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  • खाड़ी देश कोई युद्ध रोकने के पक्ष में तो कोई ईरान पर हमले तेज करने की मांग में

    खाड़ी देश कोई युद्ध रोकने के पक्ष में तो कोई ईरान पर हमले तेज करने की मांग में

    तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध का 28वां दिन और तनावपूर्ण हो गया है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के कई अहम ठिकानों पर फिर हमले किए हैं, जिससे संकट और गहरा गया है।
    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ईरानी ऊर्जा ठिकानों पर संभावित हमलों को आगे बढ़ाते हुए तेहरान को चेतावनी दी है कि वह को खोले, अन्यथा उसके ऊर्जा संयंत्र निशाने पर आ सकते हैं।
    खाड़ी देश दो फाड़
    ईरान को लेकर खाड़ी के मुस्लिम देश अलग-अलग रुख अपनाते दिख रहे हैं। कतर, ओमान और कुवैत आर्थिक नुकसान और जवाबी हमलों के डर से युद्ध जल्द खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।
    सूत्रों के मुताबिक, खाड़ी देश कतर, ओमान और कुवैत और Bahrain का मानना है कि जब तक ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता खत्म नहीं होती, तब तक उस पर हमले जारी रहने चाहिए। इन देशों का कहना है कि अधूरा समझौता भविष्य में फिर संकट पैदा कर सकता है।

    अमेरिका से सख्त समझौते की मांग
    खाड़ी देशों ने निजी बातचीत में अमेरिका से कहा है कि किसी भी समझौते में ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं पर स्थायी रोक, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उनका जोर इस बात पर है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को भविष्य में हथियार की तरह इस्तेमाल न किया जा सके।

    बार-बार हमलों से बढ़ी चिंता
    खाड़ी देशों का कहना है कि ईरान ने युद्ध के दौरान उनके ऊर्जा और नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वे ऐसे व्यापक समझौते की मांग कर रहे हैं जिसमें प्रॉक्सी युद्ध, तेल मार्गों की सुरक्षा और समुद्री यातायात की गारंटी शामिल हो।

    एमिरेट्स पॉलिसी सेंटर की प्रमुख Ebtesam Al-Ketbi ने कहा कि असली चुनौती सिर्फ युद्ध रोकना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसे संकट से बचाव सुनिश्चित करना है। वहीं अमेरिका में यूएई के राजदूत Yousef Al Otaiba ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता की परीक्षा बताया।

    सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया आकलन में ईरान के मिसाइल भंडार का करीब एक-तिहाई हिस्सा नष्ट होने का अनुमान है, लेकिन उसकी क्षमताएं अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ऐसे में खाड़ी देश 2015 के परमाणु समझौते से अधिक व्यापक नए समझौते की मांग कर रहे हैं, ताकि पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

  • ईरान को अमेरिका की चेतावनी- हार नहीं मानी तो होगा और भीषण हमला

    ईरान को अमेरिका की चेतावनी- हार नहीं मानी तो होगा और भीषण हमला


    वॉशिंगटन.
     अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब और गहरा होता जा रहा है। जहां एक ओर युद्धविराम को लेकर बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी और सैन्य दबाव तेज हो गया है। व्हाइट हाउस ने साफ किया है कि वार्ता अभी डेड एंड पर नहीं पहुंची है, लेकिन हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को और तेज कर सकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि तेहरान अपनी सैन्य हार को स्वीकार नहीं करता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले से भी अधिक कड़ा कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

    पाकिस्तान में संभावित बैठक पर बयान

    लेविट ने कहा कि पाकिस्तान में ईरान से वार्ता को लेकर कई अटकलें हैं, लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा आधिकारिक घोषणा के बिना किसी को भी इसे मान्य नहीं समझना चाहिए। लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप धमकी नहीं देते, बल्कि कार्रवाई करते हैं। उन्होंने ईरान को चेतावनी दी कि पिछली गलत गणना ने उनकी वरिष्ठ नेतृत्व टीम, नौसेना, वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ तीन दिनों तक उपजाऊ बातचीत की, जिसके कारण कुछ हमलों को अस्थायी रूप से स्थगित किया गया। ईरान के लिए यह एक और अवसर है कि वे अपने परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से छोड़ें और अमेरिका व उसके सहयोगियों को खतरा न बनें।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर फोकस
    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य रणनीति का एक प्रमुख लक्ष्य होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना है। यह क्षेत्र वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से तेल टैंकरों के गुजरने का निर्णय केवल राष्ट्रपति ट्रंप ही कर सकते हैं। फिलहाल इस बारे में कोई निश्चित समयसीमा नहीं है, लेकिन प्रशासन इस पर तेजी से काम कर रहा है।

