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  • विकसित भारत सिर्फ ऊंची इमारतों का नाम नहीं, हर घर पानी और युवाओं को अवसर मिलना जरूरी: राजनाथ सिंह

    विकसित भारत सिर्फ ऊंची इमारतों का नाम नहीं, हर घर पानी और युवाओं को अवसर मिलना जरूरी: राजनाथ सिंह


    नई दिल्ली। रक्षा मंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह ने रविवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है और आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज को पूरी दुनिया गंभीरता से सुनती है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत और मजबूत होते कद का स्पष्ट प्रमाण है। लखनऊ छावनी परिषद में करीब 101 करोड़ रुपये की लागत वाली 12 विकास परियोजनाओं के भूमिपूजन और शिलान्यास कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि इन परियोजनाओं को केवल निर्माण कार्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि ये लखनऊ छावनी के बेहतर भविष्य के लिए सरकार के 12 संकल्प हैं।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि विकसित भारत का सपना केवल बड़े प्रोजेक्ट बनाने और आधुनिक इमारतें खड़ी करने से पूरा नहीं होगा। वास्तविक विकास तब माना जाएगा जब प्रत्येक परिवार तक स्वच्छ पेयजल पहुंचे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले युवाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिलें और समाज के प्रत्येक वर्ग को सम्मानजनक सुविधाएं हासिल हों। उन्होंने कहा कि विकास की रोशनी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि हर मोहल्ले हर बस्ती और हर परिवार तक इसका लाभ पहुंचना चाहिए।

    भारत की वैश्विक स्थिति में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि करीब 10 से 12 वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भारत अपनी बात रखता था तो उसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता था जितनी भारत की क्षमता और भूमिका को मिलनी चाहिए थी। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब जब भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखता है तो पूरी दुनिया ध्यान से सुनती है कि भारत क्या कह रहा है। उन्होंने इसे देश की बढ़ती ताकत और वैश्विक प्रभाव का परिणाम बताया।

    उन्होंने कहा कि विकसित भारत का मतलब यह भी है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर मिलें। खेलकूद के क्षेत्र में आगे बढ़ने की सुविधाएं हों और दिव्यांग बच्चों को भी समाज की मुख्यधारा में बराबरी का स्थान मिले। राजनाथ सिंह ने कहा कि समय के साथ शहरों की जरूरतें बदलती हैं इसलिए विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए नियमों में भी बदलाव आवश्यक है।

    इसी दिशा में लखनऊ छावनी क्षेत्र में नए बिल्डिंग बायलॉज लागू किए गए हैं। पहले यहां जी प्लस-2 तक निर्माण की अनुमति थी जिसे बढ़ाकर जी प्लस-3 किया गया है। पार्किंग को शामिल करने पर अब पांच मंजिल तक निर्माण की अनुमति दी गई है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य लखनऊ छावनी को उसकी ऐतिहासिक विरासत के साथ आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना है ताकि क्षेत्र का विकास तेज गति से हो सके।

    रक्षा मंत्री ने छावनी क्षेत्र में कई बाजारों के नाम बदले जाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नामों में बदलाव केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसके पीछे नई पीढ़ी को देश के इतिहास और महान विभूतियों से जोड़ने की भावना है। रॉयल आर्टिलरी बाजार का नाम एकता बाजार ब्रिटिश कैवलरी बाजार का नाम वीरांगना ऊदा देवी बाजार और ब्रिटिश इन्फैंट्री बाजार का नाम माता दीन वाल्मीकि बाजार किया गया है। एक अन्य बाजार का नाम मंगल पांडे बाजार जबकि कैनेडी मार्केट का नाम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मार्केट रखा गया है।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि इन बदलावों के जरिए स्वतंत्रता संग्राम राष्ट्रसेवा और सामाजिक चेतना से जुड़े महान व्यक्तित्वों की स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने लखनऊ और उत्तर प्रदेश में हो रहे विकास कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि बेहतर जलापूर्ति शिक्षा खेलकूद बाढ़ नियंत्रण और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर लगातार काम किया जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की भी प्रशंसा की और कहा कि लखनऊ छावनी में सैन्यकर्मियों पूर्व सैनिकों और आम नागरिकों के लिए सुविधाओं का विस्तार करते हुए ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने के साथ आधुनिक विकास को आगे बढ़ाया जा रहा है।

