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  • जबलपुर में सूर्या हाफ मैराथन का काउंटडाउन शुरू, 10 हजार से ज्यादा धावक दौड़कर देंगे फिटनेस और स्वच्छता का संदेश

    जबलपुर में सूर्या हाफ मैराथन का काउंटडाउन शुरू, 10 हजार से ज्यादा धावक दौड़कर देंगे फिटनेस और स्वच्छता का संदेश


    जबलपुर । जबलपुर में सूर्या हाफ मैराथन को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। आगामी 22 नवंबर को आयोजित होने वाली इस बड़ी खेल प्रतियोगिता से पहले रविवार सुबह धावकों ने ट्रायल रन में हिस्सा लिया। सुबह करीब 6 बजे पंडित रविशंकर शुक्ल स्टेडियम यानी राइट टाउन स्टेडियम से दौड़ की शुरुआत हुई। भारतीय सेना और नगर निगम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाली इस मैराथन को लेकर शहर में उत्साह का माहौल है। ट्रायल रन के जरिए आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं को परखने के साथ ही धावकों को दौड़ के मार्ग और तैयारियों से परिचित कराने का प्रयास किया गया।

    सूर्या हाफ मैराथन का उद्देश्य केवल एक खेल प्रतियोगिता आयोजित करना नहीं है बल्कि शहरवासियों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना भी है। इस आयोजन के माध्यम से खेल और फिटनेस के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ स्वच्छता और अनुशासन का संदेश दिया जाएगा। आयोजकों को उम्मीद है कि 22 नवंबर को होने वाली मुख्य मैराथन में 10 हजार से अधिक धावक शामिल होंगे। इतनी बड़ी संख्या में प्रतिभागियों की मौजूदगी को देखते हुए आयोजन की तैयारियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    ट्रायल रन के दौरान आयोजन से जुड़े लोगों ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया। धावकों की आवाजाही और दौड़ के दौरान सामने आने वाली संभावित चुनौतियों को समझने की कोशिश की गई। मुख्य आयोजन में किसी तरह की अव्यवस्था न हो इसके लिए सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर पहले से योजना तैयार की जा रही है। खास तौर पर धावकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है ताकि दौड़ के दौरान किसी भी प्रतिभागी को परेशानी का सामना न करना पड़े।

    इसी सिलसिले में महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू की अध्यक्षता में तैयारियों की समीक्षा बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में भारतीय सेना के कर्नल सीएस मैनी यातायात विभाग के डीएसपी शुक्ला और नगर निगम के अधिकारी मौजूद रहे। इस दौरान मैराथन के आयोजन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों ने धावकों की सुरक्षा और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं को लेकर आवश्यक इंतजाम करने पर जोर दिया। इसके अलावा दौड़ के मार्ग पर पेयजल की उपलब्धता और यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने की रणनीति पर भी विचार किया गया।

    मैराथन का आयोजन पंडित रविशंकर शुक्ल स्टेडियम से शुरू होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरेगा। निर्धारित रूट के अनुसार धावक अशोका होटल चौक तीनपत्ती चौक और महाराणा प्रताप चौक होते हुए नौदरा ब्रिज पहुंचेंगे। इसके बाद रसल चौक जबलपुर हॉस्पिटल ब्लूम चौक और नवभारत प्रेस से गुजरते हुए पंकज होटल तथा गौमाता चौक की ओर बढ़ेंगे। यहां से दौड़ वापस राइट टाउन स्टेडियम पहुंचेगी। इस मार्ग को लेकर यातायात प्रबंधन और सुरक्षा इंतजामों को व्यवस्थित करने की तैयारी की जा रही है।

    सूर्या हाफ मैराथन के आयोजन से जबलपुर को खेल और फिटनेस के क्षेत्र में नई पहचान मिलने की उम्मीद है। सेना और नगर निगम की संयुक्त पहल से शहर के युवाओं और आम नागरिकों को दौड़ने तथा नियमित व्यायाम के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया जा रहा है। ट्रायल रन के बाद अब मुख्य आयोजन की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। 22 नवंबर को हजारों धावकों की भागीदारी के साथ जबलपुर की सड़कों पर खेल भावना और उत्साह का नजारा देखने को मिल सकता है।

  • भारत में जल्द बनेगी अंतरिक्ष कमान, तीनों सेनाओं की होगी संयुक्त व्यवस्था; थल सेना संभालेगी नेतृत्व

    भारत में जल्द बनेगी अंतरिक्ष कमान, तीनों सेनाओं की होगी संयुक्त व्यवस्था; थल सेना संभालेगी नेतृत्व


    नई दिल्ली । युद्ध के बदलते स्वरूप और अंतरिक्ष के बढ़ते रणनीतिक महत्व को देखते हुए भारत जल्द ही अंतरिक्ष कमान के गठन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रस्तावित अंतरिक्ष कमान तीनों सेनाओं की संयुक्त कमान होगी और इसका नेतृत्व थल सेना के पास रहेगा। इस व्यवस्था को देश की रक्षा तैयारियों में महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

