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  • पाकिस्‍तान में खाद्य सुरक्षा का संकट, रोटी-चावल तक के लिए मोहताज हो रहे पाकिस्तानी, देखें आकड़े

    पाकिस्‍तान में खाद्य सुरक्षा का संकट, रोटी-चावल तक के लिए मोहताज हो रहे पाकिस्तानी, देखें आकड़े


    नई दिल्ली। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में अब खाद्य असुरक्षा भी गंभीर होती जा रही है। पाकिस्तान सरकार के आंकड़े ही देश के बिगड़ते हालात की तस्वीर सामने रख रहे हैं। पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स (PBS) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह वर्षों में पाकिस्तानी परिवारों ने गेहूं, चावल, मीट, दूध और चाय समेत लगभग सभी प्रमुख खाद्य श्रेणियों का सेवन कम किया है। ग्रामीण ही नहीं, शहरी परिवार भी इसकी चपेट में हैं।

    2019 में 15.92% परिवार खाद्य असुरक्षित थे, 2025 में आंकड़ा 24.35%
    ‘पाकिस्तान टुडे’ की रिपोर्ट में PBS के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि पाकिस्तान में मध्यम से गंभीर खाद्य असुरक्षा वाले परिवारों की हिस्सेदारी 2019 में 15.92% थी, जो 2025 में बढ़कर 24.35% हो गई।

    वहीं, गंभीर खाद्य असुरक्षा से जूझने वाले परिवारों की हिस्सेदारी भी दोगुने से ज्यादा बढ़ी है। यह 2.37% से बढ़कर 5.04% हो गई। यानी अब करीब एक चौथाई पाकिस्तानी परिवार किसी न किसी स्तर पर भूख और कुपोषण का सामना कर रहे हैं।

    छोटी रोटियां, कम चावल और बच्चों के दूध में भी कटौती
    महंगाई बढ़ने के साथ पाकिस्तानी परिवारों की खाने की थाली भी सिकुड़ रही है। परिवार अब पहले की तुलना में कम मात्रा में चावल पका रहे हैं और छोटी रोटियां बना रहे हैं। मीट की खपत घट गई है, जबकि बच्चों को दिए जाने वाले दूध की मात्रा में भी कटौती की जा रही है।

    चाय जैसी रोजमर्रा की चीजों का सेवन भी कम हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से परिवारों को अपनी खरीदारी की मात्रा और भोजन की विविधता दोनों में कटौती करनी पड़ रही है।

    ग्रामीण इलाकों में हालात ज्यादा खराब
    PBS के आंकड़ों के अनुसार, खाद्य पदार्थों की खपत में गिरावट ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दर्ज की गई है। हालांकि ग्रामीण परिवारों पर इसका दबाव ज्यादा है। महंगे भोजन के कारण पौष्टिक आहार तक आम लोगों की पहुंच लगातार कम होती जा रही है।

    कृषि प्रधान देश, फिर भी खाद्य पदार्थों का शुद्ध आयातक
    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को कृषि प्रधान माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद देश में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और गुणवत्ता पर दबाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान कम से कम 2021 से खाद्य पदार्थों का शुद्ध आयातक बना हुआ है।

    यह स्थिति पाकिस्तान के लिए बड़ी चेतावनी मानी जा रही है। भोजन की मात्रा और गुणवत्ता में लगातार गिरावट का असर आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और पोषण पर पड़ सकता है। आर्थिक संकट के साथ बढ़ती खाद्य असुरक्षा अब पाकिस्तान के सामने एक और बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

  • मुंबई में महंगाई का डबल झटका, CNG-PNG के साथ ऑटो-टैक्सी किराया भी बढ़ा

    मुंबई में महंगाई का डबल झटका, CNG-PNG के साथ ऑटो-टैक्सी किराया भी बढ़ा


    नई दिल्ली। मुंबई में एक सितंबर से आम लोगों की जेब पर महंगाई का दोहरा असर पड़ा है। महानगर गैस लिमिटेड (MGL) ने सीएनजी और घरेलू पीएनजी के दाम बढ़ा दिए हैं। वहीं, मुंबई महानगर क्षेत्र में ऑटो रिक्शा और काली-पीली टैक्सी का न्यूनतम किराया भी बढ़ गया है। दोनों बढ़ोतरी एक सितंबर से लागू हो गई हैं।

    CNG 2 रुपये और PNG 1 रुपये महंगी

    MGL के मुताबिक, मुंबई और आसपास के इलाकों में सीएनजी की कीमत 2 रुपये प्रति किलो बढ़कर 88 रुपये प्रति किलो हो गई है। घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के दाम में भी 1 रुपये प्रति एससीएम की बढ़ोतरी की गई है।

