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  • भोपाल में दिखेगा सेना का शौर्य, आर्मी डे परेड में पहली बार सड़कों पर उतरेंगे टैंक; 50 हजार दर्शकों के लिए खास इंतजाम

    भोपाल में दिखेगा सेना का शौर्य, आर्मी डे परेड में पहली बार सड़कों पर उतरेंगे टैंक; 50 हजार दर्शकों के लिए खास इंतजाम


    भोपाल । भोपाल में देश की सैन्य ताकत और शौर्य का ऐसा नजारा पहली बार देखने को मिलेगा जब सेना के भारी-भरकम टैंक शहर की सड़कों पर अपनी ताकत और क्षमता का प्रदर्शन करते नजर आएंगे। 15 जनवरी 2027 को आर्मी डे के मौके पर होने वाली विशेष परेड के लिए तैयारियां तेज हो गई हैं। इस ऐतिहासिक आयोजन को करीब 50 हजार दर्शकों के देखने की उम्मीद है। खास बात यह है कि भोपाल में पहली बार आर्मी डे परेड किसी सैन्य कैंटोनमेंट के भीतर नहीं बल्कि आम लोगों के बीच सार्वजनिक क्षेत्र में आयोजित की जाएगी।

    आर्मी डे परेड 2027 के लिए भोपाल का चयन इसी साल मार्च में किया गया था। इसके बाद से ही प्रशासन और सेना के स्तर पर आयोजन को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई थीं। शनिवार को सेना भोपाल पुलिस जिला प्रशासन बिजली कंपनी लोक निर्माण विभाग भेल और सीपीए के अधिकारियों ने प्रस्तावित परेड मार्ग और आयोजन स्थल का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने गोविंदपुरा थाने से जंबूरी मैदान तक जाने वाली सड़क का जायजा लिया और सैन्य वाहनों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए जरूरी बदलावों पर चर्चा की।

    एडीएम महेंद्र कपचे के नेतृत्व में अधिकारियों ने पूरे मार्ग का निरीक्षण किया। गोविंदपुरा थाने से जंबूरी मैदान तक करीब 2.4 किलोमीटर लंबे मार्ग को विशेष रूप से तैयार किया जाएगा। इस सड़क की चौड़ाई बढ़ाकर करीब 15 मीटर की जाएगी। भारी सैन्य टैंकों और अन्य सैन्य वाहनों की आवाजाही को देखते हुए सड़क की मजबूती बढ़ाने का काम भी किया जाएगा। पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर एससी वर्मा के मुताबिक सड़क को इस तरह मजबूत किया जाएगा कि भारी वजन वाले सैन्य टैंकों का दबाव आसानी से सह सके।

    परेड को देखने आने वाले लोगों के लिए भी विशेष इंतजाम किए जाएंगे। सड़क के दोनों ओर करीब 50 हजार दर्शकों के बैठने की व्यवस्था की जाएगी। प्रशासन की कोशिश है कि बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने के बावजूद आयोजन स्थल पर सुरक्षा और यातायात व्यवस्था सुचारु बनी रहे। इसी वजह से पूरे मार्ग को पहले से चिन्हित कर आवश्यक बदलाव किए जा रहे हैं।

    आयोजन के दौरान सड़क पर स्पीड ब्रेकर नहीं होंगे ताकि टैंक और सैन्य वाहनों की आवाजाही में किसी तरह की बाधा न आए। इसके अलावा मार्ग में आने वाले कुछ बिजली के पोल और पेड़ों को भी हटाया जाएगा। सैन्य वाहनों की पार्किंग के लिए नटराज-हेमा स्कूल मार्ग को निर्धारित किया गया है। इससे मुख्य परेड मार्ग पर भीड़ और वाहनों का दबाव कम रखने में मदद मिलेगी।

    भोपाल में होने वाला यह आयोजन इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि आम नागरिकों को सेना के अत्याधुनिक टैंकों और सैन्य वाहनों को करीब से देखने का अवसर मिलेगा। आमतौर पर आर्मी डे परेड सैन्य कैंटोनमेंट क्षेत्रों में आयोजित होती रही है लेकिन 2027 में भोपाल में इसे सार्वजनिक क्षेत्र में आयोजित करने का फैसला किया गया है। इससे शहरवासियों के बीच सेना के प्रति जुड़ाव और गौरव की भावना को और मजबूत करने की उम्मीद है।

