Tag: Indian Politics

  • गौरव गोगोई का हिमंता बिस्वा सरमा पर हमला: भ्रष्टाचार और मतदान अधिकारों

    गौरव गोगोई का हिमंता बिस्वा सरमा पर हमला: भ्रष्टाचार और मतदान अधिकारों

    नई दिल्ली| गौरव गोगोई का आरोपअसम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पर गंभीर आरोप लगाते हुए उनके शासन में भ्रष्टाचार और कुशासन की बातें की हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदान अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
    पत्रकारों से बातचीत करते हुए गोगोई ने कहा कि भाजपा के खिलाफ वोट देने वाले लोगों को दोबारा मतदान करने से रोका जा रहा है, जो उनकी डर का संकेत है।

    जुबीन गर्ग हत्याकांड पर सवाल

    गोगोई ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री सरमा जुबीन गर्ग हत्या मामले में न्याय दिलाने में असफल रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरमा अक्सर झूठे और भ्रामक बयान देते हैं, और उनके शब्दों में कोई विश्वसनीयता नहीं है। गोगोई ने कहा कि जुबीन गर्ग मामले में कमजोर चार्जशीट पेश की गई है, और इसमें शामिल लोगों के नाम इसलिए नहीं हैं क्योंकि वे मुख्यमंत्री के करीबी हैं।

    जाति बचाओ, मति बचाओ अभियान

    गौरव गोगोई ने ‘जाति बचाओ, मति बचाओ’ अभियान के तहत गुवाहाटी में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में कई सामुदायिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने कांग्रेस में शामिल होने की घोषणा की। शामिल होने वालों में प्रमुख आदिवासी नेता रुकमा कुमार मेडोक और पूर्व अल्पसंख्यक छात्र संघ के अध्यक्ष रेजाउल करीम सरकार शामिल थे।

    तरुण गोगोई की याद

    गोगोई ने अपने दिवंगत पिता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को याद करते हुए कहा कि उन्होंने एक बार असम के राजनीतिक माहौल को बदल दिया था। उन्होंने कहा कि आज असम के लोग फिर से सत्ता पर सवाल उठा रहे हैं। गोगोई ने चेतावनी दी कि वर्तमान सरकार ने भय का माहौल बनाया है और इसे समाप्त करना आवश्यक है।

  • बीजेपी ने नेहरू पर निशाना साधा, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में लिखे थे 17 पत्र

    बीजेपी ने नेहरू पर निशाना साधा, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में लिखे थे 17 पत्र


    गुजरात। गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर, जिसे महमूद ग़ज़नी और अलाउद्दीन खिलजी जैसे आक्रमणकारियों ने लूटा था अब 1000 साल का उत्सव मना रहा है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर से पंडित जवाहरलाल नेहरू पर निशाना साधा है, जिनकी सरकार ने स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध किया था। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि पंडित नेहरू ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को 17 पत्र लिखे थे जिनमें उन्होंने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के खिलाफ अपनी नापसंदगी व्यक्त की थी।

    सुधांशु त्रिवेदी ने 21 अप्रैल, 1951 को नेहरू द्वारा लियाकत अली खान को लिखे पत्र का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि पंडित नेहरू ने मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रयास को झूठा बताया और इसे लेकर किसी प्रकार की आस्था या राजनीति को अस्वीकार किया। त्रिवेदी ने कहा कि नेहरू ने लियाकत अली खान को प्रिय नवाबजादा कहकर संबोधित किया और सोमनाथ मंदिर के बारे में किसी भी पुनर्निर्माण के प्रयास की बात से इनकार किया।

    इस पत्र को बीजेपी ने तुष्टीकरण की राजनीति का उदाहरण बताते हुए कहा कि नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए यह कदम उठाया। सुधांशु त्रिवेदी ने यह भी दावा किया कि पंडित नेहरू ने एक तरह से पाकिस्तान के प्रति आत्मसमर्पण करते हुए सोमनाथ मंदिर के निर्माण को नकार दिया था और यह दिखाता है कि स्वतंत्र भारत में नेहरू को भगवान सोमनाथ से सबसे ज्यादा नफरत थी।

