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  • सेमिकॉन 2.0 से लेकर वाराणसी एलिवेटेड कॉरिडोर तक, केंद्रीय कैबिनेट ने विकास की रफ्तार बढ़ाने वाले छह बड़े फैसलों को दी मंजूरी

    सेमिकॉन 2.0 से लेकर वाराणसी एलिवेटेड कॉरिडोर तक, केंद्रीय कैबिनेट ने विकास की रफ्तार बढ़ाने वाले छह बड़े फैसलों को दी मंजूरी

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में देश के औद्योगिक विकास, बुनियादी ढांचे, रेल नेटवर्क, उर्वरक उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को नई दिशा देने वाले कई महत्वपूर्ण फैसलों को मंजूरी दी गई। इन निर्णयों का उद्देश्य घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना, बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करना, रोजगार के नए अवसर सृजित करना और भारत को रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में तेजी लाना है। कैबिनेट के फैसलों में वाराणसी के लिए नई आधारभूत परियोजनाएं, सेमीकंडक्टर मिशन का दूसरा चरण, मोबाइल निर्माण प्रोत्साहन योजना, रेलवे विस्तार और यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाने जैसी प्रमुख घोषणाएं शामिल हैं।

    मंत्रिमंडल ने भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत बनाने के लिए ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ को 1.27 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी है। इस योजना के तहत चिप डिजाइन, विनिर्माण, कच्चे माल की आपूर्ति और संपूर्ण वैल्यू चेन को विकसित करने पर जोर दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य घरेलू स्तर पर सेमीकंडक्टर उत्पादन को बढ़ावा देना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और आने वाले वर्षों में देश को चिप निर्माण के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाना है। योजना के माध्यम से बड़े निवेश और उच्च तकनीक आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई गई है।

    मोबाइल विनिर्माण को गति देने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के दूसरे चरण को भी मंजूरी दी गई है। इस योजना पर 62,500 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे और इसे अगले पांच वर्षों तक लागू किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य भारत में मोबाइल निर्माण क्षमता का विस्तार करना, निर्यात बढ़ाना, घरेलू ब्रांडों को प्रोत्साहित करना और बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराना है। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप विकसित करने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    वाराणसी में बढ़ती आबादी और पर्यटन गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए दो बड़े एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजनाओं को भी स्वीकृति मिली है। राष्ट्रीय राजमार्गों और रिंग रोड को जोड़ने वाली इन परियोजनाओं का उद्देश्य शहर में यातायात दबाव कम करना, आवागमन को तेज बनाना और धार्मिक पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढांचे को आधुनिक स्वरूप देना है। सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद शहर में ट्रैफिक प्रबंधन अधिक प्रभावी होगा और यात्रियों को बेहतर सुविधा मिलेगी।

    उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय निवेश नीति-2026 को भी मंजूरी दी गई है। इसके तहत प्राकृतिक गैस आधारित आठ से नौ नए यूरिया संयंत्र स्थापित किए जाएंगे, जिससे देश में अतिरिक्त यूरिया उत्पादन क्षमता विकसित होगी। सरकार का लक्ष्य आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना और कृषि क्षेत्र की आवश्यकताओं को घरेलू उत्पादन के माध्यम से पूरा करना है।

    रेलवे क्षेत्र में भी दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। इनमें पारादीप-हरिदासपुर रेलखंड का दोहरीकरण तथा राजखरसावां-डांगोआपोसी रेलखंड पर चौथी रेल लाइन का निर्माण शामिल है। इन परियोजनाओं से रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ेगी, माल और यात्री ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम होगी तथा भीड़भाड़ कम होने के साथ समयबद्ध संचालन को भी मजबूती मिलेगी। सरकार का मानना है कि इन सभी फैसलों से औद्योगिक विकास, निवेश, रोजगार, परिवहन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा तथा देश की आर्थिक प्रगति को नई गति प्राप्त होगी।

  • जनकल्याण और बुनियादी ढांचे पर सरकार का बड़ा निवेश, 8,445 करोड़ रुपये शहरी विकास के लिए स्वीकृत, मूंग उपार्जन और सिंचाई परियोजनाओं को भी मिली मंजूरी

    जनकल्याण और बुनियादी ढांचे पर सरकार का बड़ा निवेश, 8,445 करोड़ रुपये शहरी विकास के लिए स्वीकृत, मूंग उपार्जन और सिंचाई परियोजनाओं को भी मिली मंजूरी

    मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और जनकल्याण योजनाओं को गति देने के उद्देश्य से 10 हजार 800 करोड़ रुपये से अधिक के विभिन्न विकास प्रस्तावों को मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में शहरी अधोसंरचना, सिंचाई, कृषि, महिला एवं बाल विकास तथा प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। सरकार का मानना है कि इन फैसलों से प्रदेश के विकास कार्यों को नई दिशा मिलेगी और विभिन्न वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा।