    कंपनी ने कीमत बढ़ाने के पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव को वजह बताया है। MGL के अनुसार, इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें बढ़ी हैं। सीएनजी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए महंगे दाम पर आयातित स्पॉट RLNG का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

    इस बढ़ोतरी का असर मुंबई, ठाणे, रायगढ़, रत्नागिरी, लातूर और धाराशिव के अलावा कर्नाटक के चित्रदुर्ग और दावणगेरे में MGL के नेटवर्क से सीएनजी लेने वाले करीब 13 लाख वाहन मालिकों पर पड़ेगा। वहीं, करीब 30 लाख घरेलू PNG उपभोक्ताओं को भी अब ज्यादा भुगतान करना होगा।

    ऑटो-टैक्सी का सफर भी हुआ महंगा

    मुंबई महानगर क्षेत्र में ऑटो और टैक्सी से सफर करने वालों के लिए भी किराया बढ़ गया है। मुंबई महानगर क्षेत्र परिवहन प्राधिकरण (MMRTA) ने ऑटो रिक्शा का न्यूनतम किराया 27 रुपये और काली-पीली टैक्सी का न्यूनतम किराया 33 रुपये कर दिया है।

    ऑटो के किराए में 1 रुपये और टैक्सी के किराए में 2 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। अब टैक्सी का किराया 20.66 रुपये से बढ़कर 21.90 रुपये प्रति किलोमीटर हो गया है, जबकि ऑटो का किराया 17.14 रुपये से बढ़कर 18.22 रुपये प्रति किलोमीटर हो गया है।

    टैक्सी में पहले 1.5 किलोमीटर के लिए 31 रुपये देने पड़ते थे, अब इसके लिए 33 रुपये चुकाने होंगे।

    ड्राइवरों को मीटर अपडेट कराने के लिए नवंबर तक का समय

    आरटीओ अधिकारियों के मुताबिक, ड्राइवर अपने इलेक्ट्रॉनिक मीटर को नई दरों के अनुसार कैलिब्रेट करा सकते हैं। इसके अलावा आरटीओ से मंजूर किराया तालिका भी वाहन में प्रदर्शित की जा सकती है। मीटर को दोबारा कैलिब्रेट कराने के लिए ड्राइवरों को नवंबर के अंत तक का समय दिया गया है। तय अवधि में मीटर अपडेट नहीं कराने पर जुर्माना लगाया जा सकता है।

    ज्यादातर ऑटो-टैक्सी CNG पर निर्भर

    मुंबई महानगर क्षेत्र में 4.5 लाख से ज्यादा ऑटो रिक्शा और 50 हजार से अधिक काली-पीली टैक्सियां संचालित होती हैं। इनमें से अधिकांश वाहन सीएनजी से चलते हैं। ऐसे में ईंधन और किराया दोनों बढ़ने से यात्रियों के साथ-साथ ऑटो-टैक्सी चालकों पर भी खर्च का असर पड़ना तय है।

    मुंबई में इससे पहले ऑटो और टैक्सी का किराया फरवरी 2025 में बढ़ाया गया था। करीब 18 महीने बाद एक बार फिर किराए में बढ़ोतरी की गई है।

  • तीन साल की नई ऊंचाई पर पहुंचा चावल का निर्यात…. बढ़ती महंगाई के बीच दाम भी बढ़े

    तीन साल की नई ऊंचाई पर पहुंचा चावल का निर्यात…. बढ़ती महंगाई के बीच दाम भी बढ़े


    नई दिल्ली।
    एक तरफ जहां देश में चावल के दाम (Rice prices) में तेजी (Rise) आ रही है, वहीं इसके निर्यात में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 26 प्रमुख उपभोक्ता देशों को भारत का चावल निर्यात (Rice Exports) सिर्फ पांच महीनों में तीन साल की नई उंचाई पर आ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच बासमती और गैर-बासमती चावल (Non-Basmati rice) का कुल निर्यात 23,476 करोड़ रुपये और 47.9 लाख टन तक पहुंच गया।

    पश्चिम एशिया संकट के कारण खाड़ी क्षेत्रों में चावल का आयात घट गया है। इसके बावजूद भारत का निर्यात प्रभावित नहीं हुआ है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (आईआरईएफ) के अनुसार, पिछले तीन वर्षों की इसी अवधि (नवंबर-मार्च) के औसत की तुलना में निर्यात मूल्य में 1.1 प्रतिशत और मात्रा में 5.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

