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  • सोने-चांदी की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट, निवेशकों में हलचल, अब बाजार की अगली चाल पर टिकी नजरें

    सोने-चांदी की कीमतों में ऐतिहासिक गिरावट, निवेशकों में हलचल, अब बाजार की अगली चाल पर टिकी नजरें

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में आई भारी गिरावट ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय सर्राफा बाजार में हलचल बढ़ा दी है। लगातार रिकॉर्ड ऊंचाई की ओर बढ़ रही दोनों कीमती धातुओं के भाव में अचानक बड़ी टूट दर्ज की गई है। इस गिरावट से निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर पिछले कारोबारी सत्र में चांदी 10,577 रुपये प्रति किलोग्राम गिरकर 1,78,900 रुपये पर बंद हुई। वहीं, सोने की कीमत में 4,347 रुपये प्रति 10 ग्राम की कमी आई और यह 1,38,419 रुपये पर पहुंच गया।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बिकवाली का दबाव दिखाई दिया। स्पॉट गोल्ड की कीमत करीब 4 प्रतिशत गिरकर 3,875.55 डॉलर प्रति औंस रह गई, जबकि स्पॉट सिल्वर में लगभग 6 प्रतिशत की गिरावट आई और इसका भाव 49.12 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। वैश्विक बाजारों में आई इस कमजोरी का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा है।

    इस गिरावट की प्रमुख वजह कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा स्रोतों की कीमतों में बढ़ोतरी को माना जा रहा है। महंगी ऊर्जा के कारण दुनिया भर में महंगाई दोबारा बढ़ने की आशंका पैदा हुई है। इससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित प्रमुख केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियों को लेकर बाजार की चिंताएं बढ़ गई हैं।

    अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने संकेत दिए हैं कि महंगाई पर नियंत्रण के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रखा जा सकता है। दिसंबर में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी की संभावना भी बाजार की चिंता का हिस्सा बनी हुई है। इससे निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर हुई है।

    ब्याज दरें ऊंची रहने पर सोने और चांदी जैसी संपत्तियों का आकर्षण प्रभावित होता है। इन धातुओं से नियमित ब्याज या निश्चित आय नहीं मिलती। इसके विपरीत, फिक्स्ड इनकम और अन्य ब्याज देने वाले निवेश विकल्प बेहतर रिटर्न की संभावना पेश करते हैं। ऐसे माहौल में निवेशक कीमती धातुओं से पैसा निकालकर दूसरे साधनों में निवेश करना पसंद कर सकते हैं। इसी बदलाव ने सोने-चांदी पर बिकवाली का दबाव बढ़ाया है।

    वैश्विक शेयर बाजारों में टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट ने भी स्थिति को प्रभावित किया है। बाजार में नुकसान झेल रहे बड़े निवेशकों और संस्थागत कारोबारियों ने नकदी जुटाने तथा घाटे की भरपाई के लिए सोने-चांदी जैसी आसानी से बेची जा सकने वाली संपत्तियों में बिकवाली की। बाजार में इस प्रक्रिया को लिक्विडेशन कहा जाता है।

    चीन से जुड़ी गतिविधियों ने भी दबाव बढ़ाया है। दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल चीन में निवेशकों द्वारा नकदी जुटाने के लिए सोने की बिक्री किए जाने की खबरों ने बाजार की धारणा प्रभावित की। चांदी में गिरावट सोने से अधिक रही, क्योंकि इसका इस्तेमाल निवेश के साथ सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उद्योगों में भी होता है। औद्योगिक मांग में सुस्ती और शेयर बाजार की अस्थिरता ने इसकी कीमतों को ज्यादा प्रभावित किया।

    कीमतों में आई गिरावट का अंदाजा पुराने रिकॉर्ड से लगाया जा सकता है। जनवरी 2026 में चांदी 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी। मौजूदा भाव के आधार पर यह अपने शिखर से 50 प्रतिशत से अधिक नीचे आ चुकी है। वर्ष 2025 में चांदी ने करीब 170 प्रतिशत का रिटर्न दिया था। इसी तरह जनवरी 2026 में सोने का भाव 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था। अब यह अपने उच्चतम स्तर से 42,321 रुपये नीचे आ चुका है। इंडियन बुलियन ज्वैलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत घटकर 1,40,054 रुपये रह गई है।

    हालांकि, घरेलू बाजार में आने वाले दिनों में मांग बढ़ने से कीमतों को सहारा मिलने की उम्मीद है। नवंबर में धनतेरस, दिवाली और शादी-विवाह के सीजन के कारण आभूषणों तथा भौतिक सोने की खरीदारी बढ़ सकती है। 6 नवंबर को धनतेरस होने के कारण बाजार को त्योहारी खरीदारी से विशेष उम्मीद है।

    इसके अलावा, दुनिया के केंद्रीय बैंक लगातार अपने भंडार में सोना शामिल कर रहे हैं। उनकी खरीदारी से सोने की दीर्घकालिक मांग को समर्थन मिल सकता है। हालांकि, निकट भविष्य में कीमतों की दिशा अमेरिकी ब्याज दरों, महंगाई, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक शेयर बाजारों की स्थिति पर निर्भर करेगी। त्योहारी मांग और औद्योगिक खपत से सुधार की संभावना जरूर है, लेकिन बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने के आसार हैं।

  • अक्टूबर में सोना-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट, चांदी 39,485 रुपये टूटी, सोना भी सात महीने के निचले स्तर पर

    अक्टूबर में सोना-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट, चांदी 39,485 रुपये टूटी, सोना भी सात महीने के निचले स्तर पर


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सर्राफा बाजार में अक्टूबर 2026 के दौरान सोने और चांदी की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। लगातार कमजोर होते भाव ने कीमती धातुओं में निवेश करने वाले लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। चांदी करीब 11 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई, जबकि सोने की कीमतों में भी पिछले सात महीनों की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली। महीनेभर के आंकड़ों के अनुसार चांदी लगभग 40 हजार रुपये और सोना आठ हजार रुपये से अधिक सस्ता हो गया है।