    अंतरिक्ष कमान के गठन को लेकर थल सेना, वायुसेना और नौसेना के बीच विमर्श की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब जल्द ही अंतरिम अंतरिक्ष कमान के गठन की घोषणा की जा सकती है। इसके कामकाज और संरचना की समीक्षा के बाद आवश्यक बदलाव किए जाएंगे और आगे चलकर इसे स्थायी स्वरूप दिया जा सकता है।

    प्रस्तावित कमान के साथ बेंगलुरु स्थित रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी यानी डीएसए को भी जोड़ा जाएगा। कमान की जिम्मेदारी सेना के पास रहने की योजना है। इसके नेतृत्व के लिए लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के अधिकारी को नियुक्त किया जा सकता है। इसके अलावा मेजर जनरल स्तर के पांच अधिकारी इसमें शामिल होंगे।

    संयुक्त व्यवस्था में वायुसेना और नौसेना की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। प्रस्तावित ढांचे में वायुसेना के मेजर जनरल के समकक्ष स्तर के तीन और नौसेना के दो अधिकारी शामिल किए जाने की बात सामने आई है। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष से जुड़े सैन्य संसाधनों और अभियानों में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है।

    दुनिया के कई देश पहले ही अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी सैन्य क्षमताओं को संगठित कर चुके हैं। अमेरिका के पास अंतरिक्ष कमान के साथ अलग स्पेस फोर्स भी मौजूद है। चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली, ऑस्ट्रेलिया और ईरान समेत कई देशों ने भी अंतरिक्ष से जुड़े सैन्य ढांचे तैयार किए हैं। ब्रिटेन भी इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की प्रस्तावित कमान का एक प्रमुख उद्देश्य उपग्रहों के जरिए रियल टाइम निगरानी को मजबूत करना होगा। इसके माध्यम से पड़ोसी या संभावित दुश्मन देशों के इलाकों में होने वाली गतिविधियों और सीमाओं पर चल रही सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिल सकती है।

    इस कमान की भूमिका केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहेगी। सुरक्षित नौवहन और संचार व्यवस्था उपलब्ध कराने में भी इसका इस्तेमाल किया जाएगा। युद्ध जैसी परिस्थितियों में सैन्य अभियानों के लिए आवश्यक सामग्री और संसाधनों की आवाजाही में भी अंतरिक्ष आधारित तकनीक से सहयोग मिलने की उम्मीद है।

    प्रस्तावित अंतरिक्ष कमान का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य दूसरे देशों के उपग्रहों से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखना होगा। आधुनिक युद्ध में उपग्रह संचार, निगरानी और खुफिया जानकारी का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में दुश्मन की अंतरिक्ष आधारित क्षमताओं पर निगरानी रक्षा रणनीति का अहम हिस्सा हो सकती है।

    इसके अलावा इस कमान को अंतरिक्ष आधारित सैन्य प्रणालियों और तकनीकों के जरिए दुश्मन के उपग्रहों, मिसाइल प्रणालियों और ड्रोन से जुड़ी क्षमताओं को निष्क्रिय करने की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। दुश्मन के खुफिया सिग्नल से जुड़ी गतिविधियों पर निगरानी और कार्रवाई भी इसके दायरे में आने की योजना है।

    फिलहाल इनसे जुड़े कई कार्य तीनों सेनाओं की अलग-अलग इकाइयों के स्तर पर किए जाते हैं। अंतरिक्ष कमान के गठन के बाद ऐसी क्षमताओं और संबंधित इकाइयों को एकीकृत ढांचे के तहत लाने की दिशा में काम किया जाएगा। इससे अंतरिक्ष आधारित सैन्य अभियानों में संयुक्त संचालन और समन्वय को एक नया ढांचा मिलने की संभावना है।

  • पहाड़ों में गरजी सैन्य ट्रेनिंग मंगोलियाई जवानों ने सीखी भारतीय तकनीक नोमैडिक एलीफेंट 2026 में दिखी मार्शल विरासत

    पहाड़ों में गरजी सैन्य ट्रेनिंग मंगोलियाई जवानों ने सीखी भारतीय तकनीक नोमैडिक एलीफेंट 2026 में दिखी मार्शल विरासत


    नई दिल्ली। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भारत और मंगोलिया की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास नोमैडिक एलीफेंट 2026 तेजी से आगे बढ़ रहा है। फॉरेन ट्रेनिंग नोड पर चल रहे इस अभ्यास में दोनों देशों के जवान कठिन और व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिए अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत कर रहे हैं। अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना और मंगोलियाई सशस्त्र बलों के बीच आपसी तालमेल सामरिक समझ और ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाना है। नोमैडिक एलीफेंट का यह 18वां संस्करण 21 सितंबर से शुरू हुआ है और 3 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। इसमें दोनों देशों की सेनाओं के 45-45 जवान हिस्सा ले रहे हैं।

