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  • ईरान युद्ध से धीमी हुई विश्व की आर्थिक गति… IMF ने घटाया वृद्धि दर का अनुमान.. महंगाई बढ़ने का आशंका

    ईरान युद्ध से धीमी हुई विश्व की आर्थिक गति… IMF ने घटाया वृद्धि दर का अनुमान.. महंगाई बढ़ने का आशंका


    वॉशिंगटन।
    अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) (International Monetary Fund (IMF) ने मंगलवार को कहाकि ईरान युद्ध (Iran War) ने इस वर्ष विश्व की आर्थिक गति (World Economic Dynamics) को धीमा कर दिया है। इसके चलते 2025 की तुलना में वृद्धि दर में गिरावट आने की आशंका है। आईएमएफ ने वैश्विक वृद्धि के अपने अनुमान को घटाकर 2026 के लिए 3.1 फीसदी कर दिया है। इससे पहले जनवरी महीने में इसके 3.3 फीसदी रहने की संभावना जताई गई थी। यह 2025 में अनुमानित 3.4 प्रतिशत वृद्धि से धीमी होगी।

    बढ़ गईं तेल और गैस की कीमतें
    ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों, ईरान के होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने और पड़ोसी देशों में तेल रिफाइनरियों और अन्य ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर जवाबी हमलों के कारण दुनिया भर में तेल एवं गैस की कीमतों में तेजी आई है। इसके परिणामस्वरूप, आईएमएफ ने इस साल वैश्विक मुद्रास्फीति के अपने अनुमान को बढ़ाकर 4.4 फीसदी कर दिया है, जबकि जनवरी में इसके 3.8 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था। वहीं 2025 के लिए यह 4.1 फीसदी था।


    युद्ध पहले तक सब सही था

    युद्ध से पहले तक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था ने आश्चर्यजनक रूप से मजबूती दिखाई थी। इन नीतियों ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और कभी आयात के लिए लगभग पूरी तरह से खुला बाजार रहे अमेरिका के चारों ओर आयात कर की दीवार खड़ी कर दी थी। लेकिन इससे नुकसान कम हुआ। इसका एक कारण यह भी था कि पिछले साल ट्रंप द्वारा घोषित शुल्क मूल रूप से कम थे।


    क्या बोले आईएमएफ चीफ

    डेटा केंद्रों और कृत्रिम मेधा में भारी निवेश के साथ प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी और बढ़ती उत्पादकता ने भी विश्व अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दिया। आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गौरिंचास ने मुद्राकोष के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य के साथ ब्लॉग पोस्ट में लिखा कि पश्चिम एशिया में युद्ध ने इस गति को रोक दिया है। गौरिंचास ने लिखा कि आईएमएफ का यह मानना था कि फारस की खाड़ी में संघर्ष अल्पकालिक होगा और इस वर्ष ऊर्जा की कीमतों में 19 फीसदी की हल्की वृद्धि होगी।

    उन्होंने आगे चेताया कि हालांकि इससे कहीं अधिक खराब हो सकते हैं। एक सीरियस सिनैरियो में, जिसमें ऊर्जा संकट अगले साल तक जारी रहता है और केंद्रीय बैंकों को मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, वैश्विक वृद्धि 2026 और 2027 में घटकर दो फीसदी हो सकती है। उन्होंने कहाकि अस्थायी युद्धविराम की हाल की खबरों के बावजूद, कुछ नुकसान पहले ही हो चुका है और आगे के जोखिम अभी भी बहुत अधिक हैं।


    अमेरिका का क्या हाल

    आईएमएफ ने इस साल अमेरिका की वृद्धि दर के अपने अनुमान को थोड़ा घटाकर 2.3 फीसदी कर दिया है। मुद्राकोष के अनुमान के अनुसार, यूरो मुद्रा साझा करने वाले 21 यूरोपीय देश इस साल सामूहिक रूप से 1.1 फीसदी की वृद्धि हासिल करेंगे, जो 2025 के 1.4 फीसदी से कम है। यूरोप प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों से बुरी तरह प्रभावित है। सबसे ज्यादा प्रभावित होने की संभावना उन कर्ज में डूबे गरीब देशों की है जो ऊर्जा आयात करते हैं और सरकारी खर्च और कर राहत बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देने में असमर्थ हैं।

    रूस पर ज्यादा असर नहीं
    इस संघर्ष से उभरने वाले एक प्रमुख देश रूस है, जो ऊर्जा निर्यातक होने के नाते उच्च कीमतों से लाभान्वित होगा। 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद प्रतिबंधों से बुरी तरह प्रभावित रूसी अर्थव्यवस्था के लिए आईएमएफ ने अपने अनुमान को बढ़ाकर 1.1 फीसदी कर दिया है, जो अभी भी मामूली है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा ईरान युद्ध का असर… महंगे तेल ने बिगाड़ी हालत


    नई दिल्ली।
    ग्लोबल स्तर (Global Level) पर बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) में तेज उछाल अब भारत की अर्थव्यवस्था (Indian Economy) पर भी असर दिखाने लगा है। हाल ही में आई मॉर्गन स्टेनली (Morgan Stanley) की रिपोर्ट में भी इसका संकेत साफ दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक, महंगे तेल की वजह से भारत की आर्थिक ग्रोथ पर दबाव बढ़ गया है। यही वजह है कि FY2027 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान घटाकर 6.2% कर दिया गया है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत पर कैसा पड़ेगा?