  • पेपर लीक कानून को मिली मंजूरी, राहुल गांधी के आरोपों और विवादित शब्दों पर लोकसभा में जोरदार हंगामा

    पेपर लीक कानून को मिली मंजूरी, राहुल गांधी के आरोपों और विवादित शब्दों पर लोकसभा में जोरदार हंगामा


    नई दिल्ली । लोकसभा ने बुधवार को सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अनुचित साधनों पर रोक लगाने से जुड़े पब्लिक एग्जामिनेशन अनुचित साधनों की रोकथाम संशोधन विधेयक 2026 को विपक्ष के हंगामे के बीच ध्वनिमत से पारित कर दिया। हालांकि सदन में सबसे ज्यादा चर्चा बिल से अधिक नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण और उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों को लेकर रही। करीब पचास मिनट के भाषण के दौरान कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने सामने आ गए जिससे सदन का माहौल बेहद गर्म हो गया।

    राहुल गांधी ने परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों को युवाओं के भविष्य के साथ बड़ा अन्याय बताया। उन्होंने कहा कि लाखों छात्र मेहनत के बावजूद परीक्षा प्रक्रिया की खामियों का खामियाजा भुगत रहे हैं। उनके अनुसार यह केवल परीक्षा व्यवस्था की नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता है। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने में सरकार असफल रही है और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    भाषण के दौरान राहुल गांधी ने छात्रों से हुई बातचीत का हवाला देते हुए कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जिन पर सत्ता पक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू तुरंत खड़े हो गए और कहा कि नेता प्रतिपक्ष को संसदीय मर्यादा का पालन करना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी से अपने शब्द वापस लेने और सदन से माफी मांगने की मांग की। इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी कई बार हस्तक्षेप करते हुए असंसदीय शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति जताई और उन्हें कार्यवाही से हटाने के निर्देश दिए।

    राहुल गांधी ने अपने संबोधन में यह भी आरोप लगाया कि छात्रों के प्रदर्शन के दौरान गृह मंत्री की ओर से पुलिस कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे। इस दावे का सरकार ने कड़ा विरोध किया। किरेन रिजिजू ने आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि गोली चलाने जैसे आदेश किसी मंत्री द्वारा नहीं बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत सक्षम अधिकारी देते हैं। उन्होंने कहा कि इतने गंभीर आरोप बिना किसी प्रमाण के लगाना उचित नहीं है और नेता प्रतिपक्ष को सदन से माफी मांगनी चाहिए।

    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी अध्यक्ष से अनुरोध किया कि विवादित शब्दों को कार्यवाही से हटाया जाए। हंगामे के बीच कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों ने नारेबाजी की जिससे सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए बाधित भी हुई। बाद में कार्यवाही दोबारा शुरू होने पर विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।

    राहुल गांधी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि देश का भविष्य सड़कों पर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहा है और प्रदर्शन कर रहे छात्र किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं बल्कि अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को केवल औपचारिक कदम बताते हुए कहा कि इससे समस्या का समाधान नहीं होगा बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है।

    उधर सरकार ने संशोधन विधेयक को परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम बताया। सरकार का कहना है कि नए प्रावधानों से पेपर लीक और परीक्षा में होने वाली गड़बड़ियों पर सख्त कार्रवाई का रास्ता और मजबूत होगा। वहीं विपक्ष का कहना है कि केवल कानून बनाने से समस्या खत्म नहीं होगी बल्कि उसे प्रभावी तरीके से लागू करना भी उतना ही जरूरी है।

