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  • सीजफायर, ईरान-इजरायल-अमेरिका की तनातनी से फिर भड़क सकता है मिडिल ईस्ट

    सीजफायर, ईरान-इजरायल-अमेरिका की तनातनी से फिर भड़क सकता है मिडिल ईस्ट


    तेहरान।
     करीब 40 दिनों से जारी भीषण संघर्ष के बाद जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर का ऐलान हुआ, तो क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगी थी। लेकिन महज 24 घंटे के भीतर ही हालात बदलते नजर आ रहे हैं। तीनों प्रमुख पक्ष—ईरान, इजरायल और अमेरिका—के बयान अलग-अलग दिशा में जाते दिख रहे हैं, जिससे सीजफायर पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

    अमेरिका ने खारिज किया ईरान का प्रस्ताव
    कूटनीतिक मोर्चे पर सबसे बड़ा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने ईरान के 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। अमेरिकी प्रशासन ने तीखे शब्दों में कहा कि प्रस्ताव को “कूड़े के डिब्बे में डाल दिया गया।” इससे संकेत मिला कि वॉशिंगटन ईरान की शर्तों पर आगे बढ़ने को तैयार नहीं है और वह इजरायल के रुख का समर्थन कर रहा है।


    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि सीजफायर समझौते में लेबनान से जुड़े हमलों को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए उस मोर्चे पर कार्रवाई जारी रह सकती है।

    लेबनान पर इजरायल के हमले तेज
    सीजफायर के तुरंत बाद इजरायल ने समझौते की तकनीकी खामी का हवाला देते हुए कहा कि लेबनान में उसके सैन्य अभियान जारी रहेंगे। इसके बाद इजरायली हमलों में तेजी देखी गई, जिनमें 100 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है।
    इजरायल का कहना है कि वह हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाता रहेगा और यह कार्रवाई सीजफायर का उल्लंघन नहीं मानी जाएगी।

    ईरान की चेतावनी—हमले हुए तो खत्म समझौता
    इजरायल के रुख पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान ने कहा कि अगर लेबनान पर हमले जारी रहे तो सीजफायर स्वतः समाप्त माना जाएगा। ईरान ने अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि “गेंद अब आपके पाले में है”, यानी जवाबी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है।

    क्या हो सकता है असर?

    अगर सीजफायर पूरी तरह टूटता है तो इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ सकता है। हिजबुल्लाह के सीधे युद्ध में उतरने से संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है और ईरान की प्रत्यक्ष भागीदारी का खतरा बढ़ जाएगा।
    विशेषज्ञों का मानना है कि हालात बिगड़ने पर होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

    महज 24 घंटे में समझौते का डगमगाना यह दिखाता है कि पक्षों के बीच अविश्वास कितना गहरा है और शांति की राह अभी भी बेहद कठिन बनी हुई है।

  • ईरान संघर्ष के बीच सऊदी अरब को दोहरा झटका, तेल सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग पर हमला

    ईरान संघर्ष के बीच सऊदी अरब को दोहरा झटका, तेल सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग पर हमला

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी जंग ट्रंप के सीजफायर के ऐलान के बाद थम गई है। लेकिन इसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने में कई वर्ष लग जाएंगे। इस युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल के दामों में उछाल आ गया था। सऊदी अरब ने तेल सप्लाई के अपने दूसरे रास्ते (ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन) का उपयोग करना शुरू कर दिया था। हालांकि, अब सामने आईं रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी हमले में इस पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचा है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही ट्रंप के सीजफायर ऐलान के बाद होर्मुज का रास्ता खुल गया हो, लेकिन इसके बाद भी लाखों बैरल तेल कच्चे बाजार से बाहर होने की आशंका है।

    सऊदी अरब में मौजूद एक स्त्रोत के मुताबिक ईरान ने अपने हमलों के दौरान सऊदी अरब के कई तेल प्रतिष्ठानों और तेल सप्लाई प्वाइंट्स को निशाना बनाया था। इसमें ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और उसके एक केंद्र (यानबू बंदरगाह) को भी निशाना बनाया गया है। इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब होर्मुज को बायपास करके तेल की सप्लाई को चालू रखता है।