    अभ्यास के दौरान मंगोलियाई सैनिकों को छोटे हथियारों से जुड़े प्रशिक्षण का व्यावहारिक अनुभव दिया गया। जवानों ने हथियारों की पहचान और उनकी कार्यप्रणाली के साथ सुरक्षा ड्रिल लोडिंग और अनलोडिंग निशाना लगाने तथा फायरिंग जैसी गतिविधियों में हिस्सा लिया। प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के दौरान हथियारों को सुरक्षित और अनुशासित तरीके से इस्तेमाल करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इससे मंगोलियाई सैनिकों को भारतीय सेना की प्रशिक्षण पद्धति और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं को करीब से समझने का अवसर मिला।

    भारतीय सेना की टुकड़ी ने इस दौरान रूम इंटरवेंशन ड्रिल का भी प्रदर्शन किया। इस ड्रिल में कमरे में व्यवस्थित तरीके से प्रवेश तलाशी समन्वित मूवमेंट संचार फायर अनुशासन और घायल व्यक्ति को सुरक्षित बाहर निकालने जैसी तकनीकों को प्रदर्शित किया गया। आबादी वाले इलाकों में अभियान के दौरान टीमवर्क और स्थितिजन्य जागरूकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के सैनिकों ने एक दूसरे के साथ हैंड्स ऑन ट्रेनिंग भी की। इससे जवानों को अपनी तकनीकों और प्रक्रियाओं को साझा करने का मौका मिला।

    अभ्यास के दौरान मंगोलियाई सैनिकों ने अपनी पारंपरिक मार्शल कला की झलक भी पेश की। उन्होंने मंगोलियाई क्लासिकल कुश्ती बोख और बिना हथियार के युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। पारंपरिक कुश्ती तकनीकों नियंत्रित ग्रैपलिंग और क्लोज कॉम्बैट मूवमेंट के जरिए मंगोलियाई जवानों ने अपनी ताकत फुर्ती अनुशासन और शारीरिक दक्षता का प्रदर्शन किया। इस गतिविधि ने सैन्य प्रशिक्षण के साथ दोनों देशों के सैनिकों के बीच पेशेवर संवाद और आपसी समझ को भी बढ़ाया।

    नोमैडिक एलीफेंट 2026 का व्यापक उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के जनादेश के तहत अर्ध शहरी और पहाड़ी इलाकों में आतंकवाद रोधी अभियानों के लिए दोनों देशों की संयुक्त सैन्य क्षमता को मजबूत करना है। अभ्यास के दौरान सैनिकों को अलग अलग परिस्थितियों में मिलकर काम करने और सामरिक स्तर पर बेहतर तालमेल विकसित करने का अवसर मिल रहा है। भारत और मंगोलिया के बीच लंबे समय से रक्षा सहयोग जारी है और नोमैडिक एलीफेंट जैसे अभ्यास इसी सहयोग को व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिए आगे बढ़ाते हैं। पिथौरागढ़ में चल रहा यह सैन्य अभ्यास दोनों देशों के जवानों को एक दूसरे की कार्यप्रणाली समझने के साथ संयुक्त अभियानों के लिए बेहतर समन्वय विकसित करने का मंच दे रहा है।

  • देवास में गणेश विसर्जन का भव्य नजारा देर रात तक उमड़ी भीड़ ऑपरेशन सिंदूर की झांकी रही खास आकर्षण

    देवास में गणेश विसर्जन का भव्य नजारा देर रात तक उमड़ी भीड़ ऑपरेशन सिंदूर की झांकी रही खास आकर्षण


    देवास । देवास में अनंत चतुर्दशी के अवसर पर शुक्रवार रात गणेश विसर्जन चल समारोह निकाला गया। शहर की सड़कों पर देर रात तक गणपति बप्पा की भक्ति और देशभक्ति का अनोखा संगम देखने को मिला। अलग अलग क्षेत्रों से निकली गणेश प्रतिमाओं और झांकियों ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। समारोह में धार्मिक और सामाजिक संदेशों के साथ देशभक्ति से जुड़ी झांकियां भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहीं।

    इस बार गणेश विसर्जन चल समारोह में ऑपरेशन सिंदूर और भारतीय सेना के शौर्य पर आधारित झांकी विशेष रूप से चर्चा में रही। झांकी के जरिए सेना के साहस और देश के प्रति समर्पण को दर्शाने का प्रयास किया गया। इसे देखने के लिए रास्ते के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। जैसे ही झांकी जुलूस के बीच से गुजरी लोगों ने उत्सुकता के साथ इसे देखा।

    समारोह में 80 से ज्यादा गणेश प्रतिमाएं और झांकियां शामिल हुईं। इनमें अलग अलग सामाजिक धार्मिक और देशभक्ति से जुड़े विषयों को प्रदर्शित किया गया। कई प्रतिमाओं को आकर्षक रोशनी और विशेष सजावट से तैयार किया गया था। रंग बिरंगी लाइटों से सजी झांकियां रात के अंधेरे में और भी आकर्षक नजर आ रही थीं।