    आयोजन को सफल बनाने के लिए सेना और स्थानीय प्रशासन के बीच लगातार समन्वय किया जा रहा है। सड़क की मजबूती से लेकर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था यातायात प्रबंधन बिजली व्यवस्था और सुरक्षा तक हर पहलू पर तैयारी की जा रही है। आने वाले दिनों में परेड मार्ग पर निर्माण और सुधार कार्य तेज होने की संभावना है। 15 जनवरी 2027 को भोपाल में होने वाला आर्मी डे समारोह शहर के लिए एक ऐतिहासिक अवसर होगा जब राजधानी की सड़कों पर पहली बार सेना के टैंक अपनी ताकत का प्रदर्शन करते दिखाई देंगे और हजारों लोग इस भव्य सैन्य आयोजन के गवाह बनेंगे।

  • वीर सपूत को इंदौर का सलाम, मेजर हमजा आरिफ को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, हर आंख हुई नम

    वीर सपूत को इंदौर का सलाम, मेजर हमजा आरिफ को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, हर आंख हुई नम


    इंदौर  इंदौर ने रविवार को अपने वीर सपूत मेजर हमजा आरिफ को पूरे सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी। एक महीने पहले जिस घर में शादी की खुशियां और शहनाइयों की गूंज थी, वहीं अब मातम पसरा हुआ था। तिरंगे में लिपटे मेजर हमजा आरिफ का पार्थिव शरीर जैसे ही उनके घर पहुंचा, परिजनों का दर्द और पूरे शहर की भावनाएं एक साथ उमड़ पड़ीं। पत्नी ज्योति अरोरा की आंखों से बहते आंसू, माता-पिता की खामोशी और सेना की अंतिम सलामी ने हर मौजूद व्यक्ति को भावुक कर दिया।

    रविवार सुबह सैफी नगर में मेजर हमजा आरिफ की जनाजे की नमाज अदा की गई। इसके बाद भारतीय सेना के वाहन में तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर अंतिम यात्रा के लिए रवाना हुआ। अंतिम यात्रा सैफी नगर से माणिकबाग पुल, कलेक्टर चौराहा, राजबाड़ा और सदर बाजार होते हुए इमली बाजार स्थित शिया दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान पहुंची। पूरे रास्ते शहरवासियों ने अपने वीर अधिकारी को श्रद्धांजलि अर्पित की। कई लोगों ने घरों और दुकानों के बाहर खड़े होकर हाथ जोड़कर नमन किया, जबकि अनेक लोगों ने सैल्यूट कर सम्मान व्यक्त किया।

    राजबाड़ा पर अंतिम यात्रा के पहुंचते ही वातावरण देशभक्ति के नारों से गूंज उठा। “भारत माता की जय” और “मेजर हमजा आरिफ अमर रहें” के नारों के बीच हजारों लोगों ने अपने वीर सपूत को अंतिम सलाम किया। शहरवासियों की भीड़ इस बात की गवाह बनी कि देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक के प्रति समाज में कितना सम्मान और आदर है।

    कब्रिस्तान में भारतीय सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया और अपने साथी अधिकारी को अंतिम सलामी अर्पित की। इसके बाद धार्मिक परंपराओं के अनुसार उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इस दौरान सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बड़ी संख्या में शहरवासी, समाजजन, रिश्तेदार और मित्र भी मौजूद रहे।

    अंतिम विदाई का सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब मेजर हमजा आरिफ की पत्नी ज्योति अरोरा अपने पति को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचीं। कांपते हाथों से उन्होंने तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को नमन किया, लेकिन अपने आंसुओं को रोक नहीं सकीं। गार्ड ऑफ ऑनर के बाद सेना के अधिकारियों ने वह तिरंगा उन्हें सौंपा जिसमें मेजर हमजा आरिफ लिपटकर अपने घर लौटे थे। उन्होंने उस तिरंगे को सीने से लगाकर अपने जीवनसाथी को अंतिम विदाई दी। वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।

    परिजनों ने बताया कि मेजर हमजा आरिफ का विवाह महज एक महीने पहले ही हुआ था। शादी के बाद वह कुछ दिनों की छुट्टी बिताकर अपनी ड्यूटी पर लौट गए थे। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि नई जिंदगी की शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद वह तिरंगे में लिपटकर अपने घर वापस आएंगे।

