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  • दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग पर ईरान का बड़ा कदम, होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से वसूलेगा सर्विस फीस, मित्र देशों को मिल सकती है राहत

    दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग पर ईरान का बड़ा कदम, होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से वसूलेगा सर्विस फीस, मित्र देशों को मिल सकती है राहत

    नई दिल्ली । ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर सर्विस फीस लगाने की दिशा में औपचारिक तैयारी शुरू कर दी है। तेहरान का कहना है कि यह व्यवस्था समुद्री सुरक्षा और जहाजों को दी जाने वाली सेवाओं के बदले लागू की जाएगी। इसके लिए ईरान ओमान के साथ मिलकर नई प्रणाली तैयार कर रहा है। इस घोषणा के बाद वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा बाजार की नजरें इस प्रस्तावित व्यवस्था पर टिक गई हैं।

    बीजिंग में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान चीन में ईरान के राजदूत अब्दोलरेजा रहमानी फजली ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के लिए नई व्यवस्था तैयार की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाजों से लिया जाने वाला शुल्क टोल टैक्स नहीं बल्कि सर्विस फीस होगा, जिसे सुरक्षा, निगरानी और समुद्री सेवाओं के बदले वसूला जाएगा।

    ईरानी पक्ष का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट का एक हिस्सा उसके क्षेत्रीय जलक्षेत्र में आता है। ऐसे में जहाजों को सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना, उनकी आवाजाही की निगरानी करना और भारी समुद्री यातायात से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों का प्रबंधन करना उसकी जिम्मेदारी है। इसी आधार पर सर्विस फीस को उचित और वैध बताया गया है।

    हालिया क्षेत्रीय संघर्ष के बाद व्यावसायिक जहाजों को लगभग 60 दिनों तक बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के इस समुद्री मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई थी। अब यह अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद ईरान स्थायी नियम लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि शुल्क की दर, लागू होने की तारीख और किन देशों पर यह व्यवस्था किस रूप में लागू होगी, इस बारे में अभी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि हालिया संकट के दौरान जिन देशों ने उसका समर्थन किया, उन्हें नई व्यवस्था में विशेष रियायत मिल सकती है। राजदूत ने कहा कि कठिन समय में साथ खड़े रहने वाले देशों के हितों का ध्यान रखा जाएगा। हालांकि भारत सहित किसी भी देश का नाम लेकर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन देशों को राहत मिलेगी और किस प्रकार की छूट दी जाएगी।

    भारत के संदर्भ में भी फिलहाल ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है कि भारतीय जहाजों को इस सर्विस फीस से छूट मिलेगी या उन्हें इसका भुगतान करना होगा। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पर इस नई व्यवस्था का क्या प्रभाव पड़ेगा। अंतिम नियम जारी होने के बाद ही विभिन्न देशों और शिपिंग कंपनियों पर पड़ने वाले वास्तविक असर का आकलन किया जा सकेगा।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस का परिवहन इसी रास्ते से होता है। इसलिए इस मार्ग से जुड़ा कोई भी प्रशासनिक या शुल्क संबंधी बदलाव अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लागत, ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। आने वाले दिनों में ईरान और ओमान द्वारा जारी किए जाने वाले अंतिम दिशा-निर्देशों पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।

  • ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, लोगों के शोक पर जताई हैरानी, कहा- पूरी नेतृत्व व्यवस्था को निशाना बनाया जा सकता था

    ईरान में खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बड़ा दावा, लोगों के शोक पर जताई हैरानी, कहा- पूरी नेतृत्व व्यवस्था को निशाना बनाया जा सकता था


    नई दिल्ली ।
    ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बन गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अवसर पर ईरान को लेकर कई तीखे बयान दिए, जिनमें संभावित सैन्य कार्रवाई, दोनों देशों के बीच बातचीत और अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ को लेकर उनकी प्रतिक्रिया शामिल रही। उनके बयान ने दोनों देशों के संबंधों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका चाहता तो ईरान के शीर्ष नेतृत्व को एक साथ निशाना बनाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि भविष्य में बातचीत की संभावना बनी रहनी चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि दोनों पक्षों ने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होने तक वार्ता से कुछ समय का विराम लेने पर सहमति बनाई है। उनके अनुसार इस अवधि में किसी भी पक्ष की ओर से नए हमले नहीं किए जाएंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में मौजूद लोगों और उनके शोक व्यक्त करने पर भी आश्चर्य जताया। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले यह धारणा थी कि ईरान के भीतर बड़ी संख्या में लोग खामेनेई के विरोधी हैं, लेकिन अंतिम संस्कार में दिखाई दिए जनसमूह और भावनात्मक माहौल ने उन्हें हैरान कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इस दृश्य को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं की जा सकती हैं।