    बता दें, ईरान के साथ बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए ही सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का निर्माण किया था। इसके जरिए तेल सप्लाई को यानबू पर ले जाकर लाल सागर के जरिए आगे बढ़ाया जाता है।

    इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल सप्लाई होता था। 28 फरवरी के बाद सामने आए शिपिंग डेटा के मुताबिक यानबू की क्षमता करीब 4.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। पिछले कुछ दिनों से यह लगातार अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थी। लेकिन अब इस पर भी हमला करके ईरान ने सऊदी के इस कदम पर भी पानी फेर दिया है।

    तेल प्रतष्ठानों पर हुए इन हमलों की जिम्मेदारी आईआरजीसी ने ली है।

    बुधवार को जारी एक बयान में आईआरजीसी की तरफ से कहा गया कि फारस की खाड़ी में कई लक्ष्यों के ऊपर मिसाइलों और ड्रोन्स के जरिए हमला किया गया है। इसमें यानबू में मौजूद अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया। यह पहली बार नहीं है कि जब इस संघर्ष के दौरान ईरान ने यानबू बंदरगाह को निशाना बनाने की कोशिश की है। इससे पहले भी ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तमाम ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया था। होर्मुज के ऊपर तेहरान ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी थी। इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल के दाम आसमान छू रहे थे। हालांकि, अब सीजफायर के ऐलान के साथ ही होर्मुज को खोलने पर भी सहमति बनी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कल से होर्मुज अपनी पूरी क्षमता के साथ शुरू भी हो जाता है, तब भी स्थिति को सामान्य होने में कई महीनों का वक्त लग जाएगा।
  • ईरान में फंसे सभी भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित मार्गों से देश वापसी का उच्च स्तरीय अलर्ट जारी

    ईरान में फंसे सभी भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित और नियंत्रित मार्गों से देश वापसी का उच्च स्तरीय अलर्ट जारी


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात को देखते हुए भारत सरकार ने ईरान में रह रहे अपने नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की है। इसमें सभी भारतीय नागरिकों से आग्रह किया गया है कि जितनी जल्दी संभव हो, तय किए गए सुरक्षित और अधिकृत मार्गों से देश छोड़ दें। इसके साथ यह चेतावनी भी दी गई है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर बिना दूतावास की अनुमति और समन्वय के बढ़ने का प्रयास न करें। यात्रा के दौरान नागरिकों को लगातार दूतावास के संपर्क में रहने और किसी भी आपात स्थिति में हेल्पलाइन नंबर तथा ईमेल आईडी का उपयोग करने की सलाह दी गई है।

    इससे पहले जारी की गई सलाह में नागरिकों को 48 घंटे तक सुरक्षित स्थानों पर रहने की हिदायत दी गई थी। हालात की संवेदनशीलता के मद्देनजर अब सरकार ने अधिक सतर्कता बरतते हुए देश छोड़ने पर जोर दिया है। यह कदम अमेरिकी और ईरानी तनाव के बीच क्षेत्र में बढ़ते खतरे को देखते हुए उठाया गया है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के लिए सीजफायर का ऐलान हुआ था, लेकिन इसे पूरी तरह सुरक्षित स्थिति नहीं माना जा रहा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के समय ईरान में लगभग 9,000 भारतीय नागरिक थे, जिनमें छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल हैं। अब तक करीब 1,800 नागरिक सुरक्षित भारत लौट चुके हैं, जबकि बाकी नागरिकों की सुरक्षित वापसी के प्रयास जारी हैं। अमेरिकी चेतावनी और क्षेत्रीय तनाव ने हालात को और भी संवेदनशील बना दिया है।

    एडवाइजरी में नागरिकों से अपील की गई है कि वे केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करें और अफवाहों से दूर रहें। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि यात्रा के सभी मार्ग अधिकृत और सुरक्षित हों। किसी भी जोखिमपूर्ण गतिविधि से बचना अत्यंत आवश्यक है। सरकार स्थिति की निरंतर निगरानी कर रही है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त दिशा-निर्देश जारी कर सकती है।