    आपको बता दें कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। इससे ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो जाती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लोगों की जेब पर दबाव बढ़ता है और खर्च कम हो जाता है, जिससे डिमांड भी कमजोर पड़ने लगती है।


    95 डॉलर प्रति बैरल होंगी तेल की कीमतें

    रिपोर्ट के अनुसार, अगर तेल की कीमतें औसतन 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती हैं, तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी, कंपनियों का मुनाफा घटेगा और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा, जो बढ़कर करीब 5.1% तक पहुंचने का अनुमान है।

    85% कच्चा तेल आयात
    भारत की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वह अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ जाता है और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी बढ़कर 2.5% तक जा सकता है। इससे रुपये पर भी दबाव बन सकता है।

    किस-किस पर होगा असर?
    इसका असर आम लोगों से लेकर कंपनियों और सरकार तक सभी पर पड़ता है, जहां आम आदमी की खरीदारी घटती है, वहीं कंपनियों के खर्च बढ़ जाते हैं और सरकार को सब्सिडी बढ़ानी पड़ सकती है। हालांकि, RBI (Reserve Bank of India) फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखते हुए स्थिति संभालने की कोशिश कर सकता है। अगर हालात और बिगड़ते हैं और तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो ग्रोथ 5.7% तक गिर सकती है और महंगाई 6% के पार जा सकती है। फिर भी मजबूत घरेलू मांग और सरकारी नीतियों की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था इस चुनौती का सामना करने में सक्षम मानी जा रही है।

  • छोटे और मध्यम उद्योग संकट में…. ईरान युद्ध से फिरोजाबात का कांच उद्योग भी प्रभावित

    छोटे और मध्यम उद्योग संकट में…. ईरान युद्ध से फिरोजाबात का कांच उद्योग भी प्रभावित


    नई दिल्ली।
    फिरोजाबाद (Firozabad) में करीब 200 छोटे और मध्यम उद्योगों (Small and Medium Industries) का अस्तित्व गैस संकट के कारण खतरे में हैं। कई फैक्ट्रियों ने उत्पादन कम कर दिया है या बंद कर दिया है। इससे हजारों कामगारों की रोजी-रोटी पर असर पड़ रहा है। ब्लूमबर्ग की यह रिपोर्ट बताती है कि फिरोजाबाद का संकट कैसे पूरे देश की कई इंडस्ट्रीज को प्रभावित कर रहा है।

    बेंगलुरु की कंपनी Mossant Craft Kombucha के को-फाउंडर शिशिर साथ्यान पिछले एक महीने से अपने प्रीमियम ड्रिंक्स के लिए कांच की बोतलें जुटाने में परेशान हैं। उनका कहना है कि बाजार में अब कांच के फ्लास्क मिल ही नहीं रहे हैं, जबकि गर्मियों में कोल्ड ड्रिंक की मांग सबसे ज्यादा होती है। बढ़ती लागत को संभालने के लिए कंपनी अब मार्केटिंग और डिस्काउंट बजट में कटौती करने पर मजबूर हो गई है।


    गैस सप्लाई में बड़ी कटौती का असर

    देश में कांच की कमी की सबसे बड़ी वजह गैस संकट है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण एनर्जी सप्लाई प्रभावित हुई है। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए LPG और LNG की सप्लाई फैक्ट्रियों से हटाकर घरों की ओर मोड़ दी है। इसका सीधा असर कांच बनाने वाले उद्योगों पर पड़ा है, जो गैस पर निर्भर होते हैं।


    फिरोजाबाद बना संकट का केंद्र

    पिछले 400 साल से कांच उद्योग का केंद्र रहा उत्तर प्रदेश का फिरोजाबाद इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बना है। यहां के कारखाने नेचुरल गैस से चलते हैं। कांच बनाने की भट्टियां 1500°C तापमान पर लगातार चलती रहती हैं। अगर ये ठंडी पड़ जाएं तो दोबारा चालू करने में हफ्तों का समय और अरबों रुपये का खर्च लगता है।

    प्रोडक्शन हुआ आधा, कीमतें 20% तक बढ़ीं
    गैस सप्लाई कम होने के कारण कई कंपनियों को उत्पादन 50% तक घटाना पड़ा है। कांच की कीमतें 20% तक बढ़ गई हैं। कई कंपनियों ने नए ऑर्डर लेना बंद कर दिया है और विस्तार योजनाएं रोक दी गई हैं। ग्लोबल कंपनियों को सप्लाई करने वाले उद्योग भी इस संकट से जूझ रहे हैं।