    बीजेपी के प्रवक्ता ने यह सवाल भी उठाया कि अगर यह तुष्टीकरण की राजनीति और मुग़ल आक्रमणकारियों के महिमामंडन के अलावा कुछ और था तो पंडित नेहरू को लियाकत अली खान को पत्र क्यों लिखना पड़ा उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के बाद के दौर में पंडित नेहरू ने भारतीय संस्कृति धार्मिक आस्थाओं और इतिहास से दूर रहते हुए पाकिस्तान के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी।

    सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के इस विवाद ने कई बार राजनीतिक हलकों में चर्चा पैदा की है, जहां एक तरफ बीजेपी इसे भारतीय संस्कृति और धार्मिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानती है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस मुद्दे पर विभाजन और तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप लगाता रहा है।

    वर्तमान में सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का यह उत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह भारतीय राजनीति और इतिहास को भी पुन परिभाषित करने का एक अवसर बन चुका है। सोमनाथ के पुनर्निर्माण की कहानी को लेकर न केवल हिंदू धर्म के अनुयायी बल्कि भारतीय राजनीति में भी एक गहरी बहस छिड़ चुकी है।

  • राहुल गांधी की राम से तुलना पर सियासी बवाल, नाना पाटोले के बयान को संजय निरुपम ने बताया हास्यास्पद

    राहुल गांधी की राम से तुलना पर सियासी बवाल, नाना पाटोले के बयान को संजय निरुपम ने बताया हास्यास्पद

    नई दिल्ली।कांग्रेस नेता नाना पाटोले द्वारा राहुल गांधी की तुलना भगवान राम से किए जाने पर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। इस बयान पर शिवसेना नेता संजय निरुपम ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। गुरुवार को उन्होंने इसे न केवल हास्यास्पद बयान बताया बल्कि कांग्रेस पार्टी के राम के प्रति रुख पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।

    संजय निरुपम ने कहा कि कांग्रेस पार्टी का इतिहास भगवान राम और राम मंदिर के विरोध से जुड़ा रहा है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर कांग्रेस ने हमेशा बाधाएं खड़ी कीं और कई बार भगवान राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए। ऐसे में राहुल गांधी की तुलना भगवान राम से करना पूरी तरह अनुचित और हास्यास्पद है।उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस नेताओं को भगवान राम के नाम का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं करना चाहिए। निरुपम के अनुसार कांग्रेस पार्टी के आचरण और उसके नेताओं की गतिविधियों को देखते हुए उनकी तुलना भगवान राम से नहीं बल्कि रावण से की जानी चाहिए। उन्होंने कहा राम के नाम को बदनाम मत कीजिए। जिन लोगों का आचरण राम के आदर्शों से मेल नहीं खाता वे ऐसी तुलना करने के अधिकारी नहीं हैं।

    दरअसल यह विवाद तब शुरू हुआ जब बुधवार को कांग्रेस नेता नाना पाटोले से राहुल गांधी के राम मंदिर न जाने को लेकर सवाल किया गया। इसके जवाब में पाटोले ने कहा था कि कांग्रेस भगवान राम का काम कर रही है और राहुल गांधी शोषितों पीड़ितों और वंचितों के लिए वही कार्य कर रहे हैं जो भगवान राम ने किया था। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी देशभर में न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं और जब वे अयोध्या जाएंगे तो राम मंदिर में प्रार्थना करेंगे।नाना पाटोले ने यह भी दावा किया कि जब रामलला के मंदिर के ताले बंद थे तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें खुलवाने का आदेश दिया था। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया।

    गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब नाना पाटोले राहुल गांधी की तुलना भगवान राम से जोड़कर विवादों में आए हों। इससे पहले अक्टूबर 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी उन्होंने राहुल गांधी और भगवान राम के नाम को जोड़ते हुए बयान दिया था जिस पर भाजपा नेताओं ने कड़ा विरोध जताया था।उस समय पाटोले ने सफाई देते हुए कहा था कि कांग्रेस राहुल गांधी की तुलना भगवान राम से नहीं करती बल्कि यह केवल एक संयोग है कि दोनों के नामआर अक्षर से शुरू होते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि भगवान राम शंकराचार्य और राहुल गांधी की यात्राओं में समानता बताना तुलना नहीं है।

    हालांकि भाजपा नेताओं ने उनके इस तर्क को खारिज करते हुए इसे हिंदू भावनाओं का अपमान बताया था। भाजपा नेता सीआर केशवन ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए नाना पाटोले से सवाल किया था कि राहुल गांधी अब तक अयोध्या राम मंदिर क्यों नहीं गए।अब एक बार फिर इस बयान ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है और राहुल गांधी कांग्रेस तथा राम मंदिर से जुड़े मुद्दे पर सियासी टकराव तेज हो गया है।

