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सितंबर में थोक महंगाई बढ़कर 11.39 प्रतिशत पहुंची, ईंधन, खाद्य पदार्थों और विनिर्माण क्षेत्र में कीमतों का दबाव बढ़ा
नई दिल्ली ।देश में थोक महंगाई सितंबर 2026 में बढ़कर 11.39 प्रतिशत पर पहुंच गई। अगस्त में यह दर 9.92 प्रतिशत दर्ज की गई थी। सितंबर में हुई इस वृद्धि के साथ थोक कीमतों पर दबाव लगातार दूसरे महीने तेज बना रहा। थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी कच्चे माल और विभिन्न वस्तुओं की कीमतों में आए बदलाव के बीच दर्ज की गई।सितंबर में सभी वस्तुओं का संयुक्त थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 112.5 हो गया, जबकि अगस्त में यह 110.8 था। आंकड़ों में प्राथमिक वस्तुओं, ईंधन एवं ऊर्जा तथा विनिर्मित उत्पादों, तीनों प्रमुख क्षेत्रों में महंगाई बढ़ने की जानकारी सामने आई। इससे पता चलता है कि थोक कीमतों में वृद्धि किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि उत्पादन और आपूर्ति से जुड़े कई हिस्सों में दर्ज की गई।प्राथमिक वस्तुओं की मुद्रास्फीति सितंबर में बढ़कर 8.67 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 7.76 प्रतिशत थी। इसी तरह ईंधन एवं ऊर्जा क्षेत्र की महंगाई 22.93 प्रतिशत से बढ़कर 25.85 प्रतिशत पर पहुंच गई। विनिर्मित उत्पादों की मुद्रास्फीति भी अगस्त के 8.37 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 9.76 प्रतिशत दर्ज की गई। इन तीनों क्षेत्रों के सूचकांकों में भी वृद्धि हुई। प्राथमिक वस्तुओं का सूचकांक 120.3, ईंधन एवं ऊर्जा का 110.5 और विनिर्मित उत्पादों का 110.2 रहा।विभिन्न वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने थोक महंगाई को ऊपर ले जाने में भूमिका निभाई। इनमें खनिज तेल, खाद्य पदार्थ, कच्चा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस शामिल हैं। इसके अलावा कोयला एवं लिग्नाइट, बेसिक मेटल्स, रसायन, वस्त्र, रबर एवं प्लास्टिक उत्पाद और विद्युत उपकरणों की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई। इन क्षेत्रों में बढ़ी कीमतें सितंबर के समग्र थोक मूल्य सूचकांक में दिखाई दीं।खाद्य महंगाई के आंकड़ों में भी तेजी दर्ज की गई। डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स में प्राथमिक खाद्य वस्तुओं और विनिर्मित खाद्य उत्पादों को शामिल किया जाता है। सितंबर में इस सूचकांक की वार्षिक मुद्रास्फीति दर बढ़कर 8.66 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 7.05 प्रतिशत थी। खाद्य वस्तुओं से जुड़े इस आंकड़े में वृद्धि से संकेत मिलता है कि खाद्य श्रेणी में भी थोक कीमतों का दबाव बढ़ा है।इस दौरान आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स यानी पीपीआई में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सितंबर में इसका सूचकांक 112.5 पर पहुंच गया, जो अगस्त में 110.8 था। कृषि, वानिकी एवं मत्स्य पालन, खनन और विनिर्माण क्षेत्रों में उत्पादक कीमतें बढ़ीं। इसके विपरीत बिजली क्षेत्र का सूचकांक अपेक्षाकृत कम रहा। विनिर्माण क्षेत्र के लिए जारी प्रायोगिक इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स यानी आईपीपीआई सितंबर में 106.1 दर्ज किया गया। यह सूचकांक उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और अन्य इनपुट की लागत से संबंधित जानकारी देता है।सरकार ने जुलाई 2026 के अंतिम संशोधित आंकड़े भी जारी किए। इनके अनुसार, जुलाई का थोक मूल्य सूचकांक 110.0 पर अपरिवर्तित रहा और उस महीने की अंतिम थोक महंगाई दर 9.78 प्रतिशत रही। जुलाई का आउटपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक भी संशोधन के बाद 109.9 पर स्थिर दर्ज किया गया। इस तरह सितंबर के आंकड़ों में थोक महंगाई के साथ उत्पादक कीमतों में भी वृद्धि सामने आई। -

आईएमएफ के 7 प्रतिशत विकास दर अनुमान से भारत की आर्थिक क्षमता पर भरोसा मजबूत, विशेषज्ञों ने खपत, निवेश और युवा आबादी को बताया बड़ी ताकत
नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत रहने के अनुमान को अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों ने देश की आर्थिक क्षमता पर वैश्विक भरोसे का संकेत बताया है। इस अनुमान के अनुसार, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि देश की विशाल आबादी, मजबूत घरेलू खपत, निवेश की संभावनाएं और सरकारी नीतियां आर्थिक विस्तार में अहम भूमिका निभा रही हैं।अर्थशास्त्री विजय सरदाना के मुताबिक, 1.5 अरब से अधिक आबादी वाले भारत में विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। उनका कहना है कि देश के मौजूदा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े इसकी आर्थिक क्षमता को दर्शाते हैं। भारत का बाजार निवेश और कारोबार के लिए बड़े अवसर उपलब्ध कराता है। वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में बदलाव के दौर में भी देश महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सरदाना ने घरेलू खपत को भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख ताकत बताया। उनके अनुसार, बड़ी आबादी की रोजमर्रा की जरूरतों पर होने वाला खर्च कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र और तकनीक सहित विभिन्न क्षेत्रों की गतिविधियों को समर्थन देता है। उन्होंने कहा कि आईएमएफ का अनुमान आर्थिक विश्वास बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन केवल जीडीपी की वृद्धि से आम लोगों के जीवन में बदलाव सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना और लोगों की आय में सुधार जरूरी है।
अर्थशास्त्री और कर विशेषज्ञ सीए योगेंद्र कपूर का मानना है कि भारत में 7 प्रतिशत या इससे अधिक की विकास दर बनाए रखने की क्षमता है। उनके अनुसार, डिजिटलीकरण, बुनियादी ढांचे के विकास और आर्थिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने पर सरकार का जोर निवेश के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर रहा है। आयकर और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में लगातार बढ़ोतरी को उन्होंने अर्थव्यवस्था के औपचारिक ढांचे की ओर बढ़ने का संकेत बताया। इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत होने में भी मदद मिली है।
हालांकि, कपूर ने महंगाई को अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौती बताया। उनके मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में विकास की गति बनाए रखने के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना जरूरी होगा।
बाजार विशेषज्ञ एपी शुक्ला ने कहा कि वर्ष 2014 के बाद भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियों के बावजूद अपनी विकास गति बनाए रखी है। उन्होंने सरकार की नीतियों, बेहतर कारोबारी माहौल और बढ़ते निजी निवेश को अर्थव्यवस्था के लिए सहायक बताया। शुक्ला के अनुसार, भारत की युवा आबादी भी वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने वाली प्रमुख ताकत है।
अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ विनोद रावल ने आईएमएफ के 7 प्रतिशत विकास दर के अनुमान को भारत के लिए सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि 12 लाख रुपये तक की आय पर आयकर में राहत देने के फैसले से लोगों की खर्च करने की क्षमता बढ़ सकती है। उनके मुताबिक, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में हो रहा विकास भी भविष्य में अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचा सकता है। रावल ने पेट्रोल की कीमतों के पहले के स्तर पर लौटने की संभावना भी जताई, हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। उन्होंने घरेलू मांग, सरकारी नीतियों और नई तकनीकों में विकास को आर्थिक वृद्धि के महत्वपूर्ण आधार बताया।
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दीवाली से पहले चावल, चीनी और दालों की कीमतों में तेजी, खराब मौसम और महंगी ढुलाई से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित
नई दिल्ली ।दीवाली से पहले खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें आम लोगों के घरेलू बजट पर दबाव डाल रही हैं। चावल, चीनी, दाल और खाने के तेल समेत कई कृषि उत्पादों के दाम में तेजी देखी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इन वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके पीछे खराब मौसम, फसलों के उत्पादन में संभावित कमी, अंतरराष्ट्रीय तनाव और सामान की ढुलाई महंगी होने जैसे कारण बताए जा रहे हैं। त्योहारों के दौरान खाद्य वस्तुओं की मांग के बीच आपूर्ति प्रभावित होने से कीमतों को लेकर चिंता बढ़ रही है।चावल की कीमतों में तेजी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के दाम पिछले दो वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं। इसकी प्रमुख वजह बाजार में आपूर्ति कम होना और माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की लागत बढ़ना बताई जा रही है। कंटेनर के जरिए सामान भेजने का खर्च पांच हजार डॉलर से बढ़कर करीब 55 हजार डॉलर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार की लागत में बड़ा अंतर आया है और खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी है।
खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुमान के अनुसार, दुनिया में चावल का उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 2.4 प्रतिशत घट सकता है। भारत में भी उत्पादन कम होने का अनुमान जताया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में चावल का उत्पादन 15.4 करोड़ टन से घटकर 14.4 करोड़ टन रह सकता है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के वायदा भाव में 30 से 70 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज किए जाने की बात कही गई है। उत्पादन में संभावित गिरावट और आपूर्ति की बढ़ती लागत का असर बाजार की कीमतों पर पड़ रहा है।
चीनी के बाजार में भी तेजी बनी हुई है। अक्टूबर में कच्ची चीनी के वायदा भाव करीब 8 प्रतिशत बढ़े हैं। वहीं, जुलाई में दर्ज निचले स्तर से कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ब्राजील, भारत, थाईलैंड और यूरोपीय संघ में खराब मौसम के कारण चीनी उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आने की आशंका जताई गई है। यूरोपीय संघ में उत्पादन 19 प्रतिशत और थाईलैंड में 17 प्रतिशत तक घट सकता है। यदि उत्पादन में यह गिरावट आती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।
खाने के तेल की कीमतों पर भी वैश्विक ऊर्जा बाजार का असर दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ी परिस्थितियों के बीच जैव ईंधन की मांग बढ़ रही है। जैव ईंधन बनाने में इस्तेमाल होने वाले वनस्पति तेल की मात्रा भी बढ़ रही है। उपलब्ध अनुमान के मुताबिक, दुनिया में इस्तेमाल होने वाले कुल वनस्पति तेल का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा जैव ईंधन उत्पादन में खर्च हो रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुमान में जैव ईंधन के लिए वनस्पति तेल का इस्तेमाल 30 से 32 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना जताई गई है। इससे खाद्य तेलों की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
दालों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले एक वर्ष में चने के दाम 23 प्रतिशत, उड़द के 24 प्रतिशत और मटर के 47 प्रतिशत तक बढ़े हैं। इनकी कीमतों में तेजी के पीछे आयात पर अधिक शुल्क को भी एक कारण बताया गया है। इसके अलावा, जौ की कीमतों में 44 प्रतिशत, मक्का में 9 प्रतिशत और चाय में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
खराब मौसम के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय तनाव से परिवहन तथा आपूर्ति व्यवस्था में रुकावट आने की स्थिति में महंगाई का दबाव आगे भी बना रह सकता है। चावल, चीनी, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर उपभोक्ताओं के खर्च पर पड़ सकता है। हालांकि, आने वाले समय में कीमतें किस दिशा में जाएंगी, यह उत्पादन, उपलब्धता और ढुलाई की लागत में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा।
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सोने की कीमतों में 1,443 रुपये की गिरावट, चांदी भी 1,552 रुपये फिसली, जानें घरेलू बाजार में भाव और आगे के अहम स्तर
नई दिल्ली । सप्ताह के पहले कारोबारी दिन सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को घरेलू वायदा बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर शुरुआती कारोबार के दौरान सोना 1,443 रुपये प्रति 10 ग्राम तक टूट गया, जबकि चांदी की कीमत में 1,552 रुपये प्रति किलोग्राम तक की कमी आई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोनों कीमती धातुओं के भाव में हल्की तेजी के बावजूद भारतीय बाजार में कीमतें नीचे रहीं। इसके पीछे रुपये की मजबूती और निवेशकों की मुनाफावसूली को प्रमुख कारण बताया गया।एमसीएक्स पर 4 दिसंबर को डिलीवरी वाला सोना पिछले कारोबारी सत्र में 1,51,499 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 1,51,596 रुपये पर खुला, लेकिन शुरुआती कारोबार में बिकवाली बढ़ने से भाव गिरकर 1,50,056 रुपये प्रति 10 ग्राम के निचले स्तर पर पहुंच गया। इस तरह सोने में 1,443 रुपये यानी करीब 0.95 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, सोने के लिए 1,50,000 से 1,50,700 रुपये का दायरा महत्वपूर्ण सपोर्ट स्तर है।
चांदी में भी कारोबार के दौरान दबाव बना रहा। एमसीएक्स पर दिसंबर डिलीवरी वाली चांदी पिछले सत्र में 2,25,755 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी। सोमवार को यह 2,25,494 रुपये पर खुली, जो पिछले बंद भाव से करीब 0.11 प्रतिशत कम था। इसके बाद कीमत और नीचे आई तथा चांदी 2,24,203 रुपये प्रति किलोग्राम के निचले स्तर तक पहुंच गई। इस दौरान इसमें 1,552 रुपये यानी लगभग 0.68 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विश्लेषकों का मानना है कि औद्योगिक मांग चांदी को कुछ समर्थन दे सकती है, लेकिन रुपये की मजबूती निकट भविष्य में इसकी कीमतों पर दबाव बनाए रख सकती है।
