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  • MP के बालाघाट में 100 गांवों के विकास का अभियान शुरू, सड़क, पानी, शिक्षा और रोजगार पर रहेगा खास जोर..

    MP के बालाघाट में 100 गांवों के विकास का अभियान शुरू, सड़क, पानी, शिक्षा और रोजगार पर रहेगा खास जोर..

    मध्य प्रदेश: के बालाघाट जिले में लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहे 100 गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया है। राज्य सरकार की इस पहल के तहत गांवों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति का आकलन किया जा रहा है। प्रशासन का उद्देश्य ग्रामीणों की जरूरतों को समझकर ऐसे विकास कार्यों की योजना बनाना है, जिनसे स्थानीय लोगों को बेहतर सुविधाएं और रोजगार के अवसर मिल सकें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर शुरू किए गए इस अभियान में विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन अधिकारियों को अपने निर्धारित गांवों का दौरा कर ग्रामीणों से सीधे बातचीत करने, समस्याओं की जानकारी जुटाने और उपलब्ध सुविधाओं की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं। यह पूरी प्रक्रिया 14 दिनों के भीतर पूरी की जानी है। इसके बाद गांवों की जरूरतों के अनुसार विकास कार्यों के प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे।

    अभियान के लिए बालाघाट जिले के 100 गांवों को चार क्लस्टर में विभाजित किया गया है। इनमें बैहर, बिरसा, लांजी और किरनापुर विकासखंड के गांव शामिल हैं। अलग-अलग विभागों की टीमें अपने निर्धारित क्षेत्रों में पहुंचकर स्थानीय परिस्थितियों और विकास की संभावनाओं का आकलन कर रही हैं। ग्रामीणों से मिली जानकारी के आधार पर यह तय करने की कोशिश की जा रही है कि किन सुविधाओं की सबसे अधिक जरूरत है और किन कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    26 अक्टूबर को अधिकारियों की टीमों ने विभिन्न गांवों का दौरा कर लोगों से चर्चा की। लांजी क्षेत्र में कट्टीपार, सतोना, बरगुड़ और देवरबेली गांवों में ग्रामीणों की समस्याओं और आवश्यकताओं की जानकारी ली गई। बैहर क्षेत्र की टीम दड़ेकसा, बिलालकसा, सोनगुड्डा, लूद, हिर्री, भर्री, सोनपुरी और बिठरी सहित कई गांवों में पहुंची। वहीं, किरनापुर क्षेत्र के सीतापार और बोरवन गांवों में भी स्थानीय लोगों से बातचीत कर विकास की जरूरतों का पता लगाया गया।

    28 अक्टूबर को कलेक्टर आदित्य सिंह ने लांजी विकासखंड की देवरबेली ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले बरगुड़-सतोना, केराडीह, सायर और संदूका गांवों का भ्रमण किया। जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी और अन्य विभागों की टीमों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचकर ग्रामीणों से संवाद किया। इसके अतिरिक्त जनजातीय कार्य, पशु चिकित्सा, मत्स्यपालन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने भी अपने क्षेत्रों में सुविधाओं की स्थिति की जानकारी जुटाई।

    अभियान में सड़क, पुल-पुलिया, पेयजल, सिंचाई और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही सरकारी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों, छात्रावासों और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता का भी आकलन किया जा रहा है। जहां सुविधाओं की कमी सामने आएगी, वहां जरूरत के अनुसार विकास कार्यों के प्रस्ताव तैयार किए जाएंगे। पात्र ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

    ग्रामीणों की आजीविका मजबूत करना भी इस पहल का अहम हिस्सा है। इसके लिए कृषि, उद्यानिकी, डेयरी, पशुपालन और मत्स्यपालन जैसी गतिविधियों में रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। प्रशासन स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे अवसरों की पहचान करना चाहता है, जिनसे ग्रामीण अपने क्षेत्र में ही आर्थिक गतिविधियों से जुड़ सकें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इससे पहले बालाघाट जिले के 100 पिछड़े गांवों में विकास कार्यों के लिए लगभग 225 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। अब जारी सर्वेक्षण और ग्रामीणों से प्राप्त सुझावों के आधार पर योजनाओं की प्राथमिकताएं तय की जाएंगी। अधिकारियों को 14 दिनों के भीतर भ्रमण और रिपोर्ट तैयार करने का काम पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। इस अभियान का लक्ष्य गांवों में जरूरी सुविधाओं का विस्तार करना और स्थानीय लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आजीविका के बेहतर अवसर विकसित करना है।

  • भारत की अर्थव्यवस्था अगले दशक में दोगुनी होकर 8 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकती है, सुधारों और निवेश से बढ़ेगी विकास क्षमता

    भारत की अर्थव्यवस्था अगले दशक में दोगुनी होकर 8 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकती है, सुधारों और निवेश से बढ़ेगी विकास क्षमता