    लेविट ने यह भी कहा कि ट्रंप ने यह दिखाया है कि वे मुक्त दुनिया के नेता और सबसे शक्तिशाली सेना के प्रमुख हैं। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों में यह साबित किया कि अमेरिका के सहयोगी उनके नेतृत्व में फैसलों का समर्थन करते हैं, जो अमेरिका और वैश्विक हितों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

    ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर वार्ता तय
    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने जानकारी दी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच लंबे समय से प्रस्तावित बैठक अब 14 और 15 मई को बीजिंग में आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि यह बैठक दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक में पश्चिम एशिया संघर्ष का निष्कर्ष चर्चा का पूर्व शर्त नहीं था। केवल बैठक की तारीख को पुनर्निर्धारित किया गया।

    साथ ही, आगे चलकर राष्ट्रपति ट्रंप और प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन की मेजबानी वॉशिंगटन डीसी में भी करेंगे। इस पारस्परिक दौरे की तारीखों की घोषणा फिलहाल बाद में की जाएगी। यह पहल दोनों वैश्विक शक्तियों के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

    ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का असर
    प्रेस ब्रीफिंग में लेविट ने बताया कि अमेरिकी सेना द्वारा चलाया जा रहा ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अब तक बड़ी सफलता हासिल कर चुका है। उन्होंने दावा किया कि तीन हफ्तों के भीतर 9,000 से अधिक लक्ष्यों को निशाना बनाया गया है। उनके अनुसार, इस अभियान के बाद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में लगभग 90% की कमी आई है। साथ ही, अमेरिका ने ईरान की नौसेना को भी भारी नुकसान पहुंचाया है और 140 से अधिक नौसैनिक जहाजों को नष्ट किया गया है।

    ईरान की नौसेना के 140 से अधिक जहाज, जिनमें लगभग 50 माइन लेयर शामिल हैं, नष्ट किए गए। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी तीन-सप्ताह के अभियान में सबसे बड़ी नौसेना ध्वंस कार्रवाई है। अमेरिका ईरान की रक्षा औद्योगिक क्षमता को भी व्यवस्थित नष्ट कर रहा है, ताकि भविष्य में क्षेत्रीय खतरे को रोका जा सके। लेविट ने जोर देकर कहा कि अमेरिकी सेना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ऊर्जा के मुक्त प्रवाह और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने पर पूरी तरह से केंद्रित है।

    लेविट ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के विवरण सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के प्रमुख सदस्य हैं और उन्होंने पूरे प्रशासनिक कार्यकाल में महत्वपूर्ण वार्ता में हिस्सा लिया है, जिनमें इस्राइल और गाजा के बीच युद्धविराम और बंधकों की रिहाई शामिल है।

    घरेलू मुद्दों पर भी हमला
    प्रेस सचिव ने इस दौरान अमेरिकी घरेलू राजनीति पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने सैंक्चुअरी सिटी नीतियों को लेकर डेमोक्रेटिक राज्यों की आलोचना करते हुए कहा कि अवैध प्रवासियों को सुरक्षा देना अमेरिकी नागरिकों के हितों के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया आखिर कितने और अमेरिकियों की जान जाएगी, तब जाकर यह नीतियां खत्म होंगी?

  • मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

    मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

    तेहरान। ईरान ने मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध समाप्त करने के लिए नए कानूनी और रणनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में छह शर्तें रखी हैं। यह युद्ध रविवार को अपने 23वें दिन में प्रवेश कर गया। ईरान की ओर से रखी गयी शर्तें हैं- होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार करना, युद्ध की पुनरावृत्ति रोकने की गारंटी, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करना, ईरान के इस्लामी गणराज्य को हर्जाने का भुगतान करना, सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर युद्धों को समाप्त करना और ईरान के प्रति शत्रुता रखने वाले मीडिया जगत के लोगों पर मुकदमा चलाना और उनका प्रत्यर्पण करना।

    ईरान के ये प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के एक दिन बाद आये हैं, जिसमें उन्होंने शनिवार को कहा था कि अमेरिका पश्चिम एशिया में सैन्य प्रयासों को ‘समेटने’ के लक्ष्यों को पूरा करने के ‘बहुत करीब’ है। उन्होंने संकेत दिया कि वह पश्चिम एशिया के अभियानों को खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी ने अज्ञात वरिष्ठ राजनीतिक और सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि ईरान अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपने रक्षात्मक युद्ध में पूर्व-नियोजित, बहु-चरणीय योजना लागू कर रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह रणनीति महीनों पहले विकसित की गयी थी और इसे उच्च रणनीतिक धैर्य के साथ अंजाम दिया जा रहा है।

    अधिकारी ने कहा कि पूरे क्षेत्र में अमेरिकी-इजरायली हवाई रक्षा प्रणालियों और रडार बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने और नष्ट करने के बाद ईरान ने अब इजरायली सत्ता के हवाई क्षेत्र पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ स्थापित कर लिया है। अधिकारी ने कहा कि ईरान ‘आक्रमणकारी को सजा देने’ की अपनी नीति तब तक जारी रखने का इरादा रखता है, जब तक वह अमेरिका-इजरायली आक्रामकता और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘ऐतिहासिक सबक’ नहीं सिखा देता। अधिकारी ने आगे बताया कि कई क्षेत्रीय पक्षों और मध्यस्थों ने युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से ईरान को प्रस्ताव भेजे हैं। ईरान ने उनके सामने ऐसी शर्तें रखी हैं, जिन्हें किसी भी समझौते पर पहुंचने से पहले पूरा किया जाना और गंभीरता से लिया जाना जरूरी है।
    युद्ध के दो-तीन हफ्ते चलने की और उम्मीद

    वहीं, ‘एक्सियोस’ ने व्हाइट हाउस के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कहा था कि वह संघर्ष को समेटने पर विचार कर रहे हैं, हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया कि वे अभी दो-तीन सप्ताह और सैन्य अभियानों की उम्मीद कर रहे हैं। इसके समानांतर सलाहकारों ने बातचीत के लिए जमीन तैयार करना शुरू कर दिया है, ताकि यदि कोई अवसर मिले तो उसका लाभ उठाया जा सके। पर्दे के पीछे काम करते हुए विशेष दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ पहले से ही तेहरान के अधिकारियों के साथ कूटनीतिक संपर्क की शुरुआती योजना बनाने में जुटे हैं। अधिकारियों ने कहा है कि ईरान के साथ किसी भी समझौते के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खुलवाना, इस्लामिक गणराज्य के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के विशाल भंडार का समाधान करना और उसके परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रॉक्सी मिलिशिया और आतंकी समूहों के समर्थन पर दीर्घकालिक सीमाएं तय करना आवश्यक होगा।

  • युद्ध के लिए फंडिंग…. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक जहाज निकालने के 20 लाख डॉलर वसूल रहा ईरान

    युद्ध के लिए फंडिंग…. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक जहाज निकालने के 20 लाख डॉलर वसूल रहा ईरान


    तेहरान।
    अमेरिका और इजरायल (America and Israel) से युद्ध लड़ रहा ईरान (Iran) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर जहाजों से वसूली (Recovery Ships) कर रहा है। खबर है कि कुछ जहाजों को गुजरने देने के लिए लाखों डॉलर लिए जा रहे हैं। ईरान के एक सांसद ने ही ऐसा दावा किया है। इससे पहले ईरान ने धमकी दी थी कि अगर अमेरिका की तरफ से हमले किए जाते हैं, तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा।

    ईरान इंटरनेशनल के अनुसार, ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य, अलादीन ब्रूजेर्दी ने कहा कि यह कदम पहले ही लागू किया जा चुका है। उन्होंने कहा, ‘अब, चूंकि युद्ध की अपनी लागत होती है, इसलिए स्वाभाविक रूप से हमें यह करना चाहिए और Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों से ट्रांजिट शुल्क लेना चाहिए।’