     

  • मध्य प्रदेश विधानसभा होगी पेपरलेस: दिल्ली से आए विशेषज्ञ विधायकों को देंगे ऑनलाइन कार्यवाही की ट्रेनिंग

    मध्य प्रदेश विधानसभा होगी पेपरलेस: दिल्ली से आए विशेषज्ञ विधायकों को देंगे ऑनलाइन कार्यवाही की ट्रेनिंग


    मध्य प्रदेश। विधानसभा को आधुनिक और तकनीक-आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। राज्य में विधानसभा की कार्यवाही को पूरी तरह डिजिटल और पेपरलेस बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसी क्रम में मंगलवार को भोपाल में विधायकों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, जिसमें उन्हें ऑनलाइन और डिजिटल माध्यम से विधानसभा कार्यवाही संचालित करने की जानकारी दी जाएगी। यह प्रशिक्षण राष्ट्रीय ई-विधान एप्लिकेशन NeVA परियोजना के तहत आयोजित किया जा रहा है। विधानसभा सचिवालय से मिली जानकारी के अनुसार, यह सत्र मंगलवार को सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक विधानसभा परिसर स्थित मानसरोवर सभागार में होगा। इसमें प्रदेश के विधायक भाग लेंगे और उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग से जुड़े विभिन्न संसदीय कार्यों की प्रक्रिया समझाई जाएगी।

    दिल्ली से आई विशेषज्ञों की टीम

    इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए संसदीय कार्य मंत्रालय, नई दिल्ली से विशेषज्ञों की एक टीम भोपाल पहुंची है। ये विशेषज्ञ विधायकों को बताएंगे कि किस प्रकार मोबाइल टैबलेट, लैपटॉप या अन्य डिजिटल उपकरणों के माध्यम से विधानसभा की कार्यवाही में भाग लिया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान लाइव डेमो के जरिए डिजिटल सिस्टम का उपयोग भी दिखाया जाएगा, ताकि विधायकों को व्यवहारिक अनुभव मिल सके।विशेषज्ञों द्वारा विधायकों को यह सिखाया जाएगा कि वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रश्न कैसे दर्ज करें, विधेयकों का अध्ययन कैसे करें और सदन की कार्यसूची, रिपोर्ट एवं अन्य दस्तावेजों तक तुरंत कैसे पहुंचें।

    कागज से मिलेगी छुटकारा

    NeVA परियोजना के लागू होने के बाद विधानसभा की कार्यवाही में कागजों का इस्तेमाल लगभग समाप्त हो जाएगा। प्रश्नोत्तर काल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, विधेयकों की प्रतियां, कार्यसूची, मतदान प्रक्रिया और उपस्थिति से संबंधित सभी जानकारियां डिजिटल रूप में उपलब्ध रहेंगी। इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि दस्तावेजों के रखरखाव और रिकॉर्ड प्रबंधन में भी आसानी होगी।विधानसभा सचिवालय का मानना है कि डिजिटल कार्यप्रणाली से सदन की पारदर्शिता बढ़ेगी और कार्यवाही अधिक सुचारू रूप से संचालित हो सकेगी।

    क्या है NeVA प्लेटफॉर्म

    NeVA यानी नेशनल ई-विधान एप्लिकेशन एक ऐसा डिजिटल सिस्टम है, जिसके माध्यम से विधानसभा की पूरी कार्यवाही रियल-टाइम में दर्ज की जाती है। इस प्लेटफॉर्म पर विधायकों को व्यक्तिगत लॉगिन उपलब्ध कराया जाता है, जिससे वे सदन से जुड़े सभी दस्तावेज, प्रस्ताव और रिपोर्ट तुरंत देख सकते हैं।यह परियोजना वन नेशन, वन एप्लिकेशन की अवधारणा पर आधारित है, जिसका उद्देश्य देश की संसद और सभी राज्य विधानसभाओं को एक समान डिजिटल प्रणाली से जोड़ना है।