    चांदी की कीमतों में आई गिरावट ने बाजार में सबसे ज्यादा असर दिखाया है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर दिसंबर डिलीवरी वाले चांदी के वायदा सौदों में शुक्रवार को 10,577 रुपये प्रति किलोग्राम की गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद भाव 1.80 लाख रुपये के स्तर से नीचे फिसलकर 1,79,600 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया। इस स्तर पर चांदी का कारोबार पिछली बार दिसंबर 2025 में देखने को मिला था।

    महीने के शुरुआती और अंतिम कारोबारी दिनों की तुलना करें तो चांदी में बड़ी गिरावट सामने आती है। इंडियन बुलियंस ज्वैलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अक्टूबर को चांदी की कीमत 2,20,829 रुपये प्रति किलोग्राम थी। वहीं 30 अक्टूबर को इसका भाव घटकर 1,81,344 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया। इस तरह एक महीने में चांदी 39,485 रुपये प्रति किलोग्राम सस्ती हो गई। अन्य कारोबार आंकड़ों के अनुसार अक्टूबर में इसकी कुल गिरावट करीब 45 हजार रुपये तक पहुंची।

    सोने की कीमतों में भी लगातार कमजोरी बनी हुई है। शुक्रवार को सोना 4,347 रुपये प्रति 10 ग्राम गिरकर 1,38,249 रुपये के निचले स्तर पर पहुंच गया। यह मार्च 2026 के बाद का सबसे कम भाव बताया गया है। सोने में लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज की गई। सितंबर में इसकी कीमत करीब 5,400 रुपये घटी थी, जबकि अक्टूबर में 10,787 रुपये प्रति 10 ग्राम की अतिरिक्त गिरावट सामने आई।

    महीने के आधार पर देखें तो 24 कैरेट सोने की कीमत 1 अक्टूबर को 1,48,138 रुपये प्रति 10 ग्राम थी। 30 अक्टूबर को यह घटकर 1,40,054 रुपये रह गई। इस तरह अक्टूबर में सोना 8,084 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हुआ। लगातार दो महीनों से जारी गिरावट ने सोने के बाजार में तेजी के पिछले रुख को कमजोर किया है।

    दोनों धातुओं की कीमतें अपने रिकॉर्ड स्तर से भी काफी नीचे आ चुकी हैं। चांदी का सर्वकालिक उच्च स्तर 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम रहा है। मौजूदा कीमतों के आधार पर इसमें रिकॉर्ड स्तर से करीब 57 प्रतिशत की गिरावट बताई जा रही है। वर्ष 2025 में चांदी ने लगभग 170 प्रतिशत की तेजी दर्ज की थी, लेकिन हालिया गिरावट ने उस बढ़त का बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया है। इसी तरह सोने का सर्वकालिक उच्च स्तर 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा है। मौजूदा भाव इससे 42,321 रुपये नीचे है।

    कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कारण बताए जा रहे हैं। अमेरिका में महंगाई बढ़ने से ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की आशंका मजबूत हुई है। सितंबर में अमेरिकी पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (पीसीई) प्राइस इंडेक्स में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो मार्च के बाद सबसे अधिक थी। सालाना महंगाई दर भी बढ़कर 3.6 प्रतिशत पहुंच गई।

    ब्याज दरें ऊंची रहने की संभावना से सोने और चांदी जैसे गैर-ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों की मांग प्रभावित होती है। निवेशक ऐसे विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं, जहां उन्हें ब्याज या अन्य रिटर्न मिलने की संभावना हो।

    इसके अलावा मध्य पूर्व में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर पर हमले से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार चौथे महीने तेजी दर्ज की गई। इससे वैश्विक महंगाई लंबे समय तक बने रहने की आशंका पैदा हुई है।

    अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती भी सोने-चांदी पर दबाव का एक कारण मानी जा रही है। तीसरी तिमाही में अमेरिका की जीडीपी वृद्धि दर 3.4 प्रतिशत रही, जो अनुमान से बेहतर बताई गई। मजबूत आर्थिक प्रदर्शन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र में निवेश के कारण डॉलर को भी समर्थन मिला है।

    अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने फिलहाल ब्याज दरों को 3.75 से 4 प्रतिशत के बीच स्थिर रखा है। हालांकि महंगाई के दबाव के चलते दिसंबर में दरें बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। इसी आशंका के बीच निवेशकों की रणनीति में बदलाव आया है और सोने-चांदी में बिकवाली का दबाव बढ़ा है।

  • दिवाली से पहले सोने-चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, गोल्ड 800 और सिल्वर 3,730 रुपये तक टूटी

    दिवाली से पहले सोने-चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, गोल्ड 800 और सिल्वर 3,730 रुपये तक टूटी

    नई दिल्ली । दिवाली और धनतेरस से पहले सोने-चांदी की खरीदारी की तैयारी कर रहे लोगों के लिए बाजार से राहत भरी खबर सामने आई है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोना 0.59 प्रतिशत तक टूट गया, जबकि चांदी की कीमत में करीब 1.96 प्रतिशत की गिरावट आई। कारोबार के दौरान चांदी 3,730 रुपये प्रति किलोग्राम तक सस्ती हो गई। वैश्विक बाजार में कमजोर रुख और अमेरिका की आर्थिक परिस्थितियों को इस गिरावट की प्रमुख वजह माना जा रहा है।

    घरेलू वायदा बाजार में दिसंबर डिलीवरी वाला सोना अपने पिछले कारोबारी बंद भाव 1,42,596 रुपये प्रति 10 ग्राम से 843 रुपये नीचे आकर 1,41,753 रुपये के निचले स्तर पर पहुंच गया। इस दौरान इसमें लगभग 0.59 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर, चांदी का भाव पिछले बंद स्तर 1,89,453 रुपये प्रति किलोग्राम से घटकर 1,85,723 रुपये पर आ गया। इसमें 3,730 रुपये यानी करीब 1.96 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा। कॉमेक्स पर सोना लगभग 0.28 प्रतिशत गिरकर 4,020 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता दिखाई दिया। वहीं चांदी की कीमत 1.20 प्रतिशत टूटकर 51.750 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। वैश्विक स्तर पर डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों को लेकर बदलती परिस्थितियों का असर सोने-चांदी की मांग पर पड़ रहा है।

