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  • भारत बनेगा वैश्विक निवेश का अगला बड़ा केंद्र, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और टेक्नोलॉजी बना रहे मजबूत बाजार

    भारत बनेगा वैश्विक निवेश का अगला बड़ा केंद्र, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और टेक्नोलॉजी बना रहे मजबूत बाजार


    नई दिल्ली ।चीन के डालियान में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक ‘न्यू चैंपियंस’ यानी समर दावोस के दौरान भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर सकारात्मक संदेश सामने आया है। नॉर्वे की प्रमुख बायोटेक्नोलॉजी कंपनी एकर बायोमरीन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैट्स जोहानसन ने भारत को दुनिया के सबसे मजबूत और आकर्षक दीर्घकालिक बाजारों में से एक बताते हुए कहा कि देश की विशाल आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और नई तकनीकों को तेजी से अपनाने की क्षमता भविष्य की आर्थिक सफलता का मजबूत आधार तैयार कर रही है।

    आईएएनएस से बातचीत में जोहानसन ने कहा कि भारत उन देशों में शामिल है जहां दीर्घकालिक निवेश और कारोबारी विस्तार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। उनके अनुसार भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार ही नहीं है बल्कि नवाचार और तकनीकी बदलावों को स्वीकार करने की असाधारण क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि वैश्विक कंपनियां भारत को भविष्य के विकास इंजन के रूप में देख रही हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी आबादी और लगातार बढ़ती क्रय शक्ति वाला मध्यम वर्ग आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा दे रहा है। इसके साथ ही डिजिटल तकनीक और नवाचार को अपनाने की रफ्तार भी दुनिया के कई देशों से बेहतर है। इन सभी कारकों के कारण भारत आने वाले वर्षों में भी वैश्विक निवेशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बाजार बना रहेगा।

    भारत के प्रति अपनी कंपनी की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए जोहानसन ने बताया कि एकर बायोमरीन देश में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। कंपनी मुंबई में नया कार्यालय खोलने की तैयारी कर रही है ताकि भारतीय बाजार में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और अधिक बढ़ने वाली है।

    उन्होंने बताया कि एकर बायोमरीन लंबे समय से भारतीय झींगा पालन उद्योग को आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा रही है। भारत का श्रिम्प फार्मिंग सेक्टर दुनिया के प्रमुख एक्वाकल्चर बाजारों में शामिल है और इस क्षेत्र में कंपनी की मजबूत भागीदारी रही है। अब कंपनी केवल जलीय कृषि तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि खाद्य उत्पादों और मानव स्वास्थ्य से जुड़े पोषण सप्लीमेंट्स के क्षेत्र में भी भारतीय बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की योजना बना रही है।

    मैट्स जोहानसन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था और उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारक बन सकता है। उनके मुताबिक एआई का उपयोग केवल उत्पादन इकाइयों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि बिक्री, विपणन, वित्तीय प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में भी बड़े बदलाव लाएगा।

    उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी एआई को अपनी पूरी वैल्यू चेन में शामिल करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इससे न केवल दक्षता बढ़ेगी बल्कि लागत में कमी और बेहतर निर्णय लेने में भी मदद मिलेगी। जोहानसन का मानना है कि एआई वैश्विक आर्थिक विकास का नया इंजन बनने जा रहा है और जो कंपनियां इसे तेजी से अपनाएंगी वे भविष्य में प्रतिस्पर्धा में आगे रहेंगी।

    गौरतलब है कि 23 जून से शुरू हुआ समर दावोस सम्मेलन 25 जून तक चलेगा। इस वैश्विक मंच पर दुनिया भर के उद्योग जगत के दिग्गज, नीति निर्माता, शिक्षाविद और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि नवाचार, उद्यमिता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक विकास के भविष्य पर मंथन कर रहे हैं। भारत को लेकर व्यक्त किए गए सकारात्मक विचार एक बार फिर यह संकेत देते हैं कि वैश्विक निवेशकों की नजर में देश की आर्थिक संभावनाएं लगातार मजबूत होती जा रही हैं।

