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  • ITR Filing 2026: आखिरी दिन उमड़ी करदाताओं की भीड़, एक दिन में 40 लाख से ज्यादा रिटर्न जमा

    ITR Filing 2026: आखिरी दिन उमड़ी करदाताओं की भीड़, एक दिन में 40 लाख से ज्यादा रिटर्न जमा


    नई दिल्ली। आयकर रिटर्न दाखिल करने को लेकर इस साल करदाताओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला है। आयकर विभाग के अनुसार, आकलन वर्ष 2026-27 के लिए 31 जुलाई की अंतिम समय सीमा तक देशभर में 5.9 करोड़ से अधिक आयकर रिटर्न (आईटीआर) दाखिल किए गए हैं। विभाग ने समय पर रिटर्न दाखिल करने वाले सभी करदाताओं का आभार जताते हुए कहा कि समय पर किया गया कर अनुपालन देश की आर्थिक प्रगति में अहम योगदान देता है।

    आयकर विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि 31 जुलाई तक 5.9 करोड़ से ज्यादा आईटीआर दाखिल हुए हैं। विभाग ने करदाताओं के विश्वास और समय पर अनुपालन को भारत की विकास यात्रा को गति देने वाला कदम बताया।

    आंकड़ों के मुताबिक, आईटीआर दाखिल करने की अंतिम तारीख यानी 31 जुलाई को ही 40 लाख से ज्यादा रिटर्न जमा किए गए। यह तारीख उन व्यक्तिगत करदाताओं और ऐसी संस्थाओं के लिए निर्धारित थी, जिन्हें अपने खातों का अनिवार्य ऑडिट नहीं कराना होता है।

    अंतिम दिनों में तेजी से बढ़ी रिटर्न फाइलिंग की रफ्तार

    इस साल आईटीआर दाखिल करने की रफ्तार अंतिम कुछ हफ्तों में काफी तेज रही। आयकर विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 11 जुलाई तक 1.7 करोड़ से अधिक रिटर्न दाखिल हो चुके थे। इसके बाद 22 जुलाई तक यह संख्या बढ़कर 3 करोड़ के पार पहुंच गई।

    27 जुलाई तक 4 करोड़ से ज्यादा आईटीआर दाखिल किए गए, जबकि 31 जुलाई को यह आंकड़ा तेजी से बढ़ते हुए 5 करोड़ के पार पहुंच गया। दिन खत्म होने से पहले रिटर्न की संख्या 5.5 करोड़ से ज्यादा हो गई और आखिरकार यह आंकड़ा 5.9 करोड़ के स्तर को पार कर गया।

    करदाताओं से पहले ही रिटर्न दाखिल करने की अपील

    आयकर विभाग लगातार करदाताओं से अपील करता रहा कि वे अंतिम तारीख का इंतजार न करें और समय रहते अपना रिटर्न दाखिल कर दें। विभाग का कहना था कि आखिरी समय में ई-फाइलिंग पोर्टल पर अधिक ट्रैफिक के कारण तकनीकी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। समय पर रिटर्न दाखिल करने से करदाताओं को जुर्माने और अन्य परेशानियों से बचने में मदद मिलती है। साथ ही, टैक्स व्यवस्था भी अधिक सुचारू रूप से संचालित होती है।

    आईटीआर फॉर्म में किए गए बदलाव

    आकलन वर्ष 2026-27 के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने संशोधित आईटीआर फॉर्म जारी किए थे। इनमें दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ, शेयर बायबैक से होने वाले नुकसान, कुछ ट्रेडिंग लेनदेन और अन्य वित्तीय जानकारियों के खुलासे से जुड़े नए प्रावधान शामिल किए गए हैं।

    इन बदलावों का उद्देश्य टैक्स प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना और करदाताओं के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान बनाना है। नए प्रावधानों के जरिए आय और निवेश से जुड़ी जानकारियों को अधिक स्पष्ट तरीके से दर्ज किया जा सकेगा।