    बाजार में गिरावट की एक प्रमुख वजह अमेरिका में महंगाई के आंकड़े हैं। सितंबर में अमेरिकी कोर पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) महंगाई दर में मासिक आधार पर 0.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि सालाना दर 3.1 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसके अलावा तीसरी तिमाही में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर 3.4 प्रतिशत दर्ज की गई। इन आंकड़ों से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर हुई है।

    बाजार में यह आशंका भी बढ़ी है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व दिसंबर में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। उपलब्ध बाजार अनुमानों के अनुसार, इस संभावना को 80 प्रतिशत से अधिक माना जा रहा है। ब्याज दरें ऊंची रहने पर निवेशकों का रुझान उन विकल्पों की ओर बढ़ सकता है, जिनसे नियमित ब्याज मिलता है। सोना और चांदी ब्याज नहीं देते, इसलिए ऐसी परिस्थितियों में इनकी मांग प्रभावित होती है।

    तकनीकी स्तरों पर भी निवेशकों की नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सोने के लिए 1.40 लाख से 1.41 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम का स्तर महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन है। यदि कीमत इस दायरे से नीचे जाती है तो इसमें 1.37 लाख से 1.38 लाख रुपये तक गिरावट की संभावना बन सकती है। चांदी के लिए 1.83 लाख से 1.85 लाख रुपये प्रति किलोग्राम का स्तर अहम माना जा रहा है।

    चांदी की मौजूदा कीमतों की तुलना इस साल बने रिकॉर्ड स्तर से करें तो गिरावट काफी बड़ी दिखाई देती है। जनवरी के आखिरी सप्ताह में चांदी ने 4,20,048 रुपये प्रति किलोग्राम का ऐतिहासिक उच्चतम स्तर छुआ था। इसके बाद कीमतों में लगातार कमजोरी आई और अब यह अपने रिकॉर्ड स्तर के आधे से भी कम भाव पर कारोबार कर रही है।

    इस बीच कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी कीमती धातुओं के बाजार को प्रभावित कर रहा है। पश्चिम एशिया में तनाव, ईरान से जुड़े घटनाक्रम और आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं से तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई पर दबाव आ सकता है, जिसके कारण केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती का फैसला टाल सकते हैं।

    अब निवेशकों की नजर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 8 और 9 दिसंबर को होने वाली बैठक पर है। साथ ही महंगाई और रोजगार से जुड़े आगामी आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। यदि आर्थिक आंकड़े कमजोर आते हैं और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका घटती है तो सोने-चांदी की कीमतों में सुधार देखने को मिल सकता है। इसके विपरीत महंगाई के मजबूत आंकड़े आने पर गिरावट का दबाव जारी रह सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी स्थिति में चांदी की कीमतों में सोने के मुकाबले अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

  • सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF

    सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF


    न्यूयार्क।
    भारत (India) की आर्थिक विकास दर (Economic Growth Rate) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने सुपर अल नीनो (Super El Niño) के संभावित खतरे के प्रति आगाह किया है। IMF के मुताबिक, मौसम में होने वाले इस बदलाव से फसलों का उत्पादन घट सकता है, खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों की खरीदारी करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।


    जनवरी में भारत की ग्रोथ का दोबारा आकलन करेगा IMF

    IMF की कम्युनिकेशन डायरेक्टर जूली कोजैक ने गुरुवार को कहा कि भारत के सामने सुपर अल नीनो से जुड़े कुछ खतरे हैं, लेकिन अभी तक ये हकीकत में सामने नहीं आए हैं।

    जूली कोजैक ने कहा, “IMF जनवरी में जारी होने वाले अपने अगले वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (WEO) अपडेट में भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान की दोबारा समीक्षा करेगा। यह समीक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि मौसम से जुड़े जोखिम किस तरह सामने आते हैं।”


    भारत की GDP ग्रोथ 7% रहने का अनुमान

    बता दें IMF ने इसी महीने वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% कर दिया था। इससे पहले जुलाई में IMF ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.4% और वित्त वर्ष 2027-28 के लिए 6.7% ग्रोथ का अनुमान लगाया था।

    IMF के मुताबिक, भारत में घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और सर्विस सेक्टर में भी अच्छी गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। यही वजह है कि मौसम से जुड़े संभावित खतरों के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान मजबूत बना हुआ है।


    क्या है सुपर अल नीनो और भारत को इससे क्या खतरा है?

    अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु संबंधी घटना है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है और भारत में मानसून की बारिश भी प्रभावित हो सकती है। अगर अल नीनो की स्थिति ज्यादा मजबूत होती है और बारिश में कमी आती है, तो इसका असर खेती और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।


    इसके तीन बड़े संभावित असर हैं

    1. फसल उत्पादन में गिरावट: बारिश कम होने से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
    2. खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी: अनाज, दालों और दूसरी खाने-पीने की चीजों की सप्लाई घटने पर कीमतें बढ़ सकती हैं।
    3. आम लोगों के बजट पर दबाव: खाने-पीने की चीजें महंगी होने से परिवारों की खरीदारी करने की क्षमता कम हो सकती है।

    हालांकि, इन आशंकाओं का मतलब यह नहीं है कि महंगाई या आर्थिक विकास पर असर पड़ना तय है। वास्तविक प्रभाव मौसम की स्थिति और कृषि उत्पादन में होने वाले बदलाव पर निर्भर करेगा।


    भारत की अर्थव्यवस्था पर रहेगी नजर

    IMF ने फिलहाल भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में सुपर अल नीनो के संभावित असर को शामिल करके कोई नई कटौती नहीं की है। संगठन का कहना है कि घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर की मजबूती से भारत की आर्थिक विकास दर को समर्थन मिल रहा है।

  • कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर मानसून.. भारत के सामने दोहरी चुनौती.. आम आदमी पर महंगाई की मार!

    कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर मानसून.. भारत के सामने दोहरी चुनौती.. आम आदमी पर महंगाई की मार!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। पहली अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल (Crude oil) की बढ़ती कीमतें (Rising Prices) और दूसरी मानसून के कमजोर रहने से पैदा हुआ सूखे का खतरा। ये दोनों समस्याएं अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन जब एक साथ सामने आती हैं, तो इनका असर देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी की रसोई तक दिखाई दे सकता है। महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल को बढ़ाता है और परिवहन से लेकर खेती तक की लागत पर दबाव डालता है। वहीं, बारिश की कमी से फसलों की पैदावार प्रभावित होने, किसानों की आमदनी घटने और खाने-पीने की चीजों के महंगे होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि भारत के लिए चिंता की बात ज्यादा क्या है? महंगा कच्चा तेल, सूखा या फिर इन दोनों का एक साथ असर? आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ होता है कि असली चुनौती इन दोनों समस्याओं के एक साथ बढ़ने से पैदा हो रही है।


    महंगे तेल ने बढ़ाया भारत का आयात बिल

    भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भारत का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। एक साल पहले इसी अवधि में यह 61.9 अरब डॉलर था। खास बात यह है कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा में एक प्रतिशत से भी कम की बढ़ोतरी हुई।

    इसका मतलब है कि आयात बिल में तेज उछाल के पीछे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की बड़ी भूमिका रही। आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में अब तक भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि जुलाई में यह लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल थी। इससे भारत को पहले के मुकाबले तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। इसका असर देश के व्यापार संतुलन और रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है।


    महंगे कच्चे तेल का आम आदमी पर क्या असर होगा?

    – कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।
    – परिवहन महंगा होने का खतरा:- ट्रक, बस और दूसरे मालवाहक वाहनों के ऑपरेशन की लागत बढ़ सकती है।
    – खाने-पीने की चीजों पर दबाव:- खेतों से मंडियों और मंडियों से दुकानों तक सामान पहुंचाने का खर्च बढ़ सकता है।
    – खेती की लागत में बढ़ोतरी:- डीजल से चलने वाले पंप, ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों का इस्तेमाल महंगा पड़ सकता है।
    – कंपनियों की लागत बढ़ेगी:- फैक्ट्रियों और अन्य उद्योगों को उत्पादन और माल की ढुलाई पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम तुरंत उसी अनुपात में बढ़ जाएंगे। सरकार के टैक्स, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। अगर पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहते हैं, तब भी महंगे तेल का आर्थिक बोझ कहीं और पड़ सकता है। कंपनियां अपने मुनाफे में कटौती कर सकती हैं या धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल सकती हैं।


    कमजोर मानसून से खेती पर मंडराया संकट

    एक तरफ महंगा तेल भारत के खर्च को बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ कमजोर मानसून कृषि क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ा सकता है। भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अब भी बारिश पर निर्भर है। समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी में नमी कम हो सकती है, जलाशयों में पानी घट सकता है और फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।

    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, जून से सितंबर 2026 के मानसून सीजन में देश में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कम बारिश का असर केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहता। अगर जलाशयों और जमीन के नीचे मौजूद पानी का स्तर गिरता है, तो किसानों के लिए अगली रबी फसल की बुवाई और सिंचाई करना भी मुश्किल हो सकता है। गेहूं, सरसों, चना और दूसरी रबी फसलों की बुवाई के समय पर्याप्त नमी और सिंचाई का पानी उपलब्ध होना जरूरी है। पानी की कमी होने पर किसानों को अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है या उन्हें कम क्षेत्र में खेती करनी पड़ सकती है।


    जलाशयों में पानी की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही

    केंद्रीय जल आयोग (CWC) के 22 अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 निगरानी वाले प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का 66.7 प्रतिशत था। लेकिन, दक्षिण भारत के 50 निगरानी वाले जलाशयों की स्थिति अधिक चिंताजनक रही। इनमें जल भंडारण 42.34 प्रतिशत था, जबकि पिछले 10 सालों का इसी अवधि का औसत 77.94 प्रतिशत रहा है। यह अंतर बताता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी की उपलब्धता एक जैसी नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर जलाशयों में पर्याप्त पानी दिखाई देने के बावजूद कुछ क्षेत्रों के किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलाशयों के ये आंकड़े देश के सभी कुओं, नदियों और सिंचाई स्रोतों की स्थिति नहीं बताते। फिर भी जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है और जलाशयों में पानी घटा है, वहां खेती पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।


    महंगा तेल और सूखा एक साथ आए तो क्या होगा?

    भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इन दोनों समस्याओं का एक साथ सामने आना है। अगर फसल की पैदावार घटती है और उसी समय डीजल महंगा होता है, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है और बाजार तक कृषि उत्पाद पहुंचाने का खर्च भी अधिक हो सकता है। इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    पहला असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा। कम बारिश के कारण अगर फसल खराब होती है, तो किसानों के पास बेचने के लिए कम उपज होगी। ऐसे में बाजार में कुछ फसलों की कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों की कुल कमाई घट सकती है।

    वहीं, दूसरा असर आम परिवारों के बजट पर होगा। अगर सब्जियों, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवारों को रोजमर्रा के खर्च के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। इसके साथ ही परिवहन और दूसरी सेवाओं की लागत बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    तीसरा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हो सकता है। खेती से आमदनी कम होने पर ग्रामीण परिवार कपड़े, वाहन, घरेलू उपकरण और अन्य सामानों पर खर्च घटा सकते हैं। इससे उन कारोबारों पर भी असर पड़ सकता है, जो ग्रामीण मांग पर निर्भर हैं। हालांकि, महंगाई पर इन दोनों कारकों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं, फसल उत्पादन कितना प्रभावित होता है और सरकार आपूर्ति को बेहतर बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती है।


    महंगाई के आंकड़े क्या बता रहे हैं?