  • भारत की विकास यात्रा को मिलेगी नई रफ्तार: कृषि और टेक्नोलॉजी बनेंगे अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन

    भारत की विकास यात्रा को मिलेगी नई रफ्तार: कृषि और टेक्नोलॉजी बनेंगे अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन


    नई दिल्ली । दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत आने वाले वर्षों में भी अपनी विकास गति बनाए रखेगा। चीन के डालियान शहर में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एनुअल न्यू चैंपियंस मीटिंग यानी समर दावोस में वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की आर्थिक क्षमता पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश के विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में कृषि और टेक्नोलॉजी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत न केवल वैश्विक विकास दर में महत्वपूर्ण योगदान देगा बल्कि नवाचार और डिजिटल परिवर्तन के जरिए नई आर्थिक संभावनाओं का केंद्र भी बनेगा।

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मैनेजिंग डायरेक्टर मिरेक डुसेक ने भारत को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बताते हुए कहा कि आने वाले वर्षों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ती रहेगी। उनके अनुसार भारत वैश्विक आर्थिक वृद्धि का एक प्रमुख आधार बन चुका है और इसकी विकास यात्रा दुनिया भर के निवेशकों और नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित कर रही है।

    डुसेक ने कहा कि समर दावोस का उद्देश्य दुनिया भर के इनोवेटर्स, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के नेताओं को एक मंच पर लाकर वैश्विक चुनौतियों के समाधान तलाशना है। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी उभरती तकनीकें न केवल उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेंगी बल्कि वैश्विक आर्थिक विकास को भी नई दिशा देंगी।

    वहीं पद्मश्री से सम्मानित और ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसर रतन लाल ने भारत की कृषि क्षमता को देश की आर्थिक ताकत का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस लक्ष्य को हासिल करने में कृषि क्षेत्र की बड़ी भूमिका होगी।

    प्रोफेसर रतन लाल ने कहा कि खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मिट्टी की सेहत सुधारना और भूमि के टिकाऊ प्रबंधन को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीकें भारतीय कृषि में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। इन तकनीकों की मदद से मिट्टी की जांच पहले की तुलना में अधिक तेज, सस्ती और सटीक हो सकेगी। इससे किसानों को अपनी जमीन और फसल की जरूरतों के अनुरूप सही निर्णय लेने में मदद मिलेगी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और लागत कम होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की युवा आबादी, तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा, तकनीकी नवाचार और मजबूत कृषि आधार देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। समर दावोस में हुई चर्चाओं से यह स्पष्ट संकेत मिला कि भविष्य की भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार केवल उद्योग और सेवाएं नहीं बल्कि आधुनिक तकनीक से सशक्त कृषि भी होगी। यही संयोजन भारत को आने वाले दशक में वैश्विक विकास का सबसे बड़ा केंद्र बना सकता है।

  • भारत का मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई में बढ़कर 55 पर, नए ऑर्डर और उत्पादन में तेज़ी से उद्योग गतिविधियों में मजबूती

    भारत का मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई में बढ़कर 55 पर, नए ऑर्डर और उत्पादन में तेज़ी से उद्योग गतिविधियों में मजबूती

    नई दिल्ली । मई में भारत के विनिर्माण क्षेत्र ने मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है, जिसमें एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई के ताजा आंकड़ों के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 55.0 के स्तर पर पहुंच गया है। यह अप्रैल के 54.7 और शुरुआती अनुमान 54.3 से अधिक है, जो औद्योगिक गतिविधियों में लगातार सुधार का संकेत देता है। नए ऑर्डरों, उत्पादन गतिविधियों और खरीद में आई तेज़ वृद्धि ने इस सुधार को प्रमुख रूप से समर्थन दिया है, जिसके चलते कंपनियों ने भविष्य की मांग को देखते हुए स्टॉक जमा करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है।

    रिपोर्ट के अनुसार मई का प्रदर्शन पिछले तीन महीनों में सबसे मजबूत माना जा रहा है, जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर और व्यापक रिकवरी की ओर इशारा करता है। देश के कई हिस्सों, जिनमें मध्य प्रदेश सहित विभिन्न औद्योगिक केंद्र शामिल हैं, वहां भी उत्पादन गतिविधियों में सुधार का रुझान देखा गया है।