    हर सेक्टर पर असर: दवा, शराब, FMCG तक झटका

    कांच की कमी का असर सिर्फ बोतलों तक सीमित नहीं है। दूध की बोतलें, जैम के जार, दवाइयों की शीशियां, कॉस्मेटिक पैकेजिंग, सबकी सप्लाई प्रभावित हुई है। कुछ कंपनियों को पैकेजिंग लागत 30% तक बढ़ानी पड़ी है। एस आर ग्लास के प्रबंध निदेशक प्रांजल मित्तल को उम्मीद है कि कांच उत्पादन में यह रुकावट महीनों तक चलेगा। उनका कहना है, “अगर युद्ध एक सप्ताह बढ़ता है, तो हमारा कारोबार एक महीने के लिए गड़बड़ा जाता है। इसका मतलब है कि अभी अगले चार महीने बिगड़ चुके हैं।”


    भारत की क्या है कमजोरी

    भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। लगभग 50% नेचुरल गैस आयात होती है। करीब 40% LNG सिर्फ कतर से आता है। LPG का लगभग 90% आयात मिडिल-ईस्ट से होता है। यही वजह है कि वैश्विक संकट का सीधा असर घरेलू उद्योगों पर पड़ रहा है।

    रेस्टोरेंट और शादी सीजन भी प्रभावित: गैस की कमी का असर सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं है। रेस्टोरेंट, ढाबे और छोटे फूड बिजनेस भी LPG की कमी से जूझ रहे हैं। इसका असर शादी सीजन और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिख रहा है।

    जल्दी राहत की उम्मीद कम: हालांकि सीजफायर की घोषणा हुई है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि हालात जल्द सामान्य नहीं होंगे। ग्लास इंडस्ट्रीज से जुड़े कारोबारी मानते हैं कि अगर युद्ध एक हफ्ता भी बढ़ता है, तो इसका असर कई महीनों तक चलता है।

  • ईरान युद्ध में सऊदी अरब को मिला दोहरा जख्म, तेल सप्लाई के दूसरे रास्ते पर भी हमला

    ईरान युद्ध में सऊदी अरब को मिला दोहरा जख्म, तेल सप्लाई के दूसरे रास्ते पर भी हमला

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी जंग ट्रंप के सीजफायर के ऐलान के बाद थम गई है। लेकिन इसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने में कई वर्ष लग जाएंगे। इस युद्ध  के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल के दामों में उछाल आ गया था। सऊदी अरब ने तेल सप्लाई के अपने दूसरे रास्ते (ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन) का उपयोग करना शुरू कर दिया था। हालांकि, अब सामने आईं रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी हमले में इस पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचा है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही ट्रंप के सीजफायर ऐलान के बाद होर्मुज का रास्ता खुल गया हो, लेकिन इसके बाद भी लाखों बैरल तेल कच्चे बाजार से बाहर होने की आशंका है। सऊदी अरब में मौजूद एक स्त्रोत के मुताबिक ईरान ने अपने हमलों के दौरान सऊदी अरब के कई तेल प्रतिष्ठानों और तेल सप्लाई प्वाइंट्स को निशाना बनाया था। इसमें ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और उसके एक केंद्र (यानबू बंदरगाह) को भी निशाना बनाया गया है। इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब होर्मुज को बायपास करके तेल की सप्लाई को चालू रखता है।

    बता दें, ईरान के साथ बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए ही सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का निर्माण किया था। इसके जरिए तेल सप्लाई को यानबू पर ले जाकर लाल सागर के जरिए आगे बढ़ाया जाता है। इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल सप्लाई होता था। 28 फरवरी के बाद सामने आए शिपिंग डेटा के मुताबिक यानबू की क्षमता करीब 4.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। पिछले कुछ दिनों से यह लगातार अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थी। लेकिन अब इस पर भी हमला करके ईरान ने सऊदी के इस कदम पर भी पानी फेर दिया है।

    तेल प्रतष्ठानों पर हुए इन हमलों की जिम्मेदारी आईआरजीसी ने ली है। बुधवार को जारी एक बयान में आईआरजीसी की तरफ से कहा गया कि फारस की खाड़ी में कई लक्ष्यों के ऊपर मिसाइलों और ड्रोन्स के जरिए हमला किया गया है। इसमें यानबू में मौजूद अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया। यह पहली बार नहीं है कि जब इस संघर्ष के दौरान ईरान ने यानबू बंदरगाह को निशाना बनाने की कोशिश की है। इससे पहले भी ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तमाम ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया था। होर्मुज के ऊपर तेहरान ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी थी। इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल के दाम आसमान छू रहे थे। हालांकि, अब सीजफायर के ऐलान के साथ ही होर्मुज को खोलने पर भी सहमति बनी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कल से होर्मुज अपनी पूरी क्षमता के साथ शुरू भी हो जाता है, तब भी स्थिति को सामान्य होने में कई महीनों का वक्त लग जाएगा।

  • ईरान युद्ध थमने से क्रिप्टो मार्केट में तेजी…. 3 हफ्ते के उच्च स्तर पर पहुंचे Bitcoin के रेट