    महंगे तेल और कमजोर मानसून की चिंता ऐसे समय बढ़ रही है, जब खुदरा महंगाई में भी तेजी दर्ज की गई है। दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। खाद्य महंगाई दर भी अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत पहुंच गई। खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी का मतलब है कि आम लोगों को खाने-पीने की वस्तुओं के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि खाद्य महंगाई में हुई पूरी बढ़ोतरी सिर्फ कमजोर मानसून के कारण है। मौसमी बदलाव, बाजार में आपूर्ति और पिछले साल की कीमतें भी इसमें भूमिका निभाती हैं। फिर भी अगर बारिश की कमी के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है और महंगे ईंधन से परिवहन लागत बढ़ती है, तो खाद्य महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।


    RBI के सामने क्यों बढ़ेगी चुनौती?

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने की होगी। जब तेल महंगा होता है, तो कंपनियों की लागत बढ़ती है। वहीं, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने पर आम लोगों की खरीदने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों से जुड़े फैसले लेना आसान नहीं रहता। RBI ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। उसकी मौद्रिक नीति में कमजोर बारिश, अल नीनो और ऊर्जा की ऊंची कीमतों को महंगाई के लिए जोखिम के रूप में रेखांकित किया गया था।

    रेपो रेट वह दर है, जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें बदलाव का असर समय के साथ होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। लेकिन यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। ब्याज दर बढ़ाने से बारिश नहीं बढ़ सकती और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सीधे कम हो सकती है। इसका उद्देश्य महंगाई के व्यापक और लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभाव को सीमित करना है। दूसरी तरफ ब्याज दरें अधिक रहने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे घर खरीदने, वाहन खरीदने और कारोबार में निवेश करने की गति प्रभावित हो सकती है। यानी RBI को महंगाई और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।

  • कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई वैश्विक बाजारों की चिंता, इंडियन बास्केट 120 डॉलर के करीब पहुंचने से बढ़ा दबाव

    कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई वैश्विक बाजारों की चिंता, इंडियन बास्केट 120 डॉलर के करीब पहुंचने से बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली ।
    वश्विक बाजारों में सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर अंतरराष्ट्रीय संकेतों के कारण निवेशकों की चिंता बनी रही। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि भारत के लिए महत्वपूर्ण इंडियन क्रूड बास्केट का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। महंगे तेल का असर भारत के आयात खर्च, महंगाई और तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर पड़ने की आशंका है।

    ब्रेंट क्रूड का भाव पिछले कारोबारी सत्र में बढ़कर 117.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। बाद में यह 116.72 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। सोमवार सुबह इसमें पिछले बंद स्तर के मुकाबले करीब 1.55 प्रतिशत की गिरावट आई और कीमत 114.91 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही। इसके बावजूद कच्चे तेल का भाव ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल और मई के दौरान भी तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंची थीं।

    अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड का भाव अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने की स्थिति में रहा है। सऊदी अरब में हूती हमलों के बाद तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने भी कीमतों को समर्थन दिया। सोमवार को भाव में नरमी आने के बावजूद आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं और वैश्विक परिस्थितियों के कारण बाजार पर दबाव बना हुआ है।

    भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की वास्तविक लागत भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 22 अक्टूबर को इंडियन क्रूड बास्केट का भाव 119.99 डॉलर प्रति बैरल दर्ज किया गया। अक्टूबर का औसत भाव भी लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल बताया गया है। इस स्तर पर कच्चे तेल की खरीद भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती है और रुपये तथा महंगाई पर दबाव डाल सकती है।

    महंगे तेल का असर तेल विपणन कंपनियों की कमाई पर भी पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनियों को प्रतिदिन 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो रहा है। पेट्रोल पर करीब 8 रुपये और डीजल पर 9 रुपये प्रति लीटर का नुकसान बताया गया है। इसके अलावा, प्रत्येक एलपीजी सिलिंडर पर लगभग 300 रुपये की अंडर रिकवरी होने की जानकारी सामने आई है।

    त्योहारी मौसम में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की आशंका कम बताई जा रही है। हालांकि, यदि त्योहारों के बाद भी कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाने पर विचार कर सकती हैं। फिलहाल, खुदरा कीमतों में बदलाव को लेकर कोई निश्चित फैसला सामने नहीं आया है।

    अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। शुक्रवार को अमेरिकी बाजार में डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 652.82 अंक यानी करीब 1.23 प्रतिशत गिरकर 52,215.16 पर बंद हुआ। एसएंडपी 500 में 0.52 प्रतिशत और नैस्डैक कंपोजिट में 0.21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, सोमवार सुबह अमेरिकी वायदा बाजार में कुछ सुधार दिखाई दिया। डाउ जोन्स फ्यूचर्स 0.24 प्रतिशत बढ़कर 52,341.69 पर कारोबार कर रहा था।

    एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा। जापान के निक्केई 225 में करीब 0.26 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया के कोस्पी में 0.92 प्रतिशत, चीन के शंघाई कंपोजिट में 0.36 प्रतिशत और सिंगापुर के स्ट्रेट्स टाइम्स में 0.43 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, हांगकांग का हैंग सेंग 0.31 प्रतिशत ऊपर रहा।

    भारतीय बाजार के लिए शुरुआती संकेत लगभग सपाट रहे। सुबह 7:36 बजे गिफ्ट निफ्टी 22,599.50 पर था, जो पिछले बंद स्तर से 8.50 अंक यानी 0.04 प्रतिशत नीचे था। इस सप्ताह 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक भी निवेशकों के लिए अहम है। ऊंची ऊर्जा कीमतों के बीच ब्याज दरों और महंगाई पर फेड के रुख से वैश्विक बाजारों की आगे की दिशा प्रभावित हो सकती है।

  • लगातार गिरावट के बाद सोने-चांदी में लौटी तेजी, चांदी 0.74% उछली, अब फेडरल रिजर्व की बैठक पर टिकी नजरें