    15% बढ़े दाम तीन हफ्ते में
    पिछले दो-तीन हफ्तों में चावल की खुदरा कीमतों में करीब 15 फीसदी की तेजी आई है। कई किस्मों के चावल 15-20 रुपये प्रति किलो तक महंगे हो गए हैं। सबसे अधिक तेजी प्रीमियम बासमती में देखी जा रही है। इसका भाव 85 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 110 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। साधारण और परमल चावल की किस्मों में भी प्रति क्विंटल 100 से 500 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है।

    दालों की खरीद के लिए खुलेंगे 500 नए केंद्र
    दलहन उत्पादकों को उनकी फसल का उचित मूल्य देने और बिक्री की परेशानियों से बचाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (नैफेड) और भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड दोनों मिलकर देशभर में 500 नए केंद्र खोलेंगे। ये दोनों एजेंसियां किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सीधा दालों की खरीद करेंगी।

    नैफेड के प्रबंध निदेशक दीपक कुमार के मुताबिक, खरीफ सीजन की दालें जल्द बाजार में आने वाली हैं। इन केंद्रों पर अरहर के साथ ही चना और उड़द जैसी प्रमुख दालों की खरीद होगी। दाल उत्पादन वाले राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तर प्रदेश प्रमुख रूप से शामिल हैं। नैफेड देश के करीब 50 जिलों में किसानों के बीच अभियान चलाकर पोर्टल पर उनका पंजीकरण कराएगा।

  • सर्विस सेक्टर में कीमतों का मिला-जुला रुख, टेलीकॉम महंगाई 0.72 प्रतिशत रही, बैंकिंग सेवाओं के सूचकांक में गिरावट आई

    सर्विस सेक्टर में कीमतों का मिला-जुला रुख, टेलीकॉम महंगाई 0.72 प्रतिशत रही, बैंकिंग सेवाओं के सूचकांक में गिरावट आई

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून की अवधि के लिए सर्विस प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स का प्रोविजनल डेटा जारी किया है। आंकड़ों में अलग-अलग सेवा क्षेत्रों में कीमतों के रुझान में अंतर देखने को मिला। इंश्योरेंस और टेलीकॉम सेवाओं की कीमतों में सालाना आधार पर मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि बैंकिंग और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन सेवाओं के मूल्य सूचकांक में गिरावट आई। हवाई यात्री सेवाओं में सबसे तेज वार्षिक बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 की जून तिमाही में इंश्योरेंस सर्विस प्राइस इंडेक्स 102.9 रहा। इसमें सालाना आधार पर 0.98 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसका मतलब है कि बीमा सेवाओं की कीमतों में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में मामूली बढ़ोतरी हुई। टेलीकॉम सर्विसेज प्राइस इंडेक्स 112.2 रहा और इसमें सालाना आधार पर 0.72 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन सर्विस प्राइस इंडेक्स में इसके विपरीत गिरावट देखने को मिली। जून तिमाही में यह सूचकांक 89.9 रहा, जो सालाना आधार पर 1.32 प्रतिशत कम है। बैंकिंग सर्विस प्राइस इंडेक्स भी 100.9 पर रहा और इसमें सालाना आधार पर 3.35 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। हालांकि, बैंकिंग सर्विस कॉन्ट्रिब्यूशन इंडेक्स 134.8 रहा और इसमें सालाना आधार पर 6.90 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    पेंशन क्षेत्र से जुड़ी सेवाओं में भी कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज हुई। मैनेजमेंट ऑफ पेंशन फंड्स सर्विस प्राइस इंडेक्स 113.3 रहा और इसमें सालाना आधार पर 5.20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र से जुड़ी सेवाओं की कीमतों में पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले वृद्धि हुई है।

    हवाई यात्री सेवाओं में सबसे उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। जून तिमाही में एयर पैसेंजर सर्विस प्राइस इंडेक्स 126.4 रहा, जो सालाना आधार पर 31.94 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि अन्य प्रमुख सेवा क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक रही। इससे हवाई यात्री सेवाओं की कीमतों में सालाना आधार पर तेज बदलाव का पता चलता है।

    रेलवे सेवाओं के सूचकांक में भी सीमित बढ़ोतरी दर्ज हुई। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में रेलवे सर्विस प्राइस इंडेक्स 103.4 रहा और इसमें सालाना आधार पर 1.27 प्रतिशत की वृद्धि हुई। रेलवे फ्रेट सर्विस प्राइस इंडेक्स 103.3 रहा, जो सालाना आधार पर 0.10 प्रतिशत बढ़ा। वहीं रेलवे पैसेंजर सर्विस प्राइस इंडेक्स 103.5 रहा और इसमें 3.50 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई।

