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  • रूसी तेल को लेकर अमेरिका पर ईरान का तंज, कहा- 'भारत समेत दुनिया के सामने भीख मांग रहा अमेरिका'

    रूसी तेल को लेकर अमेरिका पर ईरान का तंज, कहा- 'भारत समेत दुनिया के सामने भीख मांग रहा अमेरिका'


    तेहरान। ईरान के विदेश मंत्री अब्‍बास अराघची (Abbas Araghchi) ने रूसी तेल के मुद्दे पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जो अमेरिका (United States) पहले भारत समेत कई देशों पर रूस (Russia) से तेल आयात रोकने के लिए दबाव बना रहा था, वही अब दुनिया के देशों से रूसी कच्चा तेल खरीदने की गुहार लगा रहा है।

    अराघची ने यह टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (Twitter) पर की। उन्होंने अपनी पोस्ट में Financial Times की एक रिपोर्ट भी साझा की, जिसमें कहा गया है कि ईरान से जुड़े युद्ध ने रूस की तेल इंडस्ट्री को बड़ा फायदा पहुंचाया है।

    अमेरिका पर साधा निशाना

    अराघची ने पोस्ट में लिखा कि अमेरिका ने महीनों तक India को रूस से तेल आयात बंद करने के लिए धमकाया। लेकिन ईरान के साथ दो हफ्ते के युद्ध के बाद अब White House दुनिया के देशों—जिनमें भारत भी शामिल है—से रूसी कच्चा तेल खरीदने की अपील कर रहा है।
    उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप को लगा था कि ईरान के खिलाफ कथित अवैध युद्ध का समर्थन करने से उसे रूस के खिलाफ अमेरिका का साथ मिलेगा।

    रूसी तेल खरीदने पर अस्थायी राहत

    अराघची की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent ने हाल ही में कहा कि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर लगे प्रतिबंध में अस्थायी ढील देने का फैसला किया है।
    उन्होंने बताया कि वित्त विभाग ने 30 दिनों के लिए उस रूसी तेल को खरीदने की अनुमति दी है जो पहले से समुद्र में मौजूद है। कुछ दिन पहले भारत को भी इसी तरह की राहत दी गई थी।

    बेसेंट के मुताबिक, इस फैसले का उद्देश्य वैश्विक तेल आपूर्ति को बनाए रखना और ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाना है। उन्होंने कहा कि इससे रूस को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि जिस तेल को मंजूरी दी गई है वह पहले से ही समुद्र में है।

    ईरान युद्ध से रूस को बड़ा फायदा

    वहीं Financial Times की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान से जुड़े युद्ध और तेल संकट के कारण रूस को रोजाना लगभग 150 मिलियन डॉलर (करीब 1389 करोड़ रुपये) की अतिरिक्त कमाई हो रही है। इसकी एक वजह यह भी बताई जा रही है कि ईरान ने Strait of Hormuz को बंद कर दिया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि संघर्ष के शुरुआती 12 दिनों में ही रूस ने तेल निर्यात से लगभग 1.3 से 1.9 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय अर्जित की। यदि मौजूदा कीमतें इसी तरह बनी रहती हैं तो महीने के अंत तक Moscow को 3.3 अरब से 5 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है।

  • मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच CBSE ने GCC देशों में 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को रद्द किया

    मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच CBSE ने GCC देशों में 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को रद्द किया


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल अमेरिका के हालिया संघर्ष के चलते तनावपूर्ण स्थिति बढ़ने के बीच भारतीय दूतावासों ने छात्रों और अभिभावकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की है। इस अपडेट में सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं को बहरीन ईरान कुवैत ओमान कतर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में रद्द करने की घोषणा की है। यह निर्णय छात्रों की सुरक्षा और शिक्षण गतिविधियों पर पड़ रहे प्रभावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

    ओमान में भारतीय दूतावास ने बताया कि यह एडवाइजरी पहले जारी 01.03.2026 03.03.2026 05.03.2026 07.03.2026 और 09.03.2026 के सर्कुलरों का अपडेशन है। इन सर्कुलरों के माध्यम से प्रभावित देशों में स्कूलों और संबंधित अधिकारियों से मिले इनपुट और अपील के आधार पर बोर्ड ने 12वीं क्लास की परीक्षाओं की समीक्षा की। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि 16 मार्च से लेकर 10 मार्च तक निर्धारित सभी परीक्षाएं रद्द कर दी गई हैं। इसके साथ ही पहले स्थगित की गई परीक्षाओं की तारीखें भी पूरी तरह रद्द होंगी।

