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  • रात में नींद नहीं आती तो अपनाएं ये आसान उपाय, तनाव से लेकर मोबाइल इस्तेमाल तक जानें प्रमुख कारण

    रात में नींद नहीं आती तो अपनाएं ये आसान उपाय, तनाव से लेकर मोबाइल इस्तेमाल तक जानें प्रमुख कारण

    नई दिल्ली । रात में बिस्तर पर जाने के बाद भी देर तक नींद न आना, बार-बार आंख खुलना या सुबह उठने के बाद थकान महसूस होना कई लोगों की परेशानी है। कभी-कभी काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां या दिनचर्या में बदलाव इसकी वजह बन सकते हैं। वहीं, कुछ लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण भी पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती। नींद पूरी नहीं होने का असर व्यक्ति के मूड, एकाग्रता और रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ सकता है। ऐसे में नींद की परेशानी के कारणों को समझना और सोने की आदतों में सुधार करना जरूरी है।

    नींद न आने की एक प्रमुख वजह तनाव और जरूरत से ज्यादा सोचना हो सकती है। कार्यालय के काम, आर्थिक चिंताएं, पारिवारिक जिम्मेदारियां या भविष्य को लेकर बेचैनी होने पर दिमाग शांत करना मुश्किल हो जाता है। शरीर आराम करना चाहता है, लेकिन मन में विचार चलते रहते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को बिस्तर पर जाने के बाद भी नींद आने में समय लग सकता है।

    सोने और जागने का समय बार-बार बदलना भी नींद की प्राकृतिक लय को प्रभावित करता है। देर रात तक जागना, सुबह अलग-अलग समय पर उठना या दिन में लंबे समय तक सोना रात की नींद में बाधा बन सकता है। शरीर को नियमित समय पर सोने और जागने की आदत डालने से इस परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है।

    सोने से ठीक पहले मोबाइल चलाना, वीडियो देखना या लैपटॉप पर काम करना भी नींद को प्रभावित कर सकता है। स्क्रीन की रोशनी और लगातार मिलने वाली सूचनाएं दिमाग को सक्रिय बनाए रख सकती हैं। इससे शरीर को आराम की स्थिति में आने में परेशानी होती है। इसलिए सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना बेहतर माना जाता है।

    खानपान की आदतों पर ध्यान देना भी जरूरी है। शाम या रात में चाय-कॉफी पीने से कुछ लोगों की नींद प्रभावित हो सकती है, क्योंकि इनमें मौजूद कैफीन सतर्कता बढ़ाता है। इसके अलावा देर रात भारी भोजन करने से पेट में असहजता या एसिडिटी हो सकती है, जिससे सोने में परेशानी आती है। कैफीन के प्रति संवेदनशील लोगों को दोपहर के बाद इसका सेवन सीमित करने से लाभ मिल सकता है।

    कुछ मामलों में दर्द, एसिडिटी, दवाओं के दुष्प्रभाव या सोते समय सांस लेने में परेशानी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी नींद बिगाड़ सकती हैं। तेज खर्राटों के साथ सांस रुकने जैसी समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि नींद की परेशानी बार-बार हो रही है, तो इसके पीछे की वजह जानने के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    बेहतर नींद के लिए सबसे पहले सोने और जागने का समय तय करें। कोशिश करें कि छुट्टी वाले दिन भी इस समय में बहुत अधिक बदलाव न हो। नियमित दिनचर्या शरीर की प्राकृतिक नींद-जागने की लय को बनाए रखने में मदद करती है। सोने से करीब 30 से 60 मिनट पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन से दूरी बनाएं। इस दौरान हल्की किताब पढ़ना, धीमा संगीत सुनना या शांत वातावरण में बैठना उपयोगी हो सकता है।

    यदि अगले दिन के कामों को लेकर चिंता बनी रहती है, तो सोने से पहले जरूरी कामों की सूची कागज पर लिख लें। कुछ मिनट धीरे-धीरे सांस लेने का अभ्यास भी मन को शांत करने में मदद कर सकता है। दिन के समय नियमित टहलना, हल्का व्यायाम करना और सुबह प्राकृतिक रोशनी में समय बिताना नींद की गुणवत्ता के लिए उपयोगी आदतें हैं। हालांकि, सोने के बिल्कुल पहले बहुत तेज व्यायाम करने से कुछ लोगों को परेशानी हो सकती है।

    दिन में झपकी लेने की आदत है, तो उसे छोटा रखें और देर शाम सोने से बचें। यदि बिस्तर पर काफी देर तक लेटने के बाद भी नींद नहीं आती, तो खुद पर सोने का दबाव न डालें। उठकर कुछ समय शांत गतिविधि करें और नींद महसूस होने पर वापस बिस्तर पर जाएं। बार-बार घड़ी देखने से बचना भी मददगार हो सकता है।

    अगर नींद की समस्या लगातार बनी रहती है, दिनभर थकान रहती है या कामकाज और मानसिक स्थिति प्रभावित होने लगती है, तो डॉक्टर से सलाह लें। लगातार परेशानी को केवल तनाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही कारण की पहचान और समय पर मदद से नींद में सुधार की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।