    ब्रूजेर्दी ने डोनाल्ड ट्रंप की उस चेतावनी का भी जिक्र किया, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि यदि 48 घंटों के भीतर स्ट्रेट को नहीं खोला गया, तो अमेरिका ईरान के बिजली और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है। इसके जवाब में ब्रूजेर्दी ने कहा कि इजरायल का ऊर्जा ढांचा भी ईरान की पहुंच में है और उसे ‘एक दिन के भीतर’ पूरी तरह तबाह किया जा सकता है।


    अमेरिका अलर्ट

    संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने रविवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ अपनी ‘रेड लाइन्स’ पर अडिग हैं। उन्होंने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की लगभग नाकेबंदी का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान को दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को बंधक नहीं बनाने देंगे।


    ट्रंप ने कहा था 48 घंटे में होर्मुज खोले ईरान

    अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि अगर ईरान ने 48 घंटों के अंदर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से फिर नहीं खोला तो ईरान के बिजली संयंत्रों को पूरी तरह तबाह कर देंगे। ट्रंप का यह बयान शनिवार को दिए उनके बयान से उलट था। उन्होंने कहा था कि वह युद्ध को खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन रविवार तड़के उन्होंने ईरान को नई धमकी दे डाली। ट्रंप की यह धमकी ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी नौसैनिक और भारी लैंडिंग क्राफ्ट क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं।

    आईजी मार्केट विश्लेषक टोनी साइकैमोर ने कहा, राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी ने अब बाजारों पर 48 घंटे की अनिश्चितता का टिक टिक करता हुआ टाइम बम रख दिया है। यदि इस अल्टीमेटम को वापस नहीं लिया गया, तो हम सोमवार को दुनियाभर के शेयर बाजारों को ‘ब्लैक मंडे’ के रूप में गिरते हुए और तेल की कीमतों को काफी ऊंचे स्तर पर जाते हुए देखेंगे।


    बंद कर सकता है ईरान

    ईरान की सेना ने चेतावनी दी कि यदि ट्रंप देश के बिजली संयंत्रों को निशाना बनाते हैं, तो वे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर देंगे। सेना की ऑपरेशनल कमांड ‘खातम अल-अंबिया’ ने सरकारी टीवी द्वारा प्रसारित बयान में कहा, यदि ईरान के बिजली संयंत्रों के संबंध में अमेरिका की धमकियों पर अमल किया गया, तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा, और इसे तब तक नहीं खोला जाएगा जब तक कि हमारे नष्ट किए गए बिजली संयंत्रों का पुनर्निर्माण नहीं हो जाता।

  • लंबे युद्ध की तैयारी….. फूड सप्लाई सुरक्षित करने में जुटा ईरान, खाद्यान  से भरे 6 जहाज होर्मुज से गुजरे

    लंबे युद्ध की तैयारी….. फूड सप्लाई सुरक्षित करने में जुटा ईरान, खाद्यान से भरे 6 जहाज होर्मुज से गुजरे


    तेहरान।
    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर ईरान (Iran) की सख्त पहरेदारी है। तेल वाले जहाजों को यहां से गुजरने की मनाही है। सिर्फ इक्का-दुक्का जहाज ही, ईरान की सहमति से इधर से जा रहे हैं। इस बीच ईरान ने कुछ और जहाजों को भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की इजाजत दी है। यह कार्गो जहाज हैं, जिन पर खाद्यान्न और अन्य कृषि पदार्थ लदे हुए हैं। अमेरिका (America) के साथ चल रहे युद्ध के बीच ईरान अपने देश में फूड सप्लाई को सुरक्षित रखना चाहता है। इसे इस तरह भी देखा जा रहा है कि अगर युद्ध लंबा चलता है तो ईरान में भुखमरी की हालत न पैदा होने पाए। यह सभी जहाज ग्रीक मैनेजमेंट की निगरानी वाले हैं। बता दें कि 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से बहुत कम जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरे हैं। इसमें भी पश्चिम के जहाजों के लिए तो यह रास्ता लगभग बंद ही है। 11 मार्च को स्टार ग्वानेथ नाम का जहाज यहां से गुजर रहा था, जिस पर मिसाइल से हमले हुए थे।