    सरकार के अनुसार सर्विस पीपीआई में सात प्रकार की सेवाओं को शामिल किया जाता है और इसका बेस ईयर 2022-23 निर्धारित है। हालांकि, इन सूचकांकों में सेवाओं के भारांक को शामिल नहीं किया जाता, क्योंकि यह पूरे सर्विस सेक्टर को कवर नहीं करते हैं। वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर के लिए सर्विस पीपीआई का अगला प्रोविजनल डेटा 25 नवंबर 2026 को जारी किया जाएगा।

  • चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    नई दिल्ली । देश के कई हिस्सों में रोजमर्रा की रसोई में इस्तेमाल होने वाली जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में पिछले कुछ समय से तेजी देखी जा रही है। चीनी, प्याज, दाल और खाद्य तेल के दाम बढ़ने से आम परिवारों के मासिक बजट पर दबाव बढ़ गया है। खास तौर पर चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में चीनी के दाम करीब 7 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं, जबकि एक महीने में इसकी कीमत में लगभग 17 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कई बाजारों में चीनी करीब 70 रुपये किलो तक बिक रही है।

    चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे आपूर्ति और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता प्रमुख कारणों में शामिल है। सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा जमाखोरी रोकने के लिए कारोबारियों के स्टॉक पर सीमा निर्धारित की गई है। घरेलू स्तर पर नई चीनी की उपलब्धता जल्दी बढ़ाने के लिए चीनी मिलों में पेराई सत्र भी सामान्य से पहले शुरू करने की तैयारी है।

    प्याज की कीमतों में भी पिछले कुछ सप्ताह में बढ़ोतरी हुई है। 21 अगस्त को प्याज का औसत खुदरा भाव करीब 40.79 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक सप्ताह पहले यह लगभग 36.56 रुपये और एक महीने पहले 34.87 रुपये प्रति किलो था। इस तरह कुछ ही समय में प्याज के दाम में 4 से 5 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि हुई है। खरीफ प्याज की नई फसल की आवक में देरी को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है। दक्षिण भारत में आवक प्रभावित होने के साथ महाराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की स्थिति का भी असर पड़ा है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

    दालों की कीमतों में भी हल्की तेजी का रुख बना हुआ है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी प्रमुख दालों के दाम में पिछले एक महीने में लगभग 1 से 2 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है। दलहन की बुवाई के रकबे में कमी और मानसून से जुड़ी अनिश्चितता को इसकी प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है। कमजोर बारिश या फसल उत्पादन में कमी की आशंका आगे दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।

    खाद्य तेल भी महंगाई के इस दबाव से अछूते नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल की कीमतों में तेजी आई है। उत्पादन वाले क्षेत्रों में मौसम संबंधी परिस्थितियों और वैश्विक आपूर्ति में बदलाव का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ रहा है। भारत खाद्य तेल की अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। पिछले एक महीने में खाद्य तेलों की कीमतों में करीब 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

    इस तरह रसोई की महंगाई के पीछे किसी एक वस्तु की समस्या नहीं बल्कि आपूर्ति, मौसम, घरेलू उत्पादन, आयात लागत और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव दिखाई दे रहा है। सरकार चीनी और प्याज की उपलब्धता बढ़ाने तथा जमाखोरी पर रोक लगाने जैसे कदम उठा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों की दिशा नई फसल की आवक, मानसून और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • चीनी के बढ़ते दामों ने बढ़ाई आम लोगों की चिंता, सोशल मीडिया पर महंगाई को लेकर वायरल हो रहे मजेदार मीम्स और जोक्स

    चीनी के बढ़ते दामों ने बढ़ाई आम लोगों की चिंता, सोशल मीडिया पर महंगाई को लेकर वायरल हो रहे मजेदार मीम्स और जोक्स

    नई दिल्ली । देश के कई हिस्सों में चीनी की कीमतों में हुई बढ़ोतरी अब केवल बाजार और घरेलू बजट तक सीमित नहीं रही है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। महंगी होती चीनी को लेकर लोग तरह-तरह के मजेदार मीम्स, वीडियो और जोक्स साझा कर रहे हैं। बढ़ती कीमतों के बीच इंटरनेट पर लोगों की प्रतिक्रियाएं तेजी से चर्चा में आ रही हैं।