    इस निर्णय का उद्देश्य न केवल छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि उनके परिणाम सही समय पर घोषित किए जाएं। एडवाइजरी में यह भी कहा गया कि परीक्षा स्थगित होने के बाद रिजल्ट जारी करने की प्रक्रिया और तरीका बाद में अलग से बताया जाएगा। इससे पहले दूतावास ने कहा था कि सीबीएसई 10 मार्च को स्थिति की पुनः समीक्षा करेगा और 12 मार्च से होने वाली परीक्षाओं के लिए सही निर्णय लेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण ओमान में भारतीय दूतावास ने पहले भी 9 10 और 11 मार्च को होने वाली 12वीं बोर्ड परीक्षाओं को फिलहाल टालने की जानकारी साझा की थी। यह कदम ईरान इजरायल युद्ध और वहां की सुरक्षा स्थिति के मद्देनजर छात्रों और उनके परिवारों के हित में उठाया गया। दूतावास ने यह भी बताया कि सभी संबंधित स्कूलों और अधिकारियों को बोर्ड ने सीधे निर्देश दिए हैं कि परीक्षा स्थगित होने की जानकारी तुरंत छात्रों तक पहुँचाई जाए।

    इस स्थिति से प्रभावित छात्रों और अभिभावकों के लिए राहत की बात यह है कि बोर्ड ने पहले से ही स्पष्ट कर दिया है कि परीक्षाओं के परिणामों को घोषित करने की प्रक्रिया सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से की जाएगी। इस बीच छात्रों को आवश्यकतानुसार ऑनलाइन अध्ययन सामग्री और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है ताकि उनका अकादमिक नुकसान कम से कम हो।

    इस निर्णय से यह भी साफ हो जाता है कि वैश्विक तनाव और सुरक्षा स्थिति सीधे तौर पर शिक्षा पर प्रभाव डाल सकती है। सीबीएसई का यह कदम छात्रों की सुरक्षा मानसिक शांति और शिक्षण गतिविधियों की निरंतरता को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • भारत आ रहे एलपीजी टैंकरों की सुरक्षा को लेकर भारत सतर्क, फारस की खाड़ी के पास नौसेना के युद्धपोत तैनात

    भारत आ रहे एलपीजी टैंकरों की सुरक्षा को लेकर भारत सतर्क, फारस की खाड़ी के पास नौसेना के युद्धपोत तैनात


    तेहरान। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए कदम तेज कर दिए हैं। भारतीय नौसेना ने फारस की खाड़ी के आसपास अपने कई युद्धपोत तैनात कर दिए हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर भारत की ओर आने वाले व्यापारिक जहाजों को सहायता और सुरक्षा दी जा सके।

    सूत्रों के मुताबिक इन युद्धपोतों की तैनाती का उद्देश्य भारतीय व्यापारिक जहाजों और उनके चालक दल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, क्योंकि क्षेत्र में हालात लगातार संवेदनशील बने हुए हैं।

    दो भारतीय एलपीजी जहाजों को मिली अनुमति

    इस बीच शनिवार को ईरान ने भारत की ओर जा रहे दो भारतीय झंडे वाले एलपीजी जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दे दी। इनमें एक जहाज शिवालिक है, जो जहाज ट्रैकिंग वेबसाइट के अनुसार फिलहाल ओमान के पास देखा गया है और इसके 21 मार्च तक अपने गंतव्य तक पहुंचने की संभावना है।

    भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर नजर

    बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने शुक्रवार को फारस की खाड़ी की समुद्री स्थिति और भारतीय जहाजों व नाविकों की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दी। मंत्रालय के मुताबिक फारस की खाड़ी में 24 भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर 668 भारतीय नाविक तैनात हैं, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य के पूर्व में तीन जहाजों पर 76 भारतीय नाविक मौजूद हैं।