  • होर्मुज से भारत को राहत, ईरान ने दी सुरक्षित आवाजाही की गारंटी; भारत की भूमिका की भी सराहना

    होर्मुज से भारत को राहत, ईरान ने दी सुरक्षित आवाजाही की गारंटी; भारत की भूमिका की भी सराहना

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। मोहम्मद फतहली ने कहा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारत समेत मित्र देशों के जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए ईरान ने विशेष इंतजाम किए हैं।
    हाल के दिनों में कई भारतीय पोत सुरक्षित रूप से इस मार्ग से गुजर चुके हैं।

    राजदूत ने स्पष्ट किया कि यह जलडमरूमध्य केवल उन देशों के लिए बंद है, जो ईरान के साथ युद्ध में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र में आता है और इसके प्रबंधन से जुड़े फैसले तेहरान और मस्कट के अधिकार क्षेत्र में हैं। ईरान ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

    भारत निभा सकता है अहम भूमिका

    राजदूत फतहली ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को समाप्त करने में भारत प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

    उन्होंने बातचीत और संयम बरतने की भारत की अपील को जिम्मेदाराना बताते हुए उसकी सराहना की। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात में भारत जैसे देशों का संतुलित रुख बेहद अहम है।

    उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि स्वतंत्र देश अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों की निंदा करेंगे। ईरान ने दोहराया कि वह युद्ध नहीं चाहता और संघर्ष शुरू करने का उसका कोई इरादा नहीं है।

    चाबहार परियोजना पर जोर

    राजदूत ने कहा कि चाबहार पोर्ट जैसे क्षेत्रीय प्रोजेक्ट एकतरफा प्रतिबंधों से प्रभावित नहीं होने चाहिए। यह परियोजना क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने के साथ-साथ मध्य एशिया तक भारत की पहुंच मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इस संबंध में ईरान लगातार भारतीय पक्ष के संपर्क में है।

    युद्ध से ईरान में बढ़ी एकजुटता

    फतहली के अनुसार, मौजूदा संघर्ष के दौरान ईरानी जनता पहले से अधिक एकजुट हुई है और बाहरी दबाव के खिलाफ सरकार का समर्थन कर रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की नीति में बदलाव उसके गलत आकलन को दर्शाता है।

    अमेरिका पर साधा निशाना

    राजदूत ने दावा किया कि अमेरिका तीन स्तरों—ईरान की नेतृत्व क्षमता, जनता और सैन्य शक्ति—के आकलन में असफल रहा है। उन्होंने उभरते मंच ब्रिक्स के महत्व पर भी जोर दिया और सदस्य देशों से जिम्मेदार रवैया अपनाने का आग्रह किया।

    ट्रंप और नेतन्याहू की बयानबाजी पर प्रतिक्रिया

    राजदूत ने डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि ईरान की सभ्यता हजारों साल पुरानी है और वह किसी भी स्थिति में “पत्थर युग” में नहीं जाएगा। उन्होंने नागरिक ठिकानों पर हमलों को अमानवीय बताते हुए इसे हताशा का संकेत बताया।

    कुल मिलाकर, ईरान ने साफ किया है कि होर्मुज से भारतीय जहाजों की आवाजाही सुरक्षित रहेगी और क्षेत्रीय तनाव कम करने में भारत की भूमिका अहम मानी जा रही है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव के बीच 45 दिन के युद्धविराम की चर्चा

    ईरान-अमेरिका तनाव के बीच 45 दिन के युद्धविराम की चर्चा

    वाशिंगटन। ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच संभावित युद्धविराम की उम्मीद जगी है। रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान समेत कई देशों की मध्यस्थता से 45 दिनों के सीजफायर प्लान पर बातचीत शुरू हो गई है। 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी और इजरायल के हमलों के बाद शुरू हुआ यह संघर्ष क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर चिंता का कारण बना हुआ है।
    45 दिन के सीजफायर का प्रस्ताव

    रिपोर्ट के मुताबिक दो चरणों वाला प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है—

    पहला चरण: 45 दिन का अस्थायी युद्धविराम
    दूसरा चरण: स्थायी शांति समझौते पर बातचीत

    बताया गया है कि जरूरत पड़ने पर सीजफायर की अवधि बढ़ाई भी जा सकती है।

    किन देशों की मध्यस्थता?

    सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान के अलावा तुर्किये और मिस्र भी दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से भी कहा गया है कि संघर्षविराम के प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

    ईरान की शर्तें

    सूत्रों के अनुसार ईरान ने युद्ध समाप्त करने के लिए कुछ मांगें रखी हैं, जिनमें

    युद्ध का हर्जाना
    सुरक्षा की गारंटी
    कुछ प्रतिबंधों में राहत
    जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर भी बातचीत अहम मानी जा रही है।
    ट्रंप की चेतावनी

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि जल्द समझौता होने की संभावना है, लेकिन अगर ईरान ने तेजी नहीं दिखाई तो हमले तेज किए जा सकते हैं।

    उन्होंने जलमार्ग खुला रखने को लेकर भी सख्त रुख दिखाया।

    ईरान का पलटवार

    ईरान के संस्कृति मंत्री सैयद रजा सालिही-अमीरी ने ट्रंप के बयानों को खारिज करते हुए कहा कि ईरानी समाज उन्हें गंभीरता से नहीं लेता। उन्होंने कहा कि होर्मुज दुनिया के लिए खुला है, लेकिन ईरान के दुश्मनों के लिए नहीं।
    कुल मिलाकर, 45 दिन के संभावित युद्धविराम पर बातचीत ने तनाव के बीच उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन शर्तों और भरोसे की कमी के कारण स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है।

  • डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का तीखा जवाब, ‘मिडिल ईस्ट को बना देंगे नरक’

    डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का तीखा जवाब, ‘मिडिल ईस्ट को बना देंगे नरक’


    तेहरान। डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी के बाद ईरान ने कड़ा पलटवार किया है। ट्रंप ने कहा था कि यदि ईरान समझौता नहीं करता तो उस पर “कहर” बरसेगा। इसके जवाब में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ने की चेतावनी दी है।  खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघारी ने कहा कि अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो पूरा क्षेत्र अमेरिका और इजरायल के लिए “नरक” बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को हराने का भ्रम विरोधियों को दलदल में फंसा देगा।

    ड्रोन और मिसाइल हमलों का दावा

    इब्राहिम जोल्फाघारी ने दावा किया कि ईरान ने अपने ड्रोन और मिसाइलों से इजरायल और अमेरिका से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और इजरायल, ईरान पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने का दबाव बना रहे हैं। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान के पास समझौते या होर्मुज खोलने के लिए बहुत कम समय बचा है। उन्होंने लिखा कि पहले 10 दिन का समय दिया गया था और अब 48 घंटे बाद कड़ी कार्रवाई हो सकती है।


    लगातार बदलते बयान, बढ़ता तनाव

    28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुए इस संघर्ष में ट्रंप के बयान लगातार बदलते रहे हैं। एक ओर वे कूटनीतिक समाधान की बात करते हैं, तो दूसरी ओर ईरान को “स्टोन एज” में भेजने जैसी कड़ी चेतावनी भी देते हैं। युद्ध को एक महीने से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन होर्मुज अब भी पूरी तरह नहीं खुला है। दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है, जिससे इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।

    ऊर्जा संकट और बढ़ती कीमतें

    होर्मुज के बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है और ईंधन की कीमतों में तेज उछाल आया है। पहले जहां ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल थी, अब यह 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है। हालांकि, कुछ देशों के जहाजों को सीमित रूप से होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी गई है, जिनमें भारत भी शामिल है। हाल ही में एक फ्रांसीसी कंपनी का जहाज इस मार्ग से गुजरने वाला पहला बड़ा पश्चिमी यूरोपीय जहाज बना। इसके बावजूद, क्षेत्र में लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के चलते सामान्य समुद्री आवाजाही अब भी प्रभावित बनी हुई है।

  • भारत की मेजबानी में आमने-सामने होंगे UAE और ईरान, BRICS बैठक से पश्चिम एशिया पर नजर

    भारत की मेजबानी में आमने-सामने होंगे UAE और ईरान, BRICS बैठक से पश्चिम एशिया पर नजर