  • NEET विवाद पर राहुल गांधी का प्रहार छात्रों के समर्थन में सरकार को घेरा पीएम से माफी और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की रखी मांग

    NEET विवाद पर राहुल गांधी का प्रहार छात्रों के समर्थन में सरकार को घेरा पीएम से माफी और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की रखी मांग


    नई दिल्ली । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने NEET परीक्षा विवाद पेपर लीक और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। नई दिल्ली स्थित इंदिरा भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने प्रेजेंटेशन के जरिए अपने आरोपों और मांगों को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि देश के करोड़ों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है लेकिन सरकार इस पूरे मामले को गंभीरता से लेने के बजाय उसे नजरअंदाज कर रही है। राहुल ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उनके साथ धक्का मुक्की की और उन्हें घसीटा गया जिससे उनके मुंह से खून निकल आया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक पुलिसकर्मी ने उनके कान में सरकार बदलने की बात कही।

    राहुल गांधी ने कहा कि NEET पेपर लीक का असर केवल परीक्षा देने वाले छात्रों तक सीमित नहीं है बल्कि लगभग साढ़े सात करोड़ छात्र और उनके परिवार इससे प्रभावित हुए हैं। उनका आरोप था कि पिछले दस वर्षों में देशभर में 152 से अधिक पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं लेकिन किसी भी बड़े मामले में दोषियों को प्रभावी सजा नहीं मिली। उन्होंने कहा कि इससे युवाओं का शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है और मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के साथ अन्याय हो रहा है।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने 20 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन से जुड़े वीडियो भी दिखाए और आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि जब युवा अपने भविष्य को लेकर आवाज उठा रहे थे तब उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया। उनका कहना था कि लोकतंत्र में छात्रों की आवाज सुनना सरकार की जिम्मेदारी है न कि उन्हें दबाना।

    राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि भारतीय परिवार NEET परीक्षा की तैयारी पर लगभग उतनी ही राशि खर्च करते हैं जितना केंद्र सरकार पूरे शिक्षा बजट पर खर्च करती है। उनके अनुसार लाखों परिवार अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए वर्षों तक आर्थिक और मानसिक संघर्ष करते हैं लेकिन पेपर लीक जैसी घटनाएं उनकी मेहनत पर पानी फेर देती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय सरकार ने उसे कमजोर किया है।

    इस दौरान राहुल गांधी ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें भी रखीं। पहली मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की रही। दूसरी मांग छात्रों पर बल प्रयोग करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की थी। तीसरी मांग प्रधानमंत्री से छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की रही। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है तो उसे जवाबदेही तय करनी होगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे।

    राहुल गांधी ने यह भी कहा कि विपक्ष छात्रों की हर लोकतांत्रिक मांग के साथ खड़ा है और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को संसद से लेकर सड़क तक उठाता रहेगा। उन्होंने कहा कि युवाओं का भविष्य किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और यदि परीक्षा प्रणाली पर भरोसा खत्म हो गया तो देश की प्रतिभा और विकास दोनों प्रभावित होंगे। इसी कारण विपक्ष इस मुद्दे पर लगातार सरकार से जवाब मांगता रहेगा।

    Tags (English)

    Rahul Gandhi, NEET Paper Leak, Dharmendra Pradhan, Student Protest, Indian Politics

  • छात्रों के मुद्दे पर सियासी संग्राम राहुल गांधी की रिहाई के बाद सरकार पर बड़ा हमला शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज

    छात्रों के मुद्दे पर सियासी संग्राम राहुल गांधी की रिहाई के बाद सरकार पर बड़ा हमला शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज


    नई दिल्ली । देश की राजधानी दिल्ली में छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर मंगलवार को राजनीतिक माहौल बेहद गरम रहा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी प्रियंका गांधी सहित कई सांसदों और नेताओं को हिरासत में लिया। कुछ घंटों बाद सभी नेताओं को रिहा कर दिया गया जिसके बाद विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया और संसद में इस मुद्दे पर तत्काल चर्चा कराने की मांग दोहराई।