वैश्विक बाजार में तस्वीर कुछ अलग रही। कॉमेक्स पर सोना 4,200 डॉलर प्रति औंस के ऊपर कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि चांदी का भाव करीब 61.1 डॉलर प्रति औंस रहा। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में मजबूती के बावजूद भारतीय बाजार में गिरावट की एक प्रमुख वजह रुपये में संभावित मजबूती की उम्मीद है। भारतीय रिजर्व बैंक के हालिया कदमों से रुपये को समर्थन मिलने की संभावना के बीच निवेशक इस घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं। रुपया मजबूत होने पर आयातित सोना और चांदी घरेलू बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते पड़ सकते हैं।
आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में अमेरिका के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई के आंकड़े और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति शामिल हैं। बाजार में दिसंबर के दौरान ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की उम्मीद भी बनी हुई है। आम तौर पर ऊंची ब्याज दरें सोने जैसी ऐसी संपत्तियों का आकर्षण घटा सकती हैं, जिनसे नियमित ब्याज नहीं मिलता। इसलिए आने वाले आर्थिक आंकड़ों के आधार पर निवेशकों की रणनीति में बदलाव देखने को मिल सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की व्यापार एवं विकास एजेंसी ने 2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर घटकर 2.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव को भी आर्थिक जोखिमों में शामिल किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भू-राजनीतिक अनिश्चितता लंबे समय में सोने की सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में मांग को समर्थन दे सकती है।
तकनीकी स्तरों के लिहाज से सोने के लिए 1.50 लाख रुपये के आसपास का भाव अहम माना जा रहा है। यह स्तर टूटने पर कीमत 1.48 लाख रुपये तक जा सकती है, जबकि ऊपर की ओर 1.52 लाख से 1.53 लाख रुपये का दायरा प्रमुख प्रतिरोध स्तर है। चांदी के लिए 2.24 लाख रुपये प्रति किलोग्राम का स्तर महत्वपूर्ण है। कीमतों में मजबूती आने पर इसका भाव 2.28 लाख रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।
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महंगाई के आंकड़े, कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर रहेगी बाजार की नजर, आठ हफ्ते बाद सेंसेक्स-निफ्टी में लौटी तेजी
नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला सप्ताह अहम रहने वाला है। निवेशकों की नजर भारत और अमेरिका से जारी होने वाले आर्थिक आंकड़ों, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर रहेगी। इन कारकों के साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियां बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं। अमेरिका में महंगाई, घरों की बिक्री और खुदरा बिक्री से जुड़े आंकड़े जारी होंगे। वहीं, भारत में खुदरा और थोक महंगाई, बेरोजगारी, व्यापार संतुलन तथा विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े सामने आएंगे। इन आंकड़ों से आर्थिक स्थिति के बारे में संकेत मिल सकते हैं, जिन पर निवेशकों की प्रतिक्रिया बाजार में उतार-चढ़ाव के रूप में दिखाई दे सकती है। बीते सप्ताह भारतीय बाजार में तेजी दर्ज की गई थी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों साप्ताहिक आधार पर बढ़त के साथ बंद हुए, जो आठ सप्ताह बाद पहली बार हुआ। ऐसे में आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशक पिछले सप्ताह की तेजी के साथ नए आर्थिक संकेतों पर भी नजर रखेंगे।कच्चे तेल की कीमत अगले सप्ताह बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारकों में शामिल रहेगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। तेल की कीमतों में बदलाव का असर निवेशकों की धारणा और बाजार की गतिविधियों पर पड़ सकता है। इस बीच रूस से डीजल की आपूर्ति को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान भी चर्चा में है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर कहा कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी बातचीत सफल रही है। उनके मुताबिक, रूस अमेरिकी और वैश्विक बाजारों में तुरंत तीन लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा। इसके बाद नवंबर में पांच लाख टन और उसके तुरंत बाद दस लाख टन डीजल की आपूर्ति की जाएगी। इस घोषणा के संभावित प्रभाव को लेकर बाजार की नजर बनी रह सकती है। जानकारों के मुताबिक, रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ने से वैश्विक तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, कीमतों की वास्तविक दिशा बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