    ईरान युद्ध थमने से क्रिप्टो मार्केट में तेजी…. 3 हफ्ते के उच्च स्तर पर पहुंचे Bitcoin के रेट


    वाशिंगटन।
    ईरान-अमेरिका युद्ध (Iran-America War) में सीजफायर के बाद बिटकॉइन की कीमतें (Bitcoin Price) तीन हफ्ते के हाई पर पहुंच गई हैं। न्यूयॉर्क ट्रेडिंग (New York Trading) में बिटकॉइन 5% चढ़कर 72,841 डॉलर तक पहुंच गया, जो 18 मार्च के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि, बाद में इसमें हल्की मुनाफावसूली भी देखने को मिली।

    ईथर और अन्य क्रिप्टो में भी उछाल: तेजी सिर्फ बिटकॉइन तक सीमित नहीं रही। ईथेरियम भी 7.5% उछलकर 2,273 डॉलर तक पहुंच गया। यानी पूरे क्रिप्टो मार्केट में निवेशकों का भरोसा लौटा है।

    सीजफायर से बाजार में आई राहत
    डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर हमले रोकने के फैसले ने ग्लोबल मार्केट में पॉजिटिव माहौल बना दिया। इसके बाद शेयर बाजारों में तेजी आई और कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 95 डॉलर से नीचे आ गईं। होर्मूज स्ट्रेट के फिर से खुलने की उम्मीद ने निवेशकों का डर कम किया, जिससे जोखिम वाले ऐसेट्स जैसे क्रिप्टो में खरीदारी बढ़ी।


    खतरा अभी बाकी: टूट सकता है ट्रेंड

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह तेजी स्थायी नहीं भी हो सकती। अगर सीजफायर टूटता है, तो बिटकॉइन फिर से गिरकर 66,000 डॉलर तक जा सकता है। युद्ध शुरू होने के बाद से बिटकॉइन 60,000 से 75,000 डॉलर के बीच ही झूल रहा है।


    शॉर्ट सेलर्स को झटका

    तेजी ने उन ट्रेडर्स को नुकसान पहुंचाया, जो गिरावट पर दांव लगा रहे थे। डेटा के मुताबिक, पिछले 24 घंटों में 250 मिलियन डॉलर से ज्यादा की शॉर्ट पोजीशन खत्म हो गईं। ब्लूमबर्ग ने विशेषज्ञों के हवाले से बताया है कि अगर कीमत 73,500 डॉलर के ऊपर टिकती है, तो बिटकॉइन 80,000 डॉलर तक जा सकता है। ब्लॉकचेन डेटा के अनुसार, अभी स्पॉट मार्केट में मांग उतनी मजबूत नहीं है।

    हालांकि, यूएस में लिस्टेड स्पॉट बिटकॉइन एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स में सोमवार को $471.3 मिलियन का नेट इनफ्लो हुआ। यह पिछले हफ़्ते के $22.3 मिलियन के इनफ्लो से काफी अधिक था। यह संस्थागत निवेशकों की वापसी का शुरुआती संकेत हो सकता है।


    राहत की रैली, पर नजर जरूरी:

    सीजफायर ने क्रिप्टो मार्केट को मजबूती दी है, लेकिन आगे की दिशा पूरी तरह जियो-पॉलिटिकल हालात और निवेशकों की मांग पर निर्भर करेगी। फिलहाल, बाजार में तेजी है, लेकिन जोखिम भी बरकरार है।

  • ईरान युद्ध के बीच दिल्ली के पास आ रहा ढाका; बांग्लादेशी मंत्री संग डोभाल की डिनर डिप्लोमेसी

    ईरान युद्ध के बीच दिल्ली के पास आ रहा ढाका; बांग्लादेशी मंत्री संग डोभाल की डिनर डिप्लोमेसी

    नई दिल्‍ली। मिडिल ईस्ट में तनाव जारी है। इजरायल और अमरिका की ओर से ईरान पर ताबड़तोड़ हमले जारी है। इस बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री भारत पहुंच चुके हैं। भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई शुरुआत और आपसी विश्वास बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ढाका के विदेश मंत्री डॉ खलीलुर रहमान से मुलाकात करेंगे। दोनों नेताओं के बीच यह मुलाकात डिनर टेबल पर होगी।
    इस दौरान दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती प्रदान करने, हाल के दिनों में उत्पन्न तनाव को दूर करने और साझा हितों पर आधारित स्थिर तथा दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करने पर विस्तृत चर्चा करेंगे। यह मुलाकात प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी सरकार द्वारा दोनों देशों के बीच ‘नए रिश्ते’ की नींव रखने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा मानी जा रही है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इस उच्चस्तरीय बैठक में सीमा प्रबंधन, व्यापार, सुरक्षा सहयोग और जल संसाधनों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी विचार-विमर्श होने की संभावना है।

