसान पहुंचा था। वहीं ईरान ने अमेरिका पर 8 मार्च को ‘केशम द्वीप’ के वॉटर प्लांट पर भी हमला करने का आरोप लगाया था, जिससे 30 गांवों की पानी सप्लाई रुकी थी। हालांकि, वाशिंगटन ने इसकी पुष्टि नहीं की थी।

    खाड़ी देश पानी के लिए डिसेलिनेशन पर इतने निर्भर क्यों हैं?
    संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानकों के अनुसार, अगर किसी देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 500 क्यूबिक मीटर से कम रिन्यूएबल ताजा पानी उपलब्ध है, तो उसे ‘पूर्ण जल कमी’ की श्रेणी में रखा जाता है। खाड़ी (GCC) देशों में यह आंकड़ा 100 क्यूबिक मीटर से भी कम है।

    प्राकृतिक संसाधनों की इस कमी के बावजूद, इस क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण, औद्योगिक विकास और आबादी बढ़ी है। इस चकाचौंध को जिंदा रखने के लिए प्राकृतिक स्रोतों के बजाय पूरी तरह आर्टिफिशयल वाटर सप्लाई का जाल बिछाया गया।

    अगर ये प्लांट काम करना बंद कर दें, तो क्या होगा?
    किसी तेल रिफाइनरी के बंद होने से केवल व्यावसायिक गतिविधियां रुकती हैं, लेकिन वॉटर प्लांट बंद होने का असर अस्पतालों, आपातकालीन सेवाओं और घरों पर हर सेकंड पड़ता है। अगर युद्ध के कारण ये प्लांट लंबे समय के लिए बंद हो जाएं, तो संकट का टाइमलाइन कुछ इस तरह बदल सकता है:

    बहरीन और कतर जैसे बहुत ज्यादा निर्भर देशों को तुरंत पानी की सख्त लिमिट लागू करनी होगी। उद्योगों और कमर्शियल इलाकों का पानी रोककर केवल घरेलू उपयोग को प्राथमिकता दी जाएगी।

    अगर हफ्ते भर में मरम्मत न हुई, तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा बूंद-बूंद पानी को तरस जाएगा। खाड़ी की 45°C से ज्यादा की झुलसाने वाली गर्मी में पानी न मिलना बड़े पैमाने पर डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) और पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को जन्म दे देगा।


    पानी की सुरक्षा और ऊर्जा का आपस में क्या कनेक्शन है?

    खाड़ी देशों में बिजली और पानी के प्लांट अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए ‘कोग्नरेशन सिस्टम’ के तहत काम करते हैं। थर्मल डिसेलिनेशन प्लांट पानी साफ करने के लिए पास के तेल या गैस से चलने वाले बिजलीघरों से निकलने वाली गर्म भाप का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, वे बिजलीघर अपने बॉयलरों को ठंडा रखने और सुरक्षित संचालन के लिए इसी साफ किए गए पानी पर निर्भर होते हैं।

    अगर किसी वॉटर प्लांट के इनटेक पंप या फिल्टर को निशाना बनाया जाता है, तो थर्मल डैमेज से बचने के लिए बिजलीघर को भी अपनी क्षमता कम करनी पड़ती है या उसे बंद करना पड़ता है। यानी पानी पर हमला सीधे तौर पर बिजली ग्रिड को ठप कर देता है।

    आधुनिक वॉटर प्लांट ‘रिवर्स ऑस्मोसिस’ (RO) तकनीक पर चलते हैं, जिसमें बेहद बारीक पॉलीमर मेम्ब्रेन के जरिए नमक को अलग किया जाता है। ये मेम्ब्रेन बेहद नाजुक और महंगी होती हैं। अगर युद्ध के कारण समुद्र में कच्चे तेल का रिसाव होता है और वह दूषित पानी इनटेक पॉइंट तक पहुंच जाता है, तो ये मेम्ब्रेन हमेशा के लिए खराब हो जाती हैं। इन्हें बदलने में महीनों का समय लग सकता है।


    साइबर वॉरफेयर का नया खतरा

    फिजिकल मिसाइल हमलों के अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि ईरानी साइबर हैकर्स अमेरिकी पानी और वेस्टवॉटर सिस्टम को निशाना बना रहे हैं। इसके लिए FBI, NSA और CISA ने अलर्ट जारी किया है।