    लगातार गिरावट के बाद सोने-चांदी में लौटी तेजी, चांदी 0.74% उछली, अब फेडरल रिजर्व की बैठक पर टिकी नजरें

    नई दिल्ली । लगातार कई दिनों तक गिरावट का सामना करने के बाद सोमवार, 26 अक्टूबर को सोने और चांदी की कीमतों में तेजी देखने को मिली। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दोनों कीमती धातुओं में खरीदारी लौटी। पिछले सप्ताह सोने और चांदी के भाव में बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी, जिसके बाद निवेशकों ने निचले स्तरों पर खरीदारी की। हालांकि, बाजार में आई इस तेजी को फिलहाल गिरावट के बाद की रिकवरी के रूप में देखा जा रहा है। आगे कीमतों की दिशा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक और महंगाई से जुड़े आंकड़ों पर निर्भर कर सकती है।

    घरेलू वायदा बाजार में सोने के दिसंबर अनुबंध का भाव लगभग 0.50 प्रतिशत यानी 761 रुपये बढ़कर 1,42,733 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गया। कारोबार के दौरान सोने ने पिछले बंद भाव 1,42,024 रुपये प्रति 10 ग्राम से 864 रुपये की बढ़त हासिल करते हुए 1,42,888 रुपये का उच्चतम स्तर छुआ। यह तेजी लगभग 0.60 प्रतिशत रही।

    चांदी के दिसंबर वायदा अनुबंध में भी मजबूती दर्ज की गई। इसका भाव करीब 0.49 प्रतिशत यानी 968 रुपये बढ़कर 1,96,687 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया। कारोबार के दौरान चांदी ने पिछले बंद स्तर 1,95,719 रुपये से 1,467 रुपये की छलांग लगाई और 1,97,186 रुपये प्रति किलोग्राम के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इस दौरान चांदी में 0.74 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई।

    पिछले सप्ताह की गिरावट के बाद दोनों धातुओं में आई खरीदारी को बाजार की अहम गतिविधि माना जा रहा है। उस दौरान सोने की कीमत लगभग 4 प्रतिशत और चांदी की कीमत 7 प्रतिशत से अधिक टूट गई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दबाव का असर दिखाई दिया था। स्पॉट गोल्ड जुलाई के बाद पहली बार 4,000 डॉलर प्रति औंस के नीचे चला गया था।

    अंतरराष्ट्रीय वायदा बाजार कॉमेक्स में सोमवार सुबह सोना लगभग 0.48 प्रतिशत बढ़कर 4,027 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता दिखाई दिया। सत्र के दौरान इसने 4,032.90 डॉलर प्रति औंस का उच्चतम स्तर भी छुआ। चांदी लगभग 0.74 प्रतिशत की तेजी के साथ 54.35 डॉलर प्रति औंस पर पहुंची और कारोबार के दौरान 54.47 डॉलर प्रति औंस का स्तर दर्ज किया।

    बाजार में सोने के लिए 4,000 डॉलर प्रति औंस का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालिया गिरावट के बाद इस स्तर के आसपास खरीदारी लौटने से कीमतों को सहारा मिला है। हालांकि, ऊंची ऊर्जा कीमतों के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका बनी हुई है, जिससे निवेशक फिलहाल सावधानी बरत रहे हैं।

    अब बाजार की नजर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली नीतिगत बैठक पर है। विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, अक्टूबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना सीमित है, लेकिन दिसंबर में दरों में बढ़ोतरी की आशंका बनी हुई है। ब्याज दरों को लेकर संकेत सोने और चांदी की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।

    इस सप्ताह जारी होने वाले अमेरिकी पर्सनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर यानी पीसीई महंगाई आंकड़े भी महत्वपूर्ण होंगे। यदि महंगाई अनुमान से अधिक रहती है, तो ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखने की संभावना बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति कीमती धातुओं पर दबाव डाल सकती है।

    चांदी ने हालिया कारोबार में सोने की तुलना में बेहतर रिकवरी दिखाई है, लेकिन तकनीकी संकेतों के अनुसार इसमें अभी पूरी तरह सुधार नहीं हुआ है। घरेलू बाजार में चांदी के लिए 2 लाख से 2.02 लाख रुपये प्रति किलोग्राम का क्षेत्र प्रतिरोध माना जा रहा है, जबकि 1.92 लाख से 1.94 लाख रुपये का स्तर समर्थन दे सकता है।

    कच्चे तेल की कीमतें भी बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं। ब्रेंट क्रूड हाल के दिनों में 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा था। तेल महंगा रहने से महंगाई बढ़ने और ब्याज दरों में कटौती टलने का जोखिम रहता है। ऐसे में निवेशकों की नजर डॉलर इंडेक्स, बॉन्ड यील्ड और ऊर्जा बाजार की चाल पर भी बनी हुई है।

  • दिवाली से पहले सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, जानिए किन वजहों से टूटा भाव और कब लौट सकती है तेजी

    दिवाली से पहले सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, जानिए किन वजहों से टूटा भाव और कब लौट सकती है तेजी


    नई दिल्ली ।
    दिवाली और त्योहारी सीजन से पहले सोने की कीमतों में आई बड़ी गिरावट ने खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारत के वायदा और खुदरा बाजार तक सोने के भाव में कमजोरी दर्ज की गई है। महंगे कच्चे तेल, मजबूत अमेरिकी डॉलर और ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता ने कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, कीमतों में आई इस नरमी को त्योहारों और शादी के सीजन के लिए खरीदारी के संभावित अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर इस सप्ताह सोने का वायदा भाव करीब 3.50 प्रतिशत गिर गया। खुदरा बाजार में भी कीमतों में उल्लेखनीय कमी आई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने का भाव पहले 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो 23 अक्टूबर तक घटकर 1,41,630 रुपये रह गया। इस तरह एक सप्ताह में इसकी कीमत 4,796 रुपये प्रति 10 ग्राम कम हो गई।