    24 घंटे निगरानी कर रही सरकार

    मंत्रालय ने बताया कि डीजी शिपिंग जहाज मालिकों, आरपीएसएल एजेंसियों और भारतीय मिशनों के साथ लगातार समन्वय बनाए हुए है। सभी जहाजों और चालक दल की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। 24 घंटे के नियंत्रण कक्ष के सक्रिय होने के बाद से अब तक 2,425 से अधिक कॉल और 4,441 ईमेल प्राप्त हुए हैं। इसके साथ ही 223 से ज्यादा फंसे भारतीय नाविकों की सुरक्षित वापसी भी सुनिश्चित की गई है।

    ईरान ने सुरक्षित रास्ता देने का भरोसा दिया

    भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहाली ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद ईरान भारत की ओर जाने वाले जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराएगा। उन्होंने भारत और ईरान को पुराने मित्र बताते हुए कहा कि दोनों देशों के हित और भविष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

    होर्मुज जलडमरूमध्य विवाद पर ईरान का बयान

    वहीं भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा कि ईरान कभी भी होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना नहीं चाहता था। उन्होंने मौजूदा हालात के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वैश्विक नेताओं को युद्ध रोकने के लिए उन पर दबाव बनाना चाहिए, क्योंकि बढ़ती तेल कीमतों का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।

  • ईरान ने भारत से बुलाए 180 नौसैनिक, कोच्चि से उड़ान भरेंगे; अमेरिकी हमले में मृतकों के शव भी लौटाए जा रहे

    ईरान ने भारत से बुलाए 180 नौसैनिक, कोच्चि से उड़ान भरेंगे; अमेरिकी हमले में मृतकों के शव भी लौटाए जा रहे



    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने एक संवेदनशील कूटनीतिक मिशन अंजाम दिया है। ईरान ने अपने युद्धपोत IRIS Lavan के लगभग 180 गैर-जरूरी नौसैनिकों को भारत के कोच्चि से स्वदेश लौटाने की विशेष व्यवस्था की है। साथ ही, श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी हमले में मारे गए नौसैनिकों के शव भी भारत के माध्यम से ईरान भेजे जा रहे हैं।

    सूत्रों के अनुसार, जहाज को 1 मार्च को तकनीकी खराबी के चलते आपातकालीन डॉकिंग की अनुमति मिली थी और यह 4 मार्च से कोच्चि में खड़ा है। जहाज पर कुल 183 चालक दल मौजूद थे, जिन्हें भारतीय नौसेना की सुविधाओं में रखा गया था। अब 180 गैर-जरूरी नाविकों को तुर्की एयरलाइन की उड़ान से पहले आर्मेनिया ले जाया जाएगा, और वहां से सड़क मार्ग के जरिए ईरान भेजा जाएगा। जबकि कुछ तकनीकी और आवश्यक कर्मचारी जहाज पर ही रहेंगे।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर हमला किया था। इस हमले में कुल 130 नाविक सवार थे, जिनमें से 32 को बचा लिया गया, जबकि दर्जनों अभी भी लापता हैं।

    भारत इस समय गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। देश में रसोई गैस की कमी और जनजीवन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में भारत ने अपने बंदरगाहों पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए ईरान के साथ लगातार कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी समकक्ष अब्बास अरागची से चार बार फोन पर बातचीत कर सुरक्षा और ऊर्जा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।

    भारतीय नौसेना ने ईरान की विशेष परिवहन मांग को पूरा किया। कोच्चि से उड़ान भरने वाले नौसैनिक और शवों की सुरक्षित हवाई व सड़क मार्ग से वापसी क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-ईरान कूटनीति के लिहाज से अहम मानी जा रही है। यह मिशन मध्य पूर्व युद्ध और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव के बीच बेहद संवेदनशील और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

  • लंबी जंग के लिए तैयार ईरान, कहा- टकराव बढ़ा तो हिल सकती है वैश्विक अर्थव्यवस्था