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था अगले एक दशक में दोगुनी होकर 8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में किए गए संरचनात्मक सुधारों, बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश और अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण ने विकास की क्षमता को मजबूत किया है। इन बदलावों से वैश्विक निवेशकों के लिए भारत में बड़े अवसर पैदा हो रहे हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत पहले ही 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का आंकड़ा पार कर चुका है। मौजूदा आर्थिक गति को देखते हुए देश अगले 10 वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था का आकार एक बार फिर दोगुना करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। रिपोर्ट में लंबे समय तक लागू किए गए आर्थिक सुधारों के प्रभाव को भारत की विकास क्षमता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां लगातार लागू किए गए संरचनात्मक सुधारों का असर व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है। वर्ष 2014 के बाद कई प्रमुख आर्थिक सुधार लागू किए गए, जिनमें वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता यानी आईबीसी, श्रम बाजार का औपचारिककरण, डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास में बड़े निवेश शामिल हैं। इन सुधारों ने अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता को बढ़ाने में भूमिका निभाई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इन बदलावों के आधार पर भारत लगभग 11 प्रतिशत नॉमिनल जीडीपी वृद्धि के मार्ग पर बना रह सकता है। साथ ही, पहले से लागू किए गए कई सुधारों का पूरा लाभ अभी अर्थव्यवस्था को मिलना बाकी है। इस वजह से भारत की आर्थिक विकास की संभावनाओं को अंतिम चरण में नहीं माना गया है और आने वाले समय में भी उल्लेखनीय अवसर बने रहने की बात कही गई है।

    औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार को भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बताया गया है। इसके अनुसार, औपचारिक अर्थव्यवस्था के बढ़ने से भारतीय कारोबारों और नकदी प्रवाह से जुड़े जोखिम प्रीमियम में कमी आई है। इससे लंबी अवधि के निवेश और आर्थिक विकास के लिए अधिक अनुकूल माहौल तैयार हुआ है। बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश को भी विकास क्षमता मजबूत करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया गया है।

    प्रौद्योगिकी क्षेत्र को लेकर रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को भारतीय आईटी सेवा उद्योग के लिए संभावित अवसर के रूप में देखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, एआई भारतीय आईटी कंपनियों के लिए केवल चुनौती नहीं है, बल्कि वे अपनी सेवाओं में इसका अधिक इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे कंपनियों की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।

    रिपोर्ट में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी जीसीसी को भी भारत की आर्थिक वृद्धि के नए इंजन के रूप में उभरता क्षेत्र बताया गया है। पारंपरिक आईटी सेवाओं के साथ जीसीसी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपने वैश्विक संचालन केंद्र स्थापित कर रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सेवा क्षेत्र पहले से भारत की रियल जीडीपी वृद्धि में आधे से अधिक योगदान दे रहा है और आने वाले वर्षों में इसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है।

  • चंद्रशेखरन बोले- भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, विकसित भारत 2047 के लिए बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी में निवेश जरूरी

    चंद्रशेखरन बोले- भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, विकसित भारत 2047 के लिए बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी में निवेश जरूरी

    नई दिल्ली ।टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने सोमवार को कहा कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चित माहौल के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत और स्थिर बनी हुई है। उन्होंने इसके पीछे मजबूत घरेलू मांग, सेवा निर्यात और अनुकूल नीतिगत माहौल को प्रमुख कारण बताया। चंद्रशेखरन ने कहा कि भारत ने हाल के वर्षों में लगातार उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है और मजबूत विकास के रास्ते पर बना हुआ है।

    इंडियन फाउंडेशन फॉर क्वालिटी मैनेजमेंट सिम्पोजियम 2026 में बोलते हुए चंद्रशेखरन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन को अच्छा बताया। उन्होंने कहा कि कई आर्थिक संकेतक देश की स्थिर और मजबूत स्थिति की ओर इशारा करते हैं। उनके अनुसार, ऑटोमोबाइल बिक्री, क्रेडिट ग्रोथ, बिजली और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में बनी मजबूत मांग अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है।

    चंद्रशेखरन ने चालू खाते की स्थिति को भी सकारात्मक आर्थिक संकेतकों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि चालू खाता घाटा लगातार जीडीपी के एक प्रतिशत से नीचे बना हुआ है। इसके अलावा सेवा निर्यात जीडीपी के करीब 11 प्रतिशत के बराबर है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की बेहतर स्थिति भी देश के आर्थिक परिदृश्य को समर्थन देने वाले महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत के विकसित भारत 2047 के विजन को हासिल करने के लिए समावेशी और टिकाऊ विकास पर ध्यान देना होगा। इसके लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, मजबूत संस्थानों और बौद्धिक संपदा का समर्थन जरूरी होगा। चंद्रशेखरन ने लंबे समय तक आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए ऊर्जा सुरक्षा, उन्नत और सटीक विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार तथा मानव पूंजी में निवेश को महत्वपूर्ण बताया।

    चंद्रशेखरन ने भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बदलाव की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने गुणवत्ता, नवाचार, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता पर अधिक ध्यान देने की बात कही। उनके अनुसार, भारत जर्मनी जैसे देशों से सीख सकता है, जहां इंजीनियरिंग, मानकों और सटीकता के साथ मजबूत आपूर्तिकर्ता तथा छोटे एवं मध्यम उद्यमों के इकोसिस्टम ने प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत में भी इसी तरह के बदलाव की जरूरत है।