    चरणबद्ध तरीके से होगा लागू
    विधानसभा सचिवालय के अधिकारियों के अनुसार, प्रशिक्षण के बाद चरणबद्ध तरीके से पेपरलेस कार्यप्रणाली को पूरी तरह लागू किया जाएगा। शुरुआती चरण में तकनीकी सहायता टीम भी तैनात रहेगी, ताकि विधायकों को किसी भी तरह की तकनीकी परेशानी न हो।अधिकारियों का कहना है कि विधायकों की सुविधा और कार्यकुशलता को ध्यान में रखते हुए डिजिटल सिस्टम को धीरे-धीरे पूरी तरह लागू किया जाएगा।

    क्यों अहम है यह कदम

    विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि इससे विधानसभा की कार्यक्षमता, पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी। कागजों की खपत कम होने से लागत में भी कमी आएगी।मध्य प्रदेश विधानसभा का यह डिजिटल बदलाव आने वाले समय में अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है और देश की विधायी प्रक्रिया को आधुनिक स्वरूप देने में सहायक होगा।

  • प्रियंका और राहुल गांधी के बीच परिवारिक कलह केंद्रीय मंत्री ने झगड़े का दावा किया

    प्रियंका और राहुल गांधी के बीच परिवारिक कलह केंद्रीय मंत्री ने झगड़े का दावा किया


    नई दिल्ली । केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रही आंतरिक कलह को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच गंभीर विवाद चल रहा है जिससे राहुल गांधी ने परिवार और पार्टी से लड़कर विदेश जाने का निर्णय लिया। बिट्टू ने कहा राहुल गांधी का विदेश में होना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस परिवार में कुछ गहरे मतभेद हैं। राहुल गांधी पार्टी और परिवार से झगड़कर विदेश गए हैं जबकि उनकी बहन प्रियंका गांधी भी लगातार अपनी बात रख रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस के अंदर ‘टीम प्रियंका बनाम टीम राहुल’ का झगड़ा अब खुलकर सामने आ चुका है।

    केंद्रीय मंत्री ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी जर्मनी में हैं जहां उनकी तस्वीरें दिखाई दी हैं जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के लिए दुनिया भर में काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस के नेताओं को महात्मा गांधी से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि वे अपनी आंतरिक लड़ाई में उलझे हुए हैं। इससे पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने भी कांग्रेस की आंतरिक कलह का दावा किया था और इसे टीम प्रियंका बनाम टीम राहुल के रूप में पेश किया था। पूनावाला ने कहा था कांग्रेस की आंतरिक कलह अब बाहर आ गई है जो कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति के लिए चिंता का विषय है।

    बिट्टू के बयान के बाद कांग्रेस से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर कोई बड़ा विवाद चल रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की तरफ से इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट बयान न आने से अटकलें और भी तेज हो गई हैं। इस आंतरिक कलह को लेकर भाजपा ने कांग्रेस को घेरते हुए सवाल उठाए हैं जबकि कांग्रेस के नेताओं के बीच बढ़ते मतभेदों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है।

  • सरकार का सोनिया गांधी पर हमला नेहरू के दस्तावेज लौटाने की मांग कहा – ये निजी संपत्ति नहीं हैं

    सरकार का सोनिया गांधी पर हमला नेहरू के दस्तावेज लौटाने की मांग कहा – ये निजी संपत्ति नहीं हैं


    नई दिल्ली । भारत सरकार ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित 51 बक्सों में रखे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय पीएमएमएल को वापस करने की मांग की है। यह दस्तावेज 2008 में तात्कालिक प्रधानमंत्री संग्रहालय से गांधी परिवार को सौंपे गए थे लेकिन अब तक इन्हें वापस नहीं किया गया है। सरकार ने इन दस्तावेजों को निजी संपत्ति मानने से इनकार करते हुए कहा है कि ये सार्वजनिक अभिलेख हैं और इनकी सार्वजनिक पहुंच जरूरी है।

    केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस मुद्दे पर कहा यह कोई निजी पारिवारिक दस्तावेज नहीं हैं। ये भारत के पहले प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय अभिलेख हैं और इन्हें सार्वजनिक अभिलेखागार में होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इन दस्तावेजों की अदला-बदली को लेकर संसद में कई बार चर्चा हो चुकी है लेकिन अब तक इन्हें वापस नहीं किया गया।