    बैठक में सबसे बड़ी स्वीकृति नगरीय क्षेत्रों के अधोसंरचना विकास के लिए दी गई। राज्य सरकार ने आगामी पांच वर्षों के लिए 8 हजार 445 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है। यह धनराशि नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद क्षेत्रों में सड़क, जल निकासी, पेयजल, सार्वजनिक सुविधाओं और अन्य आधारभूत विकास परियोजनाओं पर खर्च की जाएगी। साथ ही स्थानीय निकायों द्वारा विकास कार्यों के लिए लिए गए ऋणों के पुनर्भुगतान में भी इसका उपयोग किया जाएगा, जिससे शहरी विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी।

    मंत्रिपरिषद ने किसानों के हित में भी महत्वपूर्ण निर्णय लिया। रबी वर्ष 2023-24 के दौरान लक्ष्य से अधिक खरीदी गई मूंग के भुगतान के लिए 1,587 करोड़ रुपये की निःशुल्क शासकीय प्रत्याभूति उपलब्ध कराने को मंजूरी दी गई। इस निर्णय के तहत विभिन्न बैंकों से ली गई साख सीमा के शेष दायित्वों के लिए सरकारी गारंटी प्रदान की जाएगी। सरकार का उद्देश्य किसानों के हितों की रक्षा करना और उपार्जन प्रक्रिया को वित्तीय रूप से सुचारु बनाए रखना है।

    सिंचाई सुविधाओं के विस्तार को लेकर भी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राजगढ़ जिले की कुण्डलिया वृहद सिंचाई परियोजना के संचालन को वर्ष 2031 तक जारी रखने के लिए 245 करोड़ 45 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान की गई है। इस परियोजना के माध्यम से राजगढ़ और आगर-मालवा जिलों के लगभग 1 लाख 39 हजार 600 हेक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के जरिए सिंचाई क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। सरकार का मानना है कि इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होगी और किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी।

    बैठक में महिला एवं बाल विकास से जुड़ा भी अहम निर्णय लिया गया। टेक-होम राशन के उत्पादन और वितरण की व्यवस्था को राज्य आजीविका फोरम से वापस लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपने का निर्णय लिया गया है। अंतरिम व्यवस्था के तहत स्व-सहायता समूहों के माध्यम से पूरक पोषण आहार उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही भविष्य में केंद्र सरकार के नए दिशा-निर्देशों के अनुरूप स्थायी व्यवस्था विकसित की जाएगी, जिससे पोषण योजनाओं का संचालन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके।

    मंत्रिपरिषद ने वाणिज्यिक कर विभाग की स्थापना योजनाओं के संचालन के लिए भी 521 करोड़ 4 लाख रुपये की स्वीकृति दी है। यह राशि आगामी पांच वर्षों तक मुख्यालय, जिला और परिक्षेत्रीय कार्यालयों के संचालन, कर्मचारियों के वेतन-भत्तों, कार्यालय व्यय, व्यावसायिक सेवाओं तथा आवश्यक संसाधनों के रखरखाव पर खर्च की जाएगी। सरकार का मानना है कि इन निर्णयों से प्रशासनिक व्यवस्था और सेवा वितरण प्रणाली को मजबूती मिलेगी।

    राज्य सरकार का कहना है कि शहरी विकास, कृषि, सिंचाई, पोषण और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े इन फैसलों का उद्देश्य प्रदेश के समग्र विकास को नई गति देना है। विभिन्न विभागों को मिली वित्तीय स्वीकृतियों के माध्यम से विकास परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन, किसानों के हितों की सुरक्षा, शहरी सुविधाओं के विस्तार और जनकल्याण कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होने की उम्मीद है।

  • 2027 तक बदलेगी सतना रेलवे स्टेशन की तस्वीर, वर्ल्ड क्लास सुविधाओं के साथ तैयार होगा आधुनिक रेल हब; महीने के अंत में रेल मंत्री कर सकते हैं दौरा

    2027 तक बदलेगी सतना रेलवे स्टेशन की तस्वीर, वर्ल्ड क्लास सुविधाओं के साथ तैयार होगा आधुनिक रेल हब; महीने के अंत में रेल मंत्री कर सकते हैं दौरा

    मध्य प्रदेश: के सतना रेलवे स्टेशन को आधुनिक सुविधाओं से लैस वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन के रूप में विकसित करने की दिशा में काम तेज हो गया है। रेलवे प्रशासन ने वर्ष 2027 तक इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। स्टेशन के पुनर्विकास के साथ यात्री सुविधाओं में व्यापक सुधार, परिचालन क्षमता में वृद्धि और रेल नेटवर्क के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी क्रम में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के इसी महीने के अंत तक सतना दौरे पर आने की संभावना जताई जा रही है, जहां वे विभिन्न रेल परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा कर सकते हैं।