    उन्होंने भारत की व्यापक विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं में टिकाऊ विनिर्माण को शामिल करने की आवश्यकता भी बताई। चंद्रशेखरन के मुताबिक, ऐसा बदलाव केवल बड़ी कंपनियों के स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मध्यम स्तर के कारोबारी इकोसिस्टम में भी मजबूत नेतृत्व विकसित करने में मदद करनी चाहिए। इससे ऐसे विशेषज्ञ तैयार करने में भी सहायता मिलेगी, जो वैश्विक विनिर्माण मानकों और प्रथाओं में योगदान देने में सक्षम हों। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास और विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ा।

  • वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की विकास क्षमता पर जताया भरोसा, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और बाजार संभावनाएं निवेशकों को कर रहीं आकर्षित

    वैश्विक विशेषज्ञों ने भारत की विकास क्षमता पर जताया भरोसा, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और बाजार संभावनाएं निवेशकों को कर रहीं आकर्षित


    नई दिल्ली ।
    कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में दुनियाभर से आए अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों के बीच मजबूत अर्थव्यवस्थाओं की जरूरत पर जोर दिया। सम्मेलन में भारत की विकास संभावनाओं, वैश्विक व्यापार व्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु जोखिम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने भारत की आर्थिक वृद्धि, बाजार क्षमता और निवेश की संभावनाओं को महत्वपूर्ण बताया।

    स्वीडिश अर्थशास्त्री एरिक बर्गलोफ ने कहा कि वह इस सम्मेलन से इसकी शुरुआत से जुड़े हुए हैं और समय के साथ इसकी गुणवत्ता तथा अंतरराष्ट्रीय भागीदारी में सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि इस बार पहले की तुलना में अधिक देशों और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया है। उनके अनुसार, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां काफी अनिश्चित हैं और ऐसे समय में ऊर्जा, व्यापार तथा आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े जोखिमों के बीच अर्थव्यवस्थाओं को अधिक लचीला बनाने पर चर्चा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत की विकास संभावनाएं मजबूत हैं और कोविड-19 के बाद देश ने प्रभावशाली आर्थिक गति हासिल की है।

    बर्गलोफ ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूत वृद्धि की क्षमता बनी हुई है। हालांकि, ईरान से जुड़े संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने आम लोगों और कारोबारों को राहत देने के प्रयास किए हैं, लेकिन इससे राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, वैश्विक संकटों के बीच विकास की गति बनाए रखना नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

    ब्राजील स्थित क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक जुलियानो असुन्साओ ने जलवायु परिवर्तन को दुनिया के सबसे बड़े साझा जोखिमों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं है और इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। उनके अनुसार, भारत और ब्राजील जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के साथ-साथ समाधान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। उन्होंने बताया कि ब्रिक्स जैसे मंचों के माध्यम से दोनों देशों के बीच संस्थागत संबंध हैं और भारतीय कंपनियों का ब्राजील में निवेश भी बढ़ रहा है। विकास, जलवायु, कृषि और सतत आर्थिक वृद्धि जैसी समान चुनौतियां दोनों देशों के सहयोग की संभावनाओं को मजबूत करती हैं।

    न्यूजीलैंड के अर्थशास्त्री प्रो. जॉन गिब्सन ने सम्मेलन को शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बताया। उन्होंने कहा कि यहां भारत के साथ एशिया-प्रशांत और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर चर्चा हो रही है। बढ़ती अनिश्चितता और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था पर दबाव के बीच उन्होंने मुक्त व्यापार समझौतों को स्थिरता देने वाला माध्यम बताया और भारत-न्यूजीलैंड के हालिया मुक्त व्यापार समझौते का उल्लेख किया।

    जापान के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोइकॉनॉमिक्स के निदेशक काजुतो सुजुकी ने कहा कि अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और जियोइकॉनॉमिक्स एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि चीन के साथ जटिल संबंधों के कारण जापानी उद्योग लंबे समय से भारत को महत्वपूर्ण बाजार मानते हैं। उनके अनुसार, बड़ी संख्या में जापानी कंपनियां भारत में निवेश के अवसर तलाश रही हैं और देश को दीर्घकालिक विकास तथा विनिर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं। भारत की बाजार क्षमता, जनसांख्यिकीय ताकत और आर्थिक विस्तार की संभावनाएं विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं।

  • गुजरात में 5-6 अक्टूबर को हाईवे विकास पर चिंतन शिविर, परियोजनाओं की चुनौतियों और समाधान पर होगा व्यापक मंथन

    गुजरात में 5-6 अक्टूबर को हाईवे विकास पर चिंतन शिविर, परियोजनाओं की चुनौतियों और समाधान पर होगा व्यापक मंथन