    गौरतलब है कि गुरुवार देर रात राजस्थान के जैसलमेर जिले में ड्यूटी से लौटते समय सेना के वाहन के सामने अचानक एक ऊंट आ गया। टक्कर के बाद वाहन अनियंत्रित होकर कई बार पलट गया। हादसे में 31 वर्षीय मेजर हमजा आरिफ का मौके पर ही निधन हो गया, जबकि उनके साथ मौजूद दो लेफ्टिनेंट गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों का सैन्य अस्पताल में उपचार जारी है। नौ वर्षों तक भारतीय सेना में सेवाएं देने वाले मेजर हमजा आरिफ अपने पीछे माता-पिता, पत्नी और तीन बहनों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका बलिदान केवल उनके परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे इंदौर और देश के लिए गर्व और भावनाओं का विषय बन गया है।

  • देश सेवा से खेलों तक जीत का सफर, पैरा एथलीट सोमन राणा ने कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास

    देश सेवा से खेलों तक जीत का सफर, पैरा एथलीट सोमन राणा ने कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए कई ऐतिहासिक पल देखने को मिले लेकिन शॉट पुट एफ57 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले पैरा एथलीट सोमन राणा की कहानी हर भारतीय के लिए प्रेरणा बन गई। भारतीय सेना में देश की सेवा करते हुए अपना दाहिना पैर गंवाने वाले सोमन ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि कठिन परिस्थितियों को चुनौती देकर ऐसा मुकाम हासिल किया जिस पर पूरा देश गर्व कर रहा है। उनकी यह जीत केवल एक स्वर्ण पदक नहीं बल्कि साहस, आत्मविश्वास और अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है।

    ग्लासगो में आयोजित प्रतियोगिता में सोमन राणा ने 13.40 मीटर की दूरी तक गोला फेंकते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। इससे पहले वह 2022 के एशियाई पैरा खेलों में रजत पदक जीत चुके थे, लेकिन इस बार उन्होंने अपनी मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर स्वर्णिम सफलता हासिल कर ली।

    सोमन राणा ने बताया कि उनका जीवन वर्ष 2006 में पूरी तरह बदल गया था। भारतीय सेना में ड्यूटी के दौरान हुए हादसे में उन्होंने अपना दाहिना पैर खो दिया। उस समय उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जीवन में लौटने की थी। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को मामूली चोट लगती है तो चलना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन उनका पूरा पैर चला गया था। ऐसे में कृत्रिम पैर के सहारे दोबारा चलना और फिर खेलों में उतरना बेहद कठिन था।

    उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में उन्हें यह समझ ही नहीं आता था कि कृत्रिम पैर के साथ सामान्य जीवन कैसे जिएंगे। लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को संभाला और नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना शुरू किया। वर्ष 2017 में उन्हें पैरालंपिक खेलों के बारे में जानकारी मिली और तभी उन्होंने तय कर लिया कि अब खेलों के जरिए देश के लिए कुछ बड़ा करना है।

    सोमन ने कहा कि दूसरे पैरा खिलाड़ियों को देखकर उनके भीतर नया आत्मविश्वास पैदा हुआ। उन्होंने महसूस किया कि कई खिलाड़ी ऐसे हैं जिनके दोनों पैर नहीं हैं फिर भी वे दुनिया भर में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। यही सोच उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। उन्होंने अपने डर को पीछे छोड़कर लगातार मेहनत की और हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाने में जुट गए।

    उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय भारतीय सेना, पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया, भारतीय खेल प्राधिकरण और अपने परिवार को दिया। सोमन ने कहा कि इन सभी का सहयोग और विश्वास ही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया। अगर परिवार और संस्थाओं का साथ नहीं मिलता तो शायद यह सपना पूरा करना इतना आसान नहीं होता।

    सोमन राणा की कहानी यह साबित करती है कि जीवन में मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो हर चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपना एक पैर खोया लेकिन उसी जज्बे के साथ खेल के मैदान में उतरकर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। उनकी यह उपलब्धि लाखों युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मिला यह स्वर्ण पदक केवल सोमन राणा की व्यक्तिगत जीत नहीं बल्कि भारतीय सेना, खेल जगत और पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। उनका संघर्ष और सफलता आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि सच्ची जीत शरीर की ताकत से नहीं बल्कि मन की दृढ़ता और हौसले से हासिल होती है।