    मोहम्मद यूनुस के अंतरिम सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके अनुभवी राजनयिक खलीलुर रहमान फरवरी में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की भारी जीत के बाद भारत आने वाले पहले वरिष्ठ मंत्री हैं। उनके साथ प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सलाहकार हुमायून कबीर भी शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, हाल के वर्षों में बांग्लादेश के साथ संबंधों को मजबूत करने में एनएसए डोभाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दोनों नेताओं की यह मुलाकात पिछले कुछ समय में उत्पन्न तनाव को दूर कर संबंधों को फिर से पटरी पर लाने का अवसर होगी।
    इनसे भी मिलेंगे बांग्लादेशी मंत्री

    बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को जारी बयान में कहा कि विदेश मंत्री रहमान अपनी भारतीय समकक्षों, जिनमें एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर शामिल हैं, से मुलाकातों के दौरान ‘गरिमा, आपसी विश्वास, सम्मान और साझा हितों पर आधारित द्विपक्षीय संबंधों की स्थिरता तथा निरंतर विकास’ पर जोर देंगे।

    बयान में उम्मीद जताई गई है कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच सहयोग को अधिक फलदायी और टिकाऊ बनाने के लिए मजबूत आधार तैयार करेगी।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, रहमान बुधवार को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी से भी मुलाकात करेंगे।

    पुरी के साथ बैठक खासतौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि ढाका ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से उत्पन्न ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अतिरिक्त ईंधन, खासकर डीजल की आपूर्ति की मांग की है।
    इन मुद्दों पर चर्चा संभव

    सूत्रों का कहना है कि चर्चा के प्रमुख मुद्दों में भारतीय वीजा प्रतिबंधों में ढील (खासकर पर्यटकों और व्यापारियों के लिए), 2025 में संबंधों में आई गिरावट के बाद बंद किए गए भारतीय भूमि और समुद्री बंदरगाहों तक पहुंच बहाल करना, दिसंबर में समाप्त हो रही गंगा जल संधि के नवीनीकरण में तेजी लाना और सीमा पर बांग्लादेशी नागरिकों पर भारतीय सीमा सुरक्षा बलों द्वारा गोलीबारी शामिल हैं। वहीं, भारतीय पक्ष का कहना है कि सीमा रक्षक तस्करों और आपराधिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि बांग्लादेशी पक्ष घातक बल के बजाय ऐसे व्यक्तियों की गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई की वकालत करता है।

    बता दें कि रहमान की यात्रा से पहले भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने सोमवार को ढाका में प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की और द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा की। उच्चायोग ने सोशल मीडिया पर बताया कि बैठक में दोनों देशों की राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप जन-केंद्रित सहयोग पर जोर दिया गया। वर्मा ने कहा कि भारत बांग्लादेश सरकार और लोगों के साथ ‘पारस्परिक हित और लाभ पर आधारित सकारात्मक, रचनात्मक तथा दूरदर्शी दृष्टिकोण’ अपनाते हुए काम करने का इरादा रखता है।
  • ईरान युद्ध टलने के ऐलान से चमके सोना-चांदी… दोनों की कीमतों में जबरदस्त उछाल

    ईरान युद्ध टलने के ऐलान से चमके सोना-चांदी… दोनों की कीमतों में जबरदस्त उछाल


    नई दिल्ली।
    डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) पर हमले दो हफ्तों के लिए टालने का ऐलान किया है। इस फैसले के बाद सोने की कीमतों में जोरदार तेजी देखने को मिली है। एमसीएक्स पर चांदी की कीमत (Silver Price) 6% या 13,000 रुपये से अधिक बढ़कर 2,44,770 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई, जबकि एमसीएक्स पर सोने की कीमत (Gold Price ) 2.4% या 3600 रुपये से अधिक बढ़कर 1,53,944 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई।

    इंटरनेशनल मार्केट में भी स्पॉट गोल्ड 2.3% चढ़कर 4,811.66 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स 3.3% की तेजी के साथ 4,840 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर बंद हुए।


    बाजार में ‘रिलीफ रैली’, आगे भी दिख सकता है उतार-चढ़ाव

    विशेषज्ञों के मुताबिक, यह तेजी फिलहाल “रिलीफ रैली” है। ब्लूमबर्ग ने एक्सपर्ट ताई वोंग के हवाले से बताया है कि सोने के लिए 4,930 डॉलर और 5,000 डॉलर के स्तर अहम रेजिस्टेंस बने रहेंगे। हालांकि, आगे की चाल इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान इस युद्धविराम का पालन करता है या नहीं।


    पाकिस्तान की मध्यस्थता से बातचीत की उम्मीद

    पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता खुलता दिख रहा है। खबरों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में बातचीत शुरू हो सकती है। हालांकि, ईरान ने साफ किया है कि बातचीत का मतलब यह नहीं है कि तनाव पूरी तरह खत्म हो गया है।


    सोने के लिए ऊर्जा कीमतें और महंगाई बनी बड़ी चिंता

    ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव अब भी बाजार के लिए बड़ा जोखिम बना हुआ है। अगर तेल की कीमतें फिर बढ़ती हैं, तो इससे वैश्विक महंगाई बढ़ सकती है और केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरों पर फैसला लेना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे माहौल में सोना पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन ऊंची ब्याज दरें इसकी तेजी को सीमित भी कर सकती हैं।