    पिछले साल भी बढ़ा था टैक्स अनुपालन

    पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में भी आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में बड़ा इजाफा देखने को मिला था। उस दौरान 9 करोड़ से अधिक करदाताओं ने अपना आईटीआर दाखिल किया था। इसी अवधि में आयकर विभाग ने 4.35 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का टैक्स रिफंड जारी किया था। यह आंकड़ा देश में प्रत्यक्ष कर व्यवस्था के बढ़ते विस्तार और आयकर विभाग की कार्यक्षमता को दर्शाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती आईटीआर फाइलिंग से देश में टैक्स अनुपालन की संस्कृति मजबूत हो रही है। डिजिटल माध्यम से आसान हुई प्रक्रिया और आयकर विभाग की ऑनलाइन सेवाओं ने भी करदाताओं को समय पर रिटर्न दाखिल करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

  • UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार

    UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार


    नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन दर्ज किया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में यूपीआई के माध्यम से किए गए लेनदेन की संख्या में सालाना आधार पर 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान कुल 23.66 अरब यानी 2366 करोड़ से ज्यादा यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए। वहीं, इन डिजिटल लेनदेन का कुल मूल्य 19 प्रतिशत बढ़कर 29.88 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई महीने में हर दिन औसतन 76.3 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन किए गए। वहीं, प्रतिदिन औसतन 96,383 करोड़ रुपए का डिजिटल भुगतान यूपीआई प्लेटफॉर्म के जरिए हुआ। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में लोग तेजी से नकदी आधारित भुगतान से डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ रहे हैं।

    इससे पहले जून 2026 में भी यूपीआई ने शानदार प्रदर्शन किया था। जून में यूपीआई के जरिए 22.72 अरब ट्रांजैक्शन हुए थे, जो पिछले साल की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक थे। इस दौरान कुल लेनदेन राशि 28.92 लाख करोड़ रुपए रही थी। जून में रोजाना औसतन 75.7 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए थे।

    सरकार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2021-22 में यूपीआई के जरिए 4,595.61 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे, जिनका कुल मूल्य 84.16 लाख करोड़ रुपए था। इसके बाद वित्त वर्ष 2022-23 में लेनदेन की संख्या बढ़कर 8,371.44 करोड़ और कुल मूल्य 139.15 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया।

    वित्त वर्ष 2023-24 में यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या 13,112.95 करोड़ रही, जबकि कुल लेनदेन मूल्य 199.95 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में यूपीआई के जरिए 18,586.60 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए और इनका कुल मूल्य बढ़कर 260.56 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    डिजिटल भुगतान के इस विस्तार को भारत की वित्तीय समावेशन नीति की बड़ी सफलता माना जा रहा है। यूपीआई ने छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े कारोबारियों तक भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाया है। मोबाइल फोन के जरिए कुछ सेकंड में होने वाले भुगतान ने देश में डिजिटल लेनदेन की संस्कृति को तेजी से बढ़ावा दिया है।

    वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने हाल ही में लोकसभा में बताया था कि एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल) भारत की डिजिटल भुगतान तकनीक को दुनिया के अन्य देशों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रही है। एनआईपीएल कई देशों के साथ साझेदारी कर भारतीय भुगतान प्रणाली के वैश्विक विस्तार को बढ़ावा दे रही है।

    इन अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के चलते भारतीय नागरिक विदेशों में भी यूपीआई आधारित भुगतान कर पा रहे हैं। साथ ही, अन्य देशों को भी रियल टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित करने में मदद मिल रही है। वर्तमान में यूपीआई संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, फ्रांस, मॉरीशस और श्रीलंका समेत आठ से अधिक देशों में उपलब्ध है।

    तेजी से बढ़ते यूपीआई उपयोग से साफ है कि भारत डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में अपनी मजबूत स्थिति बना रहा है। आने वाले समय में यूपीआई के और अधिक देशों तक विस्तार की संभावना है, जिससे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।

  • मिडिल ईस्ट तनाव से तेल बाजार में हड़कंप 100 डॉलर की ओर बढ़ता क्रूड भारत के लिए क्यों बना चिंता का कारण

    मिडिल ईस्ट तनाव से तेल बाजार में हड़कंप 100 डॉलर की ओर बढ़ता क्रूड भारत के लिए क्यों बना चिंता का कारण


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते भू राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल दर्ज किया जा रहा है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा रेड सी क्षेत्र में तेल टैंकरों पर बढ़ते हमलों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है और विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगातार मजबूत बना हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका के चलते निवेशक तेजी से खरीदारी कर रहे हैं। कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने भी चेतावनी दी है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