    ईरान में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कई चरणों में आयोजित की जा रही है। राजधानी तेहरान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम के बाद धार्मिक महत्व वाले शहरों में भी विभिन्न रस्में आयोजित की जा रही हैं। अंतिम चरण में खामेनेई को उनके गृह नगर में सुपुर्द-ए-खाक किए जाने की योजना है। सुरक्षा कारणों से पूरे कार्यक्रम के दौरान व्यापक इंतजाम किए गए हैं।

    इस बीच ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े परिवार की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए परिवार के कुछ प्रमुख सदस्यों के सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने की जानकारी सामने आई है। माना जा रहा है कि मौजूदा हालात और क्षेत्रीय तनाव को देखते हुए अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।

    खामेनेई के निधन के बाद मध्य पूर्व की राजनीतिक स्थिति पहले से अधिक संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के कारण दोनों देशों के हर बयान और कदम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। ऐसे समय में ट्रंप के हालिया बयान को क्षेत्रीय कूटनीति और सुरक्षा परिदृश्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच संभावित वार्ता, क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक घटनाक्रम वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बने रहेंगे। फिलहाल ईरान में अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं, जबकि अमेरिका की ओर से दिए गए ताजा बयान ने एक बार फिर दोनों देशों के संबंधों को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है।

  • यमन में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, ईरानी विमान की लैंडिंग के बाद सऊदी गठबंधन की हूतियों को कड़ी चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव गहराया

    यमन में फिर बढ़ा युद्ध का खतरा, ईरानी विमान की लैंडिंग के बाद सऊदी गठबंधन की हूतियों को कड़ी चेतावनी, क्षेत्रीय तनाव गहराया

    नई दिल्ली । यमन में एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ने के संकेत दिखाई दे रहे हैं। राजधानी सना में ईरान के एक नागरिक विमान के उतरने के बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन और हूती विद्रोहियों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। दोनों पक्षों की ओर से जारी चेतावनियों ने पूरे मध्य पूर्व में सुरक्षा स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब क्षेत्र पहले से ही कई भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।

    जानकारी के अनुसार, हूती नियंत्रण वाले सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक ईरानी विमान के उतरने के दौरान तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई। हूती पक्ष का दावा है कि विमान को रोकने की कोशिश के जवाब में उन्होंने अपने वायु रक्षा तंत्र को सक्रिय किया। वहीं दूसरी ओर सऊदी समर्थित गठबंधन इस घटनाक्रम को क्षेत्रीय सुरक्षा और यमन की स्थिति के लिए गंभीर मान रहा है।

    सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने स्पष्ट किया है कि यदि उसकी सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता या यमन की संप्रभुता को चुनौती देने की कोई भी कोशिश की गई तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। गठबंधन का कहना है कि हाल के घटनाक्रम केवल सैन्य चुनौती नहीं हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी असर डाल सकते हैं।

    उधर हूती विद्रोहियों ने भी अपने हालिया बयानों में सऊदी अरब के विभिन्न रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में हस्तक्षेप जारी रहा तो वे जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेंगे। इस बयान के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव और अधिक बढ़ गया है।

    यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार ने भी पूरे घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त की है। सरकार की ओर से आयोजित आपात बैठक में ईरानी विमान की लैंडिंग पर आपत्ति जताते हुए इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताया गया। साथ ही संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्षेत्र में तनाव कम करने तथा हालात को नियंत्रण में रखने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल यमन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव हो सकते हैं। सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं। ऐसे में यमन में बढ़ता तनाव दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील समीकरणों को और जटिल बना सकता है।

    यमन वर्ष 2015 से लगातार संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। लंबे समय से जारी गृहयुद्ध के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और देश गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठन समय-समय पर संघर्ष विराम और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है।

    ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते, तो यमन में सैन्य टकराव का नया दौर शुरू हो सकता है। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजर सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन, हूती विद्रोहियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आगामी रणनीति पर बनी हुई है, क्योंकि किसी भी बड़े कदम का असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है।

  • ईरानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की साजिश के दावे पर बढ़ा विवाद, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट को इजरायल ने बताया पूरी तरह निराधार

    ईरानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की साजिश के दावे पर बढ़ा विवाद, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट को इजरायल ने बताया पूरी तरह निराधार


    नई दिल्ली ।
    इजरायल और अमेरिकी समाचार पत्र के बीच एक रिपोर्ट को लेकर नया विवाद सामने आया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को उन संभावित खतरों के बारे में आगाह किया था, जिनमें परमाणु वार्ता में शामिल ईरानी प्रतिनिधियों को इजरायल द्वारा निशाना बनाए जाने की आशंका जताई गई थी। हालांकि इजरायल ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्हें तथ्यहीन और मनगढ़ंत करार दिया है।

    रिपोर्ट में दावा किया गया कि अप्रैल के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ संभावित सुरक्षा खतरे का सामना कर सकते हैं। दोनों नेता उस समय परमाणु वार्ता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बताए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन को आशंका थी कि क्षेत्रीय तनाव के बीच इन नेताओं की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन दावों का तत्काल खंडन किया। आधिकारिक बयान में कहा गया कि प्रकाशित रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों पर आधारित नहीं है और इसमें लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह निराधार हैं। सरकार का कहना है कि इस प्रकार की खबरें तथ्यों से परे हैं और इन्हें बिना पर्याप्त आधार के प्रकाशित किया गया है।

    दूसरी ओर संबंधित अमेरिकी समाचार संस्थान ने अपनी रिपोर्ट का बचाव किया है। संस्थान का कहना है कि रिपोर्ट वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है तथा प्रकाशन से पहले संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास भी किया गया था। समाचार पत्र ने यह भी कहा कि रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी उपलब्ध नहीं कराई गई थी।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि संघर्षविराम के बाद इजरायल कथित रूप से ईरानी नेतृत्व के कुछ प्रमुख चेहरों को संभावित लक्ष्य के रूप में देख रहा था। इसी संदर्भ में संसद अध्यक्ष गालिबाफ के यात्रा कार्यक्रम को लेकर भी सुरक्षा संबंधी चिंताओं का उल्लेख किया गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही किसी आधिकारिक एजेंसी ने इन्हें प्रमाणित किया है।

    रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि गालिबाफ की वापसी यात्रा के दौरान संभावित खतरे की सूचना मिलने के बाद उनके विमान ने मार्ग में आपात स्थिति के तहत लैंडिंग की थी। हालांकि इस घटनाक्रम के संबंध में भी संबंधित पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इन दावों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव तथा परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गतिविधियों के बीच इस तरह की रिपोर्टों ने नई बहस को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में आधिकारिक पुष्टि और विश्वसनीय तथ्यों का विशेष महत्व होता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। एक ओर इजरायल ने रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज किया है, वहीं अमेरिकी समाचार संस्थान अपनी रिपोर्टिंग को तथ्य-आधारित बताते हुए उस पर कायम रहने की बात कह रहा है।

  • ईरान-इजरायल तनाव के बीच गालिबाफ और अराघची कथित तौर पर थे निशाने पर, अमेरिकी दखल से टली कार्रवाई, शांति वार्ता बचाने की कोशिश तेज

    ईरान-इजरायल तनाव के बीच गालिबाफ और अराघची कथित तौर पर थे निशाने पर, अमेरिकी दखल से टली कार्रवाई, शांति वार्ता बचाने की कोशिश तेज

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में हालिया तनाव के बीच ईरान और इजरायल से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जानकारी सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, युद्धविराम और बातचीत की प्रक्रिया के दौरान ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची पर संभावित हमले की आशंका जताई गई थी। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद यह कार्रवाई टल गई, जिससे शांति वार्ता प्रभावित होने से बच गई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्टों के मुताबिक उस समय अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को स्थायी रूप देने तथा आगे की बातचीत को लेकर प्रयास जारी थे। इसी दौरान आशंका जताई गई कि यदि वार्ता में शामिल शीर्ष ईरानी नेताओं को निशाना बनाया जाता, तो दोनों देशों के बीच तनाव फिर से चरम पर पहुंच सकता था। ऐसी स्थिति में कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को गंभीर झटका लगने का खतरा था।