    रिहाई के बाद राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने सुबह लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर छात्रों के साथ हुई घटना पर संसद में चर्चा कराने का अनुरोध किया था। उनके अनुसार अध्यक्ष ने कहा कि इसके लिए सरकार की सहमति आवश्यक होगी। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार इस विषय पर बहस कराने में रुचि नहीं रखती इसलिए विपक्ष ने लोकतांत्रिक तरीके से प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया।

    राहुल गांधी ने कहा कि छात्रों की प्रमुख मांगों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का इस्तीफा संसद मार्च के दौरान छात्रों के साथ कथित मारपीट और दुर्व्यवहार करने वालों पर कार्रवाई तथा छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी मामलों को वापस लेना शामिल है। उन्होंने कहा कि पूरा विपक्ष चाहता है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा हो ताकि छात्रों की चिंताओं का समाधान निकल सके।

    दूसरी ओर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने रिहाई के बाद कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि छात्रों की मांगें पूरी तरह जायज हैं और लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार छात्रों की समस्याओं को सुनने के बजाय उनकी आवाज दबाने का प्रयास कर रही है। प्रियंका गांधी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए संसद में कानून लाने की आवश्यकता बताई।

    वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राहुल गांधी छात्रों का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार युवाओं और छात्रों के हित में लगातार काम कर रही है और केवल राजनीतिक बयानबाजी से समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

    भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस के प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन को अनुचित बताते हुए राहुल गांधी के आचरण की आलोचना की और कहा कि विरोध प्रदर्शन की भी एक मर्यादा होती है। भाजपा का कहना है कि संसद के भीतर सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए सरकार तैयार है लेकिन अराजकता फैलाने की राजनीति उचित नहीं है।

    दिनभर चले इस घटनाक्रम के बाद दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी प्रियंका गांधी और अन्य हिरासत में लिए गए नेताओं को रिहा कर दिया। इसके बावजूद छात्रों के मुद्दे को लेकर राजनीतिक टकराव फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है। विपक्ष लगातार संसद में चर्चा और सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहा है जबकि सरकार अपने रुख पर कायम है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस होने की संभावना जताई जा रही है।

  • आपातकाल के 51 साल: भारत के लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर, जानें कैसे बदला था देश का राजनीतिक परिदृश्य

    आपातकाल के 51 साल: भारत के लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर, जानें कैसे बदला था देश का राजनीतिक परिदृश्य

    नई दिल्ली। भारत में 25 जून 1975 की आधी रात से 21 मार्च 1977 तक लगभग 21 महीनों तक लागू रहा आपातकाल आज 51 साल पूरे कर चुका है। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की थी।

    यह दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित समय माना जाता है, जिसे लेकर आज भी राजनीतिक बहस जारी रहती है। आपातकाल के मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लगातार उठाया है, खासकर तब जब विपक्ष ने वर्तमान सरकार पर संविधान के खिलाफ काम करने के आरोप लगाए।

    किन परिस्थितियों में लगा आपातकाल

    आपातकाल की पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाई कोर्ट का 1975 का फैसला माना जाता है। इस फैसले में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया गया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि चुनाव में अनियमित तरीके अपनाए गए थे।

    मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया, जिसके बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन गई और अंततः आपातकाल की घोषणा की गई।

    आपातकाल के दौरान देश पर असर

    आपातकाल लागू होने के बाद देश में कई बड़े बदलाव देखने को मिले—
    – पूरे देश में चुनाव स्थगित कर दिए गए।
    – नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य अधिकार प्रभावित हुए।
    – 25 जून की रात से ही विपक्षी नेताओं की массов गिरफ्तारियां शुरू हो गईं, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता शामिल थे।
    – जेलों में कैदियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि स्थान की कमी हो गई।
    – प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू की गई, जिसके तहत किसी भी खबर के प्रकाशन से पहले अनुमति अनिवार्य थी।
    – सरकार विरोधी खबरें प्रकाशित करने पर कार्रवाई और गिरफ्तारियों के मामले भी सामने आए।