    तेल की कीमतों में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ता तनाव माना जा रहा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसके अलावा रेड सी में जहाजों पर बढ़ते हमलों ने भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल परिवहन को प्रभावित किया है जिससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।

    भारत के लिए यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर आयात बिल पर पड़ता है। यदि लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा बना रहता है तो सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है और पेट्रोल तथा डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना भी मजबूत हो जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चा तेल 95 से 120 डॉलर प्रति बैरल के बीच लंबे समय तक बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल के दाम में प्रति लीटर पांच से आठ रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे केवल वाहन चालकों की जेब पर असर नहीं पड़ेगा बल्कि माल ढुलाई की लागत बढ़ने से फल सब्जियां दूध अनाज और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। इसका असर खुदरा महंगाई पर भी देखने को मिल सकता है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल अंतरराष्ट्रीय हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं तो आने वाले दिनों में आम लोगों को ईंधन और रोजमर्रा की वस्तुओं पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है।

    फिलहाल बाजार की नजर मिडिल ईस्ट की स्थिति और वैश्विक तेल आपूर्ति पर टिकी हुई है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या फिर नया रिकॉर्ड बनाती हैं।

  • भारत बनेगा वैश्विक निवेश का अगला बड़ा केंद्र, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और टेक्नोलॉजी बना रहे मजबूत बाजार

    भारत बनेगा वैश्विक निवेश का अगला बड़ा केंद्र, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और टेक्नोलॉजी बना रहे मजबूत बाजार


    नई दिल्ली ।चीन के डालियान में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक ‘न्यू चैंपियंस’ यानी समर दावोस के दौरान भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर सकारात्मक संदेश सामने आया है। नॉर्वे की प्रमुख बायोटेक्नोलॉजी कंपनी एकर बायोमरीन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैट्स जोहानसन ने भारत को दुनिया के सबसे मजबूत और आकर्षक दीर्घकालिक बाजारों में से एक बताते हुए कहा कि देश की विशाल आबादी, तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग और नई तकनीकों को तेजी से अपनाने की क्षमता भविष्य की आर्थिक सफलता का मजबूत आधार तैयार कर रही है।

    आईएएनएस से बातचीत में जोहानसन ने कहा कि भारत उन देशों में शामिल है जहां दीर्घकालिक निवेश और कारोबारी विस्तार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। उनके अनुसार भारत केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार ही नहीं है बल्कि नवाचार और तकनीकी बदलावों को स्वीकार करने की असाधारण क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि वैश्विक कंपनियां भारत को भविष्य के विकास इंजन के रूप में देख रही हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी आबादी और लगातार बढ़ती क्रय शक्ति वाला मध्यम वर्ग आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा दे रहा है। इसके साथ ही डिजिटल तकनीक और नवाचार को अपनाने की रफ्तार भी दुनिया के कई देशों से बेहतर है। इन सभी कारकों के कारण भारत आने वाले वर्षों में भी वैश्विक निवेशकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बाजार बना रहेगा।

    भारत के प्रति अपनी कंपनी की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए जोहानसन ने बताया कि एकर बायोमरीन देश में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। कंपनी मुंबई में नया कार्यालय खोलने की तैयारी कर रही है ताकि भारतीय बाजार में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और अधिक बढ़ने वाली है।

    उन्होंने बताया कि एकर बायोमरीन लंबे समय से भारतीय झींगा पालन उद्योग को आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा रही है। भारत का श्रिम्प फार्मिंग सेक्टर दुनिया के प्रमुख एक्वाकल्चर बाजारों में शामिल है और इस क्षेत्र में कंपनी की मजबूत भागीदारी रही है। अब कंपनी केवल जलीय कृषि तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि खाद्य उत्पादों और मानव स्वास्थ्य से जुड़े पोषण सप्लीमेंट्स के क्षेत्र में भी भारतीय बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की योजना बना रही है।

    मैट्स जोहानसन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में एआई वैश्विक अर्थव्यवस्था और उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारक बन सकता है। उनके मुताबिक एआई का उपयोग केवल उत्पादन इकाइयों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि बिक्री, विपणन, वित्तीय प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में भी बड़े बदलाव लाएगा।

    उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी एआई को अपनी पूरी वैल्यू चेन में शामिल करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इससे न केवल दक्षता बढ़ेगी बल्कि लागत में कमी और बेहतर निर्णय लेने में भी मदद मिलेगी। जोहानसन का मानना है कि एआई वैश्विक आर्थिक विकास का नया इंजन बनने जा रहा है और जो कंपनियां इसे तेजी से अपनाएंगी वे भविष्य में प्रतिस्पर्धा में आगे रहेंगी।

    गौरतलब है कि 23 जून से शुरू हुआ समर दावोस सम्मेलन 25 जून तक चलेगा। इस वैश्विक मंच पर दुनिया भर के उद्योग जगत के दिग्गज, नीति निर्माता, शिक्षाविद और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि नवाचार, उद्यमिता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक विकास के भविष्य पर मंथन कर रहे हैं। भारत को लेकर व्यक्त किए गए सकारात्मक विचार एक बार फिर यह संकेत देते हैं कि वैश्विक निवेशकों की नजर में देश की आर्थिक संभावनाएं लगातार मजबूत होती जा रही हैं।

  • भारत की विकास यात्रा को मिलेगी नई रफ्तार: कृषि और टेक्नोलॉजी बनेंगे अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन

    भारत की विकास यात्रा को मिलेगी नई रफ्तार: कृषि और टेक्नोलॉजी बनेंगे अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े इंजन


    नई दिल्ली । दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत आने वाले वर्षों में भी अपनी विकास गति बनाए रखेगा। चीन के डालियान शहर में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एनुअल न्यू चैंपियंस मीटिंग यानी समर दावोस में वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की आर्थिक क्षमता पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश के विकास को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में कृषि और टेक्नोलॉजी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत न केवल वैश्विक विकास दर में महत्वपूर्ण योगदान देगा बल्कि नवाचार और डिजिटल परिवर्तन के जरिए नई आर्थिक संभावनाओं का केंद्र भी बनेगा।

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मैनेजिंग डायरेक्टर मिरेक डुसेक ने भारत को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बताते हुए कहा कि आने वाले वर्षों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ती रहेगी। उनके अनुसार भारत वैश्विक आर्थिक वृद्धि का एक प्रमुख आधार बन चुका है और इसकी विकास यात्रा दुनिया भर के निवेशकों और नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित कर रही है।

    डुसेक ने कहा कि समर दावोस का उद्देश्य दुनिया भर के इनोवेटर्स, टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के नेताओं को एक मंच पर लाकर वैश्विक चुनौतियों के समाधान तलाशना है। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी उभरती तकनीकें न केवल उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेंगी बल्कि वैश्विक आर्थिक विकास को भी नई दिशा देंगी।

    वहीं पद्मश्री से सम्मानित और ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसर रतन लाल ने भारत की कृषि क्षमता को देश की आर्थिक ताकत का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस लक्ष्य को हासिल करने में कृषि क्षेत्र की बड़ी भूमिका होगी।

    प्रोफेसर रतन लाल ने कहा कि खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए मिट्टी की सेहत सुधारना और भूमि के टिकाऊ प्रबंधन को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक संसाधनों का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीकें भारतीय कृषि में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। इन तकनीकों की मदद से मिट्टी की जांच पहले की तुलना में अधिक तेज, सस्ती और सटीक हो सकेगी। इससे किसानों को अपनी जमीन और फसल की जरूरतों के अनुरूप सही निर्णय लेने में मदद मिलेगी, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और लागत कम होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की युवा आबादी, तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा, तकनीकी नवाचार और मजबूत कृषि आधार देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। समर दावोस में हुई चर्चाओं से यह स्पष्ट संकेत मिला कि भविष्य की भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार केवल उद्योग और सेवाएं नहीं बल्कि आधुनिक तकनीक से सशक्त कृषि भी होगी। यही संयोजन भारत को आने वाले दशक में वैश्विक विकास का सबसे बड़ा केंद्र बना सकता है।

  • भारत का मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई में बढ़कर 55 पर, नए ऑर्डर और उत्पादन में तेज़ी से उद्योग गतिविधियों में मजबूती

    भारत का मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई में बढ़कर 55 पर, नए ऑर्डर और उत्पादन में तेज़ी से उद्योग गतिविधियों में मजबूती