    बताया जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन ने क्षेत्रीय सहयोगी देशों के माध्यम से संभावित सुरक्षा जोखिम की जानकारी ईरानी पक्ष तक पहुंचाई। इसके बाद संबंधित नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत कर दी गई। रिपोर्टों के अनुसार इस कदम का उद्देश्य बातचीत की प्रक्रिया को बाधित होने से बचाना और क्षेत्र में व्यापक सैन्य टकराव की आशंका को कम करना था।

    अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से जारी तनाव में दोनों देशों की रणनीतियां अलग-अलग प्राथमिकताओं पर आधारित रही हैं। एक ओर सुरक्षा और सैन्य दबाव की नीति अपनाई जाती रही है, वहीं दूसरी ओर परमाणु कार्यक्रम, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर कूटनीतिक संवाद भी समानांतर रूप से चलता रहा है। ऐसे में वार्ता से जुड़े वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा अत्यंत संवेदनशील विषय मानी जाती है।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि संबंधित ईरानी नेताओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी कई बार अतिरिक्त सतर्कता बरती गई थी। बीते वर्षों में ईरान के कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों पर हमलों की घटनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियां पहले से अधिक सतर्क हैं। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय दौरों और महत्वपूर्ण बैठकों के दौरान विशेष सुरक्षा प्रबंध किए जाते रहे हैं।

    एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में आयोजित वार्ता के दौरान भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए थे। वापसी यात्रा के दौरान संभावित खतरे की सूचना मिलने पर विमान की उड़ान योजना में बदलाव किया गया और प्रतिनिधिमंडल को वैकल्पिक मार्ग से सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाया गया। हालांकि इस संबंध में संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों में सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक प्रयासों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। किसी भी शीर्ष राजनीतिक या कूटनीतिक नेतृत्व पर संभावित हमला न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है, बल्कि शांति प्रक्रिया को भी गंभीर रूप से बाधित कर सकता है। ऐसे में सभी पक्षों के लिए संवाद बनाए रखना और तनाव कम करने की दिशा में निरंतर प्रयास करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • दो देशों और पांच प्रमुख शहरों से गुजरेगा अली खामेनेई का अंतिम सफर, 9 जुलाई को होगा अंतिम संस्कार

    दो देशों और पांच प्रमुख शहरों से गुजरेगा अली खामेनेई का अंतिम सफर, 9 जुलाई को होगा अंतिम संस्कार

    नई दिल्ली । ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की राजकीय अंतिम यात्रा 4 जुलाई से शुरू होगी और 9 जुलाई को उनके पैतृक शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किए जाने के साथ संपन्न होगी। अंतिम यात्रा का कार्यक्रम धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके तहत ईरान और इराक के कई प्रमुख शिया धार्मिक केंद्रों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जहां बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना है।

    राजधानी तेहरान से अंतिम यात्रा की शुरुआत होगी, जहां आम लोगों के अंतिम दर्शन और राजकीय श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। तेहरान को देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का केंद्र माना जाता है, इसलिए यहां से अंतिम यात्रा की शुरुआत को राष्ट्रीय सम्मान और नेतृत्व की निरंतरता का प्रतीक माना जा रहा है। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी विशेष रूप से मजबूत रखी जाएगी।

    तेहरान के बाद अंतिम यात्रा पवित्र शहर कोम पहुंचेगी, जिसे शिया धार्मिक शिक्षा और विद्वता का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां बड़ी संख्या में धर्मगुरु, छात्र और श्रद्धालु अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। कोम लंबे समय से शिया धार्मिक परंपरा और वैचारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, इसलिए इस शहर को अंतिम यात्रा के प्रमुख पड़ावों में शामिल किया गया है।

    इसके बाद पार्थिव शरीर को इराक ले जाया जाएगा, जहां कर्बला और नजफ में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित होंगे। कर्बला शिया समुदाय के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है, जबकि नजफ धार्मिक शिक्षा और शिया परंपरा का महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। इन दोनों शहरों में अंतिम यात्रा का पहुंचना व्यापक शिया समुदाय के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है। इन स्थानों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