    सर्वेक्षण के अनुसार इंटरमीडिएट और कैपिटल गुड्स सेगमेंट में वृद्धि उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र की तुलना में अधिक तेज रही, जिससे औद्योगिक उत्पादन के बुनियादी ढांचे को मजबूती मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू मांग इस वृद्धि का मुख्य आधार बनी हुई है, जबकि निर्यात ऑर्डरों की वृद्धि दर कुछ धीमी जरूर हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों से नए ऑर्डरों की लगातार प्राप्ति ने संतुलन बनाए रखा है।

    एशिया, यूरोप और अफ्रीका के कुछ देशों से भी भारतीय उत्पादों की मांग बनी हुई है, जिससे निर्यात आधारित गतिविधियों को समर्थन मिला है। लागत के मोर्चे पर कच्चे माल, ऊर्जा, ईंधन और परिवहन खर्चों में वृद्धि दर्ज की गई है, जो पिछले कई महीनों की तुलना में अधिक है। यह वृद्धि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव का परिणाम मानी जा रही है।

    हालांकि तैयार उत्पादों की कीमतों में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है, जिससे कंपनियों के लाभ मार्जिन पर कुछ दबाव बनने की संभावना जताई जा रही है। उत्पादन और नए ऑर्डरों में आई तेज़ी फरवरी के बाद सबसे अधिक दर्ज की गई है, जो यह दर्शाती है कि उद्योगों में मांग का स्तर मजबूत बना हुआ है।

    उद्योग जगत के अनुसार यह रुझान आने वाले महीनों में भी जारी रह सकता है, क्योंकि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश और निर्माण गतिविधियों में वृद्धि से औद्योगिक मांग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों का विश्वास स्तर भी मजबूत बना हुआ है, जो उत्पादन क्षमता विस्तार और नई भर्तियों की संभावनाओं को बढ़ा रहा है।

    हालांकि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण लागत दबाव बना रह सकता है, लेकिन घरेलू मांग इस दबाव को काफी हद तक संतुलित कर रही है। कुल मिलाकर मई के पीएमआई आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र स्थिर गति से विस्तार कर रहा है और आर्थिक गतिविधियों में मजबूती के संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिससे निवेश और उत्पादन दोनों को सकारात्मक दिशा मिल रही है।

  • उत्तर प्रदेश अब बदल चुका है, पीछे नहीं लौटेगा: सीएम योगी ने निवेश और विकास का नया विजन रखा सामने

    उत्तर प्रदेश अब बदल चुका है, पीछे नहीं लौटेगा: सीएम योगी ने निवेश और विकास का नया विजन रखा सामने


    नई दिल्ली । 
    दिल्ली में आयोजित एक बड़े औद्योगिक और निवेश मंच पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य के भविष्य को लेकर एक नया और आत्मविश्वास से भरा विजन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब उत्तर प्रदेश को केवल सुधार की प्रक्रिया में नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे बुलेट ट्रेन जैसी तेज रफ्तार के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। उनके अनुसार, राज्य ने अब तक जिन कमजोरियों को पीछे छोड़ा है, उनके स्थान पर मजबूत विकास की नींव खड़ी कर दी गई है।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य की असली ताकत उसके उद्योग, निवेश और उत्पादन क्षमता में होती है। जब उद्योग मजबूत होते हैं तो रोजगार के अवसर अपने आप बढ़ते हैं और अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की ताकत केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया को स्थिरता और विकास का नया मार्ग दिखाने की क्षमता भी रखता है।

    अपने भाषण में उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुराने हालातों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक राज्य की स्थिति ऐसी थी कि विकास की रफ्तार धीमी थी और लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती थी। उन्होंने कहा कि उस समय सड़कों की स्थिति, कानून व्यवस्था की चुनौतियां और औद्योगिक माहौल की कमजोरी के कारण निवेश प्रभावित होता था और लोग राज्य से बाहर जाने को मजबूर होते थे।

