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  • नेतन्याहू का ईरान की जनता से सीधा संदेश, कहा—अयातुल्ला शासन हटाने का मौका न गंवाएं

    नेतन्याहू का ईरान की जनता से सीधा संदेश, कहा—अयातुल्ला शासन हटाने का मौका न गंवाएं

    तेल अवीव। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच Benjamin Netanyahu ने ईरान की जनता को सीधा संदेश देते हुए उन्हें अपने देश में बदलाव के लिए तैयार रहने की अपील की है। इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा कि मौजूदा हालात एक ऐतिहासिक मौका बन सकते हैं, जब ईरान के लोग अयातुल्ला शासन के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं।

    नेतन्याहू ने कहा कि यह संघर्ष केवल सैन्य टकराव नहीं बल्कि आजादी और बदलाव की लड़ाई है। उनके मुताबिक यह अवसर बार-बार नहीं आता और ईरान की जनता को इसे पहचानकर अपने भविष्य के लिए निर्णायक कदम उठाना चाहिए।

    ईरान की जनता से क्या बोले नेतन्याहू

    नेतन्याहू ने अपने संदेश में कहा कि ईरान के लोग लंबे समय से आजादी चाहते हैं और मौजूदा हालात उन्हें बदलाव का मौका दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि जब सही समय आएगा तो बदलाव की मशाल ईरान की जनता के हाथ में होगी, इसलिए लोगों को उस पल के लिए तैयार रहना चाहिए।

    ईरान में सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व का प्रतीक अयातुल्ला प्रणाली है, जिसका नेतृत्व वर्तमान में Ali Khamenei के हाथ में है।

    अमेरिका-इजरायल की रणनीति

    नेतन्याहू ने दावा किया कि इजरायल और अमेरिका मिलकर तेहरान की सत्ता पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिका और इजरायल की रणनीति का उद्देश्य ईरान के शासकों को कमजोर करना और क्षेत्र में स्थिरता लाना है।

    उनके अनुसार सैन्य और रणनीतिक दबाव के जरिए ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं, जिनसे ईरान के भीतर राजनीतिक बदलाव की संभावना बढ़ सकती है।

    ईरान की आंतरिक राजनीति पर असर

    विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान ईरान की घरेलू राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। ईरान लंबे समय से धार्मिक नेतृत्व वाले शासन के तहत चल रहा है और बाहरी दबाव या युद्ध जैसी स्थितियां देश के भीतर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती हैं।

    हालांकि तेहरान की सरकार ऐसे बयानों को अक्सर विदेशी हस्तक्षेप बताकर खारिज करती रही है।

    क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका

    पश्चिम एशिया में पहले से ही हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद Iran कई जगह जवाबी कार्रवाई कर चुका है।

    ऐसे में नेतन्याहू का यह बयान क्षेत्रीय राजनीति को और संवेदनशील बना सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस पूरे संघर्ष पर बनी हुई है, क्योंकि इसका असर पूरे मध्य-पूर्व और वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

  • ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    वॉशिंगटन। दुनिया में जब भी कोई युद्ध शुरू होता है तो आमतौर पर ध्यान बमबारी, मिसाइल हमलों और सैनिकों की तैनाती पर जाता है, लेकिन हर युद्ध की एक बड़ी कीमत भी होती है। अमेरिका और ईरान (Iran) के बीच जारी संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती आकलन बताते हैं कि अमेरिका इस अभियान पर हर दिन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।

    यह खर्च केवल हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें मिसाइल, लड़ाकू विमानों का संचालन, नौसैनिक बेड़े की तैनाती, रक्षा प्रणाली, सैन्य ठिकानों का संचालन और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है।

    रोज करीब 891 मिलियन डॉलर का खर्च
    वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका इस संघर्ष में प्रति दिन करीब 891.4 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह अनुमान सैन्य अभियान Operation Epic Fury के पहले 100 घंटों के खर्च के आधार पर लगाया गया है।

    इन शुरुआती घंटों में कुल खर्च करीब 3.7 अरब डॉलर रहा, जिससे रोजाना खर्च का औसत करीब 891 मिलियन डॉलर निकाला गया। कुछ अन्य विश्लेषणों के मुताबिक वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है और यह 1 अरब से बढ़कर 1.43 अरब डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।

    सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर
    इस युद्ध में सबसे बड़ा खर्च हथियारों और मिसाइलों पर हो रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.1 अरब डॉलर केवल इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई (म्यूनिशन रिप्लेसमेंट) पर खर्च किए गए हैं।

    इसके अलावा सैन्य ऑपरेशन चलाने में भी भारी खर्च आता है। इसमें युद्धपोत, लड़ाकू विमान, सैन्य ठिकाने और सैनिकों की तैनाती शामिल है। शुरुआती चरण में प्रत्यक्ष सैन्य संचालन पर लगभग 196 मिलियन डॉलर खर्च हुए, जबकि युद्ध में हुए नुकसान और सैन्य ढांचे की मरम्मत पर करीब 350 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया है।

    Pentagon के अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के पहले सप्ताह में ही कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें लगभग 4 अरब डॉलर सिर्फ मिसाइल और उन्नत इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च हुए।

    विमानवाहक पोत की तैनाती भी महंगी
    युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत और नौसैनिक बेड़े को भी क्षेत्र में तैनात किया है। अनुमान है कि दो विमानवाहक पोतों के संचालन पर ही रोज करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं। इसके अलावा हवाई हमले, मिसाइल रक्षा प्रणाली और सैनिकों की आवाजाही जैसे कई सैन्य अभियानों से खर्च लगातार बढ़ रहा है।

    युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगी लागत
    विश्लेषकों का कहना है कि अभी संघर्ष शुरुआती चरण में है, इसलिए खर्च बहुत ज्यादा दिखाई दे रहा है। अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो इसकी कुल लागत और तेजी से बढ़ सकती है।

    पिछले युद्धों ने भी खाली किया खजाना
    अमेरिका के पिछले युद्धों का इतिहास बताता है कि लंबे सैन्य अभियान बेहद महंगे साबित होते हैं।

    Iraq War पर अमेरिका ने करीब 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए।

    War in Afghanistan की लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

    9/11 के बाद विभिन्न युद्ध अभियानों पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 8 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है, जिसमें सैनिकों की देखभाल, कर्ज पर ब्याज और अन्य दीर्घकालिक खर्च भी शामिल हैं।

    असली खतरा तेल आपूर्ति पर
    विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक खतरा केवल युद्ध नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति है। Strait of Hormuz दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यहां लंबे समय तक बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो अमेरिका में महंगाई 1 से 2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर
    तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केवल ईंधन ही महंगा नहीं होगा, बल्कि परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। साथ ही अमेरिकी सेना का ईंधन खर्च भी बढ़ जाएगा, जिससे युद्ध की कुल लागत और ज्यादा हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का झटका लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था शुरुआती खर्च संभाल सकती है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इसका आर्थिक बोझ काफी भारी पड़ सकता है।

  • युद्ध के बीच ईरान के तेल भंडार पर अमेरिका की नजर…. ट्रंप के बयान से हलचल

    युद्ध के बीच ईरान के तेल भंडार पर अमेरिका की नजर…. ट्रंप के बयान से हलचल


    तेहरान।
    युद्ध के बीच अमेरिका (America) अब ईरान के तेल पर भी कब्जे (Controls Iran oil ) के संकेत दे रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा है कि इसे लेकर बातचीत जरूर हुई थी। उन्होंने इस मुद्दे पर ज्यादा जानकारी नहीं दी। खास बात है कि ईरान पहले ही आरोप लगा चुका है कि अमेरिका दुनिया के तेल संसाधनों पर अवैध नियंत्रण हासिल करना चाहता है। जबकि, अमेरिका दावा करता है कि इजरायल के हित में वह युद्ध लड़ रहा है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मुद्दे पर खुलकर बात नहीं की थी कि अमेरिका ईरानी तेल पर कब्जा करना चाहता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर कुछ लोगों ने बात जरूर की है। इस दौरान उन्होंने वेनेजुएला का भी जिक्र किया।

    ट्रंप ने कहा, ‘आपने वेनेजुएला को देखा।’ उन्होंने कहा, ‘लोगों ने इसके बारे में सोचा है, लेकिन अभी इस पर बात करना जल्दबाजी होगी।’ खास बात है कि ट्रंप ने बीते महीने कहा था कि अमेरिका को अपने नए दोस्त से 80 मिलियन बैरल तेल मिला है।