    गणेश विसर्जन चल समारोह को देखने के लिए शहर के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंचे। जुलूस जिस मार्ग से गुजर रहा था वहां श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दी। परिवारों के साथ लोग प्रतिमाओं के दर्शन करने के लिए देर रात तक सड़कों पर मौजूद रहे। कई स्थानों पर स्थानीय लोगों ने जुलूस का स्वागत किया और गणेश प्रतिमाओं पर फूल बरसाए।

    धार्मिक आस्था के इस आयोजन में देशभक्ति से जुड़ी झांकियों ने समारोह को अलग पहचान दी। ऑपरेशन सिंदूर की झांकी में भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम को प्रदर्शित किया गया। बड़ी संख्या में लोगों ने रुककर झांकी को देखा और इसके जरिए दिए जा रहे संदेश को समझने की कोशिश की।

    गणेश विसर्जन के दौरान प्रशासन ने भी व्यवस्थाओं पर नजर बनाए रखी। कलेक्टर ऋतुराज सिंह और पुलिस अधीक्षक पुनीत गेहलोत ने जुलूस मार्ग का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था के साथ यातायात और भीड़ नियंत्रण की स्थिति का जायजा लिया। जुलूस के दौरान पुलिस बल को अलग अलग स्थानों पर तैनात किया गया था।

    प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही गई। भीड़ वाले स्थानों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अमला सक्रिय रहा। जुलूस के दौरान लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिए मार्ग और यातायात व्यवस्था पर भी नजर रखी गई।

    देर रात तक देवास की सड़कों पर गणेश प्रतिमाओं और झांकियों का सिलसिला चलता रहा। श्रद्धालु गणपति बप्पा के दर्शन करते रहे और विसर्जन के लिए आगे बढ़ती प्रतिमाओं को देखते रहे। धार्मिक उत्साह के साथ सेना के शौर्य को दर्शाती झांकी ने इस बार के गणेश विसर्जन समारोह को खास बना दिया।

  • भोपाल में दिखेगा सेना का शौर्य, आर्मी डे परेड में पहली बार सड़कों पर उतरेंगे टैंक; 50 हजार दर्शकों के लिए खास इंतजाम

    भोपाल में दिखेगा सेना का शौर्य, आर्मी डे परेड में पहली बार सड़कों पर उतरेंगे टैंक; 50 हजार दर्शकों के लिए खास इंतजाम


    भोपाल । भोपाल में देश की सैन्य ताकत और शौर्य का ऐसा नजारा पहली बार देखने को मिलेगा जब सेना के भारी-भरकम टैंक शहर की सड़कों पर अपनी ताकत और क्षमता का प्रदर्शन करते नजर आएंगे। 15 जनवरी 2027 को आर्मी डे के मौके पर होने वाली विशेष परेड के लिए तैयारियां तेज हो गई हैं। इस ऐतिहासिक आयोजन को करीब 50 हजार दर्शकों के देखने की उम्मीद है। खास बात यह है कि भोपाल में पहली बार आर्मी डे परेड किसी सैन्य कैंटोनमेंट के भीतर नहीं बल्कि आम लोगों के बीच सार्वजनिक क्षेत्र में आयोजित की जाएगी।

    आर्मी डे परेड 2027 के लिए भोपाल का चयन इसी साल मार्च में किया गया था। इसके बाद से ही प्रशासन और सेना के स्तर पर आयोजन को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई थीं। शनिवार को सेना भोपाल पुलिस जिला प्रशासन बिजली कंपनी लोक निर्माण विभाग भेल और सीपीए के अधिकारियों ने प्रस्तावित परेड मार्ग और आयोजन स्थल का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने गोविंदपुरा थाने से जंबूरी मैदान तक जाने वाली सड़क का जायजा लिया और सैन्य वाहनों की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए जरूरी बदलावों पर चर्चा की।

    एडीएम महेंद्र कपचे के नेतृत्व में अधिकारियों ने पूरे मार्ग का निरीक्षण किया। गोविंदपुरा थाने से जंबूरी मैदान तक करीब 2.4 किलोमीटर लंबे मार्ग को विशेष रूप से तैयार किया जाएगा। इस सड़क की चौड़ाई बढ़ाकर करीब 15 मीटर की जाएगी। भारी सैन्य टैंकों और अन्य सैन्य वाहनों की आवाजाही को देखते हुए सड़क की मजबूती बढ़ाने का काम भी किया जाएगा। पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर एससी वर्मा के मुताबिक सड़क को इस तरह मजबूत किया जाएगा कि भारी वजन वाले सैन्य टैंकों का दबाव आसानी से सह सके।

    परेड को देखने आने वाले लोगों के लिए भी विशेष इंतजाम किए जाएंगे। सड़क के दोनों ओर करीब 50 हजार दर्शकों के बैठने की व्यवस्था की जाएगी। प्रशासन की कोशिश है कि बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने के बावजूद आयोजन स्थल पर सुरक्षा और यातायात व्यवस्था सुचारु बनी रहे। इसी वजह से पूरे मार्ग को पहले से चिन्हित कर आवश्यक बदलाव किए जा रहे हैं।