    हैकर्स किसी वायरस या मालवेयर का इस्तेमाल करने के बजाय सिस्टम के प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स में सेंध लगाते हैं, जो पंपों और फिल्टरेशन को ऑटोमैटिक कंट्रोल करते हैं। हैकर्स प्रोग्रामिंग टूल्स का इस्तेमाल करके सामान्य मेंटेनेंस स्टाफ की तरह नेटवर्क में छिप जाते हैं।

    वे उन फाइलों को डिलीट कर देते हैं जो तय करती हैं कि पंप कब चालू या बंद होना है। साथ ही, वे ह्यूमन-मशीन इंटरफेस यानी ऑपरेटर की डिजिटल स्क्रीन पर झूठा डेटा दिखा देते हैं, जिससे अधिकारियों को लगता है कि सब ठीक चल रहा है, जबकि अंदर ही अंदर सिस्टम फेल हो चुका होता है। इससे पहले इजरायल के वॉटर सिस्टम पर भी ऐसा ही हमला हुआ था, जहां पानी में क्लोरीन की मात्रा को चुपके से बढ़ाने की कोशिश की गई थी।


    इंटरनेशनल कानून और CIA की पुरानी चेतावनी

    पेंटागन और अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को सालों से इस कमजोरी का अंदाजा था। साल 2010 में CIA की एक गोपनीय रिपोर्ट में आगाह किया गया था कि खाड़ी के 90% से ज्यादा पानी का उत्पादन केवल 56 संवेदनशील प्लांट्स में केंद्रित है। इन पर किया गया कोई भी बड़ा हमला पूरे क्षेत्र में राष्ट्रीय आपातकाल ला सकता है।

    जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन, अनुच्छेद 54 (पैराग्राफ 2) के तहत इंटरनेशनल मानवीय कानून साफ तौर पर कहता है कि- नागरिक आबादी के जिंदा रहने के लिए अपरिहार्य वस्तुओं, जैसे कि भोजन, कृषि क्षेत्र… और पीने के पानी के प्रतिष्ठानों और सप्लाई को नष्ट करना, हटाना या बेकार करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।”

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच सरकार का बड़ा कदम, भारतीय नाविकों की तैनाती पर जारी हुई नई एडवाइजरी

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच सरकार का बड़ा कदम, भारतीय नाविकों की तैनाती पर जारी हुई नई एडवाइजरी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालात के बीच भारत सरकार ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। समुद्री प्रशासन महानिदेशालय (DGMA) ने शिपिंग कंपनियों और जहाज प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं के लिए नई एडवाइजरी जारी करते हुए निर्देश दिया है कि अगले आदेश तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर भारतीय नाविकों की तैनाती से बचा जाए।

    सरकार का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी जोखिमों को देखते हुए समुद्री मार्गों पर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है, जहां से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का परिवहन होता है।

    जारी एडवाइजरी में शिप ओनर और शिप मैनेजमेंट कंपनियों से कहा गया है कि भारतीय नाविकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जब तक सुरक्षा स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक होर्मुज क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नागरिकों की तैनाती नहीं की जाए। साथ ही कंपनियों को क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने और सभी सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

    समुद्री प्रशासन का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह एहतियाती उपाय के रूप में लिया गया है। खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटना से भारतीय नाविकों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। ऐसे में पहले से सावधानी बरतना आवश्यक माना गया है।

    हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर भी असर डाला है। कई देशों ने अपने नागरिकों और व्यापारिक जहाजों के लिए अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा सलाह जारी की है। भारत ने भी इसी क्रम में अपने समुद्री कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का सुरक्षा संकट अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समुद्री कंपनियां भी लगातार सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन के निर्देशों के अनुरूप अपनी परिचालन रणनीति में बदलाव कर रही हैं।

    सरकार ने शिपिंग कंपनियों से यह भी अपेक्षा की है कि वे अपने जहाजों की आवाजाही और चालक दल की तैनाती से जुड़े सभी निर्णय मौजूदा सुरक्षा आकलन के आधार पर लें। यदि क्षेत्र की परिस्थितियों में कोई नया बदलाव होता है तो उसके अनुसार आगे के निर्देश भी जारी किए जाएंगे।

    भारतीय नाविक दुनिया के विभिन्न देशों के व्यापारिक जहाजों पर बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। वर्तमान एडवाइजरी को भी इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण एहतियाती कदम माना जा रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में भारतीय समुद्री कर्मियों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।