    अमेरिकी की बड़ी साजिश, ईरान के आरोप

    ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य ईरान तेल संसाधनों पर अवैध नियंत्रण हासिल करना है। अगर वे ईरान और वेनेजुएला दोनों के तेल पर नियंत्रण कर लेता है तो दुनिया के लगभग 31 प्रतिशत तेल संसाधनों पर उनका नियंत्रण हो जाएगा। अमेरिका ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि वह यह युद्ध इजरायल के हित में लड़ रहा। अमेरिका बेनकाब हो चुका है।


    तेल मोर्चे पर है अमेरिका की नजर

    व्हाइट हाउस ने सोमवार को कहा कि वर्तमान में तेल कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, वो कुछ समय की ही है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने बयान में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पूरी ऊर्जा टीम ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू होने से काफी पहले ही ऊर्जा बाजारों को स्थिर रखने के लिए एक मजबूत योजना तैयार कर ली थी, और वे सभी विश्वसनीय विकल्पों की समीक्षा जारी रखेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रशासन ऊर्जा बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए आगे भी आवश्यक कदम उठा सकता है।


    कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था

    ईरान युद्ध के तेज होने से पश्चिम एशिया में उत्पादन और पोत परिवहन पर मंडराते खतरे के बीच सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं थीं। हालांकि, बाद में कीमतों में कुछ नरमी देखी गई, लेकिन इस उथल-पुथल से दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत सुबह उछलकर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, लेकिन बाद में यह 101 डॉलर के करीब आ गई। इसी तरह, अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 119.48 डॉलर तक पहुंचने के बाद घटकर 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया।


    क्या थी वजह

    कीमतों में आई ताजा नरमी का कारण उन खबरों को माना जा रहा था जिनमें कहा गया था कि जी-7 देश रणनीतिक तेल भंडार से आपूर्ति जारी करने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, बाद में सोमवार को ही जी-7 समूह ने फिलहाल इन सुरक्षित भंडारों का उपयोग न करने का फैसला किया है। फ्रांस के वित्त मंत्री ने कहा कि समूह बाजार को स्थिर करने के लिए तैयार है, लेकिन फिलहाल हम भंडार से तेल निकालने की स्थिति तक नहीं पहुंचे हैं। इससे पहले शनिवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सामरिक भंडार के इस्तेमाल की संभावना को कमतर बताया था।

  • ईरान-USA-इजराइल जंग: मजबूरी में लड़ रहा ईरान, नए सुप्रीम लीडर घायल, UAE ने मिसाइलों को नष्ट किया

    ईरान-USA-इजराइल जंग: मजबूरी में लड़ रहा ईरान, नए सुप्रीम लीडर घायल, UAE ने मिसाइलों को नष्ट किया


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल के साथ जारी ईरान संघर्ष आज 10वें दिन पहुंच गया है। ईरान ने साफ किया है कि यह जंग उनकी पसंद नहीं, बल्कि मजबूरी में लड़नी पड़ रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि इस जंग को देश पर जबरन थोप दिया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल मध्यस्थता या सीजफायर पर चर्चा करना संभव नहीं है, क्योंकि सैन्य टकराव जारी है और प्राथमिकता देश की सुरक्षा पर है।बघाई ने जोर देकर कहा कि ईरान ने जंग शुरू नहीं की थी, और किसी अन्य देश तुर्किये, साइप्रस और अजरबैजान पर हमला नहीं किया गया।

    नए सुप्रीम लीडर पर हमला
    ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल हमले में मौत हुई थी। 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज अली खामेनेई ने 1979 की इस्लामिक क्रांति में अहम भूमिका निभाई थी और 1981 में आठ साल के लिए राष्ट्रपति भी रहे।

    उनके उत्तराधिकारी, मुजतबा खामेनेई, बीती रात नए सुप्रीम लीडर घोषित हुए, लेकिन उन्हें हाल ही में इजराइली हमले में चोट लगी। ईरानी सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी ने कहा कि नए नेतृत्व से देश में उम्मीद और एकजुटता बढ़ी है, जबकि अमेरिका और इजराइल के लिए यह निराशाजनक संकेत है।

    UAE ने रोकी ईरान की मिसाइलें और ड्रोन
    संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने ईरान से दागी गई 12 बैलिस्टिक मिसाइलें और 17 ड्रोन हवा में ही नष्ट कर दिए। युद्ध शुरू होने के बाद UAE की तरफ कुल 253 मिसाइलें और 1,440 ड्रोन दागे जा चुके हैं।