    लंबी जंग के लिए तैयार ईरान, कहा- टकराव बढ़ा तो हिल सकती है वैश्विक अर्थव्यवस्था

    तेहरान। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने साफ संकेत दिया है कि वह लंबी अवधि तक चलने वाले युद्ध के लिए तैयार है। ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जारी रहा तो इसका असर पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ेगा और वैश्विक बाजारों में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
    यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान ने दो वाणिज्यिक जहाजों पर गोलीबारी की और अमेरिका या उसके सहयोगियों से जुड़े जहाजों को चेतावनी जारी की है। साथ ही ईरान ने वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। दूसरी ओर अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि युद्ध जल्द खत्म हो सकता है और ईरान में अब अमेरिकी सेना के लिए निशाना बनाने योग्य बहुत कम लक्ष्य बचे हैं।

    तेल बाजार में उथल-पुथल

    दरअसल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों और ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की मौत के बाद क्षेत्र में संघर्ष तेज हो गया था। इसके बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है।

    कीमतों को काबू में रखने के लिए International Energy Agency (IEA) ने सदस्य देशों के साथ मिलकर अपने भंडार से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने का फैसला किया है। इसे अब तक की सबसे बड़ी रणनीतिक तेल आपूर्ति मानी जा रही है।

    जहाजों पर हमले और कंपनियों की चिंता

    संघर्ष के 12वें दिन ईरान की Islamic Revolutionary Guard Corps ने उन आर्थिक संस्थानों और बैंकों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है, जिन्हें वह अमेरिका और इजरायल से जुड़ा मानता है। इसके बाद कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने Dubai से अपने कर्मचारियों को निकालना शुरू कर दिया है।

    ईरान का दावा है कि उसने लाइबेरिया के झंडे वाले कंटेनर जहाज “एक्सप्रेस रोम” और थाई मालवाहक पोत “मयूरी नारी” पर हमला किया, क्योंकि वे चेतावनी के बावजूद Strait of Hormuz में दाखिल हुए थे।

    Royal Navy of Oman ने जहाज से 20 चालक दल के सदस्यों को बचा लिया, जबकि तीन लोगों की तलाश जारी है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा

    विश्लेषकों का कहना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है तो इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा। इस समुद्री मार्ग से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी का परिवहन होता है, साथ ही वैश्विक उर्वरक आपूर्ति का भी बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

    फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने जी-7 देशों से अपील की है कि जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही जल्द बहाल कराने के लिए कदम उठाए जाएं। वहीं United Nations ने सभी पक्षों से मानवीय सहायता सामग्री के आवागमन की अनुमति देने का आग्रह किया है।

    खाड़ी क्षेत्र में हमले जारी

    इस बीच Dubai सरकार ने बताया कि दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास दो ड्रोन गिरने से चार लोग घायल हो गए।

    वहीं Salalah Port पर हुए ड्रोन हमले में ईंधन टैंकों को निशाना बनाया गया, जिससे लाखों लीटर तेल में आग लग गई। हालांकि इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

    दूसरी ओर इजरायल ने ईरान और लेबनान में Hezbollah के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर नए हमले शुरू करने का दावा किया है। Beirut में एक बहुमंजिला आवासीय इमारत पर हवाई हमले से इमारत को भारी नुकसान पहुंचा और आसपास खड़ी कई गाड़ियां क्षतिग्रस्त हो गईं।

    ईरान में सुरक्षा अलर्ट

    ईरान के राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख Ahmad Reza Radan ने कहा है कि सुरक्षा बल पूरी तरह सतर्क हैं और किसी भी विरोध प्रदर्शन को दुश्मन की गतिविधि माना जाएगा। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार अमेरिका और इजरायल के हमलों में अब तक 1200 से अधिक लोगों की मौत और 10 हजार से ज्यादा नागरिकों के घायल होने की जानकारी सामने आई है, हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

  • ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच भारत-ईरान बातचीत: जहाजों की अनुमति पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं, ऊर्जा और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे

    ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच भारत-ईरान बातचीत: जहाजों की अनुमति पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं, ऊर्जा और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे

    नई दिल्ली। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष का आज 13वां दिन है। मध्य-पूर्व में युद्ध और तनाव के बीच भारत और ईरान के विदेश मंत्रियों ने पिछले कुछ दिनों में तीन बार बातचीत की है। यह जानकारी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी।

    जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान ने भारत जाने वाले जहाजों को अनुमति दी है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस विषय पर अधिक जानकारी देना जल्दबाजी होगी। हाल की बातचीत में समुद्री शिपिंग की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि भारत ने ईरान के दिवंगत नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को औपचारिक श्रद्धांजलि दी थी। विदेश सचिव ने 5 मार्च को ईरानी दूतावास में जाकर शोक-पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए। मंत्रालय ने कहा कि यह औपचारिकता पहले दिन पूरी कर दी गई और बिना तथ्यात्मक जानकारी के टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

    उधर, रूस ने अमेरिका और इजराइल से ईरान पर हमले रोकने और बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने कहा कि पूरे क्षेत्र में मानवीय स्थिति बेहद कठिन होती जा रही है और लगातार बढ़ता तनाव गंभीर चिंता का विषय है। रूस की अपील है कि दोनों पक्ष वार्ता के रास्ते पर लौटें और संघर्ष को रोकें।

    संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी UNHCR ने भी चेताया है कि इस संघर्ष के कारण अब तक करीब 32 लाख लोग ईरान में विस्थापित हो चुके हैं। यह आंकड़ा देशभर में शुरुआती आकलन पर आधारित है। एजेंसी ने कहा कि अगर संघर्ष जारी रहा, तो विस्थापित लोगों की संख्या और बढ़ सकती है, जिससे मानवीय संकट और गहरा जाएगा।

    ईरान ने भी स्पष्ट चेतावनी दी है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ ने कहा कि यदि ईरान के किसी भी द्वीप पर हमला किया गया, तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि फारस की खाड़ी में हमलावरों के खिलाफ पूरी ताकत से जवाब देने में किसी प्रकार की सीमा नहीं मानी जाएगी।

    इस बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने GCC (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) के प्रस्ताव का समर्थन किया। इस प्रस्ताव का मकसद खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और हमलों को रोकना, जहाजों की आवाजाही सुरक्षित बनाना और ऊर्जा सप्लाई में बाधा से बचाना है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि ईरान के हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं और इससे वैश्विक शांति को गंभीर खतरा है। प्रस्ताव को 135 देशों ने समर्थन दिया। सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 13 ने पक्ष में वोट किया, जबकि रूस और चीन ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत लगातार ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए है। युद्ध का असर केवल एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के कई देशों और उनके नागरिकों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राथमिकता है कि भारतीय नागरिकों और ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।

    जायसवाल ने बताया कि बातचीत के दौरान समुद्री शिपिंग सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे प्रमुख मुद्दों पर फोकस किया गया। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि ईरान ने भारतीय जहाजों को आवाजाही की अनुमति दी है या नहीं। मंत्रालय ने कहा कि इस विषय पर जल्दबाजी में कोई घोषणा करना सही नहीं होगा।

    विदेश मंत्रालय का यह भी कहना है कि युद्ध और तनाव के बीच सभी पक्षों को शांति बनाए रखने और कूटनीतिक बातचीत के रास्ते अपनाने की आवश्यकता है। भारत ने इस संघर्ष के दौरान हर कदम पर सावधानी और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा है और आगे भी स्थिति पर करीबी नजर रखेगा।

  • ईरान में फंसे भारतीयों की सुरक्षित घर वापसी कराने में जुटी सरकार, ये दो देश कर रहे मदद

    ईरान में फंसे भारतीयों की सुरक्षित घर वापसी कराने में जुटी सरकार, ये दो देश कर रहे मदद


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत सरकार (Indian Government) अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर लगातार सक्रिय है। विदेश मंत्रालय ने बताया कि ईरान में मौजूद भारतीयों की सुरक्षित वापसी के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। सरकार उन भारतीयों की मदद कर रही है जो ईरान से बाहर निकलना चाहते हैं। इसके लिए आर्मेनिया (Armenia) और अजरबैजान (Azerbaijan) के रास्ते लोगों को सुरक्षित बाहर लाने की व्यवस्था की जा रही है।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि तेहरान स्थित भारतीय दूतावास पूरी तरह सक्रिय है और हाई अलर्ट पर काम कर रहा है। दूतावास भारतीय छात्रों, तीर्थयात्रियों और अन्य नागरिकों से लगातार संपर्क में है। जो लोग ईरान छोड़ना चाहते हैं उन्हें जमीन के रास्ते आर्मेनिया और अजरबैजान भेजा जा रहा है, जहां से वे व्यावसायिक उड़ानों के जरिए भारत लौट सकते हैं।


    ईरान में कितने भारतीय मौजूद हैं?