    आयोजन के दौरान सड़क पर स्पीड ब्रेकर नहीं होंगे ताकि टैंक और सैन्य वाहनों की आवाजाही में किसी तरह की बाधा न आए। इसके अलावा मार्ग में आने वाले कुछ बिजली के पोल और पेड़ों को भी हटाया जाएगा। सैन्य वाहनों की पार्किंग के लिए नटराज-हेमा स्कूल मार्ग को निर्धारित किया गया है। इससे मुख्य परेड मार्ग पर भीड़ और वाहनों का दबाव कम रखने में मदद मिलेगी।

    भोपाल में होने वाला यह आयोजन इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि आम नागरिकों को सेना के अत्याधुनिक टैंकों और सैन्य वाहनों को करीब से देखने का अवसर मिलेगा। आमतौर पर आर्मी डे परेड सैन्य कैंटोनमेंट क्षेत्रों में आयोजित होती रही है लेकिन 2027 में भोपाल में इसे सार्वजनिक क्षेत्र में आयोजित करने का फैसला किया गया है। इससे शहरवासियों के बीच सेना के प्रति जुड़ाव और गौरव की भावना को और मजबूत करने की उम्मीद है।

    आयोजन को सफल बनाने के लिए सेना और स्थानीय प्रशासन के बीच लगातार समन्वय किया जा रहा है। सड़क की मजबूती से लेकर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था यातायात प्रबंधन बिजली व्यवस्था और सुरक्षा तक हर पहलू पर तैयारी की जा रही है। आने वाले दिनों में परेड मार्ग पर निर्माण और सुधार कार्य तेज होने की संभावना है। 15 जनवरी 2027 को भोपाल में होने वाला आर्मी डे समारोह शहर के लिए एक ऐतिहासिक अवसर होगा जब राजधानी की सड़कों पर पहली बार सेना के टैंक अपनी ताकत का प्रदर्शन करते दिखाई देंगे और हजारों लोग इस भव्य सैन्य आयोजन के गवाह बनेंगे।

  • वीर सपूत को इंदौर का सलाम, मेजर हमजा आरिफ को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, हर आंख हुई नम

    वीर सपूत को इंदौर का सलाम, मेजर हमजा आरिफ को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, हर आंख हुई नम


    इंदौर । इंदौर ने रविवार को अपने वीर सपूत मेजर हमजा आरिफ को पूरे सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी। एक महीने पहले जिस घर में शादी की खुशियां और शहनाइयों की गूंज थी, वहीं अब मातम पसरा हुआ था। तिरंगे में लिपटे मेजर हमजा आरिफ का पार्थिव शरीर जैसे ही उनके घर पहुंचा, परिजनों का दर्द और पूरे शहर की भावनाएं एक साथ उमड़ पड़ीं। पत्नी ज्योति अरोरा की आंखों से बहते आंसू, माता-पिता की खामोशी और सेना की अंतिम सलामी ने हर मौजूद व्यक्ति को भावुक कर दिया।

    रविवार सुबह सैफी नगर में मेजर हमजा आरिफ की जनाजे की नमाज अदा की गई। इसके बाद भारतीय सेना के वाहन में तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर अंतिम यात्रा के लिए रवाना हुआ। अंतिम यात्रा सैफी नगर से माणिकबाग पुल, कलेक्टर चौराहा, राजबाड़ा और सदर बाजार होते हुए इमली बाजार स्थित शिया दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान पहुंची। पूरे रास्ते शहरवासियों ने अपने वीर अधिकारी को श्रद्धांजलि अर्पित की। कई लोगों ने घरों और दुकानों के बाहर खड़े होकर हाथ जोड़कर नमन किया, जबकि अनेक लोगों ने सैल्यूट कर सम्मान व्यक्त किया।

    राजबाड़ा पर अंतिम यात्रा के पहुंचते ही वातावरण देशभक्ति के नारों से गूंज उठा। “भारत माता की जय” और “मेजर हमजा आरिफ अमर रहें” के नारों के बीच हजारों लोगों ने अपने वीर सपूत को अंतिम सलाम किया। शहरवासियों की भीड़ इस बात की गवाह बनी कि देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक के प्रति समाज में कितना सम्मान और आदर है।

    कब्रिस्तान में भारतीय सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया और अपने साथी अधिकारी को अंतिम सलामी अर्पित की। इसके बाद धार्मिक परंपराओं के अनुसार उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इस दौरान सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बड़ी संख्या में शहरवासी, समाजजन, रिश्तेदार और मित्र भी मौजूद रहे।