    अंतिम चरण में पार्थिव शरीर को ईरान के मशहद लाया जाएगा, जहां 9 जुलाई को पूरे राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। मशहद अयातुल्लाह अली खामेनेई का जन्मस्थान भी है और शिया समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में इसकी विशेष पहचान है। इसी कारण अंतिम संस्कार के लिए इस शहर का चयन किया गया है।

    अंतिम यात्रा को लेकर ईरान में व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। प्रशासन ने सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की हैं। देश-विदेश से बड़ी संख्या में धार्मिक प्रतिनिधियों, गणमान्य व्यक्तियों और श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अंतिम यात्रा केवल एक राजकीय श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति, धार्मिक नेतृत्व और शिया समुदाय की एकजुटता का भी महत्वपूर्ण प्रतीक होगी।

  • दोहा में अमेरिका-ईरान की अहम बातचीत, होर्मुज पर टकराव बरकरार; समुद्री मार्ग, प्रतिबंध और समझौते की शर्तों पर नहीं बनी सहमति

    दोहा में अमेरिका-ईरान की अहम बातचीत, होर्मुज पर टकराव बरकरार; समुद्री मार्ग, प्रतिबंध और समझौते की शर्तों पर नहीं बनी सहमति

    नई दिल्ली । कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और ईरान के बीच हुई ताजा वार्ता में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ता तनाव चर्चा का सबसे अहम विषय रहा। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और प्रस्तावित व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श किया, हालांकि बातचीत के बाद किसी ठोस सहमति या औपचारिक प्रगति की घोषणा नहीं की गई। इसके बावजूद इस बैठक को दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    वार्ता के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधियों ने ईरानी पक्ष को स्पष्ट संदेश दिया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर टोल लगाने की किसी भी योजना से व्यापक समझौते की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। अमेरिकी पक्ष का तर्क रहा कि यदि भविष्य में आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिलती है और ईरान वैश्विक बाजार में अपने तेल तथा अन्य संसाधनों का निर्बाध निर्यात कर पाता है, तो उससे होने वाली आय किसी भी संभावित टोल व्यवस्था से कहीं अधिक लाभदायक होगी। अमेरिका ने ईरान से दीर्घकालिक आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने की अपील भी की।

    बैठक में पिछले महीने हुए समझौता ज्ञापन की शर्तों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों के बीच इस समझौते की व्याख्या और उसके क्रियान्वयन को लेकर मतभेद बने हुए हैं। अमेरिका का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री धुरी से जुड़ी किसी भी नई व्यवस्था में खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों की सहमति और भागीदारी भी आवश्यक है। दूसरी ओर ईरान का कहना है कि संबंधित क्षेत्र उसके अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विषय है और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उसी के पास होना चाहिए।

    वार्ता के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री गतिविधियों से जुड़े हालिया घटनाक्रम भी चर्चा का हिस्सा रहे। हाल के दिनों में होर्मुज के आसपास बढ़ी सैन्य गतिविधियों और व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है। नए समुद्री मार्गों के संचालन और क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार की सुरक्षा को लेकर कई देशों की चिंता और बढ़ा दी है।

    समझौता ज्ञापन के तहत निर्धारित 60 दिन की अवधि भी वार्ता का महत्वपूर्ण विषय रही। इस अवधि के पूरा होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन और वहां से गुजरने वाले जहाजों के संचालन को लेकर दोनों पक्षों की अलग-अलग व्याख्याएं सामने आ रही हैं। इसी कारण भविष्य की व्यवस्था को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। निर्धारित समय-सीमा के भीतर व्यापक समझौते तक पहुंचना दोनों देशों के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव अंतरराष्ट्रीय बाजार, तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में दोहा में जारी संवाद को भविष्य के संभावित समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है, हालांकि कई संवेदनशील मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी कायम हैं।

  • ईरान के राजकीय शोक समारोह में भारत की मौजूदगी, महबूबा मुफ्ती ने स्वीकार किया निमंत्रण, कई वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी तय

    ईरान के राजकीय शोक समारोह में भारत की मौजूदगी, महबूबा मुफ्ती ने स्वीकार किया निमंत्रण, कई वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी तय

    नई दिल्ली । ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनयिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इसी क्रम में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने ईरान सरकार की ओर से भेजा गया आधिकारिक निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। उन्होंने पुष्टि की है कि वह अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए ईरान जाएंगी और दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी।