    नई दिल्ली । सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय देशभर में राजमार्ग अवसंरचना के विकास और परियोजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए गुजरात के नर्मदा जिले के एकता नगर में दो दिवसीय चिंतन शिविर आयोजित करेगा। यह कार्यक्रम 5 और 6 अक्टूबर को होगा। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न परियोजना क्रियान्वयन एजेंसियों के प्रतिनिधि और अन्य संबंधित हितधारक शामिल होंगे। कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी करेंगे। केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा और हर्ष मल्होत्रा भी इस अवसर पर मौजूद रहेंगे।

    मंत्रालय के अनुसार, चिंतन शिविर का प्रमुख उद्देश्य राजमार्ग परियोजनाओं के क्रियान्वयन में सामने आने वाली चुनौतियों की पहचान करना और उनके व्यावहारिक समाधान तलाशना है। इसके साथ विभिन्न पक्षों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर भी जोर दिया जाएगा। यह आयोजन केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को मजबूत करने तथा जमीनी स्तर पर सामने आए अनुभवों और बेहतर कार्यप्रणालियों को साझा करने का अवसर प्रदान करेगा। इसमें विभिन्न राज्यों के सड़क परिवहन और लोक निर्माण विभागों के मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, परियोजना क्रियान्वयन एजेंसियों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है।

    मंत्रालय के मुताबिक, कार्यक्रम में परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं की पहचान के साथ नए और दोहराए जा सकने वाले समाधानों पर विचार किया जाएगा। नीति और संस्थागत सुधारों से जुड़े विषयों पर भी चर्चा होगी। इसके अलावा हाईवे परियोजनाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और परिचालन दक्षता को बेहतर बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। मंत्रालय का मानना है कि अलग-अलग राज्यों और संबंधित एजेंसियों के अनुभवों को एक मंच पर लाने से सड़क अवसंरचना विकास से जुड़े मुद्दों पर साझा समझ विकसित करने में मदद मिलेगी और परियोजनाओं की गति बढ़ाई जा सकेगी।

    दो दिवसीय चिंतन शिविर में पांच प्रमुख विषयगत सत्र आयोजित किए जाएंगे। इनमें पीएम गतिशक्ति और एकीकृत अवसंरचना योजना, भूमि अधिग्रहण और भूमि राशि प्लेटफॉर्म, मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट और रेटिंग्स, हाईवे सुरक्षा तथा गुणवत्ता आश्वासन एवं परियोजना निगरानी शामिल हैं। पीएम गतिशक्ति से जुड़े सत्र में विभिन्न अवसंरचना क्षेत्रों के बीच बेहतर समन्वय और एकीकृत योजना निर्माण पर चर्चा होगी। भूमि अधिग्रहण से संबंधित सत्र में परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं और उन्हें दूर करने के संभावित उपायों पर विचार किया जाएगा।

    मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट और रेटिंग्स से जुड़े सत्र में अनुबंध संबंधी मुद्दों तथा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। हाईवे सुरक्षा के सत्र में सुरक्षित सड़क डिजाइन और सुरक्षा उपायों को परियोजना की योजना तथा निर्माण प्रक्रिया में अधिक प्रभावी ढंग से शामिल करने पर चर्चा होगी। वहीं गुणवत्ता आश्वासन एवं परियोजना निगरानी सत्र में निर्माण की गुणवत्ता सुधारने, परियोजनाओं की निगरानी मजबूत करने और बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने के उपायों पर विचार किया जाएगा। मंत्रालय के अनुसार, चिंतन शिविर से सड़क और राजमार्ग अवसंरचना विकास को अधिक प्रभावी, सुरक्षित और समयबद्ध बनाने के लिए केंद्र तथा राज्यों के बीच सहयोग को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत, वैश्विक अनिश्चितता के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती पर वित्त मंत्री सीतारमण का जोर

    भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत, वैश्विक अनिश्चितता के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती पर वित्त मंत्री सीतारमण का जोर

    नई दिल्ली: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि पश्चिम एशिया संकट से पैदा हुई वैश्विक अनिश्चितता का भारत ने सफलतापूर्वक सामना किया है और देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। राष्ट्रीय राजधानी में 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 के विशेष पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत इस दौर से उल्लेखनीय रूप से बेहतर स्थिति में निकला है और उसकी आर्थिक बुनियाद में और मजबूती आई है। उन्होंने वैश्विक सार्वजनिक ऋण का जिक्र करते हुए कहा कि 2025 में यह बढ़कर वैश्विक जीडीपी के करीब 94 प्रतिशत तक पहुंच गया और 2029 तक इसके 100 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।

    उन्होंने कहा कि ऐसे समय में आर्थिक झटके व्यापक आर्थिक प्रणालियों, वितरण तंत्र और राज्य की क्षमता की परीक्षा लेते हैं। वित्त मंत्री के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी, अगस्त 2026 में सीपीआई मुद्रास्फीति करीब 4.8 प्रतिशत रही और पहली तिमाही में चालू खाते का घाटा जीडीपी का 0.5 प्रतिशत रहा।