  • जम्मू-कश्मीर में सीमा पर हाई अलर्ट, LoC पार करते पकड़ा गया PoK निवासी; जांच शुरू

    जम्मू-कश्मीर में सीमा पर हाई अलर्ट, LoC पार करते पकड़ा गया PoK निवासी; जांच शुरू


    नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा पर सुरक्षाबलों ने एक संदिग्ध घुसपैठ की कोशिश को नाकाम करते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के एक नागरिक को हिरासत में लिया है। सुरक्षा एजेंसियां पकड़े गए व्यक्ति से गहन पूछताछ कर रही हैं ताकि उसके भारत में प्रवेश के उद्देश्य और संभावित संपर्कों का पता लगाया जा सके। घटना ऐसे समय सामने आई है जब अमरनाथ यात्रा और श्री माता वैष्णो देवी यात्रा को लेकर पूरे जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था पहले से ही हाई अलर्ट पर है।

    अधिकारियों के अनुसार पकड़े गए व्यक्ति की पहचान मोहम्मद सज्जाद के रूप में हुई है जो रफीक का पुत्र और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के पोलास क्षेत्र का निवासी बताया जा रहा है। नियमित गश्त और निगरानी के दौरान सुरक्षाबलों ने उसकी संदिग्ध गतिविधियां देखीं जिसके बाद उसे रोककर हिरासत में ले लिया गया। फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां उससे पूछताछ कर रही हैं और यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि वह गलती से सीमा पार आया या किसी विशेष उद्देश्य से भारतीय सीमा में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था।

    इस बीच जम्मू-कश्मीर में आगामी श्री अमरनाथ यात्रा और श्री माता वैष्णो देवी यात्रा को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया गया है। उधमपुर रियासी रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक शिव कुमार शर्मा ने कटड़ा में उच्चस्तरीय संयुक्त सुरक्षा समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में पुलिस सेना सीआरपीएफ इंटेलिजेंस ब्यूरो सीआईडी रेलवे ट्रैफिक पुलिस और श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

    बैठक में कटड़ा शहर यात्रा मार्ग और भवन क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की विस्तृत समीक्षा की गई। सीसीटीवी निगरानी प्रणाली जवानों की तैनाती आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को और मजबूत बनाने पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों ने संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त निगरानी और सुरक्षा बलों की रणनीतिक तैनाती के निर्देश दिए।

    कटड़ा से भवन तक पूरे यात्रा मार्ग की सुरक्षा व्यवस्था का भी बारीकी से आकलन किया गया ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित और निर्बाध यात्रा का अनुभव मिल सके। इसके अलावा होटल लॉज गेस्ट हाउस होमस्टे और अन्य ठहरने की जगहों के नियमित सत्यापन और निरीक्षण के निर्देश भी दिए गए हैं ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर समय रहते कार्रवाई की जा सके।

    सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि तीर्थयात्रा के दौरान किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए सभी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और खुफिया सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। प्रशासन का उद्देश्य श्रद्धालुओं को पूरी तरह सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना और जम्मू-कश्मीर में धार्मिक यात्राओं को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराना है।

  • 1971 के नायक के साथ हुआ था बड़ा अन्याय वर्षों तक मिली आधी पेंशन फिर राष्ट्रपति कलाम ने दिलाया पूरा सम्मान

    1971 के नायक के साथ हुआ था बड़ा अन्याय वर्षों तक मिली आधी पेंशन फिर राष्ट्रपति कलाम ने दिलाया पूरा सम्मान


    नई दिल्ली। भारतीय सेना के इतिहास में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नाम अदम्य साहस दूरदर्शी नेतृत्व और ऐतिहासिक सैन्य रणनीति के लिए हमेशा याद किया जाएगा। वर्ष 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने केवल 13 दिनों में ऐसी निर्णायक जीत हासिल की जिसने दक्षिण एशिया का भूगोल ही बदल दिया और बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ। लेकिन देश को इतनी बड़ी जीत दिलाने वाले इस महान सैन्य अधिकारी को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में लंबे समय तक पूरा वित्तीय अधिकार नहीं मिल पाया।