    चीनी रोजमर्रा की जरूरत की प्रमुख खाद्य वस्तुओं में शामिल है। ऐसे में इसकी कीमत बढ़ने का सीधा असर परिवारों के मासिक खर्च पर पड़ता है। खासकर त्योहारों का मौसम नजदीक होने के कारण चीनी की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। मिठाइयों और घरेलू पकवानों में इसका इस्तेमाल अधिक होने से आने वाले दिनों में इसकी खपत भी बढ़ सकती है।

    बाजार से सामने आ रही जानकारी के अनुसार, देश के कुछ हिस्सों में खुदरा बाजार में चीनी की कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। अलग-अलग राज्यों और बाजारों में कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है। इसी वजह से उपभोक्ताओं के बीच बढ़ते खर्च को लेकर चिंता बढ़ी है।

    मुंबई के बाजार में भी चीनी के भाव में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अगस्त के मध्य में एम30 ग्रेड चीनी की कीमत करीब 59 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। रोजाना इस्तेमाल की वस्तु होने के कारण कीमत में मामूली बढ़ोतरी भी बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं के घरेलू बजट को प्रभावित कर सकती है।

    पंजाब में स्थिति और अधिक चर्चा में है। यहां चीनी का थोक भाव करीब 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है, जबकि खुदरा दुकानों पर इसकी कीमत लगभग 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताई जा रही है। स्थानीय बाजार में कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने व्यापारियों और उपभोक्ताओं दोनों का ध्यान खींचा है।

    त्योहारों से पहले मांग बढ़ना चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे बताए जा रहे प्रमुख कारणों में से एक है। इस अवधि में घरों के अलावा मिठाई और खाद्य कारोबार से जुड़े व्यवसायों में भी चीनी की मांग बढ़ती है। मांग और बाजार में उपलब्धता के बीच संतुलन बिगड़ने पर कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    बढ़ती कीमतों के बीच सरकार की ओर से भी बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रखने और जमाखोरी पर नजर बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। बाजार में आपूर्ति सामान्य बनाए रखना और अनावश्यक रूप से कीमत बढ़ने से रोकना इस समय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    हालांकि, चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे अलग असर सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहा है। इंटरनेट यूजर्स महंगाई को लेकर अपनी प्रतिक्रिया सीधे शिकायत के बजाय हास्य और व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त कर रहे हैं। कई मीम्स में चीनी की कीमतों की तुलना दूसरी महंगी वस्तुओं से की जा रही है, जबकि कुछ पोस्टों में त्योहारों के दौरान बढ़ने वाले घरेलू खर्च को मजाकिया अंदाज में दिखाया जा रहा है।

    सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ये मीम्स इस बात का संकेत भी देते हैं कि रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में बदलाव आम लोगों के बीच कितनी तेजी से चर्चा का विषय बन जाता है। हालांकि मीम्स और सोशल मीडिया पोस्ट मनोरंजन का माध्यम हैं, लेकिन इनके पीछे बढ़ती महंगाई और घरेलू खर्च को लेकर लोगों की वास्तविक चिंता भी दिखाई दे रही है।

    आने वाले त्योहारों को देखते हुए चीनी की कीमतों पर बाजार की नजर बनी रहेगी। यदि मांग बढ़ती है तो आपूर्ति और कीमतों का संतुलन महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल उपभोक्ताओं के लिए बढ़े हुए भाव राहत की खबर नहीं हैं, जबकि सोशल मीडिया ने इस आर्थिक परेशानी को हास्य और मीम्स के जरिए एक अलग चर्चा में बदल दिया है।

  • युवा, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर कांग्रेस का केंद्र पर हमला, इमरान मसूद और रेणुका चौधरी ने उठाए सवाल हेडलाइन 2:

    युवा, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर कांग्रेस का केंद्र पर हमला, इमरान मसूद और रेणुका चौधरी ने उठाए सवाल हेडलाइन 2:


    नई दिल्ली । 
    राष्ट्रगीत, झंडा फहराने और राष्ट्रगान को लेकर राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेताओं ने देशभक्ति से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ युवाओं की बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, टैक्स का बोझ और महंगी होती ईएमआई जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाते हुए सरकार से इन पर चर्चा करने की मांग की है।

    कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने राष्ट्रगीत को लेकर बीजेपी पर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी को राष्ट्रगीत के मुद्दे पर अचानक इतना जोर देने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। मसूद ने कहा कि देश में जब राष्ट्रगीत गाने को लेकर विरोध और कार्रवाई की स्थिति बनी थी, तब बीजेपी के लोग इस तरह सामने नहीं आए थे।