    चांदी और अन्य धातुओं में भी तेजी

    सोने के साथ-साथ अन्य कीमती धातुओं में भी उछाल देखने को मिला। स्पॉट सिल्वर 4.3% बढ़कर 76.08 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई। प्लैटिनम 2.4% चढ़ा, जबकि पैलेडियम में 2.1% की बढ़त दर्ज की गई।


    राहत के संकेत, लेकिन अनिश्चितता बरकरार

    ट्रंप के फैसले से फिलहाल बाजार को राहत जरूर मिली है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सोने की कीमतों में आगे भी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, क्योंकि बाजार अब अमेरिका-ईरान वार्ता और वैश्विक आर्थिक संकेतों पर नजर रखे हुए है।

  • कूटनीतिक सफलता…. ईरान युद्ध के बीच होर्मुज से अब तक निकले तेल-गैस से भरे भारत के 9 जहाज

    कूटनीतिक सफलता…. ईरान युद्ध के बीच होर्मुज से अब तक निकले तेल-गैस से भरे भारत के 9 जहाज


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष (West Asia Crisis) के बीच ईरान (Iran) ने समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लगभग बंद कर दिया है। इससे खाड़ी देशों से गैस और तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में तेल की कीमतों में आग लगी है। लेकिन, भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिन्होंने इस जोखिम भरे रास्ते से तेल और गैस से भरे सबसे अधिक जहाज सुरक्षित निकाले हैं। होर्मुज फारस और ओमान की खाड़ी के बीच एक संकरा समुद्री मार्ग है। ओमान और ईरान के बीच स्थित होर्मुज जलमार्ग एक जगह मात्र 33 किलोमीटर चौड़ा है। यह फारस की खाड़ी को शेष दुनिया से जोड़ता है।

    इस रास्ते से दुनिया का लगभग 20 फीसदी कच्चे तेल का नौवहन होता है। 28 फरवरी को अमेरिका-इस्राइल की ओर से हमला किए जाने के बाद ईरान ने इस मार्ग की नाकेबंदी कर दी है। कुछ तेल टैंकरों को ईरान ने निशाना भी बनाया है। लेकिन ईरान से अपने ऐतिहासिक संबंधों और मजबूत कूटनीति के जरिये भारत होर्मुज के रास्ते अब तक तेल और गैस से भरे 9 जहाज सुरक्षित निकाल लाने में सफल रहा है। इनमें से 8 जहाज भारतीय तट पर पहुंच गए हैं, जबकि एक पहुंचने वाला है।


    सबसे पहले जहाज पार कराया था

    पश्चिम एशिया में संघर्ष के बीच भारत ने सबसे पहले घरेलू लिक्विफाइड पेट्रोलिमय गैस (एलपीजी) से भरे दो जहाजों को होर्मुज पार कराया था। शिवालिक और नंदा देवी नामक इन दोनों टैंकरों को ईरान की नौसेना ने ही अपनी सुरक्षा में होर्मुज को पार कराा था। हालांकि, भारत ने भी अपने जहाजों की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में पोत तैनात कर रखे हैं। शिवालिक और एमटी नंदा देवी 92,712 टन एलपीजी लेकर आए थे। शिवालिक 16 मार्च को गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह और नंदा देवी उसके अगले दिन 17 मार्च को गुजरात के ही कांडला बंदरगाह पहुंचा था।


    जग लाडकी से जगत वसंत तक, भारत पहुंचे कई जहाज

    जग लाडकी संयुक्त अरब अमीरात से 80,886 टन कच्चा तेल लेकर 18 मार्च को मुंद्रा बंदरगाह पहुंचा था। इसके बाद पाइन गैस और जग वसंत 92,612 टन एलपीजी लेकर 26 और 28 मार्च को भारत पहुंचे थे। 94,000 टन एलपीजी लेकर बीडब्ल्यू टीवाईआर और बीडब्ल्यू ईएलएम भी आए हैं। बीडब्ल्यू टीवाई 31 मार्च को मुंबई और बीडब्ल्यू ईएलएम 1 अप्रैल को मंगलोर बंदरगाह पहुंचा था। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लगभग 44,000 टन एलपीजी लेकर सी बर्ड 2 अप्रैल को मंगलोर बंदरगाह पहुंचा था। यह ईरान से एलपीजी लेकर आया है। सात साल में पहली बार भारत ने ईरान से गैस खरीदा है।


    ईरान के साथ भुगतान की समस्या नहीं कच्चे तेल की आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित

    केंद्र सरकार ने शनिवार को कहा कि ईरान से कच्चे तेल के आयात के लिए भुगतान संबंधी कोई समस्या नहीं है और रिफाइनरियां तेहरान के साथ दुनियाभर के विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं से तेल हासिल कर रही हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में उन खबरों को खारिज किया, जिनमें दावा किया गया था कि ईरानी कच्चा तेल ले जा रहा एक तेल टैंकर अपने पहले से संकेतित गंतव्य भारत के बजाय चीन की ओर मुड़ गया है।