    इस दौर में प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई को लेकर कई तरह के आरोप और अनुभव भी सामने आए, जिन्हें बाद में व्यापक बहस का विषय बनाया गया।

    आपातकाल से जुड़े दावे और चर्चाएं

    पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे आरके धवन के एक साक्षात्कार में आपातकाल से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा की गई। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस.एस. राय ने जनवरी 1975 में ही आपातकाल लागू करने की सलाह दी थी।

    यह भी दावा किया गया कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की सिफारिश को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी और तुरंत सहमति दे दी थी।

    कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि उस समय इंदिरा गांधी को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी, जबकि बाद में 1977 के चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।

    आपातकाल का राजनीतिक प्रभाव

    आपातकाल भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय बन गया, जिसे कई दल लोकतंत्र पर बड़ा संकट मानते हैं। यह दौर आज भी राजनीतिक चर्चाओं और बहसों में एक प्रमुख संदर्भ के रूप में देखा जाता है, खासकर लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर।
  • यू-टर्न के बाद फंसी रणनीति? अभिजीत दीपके के अगले कदम पर सस्पेंस

    यू-टर्न के बाद फंसी रणनीति? अभिजीत दीपके के अगले कदम पर सस्पेंस


    नई दिल्ली। अमेरिका से 6 जून को दिल्ली पहुंचने वाले Abhijeet Deepke ने पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थकों को राजधानी में जुटने का आह्वान किया था। शुरुआत में उन्होंने लोगों से कहा था कि वे इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI) पर उनका स्वागत करने पहुंचें। उनका दावा था कि दिल्ली पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है, इसलिए समर्थकों की मौजूदगी जरूरी होगी।

    हालांकि, प्रदर्शन से ठीक दो दिन पहले दीपके ने अपने रुख में बड़ा बदलाव करते हुए समर्थकों से एयरपोर्ट न आने की अपील कर दी। उन्होंने तर्क दिया कि बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से आम यात्रियों और नागरिकों को परेशानी हो सकती है। लेकिन इस फैसले ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    एयरपोर्ट से हटे, लेकिन आगे का रास्ता अस्पष्ट
    दीपके ने अब कहा है कि वे एयरपोर्ट से सीधे पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने जाएंगे और समर्थक वहीं एकत्रित हों। यहीं से प्रदर्शन की अनुमति लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई है।

    लेकिन आलोचकों और पर्यवेक्षकों का सवाल है कि यदि वास्तव में हजारों या लाखों लोग पहुंचते हैं, जैसा कि CJP दावा कर रही है, तो नई दिल्ली के अत्यंत संवेदनशील इलाके में व्यवस्था कैसे बनाए रखी जाएगी? पार्लियामेंट स्ट्रीट और आसपास के क्षेत्रों में कई सरकारी कार्यालय, महत्वपूर्ण संस्थान और व्यस्त मार्ग मौजूद हैं। ऐसे में बड़ी भीड़ के जुटने से यातायात और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि अनुमति मिलने तक समर्थक कहां रहेंगे और भीड़ को नियंत्रित करने की क्या व्यवस्था होगी।

    अनुमति को लेकर सबसे बड़ा सवाल
    पूरा विवाद प्रदर्शन की अनुमति को लेकर भी केंद्रित है। अब तक CJP की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पूर्व निर्धारित प्रक्रिया के तहत पुलिस या प्रशासन से पहले ही अनुमति क्यों नहीं मांगी गई। पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि दीपके स्वयं दिल्ली पहुंचकर आवेदन देंगे, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि क्या कुछ घंटों के भीतर किसी बड़े धरना-प्रदर्शन की अनुमति मिल पाना संभव होगा।

    अगर अनुमति नहीं मिली तो क्या होगा?
    सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन या जंतर-मंतर पर सभा की अनुमति देने से इनकार कर दिया, तो पार्टी की अगली रणनीति क्या होगी?