    सीतारमण ने कहा कि 2014 से सरकार ने सतत विकास के लिए जरूरी क्षमताओं को मजबूत करने पर काम किया है। इनमें राज्य की प्रतिक्रिया देने की क्षमता, अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता और नागरिकों तथा उद्यमों की विकास में भागीदारी शामिल है। उन्होंने पहली बुनियाद परिवारों के स्तर पर लचीलेपन को मजबूत करना बताया। उनके अनुसार सरकारी खर्च और योजनाओं को लोगों के जीवन में ठोस सुधार में बदलने, पारदर्शी तंत्र, निगरानी और योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन से परिवारों की असुरक्षा के अलग-अलग स्रोतों को कम करने में मदद मिली।

    जन धन-आधार-मोबाइल यानी जेएएम और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने लाभार्थियों तक सीधे सहायता पहुंचाने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत किया। पीएम आवास योजना, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत और पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत किए गए कार्यों का भी उन्होंने उल्लेख किया।

    वित्त मंत्री ने दूसरी बुनियाद को आर्थिक अवसरों को उत्पादक गतिविधियों में बदलने की क्षमता बताया। उन्होंने कहा कि वित्त तक पहुंच इसका महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पीएम मुद्रा योजना के तहत 52 करोड़ से अधिक बिना गारंटी वाले ऋण स्वीकृत किए गए हैं, जिससे स्वरोजगार और छोटे उद्यमों को समर्थन मिला। पीएम स्वनिधि योजना से रेहड़ी-पटरी वालों को सहायता मिलने का भी उन्होंने उल्लेख किया। सीतारमण के अनुसार, बैंकिंग क्षेत्र में पुनर्पूंजीकरण, संकट वाली परिसंपत्तियों के समाधान, बेहतर प्रशासन और जोखिम प्रबंधन ढांचे के जरिए वित्तीय प्रणाली को मजबूत किया गया है।

    अगस्त 2026 तक के एक वर्ष में गैर-खाद्य ऋण में 18.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उन्होंने कहा कि आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना ने कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने, परिचालन और रोजगार बनाए रखने तथा व्यवधान के समय नकदी की कमी से निपटने में मदद की।

    तीसरी बुनियाद के तौर पर सीतारमण ने उस बुनियादी ढांचे को बताया, जो लोगों, कारखानों और बाजारों को जोड़ता है। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में अकेले पूंजीगत व्यय के लिए 12.22 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। उनके अनुसार प्रभावी पूंजीगत व्यय 17.15 लाख करोड़ रुपये है, जो जीडीपी का 4.4 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि 2014 से लगातार किए गए निवेश के संचयी परिणाम दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार करीब 61 प्रतिशत हुआ है, परिचालन रेलवे मार्ग दोगुने से अधिक हो गए हैं और प्रमुख बंदरगाहों की माल ढुलाई क्षमता में करीब 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

    चौथी बुनियाद के रूप में उन्होंने मजबूत सुधारवादी सोच वाले नेतृत्व का उल्लेख किया। सीतारमण ने कहा कि सरकार ने जीएसटी, दिवाला और दिवालियापन संहिता, चार श्रम संहिताओं और जन विश्वास अधिनियमों के जरिए राष्ट्रीय स्तर के ढांचे को आगे बढ़ाया है। उन्होंने परिचालन हवाई अड्डों की संख्या दोगुने से अधिक होने और प्रमुख बंदरगाहों की माल ढुलाई क्षमता में करीब 60 प्रतिशत वृद्धि का भी उल्लेख किया।

  • 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य कैसे होगा हासिल, पीयूष गोयल ने बताया आर्थिक विकास का पूरा रोडमैप

    2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य कैसे होगा हासिल, पीयूष गोयल ने बताया आर्थिक विकास का पूरा रोडमैप

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता, इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और लक्षित समाज कल्याण योजनाओं के जरिए भारत 2047 तक विकसित देश बनने का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों को मजबूत आधार के रूप में विकसित करने पर सरकार का विशेष जोर है।

    गोयल ने एक आर्थिक सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में देश मजबूत आधार तैयार कर रहा है। उन्होंने इसके लिए आर्थिक स्थिरता, बुनियादी ढांचे के विस्तार और लक्षित समाज कल्याण योजनाओं को प्रमुख एजेंडा बताया।

    केंद्रीय मंत्री के अनुसार व्यापार, विनिर्माण और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के विस्तार से भारत वैश्विक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में भारत की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।

    गोयल ने वैश्विक स्तर पर साझेदारियों के महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य उन्हीं देशों और लोगों का है, जो साझेदारी बनाने की क्षमता रखते हैं। उनके मुताबिक भारत ने विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है और विकसित तथा विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं के साथ सहयोग बढ़ाया है।

    इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में निवेश को लेकर गोयल ने कहा कि केंद्र सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर हर साल करीब 12 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। इस निवेश में बंदरगाह, एक्सप्रेसवे, जलमार्ग और रेलवे जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं।

    उन्होंने कहा कि मजबूत बुनियादी ढांचा देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ कारोबार और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है।