    स्थिति तनावपूर्ण, लेकिन ईरान ने मजबूती दिखाई
    ईरानी अधिकारियों ने कहा कि देश की सुरक्षा मजबूत है और नए सुप्रीम लीडर के नेतृत्व में ईरान और भी एकजुट दिखाई देगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश की रक्षा के लिए मजबूरी में जंग लड़नी पड़ रही है, और किसी अन्य क्षेत्र पर आक्रामकता नहीं दिखाई जा रही।

  • अमेरिका-ईरान युद्ध का असर, कच्चे तेल की कीमतें $100 पार, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

    अमेरिका-ईरान युद्ध का असर, कच्चे तेल की कीमतें $100 पार, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

    नई दिल्ली। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भूचाल ला दिया है। सोमवार को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में ही कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। इस उछाल ने ग्लोबल इकोनॉमी में चिंता बढ़ा दी है और आने वाले दिनों में आम आदमी की रसोई और ईंधन पर असर होने की संभावना जताई जा रही है।

    एक दिन में 17% की भारी तेजी

    सोमवार को अमेरिकी बेंचमार्क (WTI) क्रूड की कीमत $15.66 की वृद्धि के साथ $106.56 प्रति बैरल पर पहुंच गई। यानी एक ही दिन में लगभग 17.23% का उछाल देखा गया। वहीं, ब्रेंट क्रूड की कीमत $14.23 बढ़कर $106.92 प्रति बैरल हो गई। शुक्रवार तक तेल बाजार $90 के आसपास स्थिर था, लेकिन वीकेंड में बिगड़े हालात ने बाजार का समीकरण बदल दिया।

    10 दिन से जारी है अमेरिका-ईरान संघर्ष

    कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल पिछले 10 दिनों से अमेरिका और ईरान-इजरायल के बीच जारी संघर्ष की वजह से आया है। अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सैन्य और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें प्रमुख ईंधन डिपो भी शामिल थे। इसके जवाब में ईरान ने भी आक्रामक हमले किए। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर ईरान की कार्रवाई ने सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा दिया।

    ईरान की चेतावनी

    ईरान के संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने चेतावनी दी है कि संघर्ष जारी रहा तो देश के तेल क्षेत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना है कि इस स्थिति में ईरान न तो तेल उत्पादन कर पाएगा और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचना संभव होगा। इस बयान से वैश्विक सप्लाई चेन में जोखिम बढ़ गया है।

    कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी की आशंका

    विशेषज्ञों की चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह वह संकरा समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया के कुल कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान ने फिलहाल इसे बंद नहीं किया है, लेकिन चेतावनी दी है कि संघर्ष बढ़ा तो अमेरिका और इजरायल से जुड़े व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। यदि मार्ग अवरुद्ध होता है, तो तेल की कीमतों में और उछाल संभव है।

    अमेरिका की प्रतिक्रिया

    अमेरिका ने कहा है कि यह संकट लंबे समय तक नहीं रहेगा। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, मौजूदा उछाल केवल मार्केट का डर है और कुछ हफ्तों तक ही बने रहने की संभावना है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने भी कहा कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई भविष्य में तेल उद्योग के लिए फायदेमंद होगी।

    ट्रंप का बयान

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि संघर्ष के कारण तेल की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन इसे सुरक्षा की कीमत मानना चाहिए। उनका मानना है कि जैसे ही ईरान का परमाणु खतरा समाप्त होगा, तेल की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। इस उछाल के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की अस्थिरता बनी हुई है, और आने वाले हफ्तों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी असर देखने को मिल सकता है।

  • ईरान में मोजतबा खामेनेई बने सुप्रीम लीडर, एक्सपर्ट बोले- अमेरिका से और बढ़ सकता है टकराव

    ईरान में मोजतबा खामेनेई बने सुप्रीम लीडर, एक्सपर्ट बोले- अमेरिका से और बढ़ सकता है टकराव


    नई दिल्ली। ईरान के मौजूदा नेतृत्व ने देश के नए सुप्रीम लीडर के रूप में मोजतबा खामेनेई को नियुक्त कर दिया है। उन्हें अयातुल्ला अली खामेनेई का उत्तराधिकारी बनाया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला ईरान के अमेरिका के साथ समझौते की बजाय टकराव की नीति को मजबूत करने का संकेत देता है।