अगले सप्ताह निवेशकों के लिए अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी एक अहम संकेतक रहेगी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड लगातार पांच प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। निवेशक इसके स्तर और इसमें होने वाले बदलावों पर नजर रखेंगे। इसके साथ अमेरिका के महंगाई आंकड़े, खुदरा बिक्री और घरों की बिक्री से जुड़े आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकते हैं। भारत में खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़ों के अलावा बेरोजगारी, व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार की जानकारी भी जारी होने वाली है। इन आंकड़ों के आधार पर निवेशक घरेलू अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन कर सकते हैं। कच्चे तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव के बीच इन आर्थिक संकेतकों पर बाजार की प्रतिक्रिया आने वाले सप्ताह में देखने को मिल सकती है।
बीते सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में बढ़त दर्ज की गई। सेंसेक्स 562.63 अंक यानी 0.78 प्रतिशत की तेजी के साथ 72,472.33 पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी में 98.50 अंक यानी 0.44 प्रतिशत की मजबूती रही और यह 22,520.45 के स्तर पर बंद हुआ। आठ सप्ताह बाद यह पहला मौका था, जब दोनों प्रमुख सूचकांक साप्ताहिक आधार पर बढ़त के साथ बंद हुए। क्षेत्रवार प्रदर्शन में बीएसई टेलीकॉम सबसे आगे रहा और इसमें 3.72 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। बीएसई एफएमसीजी में 2.43 प्रतिशत, बीएसई पीएसयू बैंक में 2.31 प्रतिशत, बीएसई फाइनेंशियल सर्विसेज में 1.03 प्रतिशत और बीएसई आईटी में 0.76 प्रतिशत की बढ़त रही। हालांकि, सभी क्षेत्रों में तेजी नहीं रही। बीएसई रियल्टी में 4.19 प्रतिशत और बीएसई मेटल में 4.18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बीएसई यूटिलिटी 2.48 प्रतिशत, बीएसई कमोडिटीज 2.46 प्रतिशत और बीएसई पावर 2.22 प्रतिशत कमजोर हुए। आने वाले सप्ताह में बाजार की दिशा तय करने में आर्थिक आंकड़ों और वैश्विक संकेतों की भूमिका अहम रह सकती है।
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आम आदमी को झटका…. महंगाई पर लगाम कसने के बहाने बढ़ाया रेपो रेट… अब EMI करेगी जेब ढ़ीली!
नई दिल्ली। तकनीकी रूप से बताया जाए तो रेपो रेट (Repo Rate) वह ब्याज दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक (Reserve Bank) देश के कमर्शियल बैंकों (Commercial Banks) को उनके दैनिक कामकाज के लिए कर्ज देता है. देखने-सुनने में यह भले दो बैंकों के बीच की बात लगे, लेकिन जैसे ही रेप रेप बढ़ने की खबर आती है, आम आदमी की जेब पर इसका असर बेहद पेंचीदा और खर्चीला हो जाता है. साढ़े तीन साल बाद RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है. इसके पीछे तर्क ये दिया गया है कि ईरान वॉर (Iran War) के कारण देश में बढ़ती महंगाई को 6 फीसदी के भीतर रोके रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।रिजर्व बैंक की दलील और उसके सामने के हालात अपनी जगह है, लेकिन आपकी और हमारी रसोई तक पहुंचने वाला यह एक बड़ा झटका भी है. बैंक को मिलने वाला महंगा कर्ज घूम-फिरकर आखिरकार आम इंसान की EMI, मकान के सपने और महीने के बजट पर ही भारी पड़ता है।
रेपो रेट बढ़ने की पूरी कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. 2020 में जब कोविड महामारी की वजह से सब कुछ बंद पड़ गया था, तब बाजार में पैसे का बहाव बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें घटा दी थीं, ताकि लोग आसानी से लोन ले सकें और ठप पड़ी अर्थव्यवस्था में थोड़ी जान आए. लेकिन महामारी का दौर ढलते ही दुनिया में एक के बाद एक नए संकट शुरू हो गए।
Repo Rate बढ़ा, अब 20, 30 और 50 लाख के लोन पर कितनी कटेगी EMI?
पहले रूस-यूक्रेन का झगड़ा और अब ईरान-अमेरिका के बीच जारी जंग ने कच्चे तेल से लेकर दुनिया भर के बाजारों में आग लगा दी है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है. जब दुनिया में तेल महंगा होता है, तो देश के भीतर माल ढुलाई महंगी हो जाती है, जिससे बाजार में हर चीज का भाव चढ़ जाता है. इस वैश्विक उथल-पुथल ने भारत में महंगाई को इस कदर भड़का दिया कि रिजर्व बैंक को साढ़े तीन साल बाद दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का फैसला लेना ही पड़ा.