    मध्य प्रदेश के प्रमुख रेलवे जंक्शनों में शामिल सतना स्टेशन पर लगातार बढ़ती यात्री संख्या और ट्रेनों के दबाव को देखते हुए व्यापक पुनर्विकास योजना तैयार की गई है। हाल ही में पश्चिम मध्य रेलवे के महाप्रबंधक ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ स्टेशन का निरीक्षण किया और विकास कार्यों की समीक्षा की। निरीक्षण के दौरान स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ भी बैठक हुई, जिसमें परियोजना की समयबद्ध प्रगति सुनिश्चित करने और आवश्यक कार्यों में तेजी लाने पर चर्चा की गई।

    पुनर्विकास योजना के तहत स्टेशन पर दो नए प्लेटफॉर्म बनाए जाएंगे, जिससे ट्रेनों के संचालन में सुविधा होगी और यात्रियों को बेहतर सेवाएं मिल सकेंगी। इसके अलावा अतिरिक्त बर्थिंग लाइनें विकसित की जाएंगी ताकि अधिक ट्रेनों का संचालन बिना बाधा के किया जा सके। रेलवे स्टेशन पर अत्याधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम भी स्थापित किया जाएगा, जिससे ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुरक्षित, तेज और व्यवस्थित हो सकेगी। आधुनिक तकनीक के उपयोग से परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय सुधार आने की उम्मीद है।

    स्टेशन परिसर में लंबे समय से बनी जलभराव की समस्या को समाप्त करने के लिए ड्रेनेज व्यवस्था को पूरी तरह अपग्रेड किया जाएगा। निचले क्षेत्रों में भराव कार्य कराया जाएगा ताकि बारिश के मौसम में यात्रियों और रेलवे कर्मचारियों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। बेहतर जल निकासी व्यवस्था से स्टेशन परिसर अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बन सकेगा।

    रेलवे प्रशासन ने स्टेशन पर भीड़ कम करने और संचालन को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए मौजूदा गुड्स शेड को कैमा स्टेशन स्थानांतरित करने की योजना भी तैयार की है। कैमा स्टेशन पर नए प्लेटफॉर्म का निर्माण अंतिम चरण में पहुंच चुका है, जबकि सिग्नलिंग और केबलिंग से जुड़े कार्यों के लिए टेंडर प्रक्रिया भी अंतिम दौर में है। इन कार्यों के पूरा होने के बाद मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों के संचालन में संतुलन स्थापित करने में मदद मिलेगी।

    क्षेत्रीय रेल कनेक्टिविटी को मजबूत करने के उद्देश्य से सतना-नागौद रेल लाइन का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। वहीं देवेंद्रनगर तक रेल लाइन तैयार है और उसका विद्युतीकरण अंतिम चरण में पहुंच गया है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार अगले तीन से चार महीनों के भीतर इस लाइन को सतना रेलवे स्टेशन से जोड़ने की योजना है। इससे आसपास के क्षेत्रों के यात्रियों को बेहतर रेल सुविधा मिलेगी और स्थानीय व्यापार तथा आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की संभावना है।

    रेलवे प्रशासन का मानना है कि परियोजना पूरी होने के बाद सतना रेलवे स्टेशन आधुनिक यात्री सुविधाओं, उन्नत तकनीक, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत रेल नेटवर्क के साथ प्रदेश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों में अपनी अलग पहचान बनाएगा। यह पुनर्विकास न केवल यात्रियों के सफर को अधिक सुविधाजनक बनाएगा, बल्कि क्षेत्र के समग्र विकास और रेलवे संचालन की दक्षता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • झांसी की आबादी 125 साल में छह गुना बढ़ी, बुनियादी सुविधाओं पर बढ़ा दबाव, तैयार हो रहा नया मास्टर प्लान

    झांसी की आबादी 125 साल में छह गुना बढ़ी, बुनियादी सुविधाओं पर बढ़ा दबाव, तैयार हो रहा नया मास्टर प्लान

    झांसी। विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) के अवसर पर सामने आए आंकड़े बताते हैं कि पिछले 125 वर्षों में झांसी जिले की आबादी लगभग छह गुना बढ़ चुकी है। हालांकि जनसंख्या के अनुपात में शहर का बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो सका, जिससे पेयजल, सीवर, सड़क, बिजली, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। भविष्य की जरूरतों को देखते हुए झांसी विकास प्राधिकरण (जेडीए) ने मास्टर प्लान-2031 तैयार किया है, जिसके तहत करीब 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का नियोजित विकास किया जाएगा।

    अर्थ एवं संख्यायिकी विभाग के अनुसार वर्ष 1901 में झांसी जिले की आबादी 4.27 लाख थी, जबकि वर्ष 2026 तक इसके लगभग 25 लाख तक पहुंचने का अनुमान है। यानी 125 वर्षों में जिले की आबादी में 20.73 लाख लोगों की बढ़ोतरी हुई है। इस अवधि में जनसंख्या 485.65 प्रतिशत यानी करीब 5.86 गुना बढ़ी। औसतन हर वर्ष लगभग 16,585 लोग जिले की आबादी में जुड़े हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या वृद्धि का कारण केवल प्राकृतिक वृद्धि नहीं है, बल्कि बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहर की ओर लगातार बढ़ते पलायन ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है।