    विवाद तब और बढ़ गया जब भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में एक सवाल उठाया कि क्या 2025 में पीएमएमएल के निरीक्षण के दौरान नेहरू के दस्तावेज गायब पाए गए थे। इसके जवाब में शेखावत ने साफ किया कि ये दस्तावेज लापता नहीं हैं बल्कि सोनिया गांधी के पास हैं और उनका स्थान पूरी तरह से ज्ञात है। उन्होंने कहा कि ये दस्तावेज 2008 में विधिवत तरीके से गांधी परिवार को सौंपे गए थे लेकिन वे अब भी वापस नहीं किए गए हैं।

    शेखावत ने आगे कहा सोनिया गांधी से यह पूछा जाना चाहिए कि क्यों ये दस्तावेज अब तक वापस नहीं किए गए जबकि कई बार पीएमएमएल की ओर से पत्र भेजे गए हैं। अगर कुछ छिपाया जा रहा है तो क्या यह सही है? उन्होंने यह भी जोड़ा कि इतिहास को सही तरीके से समझने और उसमें सही दृष्टिकोण विकसित करने के लिए इन दस्तावेजों तक सभी को पहुंच मिलनी चाहिए। विपक्षी कांग्रेस ने इस मुद्दे पर जवाब देते हुए शेखावत से पूछा कि क्या अब वह माफी मांगेंगे क्योंकि यह स्पष्ट हो गया है कि दस्तावेज गायब नहीं थे। कांग्रेस ने सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि वह इस मुद्दे को केवल राजनीतिक लाभ के लिए तूल दे रही है।

    कुल मिलाकर यह मामला अब एक गंभीर राजनीतिक मुद्दा बन गया है। जहां एक तरफ सरकार ने नेहरू के दस्तावेजों को सार्वजनिक अभिलेखागार में रखने की जरूरत जताई है वहीं कांग्रेस और गांधी परिवार की ओर से इसे एक निजी और परिवारिक अधिकार बताया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि इस मामले पर ममता बनर्जी और सोनिया गांधी किस तरह की प्रतिक्रिया देती हैं और सरकार इस मुद्दे को किस दिशा में ले जाती है।

  • राहुल–प्रियंका के बीच तकरार के दावे: विदेश दौरे पर गए राहुल गांधी को लेकर केंद्रीय मंत्री बिट्टू का बड़ा हमला

    राहुल–प्रियंका के बीच तकरार के दावे: विदेश दौरे पर गए राहुल गांधी को लेकर केंद्रीय मंत्री बिट्टू का बड़ा हमला


    नई दिल्ली/कांग्रेस पार्टी की आंतरिक राजनीति को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के बाद अब केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तथा उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच कथित विवाद का दावा किया है। बिट्टू का कहना है कि दोनों के बीच गंभीर मतभेद चल रहे हैं और इसी वजह से राहुल गांधी परिवार और पार्टी से नाराज होकर विदेश चले गए हैं। रवनीत सिंह बिट्टू ने यह बयान एनडीटीवी से बातचीत के दौरान दिया। उनसे कांग्रेस द्वारा वीबी जी राम जी बिल को लेकर प्रस्तावित प्रदर्शन पर सवाल किया गया था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए बिट्टू ने कांग्रेस नेतृत्व और गांधी परिवार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास अब न तो विचारधारा बची है और न ही जमीन पर प्रदर्शन करने के लिए लोग।

    केंद्रीय मंत्री ने कहाकांग्रेस का महात्मा गांधी से कोई लेना-देना नहीं है। इनके लिए गांधी का मतलब सिर्फ प्रियंका गांधीराहुल गांधीइंदिरा गांधीराजीव गांधी और संजय गांधी तक सीमित रह गया है। उन्हें उस गांधी से समस्या है जो देश और समाज के लिए खड़ा था। बिट्टू ने दावा किया कि जनता अब उस नाम वाले गांधी को नकार चुकी हैजबकि महात्मा गांधी का सम्मान देश में हमेशा बना रहेगा।राहुल गांधी के विदेश दौरे को लेकर बिट्टू ने तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का नाम रोशन करने के लिए विदेश जाते हैंजबकि राहुल गांधी सैर-सपाटे के लिए विदेश रवाना हो जाते हैं। उन्होंने कहा मैंने अभी राहुल गांधी की तस्वीरें जर्मनी से देखीं। सवाल यह है कि राहुल गांधी हैं कहां? देश के अहम मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिएलेकिन वो विदेश में घूमते नजर आते हैं।