    ईरान में सुप्रीम लीडर देश का सबसे शक्तिशाली पद होता है। विदेश नीति, रक्षा और परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम फैसलों पर अंतिम अधिकार उसी के पास होता है। साथ ही वह राष्ट्रपति और संसद के कामकाज को भी दिशा देता है। यानी कई मामलों में सुप्रीम लीडर की ताकत राष्ट्रपति से भी अधिक मानी जाती है।

    ट्रंप के लिए झटका माना जा रहा फैसला

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी झटका माना जा सकता है। ट्रंप ने पहले मोजतबा को कमजोर नेता बताते हुए उनकी संभावित नियुक्ति को खारिज किया था और यह भी संकेत दिए थे कि नए सुप्रीम लीडर के चयन में उनकी राय अहम होनी चाहिए।

    गौरतलब है कि युद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिका और इजरायल के हमलों के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके बाद मोजतबा को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया है। इस कदम को तेहरान में कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

    अमेरिका के लिए ‘बेइज्जती’ जैसा कदम

    मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वटांका के मुताबिक इतने बड़े सैन्य अभियान के बाद भी अगर 86 वर्षीय नेता की जगह उसके और ज्यादा कट्टरपंथी बेटे को सत्ता मिल जाए तो यह अमेरिका के लिए बड़ी असहज स्थिति है।

    विश्लेषकों का कहना है कि मोजतबा का चयन एक स्पष्ट संदेश देता है कि ईरान फिलहाल समझौते की राह नहीं, बल्कि सख्त रुख और जवाबी कार्रवाई की नीति अपनाने की तैयारी में है।

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो पॉल सलेम ने कहा कि मोजतबा के नेतृत्व में ईरान के लिए आने वाले दिन कठिन हो सकते हैं। उनका मानना है कि मोजतबा ऐसे नेता नहीं हैं जो अमेरिका के साथ समझौता करने या अपनी रणनीति बदलने के लिए तैयार हों।

    पिता से भी ज्यादा कट्टर बताए जाते हैं मोजतबा

    पूर्व अमेरिकी राजनयिक और ईरान विशेषज्ञ एलन आयर के मुताबिक मोजतबा खामेनेई को उनके पिता से भी ज्यादा सख्त और कट्टर माना जाता है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) भी उन्हें पसंदीदा उम्मीदवार मानती रही है।

    56 वर्षीय मोजतबा खामेनेई ने शिया इस्लाम की शिक्षा ईरान के कोम स्थित धार्मिक मदरसों में प्राप्त की है। उन्हें ‘हुज्जतुल इस्लाम’ की उपाधि मिली हुई है, जो शिया धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक दर्जा माना जाता है।

    अमेरिका ने 2019 में मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध भी लगाया था। अमेरिकी वित्त मंत्रालय का आरोप था कि किसी आधिकारिक सरकारी पद पर न होने के बावजूद वे अपने पिता के प्रतिनिधि की तरह काम करते हुए सत्ता के फैसलों पर प्रभाव डालते रहे हैं।

    आर्थिक संकट और सख्त नीतियों की चुनौती

    ईरान पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्रा और बढ़ती गरीबी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इसके साथ ही सरकार की कड़ी नीतियों के कारण जनता में असंतोष और विरोध प्रदर्शन भी बढ़े हैं।ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा के सामने देश की आंतरिक चुनौतियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय दबाव से निपटना भी बड़ी चुनौती होगी। कई विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में उनके पास सख्त रुख अपनाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं, चाहे युद्ध समाप्त ही क्यों न हो जाए।

  • इजराइल-ईरान जंग: तेल डिपो पर मिसाइल, 5 देशों पर हमला, 6 महीने तक संघर्ष का एलान

    इजराइल-ईरान जंग: तेल डिपो पर मिसाइल, 5 देशों पर हमला, 6 महीने तक संघर्ष का एलान


    नई दिल्ली। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जंग का नौवां दिन जारी है। इस बीच इजराइल ने ईरान में तेल भंडार और रिफाइनरी फैसिलिटी को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए। इजराइली मीडिया वाइनेट के मुताबिक, ईरान के 3 तेल डिपो और 30 फ्यूल टैंक तबाह हुए हैं।