    वर्तमान अनुमान के मुताबिक जिले की 58.3 प्रतिशत आबादी, यानी करीब 14.58 लाख लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जबकि 41.7 प्रतिशत आबादी, यानी लगभग 10.42 लाख लोग शहरी क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं। शहरी आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन उसी अनुपात में सड़क, सीवर, पेयजल, सार्वजनिक परिवहन और आवास जैसी आधारभूत सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पाया है।

    सीवर नेटवर्क सबसे बड़ी चुनौती
    बढ़ती आबादी के बीच झांसी की सबसे बड़ी समस्या सीवर व्यवस्था को माना जा रहा है। शहर का बड़ा हिस्सा आज भी सीवर नेटवर्क से नहीं जुड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य की जरूरतों को देखते हुए समय पर निवेश नहीं किया गया, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

    जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी (डीएसटीओ) अर्चना सिंह के अनुसार, वर्ष 1901 की तुलना में जिले की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि वर्ष 2001 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में कमी दर्ज की गई, जिसका प्रमुख कारण परिवार नियोजन के प्रति बढ़ती जागरूकता है।

    500 वर्ग किलोमीटर में होगा नियोजित विस्तार
    तेजी से बढ़ती शहरी आबादी को ध्यान में रखते हुए झांसी विकास प्राधिकरण ने मास्टर प्लान-2031 तैयार किया है। जेडीए के टाउन प्लानर विजय कुमार सिंह के अनुसार यह योजना लगभग 13 लाख की प्रस्तावित शहरी आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इसके तहत शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को मिलाकर करीब 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का नियोजित विकास किया जाएगा। इनमें लगभग 19 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को शहरीकरण के लिए चिह्नित किया गया है।

    योजना के तहत निजी क्षेत्र में 250-250 एकड़ की दो टाउनशिप विकसित की जाएंगी, जबकि जेडीए स्वयं 1000 एकड़ में एक एकीकृत टाउनशिप विकसित करेगा। यह परियोजना ग्वालियर-कानपुर हाईवे और ग्वालियर रोड स्थित अंबावाय क्षेत्र में प्रस्तावित है।

    मास्टर प्लान के साथ जोनल प्लान भी तैयार किया जा रहा है। इसके माध्यम से नई कॉलोनियों और विकसित होने वाले क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, सीवर, बिजली, अस्पताल, स्कूल, पार्क तथा अन्य नागरिक सुविधाओं का योजनाबद्ध विकास सुनिश्चित किया जाएगा।

  • पहली बारिश में बह गई करोड़ों के पुल की सुरक्षा दीवार निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल ग्रामीणों ने मांगी तकनीकी जांच

    पहली बारिश में बह गई करोड़ों के पुल की सुरक्षा दीवार निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल ग्रामीणों ने मांगी तकनीकी जांच


    देवास । देवास जिले के होशियारी और मकोडिया गांवों को जोड़ने वाला करोड़ों रुपए की लागत से बना स्टॉप डैम कम पुल पहली ही बारिश के बाद सवालों के घेरे में आ गया है। मानसून की शुरुआती बारिश में ही पुल के दोनों ओर बनाई गई प्रोटेक्शन वॉल बह गई जबकि उसके पीछे भरी गई मिट्टी भी कई स्थानों से कट गई। इस घटना ने निर्माण गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल पुल पर आवागमन जारी है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यदि आगामी दिनों में तेज बारिश या बाढ़ का दबाव बढ़ा तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है।

    मौके पर निरीक्षण के दौरान पुल के दोनों सिरों पर सुरक्षा दीवार के कई हिस्से क्षतिग्रस्त मिले। जहां मजबूत प्रोटेक्शन वॉल बनाई गई थी वहां अब केवल कंक्रीट के अवशेष और बह चुकी मिट्टी दिखाई दे रही है। पुल के एप्रोच मार्ग के पास भराव मिट्टी के बह जाने से कई स्थानों पर गड्ढेनुमा स्थिति बन गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अभी तक नदी में बड़ा उफान भी नहीं आया है। केवल सामान्य बारिश और शिप्रा नदी में छोड़े गए पानी के बहाव से ही यह नुकसान हुआ है। ऐसे में यदि मानसून के अगले दौर में जलस्तर बढ़ा तो पुल की नींव तक खतरा पहुंच सकता है।

    ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इरफान पटेल धीरज बना गोलू वर्मा टेपू शेख रंजन सिंह चौहान लाखन सिंह राठौर नवाब शेख और शेर मोहम्मद पटेल सहित कई ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण में मानकों के अनुरूप सामग्री का उपयोग नहीं किया गया। उनका आरोप है कि सरियों और अन्य निर्माण सामग्री की गुणवत्ता कमजोर रही जिसके कारण पहली ही बारिश में सुरक्षा दीवार टिक नहीं सकी। ग्रामीणों के अनुसार मार्च में भूमिपूजन के बाद जल्दबाजी में करीब 28 दिनों के भीतर निर्माण कार्य पूरा कर दिया गया था। उनका कहना है कि करोड़ों रुपए की इस परियोजना की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए और यदि किसी प्रकार की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार एजेंसी और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