    उन्होंने आजादी के बाद के राजनीतिक इतिहास का उल्लेख करते हुए बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसके लोगों ने लंबे समय तक राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और झंडा फहराने जैसे विषयों को लेकर वह भूमिका नहीं निभाई, जिसका दावा अब किया जा रहा है। मसूद ने कहा कि देश की जनता शिक्षित है और राजनीतिक दलों के पुराने रुख तथा उनके वर्तमान बयानों के बीच अंतर को समझती है।

    मसूद ने यह भी कहा कि आज सूचना तकनीक के दौर में लोगों के पास पुराने घटनाक्रमों और बयानों को जानने के कई साधन मौजूद हैं। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी पुराने तथ्य की जानकारी हासिल की जा सकती है। उनके अनुसार देशभक्ति से जुड़े इतिहास को किसी एक संगठन या विचारधारा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

    कांग्रेस नेता ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास व्यापक रहा है और इसमें अलग-अलग विचारधाराओं तथा समुदायों से जुड़े लोगों ने योगदान दिया था। इसलिए देशभक्ति पर किसी एक संगठन या राजनीतिक विचारधारा का अधिकार नहीं माना जा सकता। उनके इस बयान के जरिए कांग्रेस ने राष्ट्रवाद की मौजूदा राजनीतिक बहस को स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक इतिहास से जोड़ने की कोशिश की।

    वहीं कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने सरकार और बीजेपी नेताओं से जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने की अपील की। उन्होंने रोजगार की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के युवाओं के सामने नौकरियों की चुनौती बनी हुई है। चौधरी ने कहा कि राजनीतिक बहस को उन मुद्दों पर भी केंद्रित किया जाना चाहिए जिनका सीधा असर आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।

    रेणुका चौधरी ने बढ़ती महंगाई, टैक्स के बोझ और ईएमआई महंगी होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और ऐसे समय में सरकार को इन समस्याओं पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रुपये की स्थिति में गिरावट का असर लोगों की आर्थिक परिस्थितियों पर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेताओं के इन बयानों से स्पष्ट है कि पार्टी राष्ट्रगीत और देशभक्ति से जुड़ी बहस के समानांतर आर्थिक और रोजगार संबंधी मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना चाहती है। पार्टी का कहना है कि युवाओं के लिए रोजगार, महंगाई से राहत और आम परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ जैसे विषयों पर सरकार को जवाब देना चाहिए।

    दूसरी ओर, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह बहस केवल राष्ट्रगीत की स्वीकार्यता तक सीमित रहने के बजाय देशभक्ति की राजनीतिक व्याख्या और जनता से जुड़े आर्थिक मुद्दों तक भी फैल सकती है।

  • गरीब की थाली पर महंगाई की मार…. 4% तक बढ़े गेहूं के दाम…. आटा-रोटी पर असर

    गरीब की थाली पर महंगाई की मार…. 4% तक बढ़े गेहूं के दाम…. आटा-रोटी पर असर


    नई दिल्ली।
    महंगाई (Inflation) की मार अब खाने की थाली (Food plate) तक और बढ़ सकती है। वैश्विक बाजार (Global market) में गेहूं की कीमतों (Wheat prices) में तेजी का असर घरेलू बाजार (Domestic Market) में भी दिखाई देने लगा है। फिलहाल गेहूं की कीमत करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के आसपास है, जो 24 जुलाई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। पिछले एक महीने में देश की प्रमुख मंडियों में गेहूं के भाव 3.85 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। अगर यह तेजी आगे भी बनी रहती है तो आटा, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।


    काला सागर का तनाव गेहूं के लिए इतना अहम क्यों है?

    गेहूं की कीमतों में तेजी के पीछे काला सागर क्षेत्र में बढ़ता तनाव बड़ी वजह बन रहा है। रूस और यूक्रेन दुनिया के गेहूं निर्यात में बड़ा हिस्सा रखते हैं। रूस की ओर से यूक्रेन के साथ काला सागर में संभावित युद्धविराम के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद वहां तनाव बना हुआ है। हमलों से समुद्री रास्तों पर शिपिंग प्रभावित हो रही है और निर्यात घटने की चिंता बढ़ी है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की आपूर्ति को लेकर आशंका पैदा हुई है।


    घरेलू मंडियों में कितनी बढ़ी गेहूं की कीमत?

    इस वैश्विक चिंता का असर भारतीय मंडियों में भी दिख रहा है। 17 जुलाई से 17 अगस्त के बीच राजकोट में गेहूं का भाव 2,600 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। दिल्ली में यह 2,782.50 रुपये से बढ़कर 2,870 रुपये, कानपुर में 2,620 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये और कोटा में 2,657.50 रुपये से बढ़कर 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। इंदौर में भी भाव 2,695 रुपये से बढ़कर 2,708.75 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। यानी कई प्रमुख मंडियों में एक महीने के भीतर कीमतें बढ़ी हैं।


    क्या आगे भी बढ़ सकती हैं गेहूं की कीमतें?