    वहीं, ईरान ने पलटवार किया और इजराइल के अलावा कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर भी हमले किए। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि वे अमेरिका और इजराइल के खिलाफ छह महीने तक जंग लड़ने में सक्षम हैं। IRGC प्रवक्ता अली मोहम्मद नैनी ने बताया कि ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड दोनों लंबे समय तक संघर्ष कर सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजराइल से जुड़े 200 से अधिक सैन्य ठिकानों और फैसिलिटी को निशाना बनाया गया है।

    जंग के पांच बड़े अपडेट
    ईरान में अब तक 6,668 सिविल इलाकों को निशाना बनाया गया।

    5,535 घर और 1,041 दुकानें नुकसान में।

    14 मेडिकल सेंटर्स और 65 स्कूल प्रभावित।

    अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग में अब तक 1,483 मौतें।

    इजराइल में 1,765 लोग घायल।

    पाकिस्तान नागरिकों की वापसी
    दुबई में मिसाइल हमले में मारे गए दो पाकिस्तानी नागरिकों के शव स्वदेश भेजे जाएंगे। पाकिस्तान सरकार UAE अधिकारियों के साथ इस प्रक्रिया में लगातार संपर्क में है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने बताया कि पाकिस्तान का राजनयिक मिशन दुबई प्रशासन के साथ मिलकर मृतकों की जल्दी और सुरक्षित वापसी सुनिश्चित कर रहा है।

    ईरान में नए सुप्रीम लीडर का चयन
    ईरान में नए सुप्रीम लीडर के चयन को लेकर अहम फैसला हो गया है। असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने उम्मीदवार तय कर लिया है, हालांकि अभी तक नाम का आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ। फार्स न्यूज एजेंसी और आईएसएनए के अनुसार, बहुमत की राय से उम्मीदवार का चयन किया गया है और जल्द ही नाम सामने आने की संभावना है।

    जंग और राजनीतिक हलचल के बीच मिडिल ईस्ट की स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संघर्ष पर कड़ी नजर बनाए हुए है।

  • ईरान के तेल भंडार पर इज़राइल का बड़ा हमला, ट्रम्प बोले- “ईरान लड़ने लायक नहीं बचेगा”

    ईरान के तेल भंडार पर इज़राइल का बड़ा हमला, ट्रम्प बोले- “ईरान लड़ने लायक नहीं बचेगा”



    नई दिल्ली। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी जंग का नौवां दिन बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। इज़राइल ने ईरान में तेल भंडार से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। इज़राइली मीडिया के अनुसार, ईरान के 30 फ्यूल टैंकों और कई तेल डिपो को निशाना बनाया गया है।

    अमेरिकी रुख:
    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को कहा कि अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह हार मान ले। उनका कहना है कि या तो ईरान खुद आत्मसमर्पण करे या उसकी सैन्य ताकत इतनी कमजोर कर दी जाए कि वह लड़ने लायक ही न बचे। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान अब मिडिल ईस्ट का दबंग नहीं, बल्कि ‘लूजर’ बन गया है।

    ईरान की चेतावनी:
    ईरानी सेना ने भी धमकी दी है कि अगर अमेरिकी जहाज फारस की खाड़ी में आए, तो उन्हें समुद्र में डुबो दिया जाएगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने खाड़ी में ऑयल टैंकर भेजने की बात कही थी, जो आमतौर पर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरते हैं।

    जंग के आँकड़े:

    सिविल इलाकों पर हमला: 6,668

    घर और दुकानें नष्ट: 5,535 घर और 1,041 दुकानें

    मेडिकल सेंटर और स्कूल: 14 मेडिकल सेंटर और 65 स्कूल

    मृत्यु: 1,483

    इज़राइल में घायल: 1,765 लोग

    रेड क्रिसेंट सेंटर: 13 हमले का शिकार

    अंतरराष्ट्रीय दबाव और ईरान की प्रतिक्रिया:
    ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने पड़ोसी देशों से माफी मांगी है और कहा कि अब सिर्फ तब हमला होगा जब उन देशों की जमीन से ईरान पर हमला किया जाए। ट्रम्प ने इसे अमेरिका और इज़राइल के लगातार हमलों का नतीजा बताया।

    संक्षेप में:
    इज़राइल के हमलों ने ईरान के तेल भंडारों को बुरी तरह नुकसान पहुँचाया है। अमेरिका की धमकियों और ट्रम्प के बयान ने ईरान की स्थिति को कमजोर कर दिया है। अब युद्ध का रुख सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तेल और ऊर्जा ढांचे पर भी असर पड़ रहा है, जिससे वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल की आशंका बढ़ गई है।