    मामला सामने आने के बाद हाटपीपल्या विधायक मनोज चौधरी ने पुल का निरीक्षण किया और सिंचाई विभाग के अधिकारियों को मौके पर बुलाकर निर्माण गुणवत्ता की जांच के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है और यदि जांच में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। साथ ही जहां कमी पाई गई है उसे तत्काल दूर कराया जाएगा ताकि भविष्य में किसी तरह की दुर्घटना की आशंका न रहे।

    सिंचाई विभाग की एसडीओ नेहा दुबे ने बताया कि पुल की मुख्य संरचना पूरी तरह सुरक्षित है और नुकसान केवल प्रोटेक्शन वॉल तथा उसके पीछे की भराव मिट्टी तक सीमित है। उन्होंने कहा कि निर्माण कार्य अभी जारी है और ग्वालियर की कटारे कंस्ट्रक्शन कंपनी इस परियोजना का निर्माण कर रही है। एजेंसी का अंतिम भुगतान भी अभी नहीं किया गया है। विभाग के अनुसार क्षतिग्रस्त हिस्से की दोबारा मरम्मत कराई जाएगी तथा पूरी प्रोटेक्शन वॉल नए सिरे से बनाई जाएगी। बारिश का दौर थमने के बाद शेष निर्माण कार्य भी पूरा कराया जाएगा।

    फिलहाल इस पूरे मामले में ग्रामीणों और विभाग के दावों के बीच अंतर दिखाई दे रहा है। एक ओर ग्रामीण निर्माण में लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं तो दूसरी ओर विभाग मुख्य पुल को सुरक्षित बताते हुए केवल सुरक्षा दीवार की मरम्मत की बात कह रहा है। अब सभी की नजर प्रस्तावित तकनीकी जांच और मानसून के अगले दौर पर टिकी है क्योंकि तेज बारिश ही यह तय करेगी कि पुल का निर्माण वास्तव में कितना मजबूत और सुरक्षित है।

  • भारतीय रेलवे मजबूत करेगा इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव नेटवर्क, रायपुर में आधुनिक होमिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर 175 करोड़ रुपये होंगे खर्च

    भारतीय रेलवे मजबूत करेगा इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव नेटवर्क, रायपुर में आधुनिक होमिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर 175 करोड़ रुपये होंगे खर्च


    नई दिल्ली ।
    भारतीय रेलवे ने अपने तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव बेड़े के रखरखाव ढांचे को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। रेलवे ने रायपुर में 250 थ्री-फेज इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के लिए अतिरिक्त होमिंग सुविधाएं विकसित करने हेतु 175 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी है। इस परियोजना का उद्देश्य बढ़ती परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप आधुनिक रखरखाव अवसंरचना तैयार करना और रेल सेवाओं की दक्षता को और बेहतर बनाना है।

    रेल मंत्रालय के अनुसार यह परियोजना दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (एसईसीआर) के रायपुर स्थित हाई हॉर्स पावर डीजल शेड में विकसित की जाएगी। वर्तमान में रेलवे के इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव बेड़े का लगातार विस्तार हो रहा है, जिसके चलते रखरखाव सुविधाओं की क्षमता बढ़ाना आवश्यक हो गया है। नई होमिंग सुविधा इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए स्वीकृत की गई है।

    रेलवे की तकनीकी व्यवस्था में होमिंग सुविधा का विशेष महत्व होता है। किसी भी लोकोमोटिव को जिस शेड में नियमित रूप से रखा जाता है और जहां उसकी निर्धारित जांच, मरम्मत, सुरक्षा निरीक्षण तथा तकनीकी रखरखाव किया जाता है, उसे उसका होमिंग शेड कहा जाता है। यह व्यवस्था लोकोमोटिव के सुरक्षित, विश्वसनीय और निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    नई परियोजना के पूरा होने के बाद रायपुर डिपो की रखरखाव क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इससे न केवल मौजूदा बुनियादी ढांचे का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होगा, बल्कि भविष्य में इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव की संख्या बढ़ने पर अतिरिक्त क्षमता भी उपलब्ध रहेगी। रेलवे का मानना है कि आधुनिक रखरखाव सुविधाओं से परिचालन दक्षता में सुधार होगा और ट्रेनों के संचालन में आने वाली तकनीकी चुनौतियों को कम करने में मदद मिलेगी।

    भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन को बढ़ावा देने और माल तथा यात्री परिवहन को अधिक तेज, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में लगातार निवेश कर रहा है। इसी रणनीति के तहत विभिन्न रेल मंडलों में आधुनिक लोकोमोटिव शेड, रखरखाव केंद्र और तकनीकी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। रायपुर की यह परियोजना भी उसी व्यापक योजना का हिस्सा मानी जा रही है।