    15 और 16 मार्च को गुजरे

    मरीन ट्रैकिंग डेटा के आंकड़ों के मुताबिक कम से कम छह जहाज, 15 और 16 मार्च के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरे हैं। इन सभी ने उत्तरी खाड़ी के बेहद महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र, ईरान के इमाम खुमैनी बंदरगाह पर माल उतारा। एनालिस्ट फर्म केपलर के मुताबिक नौ मार्च के बाद से पोर्ट पर माल उतारने के बाद पांच अन्य जहाज भी होर्मुज से होकर गुजरे हैं। इन सभी ने वैकल्पिक शिपिंग लेन का उपयोग किया। इन जहाजों में से एक, गियाकोमेटी था, जिसमें कनाडाई सोयाबीन ले जाई गई। इसने शुक्रवार को खाड़ी में प्रवेश किया। इनके आने का उद्देश्य घरेलू खाद्य आपूर्ति को बनाए रखना दिखाई देता है। बता दें कि ईरान अपनी खाद्य जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खुद पैदा करता है। वहीं, अनाज और तेल बीजों के आयात पर निर्भर रहता है। इनका इस्तेमाल कुकिंग ऑयल और पशु चारे के लिए किया जाता है।


    अनाज स्टोर करने पर जोर

    ग्रेन कंसल्टेंसी सॉइकॉन के मैनेजिंग डायरेक्टर आंद्रे सिजोव के मुताबिक, ईरान हर साल करीब 1.5 मिलियन टन मक्के का उत्पादन करता है। वहीं, ब्राजील से 8 मिलियन से 10 मिलियन टन तक का आयात भी करता है। उन्होंने बताया कि कृषि इस देश के लिए एक बड़ी परेशानी है। वजह, यहां पर पानी की कमी के चलते उत्पादन ठीक नहीं रहता। यह किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है। बता दें कि युद्ध से पहले ईरान ने करीब 4 मिलियन टन गेहूं का रणनीतिक भंडार तैयार कर लिया था। यह चार महीने तक उसकी घरेलू मांग को पूरा करने में सक्षम है। कृषि मंत्री गोलामरेजा नूरी गेजेलजेह ने हाल ही में कहा कि बेकरीज को लगभग दो महीने के आटे का आवंटन किया गया है। नागरिकों से अपील की गई है कि वह घबराकर खरीदारी न करें।

    गौरतलब है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के युद्ध के चलते ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी कर रखी है। बहुत ही सीमित संख्या में यहां से जहाजों का आना-जाना हो रहा है। होर्मुज को लेकर ईरान की सख्ती के चलते वैश्विक व्यापार को बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। गौरतलब है कि दुनिया के तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है। अब यहां से सप्लाई बंद होने के चलते तेल और गैस की कीमतों में काफी ज्यादा इजाफा हो रहा है।

  • तेल-गैस के बाद इंटरनेट पर भी संकट? ईरान के कदम से वैश्विक कनेक्टिविटी पर खतरा, भारत भी प्रभावित हो सकता है

    तेल-गैस के बाद इंटरनेट पर भी संकट? ईरान के कदम से वैश्विक कनेक्टिविटी पर खतरा, भारत भी प्रभावित हो सकता है


    तेहरान।
     मध्य पूर्व में जारी तनाव अब सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क पर भी खतरा मंडराने लगा है। ईरान द्वारा हॉर्मुज में ऊर्जा आपूर्ति बाधित करने के बाद अब समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन केबलों को नुकसान पहुंचता है, तो दुनिया के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं ठप हो सकती हैं, जिसका असर India सहित कई देशों की बैंकिंग और डिजिटल सेवाओं पर पड़ेगा।

    दो अहम समुद्री रास्ते खतरे में
    रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक कनेक्टिविटी के लिए दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गहॉर्मुज  और बाब-अल-मंदेब मार्ग इस समय जोखिम में हैं। इन दोनों इलाकों के समुद्र तल में फाइबर ऑप्टिक केबलों का विशाल नेटवर्क फैला हुआ है, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ता है।