    इसके बाद बिट्टू ने राहुल और प्रियंका गांधी के बीच कथित टकराव को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि संसद में हाल के दिनों में दिए गए भाषणों को लेकर दोनों के बीच तुलना होने लगी है। बिट्टू के मुताबिककई लोगों ने प्रियंका गांधी के भाषणों की तुलना राहुल गांधी से कीजिससे राहुल नाराज हो गए। उन्होंने कहादोनों गांधी के बीच बड़ी भारी लड़ाई चल रही है। राहुल गांधी इसी नाराजगी में परिवार और पार्टी से झगड़ा कर विदेश चले गए हैं।केंद्रीय मंत्री ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और दिशा को लेकर गंभीर समस्याएं हैं। उनके अनुसारराहुल गांधी का विदेश जाना केवल व्यक्तिगत दौरा नहींबल्कि पार्टी और परिवार के अंदरूनी तनाव का नतीजा है। हालांकिइन आरोपों पर कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    यह पहला मौका नहीं है जब भाजपा नेताओं ने कांग्रेस में अंदरूनी कलह का दावा किया हो। इससे पहले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला भी सोशल मीडिया पर कांग्रेस को लेकर ऐसे ही आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने लिखा था किटीम प्रियंका बनाम टीम राहुल अब खुलकर सामने आ गई है और कांग्रेस की आंतरिक कलह सार्वजनिक हो चुकी है।शहजाद पूनावाला ने ओडिशा से कांग्रेस के पूर्व नेता मोहम्मद मुकीम के पत्र का हवाला देते हुए कहा था कि पार्टी में नेतृत्व संकट गहराता जा रहा है। उन्होंने दावा किया था कि मुकीम ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर मल्लिकार्जुन खरगे को हटाने और प्रियंका गांधी को आगे लाने की मांग की थी। साथ ही उन्होंने प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व पर भी गंभीर सवाल उठाए थे।

    भाजपा का कहना है कि कांग्रेस इस समय संगठनात्मक और वैचारिक संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असमंजस और आपसी खींचतान खुलकर सामने आ रही है। दूसरी ओरकांग्रेस की चुप्पी ने इन आरोपों को और हवा दे दी है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस की ओर से इन दावों पर सफाई आ सकती हैलेकिन फिलहाल भाजपा इन बयानों के जरिए विपक्ष को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के रिश्तों को लेकर लगाए गए ये आरोप सियासी बयानबाजी का हिस्सा हैं या वास्तव में पार्टी के भीतर किसी बड़े बदलाव का संकेतयह आने वाला समय ही बताएगा।

  • बंगाल चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान कहा 'कांग्रेस की हमें नहीं जरूरत इंडिया गठबंधन पर भी दिया बयान'

    बंगाल चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान कहा 'कांग्रेस की हमें नहीं जरूरत इंडिया गठबंधन पर भी दिया बयान'


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस TMC के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के लिए उनकी पार्टी को कांग्रेस की जरूरत नहीं है। हालांकि अभिषेक ने यह भी साफ किया कि तृणमूल कांग्रेस अब भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है।

    अभिषेक बनर्जी ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कहा कांग्रेस के पास बंगाल में ऐसा कुछ नहीं है जिसकी हमें जरूरत हो या जो वह हमें दे सके। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सिर्फ दो सीटों पर जीत हासिल की जबकि तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें गठबंधन का प्रस्ताव दिया था जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। अभिषेक ने कहा इसका परिणाम सबके सामने है उनकी सीट अब घटकर एक रह गई है।

    अभिषेक ने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कोई भी निर्णय ममता बनर्जी ही लेंगी। उन्होंने कहा जब पार्टी कोई फैसला लेगी तो आपको पता चल जाएगा। फिलहाल कांग्रेस से कोई गठबंधन नहीं है।
    इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी ने केंद्र सरकार पर भी हमला किया और मनरेगा का नाम बदलने के मुद्दे पर कहा कि इसका नाम बदलने से कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने सरकार से पश्चिम बंगाल को बकाया राशि का भुगतान करने की मांग की। केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल का बकाया भुगतान करना चाहिए। मनरेगा का नाम बदलने से कोई फायदा नहीं होगा उन्होंने कहा।