    मंत्रालय ने कहा कि ये दावे उद्योग के उस सामान्य अभ्यास की अनदेखी करते हैं, जहां परिचालन लचीलेपन के आधार पर यात्रा के दौरान कार्गो अपना गंतव्य बदल सकते हैं। यदि यह खेप भारत आती, तो लगभग सात वर्षों में ऐसी पहली खेप होती। मंत्रालय ने इन दावों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया कि भुगतान बाधाओं के कारण कार्गो को गुजरात के वाडिनार के बजाय चीन की ओर मोड़ा गया था। मंत्रालय ने कहा कि ईरानी कच्चे तेल के आयात के लिए भुगतान की कोई बाधा नहीं है।

    मंत्रालय ने स्पष्ट किया, भारत 40 से अधिक देशों से कच्चे तेल का आयात करता है, और कंपनियों के पास विभिन्न स्रोतों और भौगोलिक क्षेत्रों से तेल प्राप्त करने का पूर्ण लचीलापन है। मंत्रालय के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने ईरान सहित अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं को सुरक्षित कर लिया है। जहाजों पर नजर रखने वाली फर्म केपलर ने शुक्रवार को कहा था कि 2002 में निर्मित और 2025 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित टैंकर पिंग शुन अब गुजरात के वाडिनार के बजाय चीन के डोंगयिंग को अपना गंतव्य बता रहा है।

  • ट्रंप ने ईरान युद्ध के बीच फोड़ा टैरिफ बम… दवाओं पर 100, स्टील-एल्यूमीनियम पर 50 शुल्क का ऐलान

    ट्रंप ने ईरान युद्ध के बीच फोड़ा टैरिफ बम… दवाओं पर 100, स्टील-एल्यूमीनियम पर 50 शुल्क का ऐलान


    वॉशिंगटन।
    ईरान युद्ध (Iran War) के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने गुरुवार को अपनी “अमेरिका फर्स्ट” वाली आर्थिक नीति को और अधिक कड़ा करते हुए स्टील, एल्युमीनियम, तांबा और विदेशी दवाओं पर नए आयात शुल्क नियमों की घोषणा की है। इन बदलावों का उद्देश्य न केवल आयात प्रक्रिया को सरल बनाना है, बल्कि विदेशी दवा कंपनियों और धातु निर्यातकों पर दबाव डालना है ताकि वे अपनी निर्माण यूनिट अमेरिका में स्थापित करें।

    ट्रंप प्रशासन ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 232 के तहत स्टील, एल्युमीनियम और तांबे के आयात पर 50% का आयात शुल्क बरकरार रखा है। हालांकि, अब इसे गणना करने के तरीके में बड़ा बदलाव किया गया है। अब यह शुल्क आयातित वस्तु के उस मूल्य पर लगेगा जो अमेरिकी ग्राहक भुगतान करते हैं, न कि केवल धातु की मात्रा पर।

    ट्रंप ने क्यों लगाए नए टैरिफ?
    इस बदलाव के पीछे का मुख्य कारण ‘अंडर-रिपोर्टिंग’ को रोकना है। प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, कई आयातक शुल्क कम करने के लिए कृत्रिम रूप से आयात मूल्य को कम दिखाते थे। नया नियम इस विसंगति को दूर करेगा।

    यदि किसी उत्पाद में धातु का वजन 15% से कम है, तो उस पर से 50% का पिछला शुल्क पूरी तरह हटा दिया गया है। 15% से अधिक धातु सामग्री वाले भारी मशीनों, वाशिंग मशीन या गैस स्टोव जैसे उत्पादों पर अब धातु की मात्रा के बजाय पूरे उत्पाद के मूल्य पर 25% फ्लैट शुल्क लगेगा। विदेश में बने लेकिन पूरी तरह से अमेरिकी स्टील या तांबे से निर्मित उत्पादों पर रियायती दर से केवल 10% शुल्क लगेगा। बिजली ग्रिड और औद्योगिक उपकरणों के लिए टैरिफ को 50% से घटाकर 15% कर दिया गया है, ताकि अमेरिका में बुनियादी ढांचे के निर्माण में तेजी लाई जा सके।

    विदेशी दवाओं पर 100% तक शुल्क
    ट्रंप ने दवा निर्माताओं को अमेरिका में उत्पादन बढ़ाने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से एक बड़ा दांव खेला है। कुछ खास आयातित दवाओं पर अब 100% तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। यह नया नियम उन पेटेंट दवाओं पर लागू होगा जो उन देशों में बनती हैं जिनका अमेरिका के साथ कोई टैरिफ समझौता नहीं है। बड़ी दवा कंपनियों के लिए ये नियम 120 दिनों में लागू होंगे, जबकि छोटे निर्माताओं को 180 दिनों की मोहलत दी गई है। यह कदम सीधे तौर पर उन कंपनियों को टारगेट करता है जिन्होंने अमेरिका के साथ ‘मोस्ट-फेवर्ड-नेशन’ मूल्य निर्धारण समझौता नहीं किया है।