    विदेश मंत्रालय के मुताबिक ईरान में करीब नौ हजार भारतीय नागरिक मौजूद हैं। इनमें बड़ी संख्या में छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं। सरकार ने कहा कि कई भारतीय पहले ही सरकार की एडवाइजरी का पालन करते हुए स्वदेश लौट चुके हैं। बाकी लोगों से भी लगातार संपर्क बनाए रखा जा रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके।


    सरकार ने सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए हैं?

    सरकार ने बताया कि कुछ छात्रों और आगंतुकों को सुरक्षा कारणों से ईरान के अलग-अलग शहरों में स्थानांतरित किया गया है। इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने एक कंट्रोल रूम भी स्थापित किया है, जो चौबीसों घंटे काम कर रहा है। यहां परिवार के लोग फोन या ईमेल के जरिए जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अधिकारियों से मदद ले सकते हैं।


    खाड़ी देशों में भारतीयों की सुरक्षा क्यों अहम है?

    विदेश मंत्रालय के अनुसार खाड़ी सहयोग परिषद के देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय रहते हैं। सरकार ने कहा कि इन सभी भारतीयों की सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार क्षेत्र के कई नेताओं के संपर्क में हैं और भारतीय समुदाय की सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं।


    संघर्ष में भारतीयों को कितना नुकसान हुआ?

    सरकार ने बताया कि हालिया घटनाओं में दो भारतीय नागरिकों की मौत हुई है और एक व्यक्ति लापता है। ये तीनों एक व्यापारी जहाज पर मौजूद थे, जो हमले का शिकार हुआ था। इसके अलावा कुछ भारतीय घायल भी हुए हैं। एक भारतीय इस्राइल में और एक दुबई में घायल हुआ है। दोनों का इलाज चल रहा है और भारतीय दूतावास उनके संपर्क में है।

  • ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला: तेल स्टोरेज टैंकों में लगी आग, सुल्तान ने ईरानी राष्ट्रपति से जताई नाराजगी, मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ा

    ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला: तेल स्टोरेज टैंकों में लगी आग, सुल्तान ने ईरानी राष्ट्रपति से जताई नाराजगी, मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ा

     
     
     
    नई दिल्ली। ओमान के दक्षिणी शहर सलालाह के पोर्ट पर तेल स्टोरेज टैंकों को निशाना बनाते हुए ड्रोन हमले की सूचना मिली है। ओमानी सरकारी मीडिया के अनुसार, ड्रोन हमले के बाद पोर्ट के फ्यूल स्टोरेज टैंकों में आग भड़क गई, लेकिन किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। समुद्री सुरक्षा कंपनी एम्ब्रे ने पुष्टि की कि पोर्ट पर मौजूद किसी व्यापारी जहाज को नुकसान नहीं पहुंचा।
    घटना के बाद ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल-सईद ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान को फोन कर इस हमले पर अपनी गहरी नाराजगी जताई। सुल्तान ने कहा कि ओमान मौजूदा संघर्ष में तटस्थ है और अपनी सुरक्षा व क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।
    तुर्किये के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोआन ने मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव पर चिंता जताते हुए कहा कि ईरान में जारी युद्ध को तुरंत रोकना होगा, वरना पूरा क्षेत्र आग की चपेट में आ सकता है। एर्दोआन ने कहा कि कूटनीति के माध्यम से ही इस संकट का समाधान संभव है और तुर्किये अभी भी दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है।
    इजराइल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने बताया कि अमेरिका के सहयोग से चल रहा अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक सभी लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते, और इस ऑपरेशन की कोई निश्चित समयसीमा नहीं है।
    इस बीच, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति पर असर को देखते हुए घोषणा की कि उसके 32 सदस्य देश आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल कच्चा तेल बाजार में उतारेंगे। IEA के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने बताया कि यह एजेंसी के इतिहास में सबसे बड़ा तेल रिलीज होगा। उन्होंने कहा कि यह कदम युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में आई बाधा को दूर करने के लिए उठाया गया है।
    28 फरवरी से होर्मुज स्ट्रेट के जरिए तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर से केवल 10% तक ही पहुंच पाया है। IEA ने कहा कि आपातकालीन भंडार से तेल सदस्य देशों की परिस्थितियों के अनुसार चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा।
    1974 में स्थापित IEA के इतिहास में यह छठी बार है जब सदस्य देश मिलकर रणनीतिक भंडार से तेल जारी कर रहे हैं। इससे पहले 1991 के खाड़ी युद्ध, 2005 के हरिकेन कैटरीना, 2011 के लीबिया युद्ध और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ऐसा कदम उठाया गया था। IEA के 32 सदस्य देशों में अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। भारत इस एजेंसी का सदस्य नहीं है, लेकिन 2017 से यह IEA का एसोसिएट देश है।
    ओमान के सलालाह पोर्ट पर ड्रोन हमला, सुल्तान की नाराजगी, मध्यस्थता के प्रयास और 32 देशों द्वारा 40 करोड़ बैरल तेल बाजार में उतारने की योजना के बीच, मिडिल-ईस्ट में तनाव और ऊर्जा संकट गहराता दिखाई दे रहा है।