    नई दिल्ली। भारत की अध्यक्षता में होने जा रही ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक कूटनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है। खास बात यह है कि मौजूदा तनाव के बावजूद ईरान और संयुक्त अरब अमीरात एक ही मंच पर बैठेंगे।
    यह बैठक 14 और 15 मई को नई दिल्ली में आयोजित होगी, जिसकी अध्यक्षता भारत करेगा।

    भारत ने इस बैठक के लिए रूस, ईरान, यूएई, ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका को निमंत्रण भेजा है। माना जा रहा है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच यह बैठक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर साबित हो सकती है, जहां टकराव की स्थिति में रहे देश भी एक साथ चर्चा करेंगे।

    ब्रिक्स समूह की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से हुई थी। 2024 में इसका विस्तार कर मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को शामिल किया गया, जबकि 2025 में इंडोनेशिया भी इसमें जुड़ गया।

    ब्रिक्स देशों की कुल आबादी करीब 3.9 अरब बताई जाती है, जो वैश्विक जनसंख्या का लगभग 48 प्रतिशत है।

    रूस के उप विदेश मंत्री आंद्रेई रुडेंको ने रूसी मीडिया को बताया कि सर्गेई लावरोव बैठक में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आएंगे। इससे बैठक का महत्व और बढ़ गया है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान ने भारत से अपील की है कि अध्यक्ष के तौर पर वह एक औपचारिक बयान जारी कर अमेरिका और इजरायल की ओर से किए गए हमलों की निंदा करे।

    हालांकि, समूह के कुछ सदस्य देश इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल हैं और भारत के अमेरिका व इजरायल के साथ करीबी संबंधों को देखते हुए साझा रुख तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    इससे पहले विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि पश्चिम एशिया संघर्ष पर ब्रिक्स देशों के बीच एकमत होना आसान नहीं है। उन्होंने बिना किसी देश का नाम लिए कहा कि कुछ सदस्य सीधे इस संघर्ष से जुड़े हैं, जिसके कारण साझा बयान तैयार करना कठिन हो गया है।

    भारत फिलहाल ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अलग-अलग विचार रखने वाले देशों के बीच संतुलन बनाते हुए किसी साझा रुख पर सहमति बनाई जाए।

  • इजरायल के पास परमाणु हथियार, तो ईरान क्यों नहीं?

    इजरायल के पास परमाणु हथियार, तो ईरान क्यों नहीं?


    तेहरान। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि जब के पास परमाणु हथियार होने की बात कही जाती है, तो को इन्हें हासिल करने से क्यों रोका जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण अंतरराष्ट्रीय कानून की संरचना और देशों की संधियों में भागीदारी से जुड़ा है।
    विशेषज्ञ बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में परमाणु हथियार रखने पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है। केवल वे देश ही बाध्य होते हैं, जिन्होंने संबंधित संधियों को स्वीकार किया है। इसी संदर्भ में Nuclear Non-Proliferation Treaty यानी एनपीटी को अहम माना जाता है, जिसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देना है

    इस संधि के तहत दुनिया को परमाणु हथियार संपन्न और गैर-परमाणु देशों में बांटा गया। 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण करने वाले देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को परमाणु संपन्न माना गया, जबकि अन्य देशों ने ऐसे हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता जताई।

    ईरान 1970 से एनपीटी का सदस्य है, इसलिए वह गैर-परमाणु देश की श्रेणी में आता है और उसे परमाणु हथियार विकसित न करने की शर्तों का पालन करना होता है। साथ ही उसका परमाणु कार्यक्रम International Atomic Energy Agency की निगरानी में रहता है।

    इसके विपरीत, इजरायल एनपीटी का सदस्य नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, कोई भी देश उस संधि से बाध्य नहीं होता जिसका वह हिस्सा नहीं है। इसी वजह से इजरायल पर एनपीटी के नियम लागू नहीं होते।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यही कारण है कि दोनों देशों की कानूनी स्थिति अलग दिखाई देती है।