    सीएम योगी ने कहा कि सरकार ने सबसे पहले प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा प्रणाली को मजबूत किया। उनका मानना है कि विकास की पहली शर्त एक सुरक्षित माहौल है। उन्होंने बताया कि कानून व्यवस्था को सख्ती से लागू किया गया और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाया गया। इसके साथ ही नीतिगत स्तर पर कई बड़े बदलाव किए गए ताकि निवेशकों का भरोसा बढ़ सके।

    उन्होंने यह भी बताया कि उनके नेतृत्व का तरीका अनुशासन और संगठनात्मक प्रबंधन पर आधारित रहा है, जिसे उन्होंने अपने पहले के अनुभवों से सीखा और शासन व्यवस्था में लागू किया। इसके परिणामस्वरूप सरकारी कामकाज में तेजी आई और निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हुई।

    विकास की दिशा में उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए मजबूत ढांचा तैयार किया गया है। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं लागू की गई हैं, जिससे छोटे और मध्यम उद्योगों को नई पहचान मिली है। आज यह सेक्टर लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है और राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश अब केवल सुधार की कहानी नहीं है, बल्कि यह बदलाव और प्रगति का उदाहरण बन रहा है। राज्य में पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहरों को भी वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को और मजबूती मिल रही है।

    अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश अब पीछे मुड़ने वाला नहीं है। राज्य को अब एक ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ाया जा रहा है जहां गति, निवेश, सुरक्षा और विकास साथ-साथ चलेंगे। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने वाले राज्यों में शामिल होगा।

  • 1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत

    1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत



    नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा।

    कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?
    1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था
    इन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था।

    क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?
    संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई।

    कितना सोना इस्तेमाल हुआ?
    रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

    किसने संभाली जिम्मेदारी?
    इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले।

    कैसे भेजा गया सोना?
    मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया

    इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया

    इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली

    क्या मिला फायदा?
    इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

  • दो दिन में 97 लाख से ज्यादा LPG सिलेंडर की डिलीवरी, ऑनलाइन बुकिंग 99% तक पहुंची: सरकार

    दो दिन में 97 लाख से ज्यादा LPG सिलेंडर की डिलीवरी, ऑनलाइन बुकिंग 99% तक पहुंची: सरकार


    नई दिल्ली।  पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शुक्रवार को जानकारी दी कि देश में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई पूरी तरह से सामान्य और सुचारू बनी हुई है। मंत्रालय के अनुसार, पिछले दो दिनों में करीब 87.66 लाख सिलेंडर की बुकिंग के मुकाबले 97 लाख से अधिक सिलेंडर की डिलीवरी की गई है।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब एलपीजी की ऑनलाइन बुकिंग का स्तर बढ़कर लगभग 99 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो डिजिटल प्रणाली की ओर बढ़ते उपभोक्ता व्यवहार को दर्शाता है। मंत्रालय ने बताया कि उपभोक्ताओं को रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे गए ऑथेंटिकेशन कोड के आधार पर लगभग 95 प्रतिशत डिलीवरी सुनिश्चित की जा रही है, जिससे डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर किसी भी तरह की गड़बड़ी या हेराफेरी को रोका जा सके।

    पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता के बावजूद देश में एलपीजी सप्लाई पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है और किसी भी रिटेल गैस एजेंसी पर स्टॉक खत्म होने जैसी स्थिति नहीं देखी गई है।

    इसके अलावा, पिछले दो दिनों में 1.11 लाख छोटे 5 किलोग्राम वाले सिलेंडरों की भी बिक्री हुई है। सरकार के अनुसार, यह छोटे सिलेंडर खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों और छोटे उपभोक्ताओं के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं।

    सरकारी तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम लगातार एलपीजी वितरण व्यवस्था को मजबूत करने में लगी हुई हैं। साथ ही कमर्शियल एलपीजी की बिक्री भी पिछले दो दिनों में 15,493 मीट्रिक टन से अधिक दर्ज की गई, जो लगभग 8.15 लाख 19 किलो वाले सिलेंडरों के बराबर है।