    अभिषेक ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह बंगाल के खिलाफ काम कर रही है और गांधीजी के नाम को हटाना बंगाल विरोधी कदम है। उन्होंने कहा गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने दी थी इसलिए बंगाल से गांधीजी का नाम हटाना गलत है।इस बयान ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को निशाने पर लिया है और यह आगामी विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक रणनीतियों का इशारा है। अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस क्या कदम उठाती है और कांग्रेस के साथ गठबंधन का कोई नया मोड़ आता है या नहीं।

  • हिजाब विवाद पर उमर अब्दुल्ला का नीतीश कुमार पर तीखा हमला, बोले– यह शर्मनाक और पिछड़ी सोच को दर्शाता है

    हिजाब विवाद पर उमर अब्दुल्ला का नीतीश कुमार पर तीखा हमला, बोले– यह शर्मनाक और पिछड़ी सोच को दर्शाता है

    नई दिल्ली/श्रीनगर।एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान एक मुस्लिम युवती का हिजाब हटाने को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार विवादों में घिरे हुए हैं। इस मामले ने अब राष्ट्रीय राजनीति में भी तूल पकड़ लिया है। जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए नीतीश कुमार की आलोचना की है और इसे शर्मनाकअस्वीकार्य और पिछड़ी सोच का प्रतीक बताया है। श्रीनगर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उमर अब्दुल्ला ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज में किसी महिला के पहनावे को लेकर सार्वजनिक तौर पर दखल देना गलत है। उन्होंने कहा कि यह घटना न केवल महिला की गरिमा के खिलाफ हैबल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आज़ादी पर भी सीधा हमला है।

    पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

    उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। उन्होंने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी PDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती से जुड़ी एक पुरानी घटना का जिक्र करते हुए कहा कि राजनीति में सत्ता के दौरान ऐसी सोच पहले भी सामने आती रही है।उन्होंने कहा मेरे चुनाव के समय भी एक घटना सामने आई थीजब एक वैध महिला वोटर का पोलिंग स्टेशन के अंदर बुर्का हटवाया गया था। यह उसी मानसिकता का हिस्सा है। तब जो हुआवह दुर्भाग्यपूर्ण था और आज जो नीतीश कुमार के मामले में हुआ हैवह भी उतना ही शर्मनाक है।

    महिला का सार्वजनिक अपमान अस्वीकार्य

    नीतीश कुमार पर सीधे निशाना साधते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि किसी भी परिस्थिति में किसी महिला का सार्वजनिक रूप से अपमान नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री खुद नियुक्ति पत्र नहीं देना चाहते थेतो वे ऐसा करने से इनकार कर सकते थेलेकिन किसी महिला को मंच पर इस तरह अपमानित करना पूरी तरह गलत है।उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि नीतीश कुमार को लंबे समय तक एक धर्मनिरपेक्षसंवेदनशील और समझदार नेता के रूप में देखा गयालेकिन इस तरह की घटनाएं उनकी छवि पर सवाल खड़े करती हैं।उन्होंने कहा धीरेधीरे नीतीश कुमार की असली सोच सामने आ रही हैजिसे अब तक लोग अलग नजरिए से देखते थे।

    लोकतंत्र और व्यक्तिगत आज़ादी पर सवाल
    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसारयह विवाद केवल एक घटना तक सीमित नहीं हैबल्कि यह महिलाओं के अधिकारधार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद जैसे मुद्दों से जुड़ा हुआ है। उमर अब्दुल्ला का बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि देश में सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं से संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। वित्तीय मुद्दों पर केंद्र सरकार को भी घेराइस दौरान उमर अब्दुल्ला ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की राज्यों के वित्तीय अनुशासन पर की गई टिप्पणी पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जम्मूकश्मीर को विरासत में मिली आर्थिक चुनौतियों के साथ काम करना पड़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य का दर्जा खत्म होने के बाद जम्मूकश्मीर को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी नहीं मिल रही हैजिससे बजट पर दबाव बढ़ा है।उमर अब्दुल्ला ने कहाहम आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं और केंद्र सरकार पर निर्भर हैं। इसके बावजूद हमने वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है।