    अंतिम विदाई का सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब मेजर हमजा आरिफ की पत्नी ज्योति अरोरा अपने पति को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचीं। कांपते हाथों से उन्होंने तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को नमन किया, लेकिन अपने आंसुओं को रोक नहीं सकीं। गार्ड ऑफ ऑनर के बाद सेना के अधिकारियों ने वह तिरंगा उन्हें सौंपा जिसमें मेजर हमजा आरिफ लिपटकर अपने घर लौटे थे। उन्होंने उस तिरंगे को सीने से लगाकर अपने जीवनसाथी को अंतिम विदाई दी। वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।

    परिजनों ने बताया कि मेजर हमजा आरिफ का विवाह महज एक महीने पहले ही हुआ था। शादी के बाद वह कुछ दिनों की छुट्टी बिताकर अपनी ड्यूटी पर लौट गए थे। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि नई जिंदगी की शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद वह तिरंगे में लिपटकर अपने घर वापस आएंगे।

    गौरतलब है कि गुरुवार देर रात राजस्थान के जैसलमेर जिले में ड्यूटी से लौटते समय सेना के वाहन के सामने अचानक एक ऊंट आ गया। टक्कर के बाद वाहन अनियंत्रित होकर कई बार पलट गया। हादसे में 31 वर्षीय मेजर हमजा आरिफ का मौके पर ही निधन हो गया, जबकि उनके साथ मौजूद दो लेफ्टिनेंट गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों का सैन्य अस्पताल में उपचार जारी है। नौ वर्षों तक भारतीय सेना में सेवाएं देने वाले मेजर हमजा आरिफ अपने पीछे माता-पिता, पत्नी और तीन बहनों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका बलिदान केवल उनके परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे इंदौर और देश के लिए गर्व और भावनाओं का विषय बन गया है।

  • देश सेवा से खेलों तक जीत का सफर, पैरा एथलीट सोमन राणा ने कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास

    देश सेवा से खेलों तक जीत का सफर, पैरा एथलीट सोमन राणा ने कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए कई ऐतिहासिक पल देखने को मिले लेकिन शॉट पुट एफ57 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले पैरा एथलीट सोमन राणा की कहानी हर भारतीय के लिए प्रेरणा बन गई। भारतीय सेना में देश की सेवा करते हुए अपना दाहिना पैर गंवाने वाले सोमन ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि कठिन परिस्थितियों को चुनौती देकर ऐसा मुकाम हासिल किया जिस पर पूरा देश गर्व कर रहा है। उनकी यह जीत केवल एक स्वर्ण पदक नहीं बल्कि साहस, आत्मविश्वास और अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है।

    ग्लासगो में आयोजित प्रतियोगिता में सोमन राणा ने 13.40 मीटर की दूरी तक गोला फेंकते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। इससे पहले वह 2022 के एशियाई पैरा खेलों में रजत पदक जीत चुके थे, लेकिन इस बार उन्होंने अपनी मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर स्वर्णिम सफलता हासिल कर ली।

    सोमन राणा ने बताया कि उनका जीवन वर्ष 2006 में पूरी तरह बदल गया था। भारतीय सेना में ड्यूटी के दौरान हुए हादसे में उन्होंने अपना दाहिना पैर खो दिया। उस समय उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जीवन में लौटने की थी। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को मामूली चोट लगती है तो चलना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन उनका पूरा पैर चला गया था। ऐसे में कृत्रिम पैर के सहारे दोबारा चलना और फिर खेलों में उतरना बेहद कठिन था।

    उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में उन्हें यह समझ ही नहीं आता था कि कृत्रिम पैर के साथ सामान्य जीवन कैसे जिएंगे। लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को संभाला और नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना शुरू किया। वर्ष 2017 में उन्हें पैरालंपिक खेलों के बारे में जानकारी मिली और तभी उन्होंने तय कर लिया कि अब खेलों के जरिए देश के लिए कुछ बड़ा करना है।

    सोमन ने कहा कि दूसरे पैरा खिलाड़ियों को देखकर उनके भीतर नया आत्मविश्वास पैदा हुआ। उन्होंने महसूस किया कि कई खिलाड़ी ऐसे हैं जिनके दोनों पैर नहीं हैं फिर भी वे दुनिया भर में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। यही सोच उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। उन्होंने अपने डर को पीछे छोड़कर लगातार मेहनत की और हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाने में जुट गए।

    उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय भारतीय सेना, पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया, भारतीय खेल प्राधिकरण और अपने परिवार को दिया। सोमन ने कहा कि इन सभी का सहयोग और विश्वास ही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया। अगर परिवार और संस्थाओं का साथ नहीं मिलता तो शायद यह सपना पूरा करना इतना आसान नहीं होता।

    सोमन राणा की कहानी यह साबित करती है कि जीवन में मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो हर चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपना एक पैर खोया लेकिन उसी जज्बे के साथ खेल के मैदान में उतरकर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। उनकी यह उपलब्धि लाखों युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मिला यह स्वर्ण पदक केवल सोमन राणा की व्यक्तिगत जीत नहीं बल्कि भारतीय सेना, खेल जगत और पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। उनका संघर्ष और सफलता आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि सच्ची जीत शरीर की ताकत से नहीं बल्कि मन की दृढ़ता और हौसले से हासिल होती है।