    नई दिल्ली । मई में भारत के विनिर्माण क्षेत्र ने मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है, जिसमें एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई के ताजा आंकड़ों के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 55.0 के स्तर पर पहुंच गया है। यह अप्रैल के 54.7 और शुरुआती अनुमान 54.3 से अधिक है, जो औद्योगिक गतिविधियों में लगातार सुधार का संकेत देता है। नए ऑर्डरों, उत्पादन गतिविधियों और खरीद में आई तेज़ वृद्धि ने इस सुधार को प्रमुख रूप से समर्थन दिया है, जिसके चलते कंपनियों ने भविष्य की मांग को देखते हुए स्टॉक जमा करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है।

    रिपोर्ट के अनुसार मई का प्रदर्शन पिछले तीन महीनों में सबसे मजबूत माना जा रहा है, जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर और व्यापक रिकवरी की ओर इशारा करता है। देश के कई हिस्सों, जिनमें मध्य प्रदेश सहित विभिन्न औद्योगिक केंद्र शामिल हैं, वहां भी उत्पादन गतिविधियों में सुधार का रुझान देखा गया है।

    सर्वेक्षण के अनुसार इंटरमीडिएट और कैपिटल गुड्स सेगमेंट में वृद्धि उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र की तुलना में अधिक तेज रही, जिससे औद्योगिक उत्पादन के बुनियादी ढांचे को मजबूती मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू मांग इस वृद्धि का मुख्य आधार बनी हुई है, जबकि निर्यात ऑर्डरों की वृद्धि दर कुछ धीमी जरूर हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों से नए ऑर्डरों की लगातार प्राप्ति ने संतुलन बनाए रखा है।

    एशिया, यूरोप और अफ्रीका के कुछ देशों से भी भारतीय उत्पादों की मांग बनी हुई है, जिससे निर्यात आधारित गतिविधियों को समर्थन मिला है। लागत के मोर्चे पर कच्चे माल, ऊर्जा, ईंधन और परिवहन खर्चों में वृद्धि दर्ज की गई है, जो पिछले कई महीनों की तुलना में अधिक है। यह वृद्धि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव का परिणाम मानी जा रही है।

    हालांकि तैयार उत्पादों की कीमतों में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है, जिससे कंपनियों के लाभ मार्जिन पर कुछ दबाव बनने की संभावना जताई जा रही है। उत्पादन और नए ऑर्डरों में आई तेज़ी फरवरी के बाद सबसे अधिक दर्ज की गई है, जो यह दर्शाती है कि उद्योगों में मांग का स्तर मजबूत बना हुआ है।

    उद्योग जगत के अनुसार यह रुझान आने वाले महीनों में भी जारी रह सकता है, क्योंकि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश और निर्माण गतिविधियों में वृद्धि से औद्योगिक मांग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों का विश्वास स्तर भी मजबूत बना हुआ है, जो उत्पादन क्षमता विस्तार और नई भर्तियों की संभावनाओं को बढ़ा रहा है।

    हालांकि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण लागत दबाव बना रह सकता है, लेकिन घरेलू मांग इस दबाव को काफी हद तक संतुलित कर रही है। कुल मिलाकर मई के पीएमआई आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र स्थिर गति से विस्तार कर रहा है और आर्थिक गतिविधियों में मजबूती के संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिससे निवेश और उत्पादन दोनों को सकारात्मक दिशा मिल रही है।

  • उत्तर प्रदेश अब बदल चुका है, पीछे नहीं लौटेगा: सीएम योगी ने निवेश और विकास का नया विजन रखा सामने

    उत्तर प्रदेश अब बदल चुका है, पीछे नहीं लौटेगा: सीएम योगी ने निवेश और विकास का नया विजन रखा सामने


    नई दिल्ली । 
    दिल्ली में आयोजित एक बड़े औद्योगिक और निवेश मंच पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य के भविष्य को लेकर एक नया और आत्मविश्वास से भरा विजन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब उत्तर प्रदेश को केवल सुधार की प्रक्रिया में नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे बुलेट ट्रेन जैसी तेज रफ्तार के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। उनके अनुसार, राज्य ने अब तक जिन कमजोरियों को पीछे छोड़ा है, उनके स्थान पर मजबूत विकास की नींव खड़ी कर दी गई है।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य की असली ताकत उसके उद्योग, निवेश और उत्पादन क्षमता में होती है। जब उद्योग मजबूत होते हैं तो रोजगार के अवसर अपने आप बढ़ते हैं और अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की ताकत केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया को स्थिरता और विकास का नया मार्ग दिखाने की क्षमता भी रखता है।