    गेहूं की कीमतों का आगे का रुख काला सागर क्षेत्र के हालात और मौसम पर निर्भर करेगा। अगर वहां तनाव और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आयातक देशों के बाजारों पर पड़ सकता है। भारत में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का घरेलू बाजार पर असर पड़ता है। ऐसे में फिलहाल गेहूं के ऊंचे भाव चिंता का विषय बने हुए हैं। कीमतों में और तेजी आई तो इसका असर आटे और गेहूं से जुड़े दूसरे उत्पादों पर भी पड़ सकता है।


    गेहूं के साथ प्याज ने भी क्यों बढ़ाई रसोई की चिंता?

    महंगाई का दबाव केवल गेहूं तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत से खरीफ प्याज की आवक में देरी के बीच थोक मंडी में प्याज का भाव बढ़कर 32 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है। 17 अगस्त 2026 को प्याज का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य 37.20 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक महीने पहले यह 34.53 रुपये और एक साल पहले 26.86 रुपये प्रति किलो था। सरकार की ओर से न्यूनतम खरीद मूल्य में सात बार बढ़ोतरी के बावजूद प्याज की खरीद दो लाख टन के लक्ष्य से करीब 25 फीसदी कम रहने का अनुमान है। यानी गेहूं और प्याज दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी ने घरेलू रसोई के बजट को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

  • पाकिस्तान के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, जानें नई कीमतों से आम लोगों पर कितना बढ़ा बोझ

    पाकिस्तान के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, जानें नई कीमतों से आम लोगों पर कितना बढ़ा बोझ


    नई दिल्ली । 
    पाकिस्तान अपने 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर महंगाई की एक और चुनौती का सामना कर रहा है। देश में 14 अगस्त से पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लागू कर दी गई है। ईंधन के दाम बढ़ने का सीधा असर आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ परिवहन और कारोबार की लागत पर पड़ने की संभावना है।

    नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल की कीमत में 0.45 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई है। इसके बाद पेट्रोल का दाम 324.98 रुपये से बढ़कर 325.43 रुपये प्रति लीटर हो गया है। इस बढ़ोतरी के बाद देश में पेट्रोल की कीमत 325 रुपये प्रति लीटर के स्तर को पार कर गई है।

    हाई-स्पीड डीजल के दाम में इससे अधिक वृद्धि की गई है। इसकी कीमत 1.16 रुपये प्रति लीटर बढ़कर 382.79 रुपये से 383.95 रुपये प्रति लीटर हो गई है। नई दरें 14 अगस्त से प्रभावी मानी जा रही हैं। डीजल की कीमत में यह वृद्धि विशेष रूप से परिवहन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन में डीजल की बड़ी भूमिका होती है।

    ईंधन की नई कीमतें पाकिस्तान के बदले हुए पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण तंत्र के तहत तय की गई हैं। इस व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव घरेलू ईंधन दरों पर तेजी से पड़ सकता है।

    पाकिस्तान में ईंधन कीमतों से जुड़ी व्यवस्था में हाल के महीनों में बदलाव किया गया है। जुलाई से लागू नई प्रणाली का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में होने वाले बदलावों के अनुरूप घरेलू कीमतों को समायोजित करना बताया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच ईंधन कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बदलाव का असर उन देशों पर ज्यादा पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। पाकिस्तान भी अपनी ईंधन जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों और विनिमय दर में बदलाव घरेलू बाजार में ईंधन की लागत को प्रभावित कर सकते हैं।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने पर माल की ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका प्रभाव खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। पहले से महंगाई का सामना कर रही आबादी के लिए ईंधन की कीमत में मामूली वृद्धि भी घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

    पाकिस्तान में इस वर्ष पहले भी ईंधन कीमतों में बदलाव देखने को मिले हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, क्षेत्रीय तनाव और आयात लागत में बदलाव के कारण वहां ईंधन मूल्य निर्धारण लगातार चर्चा में रहा है।

    14 अगस्त को लागू हुई नई दरें ऐसे समय में आई हैं जब पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। राष्ट्रीय उत्सव के बीच पेट्रोल और डीजल महंगा होने से महंगाई का मुद्दा एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा में है। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की दिशा और क्षेत्रीय परिस्थितियां यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि पाकिस्तान में ईंधन की कीमतों पर आगे कितना दबाव बना रहता है।