  • जम्मू-कश्मीर में सीमा पर हाई अलर्ट, LoC पार करते पकड़ा गया PoK निवासी; जांच शुरू

    जम्मू-कश्मीर में सीमा पर हाई अलर्ट, LoC पार करते पकड़ा गया PoK निवासी; जांच शुरू


    नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा पर सुरक्षाबलों ने एक संदिग्ध घुसपैठ की कोशिश को नाकाम करते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के एक नागरिक को हिरासत में लिया है। सुरक्षा एजेंसियां पकड़े गए व्यक्ति से गहन पूछताछ कर रही हैं ताकि उसके भारत में प्रवेश के उद्देश्य और संभावित संपर्कों का पता लगाया जा सके। घटना ऐसे समय सामने आई है जब अमरनाथ यात्रा और श्री माता वैष्णो देवी यात्रा को लेकर पूरे जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था पहले से ही हाई अलर्ट पर है।

    अधिकारियों के अनुसार पकड़े गए व्यक्ति की पहचान मोहम्मद सज्जाद के रूप में हुई है जो रफीक का पुत्र और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के पोलास क्षेत्र का निवासी बताया जा रहा है। नियमित गश्त और निगरानी के दौरान सुरक्षाबलों ने उसकी संदिग्ध गतिविधियां देखीं जिसके बाद उसे रोककर हिरासत में ले लिया गया। फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां उससे पूछताछ कर रही हैं और यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि वह गलती से सीमा पार आया या किसी विशेष उद्देश्य से भारतीय सीमा में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा था।

    इस बीच जम्मू-कश्मीर में आगामी श्री अमरनाथ यात्रा और श्री माता वैष्णो देवी यात्रा को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर दिया गया है। उधमपुर रियासी रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक शिव कुमार शर्मा ने कटड़ा में उच्चस्तरीय संयुक्त सुरक्षा समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में पुलिस सेना सीआरपीएफ इंटेलिजेंस ब्यूरो सीआईडी रेलवे ट्रैफिक पुलिस और श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

    बैठक में कटड़ा शहर यात्रा मार्ग और भवन क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था की विस्तृत समीक्षा की गई। सीसीटीवी निगरानी प्रणाली जवानों की तैनाती आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को और मजबूत बनाने पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों ने संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त निगरानी और सुरक्षा बलों की रणनीतिक तैनाती के निर्देश दिए।

    कटड़ा से भवन तक पूरे यात्रा मार्ग की सुरक्षा व्यवस्था का भी बारीकी से आकलन किया गया ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित और निर्बाध यात्रा का अनुभव मिल सके। इसके अलावा होटल लॉज गेस्ट हाउस होमस्टे और अन्य ठहरने की जगहों के नियमित सत्यापन और निरीक्षण के निर्देश भी दिए गए हैं ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर समय रहते कार्रवाई की जा सके।

    सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि तीर्थयात्रा के दौरान किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए सभी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और खुफिया सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। प्रशासन का उद्देश्य श्रद्धालुओं को पूरी तरह सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना और जम्मू-कश्मीर में धार्मिक यात्राओं को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराना है।

  • 1971 के नायक के साथ हुआ था बड़ा अन्याय वर्षों तक मिली आधी पेंशन फिर राष्ट्रपति कलाम ने दिलाया पूरा सम्मान

    1971 के नायक के साथ हुआ था बड़ा अन्याय वर्षों तक मिली आधी पेंशन फिर राष्ट्रपति कलाम ने दिलाया पूरा सम्मान


    नई दिल्ली। भारतीय सेना के इतिहास में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नाम अदम्य साहस दूरदर्शी नेतृत्व और ऐतिहासिक सैन्य रणनीति के लिए हमेशा याद किया जाएगा। वर्ष 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने केवल 13 दिनों में ऐसी निर्णायक जीत हासिल की जिसने दक्षिण एशिया का भूगोल ही बदल दिया और बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ। लेकिन देश को इतनी बड़ी जीत दिलाने वाले इस महान सैन्य अधिकारी को अपने जीवन के अंतिम वर्षों में लंबे समय तक पूरा वित्तीय अधिकार नहीं मिल पाया।

    3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में जन्मे सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ के पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें लेकिन उन्होंने सैन्य जीवन को चुना और 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी के पहले बैच में शामिल हो गए। आगे चलकर उन्होंने अपने नेतृत्व और साहस के दम पर भारतीय सेना में सर्वोच्च सम्मान हासिल किया। गोरखा सैनिकों ने उन्हें सम्मानपूर्वक सैम बहादुर नाम दिया जो आज भी उनकी पहचान बना हुआ है।