    इसी अवधि में 22 कैरेट सोने के दाम भी नीचे आए। इसका भाव 1,34,207 रुपये प्रति 10 ग्राम से गिरकर 1,29,566 रुपये रह गया। यानी 22 कैरेट सोना 4,641 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हुआ। कीमतों में इस गिरावट से उन ग्राहकों को राहत मिल सकती है, जो दिवाली या आगामी शादी समारोहों के लिए आभूषण खरीदने की योजना बना रहे हैं।

    वैश्विक बाजार में भी सोने की स्थिति कमजोर बनी हुई है। शुक्रवार को इसकी कीमत करीब तीन महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई। पूरे सप्ताह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में लगभग चार प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो जून के बाद इसका सबसे कमजोर साप्ताहिक प्रदर्शन बताया गया है। इस गिरावट के बाद निवेशकों की नजर 4,000 डॉलर प्रति औंस के महत्वपूर्ण स्तर पर टिकी है। यह स्थिति अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली नीतिगत बैठक से ठीक पहले बनी है।

    सोने की कीमतों में गिरावट की एक प्रमुख वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। सऊदी अरब में हूती हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी, जिससे ब्रेंट क्रूड पांच महीने से अधिक के उच्च स्तर पर पहुंच गया। महंगा तेल महंगाई को बढ़ा सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रख सकते हैं, जिससे सोने जैसी बिना ब्याज वाली संपत्तियों की मांग प्रभावित होती है।

    अमेरिका में उपभोक्ता और उत्पादक महंगाई के आंकड़े भी बाजार की चिंता बढ़ाने वाले रहे हैं। कारोबारियों को आगामी बैठक में फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में बदलाव नहीं होने की उम्मीद है, लेकिन साल के अंत में मौद्रिक नीति सख्त रहने की आशंका बनी हुई है। डॉलर इंडेक्स में कुछ नरमी के बावजूद इसका स्तर करीब 101.5 बना हुआ है। फरवरी के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के समय से सोने में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट का भी उल्लेख किया गया है।

    तकनीकी संकेतों के मुताबिक, निकट अवधि में सोने पर दबाव बना रह सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 4,000 डॉलर प्रति औंस के नीचे टिकती है, तो 3,950 डॉलर तक गिरावट की आशंका जताई गई है। दूसरी ओर, 3,950 से 4,000 डॉलर का दायरा संभावित खरीदारी और समर्थन का क्षेत्र माना जा रहा है। चांदी के लिए 50 से 55 डॉलर के स्तर को अहम समर्थन बताया गया है। कुछ विशेषज्ञों ने आने वाले हफ्तों में 10 से 15 प्रतिशत तक सुधार की संभावना जताई है, जबकि सोने में तेजी का रुझान मजबूत होने के लिए 4,200 डॉलर के ऊपर टिकना महत्वपूर्ण माना गया है।

    दिवाली के दौरान सोने और आभूषणों की मांग मजबूत रहने की उम्मीद है। भारतीय खरीदार सोने को निवेश और पारंपरिक खरीदारी, दोनों के लिहाज से महत्व देते हैं। बाजार में हल्के वजन के आभूषणों और पुराने सोने के बदले नए आभूषण खरीदने की योजनाओं की मांग भी बढ़ रही है। ग्राहक अब डिजाइन के साथ शुद्धता, प्रामाणिकता और पारदर्शिता पर भी ध्यान दे रहे हैं। हालांकि, दिवाली से पहले कीमतों में दोबारा उछाल आएगा या गिरावट जारी रहेगी, यह वैश्विक बाजार, डॉलर की चाल और अमेरिकी मौद्रिक नीति के संकेतों पर निर्भर करेगा।

  • पाकिस्तान में LPG संकट गहराया, 12 किलो सिलेंडर की कीमत 8200 रुपये तक पहुंची..

    पाकिस्तान में LPG संकट गहराया, 12 किलो सिलेंडर की कीमत 8200 रुपये तक पहुंची..


    नई दिल्ली ।
    पाकिस्तान में महंगाई के बीच रसोई गैस की कमी ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। देश के कई हिस्सों में घरेलू इस्तेमाल वाले LPG सिलेंडरों की कीमतों में तेजी से उछाल आया है। करीब 12 किलो गैस वाला सिलेंडर, जो कुछ दिन पहले लगभग 4,500 पाकिस्तानी रुपये में मिल रहा था, अब 7,000 रुपये से अधिक कीमत पर बिक रहा है। कुछ क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को इसके लिए 8,200 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। गैस की बढ़ती कीमतों और सीमित उपलब्धता ने घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।

    इस संकट की प्रमुख वजह ईरान से होने वाली LPG आपूर्ति का बाधित होना है। पाकिस्तान और ईरान के बीच स्थित दो प्रमुख सीमा चौकियां 17 अक्टूबर से बंद हैं। सीमा बंद होने के कारणों को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं। पाकिस्तान सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और अवैध तस्करी रोकने को इसकी वजह बताया है, जबकि ईरान ने इसे तकनीकी समस्या से जुड़ा मामला कहा है।

    पाकिस्तान अपनी LPG जरूरत का लगभग आधा हिस्सा ईरान से प्राप्त करता है। ऐसे में सीमा पर आवाजाही बंद होने से गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण बाजार में मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ गया है। इसका असर सीधे सिलेंडरों की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

    पाकिस्तान की LPG जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश अपनी कुल आवश्यकता का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ईरान के अलावा ओमान और इराक भी गैस आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं। इन देशों से आने वाली खेप प्रभावित होने से संकट और गंभीर हो गया है।

    पाकिस्तान में प्रतिदिन लगभग 6,500 से 7,000 टन LPG की खपत होती है। इसके मुकाबले घरेलू उत्पादन करीब 2,000 से 2,500 टन प्रतिदिन है। शेष जरूरत पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक के अनुसार, खपत और उत्पादन के बीच का यह अंतर देश को बाहरी आपूर्ति में आने वाली बाधाओं के प्रति संवेदनशील बनाता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने समुद्री परिवहन को भी प्रभावित किया है। इसके कारण इराक और ओमान से आने वाली गैस की आपूर्ति बाधित होने की जानकारी सामने आई है। इस तरह पाकिस्तान को एक साथ सीमा पार आपूर्ति और समुद्री मार्गों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