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  • नेतन्याहू का ईरान की जनता से सीधा संदेश, कहा—अयातुल्ला शासन हटाने का मौका न गंवाएं

    नेतन्याहू का ईरान की जनता से सीधा संदेश, कहा—अयातुल्ला शासन हटाने का मौका न गंवाएं

    तेल अवीव। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच Benjamin Netanyahu ने ईरान की जनता को सीधा संदेश देते हुए उन्हें अपने देश में बदलाव के लिए तैयार रहने की अपील की है। इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा कि मौजूदा हालात एक ऐतिहासिक मौका बन सकते हैं, जब ईरान के लोग अयातुल्ला शासन के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं।

    नेतन्याहू ने कहा कि यह संघर्ष केवल सैन्य टकराव नहीं बल्कि आजादी और बदलाव की लड़ाई है। उनके मुताबिक यह अवसर बार-बार नहीं आता और ईरान की जनता को इसे पहचानकर अपने भविष्य के लिए निर्णायक कदम उठाना चाहिए।

    ईरान की जनता से क्या बोले नेतन्याहू

    नेतन्याहू ने अपने संदेश में कहा कि ईरान के लोग लंबे समय से आजादी चाहते हैं और मौजूदा हालात उन्हें बदलाव का मौका दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब सही समय आएगा तो बदलाव की मशाल ईरान की जनता के हाथ में होगी, इसलिए लोगों को उस पल के लिए तैयार रहना चाहिए।

    ईरान में सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व का प्रतीक अयातुल्ला प्रणाली है, जिसका नेतृत्व वर्तमान में Ali Khamenei के हाथ में है।

    अमेरिका-इजरायल की रणनीति

    नेतन्याहू ने दावा किया कि इजरायल और अमेरिका मिलकर तेहरान की सत्ता पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिका और इजरायल की रणनीति का उद्देश्य ईरान के शासकों को कमजोर करना और क्षेत्र में स्थिरता लाना है।

    उनके अनुसार सैन्य और रणनीतिक दबाव के जरिए ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं, जिनसे ईरान के भीतर राजनीतिक बदलाव की संभावना बढ़ सकती है।

    ईरान की आंतरिक राजनीति पर असर

    विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान ईरान की घरेलू राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। ईरान लंबे समय से धार्मिक नेतृत्व वाले शासन के तहत चल रहा है और बाहरी दबाव या युद्ध जैसी स्थितियां देश के भीतर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती हैं।

    हालांकि तेहरान की सरकार ऐसे बयानों को अक्सर विदेशी हस्तक्षेप बताकर खारिज करती रही है।

    क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका

    पश्चिम एशिया में पहले से ही हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद Iran कई जगह जवाबी कार्रवाई कर चुका है।

    ऐसे में नेतन्याहू का यह बयान क्षेत्रीय राजनीति को और संवेदनशील बना सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस पूरे संघर्ष पर बनी हुई है, क्योंकि इसका असर पूरे मध्य-पूर्व और वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

  • ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    वॉशिंगटन। दुनिया में जब भी कोई युद्ध शुरू होता है तो आमतौर पर ध्यान बमबारी, मिसाइल हमलों और सैनिकों की तैनाती पर जाता है, लेकिन हर युद्ध की एक बड़ी कीमत भी होती है। अमेरिका और ईरान (Iran) के बीच जारी संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती आकलन बताते हैं कि अमेरिका इस अभियान पर हर दिन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।

    यह खर्च केवल हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें मिसाइल, लड़ाकू विमानों का संचालन, नौसैनिक बेड़े की तैनाती, रक्षा प्रणाली, सैन्य ठिकानों का संचालन और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है।

    रोज करीब 891 मिलियन डॉलर का खर्च
    वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका इस संघर्ष में प्रति दिन करीब 891.4 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह अनुमान सैन्य अभियान Operation Epic Fury के पहले 100 घंटों के खर्च के आधार पर लगाया गया है।

    इन शुरुआती घंटों में कुल खर्च करीब 3.7 अरब डॉलर रहा, जिससे रोजाना खर्च का औसत करीब 891 मिलियन डॉलर निकाला गया। कुछ अन्य विश्लेषणों के मुताबिक वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है और यह 1 अरब से बढ़कर 1.43 अरब डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।

    सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर
    इस युद्ध में सबसे बड़ा खर्च हथियारों और मिसाइलों पर हो रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.1 अरब डॉलर केवल इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई (म्यूनिशन रिप्लेसमेंट) पर खर्च किए गए हैं।

    इसके अलावा सैन्य ऑपरेशन चलाने में भी भारी खर्च आता है। इसमें युद्धपोत, लड़ाकू विमान, सैन्य ठिकाने और सैनिकों की तैनाती शामिल है। शुरुआती चरण में प्रत्यक्ष सैन्य संचालन पर लगभग 196 मिलियन डॉलर खर्च हुए, जबकि युद्ध में हुए नुकसान और सैन्य ढांचे की मरम्मत पर करीब 350 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया है।

    Pentagon के अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के पहले सप्ताह में ही कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें लगभग 4 अरब डॉलर सिर्फ मिसाइल और उन्नत इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च हुए।

    विमानवाहक पोत की तैनाती भी महंगी
    युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत और नौसैनिक बेड़े को भी क्षेत्र में तैनात किया है। अनुमान है कि दो विमानवाहक पोतों के संचालन पर ही रोज करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं। इसके अलावा हवाई हमले, मिसाइल रक्षा प्रणाली और सैनिकों की आवाजाही जैसे कई सैन्य अभियानों से खर्च लगातार बढ़ रहा है।

    युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगी लागत
    विश्लेषकों का कहना है कि अभी संघर्ष शुरुआती चरण में है, इसलिए खर्च बहुत ज्यादा दिखाई दे रहा है। अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो इसकी कुल लागत और तेजी से बढ़ सकती है।

    पिछले युद्धों ने भी खाली किया खजाना
    अमेरिका के पिछले युद्धों का इतिहास बताता है कि लंबे सैन्य अभियान बेहद महंगे साबित होते हैं।

    Iraq War पर अमेरिका ने करीब 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए।

    War in Afghanistan की लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

    9/11 के बाद विभिन्न युद्ध अभियानों पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 8 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है, जिसमें सैनिकों की देखभाल, कर्ज पर ब्याज और अन्य दीर्घकालिक खर्च भी शामिल हैं।

    असली खतरा तेल आपूर्ति पर
    विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक खतरा केवल युद्ध नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति है। Strait of Hormuz दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यहां लंबे समय तक बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो अमेरिका में महंगाई 1 से 2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर
    तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केवल ईंधन ही महंगा नहीं होगा, बल्कि परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। साथ ही अमेरिकी सेना का ईंधन खर्च भी बढ़ जाएगा, जिससे युद्ध की कुल लागत और ज्यादा हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का झटका लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था शुरुआती खर्च संभाल सकती है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इसका आर्थिक बोझ काफी भारी पड़ सकता है।