    रेलवे मंत्रालय का मानना है कि बेहतर रखरखाव व्यवस्था से लोकोमोटिव की उपलब्धता बढ़ेगी, मरम्मत में लगने वाला समय कम होगा और ट्रेनों के समयबद्ध संचालन को भी मजबूती मिलेगी। इससे माल ढुलाई और यात्री सेवाओं दोनों की कार्यक्षमता में सकारात्मक सुधार होने की उम्मीद है।

    इसी क्रम में भारतीय रेलवे देश की महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना पर भी तेजी से काम कर रहा है। रेलवे के अनुसार परियोजना के विभिन्न चरण निर्धारित समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ रहे हैं और गुजरात क्षेत्र में निर्माण कार्य का बड़ा हिस्सा पूरा किया जा चुका है। रेलवे का लक्ष्य आधुनिक तकनीक, मजबूत बुनियादी ढांचे और उन्नत रखरखाव प्रणाली के माध्यम से देश के रेल नेटवर्क को अधिक सुरक्षित, तेज और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना है।

  • करोड़ों खर्च, पहली बारिश में ध्वस्त पुल: देवास में निर्माण कार्य पर सवाल, वीडियो वायरल

    करोड़ों खर्च, पहली बारिश में ध्वस्त पुल: देवास में निर्माण कार्य पर सवाल, वीडियो वायरल


    देवास । मध्य प्रदेश के देवास जिले में करोड़ों रुपये की लागत से बने एक पुल की गुणवत्ता पहली ही तेज बारिश में सवालों के घेरे में आ गई है। होशियारी और मकोडिया गांवों के बीच करीब 7 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित पुल का एक हिस्सा बारिश के तेज बहाव में क्षतिग्रस्त हो गया। बताया जा रहा है कि पुल का निर्माण कार्य महज तीन-चार महीने पहले ही पूरा हुआ था, लेकिन पहली ही बारिश का दबाव वह नहीं झेल सका।

    गुरुवार को पुल के क्षतिग्रस्त हिस्से का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला चर्चा का विषय बन गया। वीडियो में पुल का एक हिस्सा बहा हुआ दिखाई दे रहा है, जिससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता और तकनीकी मानकों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस पुल के बनने से वर्षों पुरानी आवागमन की समस्या दूर होने की उम्मीद थी, लेकिन पहली ही बारिश में पुल का हिस्सा बह जाने से लोगों का भरोसा टूट गया है। उनका आरोप है कि निर्माण में गुणवत्ता का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया, जिसके कारण करोड़ों रुपये की परियोजना इतनी जल्दी क्षतिग्रस्त हो गई।

    ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि पुल निर्माण में यदि किसी प्रकार की लापरवाही या घटिया सामग्री के इस्तेमाल की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों और निर्माण एजेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

    फिलहाल प्रशासन की ओर से पुल के क्षतिग्रस्त होने के कारणों की जांच की जा रही है। जांच रिपोर्ट के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि नुकसान अत्यधिक बारिश और तेज जलप्रवाह के कारण हुआ या निर्माण कार्य में किसी प्रकार की तकनीकी खामी रही। वहीं, पुल क्षतिग्रस्त होने से क्षेत्र के लोगों की आवाजाही भी प्रभावित हुई है और वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ रहा है।

  • नेशनल ग्रिड फेल होते ही ठहर गया पूरा देश, क्यूबा के ब्लैकआउट ने बताया बिजली संकट कैसे संचार, पानी, अस्पताल और अर्थव्यवस्था पर डालता है असर

    नेशनल ग्रिड फेल होते ही ठहर गया पूरा देश, क्यूबा के ब्लैकआउट ने बताया बिजली संकट कैसे संचार, पानी, अस्पताल और अर्थव्यवस्था पर डालता है असर

    नई दिल्ली । क्यूबा में एक बार फिर देशव्यापी बिजली संकट ने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। राष्ट्रीय बिजली ग्रिड ठप होने के बाद देश के अधिकांश हिस्सों में बिजली आपूर्ति रुक गई, जिससे संचार, परिवहन, जलापूर्ति, स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ा। लगभग 96 लाख की आबादी वाले इस द्वीपीय देश में यह वर्ष के भीतर तीसरी बड़ी बिजली आपूर्ति बाधित होने की घटना मानी जा रही है। इस घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी देश की ऊर्जा व्यवस्था बाधित होने पर आधुनिक जीवन का लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।

    बिजली बंद होते ही सबसे पहले संचार सेवाओं पर असर दिखाई देता है। मोबाइल टावर और इंटरनेट नेटवर्क सीमित समय तक बैटरी या जनरेटर के सहारे चलते हैं, लेकिन लंबे समय तक बिजली नहीं रहने पर उनकी क्षमता समाप्त हो जाती है। इसके बाद मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं बाधित होने लगती हैं, जिससे लोगों के बीच संपर्क टूट जाता है। डिजिटल संचार पर निर्भर सरकारी और निजी सेवाओं के संचालन में भी कठिनाइयां बढ़ जाती हैं।