    1971 के युद्ध से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान की स्थिति को देखते हुए तत्काल सैन्य कार्रवाई का सुझाव दिया था लेकिन सैम मानेकशॉ ने मौसम और सैन्य तैयारियों का हवाला देते हुए कुछ महीनों का समय मांगा। उन्होंने भरोसा दिया कि पूरी तैयारी के बाद सफलता निश्चित होगी। उनकी रणनीति पूरी तरह सफल साबित हुई और 3 दिसंबर 1971 को युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय सेना ने तेजी से अभियान चलाकर ढाका को चारों ओर से घेर लिया। आखिरकार पाकिस्तान के लगभग 90 हजार सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया और बांग्लादेश का गठन हुआ।

    सैन्य सेवा से 15 जनवरी 1973 को सेवानिवृत्त होने के बाद भी फील्ड मार्शल का पद आजीवन माना जाता है। इस पद पर आसीन अधिकारी को पूर्ण वेतन और सभी सुविधाएं मिलने का अधिकार होता है। हालांकि प्रशासनिक और नौकरशाही कारणों से सैम मानेकशॉ को लंबे समय तक केवल आधी पेंशन ही मिलती रही। यह स्थिति कई वर्षों तक बनी रही और उनका बकाया भुगतान लंबित रहा।

    बाद में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। उनके प्रयासों के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त अस्पताल पहुंचे और सैम मानेकशॉ को 1.16 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान सौंपा। यह केवल एक आर्थिक भुगतान नहीं बल्कि देश की ओर से अपने महान सैनिक को दिया गया सम्मान भी था।

    27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य अस्पताल में फेफड़ों के संक्रमण के कारण 94 वर्ष की आयु में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि नेतृत्व केवल युद्ध जीतने का नाम नहीं बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने का साहस भी होता है। आज भी भारतीय सेना में उनकी रणनीति नेतृत्व क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण प्रेरणा का स्रोत माने जाते हैं।

  • भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, 'ऑपरेशन अमिस्ताद' के तहत वेनेजुएला भेजे डॉक्टर, भीष्म क्यूब और राहत सामग्री

    भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ, 'ऑपरेशन अमिस्ताद' के तहत वेनेजुएला भेजे डॉक्टर, भीष्म क्यूब और राहत सामग्री


    नई दिल्ली । उत्तरी वेनेजुएला में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने एक बार फिर वैश्विक मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए राहत और चिकित्सा सहायता के लिए ‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ शुरू किया है। इस विशेष अभियान के तहत भारतीय सेना की मेडिकल टीम, आधुनिक चिकित्सा उपकरण और बड़ी मात्रा में राहत सामग्री वेनेजुएला भेजी गई है, ताकि आपदा प्रभावित लोगों को तत्काल इलाज और जरूरी सहायता मिल सके।

    भारतीय सेना के 60 पैरा फील्ड हॉस्पिटल से 41 सदस्यीय विशेषज्ञ दल भारतीय वायुसेना के दो सी-17 परिवहन विमानों के जरिए वेनेजुएला रवाना हुआ है। इस टीम में नौ अनुभवी सैन्य चिकित्सक भी शामिल हैं, जो प्रभावित इलाकों में आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं, ट्रॉमा केयर, गंभीर घायलों का इलाज, सर्जरी और गहन चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।

    भारतीय सेना के अनुसार राहत दल अपने साथ लगभग छह टन चिकित्सा सामग्री और मानवीय सहायता लेकर गया है। इसके अलावा मिशन में 35 टन से अधिक राहत सामग्री, दवाइयां और चिकित्सा उपकरण भी भेजे गए हैं। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता ‘भीष्म क्यूब’ है, जिसे भारत की आरोग्य मैत्री परियोजना के तहत विकसित किया गया है। यह अत्याधुनिक मॉड्यूलर फील्ड हॉस्पिटल बेहद कम समय में स्थापित किया जा सकता है और लगभग 200 मरीजों को एक साथ जीवनरक्षक चिकित्सा सुविधा देने में सक्षम है।

    विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत भारतीय वायुसेना के दो सी-17 विमान राहत सामग्री और चिकित्सा दल के साथ वेनेजुएला रवाना हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत इस कठिन समय में वेनेजुएला की सरकार और वहां के नागरिकों के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है तथा हरसंभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है।

    भीष्म क्यूब को विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकट वाले क्षेत्रों में तेजी से चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह उन्नत ट्रॉमा केयर, आपातकालीन सर्जरी और गहन चिकित्सा सुविधाओं से लैस है, जिससे बड़ी संख्या में घायलों का तत्काल उपचार संभव हो पाता है।

    भारत का यह मिशन केवल राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मित्र देशों के साथ संकट की घड़ी में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की उसकी विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण का भी मजबूत संदेश देता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना पर आधारित यह अभियान वैश्विक सहयोग, करुणा और मानवता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को फिर से रेखांकित करता है।

    वेनेजुएला में चलाया जा रहा ऑपरेशन अमिस्ताद हजारों प्रभावित लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण साबित हो सकता है। साथ ही यह अभियान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और मानवीय शक्ति की छवि को भी और मजबूत करेगा।