  • PCOS से बिगड़ सकती है नींद, तेज खर्राटे और सुबह की थकान जैसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    PCOS से बिगड़ सकती है नींद, तेज खर्राटे और सुबह की थकान जैसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    नई दिल्ली ।पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस को आमतौर पर अनियमित पीरियड्स, वजन बढ़ने और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इसका संबंध नींद से जुड़ी परेशानियों से भी हो सकता है। पीसीओएस से जूझ रही महिलाओं में अगर तेज खर्राटे, रात में बार-बार नींद खुलना, सोते समय सांस लेने में परेशानी या पर्याप्त नींद के बावजूद सुबह थकान बनी रहती है, तो इन संकेतों को सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    इन लक्षणों का संबंध स्लीप एपनिया जैसी समस्या से हो सकता है। पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया का जोखिम सामान्य महिलाओं की तुलना में अधिक बताया गया है। इस स्थिति में सोते समय सांस की नली कुछ समय के लिए संकरी या बंद हो सकती है। इससे सांस लेने में रुकावट आती है और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर प्रभावित हो सकता है।

    जब नींद के दौरान सांस लेने में रुकावट आती है, तो शरीर सामान्य सांस बहाल करने के लिए बार-बार जागने की स्थिति में पहुंच सकता है। इसका असर पूरी नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है। कई बार व्यक्ति को यह महसूस भी नहीं होता कि रात में उसकी नींद बार-बार टूट रही है।

    पीसीओएस और अनिद्रा के बीच भी संबंध देखा जाता है। पीसीओएस में इंसुलिन रेजिस्टेंस, वजन बढ़ना और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं आम हो सकती हैं। दूसरी ओर, लंबे समय तक नींद की कमी या स्लीप एपनिया जैसी स्थिति शरीर में तनाव हार्मोन और इंसुलिन रेजिस्टेंस को प्रभावित कर सकती है। इस तरह दोनों स्थितियां एक-दूसरे पर असर डाल सकती हैं।

    नींद लगातार पूरी न होने या बार-बार बाधित होने से थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी और मूड में बदलाव जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। जिन महिलाओं को पहले से अनियमित पीरियड्स, वजन बढ़ने या इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी पीसीओएस से जुड़ी परेशानियां हैं, उनके लिए खराब नींद इन समस्याओं को और चुनौतीपूर्ण बना सकती है।

    हालांकि, केवल खर्राटे आने का मतलब स्लीप एपनिया होना नहीं है। लेकिन अगर खर्राटे बहुत तेज और नियमित हैं, सोते समय सांस रुकने जैसा महसूस होता है, रात में घुटन होती है या सांस लेने की गति बढ़ जाती है, तो इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। सुबह उठने के बाद सिरदर्द रहना या पर्याप्त नींद के बावजूद दिनभर नींद और थकान महसूस होना भी डॉक्टर से सलाह लेने का कारण हो सकता है।

    पीसीओएस को मैनेज करने के लिए केवल पीरियड्स को नियमित करने या वजन कम करने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं माना जाता। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तनाव को बेहतर तरीके से संभालना भी महत्वपूर्ण है।

    अगर किसी महिला में स्लीप एपनिया से जुड़े लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर स्थिति के अनुसार आगे की जांच और उपचार की सलाह दे सकते हैं। नींद शरीर के हार्मोनल, मेटाबॉलिक और समग्र स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, इसलिए लगातार होने वाली नींद की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    पीसीओएस लंबे समय तक बनी रहने वाली स्थिति हो सकती है, लेकिन सही जीवनशैली और चिकित्सकीय देखभाल के जरिए इसके प्रभावों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इसलिए शरीर में होने वाले बदलावों और नींद से जुड़े लगातार बने रहने वाले संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है।

  • रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा

    रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा


    नई दिल्ली । नींद हमारे शरीर और दिमाग को आराम देने के साथ अगले दिन बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार करती है। यही वजह है कि पर्याप्त नींद को स्वस्थ जीवनशैली का बेहद जरूरी हिस्सा माना जाता है। अगर रात की नींद बार-बार अधूरी रह रही है तो इसका असर सिर्फ सुबह की थकान या दिनभर की सुस्ती तक सीमित नहीं रहता बल्कि धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार याददाश्त एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगता है। गुस्सा जल्दी आना छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन महसूस होना किसी काम पर ध्यान केंद्रित न कर पाना और जरूरी बातें भूल जाना कई बार नींद पूरी न होने से भी जुड़ा हो सकता है।

    एक रात नींद कम होने पर अगले दिन थकान सिरदर्द सुस्ती और काम करने में परेशानी महसूस होना सामान्य हो सकता है। कभी-कभार ऐसा होने पर आमतौर पर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती लेकिन जब नींद की कमी लगातार बनी रहती है तो इसका असर रोजमर्रा की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। व्यक्ति को छोटे-छोटे फैसले लेने में भी परेशानी हो सकती है और पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान भटकने की समस्या बढ़ सकती है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न मिलने की स्थिति में शरीर और दिमाग दोनों पर दबाव बढ़ता है।