    मंत्रालय ने यह भी बताया कि देश में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन का विस्तार तेजी से हो रहा है। अब तक करीब 6.5 लाख कनेक्शनों में गैस सप्लाई शुरू हो चुकी है, जबकि कुल कनेक्शन संख्या 9.16 लाख तक पहुंच गई है। इसके अलावा, 7.08 लाख नए उपभोक्ताओं ने कनेक्शन के लिए आवेदन किया है।

    सरकार ने बताया कि एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए देशभर में सख्त कार्रवाई की जा रही है। हाल ही में 2,000 से अधिक जगहों पर छापेमारी की गई, जिसमें 378 डिस्ट्रीब्यूटरों पर जुर्माना लगाया गया और 76 एजेंसियों को निलंबित किया गया।

    पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। सभी सरकारी तेल कंपनियों के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं।

    सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें और घबराकर अतिरिक्त खरीदारी न करें। साथ ही उपभोक्ताओं को डिजिटल माध्यम से बुकिंग करने और गैस एजेंसियों पर अनावश्यक भीड़ से बचने की सलाह दी गई है।

  • तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल

    तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल


    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है जहां United Arab Emirates ने 1 मई से OPEC से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासतौर पर भारत जैसे आयातक देशों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

    भारत के पूर्व राजदूत Navdeep Singh Suri के मुताबिक यूएई का यह फैसला अचानक नहीं है बल्कि पिछले पांच वर्षों से इसकी तैयारी चल रही थी। उनका कहना है कि यूएई लंबे समय से ओपेक द्वारा तय किए गए उत्पादन कोटे से असंतुष्ट था। शुरुआत में उसे करीब 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन की अनुमति थी जिसे बाद में बढ़ाकर 3.4 मिलियन बैरल किया गया लेकिन यह भी उसकी बढ़ती क्षमता के अनुरूप नहीं था।

    सूरी ने बताया कि यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी तेल उत्पादन क्षमता में भारी निवेश किया है और वह जल्द ही 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन करने की स्थिति में पहुंच सकता है। ऐसे में वह ओपेक के कड़े नियमों और सऊदी अरब के प्रभाव वाले फैसलों से मुक्त होकर अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चाहता है। यही वजह है कि उसने स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

    हालांकि इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत देखने को मिल सकता है। मौजूदा समय में Strait of Hormuz में तनाव और रुकावट के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है जिससे कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर होना बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आने वाले समय में होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सामान्य होती है और तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से शुरू हो जाती है तो यूएई का अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इससे भारत जैसे देशों को राहत मिल सकती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं।

    लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा खतरा भी सामने आता है। ओपेक लंबे समय से तेल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है जिससे कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। यदि यूएई जैसे बड़े उत्पादक देश इस संगठन से बाहर निकलते हैं तो ओपेक की पकड़ कमजोर हो सकती है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच Iran और United States के बीच जारी तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पूर्व राजदूत सूरी ने स्पष्ट कहा कि इन हालातों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उनका मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और आपूर्ति में रुकावट वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

    कुल मिलाकर यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देश इस फैसले के बाद क्या रणनीति अपनाते हैं और बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • रिपोर्ट का दावा: भारत में इस साल हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी रहेगी स्थिर

    रिपोर्ट का दावा: भारत में इस साल हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी रहेगी स्थिर


    नई दिल्ली। भारत में घर खरीदने का सपना देखने वालों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। CBRE South Asia Pvt. Ltd. की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में देश में हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी यानी घर खरीदने की क्षमता स्थिर रहने की संभावना है। बढ़ती आय और सरकार की सहायक नीतियों के चलते प्रॉपर्टी की ऊंची कीमतों का असर काफी हद तक संतुलित हो सकता है, जिससे मध्यम वर्ग को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

    आय बढ़ेगी, EMI का बोझ होगा कम

    रिपोर्ट ‘इंडिया रेसिडेंशियल मार्केट आउटलुक 2026’ में कहा गया है कि 2021 के बाद पहली बार ऐसा होगा जब लोगों की आय प्रॉपर्टी की कीमतों से तेज गति से बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा होम बायर्स को मिलेगा क्योंकि उनकी EMI का बोझ कम होगा और वे आसानी से घर खरीदने का फैसला ले सकेंगे।