    3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में जन्मे सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ के पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें लेकिन उन्होंने सैन्य जीवन को चुना और 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी के पहले बैच में शामिल हो गए। आगे चलकर उन्होंने अपने नेतृत्व और साहस के दम पर भारतीय सेना में सर्वोच्च सम्मान हासिल किया। गोरखा सैनिकों ने उन्हें सम्मानपूर्वक सैम बहादुर नाम दिया जो आज भी उनकी पहचान बना हुआ है।

    1971 के युद्ध से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति को देखते हुए तत्काल सैन्य कार्रवाई का सुझाव दिया था लेकिन सैम मानेकशॉ ने मौसम और सैन्य तैयारियों का हवाला देते हुए कुछ महीनों का समय मांगा। उन्होंने भरोसा दिया कि पूरी तैयारी के बाद सफलता निश्चित होगी। उनकी रणनीति पूरी तरह सफल साबित हुई और 3 दिसंबर 1971 को युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय सेना ने तेजी से अभियान चलाकर ढाका को चारों ओर से घेर लिया। आखिरकार पाकिस्तान के लगभग 90 हजार सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया और बांग्लादेश का गठन हुआ।

    सैन्य सेवा से 15 जनवरी 1973 को सेवानिवृत्त होने के बाद भी फील्ड मार्शल का पद आजीवन माना जाता है। इस पद पर आसीन अधिकारी को पूर्ण वेतन और सभी सुविधाएं मिलने का अधिकार होता है। हालांकि प्रशासनिक और नौकरशाही कारणों से सैम मानेकशॉ को लंबे समय तक केवल आधी पेंशन ही मिलती रही। यह स्थिति कई वर्षों तक बनी रही और उनका बकाया भुगतान लंबित रहा।

    बाद में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। उनके प्रयासों के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त अस्पताल पहुंचे और सैम मानेकशॉ को 1.16 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान सौंपा। यह केवल एक आर्थिक भुगतान नहीं बल्कि देश की ओर से अपने महान सैनिक को दिया गया सम्मान भी था।

    27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य अस्पताल में फेफड़ों के संक्रमण के कारण 94 वर्ष की आयु में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि नेतृत्व केवल युद्ध जीतने का नाम नहीं बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने का साहस भी होता है। आज भी भारतीय सेना में उनकी रणनीति नेतृत्व क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण प्रेरणा का स्रोत माने जाते हैं।

  • भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, 'ऑपरेशन अमिस्ताद' के तहत वेनेजुएला भेजे डॉक्टर, भीष्म क्यूब और राहत सामग्री

    भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, 'ऑपरेशन अमिस्ताद' के तहत वेनेजुएला भेजे डॉक्टर, भीष्म क्यूब और राहत सामग्री


    नई दिल्ली । उत्तरी वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने एक बार फिर वैश्विक मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए राहत और चिकित्सा सहायता के लिए ‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ शुरू किया है। इस विशेष अभियान के तहत भारतीय सेना की मेडिकल टीम, आधुनिक चिकित्सा उपकरण और बड़ी मात्रा में राहत सामग्री वेनेजुएला भेजी गई है, ताकि आपदा प्रभावित लोगों को तत्काल इलाज और जरूरी सहायता मिल सके।

    भारतीय सेना के 60 पैरा फील्ड हॉस्पिटल से 41 सदस्यीय विशेषज्ञ दल भारतीय वायुसेना के दो सी-17 परिवहन विमानों के जरिए वेनेजुएला रवाना हुआ है। इस टीम में नौ अनुभवी सैन्य चिकित्सक भी शामिल हैं, जो प्रभावित इलाकों में आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं, ट्रॉमा केयर, गंभीर घायलों का इलाज, सर्जरी और गहन चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।

    भारतीय सेना के अनुसार राहत दल अपने साथ लगभग छह टन चिकित्सा सामग्री और मानवीय सहायता लेकर गया है। इसके अलावा मिशन में 35 टन से अधिक राहत सामग्री, दवाइयां और चिकित्सा उपकरण भी भेजे गए हैं। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता ‘भीष्म क्यूब’ है, जिसे भारत की आरोग्य मैत्री परियोजना के तहत विकसित किया गया है। यह अत्याधुनिक मॉड्यूलर फील्ड हॉस्पिटल बेहद कम समय में स्थापित किया जा सकता है और लगभग 200 मरीजों को एक साथ जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधा देने में सक्षम है।

    विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत भारतीय वायुसेना के दो सी-17 विमान राहत सामग्री और चिकित्सा दल के साथ वेनेजुएला रवाना हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत इस कठिन समय में वेनेजुएला की सरकार और वहां के नागरिकों के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है तथा हरसंभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है।

    भीष्म क्यूब को विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकट वाले क्षेत्रों में तेजी से चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह उन्नत ट्रॉमा केयर, आपातकालीन सर्जरी और गहन चिकित्सा सुविधाओं से लैस है, जिससे बड़ी संख्या में घायलों का तत्काल उपचार संभव हो पाता है।

    भारत का यह मिशन केवल राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मित्र देशों के साथ संकट की घड़ी में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की उसकी विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण का भी मजबूत संदेश देता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर आधारित यह अभियान वैश्विक सहयोग, करुणा और मानवता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को फिर से रेखांकित करता है।

    वेनेजुएला में चलाया जा रहा ऑपरेशन अमिस्ताद हजारों प्रभावित लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण साबित हो सकता है। साथ ही यह अभियान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और मानवीय शक्ति की छवि को भी और मजबूत करेगा।

  • रोबोटिक डॉग्स से लेकर देसी रामपुर हाउंड तक, सैन्य अभ्यास प्रगति 2026 में दिखी युद्ध की नई तस्वीर

    रोबोटिक डॉग्स से लेकर देसी रामपुर हाउंड तक, सैन्य अभ्यास प्रगति 2026 में दिखी युद्ध की नई तस्वीर


    नई दिल्ली । आधुनिक युद्ध अब केवल हथियारों और सैनिकों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि तकनीक और विशेष सैन्य प्रणालियां भी इसमें तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसी बदलते सैन्य परिदृश्य की झलक मेघालय के उमरोई में आयोजित बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास ‘प्रगति 2026’ में देखने को मिली। इस बार अभ्यास में सिर्फ सैनिकों की रणनीति और सैन्य कौशल ही चर्चा में नहीं रहे, बल्कि भारतीय सेना के प्रशिक्षित K9 योद्धा और रोबोटिक डॉग्स भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र बने।

    अभ्यास के दौरान सैन्य डॉग स्क्वॉड ने अपनी विशेष क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए मौजूद अधिकारियों और विदेशी प्रतिनिधियों का ध्यान खींचा। इन प्रशिक्षित डॉग्स ने विस्फोटक खोजने, संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने, लक्ष्य का पीछा करने और हमले जैसी कई सैन्य गतिविधियों को प्रदर्शित किया। सेना का मानना है कि आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में ऐसी टीमें सैनिकों के लिए एक महत्वपूर्ण सहायक शक्ति बनती जा रही हैं। कठिन परिस्थितियों में उनकी भूमिका कई बार अत्यंत निर्णायक साबित होती है।

    इस अभ्यास में शामिल सैन्य डॉग्स की विशेष भूमिकाएं भी ध्यान आकर्षित करने वाली रहीं। इनमें एक हमला करने वाला प्रशिक्षित डॉग, एक ट्रैकिंग विशेषज्ञ और एक विस्फोटक खोजने वाला डॉग शामिल था। अलग-अलग परिस्थितियों में इनकी क्षमताओं का प्रदर्शन किया गया। सैन्य अधिकारियों के अनुसार युद्ध और सुरक्षा अभियानों में ऐसे प्रशिक्षित डॉग्स की मदद से जोखिम कम करने और अभियान को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिलती है।