    नींद की कमी का सीधा असर व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। पर्याप्त आराम न मिलने पर व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में भी ज्यादा चिड़चिड़ा हो सकता है और छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता है। भावनाओं को नियंत्रित करना भी मुश्किल महसूस हो सकता है। यही समस्या अगर लंबे समय तक जारी रहे तो तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। नींद और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध काफी गहरा माना जाता है और लगातार नींद की समस्या रहने पर चिंता तथा अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

    याददाश्त और एकाग्रता पर भी नींद की कमी का असर पड़ता है। रात में शरीर और दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिलने पर अगले दिन किसी काम पर ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। चीजें याद रखने में दिक्कत हो सकती है और काम या पढ़ाई का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। बच्चों और किशोरों के लिए पर्याप्त नींद विशेष रूप से जरूरी है क्योंकि नींद उनकी सीखने की क्षमता ध्यान याददाश्त और व्यवहार से जुड़ी होती है। इसलिए बच्चों में लगातार नींद की परेशानी को केवल आदत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    कम नींद का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने को वजन बढ़ने मधुमेह और हृदय स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से भी जोड़ा जाता है। कुछ लोगों को रात में सोने में परेशानी होती है जबकि कुछ लोग पर्याप्त समय बिस्तर पर रहने के बाद भी सुबह तरोताजा महसूस नहीं करते। कुछ नींद संबंधी विकारों में रात के समय सांस लेने में रुकावट या सांस के अनियमित होने जैसी समस्या भी हो सकती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को पर्याप्त समय सोने के बावजूद अच्छी गुणवत्ता वाली नींद नहीं मिल पाती।

    कुछ संकेत ऐसे हैं जिन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। अगर गाड़ी चलाते समय बार-बार झपकी आने लगे टीवी देखते या किताब पढ़ते समय थोड़ी देर में ही नींद आने लगे दिन के समय बहुत ज्यादा नींद महसूस हो काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाए या चीजें याद रखने में पहले से ज्यादा परेशानी होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया बढ़ना और काम करने की क्षमता में कमी आना भी लगातार खराब नींद के संकेत हो सकते हैं।

    इसलिए नींद को केवल आराम का समय समझने के बजाय स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरत मानना जरूरी है। अगर रात में लगातार सोने में परेशानी हो रही है या पर्याप्त समय सोने के बाद भी दिनभर अत्यधिक नींद और थकान बनी रहती है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। समय रहते नींद से जुड़ी समस्या के कारणों की पहचान करने और जरूरी सुधार करने से रोजमर्रा की कार्यक्षमता मानसिक संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

  • झांसी में गर्मी और बिजली कटौती से बिगड़ रही लोगों की नींद, बढ़े मानसिक तनाव के मरीज

    झांसी में गर्मी और बिजली कटौती से बिगड़ रही लोगों की नींद, बढ़े मानसिक तनाव के मरीज



    झांसी । झांसी में भीषण गर्मी और लगातार हो रही बिजली कटौती लोगों के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति पर गहरा असर डाल रही है। रात के समय बिजली न आने और तेज गर्मी के कारण लोगों की नींद पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे चिड़चिड़ापन, बेचैनी और तनाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

    जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. शिकाफा जाफरीन के अनुसार ओपीडी में आने वाले मानसिक रोगियों में हर चौथा मरीज नींद की कमी से जुड़ी समस्याओं से परेशान है। काउंसलिंग के दौरान यह सामने आया है कि अधिकतर लोग या तो गर्मी के कारण सो नहीं पा रहे हैं या फिर रात में बिजली कटौती उनकी नींद बाधित कर रही है।

    डॉक्टरों का कहना है कि पर्याप्त नींद न मिलने से मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। इससे मेनिया, पैनिक डिसऑर्डर और इनसोमनिया (अनिद्रा) जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। मेनिया की स्थिति में व्यक्ति अत्यधिक उत्तेजित हो जाता है, बहुत अधिक या बहुत कम बोलता है, मूड स्विंग होता है और व्यवहार असामान्य हो जाता है।

    वहीं पैनिक डिसऑर्डर के मरीजों में बार-बार घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना और सांस फूलने जैसी समस्याएं देखी जा रही हैं।

    इनसोमनिया के मरीज अधिक सोचने लगते हैं और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और गुस्सा दिखाने लगते हैं।

    डॉक्टरों के अनुसार नींद की कमी का असर केवल मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है, जिससे लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है। लगातार नींद न पूरी होने से मरीजों में तनाव बढ़ता जा रहा है और कई लोग सामान्य बातचीत में भी आक्रामक व्यवहार करने लगे हैं।

    फिलहाल विशेषज्ञों ने लोगों को सलाह दी है कि वे गर्मी से बचाव के उपाय अपनाएं, पर्याप्त पानी पिएं और जितना संभव हो नींद का नियमित समय बनाए रखें, ताकि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर रखा जा सके।