    बड़े शहरों में दिखेगा असर

    इस रिपोर्ट में मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और पुणे जैसे प्रमुख शहरों का विश्लेषण किया गया है। 2021 से 2024 के बीच इन शहरों में प्रॉपर्टी कीमतों और ब्याज दरों में तेजी के कारण अफोर्डेबिलिटी पर दबाव बढ़ा था, लेकिन अब हालात सुधरने की उम्मीद जताई गई है।

    बदल रहा है रियल एस्टेट का ट्रेंड

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कम होती ब्याज दरें, धीमी कीमत वृद्धि और बढ़ती आय—ये तीनों मिलकर हाउसिंग डिमांड को मजबूत बनाएंगे। 2026 से 2028 के बीच EMI और आय का अनुपात स्थिर रहने से बाजार में संतुलन बनेगा और खरीदारों का भरोसा बढ़ेगा।

    प्रीमियम और लग्जरी घरों की बढ़ी मांग

    रिपोर्ट में एक और दिलचस्प ट्रेंड सामने आया है-लोग अब प्रीमियम और लग्जरी घरों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। कुल बिक्री में इनकी हिस्सेदारी करीब 27% रही, जबकि इस सेगमेंट में बिक्री सालाना आधार पर 30% से ज्यादा बढ़ी है। यह संकेत देता है कि खरीदार अब बेहतर सुविधाओं और लाइफस्टाइल को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    2030 तक और मजबूत होगा सेक्टर

    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 2030 तक अपर-मिडिल इनकम देश बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे रियल एस्टेट सेक्टर को और मजबूती मिलेगी। बढ़ती आय, शहरीकरण और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण हाउसिंग सेक्टर में लंबे समय तक ग्रोथ बनी रहने की संभावना है।

    निवेश और खरीदारों के लिए सुनहरा मौका

    कुल मिलाकर, मौजूदा परिस्थितियां घर खरीदने वालों और निवेशकों दोनों के लिए अनुकूल होती दिख रही हैं। अगर ब्याज दरें नियंत्रित रहती हैं और आय में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में घर खरीदना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान हो सकता है।

  • UN महासचिव ने भारत की अर्थव्यवस्था को सराहा… बोले- AI Summit के लिए यह उपयुक्त स्थान

    UN महासचिव ने भारत की अर्थव्यवस्था को सराहा… बोले- AI Summit के लिए यह उपयुक्त स्थान

    UN Secretary-General

    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस (UN Secretary-General Antonio Guterres) ने कहा है कि भारत (India0 वैश्विक मामलों में प्रभाव रखने वाली एक ‘बेहद सफल’ उभरती अर्थव्यवस्था है और यह एआई शिखर सम्मेलन (AI Summit) के लिए उपयुक्त स्थान है। ‘इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ (‘India-AI Impact Summit 2026’) से गुतारेस ने इस बात पर जोर दिया कि कृत्रिम मेधा (AI) से पूरी दुनिया को लाभ होना चाहिए, न कि यह केवल विकसित देशों या दो महाशक्तियों के लिए आरक्षित विशेषाधिकार हो।

    उन्होंने कहा, ‘मैं इस शिखर सम्मेलन के आयोजन के लिए भारत को हार्दिक बधाई देता हूं। यह अत्यंत आवश्यक है कि एआई का विकास हर किसी के लाभ के लिए हो और ‘ग्लोबल साउथ’ के देश भी एआई के लाभ का हिस्सा बनें।’ ‘ग्लोबल साउथ’ से तात्पर्य उन देशों से है जिन्हें अक्सर विकासशील, कम विकसित अथवा अविकसित के रूप में जाना जाता है और ये मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिका में स्थित हैं।

    यह उच्च स्तरीय कार्यक्रम 16 से 20 फरवरी तक आयोजित होने वाला है जो ‘ग्लोबल साउथ’ के किसी देश में आयोजित होने वाला पहला एआई शिखर सम्मेलन होगा और यह ‘लोग, धरती और प्रगति’ के तीन मार्गदर्शक सिद्धांतों पर आधारित है। गुतारेस शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत की यात्रा करेंगे। उन्होंने कहा कि ”यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है कि एआई केवल सर्वाधिक विकसित देशों का विशेषाधिकार हो’।