    इस मुद्दे पर न तो दीपके ने और न ही पार्टी के अन्य नेताओं ने कोई स्पष्ट जवाब दिया है। समर्थकों को भी यह नहीं बताया गया है कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना होगा। यही वजह है कि प्रदर्शन से पहले ही पूरे कार्यक्रम को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

    फिलहाल, 6 जून के कार्यक्रम पर सबकी नजरें टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि अभिजीत दीपके का ‘दिल्ली प्लान’ जमीन पर कितना सफल होता है और प्रशासन तथा प्रदर्शनकारियों के बीच स्थिति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

  • मोदी सरकार पर राहुल गांधी का नया हमला, महंगाई और रोजगार के मुद्दों पर साधा निशाना

    मोदी सरकार पर राहुल गांधी का नया हमला, महंगाई और रोजगार के मुद्दों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । देश की राजनीति में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार तेज बना हुआ है। इसी बीच कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है जिसने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। राहुल गांधी ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अपनी पहले की बात दोहराते हुए दावा किया कि आने वाले समय में देश की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। उनके इस बयान के बाद सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है।

    दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान राहुल गांधी ने कई राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखी। इस दौरान उन्होंने आर्थिक चुनौतियों और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया। राहुल गांधी ने कहा कि देश के सामने महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याएं लगातार गंभीर रूप ले रही हैं और इन मुद्दों पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। उन्होंने दावा किया कि आर्थिक मोर्चे पर सरकार कई सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है।

    राहुल गांधी ने अपने संबोधन के दौरान यह भी कहा कि बदलते राजनीतिक माहौल में जनता कई मुद्दों पर गंभीरता से विचार कर रही है। उनके बयान के बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। विपक्षी दलों के नेता इसे सरकार के खिलाफ बढ़ती असंतुष्टि से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे राजनीतिक बयानबाजी बताया है।

    राजनीतिक चर्चा के बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी इस बैठक का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। पार्टी संगठन और राजनीतिक ढांचे में अनुसूचित जाति समुदाय की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया। बैठक में इस बात पर विचार किया गया कि संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत कैसे बनाया जाए तथा समाज के विभिन्न वर्गों को राजनीतिक प्रक्रिया में अधिक अवसर कैसे दिए जाएं।

    बैठक में शामिल नेताओं ने सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा की। माना जा रहा है कि कांग्रेस आने वाले समय में संगठनात्मक स्तर पर कुछ नई रणनीतियों पर काम कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विभिन्न राज्यों में पार्टी अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है और इसी दिशा में सामाजिक समीकरणों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    इस दौरान भाजपा की ओर से भी राहुल गांधी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी नेताओं ने कहा कि केंद्र सरकार स्थिर और मजबूत स्थिति में है तथा विपक्ष के दावों का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच दोनों दलों के नेताओं ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया।

    देश की राजनीति में आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम होने हैं और ऐसे में बड़े नेताओं के बयान लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। फिलहाल राहुल गांधी के इस बयान ने राजनीतिक बहस को एक नई दिशा दे दी है और अब सभी की नजर आने वाले दिनों की राजनीतिक गतिविधियों पर बनी हुई है।

  • 18 जून को राज्यसभा चुनाव, 24 सीटें खाली होने से बदलेगा सियासी गणित, कई दिग्गज नेताओं का कार्यकाल समाप्त

    18 जून को राज्यसभा चुनाव, 24 सीटें खाली होने से बदलेगा सियासी गणित, कई दिग्गज नेताओं का कार्यकाल समाप्त


    नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा संसदीय फेरबदल देखने को मिलने वाला है, क्योंकि राज्यसभा की कई महत्वपूर्ण सीटों पर चुनावी प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। चुनाव आयोग द्वारा घोषित कार्यक्रम के अनुसार 10 राज्यों की कुल 24 राज्यसभा सीटों पर आगामी जून में मतदान कराया जाएगा, जिससे उच्च सदन की राजनीतिक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हैं।

    इन सीटों पर चुनाव की प्रक्रिया 18 जून को मतदान के साथ पूरी होगी। इससे पहले नामांकन, जांच और नाम वापसी की औपचारिक प्रक्रिया निर्धारित समय के अनुसार संपन्न की जाएगी। यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें कई वरिष्ठ और अनुभवी सांसदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, जिससे संसद के ऊपरी सदन में नई राजनीतिक समीकरणों की शुरुआत होगी।

     जिन प्रमुख सांसदों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है उनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इनके अलावा विभिन्न दलों के कई अन्य सांसद भी इस सूची में हैं, जिनका राज्यसभा कार्यकाल पूरा हो रहा है। यह स्थिति राजनीतिक दलों के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे आने वाले समय में सदन की संख्या और शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।

    राज्यों के हिसाब से देखें तो गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में चार-चार सीटों पर चुनाव होगा, जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में तीन-तीन सीटें खाली हो रही हैं। झारखंड में दो सीटों पर चुनाव होगा, वहीं अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और मेघालय में एक-एक सीट पर प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इन सभी राज्यों में राजनीतिक दल अपने-अपने गणित को साधने में जुट गए हैं।

     इस चुनावी प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर उन राज्यों में देखने को मिलेगा जहां विधानसभा में सीटों का संतुलन बेहद करीबी मुकाबले का है। ऐसे राज्यों में छोटे राजनीतिक अंतर भी राज्यसभा सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी वजह से सभी प्रमुख दलों ने अभी से रणनीति बनानी शुरू कर दी है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं बल्कि विधायकों के माध्यम से होते हैं, इसलिए विधानसभा की संख्या ही अंतिम परिणाम तय करती है। यही कारण है कि हर पार्टी अपने विधायकों को एकजुट रखने और क्रॉस वोटिंग से बचाने पर विशेष ध्यान दे रही है।

     राज्यसभा एक स्थायी सदन है, जिसमें हर दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं। इस प्रक्रिया से सदन में निरंतरता बनी रहती है, लेकिन राजनीतिक संतुलन समय-समय पर बदलता रहता है। वर्तमान चुनाव भी इसी बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।

    कुल मिलाकर 24 सीटों पर होने वाला यह चुनाव न केवल संख्या का खेल है, बल्कि आने वाले समय में संसद के भीतर राजनीतिक समीकरणों और दलों की ताकत को भी प्रभावित करेगा। सभी प्रमुख दल अब इन सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए अंतिम रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं।

  • ओवैसी और कांग्रेस पर किरेन रिजिजू का तीखा बयान, अल्पसंख्यक राजनीति पर फिर छिड़ी बहस

    ओवैसी और कांग्रेस पर किरेन रिजिजू का तीखा बयान, अल्पसंख्यक राजनीति पर फिर छिड़ी बहस

    नई दिल्ली ।भारतीय राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी देखने को मिली है, जब केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री Kiren Rijiju ने एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi को लेकर एक बयान दिया, जिसने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है। उनके बयान के केंद्र में न केवल ओवैसी रहे, बल्कि मुख्य विपक्षी दल Indian National Congress पर भी गंभीर आरोप लगाए गए।

    मामला तब सामने आया जब किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी करते हुए ओवैसी को देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में से एक बताया और साथ ही यह भी कहा कि वे लगातार मुस्लिम समुदाय के अधिकारों की बात उठाते रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसे “मुस्लिम लीग पार्टी” जैसा बताने की बात कही, जिससे राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

    रिजिजू के इस बयान के बाद देश की राजनीति में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। उन्होंने अपने विचारों में यह भी संकेत दिया कि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, अपनी जनसंख्या और स्थिति को लेकर किसी तरह की हीन भावना न रखें, क्योंकि देश का लोकतांत्रिक ढांचा सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है।