    बताया जा रहा है कि हॉर्मुज क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों और संभावित सुरंगों के कारण शिपिंग और बीमा कंपनियां पहले ही सतर्क हो गई हैं। वहीं लाल सागर क्षेत्र में Houthis के हमलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

    इंटरनेट की रीढ़ हैं ये केबल
    समुद्र के नीचे बिछी ये फाइबर केबलें हजारों किलोमीटर लंबी होती हैं और दुनिया के अधिकांश डेटा ट्रांसफर का आधार हैं। वीडियो कॉल, ईमेल, ऑनलाइन बैंकिंग से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेवाएं—सब कुछ इन्हीं पर निर्भर करता है।

    हॉर्मुज के संकरे हिस्सों में समुद्र की गहराई लगभग 200 फीट तक ही है, जिससे इन केबलों को निशाना बनाना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है।

    करीब 20 केबलों पर मंडरा रहा खतरा
    लाल सागर और हॉर्मुज क्षेत्र में करीब 20 प्रमुख केबल मौजूद हैं, जिनमें 17 लाल सागर से होकर गुजरती हैं। हॉर्मुज मार्ग में AAE-1, Falcon, Gulf Bridge International और Tata TGN-Gulf जैसी महत्वपूर्ण लाइनें शामिल हैं। ये केबल सीधे तौर पर भारत के अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक को सपोर्ट करती हैं।

    डिजिटल दुनिया पर बड़ा असर संभव
    Amazon, Microsoft और Google जैसी बड़ी टेक कंपनियों के मिडिल ईस्ट में स्थापित डाटा सेंटर भी इन्हीं केबलों से जुड़े हैं। ऐसे में अगर कनेक्टिविटी प्रभावित होती है, तो क्लाउड सेवाएं, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर, यह संकट दिखाता है कि आधुनिक दुनिया की डिजिटल लाइफलाइन कितनी नाजुक है—जहां एक क्षेत्रीय संघर्ष भी वैश्विक इंटरनेट और अर्थव्यवस्था को झकझोर सकता है।

  • ईरान युद्ध में अमेरिकी सैनिक नहीं भेजेंगे: ट्रंप का यू-टर्न, बोले-‘कहीं भी सेना तैनात नहीं कर रहा’

    ईरान युद्ध में अमेरिकी सैनिक नहीं भेजेंगे: ट्रंप का यू-टर्न, बोले-‘कहीं भी सेना तैनात नहीं कर रहा’


    वॉशिंगटन। अमेरिका 
    राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच बड़ा बयान देते हुए साफ कर दिया है कि वह ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी जमीनी सैनिक नहीं भेजेंगे। यह बयान ऐसे समय आया है, जब युद्ध चौथे सप्ताह में पहुंच चुका है और अमेरिका की भूमिका को लेकर अटकलें तेज थीं।

    व्हाइट हाउस में Sanae Takaichi के साथ बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “मैं कहीं भी सैनिक नहीं भेज रहा हूं… और अगर भेज भी रहा होता, तो आपको नहीं बताता। लेकिन स्पष्ट कर दूं—हम वहां सैनिक नहीं भेज रहे।”

    गौरतलब है कि युद्ध की शुरुआत के कुछ दिन बाद ट्रंप ने जमीनी सेना भेजने की संभावना से इनकार नहीं किया था, लेकिन अब उनका रुख बदलता नजर आ रहा है।

    ‘जरूरत पड़ी तो कार्रवाई करेंगे’
    हालांकि ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका पूरी तरह पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने कहा कि हालात के मुताबिक जो जरूरी होगा, वह किया जाएगा। ट्रंप लंबे समय से विदेशी जमीन पर अमेरिकी सैनिक भेजने के आलोचक रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में भी उन्होंने Afghanistan से सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया शुरू की थी।

    ईरान को बताया बड़ा खतरा
    ट्रंप ने Iran को वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताते हुए कहा कि “जब यह अभियान खत्म होगा, तो दुनिया पहले से ज्यादा सुरक्षित होगी।”

    उन्होंने अमेरिकी सेना की ताकत का जिक्र करते हुए दावा किया कि हालिया हमलों में दागे गए 114 रॉकेट्स को एयर डिफेंस सिस्टम ने सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया।