    ईरान में अंतिम संस्कार और शोक संबंधी कार्यक्रम 4 जुलाई से 9 जुलाई तक तेहरान, कोम और मशहद में आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में दुनिया के अनेक देशों के प्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं के शामिल होने की संभावना है। ईरान ने भारत सहित कई देशों के प्रमुख नेताओं और प्रतिनिधियों को औपचारिक निमंत्रण भेजा है, ताकि वे राजकीय शोक समारोह में भाग लेकर संवेदना व्यक्त कर सकें।

    महबूबा मुफ्ती ने अपनी यात्रा की पुष्टि करते हुए कहा कि वह निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ईरान जाएंगी। वहां वह ईरानी नेतृत्व और नागरिकों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करेंगी तथा दिवंगत नेता को अंतिम श्रद्धांजलि देंगी। उनके इस दौरे को भारत और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ईरान की ओर से केवल महबूबा मुफ्ती ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कई प्रमुख नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है। इनमें विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और शिया समुदाय से जुड़े प्रमुख धार्मिक एवं सामाजिक नेता शामिल हैं। इन नेताओं की संभावित भागीदारी को क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक जुड़ाव के दृष्टिकोण से भी अहम माना जा रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ईरान की ओर से औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था। हालांकि, पूर्व निर्धारित विदेश यात्राओं के कारण उनके इस कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना नहीं है। ऐसे में भारत सरकार की ओर से एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल अंतिम संस्कार समारोह में भाग लेगा। यह प्रतिनिधिमंडल भारत की ओर से आधिकारिक संवेदना व्यक्त करेगा और राजनयिक स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करेगा।

    इसके अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों के कई वरिष्ठ नेताओं के भी ईरान जाने की संभावना जताई जा रही है। इनमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधियों के नाम सामने आए हैं। इससे स्पष्ट है कि यह कार्यक्रम केवल धार्मिक या औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक महत्व भी रखता है, जहां विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एक मंच पर मौजूद रहेंगे।

    अयातुल्लाह अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में राष्ट्रीय शोक का माहौल है। अंतिम संस्कार के दौरान सुरक्षा और राजनयिक व्यवस्थाओं को विशेष रूप से मजबूत किया गया है। दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बीच यह आयोजन वैश्विक राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत की भागीदारी को दोनों देशों के पारंपरिक संबंधों और आपसी सम्मान की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।

  • ईरान-इजरायल तनाव फिर चरम पर, नेतन्याहू ने दोहराई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, तेहरान बोला- बातचीत विफल हुई तो युद्ध के लिए तैयार

    ईरान-इजरायल तनाव फिर चरम पर, नेतन्याहू ने दोहराई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, तेहरान बोला- बातचीत विफल हुई तो युद्ध के लिए तैयार


    नई दिल्ली ।
    मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर इजरायल की ओर से आए सख्त बयानों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ तो ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। इसके जवाब में ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह बातचीत को प्राथमिकता देता है, लेकिन वार्ता विफल होने की स्थिति में हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।

    इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके देश ने पहले भी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठाए हैं और भविष्य में भी आवश्यकता पड़ने पर ऐसा करने से पीछे नहीं हटेगा। उनका कहना था कि ईरान की परमाणु गतिविधियों को लेकर इजरायल किसी भी संभावित खतरे को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि यदि सुरक्षा संबंधी चिंताएं दूर नहीं हुईं तो आगे भी सैन्य विकल्प खुले रहेंगे।

    इजरायल लंबे समय से यह रुख अपनाता रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी कारण वह अपने सुरक्षा हितों के अनुरूप स्वतंत्र कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित मानता है। हालिया बयान को भी इसी नीति का विस्तार माना जा रहा है, जिसने क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है।

    इस बीच अमेरिका लगातार दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। वॉशिंगटन का मानना है कि बढ़ते सैन्य तनाव से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है और कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं। इसी वजह से सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देने की अपील की जा रही है।

    दूसरी ओर ईरान ने भी अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि वह मौजूदा वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि कूटनीतिक समाधान ही सबसे बेहतर विकल्प है और इसी दिशा में प्रयास जारी हैं। हालांकि, साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती या देश की सुरक्षा को चुनौती मिलती है तो ईरान आवश्यक जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार रहेगा।