    अपने भाषण में उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुराने हालातों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक राज्य की स्थिति ऐसी थी कि विकास की रफ्तार धीमी थी और लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती थी। उन्होंने कहा कि उस समय सड़कों की स्थिति, कानून व्यवस्था की चुनौतियां और औद्योगिक माहौल की कमजोरी के कारण निवेश प्रभावित होता था और लोग राज्य से बाहर जाने को मजबूर होते थे।

    सीएम योगी ने कहा कि सरकार ने सबसे पहले प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा प्रणाली को मजबूत किया। उनका मानना है कि विकास की पहली शर्त एक सुरक्षित माहौल है। उन्होंने बताया कि कानून व्यवस्था को सख्ती से लागू किया गया और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाया गया। इसके साथ ही नीतिगत स्तर पर कई बड़े बदलाव किए गए ताकि निवेशकों का भरोसा बढ़ सके।

    उन्होंने यह भी बताया कि उनके नेतृत्व का तरीका अनुशासन और संगठनात्मक प्रबंधन पर आधारित रहा है, जिसे उन्होंने अपने पहले के अनुभवों से सीखा और शासन व्यवस्था में लागू किया। इसके परिणामस्वरूप सरकारी कामकाज में तेजी आई और निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी हुई।

    विकास की दिशा में उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए मजबूत ढांचा तैयार किया गया है। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं लागू की गई हैं, जिससे छोटे और मध्यम उद्योगों को नई पहचान मिली है। आज यह सेक्टर लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है और राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश अब केवल सुधार की कहानी नहीं है, बल्कि यह बदलाव और प्रगति का उदाहरण बन रहा है। राज्य में पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहरों को भी वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को और मजबूती मिल रही है।

    अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश अब पीछे मुड़ने वाला नहीं है। राज्य को अब एक ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ाया जा रहा है जहां गति, निवेश, सुरक्षा और विकास साथ-साथ चलेंगे। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने वाले राज्यों में शामिल होगा।

  • 1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत

    1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत



    नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा।

    कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?
    1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था
    इन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था।

    क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?
    संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई।

    कितना सोना इस्तेमाल हुआ?
    रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

    किसने संभाली जिम्मेदारी?
    इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले।

    कैसे भेजा गया सोना?
    मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया

    इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया

    इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली

    क्या मिला फायदा?
    इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

  • दो दिन में 97 लाख से ज्यादा LPG सिलेंडर की डिलीवरी, ऑनलाइन बुकिंग 99% तक पहुंची: सरकार

    दो दिन में 97 लाख से ज्यादा LPG सिलेंडर की डिलीवरी, ऑनलाइन बुकिंग 99% तक पहुंची: सरकार


    नई दिल्ली।  पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने शुक्रवार को जानकारी दी कि देश में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई पूरी तरह से सामान्य और सुचारू बनी हुई है। मंत्रालय के अनुसार, पिछले दो दिनों में करीब 87.66 लाख सिलेंडर की बुकिंग के मुकाबले 97 लाख से अधिक सिलेंडर की डिलीवरी की गई है।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब एलपीजी की ऑनलाइन बुकिंग का स्तर बढ़कर लगभग 99 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो डिजिटल प्रणाली की ओर बढ़ते उपभोक्ता व्यवहार को दर्शाता है। मंत्रालय ने बताया कि उपभोक्ताओं को रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे गए ऑथेंटिकेशन कोड के आधार पर लगभग 95 प्रतिशत डिलीवरी सुनिश्चित की जा रही है, जिससे डिस्ट्रीब्यूटर स्तर पर किसी भी तरह की गड़बड़ी या हेराफेरी को रोका जा सके।

    पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता के बावजूद देश में एलपीजी सप्लाई पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा है और किसी भी रिटेल गैस एजेंसी पर स्टॉक खत्म होने जैसी स्थिति नहीं देखी गई है।