रिजर्व बैंक की नजरिया: महंगाई की आग बुझाने की मजबूरी
रिजर्व बैंक की अपनी एक तय जिम्मेदारी है- बाजार में घूम रहे पैसे को इस तरह संभालना कि कीमतें काबू से बाहर न जाएं. जब बाजार में महंगाई का ग्राफ ऊपर भागने लगता है, तो रिजर्व बैंक का मानना होता है कि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा थोड़ा कम किया जाए. ताकि डिमांड घटे और कीमतें स्थिर हों।अर्थशास्त्री इस पहलू पर सहमति देते हुए समझाते हैं कि जब महंगाई लंबी खिंच जाती है, तो वह आम परिवार की पूरी बचत को निगल जाती है. रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाकर एक तरह से ब्रेक लगाने की कोशिश की है. उसके लिए प्राथमिकता विकास की रफ्तार से ज्यादा इस बात की है कि रोजमर्रा के सामान इतने महंगे न हो जाएं कि आम इंसान की खरीदने की ताकत ही खत्म हो जाए।
मोदी सरकार का नजरिया: भले राजनीतिक जोखिम हो, अर्थव्यवस्था का संतुलन जरूरी
मोदी सरकार के लिए रिजर्व बैंक का यह फैसला एक कड़वी दवा जैसा है. एक तरफ सरकार चाहती है कि देश में नए उद्योग लगें, लोग कारोबार शुरू करें और युवाओं को नौकरियां मिलें, जिसके लिए सस्ते लोन की जरूरत होती है. कर्ज महंगा होने से व्यापार की रफ्तार धीमी पड़ने का डर रहता है. इतना ही नहीं, सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि रेपो रेट बढ़ने से जब EMI बढ़ेगी, तो भी लोग सरकार को ही कोसेंगे।लेकिन दूसरी तरफ, सरकार यह भी अच्छी तरह जानती है कि आम इंसान के लिए महंगाई से बड़ा कोई दर्द नहीं होता. अगर राशन, तेल और सब्जियों के दाम लगातार बढ़ते रहे, तो जनता का गुस्सा सीधे सरकार पर ही फूटता है. इसलिए सरकार के नजरिये से यह कदम भले ही थोड़े समय के लिए अप्रिय हो, लेकिन देश की आर्थिक साख बचाए रखने और रुपये को टूटने से रोकने के लिए यह कदम उठाना उसकी भी एक राजनीतिक मजबूरी बन गया है।
आम नागरिक का संकट: बजट और सपनों पर टूटा पहाड़
मध्यमवर्गीय और कामकाजी परिवारों के लिए इस फैसले का मतलब है हर महीने का गणित गड़बड़ा जाना. जब रिजर्व बैंक से बैंकों को महंगा कर्ज मिलेगा, तो बैंक बिना देर किए इसका बोझ अपने ग्राहकों पर डाल देंगे. इसका सबसे बड़ा थप्पड़ उन लोगों को लगेगा जिन्होंने होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन ले रखा है। -

आरबीआई ने महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा, खाद्य और ईंधन कीमतों के दबाव के बीच रेपो रेट में भी 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी
नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि महंगाई का परिदृश्य पिछले वर्ष की तुलना में अब उतना अनुकूल नहीं है। खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के साथ आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिम भी बढ़े हैं। मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की घोषणा करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई के ताजा अनुमान और उससे जुड़े जोखिमों की जानकारी दी।आरबीआई के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में CPI महंगाई 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। तीसरी तिमाही में इसके बढ़कर 6 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। वहीं, वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान 5.6 प्रतिशत रखा गया है। चालू वित्त वर्ष के लिए कोर मुद्रास्फीति का अनुमान 4.4 प्रतिशत है।
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि अगस्त में CPI महंगाई बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई, जबकि इससे पहले यह 4.5 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी में खाद्य और ईंधन कीमतों में तेजी की अहम भूमिका रही। उन्होंने कहा कि कोर मुद्रास्फीति में भी वृद्धि हुई है। इससे संकेत मिलता है कि कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव अब अर्थव्यवस्था के अधिक क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है।
केंद्रीय बैंक के मुताबिक खाद्य महंगाई अब केवल कुछ चुनिंदा वस्तुओं तक सीमित नहीं रही है। चीनी और प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। अगस्त में ईंधन महंगाई बढ़ने के पीछे प्रतिकूल आधार प्रभाव भी एक कारण रहा। आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में कोर मुद्रास्फीति 4.2 प्रतिशत रही। वहीं, कीमती धातुओं को अलग रखने पर कोर मुद्रास्फीति 2.9 प्रतिशत दर्ज की गई।
आरबीआई ने आने वाले महीनों में आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिमों के बने रहने की आशंका जताई है। कमजोर मानसून, जारी अल नीनो परिस्थितियां, ऊंची ऊर्जा कीमतें और अन्य कमोडिटी की मजबूत कीमतें महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। केंद्रीय बैंक ने इस स्थिति को महंगाई के मौजूदा परिदृश्य के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है।
आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि CPI बास्केट में शामिल उन वस्तुओं का हिस्सा, जिनकी महंगाई दर 4 प्रतिशत से अधिक है, अगस्त में बढ़कर करीब 37 प्रतिशत हो गया। इससे यह संकेत मिलता है कि कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव अधिक वस्तुओं तक फैल रहा है। केंद्रीय बैंक ने इसी व्यापक दबाव को महंगाई के बदलते परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है।