    जंग लंबी खिंचने के संकेत
    28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष में United States और Israel एक ओर हैं, जबकि दूसरी ओर Iran डटा हुआ है। शुरुआती आकलन था कि ईरान में सत्ता परिवर्तन जल्दी हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

    विशेषज्ञों का मानना है कि केवल हवाई हमलों के जरिए न तो सत्ता परिवर्तन संभव है और न ही ईरान के संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है, क्योंकि इसे गहरे भूमिगत ठिकानों में सुरक्षित रखा गया है।

    जमीनी युद्ध से क्यों बच रहा अमेरिका?
    विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान में जमीनी युद्ध बेहद महंगा और जोखिम भरा साबित हो सकता है। वहां की भौगोलिक परिस्थितियां और सैन्य ताकत अमेरिकी सेना के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

    ऐसे में ट्रंप का सैनिक न भेजने का फैसला संकेत देता है कि अमेरिका फिलहाल इस युद्ध को सीमित दायरे में रखकर ही आगे बढ़ना चाहता है, ताकि बड़े और लंबे जमीनी संघर्ष से बचा जा सके।

  • 2 मुस्लिम देशों की ईरान को चेतावनी, क्या सऊदी-पाकिस्तान जंग में उतरेंगे

    2 मुस्लिम देशों की ईरान को चेतावनी, क्या सऊदी-पाकिस्तान जंग में उतरेंगे


    रियाद।
     मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ईरान  के खिलाफ 12 मुस्लिम देशों ने एकजुट होकर कड़ा रुख अपनाया है। साउदी अरब  की राजधानी में हुई अहम बैठक में पाकिस्‍तान समेत कई देशों के विदेश मंत्रियों ने ईरान से तुरंत हमले रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की मांग की।

    बैठक में । अज़रबैजान, बहरीन, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात  जैसे देश शामिल रहे। सभी ने नागरिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की कड़ी निंदा की।

    ईरान को सख्त संदेश

    बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में तेल संयंत्रों, हवाई अड्डों, रिहायशी इलाकों और राजनयिक मिशनों पर हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया। देशों ने United Nations चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा के अधिकार का भी जिक्र किया और United Nations Security Council के प्रस्तावों के पालन की मांग की।

    साथ ही ईरान से हॉर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में हस्तक्षेप न करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की अपील की गई।

    सऊदी विदेश मंत्री की कड़ी चेतावनी
    सऊदी विदेश मंत्री Faisal bin Farhan Al Saud ने साफ कहा कि ईरान पर भरोसा “पूरी तरह खत्म” हो चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि तेहरान दबाव और आक्रामक रणनीति के जरिए क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

    उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जरूरत पड़ी तो सऊदी अरब “उचित कदम” उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनका यह बयान सीधे तौर पर सैन्य कार्रवाई की संभावना की ओर इशारा माना जा रहा है।

    क्या पाकिस्तान भी जंग में खिंच सकता है?
    विश्लेषकों का मानना है कि यदि Saudi Arabia सीधे संघर्ष में उतरता है, तो उसका रक्षा सहयोग समझौता Pakistan के साथ सक्रिय हो सकता है। ऐसे में इस्लामाबाद भी इस टकराव का हिस्सा बन सकता है, जिससे संघर्ष और व्यापक हो सकता है।

    खाड़ी देशों पर हमलों से बढ़ा तनाव
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद ईरान ने खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सभी छह देशों को निशाना बनाया है। Abu Dhabi और Dubai में हुए हमलों में कई नागरिकों की मौत हुई, जबकि Kuwait, Oman और Bahrain में भी नुकसान की खबरें हैं।

    Qatar के अल-उदीद एयरबेस और Saudi Arabia के तेल ठिकानों पर भी हमले किए गए, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

    स्थिति बेहद संवेदनशील
    मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहा। अगर सऊदी अरब और उसके सहयोगी सीधे मैदान में उतरते हैं, तो यह टकराव पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकता है—जिसके वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक असर भी गंभीर हो सकते हैं।

  • मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत

    मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत



    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच हालात और गंभीर होते नजर आ रहे हैं। Iran, United States और Israel के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच अब संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका बड़ा कदम उठा सकता है, जिससे जंग और फैलने की आशंका बढ़ गई है।