    अपने बयान के दौरान उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि देश में अलग-अलग धार्मिक समुदाय शांतिपूर्वक और सुरक्षित वातावरण में रहते हैं। उन्होंने पारसी समुदाय का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमित संख्या में होने के बावजूद यह समुदाय भी भारत में सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी रहा है। इस संदर्भ में उन्होंने यह तर्क देने की कोशिश की कि भारत में धार्मिक आधार पर भेदभाव की स्थिति नहीं है और सभी समुदायों को समान अवसर प्राप्त हैं।

    इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में विभिन्न दलों की ओर से प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। विपक्षी नेताओं ने इस टिप्पणी को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आलोचना की है, जबकि समर्थक इसे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं। इस मुद्दे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश में अल्पसंख्यक राजनीति की दिशा और परिभाषा क्या होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान चुनावी राजनीति के दौरान अक्सर चर्चा का केंद्र बन जाते हैं, जिससे जनमत पर भी प्रभाव पड़ता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इस तरह की बयानबाजी से राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है।

    फिलहाल, किरेन रिजिजू के इस बयान ने न केवल सोशल मीडिया पर बहस को तेज कर दिया है, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच भी नई बयानबाजी की शुरुआत कर दी है, जिसका असर आने वाले समय में और स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।

  • पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को राष्ट्र ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि, नेताओं ने बताया जनसेवा का प्रतीक

    पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को राष्ट्र ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि, नेताओं ने बताया जनसेवा का प्रतीक

    नई दिल्ली । उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ राजनेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी के निधन से देशभर में शोक की लहर फैल गई है। राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अपनी सादगी, अनुशासन और ईमानदार छवि के लिए पहचाने जाने वाले खंडूरी के जाने को सार्वजनिक जीवन की बड़ी क्षति माना जा रहा है। उनके निधन पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सहित देश के कई वरिष्ठ नेताओं ने गहरी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए उन्हें राष्ट्रसेवा और सुशासन का प्रतीक बताया।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि भुवन चंद्र खंडूरी ने अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, पारदर्शिता और विकास की राजनीति का आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सेना में उत्कृष्ट सेवाएं देने के बाद उन्होंने राजनीति में भी जनहित और सुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। राष्ट्रपति ने उनके योगदान को देश और विशेष रूप से उत्तराखंड के विकास के लिए अविस्मरणीय बताया।

    देश के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी खंडूरी के निधन को अपूरणीय क्षति करार दिया। नेताओं ने कहा कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में अनुशासन और राष्ट्रहित को हमेशा सर्वोपरि रखा। उनकी साफ-सुथरी छवि और जनसेवा के प्रति समर्पण उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान दिलाता था। उत्तराखंड में उनके कार्यकाल को सुशासन और विकास के लिए आज भी याद किया जाता है।

    भुवन चंद्र खंडूरी केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक पूर्व सैनिक भी थे जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दीं। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और सार्वजनिक जीवन में भी उसी अनुशासन और ईमानदारी को बनाए रखा। उनके नेतृत्व में कई विकास कार्यों को गति मिली और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए गए।

    राजनीतिक जीवन में उनकी छवि एक सादगीपूर्ण और कर्मठ नेता की रही। उन्होंने हमेशा साफ राजनीति और जनहित को प्राथमिकता दी। यही वजह रही कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग भी उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली का सम्मान करते थे। उनके निधन के बाद देशभर से श्रद्धांजलियों का सिलसिला लगातार जारी है।

    उत्तराखंड की राजनीति में भुवन चंद्र खंडूरी का नाम एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने विकास, पारदर्शिता और जनकल्याण को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा और सार्वजनिक जीवन में उनकी सादगी तथा ईमानदारी हमेशा उदाहरण के रूप में याद की जाएगी।