    इस पूरे अभ्यास में सबसे अधिक चर्चा भारत की देसी नस्ल रामपुर हाउंड की रही। ‘विक्टर’ नाम का यह ट्रैकर डॉग अपनी फुर्ती और सूंघने की तेज क्षमता के कारण आकर्षण का केंद्र बना। सैन्य अधिकारियों का मानना है कि भारतीय नस्लों में स्थानीय मौसम और कठिन परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता अधिक होती है। यही कारण है कि सेना अब स्वदेशी नस्लों को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दे रही है। इसे आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    भारतीय सेना के K9 योद्धाओं की विशेषता यह है कि वे केवल सामान्य इलाकों तक सीमित नहीं रहते। इनका उपयोग रेगिस्तानी क्षेत्रों, घने जंगलों और बर्फीले इलाकों तक में किया जाता है। आतंकवाद विरोधी अभियान, विस्फोटक पदार्थों की खोज और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों में इनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। सेना के अनुसार इनकी सबसे बड़ी ताकत तेज सूंघने की क्षमता, अनुशासन और अपने मिशन के प्रति विश्वसनीयता है।

    अभ्यास में रोबोटिक डॉग्स की मौजूदगी ने भी भविष्य की युद्ध प्रणाली की एक नई तस्वीर पेश की। इनके प्रदर्शन के जरिए यह संकेत दिया गया कि आने वाले समय में तकनीक और पारंपरिक सैन्य कौशल एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। सेना का मानना है कि भविष्य में रोबोटिक सिस्टम और K9 टीमें मिलकर सैन्य अभियानों को अधिक सुरक्षित, प्रभावी और आधुनिक बना सकती हैं। प्रगति 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया कि युद्ध की नई दुनिया में तकनीक और प्रशिक्षण का यह मेल भविष्य की रणनीति तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

  • तपती धूप में शहीद को नमन: सियाचिन के वीर कैप्टन प्रताप सिंह की याद में मेरठ में सेना ने बांटा शरबत

    तपती धूप में शहीद को नमन: सियाचिन के वीर कैप्टन प्रताप सिंह की याद में मेरठ में सेना ने बांटा शरबत



    मेरठ। मेरठ में 43 डिग्री की भीषण गर्मी के बीच सेना के जवानों ने सियाचिन के वीर शहीद कैप्टन प्रताप सिंह को अनोखे अंदाज में श्रद्धांजलि दी। बसंतर रेजीमेंट के जवानों ने सड़क पर राहगीरों को शरबत पिलाकर न सिर्फ लोगों की प्यास बुझाई, बल्कि शहीद के बलिदान को भी याद किया। इस दौरान लोगों ने सेना के इस मानवीय और प्रेरणादायक प्रयास की जमकर सराहना की।

    26 मई 1988 को सियाचिन ग्लेशियर के बाना पोस्ट पर तैनात कैप्टन प्रताप सिंह ने दुश्मन की घुसपैठ को नाकाम करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। ऑपरेशन के दौरान हुए माइंस ब्लास्ट में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने अंतिम सांस तक साहस दिखाते हुए दुश्मन की मदद के लिए लगाई गई रस्सी की सीढ़ी को काट दिया, जिससे घुसपैठ पूरी तरह विफल हो गई। उनकी इसी बहादुरी और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

    सेना के जवानों ने कहा कि शहीद सिर्फ इतिहास नहीं होते, बल्कि वे हर जवान और हर नागरिक के लिए प्रेरणा होते हैं। इसी भावना के तहत जवानों ने आम लोगों के बीच जाकर सेवा का संदेश दिया और शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के दौरान सड़क से गुजर रहे लोग भी रुके और जवानों के साथ शहीद को नमन किया।

  • भारत के खतरे को लेकर पाकिस्तान में चिंता: विशेषज्ञों ने डिफेंस मजबूत करने की दी सलाह

    भारत के खतरे को लेकर पाकिस्तान में चिंता: विशेषज्ञों ने डिफेंस मजबूत करने की दी सलाह



    नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण रिश्तों के बीच पाकिस्तान में एक बार फिर भारत की सैन्य क्षमता को लेकर चिंता बढ़ गई है। “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद से वहां के सुरक्षा विशेषज्ञ और रणनीतिक विश्लेषक भारत से संभावित भविष्य के सैन्य अभियानों को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं।

    पाकिस्तान के रक्षा और रणनीतिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बदलती सैन्य रणनीति और तकनीकी बढ़त को देखते हुए देश को अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की जरूरत है। उनका मानना है कि आधुनिक युद्ध तकनीक और नई रणनीतियां क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।