    व्यापार समझौतों का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत ने पिछले वर्षों में कई देशों के साथ द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। इन समझौतों से भारतीय घरेलू उद्योग और कारोबारियों के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच के अवसर बढ़े हैं।

    गोयल के अनुसार 2014 से अब तक हुए व्यापार समझौतों के जरिए भारत को कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच मिली है। उन्होंने बताया कि पिछले चार वर्षों में हुए नौ मुक्त व्यापार समझौतों के परिणामस्वरूप भारतीय कारोबारियों को 38 देशों के बाजारों में तरजीही पहुंच मिली है।

    इन देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था का आकार करीब 60 ट्रिलियन डॉलर बताया गया है। इससे भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के लिए निर्यात तथा अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नए अवसर उपलब्ध होने की बात कही गई है।

    गोयल ने बताया कि सरकार फिलहाल आठ और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रही है। इन समझौतों के पूरा होने पर भारतीय कारोबारियों को लगभग 15 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त बाजारों में तरजीही पहुंच मिलने की संभावना है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आर्थिक स्थिरता, इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश, व्यापार विस्तार और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को साथ लेकर भारत 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

  • माइक्रोसॉफ्ट ने हैदराबाद में भारत का चौथा क्लाउड रीजन शुरू किया, एआई और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार को मिलेगा नया बल

    माइक्रोसॉफ्ट ने हैदराबाद में भारत का चौथा क्लाउड रीजन शुरू किया, एआई और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार को मिलेगा नया बल

    नई दिल्ली । माइक्रोसॉफ्ट ने हैदराबाद में अपना चौथा क्लाउड रीजन लॉन्च किया है। ‘इंडिया साउथ सेंट्रल’ नाम से शुरू किया गया यह क्लाउड रीजन भारत में कंपनी की क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अवसंरचना क्षमता के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही देश में माइक्रोसॉफ्ट की हाइपरस्केल क्लाउड मौजूदगी और मजबूत हुई है।

    हैदराबाद का नया क्लाउड रीजन माइक्रोसॉफ्ट के पुणे, चेन्नई और मुंबई स्थित मौजूदा क्लाउड रीजन से जुड़ गया है। कंपनी के अनुसार, भारत में डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने और एंटरप्राइज स्तर पर एआई के इस्तेमाल में तेजी आने की संभावनाओं के बीच यह विस्तार किया गया है।

    यह लॉन्च भारत में माइक्रोसॉफ्ट के पहले घोषित 20.5 अरब डॉलर के निवेश कार्यक्रम का हिस्सा है। इस कार्यक्रम के तहत देश में क्लाउड क्षमताओं, एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, कौशल विकास और परिचालन विस्तार को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।

    क्लाउड रीजन के लॉन्च के दौरान माइक्रोसॉफ्ट इंडिया एवं दक्षिण एशिया के अध्यक्ष पुनीत चंदोक ने भारत की डिजिटल परिवर्तन यात्रा को तेजी से आगे बढ़ने वाला चरण बताया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े डेटा उत्पादक देशों में तेजी से उभर रहा है और आने वाले समय में डिजिटल सेवाओं की जरूरत और बढ़ सकती है।

    चंदोक के अनुसार, भारत वर्तमान में दुनिया के कुल डेटा का लगभग 20 प्रतिशत उत्पन्न करता है, जबकि वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता में देश की हिस्सेदारी केवल करीब 3 प्रतिशत है। उनके मुताबिक, डेटा उत्पादन और डेटा सेंटर क्षमता के बीच का यह अंतर भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की बड़ी संभावना को दर्शाता है।

    उन्होंने बताया कि भारत में मौजूदा डेटा सेंटर क्षमता लगभग 2 गीगावाट है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक यह क्षमता बढ़कर 12 से 14 गीगावाट के बीच पहुंच सकती है। इस विस्तार के पीछे डिजिटल सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और एआई आधारित तकनीकों की बढ़ती जरूरत को प्रमुख कारण माना जा रहा है।

    एआई के क्षेत्र में बदलाव अब केवल प्रयोग या शुरुआती इस्तेमाल तक सीमित नहीं रह गया है। कंपनियां, सरकारी विभाग और विभिन्न संस्थान बड़े स्तर पर एआई आधारित अनुप्रयोगों को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके कारण कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा स्टोरेज और क्लाउड सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हो रही है।

    बढ़ती मांग के बीच पर्याप्त भौतिक और डिजिटल अवसंरचना तैयार करना बड़ी आवश्यकता बन गई है। एआई मॉडल और उनसे जुड़ी सेवाओं के संचालन के लिए बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग संसाधन और क्लाउड क्षमता की जरूरत होती है।

    माइक्रोसॉफ्ट का हैदराबाद क्लाउड रीजन ऐसे समय शुरू हुआ है जब भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा की मात्रा भी लगातार बढ़ रही है। नए क्लाउड रीजन से देश में स्थानीय स्तर पर क्लाउड सेवाओं की क्षमता बढ़ाने और एआई आधारित तकनीकों के लिए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    चंदोक ने कहा कि जिस डिजिटल पैमाने पर भारत आगे बढ़ रहा है, उसके अनुरूप भौतिक अवसंरचना का विस्तार भी जरूरी है। उनके अनुसार, डिजिटल विकास की गति को बनाए रखने के लिए डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण प्राथमिकता होगी।