    इसके अलावा, पिछले दो दिनों में 1.11 लाख छोटे 5 किलोग्राम वाले सिलेंडरों की भी बिक्री हुई है। सरकार के अनुसार, यह छोटे सिलेंडर खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों और छोटे उपभोक्ताओं के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं।

    सरकारी तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम लगातार एलपीजी वितरण व्यवस्था को मजबूत करने में लगी हुई हैं। साथ ही कमर्शियल एलपीजी की बिक्री भी पिछले दो दिनों में 15,493 मीट्रिक टन से अधिक दर्ज की गई, जो लगभग 8.15 लाख 19 किलो वाले सिलेंडरों के बराबर है।

    मंत्रालय ने यह भी बताया कि देश में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन का विस्तार तेजी से हो रहा है। अब तक करीब 6.5 लाख कनेक्शनों में गैस सप्लाई शुरू हो चुकी है, जबकि कुल कनेक्शन संख्या 9.16 लाख तक पहुंच गई है। इसके अलावा, 7.08 लाख नए उपभोक्ताओं ने कनेक्शन के लिए आवेदन किया है।

    सरकार ने बताया कि एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए देशभर में सख्त कार्रवाई की जा रही है। हाल ही में 2,000 से अधिक जगहों पर छापेमारी की गई, जिसमें 378 डिस्ट्रीब्यूटरों पर जुर्माना लगाया गया और 76 एजेंसियों को निलंबित किया गया।

    पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। सभी सरकारी तेल कंपनियों के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं।

    सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें और घबराकर अतिरिक्त खरीदारी न करें। साथ ही उपभोक्ताओं को डिजिटल माध्यम से बुकिंग करने और गैस एजेंसियों पर अनावश्यक भीड़ से बचने की सलाह दी गई है।

  • तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल

    तेल कोटे पर टकराव के बाद यूएई का बड़ा फैसला, ओपेक से बाहर निकलने से दुनिया में हलचल


    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ा बदलाव सामने आया है जहां United Arab Emirates ने 1 मई से OPEC से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खासतौर पर भारत जैसे आयातक देशों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।

    भारत के पूर्व राजदूत Navdeep Singh Suri के मुताबिक यूएई का यह फैसला अचानक नहीं है बल्कि पिछले पांच वर्षों से इसकी तैयारी चल रही थी। उनका कहना है कि यूएई लंबे समय से ओपेक द्वारा तय किए गए उत्पादन कोटे से असंतुष्ट था। शुरुआत में उसे करीब 2.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन की अनुमति थी जिसे बाद में बढ़ाकर 3.4 मिलियन बैरल किया गया लेकिन यह भी उसकी बढ़ती क्षमता के अनुरूप नहीं था।

    सूरी ने बताया कि यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी तेल उत्पादन क्षमता में भारी निवेश किया है और वह जल्द ही 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन करने की स्थिति में पहुंच सकता है। ऐसे में वह ओपेक के कड़े नियमों और सऊदी अरब के प्रभाव वाले फैसलों से मुक्त होकर अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चाहता है। यही वजह है कि उसने स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

    हालांकि इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत देखने को मिल सकता है। मौजूदा समय में Strait of Hormuz में तनाव और रुकावट के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है जिससे कीमतें 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर होना बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आने वाले समय में होर्मुज स्ट्रेट में स्थिति सामान्य होती है और तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से शुरू हो जाती है तो यूएई का अतिरिक्त उत्पादन वैश्विक बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इससे भारत जैसे देशों को राहत मिल सकती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं।

    लेकिन दूसरी ओर एक बड़ा खतरा भी सामने आता है। ओपेक लंबे समय से तेल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है जिससे कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। यदि यूएई जैसे बड़े उत्पादक देश इस संगठन से बाहर निकलते हैं तो ओपेक की पकड़ कमजोर हो सकती है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच Iran और United States के बीच जारी तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। पूर्व राजदूत सूरी ने स्पष्ट कहा कि इन हालातों का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। उनका मानना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और आपूर्ति में रुकावट वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।

    कुल मिलाकर यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देश इस फैसले के बाद क्या रणनीति अपनाते हैं और बाजार किस दिशा में आगे बढ़ता है।