  • जुलाई में थोक महंगाई दर घटकर 9.78 प्रतिशत हुई, ईंधन कीमतों में नरमी के बावजूद खाद्य और विनिर्माण दबाव बढ़ा

    जुलाई में थोक महंगाई दर घटकर 9.78 प्रतिशत हुई, ईंधन कीमतों में नरमी के बावजूद खाद्य और विनिर्माण दबाव बढ़ा

    नई दिल्ली ।भारत में थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में जुलाई 2026 के दौरान मामूली नरमी देखने को मिली। जुलाई में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 9.78 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 9.87 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस तरह मासिक आधार पर थोक महंगाई में हल्की कमी आई है, हालांकि कीमतों का दबाव अभी भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

    2022-23 को आधार वर्ष मानकर जारी अनंतिम आंकड़ों के अनुसार जुलाई में सभी वस्तुओं का थोक मूल्य सूचकांक 110.0 रहा। जून में यह सूचकांक 110.2 दर्ज किया गया था। समग्र सूचकांक में मामूली गिरावट के बावजूद अलग-अलग श्रेणियों में कीमतों का रुझान एक जैसा नहीं रहा।

    प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर जुलाई में बढ़कर 8.52 प्रतिशत हो गई, जबकि जून में यह 7.00 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि इस श्रेणी की वस्तुओं की कीमतों में पिछले महीने की तुलना में अधिक दबाव रहा। प्राथमिक वस्तुओं का सूचकांक भी जून के 116.1 से बढ़कर जुलाई में 117.2 हो गया।

    विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिली। जुलाई में इस श्रेणी की महंगाई दर 8.29 प्रतिशत रही, जबकि जून में यह 7.48 प्रतिशत थी। विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक जून के 107.8 से बढ़कर जुलाई में 108.4 हो गया। इससे उत्पादन क्षेत्र में लागत और कीमतों से जुड़ा दबाव बने रहने का संकेत मिलता है।

    इसके विपरीत ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में महंगाई दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। जून में 27.41 प्रतिशत रही यह दर जुलाई में घटकर 20.05 प्रतिशत पर आ गई। हालांकि गिरावट के बावजूद इस श्रेणी में महंगाई अभी भी काफी ऊंची बनी हुई है। ईंधन और ऊर्जा का सूचकांक जून के 111.1 से घटकर जुलाई में 105.4 हो गया।

    जुलाई में थोक महंगाई को प्रभावित करने वाले प्रमुख क्षेत्रों में खनिज तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य वस्तुएं, बेसिक मेटल्स, गैर-खाद्य प्राथमिक उत्पाद, खाद्य उत्पादों का विनिर्माण तथा रसायन और रासायनिक उत्पाद शामिल रहे। इन क्षेत्रों में कीमतों की बढ़ोतरी का असर कुल थोक महंगाई के आंकड़े पर पड़ा।

    खाद्य क्षेत्र में भी कीमतों का दबाव बढ़ा है। जुलाई में डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स आधारित महंगाई दर 6.65 प्रतिशत रही, जो जून के 6.14 प्रतिशत से अधिक है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का असर थोक बाजार के साथ आगे चलकर अन्य कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

    इस बीच मई 2026 के थोक महंगाई आंकड़ों में भी संशोधन किया गया है। मई का अंतिम थोक मूल्य सूचकांक 109.9 के प्रारंभिक अनुमान से संशोधित होकर 110.1 हो गया। इसके साथ मई की थोक महंगाई दर भी 9.68 प्रतिशत के प्रारंभिक आंकड़े से संशोधित होकर 9.88 प्रतिशत हो गई।

    मई के अंतिम आंकड़े 98.14 प्रतिशत वेटेड रिस्पॉन्स रेट के आधार पर तैयार किए गए हैं। इसके अलावा आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स का मई का अंतिम आंकड़ा 109.6 के प्रारंभिक अनुमान से बढ़कर 109.9 हो गया है।

    विनिर्माण क्षेत्र के ऑल इंडिया ट्रायल इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स की बात करें तो जुलाई में यह 105.9 दर्ज किया गया। मई के इनपुट पीपीआई के अंतिम आंकड़े में भी संशोधन हुआ और यह शुरुआती 104.9 से बढ़कर 106.5 हो गया।

    कुल मिलाकर जुलाई में थोक महंगाई दर में मामूली राहत जरूर मिली, लेकिन प्राथमिक वस्तुओं, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों में बढ़ता मूल्य दबाव अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। वहीं ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में आई नरमी ने समग्र महंगाई दर को नीचे लाने में मदद की है।