  • गुजरात सरकार ने टेंडर वैलिडेशन अवधि 120 से घटाकर 90 दिन की, मंजूरी प्रक्रिया के लिए 51 और 66 दिन की समय-सीमा तय

    गुजरात सरकार ने टेंडर वैलिडेशन अवधि 120 से घटाकर 90 दिन की, मंजूरी प्रक्रिया के लिए 51 और 66 दिन की समय-सीमा तय

    नई दिल्ली । गुजरात सरकार ने विकास और निर्माण कार्यों से जुड़े टेंडर की मंजूरी प्रक्रिया में बदलाव करते हुए वैलिडेशन की अवधि 120 दिन से घटाकर 90 दिन कर दी है। नई व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक स्तर पर होने वाली देरी को कम करना और सड़क, पुल तथा सरकारी भवनों जैसी विकास परियोजनाओं को निर्धारित समय के भीतर शुरू करना है।

    नई व्यवस्था के तहत केवल फाइनेंशियल बिड वाले टेंडर की पूरी मंजूरी प्रक्रिया अधिकतम 51 दिनों में पूरी करनी होगी। वहीं जिन टेंडर में तकनीकी और वित्तीय दोनों स्तरों पर जांच की जरूरत होगी, उनके लिए अधिकतम 66 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है।

    जिन मामलों में ठेकेदारों की प्री-क्वालिफिकेशन की आवश्यकता नहीं है और केवल फाइनेंशियल बिड शामिल है, उनमें फील्ड या क्षेत्रीय कार्यालय से लेकर सचिवालय और वित्त विभाग तक की पूरी प्रक्रिया 51 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी। इसका उद्देश्य अलग-अलग प्रशासनिक स्तरों पर फाइलों के लंबित रहने की स्थिति को कम करना है।

    प्री-क्वालिफिकेशन वाले टेंडर में प्रक्रिया अपेक्षाकृत विस्तृत होगी। ऐसे मामलों में तकनीकी और वित्तीय दोनों बिड की जांच की जाती है। इसके लिए संबंधित कार्यालयों और प्रशासनिक स्तरों पर होने वाली पूरी प्रक्रिया को अधिकतम 66 दिनों में पूरा करने की समय-सीमा तय की गई है।

    सरकार ने टेंडर प्रक्रिया के दौरान होने वाली बातचीत यानी नेगोशिएशन को भी सीमित करने का निर्णय लिया है। निर्धारित नियमों के अनुसार व्यापक प्रचार के बाद यदि एक से अधिक टेंडर प्राप्त होते हैं, तो सामान्य परिस्थितियों में बातचीत से बचा जाएगा। केवल आवश्यकता महसूस होने पर ही नेगोशिएशन किया जा सकेगा।

    यदि बातचीत आवश्यक होती है तो इसे केवल एक स्तर पर सक्षम अधिकारी के स्तर पर किए जाने की व्यवस्था होगी। कई प्रशासनिक स्तरों पर बातचीत की अनुमति नहीं होगी। इससे टेंडर प्रक्रिया में लगने वाले अतिरिक्त समय को कम करने का प्रयास किया गया है।

    नई व्यवस्था में तय समय-सीमा का पालन नहीं होने की स्थिति में जवाबदेही निर्धारित करने का भी प्रावधान किया गया है। यदि किसी प्रस्ताव पर निर्धारित अवधि के भीतर कार्रवाई नहीं होती है तो देरी के कारणों को संबंधित स्तर पर दर्ज करना होगा। साथ ही देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही भी तय की जाएगी।

    यदि किसी प्रस्ताव के अधूरे होने के कारण प्रक्रिया में देरी होती है तो इसकी जिम्मेदारी उस स्तर की होगी जहां से प्रस्ताव आगे भेजा गया था। इस प्रावधान का उद्देश्य टेंडर से जुड़ी फाइलों और प्रस्तावों को पूरा करके समय पर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है।

    ये बदलाव विभिन्न विकास और निर्माण कार्यों से जुड़े टेंडरों पर लागू होंगे। इनमें सड़क, पुल और सरकारी भवनों सहित अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शामिल हैं। सरकार के अनुसार निर्धारित समय-सीमा के कारण टेंडर मंजूरी की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ सकेगी।

    नई व्यवस्था के तहत टेंडर की वैलिडिटी अवधि घटाकर 90 दिन किए जाने के साथ मंजूरी के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की गई है। इससे परियोजनाओं की प्रशासनिक प्रक्रिया को लंबा खिंचने से रोकने और निर्माण कार्यों को तय कार्यक्रम के अनुसार शुरू करने पर जोर दिया गया है।

    सरकार का कहना है कि समयबद्ध टेंडर मंजूरी से प्रशासनिक देरी कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही सड़क, पुल और अन्य सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पूरा होने के बाद नागरिकों को संबंधित सुविधाओं और सेवाओं का लाभ जल्द उपलब्ध कराने में भी सहायता मिलेगी।