संजय मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई और उसका आउटलुक पिछले वर्ष की तुलना में अब उतना अनुकूल नहीं है। अगले तीन तिमाहियों में औसत CPI मुद्रास्फीति करीब 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि कोर मुद्रास्फीति लगभग 4.4 प्रतिशत रह सकती है। इस आकलन के बीच मौद्रिक नीति को लेकर भी बदलाव किया गया है।
आरबीआई ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। गवर्नर के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में नीतिगत ब्याज दरों का पुनर्संतुलन आवश्यक हो गया था। महंगाई के बढ़ते दबाव, खाद्य और ऊर्जा कीमतों में तेजी तथा आपूर्ति संबंधी जोखिमों को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने मुद्रास्फीति अनुमान को 5.2 प्रतिशत पर रखा है।
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आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता
नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7.1 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं और महंगाई से जुड़े जोखिमों के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। केंद्रीय बैंक ने आर्थिक वृद्धि को लेकर भरोसा जताया है, लेकिन बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।आरबीआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। दूसरी तिमाही के लिए 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही के लिए 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही के लिए 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। आरबीआई के मुताबिक घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां आर्थिक वृद्धि को समर्थन दे रही हैं।
गवर्नर ने बताया कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां विस्तार की स्थिति में हैं। दूसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई वृद्धि क्षेत्र में बने रहे, हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में इनकी गति कुछ धीमी हुई है। केंद्रीय बैंक का आकलन है कि घरेलू मांग, निवेश, सेवाओं की मजबूती और विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार अर्थव्यवस्था को आगे भी सहारा दे सकते हैं।
महंगाई के मोर्चे पर आरबीआई ने खाद्य कीमतों में बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई है। गवर्नर के अनुसार खाद्य मुद्रास्फीति का दबाव अब व्यापक रूप ले रहा है और चीनी तथा प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अगस्त में खाद्य और ईंधन महंगाई दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें आधार प्रभाव की भी भूमिका रही। आरबीआई महंगाई की स्थिति पर नजर रखने के लिए महंगाई अपेक्षाओं, कंपनियों के मूल्य निर्धारण व्यवहार, कोर इन्फ्लेशन और अन्य आर्थिक संकेतकों का आकलन कर रहा है।
केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के साथ अन्य प्रमुख दरों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर को 5.25 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी दर तथा बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत किया गया है। वैश्विक स्तर पर भी महंगाई के दबाव बढ़ने की आशंका के बीच प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को सख्त किए जाने का उल्लेख किया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम भी वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम माने जा रहे हैं।
व्यापार के मोर्चे पर भारत का व्यापार घाटा जुलाई और अगस्त में बढ़कर 58.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 55.1 अरब डॉलर था। आरबीआई के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सामान और कच्चे तेल के आयात ने इसमें भूमिका निभाई। वैश्विक व्यापार वृद्धि में नरमी, ऊंची ऊर्जा कीमतें और व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितताएं चालू खाते के घाटे के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।
वहीं वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 13.8 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 9.6 अरब डॉलर से अधिक है। महंगाई के निकट भविष्य के परिदृश्य को लेकर आरबीआई ने दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को आपूर्ति पक्ष के दबाव के प्रमुख कारणों में शामिल किया है। पूरे वित्त वर्ष में सीपीआई महंगाई 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत, तीसरी में 6 प्रतिशत और चौथी में 5.7 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।
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RBI ने अचानक बढ़ाया रेपो रेट, महंगे हो सकते हैं होम लोन और EMI, महंगाई के बीच क्यों लिया गया बड़ा फैसला
नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का ऐलान किया। इसके साथ नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गई है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि की है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई के दबाव को बढ़ा रही है।यह फैसला आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक के बाद लिया गया। केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति के दूसरे हिस्सों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी यानी एसडीएफ दर को बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी यानी एमएसएफ दर और बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत पर समायोजित किया गया है।
रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेना महंगा हो जाता है। इसका असर आगे चलकर ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज पर पड़ सकता है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में वृद्धि होने पर नई और मौजूदा ईएमआई महंगी होने की संभावना रहती है।
आरबीआई ने रेपो रेट बढ़ाने के पीछे वैश्विक अनिश्चितताओं और बढ़ते महंगाई दबाव को प्रमुख वजहों में रखा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि दुनिया में मुद्रास्फीति के दोबारा तेज होने की आशंका बनी हुई है। इसी वजह से कई प्रमुख केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों को और सख्त करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भी केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से परिवहन और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है, जिसका असर घरेलू और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है।
देश में महंगाई के ताजा आंकड़े भी दबाव की ओर संकेत कर रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई आधारित महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई थी, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी ने कीमतों को लेकर आरबीआई की चिंताओं को बढ़ाया है। इसके अलावा अल नीनो प्रभाव और कम वर्षा के कारण रबी फसल के उत्पादन पर जोखिम भी बना हुआ है।
रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के बीच पहले से चर्चा थी। एसबीआई रिसर्च ने बढ़ते महंगाई दबाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, बदलती तरलता स्थिति और जोखिमों के दोबारा आकलन को देखते हुए समय रहते कदम उठाने की जरूरत बताई थी।
आरबीआई के इस फैसले का सीधा असर बैंकिंग व्यवस्था और कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। ब्याज दरों में बदलाव का असर किस तरह और कितनी तेजी से ग्राहकों तक पहुंचेगा, यह बैंकों के कर्ज और जमा दरों में किए जाने वाले अगले बदलावों पर निर्भर करेगा। फिलहाल केंद्रीय बैंक का फैसला महंगाई और वैश्विक जोखिमों के बीच मौद्रिक नीति को संतुलित रखने की दिशा में उठाया गया कदम है।
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वैश्विक तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच RBI MPC का फैसला आज, रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना
नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति बुधवार को अपनी द्विमासिक समीक्षा बैठक के फैसलों की घोषणा करेगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति ऐसे समय में अपना निर्णय सुनाने जा रही है, जब देश और दुनिया में महंगाई तथा ऊर्जा कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं। इस बैठक पर निवेशकों, उद्योग जगत, कर्ज लेने वालों और वित्तीय बाजारों की नजर बनी हुई है। समिति के सामने महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।एमपीसी की बैठक बढ़ती खुदरा महंगाई, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव की पृष्ठभूमि में हो रही है। इन परिस्थितियों का असर वित्तीय बाजारों और नीति निर्माताओं की चिंताओं पर भी पड़ा है। आरबीआई ने पिछली समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था। हालांकि, इस बार कई अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ ब्याज दर में बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं। ऐसा होने पर फरवरी 2023 के बाद यह पहली दर बढ़ोतरी हो सकती है।
बैंक ऑफ अमेरिका का अनुमान है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार करने के बजाय अक्टूबर की बैठक में ही रेपो रेट में 25 आधार अंक यानी 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है। उसके मुताबिक, करीब दो वर्षों की मौद्रिक सहजता के बाद केंद्रीय बैंक अब नीतिगत समर्थन को धीरे-धीरे वापस लेने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। वहीं, एसबीआई रिसर्च ने भी 25 आधार अंकों की दर वृद्धि की संभावना को मजबूत बताया है। इसके पीछे बढ़ता मुद्रास्फीति दबाव, कमजोर होती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, बदलती तरलता स्थिति और वैश्विक जोखिमों का दोबारा आकलन प्रमुख कारण बताए गए हैं।
एसबीआई रिसर्च के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में बाद में कार्रवाई करने के बजाय पहले से कदम उठाना अधिक विवेकपूर्ण हो सकता है। महंगाई के आंकड़े भी आरबीआई के सामने चुनौती बढ़ा रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इसके अलावा मजबूत अल नीनो प्रभाव और अक्टूबर में सामान्य से कम बारिश की आशंका से रबी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ने की चिंता है। इससे आने वाले समय में खाद्य महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती बॉन्ड यील्ड और ऊंची ऊर्जा कीमतें भी ब्याज दरों को लंबे समय तक मौजूदा स्तर पर बनाए रखने की चुनौती बढ़ा रही हैं। ऐसे में आरबीआई के फैसले में महंगाई के साथ आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय परिस्थितियों को भी महत्व मिलने की उम्मीद है। बाजार की नजर सिर्फ रेपो रेट पर नहीं, बल्कि महंगाई अनुमान, आर्थिक वृद्धि के आकलन और भविष्य की मौद्रिक नीति के रुख पर भी रहेगी। एमपीसी के ये संकेत आने वाले महीनों में बाजार और ब्याज दरों की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।