    गुतारेस की इस टिप्पणी को स्पष्ट रूप से अमेरिका और चीन पर केन्द्रित माना जा रहा है। गुतारेस ने कहा, ”यह बेहद आवश्यक है कि कृत्रिम मेधा मानव जाति के लाभ के लिए एक सार्वभौमिक साधन बने।’ उन्होंने कहा, ‘भारत की भूमिका आज एक बेहद सफल उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में है और यह न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में बल्कि वैश्विक मामलों में भी लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस शिखर सम्मेलन के आयोजन के लिए भारत बिल्कुल उपयुक्त जगह है और यह सुनिश्चित करने के लिए भी कि एआई की अपार संभावनाओं एवं इसके सभी जोखिमों के साथ इस पर गहराई से चर्चा हो क्योंकि एआई पूरी दुनिया से संबंधित है, न कि केवल कुछ लोगों से।’


    सम्मेलन में कौन से नेता लेंगे हिस्सा

    विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जिन नेताओं ने शिखर सम्मेलन में अपनी भागीदारी की पुष्टि कर दी है, जिनमें फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, स्पेन के राष्ट्रपति पेड्रो सांचेज पेरेज-कास्टेजोन, अबू धाबी के युवराज शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान, भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे और क्रोएशिया के प्रधानमंत्री आंद्रेज प्लेनकोविक शामिल हैं।

    मंत्रालय के अनुसार, एस्टोनिया के राष्ट्रपति अलार कारिस, फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो, यूनान के प्रधानमंत्री क्यारियाकोस मित्सोटाकिस, कजाकिस्तान के प्रधानमंत्री ओलझास बेक्टेनोव और मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम ने भी ‘एआई इंपैक्ट समिट’ में शामिल होने की पुष्टि की है।

  • भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो

    भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो


    नई दिल्ली ।अमेरिका में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो अगस्टिन कॉसिनो ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर बड़ा बयान दिया है। न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसकी विशाल आबादी है। उनके अनुसार भारत न केवल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है बल्कि यहां के लोगों में टैलेंट और क्रिएटिव सोच की भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

    राजदूत कॉसिनो ने कहा कि जब भारत सरकार ने पाबंदियां, सीमाएं और अनावश्यक रेगुलेशन हटाए तो भारतीय लोगों की क्षमताएं खुलकर सामने आईं। यही वजह है कि पिछले दस से पंद्रह वर्षों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसके लोग हैं और यही उसे आगे बढ़ा रही है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण पर बात करते हुए अर्जेंटीना के राजदूत ने कहा कि पीएम मोदी को बड़ी सफलता मिली है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में छह से आठ प्रतिशत की दर से बढ़ी है। उन्होंने इसे आर्थिक नीति और विनियमन में ढील का सफल उदाहरण बताया।

    कॉसिनो ने यह भी साझा किया कि जब प्रधानमंत्री मोदी अर्जेंटीना गए थे तब उन्हें राष्ट्रपति जेवियर माइली के साथ हुई बैठक में शामिल होने का अवसर मिला था। इस दौरान विनियमन में ढील अनावश्यक नियमों को हटाने और लोगों को कम से कम सरकारी हस्तक्षेप के साथ आगे बढ़ने का मौका देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी।भारत में विदेशी निवेश को लेकर पूछे गए सवाल पर राजदूत ने कहा कि वह भारत को यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि उसे क्या करना चाहिए क्योंकि यह एक घरेलू नीति का विषय है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि जब देश अपनी अर्थव्यवस्था खोलते हैं और ज्यादा उत्पादों को आने की अनुमति देते हैं तो इसका फायदा उपभोक्ताओं और घरेलू खपत दोनों को मिलता है।

    उन्होंने आगे कहा कि भारत इस दिशा में अच्छा काम कर रहा है और अर्जेंटीना भारत की खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा में और अधिक योगदान देने के लिए तैयार है। उनके अनुसार भारत और अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के लिए पूरक हैं और यह रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकती है।