    इजरायल के अलावा India, Pakistan और North Korea जैसे देश भी एनपीटी के बाहर रहते हुए परमाणु क्षमता रखते हैं।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में परमाणु हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। केवल वे देश ही बाध्य होते हैं, जिन्होंने एनपीटी या 2017 की परमाणु हथियार निषेध संधि जैसे समझौतों को स्वीकार किया है। इस तरह ईरान और इजरायल के बीच अंतर किसी दोहरे मापदंड से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कानून की सहमति-आधारित व्यवस्था को दर्शाता है।

  • खाड़ी देश कोई युद्ध रोकने के पक्ष में तो कोई ईरान पर हमले तेज करने की मांग में

    खाड़ी देश कोई युद्ध रोकने के पक्ष में तो कोई ईरान पर हमले तेज करने की मांग में

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध का 28वां दिन और तनावपूर्ण हो गया है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के कई अहम ठिकानों पर फिर हमले किए हैं, जिससे संकट और गहरा गया है।
    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ईरानी ऊर्जा ठिकानों पर संभावित हमलों को आगे बढ़ाते हुए तेहरान को चेतावनी दी है कि वह को खोले, अन्यथा उसके ऊर्जा संयंत्र निशाने पर आ सकते हैं।
    खाड़ी देश दो फाड़
    ईरान को लेकर खाड़ी के मुस्लिम देश अलग-अलग रुख अपनाते दिख रहे हैं। कतर, ओमान और कुवैत आर्थिक नुकसान और जवाबी हमलों के डर से युद्ध जल्द खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।
    सूत्रों के मुताबिक, खाड़ी देश कतर, ओमान और कुवैत और Bahrain का मानना है कि जब तक ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता खत्म नहीं होती, तब तक उस पर हमले जारी रहने चाहिए। इन देशों का कहना है कि अधूरा समझौता भविष्य में फिर संकट पैदा कर सकता है।

    अमेरिका से सख्त समझौते की मांग
    खाड़ी देशों ने निजी बातचीत में अमेरिका से कहा है कि किसी भी समझौते में ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं पर स्थायी रोक, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उनका जोर इस बात पर है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को भविष्य में हथियार की तरह इस्तेमाल न किया जा सके।

    बार-बार हमलों से बढ़ी चिंता
    खाड़ी देशों का कहना है कि ईरान ने युद्ध के दौरान उनके ऊर्जा और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वे ऐसे व्यापक समझौते की मांग कर रहे हैं जिसमें प्रॉक्सी युद्ध, तेल मार्गों की सुरक्षा और समुद्री यातायात की गारंटी शामिल हो।

    एमिरेट्स पॉलिसी सेंटर की प्रमुख Ebtesam Al-Ketbi ने कहा कि असली चुनौती सिर्फ युद्ध रोकना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसे संकट से बचाव सुनिश्चित करना है। वहीं अमेरिका में यूएई के राजदूत Yousef Al Otaiba ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता की परीक्षा बताया।

    सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया आकलन में ईरान के मिसाइल भंडार का करीब एक-तिहाई हिस्सा नष्ट होने का अनुमान है, लेकिन उसकी क्षमताएं अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ऐसे में खाड़ी देश 2015 के परमाणु समझौते से अधिक व्यापक नए समझौते की मांग कर रहे हैं, ताकि पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

  • ईरान को अमेरिका की चेतावनी- हार नहीं मानी तो होगा और भीषण हमला

    ईरान को अमेरिका की चेतावनी- हार नहीं मानी तो होगा और भीषण हमला


    वॉशिंगटन.
     अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब और गहरा होता जा रहा है। जहां एक ओर युद्धविराम को लेकर बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी और सैन्य दबाव तेज हो गया है। व्हाइट हाउस ने साफ किया है कि वार्ता अभी डेड एंड पर नहीं पहुंची है, लेकिन हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को और तेज कर सकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि तेहरान अपनी सैन्य हार को स्वीकार नहीं करता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले से भी अधिक कड़ा कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