    ईरानी संसद के शीर्ष नेतृत्व ने कहा कि देश अपनी रक्षा क्षमता और राष्ट्रीय हितों से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं करेगा। उनका कहना था कि परमाणु कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप संचालित किया जा रहा है और शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक विकसित करना ईरान का वैध अधिकार है। उन्होंने दोहराया कि देश अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करता रहेगा, लेकिन अपने अधिकारों की रक्षा भी करेगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात बेहद संवेदनशील हैं। एक ओर कूटनीतिक वार्ता जारी है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों की सख्त बयानबाजी से तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी हुई है। यदि संवाद सफल रहता है तो क्षेत्र में स्थिरता की संभावना मजबूत हो सकती है, लेकिन बातचीत विफल होने पर हालात फिर से सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • PM मोदी ने ईरान से राष्ट्रपति को किया टेलीफोन…. बोले- होर्मुज स्ट्रेट में हो आवाजाही की स्वतंत्रता

    PM मोदी ने ईरान से राष्ट्रपति को किया टेलीफोन…. बोले- होर्मुज स्ट्रेट में हो आवाजाही की स्वतंत्रता


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने ईरान (Iran) के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेश्कियन (President Dr. Masoud Pezeshkian) से मंगलवार को टेलीफोन पर बातचीत की, जिसमें राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने पश्चिम एशिया (West Asia) की हालिया घटनाओं और आगे की दिशा की जानकारी प्रधानमंत्री को दी। पीएम मोदी ने समझौते का स्वागत करते हुए भारत की स्थिर नीति को दोहराया कि क्षेत्र के सभी मुद्दों का समाधान संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही होना चाहिए। साथ ही उन्होंने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के निरंतर प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया। इस दौरान समुद्री नौवहन की स्वतंत्रता और वाणिज्य की सुरक्षा को बनाए रखने के महत्व को भी सामने रखा गया।

    पीएम मोदी ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘पश्चिम एशिया में हाल की घटनाओं के बारे में ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेश्कियन से बात हुई। बातचीत में हुई प्रगति का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि लगातार कोशिशों से इस इलाके में स्थायी शांति आएगी। भारत और दुनिया के लिए होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही की आजादी के महत्व को फिर से दोहराया।’ इससे पहले, पेजेश्कियन ने प्रधानमंत्री मोदी को ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था। खामेनेई का अंतिम संस्कार समारोह अगले सप्ताह आयोजित होने वाला है। खबरों के मुताबिक, सरकार भारत के प्रतिनिधि के तौर पर बिहार के राज्यपाल अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिटा को इन समारोह में भेजने की योजना बना रही है। अंतिम संस्कार की रस्में 5 से 9 जुलाई तक होंगी।


    भारत-ईरान के रिश्ते में उतार-चढ़ाव

    भारत और ईरान के मौजूदा संबंध काफी जटिल और रणनीतिक महत्व वाले रहे हैं। दोनों देशों के बीच सभ्यतागत और ऐतिहासिक गहराई है, लेकिन हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रतिबंधों, क्षेत्रीय तनाव और ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। 2024 में भारत ने चाबहार पोर्ट के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को 10 वर्षों के लिए ऑपरेट करने का समझौता किया, जिसमें 120 मिलियन डॉलर का निवेश शामिल था। 2026 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने पोर्ट पर अपनी गतिविधियां कम कीं और वादा किया राशि का भुगतान पूरा कर लिया।

    होर्मुज स्ट्रेट संकट के दौरान भारत ने ईरान के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ाया, जहाजों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करने के लिए विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री स्तर पर बातचीत हुई। ईरान के सुप्रीम लीडर की मृत्यु पर भारत ने शोक व्यक्त किया और BRICS जैसे मंचों पर सहयोग जारी रखा। ऊर्जा आयात लगभग बंद हो गया है, लेकिन कनेक्टिविटी, अफगानिस्तान और मध्य एशिया पहुंच के लिए चाबहार अभी भी अहम बना हुआ है। दोनों देशों के बीच संबंध रणनीतिक स्वायत्तता और व्यावहारिक जरूरतों पर आधारित हैं। भारत ईरान को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी मानता है, जबकि ईरान भारत को बड़े बाजार और निवेशक के रूप में देखता है।