  • रांची में बनेंगे तीन नए फ्लाईओवर, 2,335 करोड़ रुपये होंगे खर्च, शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने की तैयारी तेज

    रांची में बनेंगे तीन नए फ्लाईओवर, 2,335 करोड़ रुपये होंगे खर्च, शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने की तैयारी तेज

    नई दिल्ली ।झारखंड की राजधानी रांची में यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने और शहर के सुनियोजित विकास के लिए तीन नए फ्लाईओवर बनाने की तैयारी की जा रही है। इन प्रस्तावित परियोजनाओं पर कुल 2,335.87 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। नगर विकास विभाग ने तीनों फ्लाईओवर से संबंधित प्रस्ताव तैयार कर लिया है।

    प्रस्ताव के अनुसार पहला फ्लाईओवर बिरसा चौक से तुपुदाना चौक तक बनाया जाना है। इसका प्रस्तावित मार्ग टेंडर हार्ट स्कूल के आसपास से होकर जाएगा। दूसरा फ्लाईओवर कटहल मोड़ से दलादिली चौक के बीच प्रस्तावित है। तीसरी परियोजना लालपुर, फिरायालाल और डंगराटोली क्षेत्र को जोड़ने वाले इंटीग्रेटेड फ्लाईओवर की है।

    इन तीनों परियोजनाओं का उद्देश्य रांची के ऐसे इलाकों में यातायात का दबाव कम करना है, जहां बड़ी संख्या में वाहनों की आवाजाही होती है। प्रस्तावित फ्लाईओवर बनने के बाद प्रमुख मार्गों पर वाहनों के आवागमन को अलग स्तर पर ले जाने में मदद मिल सकती है, जिससे सड़क पर जाम की समस्या कम करने की योजना है।

    फिलहाल तीनों फ्लाईओवर की परियोजनाएं प्रस्ताव के शुरुआती चरण में हैं। इनके अंतिम अनुमोदन, बजट आवंटन और निर्माण कार्य शुरू करने की समयसीमा को लेकर औपचारिक प्रक्रिया पूरी होना बाकी है। इसलिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि तीनों परियोजनाओं का निर्माण किस तारीख से शुरू होगा।

    राज्य में शहरी विकास और राजधानी के भविष्य के विस्तार को लेकर हाल में अधिकारियों के साथ चर्चा की गई थी। इस दौरान रांची के सुनियोजित विकास और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप शहर में अधोसंरचना तैयार करने से जुड़े प्रस्तावों पर विचार किया गया। इसी क्रम में राजधानी के सौंदर्यीकरण और विकास से संबंधित रिपोर्ट तथा डिजाइन भी प्रस्तुत किया गया।

    रांची में कुछ अन्य फ्लाईओवर और कॉरिडोर की प्रक्रिया इससे पहले आगे बढ़ चुकी है। करमटोली-चिरौंदी, अरगोड़ा-चापूटोली और हरमू रोड फ्लाईओवर के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी होने और निर्माण एजेंसियों के चयन की जानकारी दी गई है। इन परियोजनाओं का निर्माण जल्द शुरू होने की संभावना है।

    करमटोली-चिरौंदी कॉरिडोर की लंबाई करीब तीन किलोमीटर प्रस्तावित है। यह करमटोली चौक से साइंस सिटी होते हुए चिरौंदी तक जाने वाला मार्ग होगा। वहीं अरगोड़ा-चापूटोली कॉरिडोर करीब चार किलोमीटर लंबा होगा और हरमू रोड से डिबडीह ब्रिज तक सीधी कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की योजना है।

    हरमू रोड फ्लाईओवर का निर्माण सहजानंद चौक के आसपास से जज कॉलोनी के नजदीक तक प्रस्तावित है। इन परियोजनाओं के जरिए राजधानी के अलग-अलग हिस्सों के बीच यातायात संपर्क बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है।

    प्रस्तावित फ्लाईओवर से घनी आबादी वाले क्षेत्रों में सड़क यातायात का दबाव कम करने पर भी जोर है। इन इलाकों में वाहनों की अधिक आवाजाही के कारण अक्सर जाम की स्थिति बनती है। फ्लाईओवर बनने से मुख्य मार्ग पर वाहनों की आवाजाही को अधिक व्यवस्थित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    रिंग रोड से कनेक्टिविटी भी इन परियोजनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुछ प्रस्तावित मार्गों के अंतिम छोर रिंग रोड के नजदीक तक पहुंचने की योजना है। इससे शहर के अंदरूनी हिस्सों से बाहर जाने वाले वाहनों को वैकल्पिक और अपेक्षाकृत सुगम मार्ग मिल सकता है।

    रांची में बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या को देखते हुए सड़क अधोसंरचना के विस्तार की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। तीन नए फ्लाईओवर का प्रस्ताव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना है। हालांकि इनके निर्माण से पहले प्रशासनिक मंजूरी, वित्तीय स्वीकृति और अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करना होगा।