    19 दिन से जारी भीषण टकराव
    पिछले करीब तीन हफ्तों से जारी संघर्ष में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के शीर्ष ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाया, वहीं ईरान ने जवाब में इजरायल और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं।

    हाल ही में ईरान ने Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates के तेल-गैस ठिकानों को भी निशाना बनाया, जिससे युद्ध का दायरा और बढ़ गया है।

    हजारों अमेरिकी सैनिक भेजने की तैयारी
    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर विचार कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का प्लान तैयार किया जा रहा है, ताकि ईरान के खिलाफ ऑपरेशन को और मजबूत किया जा सके।

    क्या है अमेरिका की रणनीति?
    सूत्रों के अनुसार, सैनिकों की तैनाती से अमेरिका को कई सैन्य विकल्प मिल सकते हैं। इनमें सबसे अहम है Strait of Hormuz में तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना।

    यह मिशन मुख्य रूप से एयरफोर्स और नेवी के जरिए चलाया जा सकता है। हालांकि कुछ विकल्प ऐसे भी हैं, जिनमें ईरान के तटीय इलाकों के पास सैनिकों की तैनाती की बात सामने आई है।

    खतरनाक योजना: खर्ग द्वीप पर नजर
    अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि Kharg Island पर जमीनी सेना भेजने के विकल्प पर चर्चा हुई है।

    यह द्वीप ईरान के लगभग 90% तेल निर्यात का केंद्र है, इसलिए यहां कोई भी सैन्य कार्रवाई बेहद संवेदनशील और जोखिम भरी मानी जा रही है। ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता इसे और खतरनाक बना देती है।

    राजनीतिक जोखिम भी कम नहीं
    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैनिकों की सीधी तैनाती Donald Trump के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है।

    अमेरिकी जनता में इस युद्ध को लेकर समर्थन सीमित है

    ट्रंप पहले ही मिडिल ईस्ट में नए युद्ध से दूर रहने का वादा कर चुके हैं

    हाल में एक अमेरिकी अधिकारी ने नाराजगी जताते हुए इस्तीफा भी दिया है

    इसके अलावा, इस संघर्ष में अब तक 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत और करीब 200 के घायल होने की खबर है।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के संभावित सैन्य कदम हालात को और विस्फोटक बना सकते हैं। यदि सैनिकों की तैनाती होती है, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

  • समलैंगिक हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा? सुनकर हंस पड़े ट्रंप

    समलैंगिक हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा? सुनकर हंस पड़े ट्रंप


    वॉशिंगटन/तेहरान।
     अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े एक नए विवाद ने चर्चा छेड़ दी है। एक रिपोर्ट में मोजतबा खामेनेई की निजी जिंदगी को लेकर सनसनीखेज दावे किए गए हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    New York Post की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक खुफिया ब्रीफिंग में यह जानकारी दी गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस इनपुट पर ट्रंप ने हैरानी जताई, लेकिन इस पर उनकी कथित प्रतिक्रिया को लेकर भी कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

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  • खुफिया दावों पर भरोसे को लेकर सवाल
    रिपोर्ट में कुछ अनाम सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि यह जानकारी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों तक पहुंची और इसे “कुछ हद तक विश्वसनीय” माना गया। हालांकि, किसी भी एजेंसी या सरकार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि खुफिया इनपुट अक्सर अपुष्ट या प्रारंभिक स्तर के होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक तौर पर सत्य मान लेना उचित नहीं होता।

    कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं
    रिपोर्ट में किए गए दावों-जैसे व्यक्तिगत संबंध या विदेश में इलाज-के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड या स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं कराई गई है।

    ईरान के कानून और संवेदनशीलता
    ईरान में समलैंगिकता कानूनन अपराध है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। ऐसे में इस तरह के आरोप न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।

    मौजूदा हालात में यह मामला अधिकतर अपुष्ट रिपोर्ट्स और अनाम सूत्रों पर आधारित नजर आता है। ऐसे में इसे तथ्य की तरह नहीं, बल्कि एक विवादित दावे के रूप में ही देखा जा रहा है।