    बिजली संकट का दूसरा बड़ा प्रभाव परिवहन व्यवस्था पर पड़ता है। ट्रैफिक सिग्नल बंद होने से प्रमुख शहरों में यातायात अव्यवस्थित हो जाता है। बिजली आधारित रेल सेवाएं, मेट्रो और अन्य सार्वजनिक परिवहन प्रभावित होते हैं, जिससे यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिन क्षेत्रों में ईंधन की उपलब्धता पहले से सीमित हो, वहां परिवहन व्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित होने लगती है।

    राष्ट्रीय स्तर पर बिजली आपूर्ति रुकने का सीधा असर वित्तीय लेनदेन पर भी पड़ता है। एटीएम, डिजिटल भुगतान प्रणाली, कार्ड स्वाइप मशीनें और ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होने से बाजार की गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं। जिन लोगों के पास नकद राशि उपलब्ध नहीं होती, उन्हें दैनिक जरूरत की वस्तुएं खरीदने में भी कठिनाई होती है। इससे स्थानीय व्यापार और खुदरा बाजारों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।

    जलापूर्ति व्यवस्था भी बिजली पर निर्भर होने के कारण गंभीर रूप से प्रभावित होती है। नगरों और महानगरों में पानी की आपूर्ति करने वाले पंप बंद हो जाते हैं, जिससे ऊंची इमारतों और आवासीय परिसरों में पानी का दबाव समाप्त हो जाता है। कुछ ही समय में पीने और घरेलू उपयोग के पानी की कमी महसूस होने लगती है। लंबे समय तक संकट बने रहने पर स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी चुनौती बन सकती है।

    स्वास्थ्य सेवाओं पर भी ऐसे संकट का गहरा प्रभाव पड़ता है। अस्पतालों में सीमित अवधि तक जनरेटर की सुविधा उपलब्ध रहती है, लेकिन लंबे समय तक बिजली नहीं रहने पर दवाओं और टीकों के कोल्ड स्टोरेज, चिकित्सा उपकरणों तथा नियमित उपचार सेवाओं पर असर पड़ सकता है। कई स्थानों पर गैर-आपातकालीन चिकित्सा प्रक्रियाओं को टालना पड़ सकता है, जिससे मरीजों की परेशानियां बढ़ जाती हैं।

    क्यूबा में बिजली संकट के पीछे पुराने बिजली संयंत्रों, ईंधन आपूर्ति की चुनौतियों और ऊर्जा अवसंरचना पर बढ़ते दबाव को प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। लंबे समय से चल रही ऊर्जा संबंधी समस्याओं ने देश की बिजली व्यवस्था को कमजोर किया है। ताजा घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश के लिए मजबूत ऊर्जा अवसंरचना केवल विकास का आधार ही नहीं, बल्कि सामान्य जनजीवन, आर्थिक गतिविधियों और आवश्यक सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है।

  • पहली बारिश में ही खुली करोड़ों की परियोजना की पोल, अटल भवन में जलभराव से निर्माण और निगरानी व्यवस्था पर सवाल

    पहली बारिश में ही खुली करोड़ों की परियोजना की पोल, अटल भवन में जलभराव से निर्माण और निगरानी व्यवस्था पर सवाल


    मध्य प्रदेश:
    की राजधानी भोपाल में हाल ही में तैयार किए गए नगर निगम के नए मुख्यालय अटल भवन की निर्माण गुणवत्ता पहली ही बारिश में सवालों के घेरे में आ गई। करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित इस भवन में वर्षा का पानी प्रवेश कर जाने से कार्यालय परिसर के भीतर जलभराव की स्थिति बन गई। घटना के सामने आने के बाद निर्माण कार्य की गुणवत्ता, तकनीकी मानकों के पालन और निगरानी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

    करीब 73 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए इस भवन को आधुनिक सुविधाओं से लैस प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। उद्देश्य यह था कि नगर निगम की विभिन्न शाखाओं को एक ही परिसर में बेहतर सुविधाओं के साथ संचालित किया जा सके। लेकिन पहली ही बारिश के दौरान भवन के भीतर पानी पहुंचने की घटना ने इस परियोजना की गुणवत्ता पर बहस छेड़ दी है।

    बारिश के दौरान भवन के विभिन्न हिस्सों में पानी जमा होने से कर्मचारियों और अधिकारियों को कामकाज में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कार्यालय के भीतर जलभराव की स्थिति बनने से यह सवाल भी उठने लगा कि क्या भवन के निर्माण में जल निकासी और वर्षा प्रबंधन से जुड़े आवश्यक मानकों का पर्याप्त ध्यान रखा गया था।