    भारत की सैन्य रणनीति पर पाकिस्तान की नजर
    कायदे-आज़म विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों ने कहा कि दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद जरूरी है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत के सैन्य सिद्धांतों में बदलाव आ रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक और अन्य सीमित सैन्य कार्रवाइयों की रणनीति ने पाकिस्तान की सुरक्षा सोच को प्रभावित किया है।

    आधुनिक युद्ध तकनीक पर जोर
    पाकिस्तानी रक्षा विश्लेषकों ने कहा कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइपरसोनिक मिसाइलें और उन्नत निगरानी प्रणाली अहम भूमिका निभाएंगी। ऐसे में पाकिस्तान को भी अपनी सैन्य तकनीक को आधुनिक बनाने की जरूरत है।

    एयर कमोडोर (सेवानिवृत्त) खालिद बनूरी के अनुसार, युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और निर्णय लेने की गति अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

    निष्कर्ष
    कुल मिलाकर, पाकिस्तान में सुरक्षा विशेषज्ञ भारत की बढ़ती सैन्य क्षमता को एक रणनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं और सरकार को रक्षा सुधारों की सलाह दे रहे हैं। हालांकि, साथ ही यह भी माना जा रहा है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीति जरूरी है।

    टैग्स
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  • CM योगी समेत कई नेताओं ने बदली सोशल मीडिया DP, ऑपरेशन सिंदूर और ब्रह्मोस तस्वीरों से दिया खास संदेश

    CM योगी समेत कई नेताओं ने बदली सोशल मीडिया DP, ऑपरेशन सिंदूर और ब्रह्मोस तस्वीरों से दिया खास संदेश

    नई दिल्ली।
    ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ के मौके पर देश के राजनीतिक और डिजिटल माहौल में एक खास तरह की हलचल देखने को मिली। इस दिन को याद करते हुए कई वरिष्ठ नेताओं ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स की प्रोफाइल तस्वीरों और कवर इमेज में बदलाव किया। यह बदलाव केवल एक औपचारिक अपडेट नहीं था, बल्कि इसके पीछे भारतीय सेना के साहस और उस ऐतिहासिक सैन्य कार्रवाई को याद करने का संदेश भी जुड़ा था, जिसे देश की सुरक्षा के इतिहास में एक अहम मोड़ माना जाता है।

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस अवसर पर अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल में विशेष बदलाव किया। उनकी प्रोफाइल तस्वीर में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी प्रतीकात्मक झलक दिखाई दी, जबकि कवर इमेज में ब्रह्मोस मिसाइल को प्रमुखता से दर्शाया गया। यह बदलाव सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ गया और लोगों के बीच इसे लेकर काफी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

    ऑपरेशन सिंदूर को उस सैन्य कार्रवाई के रूप में देखा जाता है जिसमें भारतीय सुरक्षा बलों ने संयुक्त रूप से आतंकवादी ठिकानों पर निर्णायक कदम उठाया था। इस कार्रवाई को देश की सुरक्षा नीति में एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जाता है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    इस वर्षगांठ पर कई नेताओं ने सोशल मीडिया के जरिए देश के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं और भारतीय सेना के साहस को सलाम किया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किए गए ये बदलाव एक प्रतीकात्मक संदेश के रूप में सामने आए, जिसमें देश की रक्षा नीति और सैन्य ताकत को प्रमुखता से दर्शाया गया।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल को कवर इमेज में शामिल करना भी विशेष रूप से चर्चा में रहा। ब्रह्मोस को भारत की आधुनिक और तेज सुपरसोनिक मिसाइलों में गिना जाता है, जिसे देश की रक्षा क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह तस्वीर भारत की बढ़ती सैन्य तकनीक और आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था का भी संकेत देती है।

    उत्तर प्रदेश में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर पर भी तेजी से काम किया जा रहा है। लखनऊ में ब्रह्मोस से जुड़ी उत्पादन इकाई इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है, जो राज्य को रक्षा क्षेत्र में नई पहचान दिला रही है।

    सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लोगों की भी बड़ी भागीदारी देखने को मिली। कई यूजर्स ने ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी तस्वीरें और संदेश साझा किए, जिससे यह विषय केवल एक औपचारिक वर्षगांठ न रहकर एक व्यापक चर्चा का हिस्सा बन गया। यह पूरा घटनाक्रम डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देशभक्ति और सुरक्षा संदेश के एक नए रूप में सामने आया।