    गैस की कमी के बीच कालाबाजारी की समस्या भी सामने आई है। पाकिस्तान के तेल एवं गैस नियामक प्राधिकरण ने 11.8 किलो के घरेलू LPG सिलेंडर की आधिकारिक कीमत 3,296 पाकिस्तानी रुपये निर्धारित की है। इसके बावजूद कई बाजारों में सिलेंडर इससे दोगुने से भी अधिक दाम पर बेचे जा रहे हैं। आधिकारिक दर और बाजार में वसूली जा रही कीमत के बीच बड़ा अंतर उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ा रहा है।

    कीमतों की स्थिति अलग-अलग क्षेत्रों में और गंभीर है। बलूचिस्तान में 12 किलो का सिलेंडर लगभग 7,000 रुपये में मिल रहा है, जबकि लाहौर में इसकी कीमत 7,500 रुपये तक बताई गई है। दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्र स्कर्दू में उपभोक्ताओं को एक सिलेंडर के लिए 8,200 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं।

    आपूर्ति सामान्य होने में देरी से घरेलू उपभोक्ताओं के सामने परेशानी बनी रह सकती है। फिलहाल सीमा चौकियों के बंद रहने, समुद्री मार्गों पर तनाव और आयात पर निर्भरता के कारण पाकिस्तान के LPG बाजार पर दबाव है। गैस की उपलब्धता में सुधार और कीमतों में स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाधित आपूर्ति कितनी जल्दी बहाल होती है।

  • दो महीने में 250 रुपये प्रति क्विंटल महंगा हुआ गेहूं, त्योहारों से पहले आटा, मैदा और सूजी के दाम बढ़ने की आशंका

    दो महीने में 250 रुपये प्रति क्विंटल महंगा हुआ गेहूं, त्योहारों से पहले आटा, मैदा और सूजी के दाम बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली । त्योहारों के मौसम में आम लोगों के घरेलू बजट पर गेहूं की बढ़ती कीमतों का असर पड़ सकता है। पिछले दो महीनों में गेहूं के भाव में करीब 250 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी दर्ज की गई है। बाजार में कीमतें बढ़कर 3,110 से 3,135 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं। ऐसे में आगामी त्योहारों के दौरान आटा, मैदा और सूजी की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। बाजार में गेहूं की उपलब्धता, मिलों की खरीद और विभिन्न क्षेत्रों से आ रही मांग को इस तेजी की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है।

    गेहूं की सरकारी खरीद निर्धारित लक्ष्य से अधिक होने के बावजूद बाजार में कीमतों में मजबूती बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस बार सरकार ने 356 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था, जिसे पार कर लिया गया। इसके बावजूद पिछले सप्ताह मंडियों में गेहूं की आवक कम होने से कीमतों को सहारा मिला। नमी और रंग के आधार पर गेहूं के भाव 3,110 से 3,135 रुपये प्रति क्विंटल के बीच पहुंच गए। हाल के दिनों में कीमतों में 30 से 35 रुपये प्रति क्विंटल की अतिरिक्त बढ़ोतरी भी दर्ज की गई।

    बाजार से जुड़े कारोबारियों के अनुसार, पिछले दो महीनों से गेहूं की मांग में तेजी बनी हुई है। इसके चलते कीमतों में लगभग 250 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा हुआ है। वहीं, निचले स्तरों की तुलना में भाव में कुल तेजी का अंतर 500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की बात कही जा रही है। पिछले एक महीने से किसानों की ओर से मंडियों में गेहूं की आवक का दबाव भी कम रहा है। इससे कारोबारियों को पर्याप्त मात्रा में माल जुटाने के लिए खरीद जारी रखनी पड़ रही है।

    गेहूं की कीमतों को मजबूती देने में रोलर फ्लोर मिलों की मांग की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ये मिलें गेहूं से आटा, मैदा और सूजी तैयार करती हैं। त्योहारों के दौरान इन उत्पादों की खपत बढ़ने की संभावना को देखते हुए मिलों की खरीद प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही मैदा और सूजी के व्यापार में बढ़ती गतिविधियों से भी गेहूं की मांग को समर्थन मिल रहा है। यदि कच्चे माल की लागत ऊंची बनी रहती है, तो इसका असर प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार पर पड़ सकता है।

    दक्षिण भारत की ओर गेहूं की खेप भेजे जाने से भी बाजार में मांग बनी हुई है। माल की ढुलाई के लिए रेल रैक उपलब्ध होने से दूसरे क्षेत्रों तक आपूर्ति करने में मदद मिल रही है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की मंडियों में भी गेहूं के भाव में दोबारा तेजी आने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा निर्यात मांग को भी कीमतों को सहारा देने वाले कारकों में शामिल किया जा रहा है। हालांकि, अलग-अलग मंडियों में गेहूं की गुणवत्ता, उपलब्धता और परिवहन लागत के आधार पर भाव में अंतर हो सकता है।

    अब बाजार की नजर सरकारी गेहूं की बिक्री पर टिकी हुई है। कारोबारियों का मानना है कि यदि सरकार बाजार में पर्याप्त मात्रा में गेहूं उपलब्ध कराती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर, सरकारी आपूर्ति सीमित रहने और मंडियों में आवक कम बनी रहने की स्थिति में भाव मजबूत रह सकते हैं। आगे कीमतों की दिशा काफी हद तक इन दोनों कारकों पर निर्भर करेगी।

    आम उपभोक्ताओं के लिए गेहूं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी चिंता का विषय बन सकती है। आटा, मैदा और सूजी रोजमर्रा के भोजन के साथ त्योहारों पर तैयार होने वाले कई पकवानों में इस्तेमाल होते हैं। मांग बढ़ने पर इन उत्पादों की खुदरा कीमतों में बदलाव की आशंका रहती है, हालांकि गेहूं के थोक भाव में हुई तेजी का असर उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचेगा, यह भी प्रसंस्करण लागत, व्यापारियों के मार्जिन और स्थानीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।