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  • नरेंद्र मोदी ने बनाया नया इतिहास भारत में सबसे लंबे समय तक सरकार प्रमुख रहने का रिकॉर्ड

    नरेंद्र मोदी ने बनाया नया इतिहास भारत में सबसे लंबे समय तक सरकार प्रमुख रहने का रिकॉर्ड

    नई दिल्ली: भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की गई है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में सबसे लंबे समय तक निर्वाचित सरकार के प्रमुख रहने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है इस उपलब्धि के साथ उन्होंने सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया है

    पवन कुमार चामलिंग ने मुख्यमंत्री के रूप में 8930 दिनों तक कार्य किया था जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को मिलाकर 8931 दिनों का आंकड़ा पार कर लिया है यह उपलब्धि उनके लंबे राजनीतिक अनुभव निरंतर जनसमर्थन और नेतृत्व क्षमता को दर्शाती है

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत एक संगठनात्मक कार्यकर्ता के रूप में की थी उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की वर्ष 1985 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

    7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला इसके बाद वे लगातार चार बार 2001 2002 2007 और 2012 में मुख्यमंत्री बने और लगभग 12 साल 7 महीने तक राज्य का नेतृत्व किया उनके कार्यकाल को विकास और प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है

    वर्ष 2014 में वे पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने और तब से लगातार इस पद पर बने हुए हैं उन्होंने 2014 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की और इस तरह वे लगातार तीन बार चुनाव जीतने वाले पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने

    प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में कई बड़े फैसले और योजनाएं लागू की गईं जिनका उद्देश्य देश के विकास और सामाजिक सुधार को गति देना रहा उनके नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी स्थिति को मजबूत किया

    यह उपलब्धि केवल आंकड़ों का रिकॉर्ड नहीं है बल्कि यह उनके लंबे राजनीतिक जीवन निरंतरता और देश के प्रति समर्पण का प्रतीक है यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र में स्थिर नेतृत्व और जनता का विश्वास कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

  • रिटायरमेंट से पहले ‘छक्के’ मारने की प्रवृत्ति चिंताजनक: CJI सूर्यकांत की न्यायपालिका को सख्त चेतावनी

    रिटायरमेंट से पहले ‘छक्के’ मारने की प्रवृत्ति चिंताजनक: CJI सूर्यकांत की न्यायपालिका को सख्त चेतावनी


    नई दिल्ली
    ।न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख दिखाया है। बुधवार, 17 दिसंबर 2025, को एक अहम सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत ने रिटायरमेंट से ठीक पहले कुछ न्यायिक अधिकारियों द्वारा पारित किए जा रहे विवादित आदेशों को लेकर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने इस प्रवृत्ति की तुलना क्रिकेट के आखिरी ओवर में लगाए जाने वाले छक्कों से करते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक करार दिया।

    यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है – CJ
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    सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के एक जिला जज की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिन्हें रिटायरमेंट से महज 10 दिन पहले दो विवादित आदेश पारित करने के आरोप में निलंबित कर दिया गया था। इस मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ कर रही थी।

    CJI ने टिप्पणी करते हुए कहा

    कुछ न्यायिक अधिकारी सेवानिवृत्ति से पहले ऐसे आदेश पारित करने लगते हैं मानो वे क्रिकेट मैच के आखिरी ओवर में छक्के मार रहे हों। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंता का विषय है।

    गलत आदेश बनाम बेईमानी – फर्क जरूरी

    हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर गलत न्यायिक आदेश कदाचार नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में किसी जज को केवल इसलिए निलंबित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका आदेश गलत पाया गया हो, क्योंकि ऐसे आदेशों को अपील या उच्च अदालत के जरिए सुधारा जा सकता है।

    लेकिन CJI ने एक अहम सवाल उठाया-

    अगर कोई आदेश स्पष्ट रूप से बेईमानी, पक्षपात या बाहरी हितों से प्रेरित हो, तो क्या उसे सिर्फ एक  गलती माना जा सकता है? यही सवाल इस पूरे मामले का केंद्र रहा।

    जज का पक्ष: बेदाग रिकॉर्ड का दावा

    मध्य प्रदेश के संबंधित जिला जज 30 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे, लेकिन 19 नवंबर को उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के चलते राज्य में जजों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई, जिससे उनका कार्यकाल एक साल और बढ़ गया। जज की ओर से सीनियर एडवोकेट विपिन सांघी ने दलील दी कि उनका पूरा सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा है और उन्हें हमेशा सकारात्मक वार्षिक मूल्यांकन मिले हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ न्यायिक आदेशों के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करना न्यायिक स्वतंत्रता के खिलाफ है।

    सुप्रीम कोर्ट का संतुलित रुख

    सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से आंशिक सहमति जताई कि न्यायिक त्रुटि और कदाचार के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने सीधे तौर पर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और जज को पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निलंबन से जुड़ी जानकारियां RTI के जरिए मांगना उचित तरीका नहीं है, खासकर जब मामला वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी से जुड़ा हो। ऐसे मामलों में संस्थागत प्रक्रियाओं और अभ्यावेदन का सहारा लिया जाना चाहिए।

    न्यायपालिका की साख पर बड़ा संदेश

    CJI सूर्यकांत की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे न्यायिक तंत्र के लिए एक स्पष्ट संदेश है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि न्यायिक स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन उसके साथ ईमानदारी और जवाबदेही भी उतनी ही अहम है।यह फैसला और टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर आत्ममंथन की जरूरत को रेखांकित करती है। रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके न्यायिक अधिकारियों से अपेक्षा है कि वे अपने पद की गरिमा और निष्पक्षता को आखिरी दिन तक बनाए रखें, क्योंकि न्यायपालिका की साख किसी एक आदेश से भी प्रभावित हो सकती है।