  • ईरानी हमलों से खाड़ी में बढ़ा तनाव, अरब लीग ने रविवार को बुलाई विदेश मंत्रियों की आपात बैठक

    ईरानी हमलों से खाड़ी में बढ़ा तनाव, अरब लीग ने रविवार को बुलाई विदेश मंत्रियों की आपात बैठक


    काहिरा। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और कई अरब देशों पर हुए कथित ईरानी हमलों के बाद स्थिति पर चर्चा के लिए अरब लीग ने विदेश मंत्रियों की आपात बैठक बुलाने का फैसला किया है। यह बैठक रविवार को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए आयोजित की जाएगी।

    अरब लीग के सहायक महासचिव होसाम जकी ने शनिवार को इसकी घोषणा करते हुए बताया कि इस विशेष बैठक का प्रस्ताव कुवैत, सऊदी अरब, कतर, ओमान, जॉर्डन और मिस्र जैसे सदस्य देशों ने संयुक्त रूप से रखा है। बैठक में खाड़ी देशों की संप्रभुता और सुरक्षा को प्रभावित करने वाली हालिया घटनाओं की समीक्षा की जाएगी और इस मुद्दे पर साझा अरब रुख तय करने की कोशिश की जाएगी।

    पड़ोसी देशों को निशाना बनाने का इरादा नहीं: ईरान

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने अमेरिका की उस मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण करने की बात कही गई थी। राज्य टीवी पर प्रसारित अपने रिकॉर्डेड संदेश में उन्होंने कहा कि ऐसी उम्मीद करना केवल एक सपना है, जो कभी पूरा नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।

    क्षेत्रीय हमलों पर जताया खेद

    हालांकि राष्ट्रपति पेजेशकियन ने खाड़ी के कुछ देशों पर हुए हालिया हमलों पर खेद भी जताया। उन्होंने कहा कि ये घटनाएं गलतफहमी के कारण हुईं और ईरान भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने का प्रयास करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक पड़ोसी देशों की जमीन से ईरान पर कोई हमला नहीं किया जाता, तब तक तेहरान की ओर से किसी को निशाना बनाने का इरादा नहीं है।

    ईरानी मीडिया के अनुसार, इस संबंध में ईरान की अंतरिम नेतृत्व परिषद ने भी अपनी मंजूरी दे दी है। यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब शनिवार सुबह बहरीन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर हमलों की खबरों के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है।

    पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहा तनाव

    पश्चिम एशिया में हालात पिछले कुछ दिनों में तेजी से बदले हैं। 28 फरवरी को शुरू हुए टकराव के बाद से ईरान, इस्राइल समेत पश्चिम एशिया के 13 देशों को निशाना बना चुका है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान की सैन्य गतिविधियों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।

  • ईरान की आखिरी गोली तक लड़ाई की कसम: खतीबजादेह ने ट्रम्प को बताया ‘औपनिवेशिक नजरिया’, कुर्द समुदाय की रक्षा का दिया आश्वासन

    ईरान की आखिरी गोली तक लड़ाई की कसम: खतीबजादेह ने ट्रम्प को बताया ‘औपनिवेशिक नजरिया’, कुर्द समुदाय की रक्षा का दिया आश्वासन



    नई दिल्ली। रायसीना डायलॉग 2026 में ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने शुक्रवार को कहा कि ईरान अमेरिकी-इजराइली हमलों के खिलाफ “आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक” लड़ने को तैयार है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान में नेतृत्व परिवर्तन की कोशिशों को औपनिवेशिक दृष्टिकोण करार दिया।

    खतीबजादेह ने कहा कि ईरान का कुर्द समुदाय देश की पहचान का अहम हिस्सा है और अलगाववाद से जोड़ा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान संघर्ष को अन्य देशों तक फैलाना नहीं चाहता और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

    हिंद महासागर में डूबे ईरानी जहाज को लेकर उन्होंने कहा कि यह भारत के आमंत्रण पर अंतरराष्ट्रीय अभ्यास में आया था और उस पर कोई हथियार नहीं थे। ईरान और भारत के रिश्तों को उन्होंने पुराने और महत्वपूर्ण बताया।

    रायसीना डायलॉग का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 मार्च को किया था। इस सम्मेलन में 110 देशों के लगभग 2700 प्रतिनिधि शामिल हैं और इसमें वैश्विक सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आर्थिक सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।