    पाकिस्तान में संभावित बैठक पर बयान

    लेविट ने कहा कि पाकिस्तान में ईरान से वार्ता को लेकर कई अटकलें हैं, लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा आधिकारिक घोषणा के बिना किसी को भी इसे मान्य नहीं समझना चाहिए। लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप धमकी नहीं देते, बल्कि कार्रवाई करते हैं। उन्होंने ईरान को चेतावनी दी कि पिछली गलत गणना ने उनकी वरिष्ठ नेतृत्व टीम, नौसेना, वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ तीन दिनों तक उपजाऊ बातचीत की, जिसके कारण कुछ हमलों को अस्थायी रूप से स्थगित किया गया। ईरान के लिए यह एक और अवसर है कि वे अपने परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से छोड़ें और अमेरिका व उसके सहयोगियों को खतरा न बनें।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर फोकस
    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य रणनीति का एक प्रमुख लक्ष्य होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना है। यह क्षेत्र वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से तेल टैंकरों के गुजरने का निर्णय केवल राष्ट्रपति ट्रंप ही कर सकते हैं। फिलहाल इस बारे में कोई निश्चित समयसीमा नहीं है, लेकिन प्रशासन इस पर तेजी से काम कर रहा है।

    लेविट ने यह भी कहा कि ट्रंप ने यह दिखाया है कि वे मुक्त दुनिया के नेता और सबसे शक्तिशाली सेना के प्रमुख हैं। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों में यह साबित किया कि अमेरिका के सहयोगी उनके नेतृत्व में फैसलों का समर्थन करते हैं, जो अमेरिका और वैश्विक हितों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

    ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर वार्ता तय
    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने जानकारी दी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच लंबे समय से प्रस्तावित बैठक अब 14 और 15 मई को बीजिंग में आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि यह बैठक दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक में पश्चिम एशिया संघर्ष का निष्कर्ष चर्चा का पूर्व शर्त नहीं था। केवल बैठक की तारीख को पुनर्निर्धारित किया गया।

    साथ ही, आगे चलकर राष्ट्रपति ट्रंप और प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन की मेजबानी वॉशिंगटन डीसी में भी करेंगे। इस पारस्परिक दौरे की तारीखों की घोषणा फिलहाल बाद में की जाएगी। यह पहल दोनों वैश्विक शक्तियों के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

    ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का असर
    प्रेस ब्रीफिंग में लेविट ने बताया कि अमेरिकी सेना द्वारा चलाया जा रहा ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अब तक बड़ी सफलता हासिल कर चुका है। उन्होंने दावा किया कि तीन हफ्तों के भीतर 9,000 से अधिक लक्ष्यों को निशाना बनाया गया है। उनके अनुसार, इस अभियान के बाद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में लगभग 90% की कमी आई है। साथ ही, अमेरिका ने ईरान की नौसेना को भी भारी नुकसान पहुंचाया है और 140 से अधिक नौसैनिक जहाजों को नष्ट किया गया है।

    ईरान की नौसेना के 140 से अधिक जहाज, जिनमें लगभग 50 माइन लेयर शामिल हैं, नष्ट किए गए। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी तीन-सप्ताह के अभियान में सबसे बड़ी नौसेना ध्वंस कार्रवाई है। अमेरिका ईरान की रक्षा औद्योगिक क्षमता को भी व्यवस्थित नष्ट कर रहा है, ताकि भविष्य में क्षेत्रीय खतरे को रोका जा सके। लेविट ने जोर देकर कहा कि अमेरिकी सेना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ऊर्जा के मुक्त प्रवाह और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने पर पूरी तरह से केंद्रित है।

    लेविट ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के विवरण सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के प्रमुख सदस्य हैं और उन्होंने पूरे प्रशासनिक कार्यकाल में महत्वपूर्ण वार्ता में हिस्सा लिया है, जिनमें इस्राइल और गाजा के बीच युद्धविराम और बंधकों की रिहाई शामिल है।

    घरेलू मुद्दों पर भी हमला
    प्रेस सचिव ने इस दौरान अमेरिकी घरेलू राजनीति पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने सैंक्चुअरी सिटी नीतियों को लेकर डेमोक्रेटिक राज्यों की आलोचना करते हुए कहा कि अवैध प्रवासियों को सुरक्षा देना अमेरिकी नागरिकों के हितों के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया आखिर कितने और अमेरिकियों की जान जाएगी, तब जाकर यह नीतियां खत्म होंगी?