    राजस्व में होगा इजाफा

    वाइट हाउस का मानना है कि पहले का टैरिफ ढांचा अत्यंत जटिल था, जिससे आयातकों को हर पुर्जे में धातु की मात्रा निर्धारित करने में सिरदर्द होता था। प्रशासन के अधिकारी ने कहा, “अब यह आसान, सरल और सीधा है। कई उत्पादों के लिए दरें कम होंगी, कुछ के लिए थोड़ी बढ़ेंगी, लेकिन कुल मिलाकर यह उद्योग के लिए अनुकूल है।” प्रशासन को उम्मीद है कि इस नए ढांचे से सरकार के राजस्व में भी वृद्धि होगी क्योंकि अब शुल्क पूरे बिक्री मूल्य पर वसूला जाएगा।

    यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका पहले से ही ईरान के साथ युद्ध और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों से जूझ रहा है। रक्षा सचिव द्वारा हाल ही में किए गए सैन्य फेरबदल और अब इन कड़े व्यापारिक नियमों से साफ है कि ट्रंप प्रशासन अपने दूसरे कार्यकाल में आर्थिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर एक आक्रामक और आत्मनिर्भर अमेरिका की छवि पेश करना चाहता है।

  • ईरान युद्ध के बीच ट्रंप की धमकी… 4 साल से जंग लड़ रहा ये छोटा सा देश बन सकता है बलि का बकरा!

    ईरान युद्ध के बीच ट्रंप की धमकी… 4 साल से जंग लड़ रहा ये छोटा सा देश बन सकता है बलि का बकरा!


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) नाटो (NATO) समूह के अन्य साथी देशों पर बुरी तरह भड़के हुए हैं। ईरान युद्ध (Iran War) के बीच नाटो देशों ने अमेरिका को एक के बाद एक झटके दिए हैं जिससे ट्रंप खिसियाए हुए हैं और यह धमकी भी दी है कि अमेरिका खुद को नाटो से अलग कर लेगा। इस बीच अब खबर है कि इन सब का खामियाजा एक छोटे से देश को भुगतना पड़ सकता है। यह देश है यूक्रेन। बीते 4 सालों से खुद रूस के साथ जंग लड़ रहा यूक्रेन अब ईरान युद्ध में बलि का बकरा बन सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यूरोपीय देशों पर दबाव बनाने के लिए ट्रंप यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई पर रोक लगाने की बात कर रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने हाल ही में यूक्रेन के लिए हथियारों की सप्लाई रोकने की धमकी दी है। सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि ट्रंप की इस धमकी का मकसद पश्चिमी देशों पर दबाव डालना है ताकि वे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवाने के अमेरिका की मदद करें। विश्लेषकों के अनुसार, यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध के बीच नाटो सहयोगियों के लिए ट्रंप का यह बयान बेहद चिंता का विषय है।

    कई देशों ने दिया झटका
    ट्रंप की यह धमकी नाटो देशों से मिले झटके के बाद आई है। फ्रांस, स्पेन, इटली समेत कई देशों ने ट्रंप को करारा झटका देते हुए ट्रंप को अपने बेस इस्तेमाल करने देने से इनकार कर दिया है। वहीं कई पश्चिमी देशों ने ट्रंप के उस प्लान का हिस्सा बनने से भी इनकार दिया, जिसके तहत ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवाने के लिए एक गठबंधन बनाने का ऐलान किया था। यूरोपीय देशों ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया है कि यह उनकी लड़ाई नहीं है।

    बता दें कि ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से दुनिया के सबसे प्रमुख जलमार्ग में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद है और ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बना रहा है, जिससे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके बाद अब ट्रंप इस रास्ते को खुलवाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं।

    नाटो को बताया ‘कागजी शेर’
    इसके बाद से ट्रंप नाटो देशों पर लगातार हमलवार हैं। ट्रंप ने टेलीग्राफ को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि वह उस नाटो सदस्यता को समाप्त करने पर विचार कर रहे हैं। ट्रंप ने नाटो से संभावित अलगाव पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा, “हां, यह अब इस पर विचार किया जा रहा है। कभी भी नाटो से प्रभावित नहीं रहा। मुझे हमेशा पता था कि यह एक ‘पेपर टाइगर’ है, और (रूस के राष्ट्रपति) व्लादिमीर पुतिन भी यह जानते हैं।”

    लंबे समय से की है आलोचना
    गौरतलब है कि ट्रंप लंबे समय से नाटो की आलोचना करते रहे हैं और इसे अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर बताते हुए कई बार इससे बाहर निकलने की चेतावनी दे चुके हैं। हालांकि अमेरिकी कानून के तहत नाटो से बाहर निकलने या सदस्यता निलंबित करने के लिए वाइट हाउस को सीनेट की “सलाह और सहमति” प्राप्त करनी होती है, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है।