    वित्तीय जिम्मेदारी का दावा
    मुख्यमंत्री ने दावा किया कि पिछले 15–16 महीनों में उनकी सरकार ने किसी भी तरह की वित्तीय लापरवाही नहीं की है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का एक भी मामला सामने आता हैतो वह खुद जवाबदेही लेने को तैयार हैं। हिजाब विवाद पर उमर अब्दुल्ला का बयान न केवल नीतीश कुमार की आलोचना हैबल्कि यह महिलाओं की गरिमाव्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन में एक मजबूत राजनीतिक संदेश भी है। यह मामला आने वाले दिनों में सियासी बहस को और तेज कर सकता है।

  • कर्नाटक CM पद पर खींचतान बरकरार, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दिल्ली में हाई कमान से करेंगे मुलाकात

    कर्नाटक CM पद पर खींचतान बरकरार, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दिल्ली में हाई कमान से करेंगे मुलाकात


    नई दिल्ली / कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस के भीतर जारी सियासी खींचतान अभी थमने के आसार नहीं दिखा रही है। बेलगावी से लेकर बेंगलुरु तक लगातार बयानबाजी के बीच अब यह मामला सीधे दिल्ली दरबार तक पहुंचता नजर आ रहा है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप मुख्य मंत्रीडीके शिवकुमार 14 दिसंबर को नई दिल्ली में कांग्रेस हाई कमान से मुलाकात कर सकते हैं। कुछ दिन पहले हाई कमान के निर्देश पर दोनों नेताओं का मुख्यमंत्री आवास पर नाश्ता हुआ था। उस बैठक के बाद यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सब कुछ सामान्य हो गया है। लेकिन इसके बाद दोनों खेमों से जिस तरह के बयान सामने आए हैं, उससे साफ है कि अंदरखाने असहमति अब भी बनी हुई है।

    दिल्ली में अहम बैठक की संभावना
    हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर सकते हैं। पार्टी के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि यह बैठक सोनिया गांधी, राहुल गांधी या कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे में से किसी एक के साथ हो सकती है। हालांकि समय कम बताया जा रहा है, लेकिन अगर यह मुलाकात होती है तो इसे कर्नाटक की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। कांग्रेस के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा
    सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। अगर वे हमारे शीर्ष नेतृत्व से मिलना चाहते हैं, तो इसमें कोई बाधा नहीं है।सूत्रों के अनुसार, यह संभावित बैठक नई दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली कांग्रेस रैली के बाद हो सकती है, जिसे ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ अभियान के तहत आयोजित किया जा रहा है।
    कहां से शुरू हुआ विवाद?
    2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर असमंजस की स्थिति बनी रही। सत्ता गठन के समय सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को उप मुख्यमंत्री बनाया गया था। तभी से यह चर्चा चलती रही कि ढाई साल बाद मुख्यमंत्री पद में बदलाव हो सकता है।20 नवंबर को सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद यह मुद्दा फिर से तेज हो गया। शिवकुमार समर्थकों का दावा है कि चुनाव जीतने के बाद सत्ता साझा करने को लेकर कोई अघोषित समझौता हुआ था, जिसके तहत आधे कार्यकाल के बाद मुख्यमंत्री बदले जाने की बात थी। हालांकि पार्टी और सरकार की ओर से कभी भी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई।

    बयानबाजी ने बढ़ाया तनाव

    हाल के दिनों में दोनों नेताओं के समर्थकों की बयानबाजी ने आग में घी डालने का काम किया है। एक ओर सिद्धारमैया खेमे की ओर से यह संदेश दिया जा रहा है कि सरकार स्थिर है और नेतृत्व में बदलाव की कोई जरूरत नहीं है, वहीं शिवकुमार समर्थक लगातार समझौते” की याद दिला रहे हैं।यह खींचतान न सिर्फ सरकार की छवि पर असर डाल रही है, बल्कि पार्टी के भीतर असंतोष को भी उजागर कर रही है। यही वजह है कि हाई कमान को अब सीधे दखल देना पड़ सकता है।

    हाई कमान के लिए बड़ी चुनौती
    कांग्रेस नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कर्नाटक में सरकार की स्थिरता बनी रहे और अंदरूनी कलह बाहर न आए। ऐसे में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की दिल्ली मुलाकात को फायरफाइटिंग मीटिंग के तौर पर देखा जा रहा है।अगर यह बैठक होती है, तो इससे यह साफ हो सकता है कि पार्टी नेतृत्व कर्नाटक में नेतृत्व को लेकर क्या रुख अपनाने जा रहा है। फिलहाल इतना तय है कि कर्नाटक की सियासत में आने वाले दिन काफी अहम होने वाले हैं।