    इस घटना ने निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली के साथ-साथ परियोजना की तकनीकी निगरानी पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। आमतौर पर इस स्तर की सार्वजनिक परियोजनाओं में निर्माण के दौरान गुणवत्ता परीक्षण, निरीक्षण और तकनीकी मूल्यांकन की कई प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। ऐसे में पहली ही बारिश में सामने आई यह स्थिति इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नए सरकारी भवन में वर्षा जल निकासी, छत की सीलिंग, ड्रेनेज नेटवर्क और जलरोधक व्यवस्था का विशेष महत्व होता है। यदि इन पहलुओं में किसी स्तर पर कमी रह जाए तो शुरुआती बारिश में ही ऐसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। इसलिए तकनीकी कारणों की विस्तृत जांच आवश्यक मानी जा रही है।

    घटना के बाद भवन की गुणवत्ता को लेकर लोगों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। सार्वजनिक धन से निर्मित बड़ी परियोजनाओं से उच्च गुणवत्ता और दीर्घकालिक उपयोग की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में निर्माण के तुरंत बाद सामने आई इस तरह की समस्या ने जवाबदेही और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग निर्माण कार्य की तकनीकी जांच कराता है या नहीं और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या मानकों की अनदेखी पाई जाती है तो उसके लिए जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है। फिलहाल यह घटना सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं में गुणवत्ता नियंत्रण और प्रभावी निगरानी व्यवस्था की आवश्यकता को एक बार फिर प्रमुखता से सामने लेकर आई है।

  • यमुना के पानी पर हरियाणा-राजस्थान में बनी सहमति, लाखों लोगों को मिलेगा पीने का पानी, तीन दशक पुरानी समस्या खत्म

    यमुना के पानी पर हरियाणा-राजस्थान में बनी सहमति, लाखों लोगों को मिलेगा पीने का पानी, तीन दशक पुरानी समस्या खत्म

    नई दिल्ली। हरियाणा और राजस्थान के बीच लंबे समय से चली आ रही पानी की समस्या के समाधान की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। दोनों राज्यों ने यमुना जल परियोजना के निर्माण और क्रियान्वयन को लेकर महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते की मौजूदगी में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह, दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। इस समझौते को जल प्रबंधन और सहकारी संघवाद की दिशा में अहम उपलब्धि माना जा रहा है।

    समझौते के तहत मानसून के दौरान जुलाई से अक्टूबर के बीच हथिनीकुंड बैराज से राजस्थान को उसके हिस्से का पानी भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा। योजना के अनुसार लगभग 580 एमसीएम पानी तीन बड़ी भूमिगत पाइपलाइनों के जरिए राजस्थान तक पहुंचाया जाएगा। इन पाइपलाइनों का व्यास 3.6 मीटर से अधिक होगा, जिससे पानी की सुरक्षित और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी।

    सरकार का कहना है कि इस परियोजना से राजस्थान के सीकर, चूरू और झुंझुनू जिलों के साथ-साथ हरियाणा के भिवानी और फतेहाबाद क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने में बड़ी मदद मिलेगी। लंबे समय से पानी की कमी झेल रहे इन इलाकों में इस परियोजना से लाखों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा जल संरक्षण और भूजल स्तर में सुधार की दिशा में भी यह योजना महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    समझौते में लागत साझा करने, वित्तीय जिम्मेदारियों, जल आवंटन, जल छोड़ने की प्रक्रिया, रखरखाव और निगरानी तंत्र से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है। इसके साथ ही पारदर्शिता बनाए रखने और भविष्य में किसी भी विवाद के समाधान के लिए स्पष्ट व्यवस्था भी तय की गई है। सरकार का दावा है कि वैज्ञानिक आधार पर तैयार यह मॉडल आने वाले वर्षों में भी प्रभावी ढंग से काम करेगा।

    केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह समझौता सहकारी संघवाद की भावना का मजबूत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यदि राज्य आपसी सहयोग और संवाद की भावना से कार्य करें तो वर्षों पुराने विवादों का भी स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। उन्होंने परियोजना को दोनों राज्यों के लिए लाभकारी बताते हुए इसे जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

    सरकार के अनुसार, इस योजना का उद्देश्य पश्चिमी यमुना नहर से राजस्थान के हिस्से का पानी भूमिगत पाइपलाइन के जरिए पहुंचाना है, ताकि वर्ष 1994 के जल बंटवारा समझौते के तहत मिले पानी का प्रभावी उपयोग किया जा सके। इससे विशेष रूप से सूखे और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता बढ़ेगी और सामाजिक व आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती मिलेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के पूरा होने के बाद जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी। साथ ही यह मॉडल भविष्य में राज्यों के बीच जल प्रबंधन से जुड़े अन्य मामलों के समाधान के लिए भी एक प्रभावी उदाहरण बन सकता है। सरकार का विश्वास है कि सभी संबंधित एजेंसियों के सहयोग से इस परियोजना को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा कर लाखों लोगों को इसका लाभ पहुंचाया जाएगा।