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  • इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच इजरायल की एक खुफिया रिपोर्ट ने नई अंतरराष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने अमेरिका के साथ साझा की गई एक खुफिया जानकारी में दावा किया है कि ईरान ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित योजना बनाई थी। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसके बावजूद इस रिपोर्ट ने सुरक्षा और कूटनीतिक स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसियां लंबे समय से ईरान की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं। इसी निगरानी के दौरान जुटाई गई जानकारी अमेरिका के साथ साझा की गई, जिसके बाद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के बीच इस मामले को लेकर सतर्कता बढ़ गई है। माना जा रहा है कि इस तरह की खुफिया सूचनाएं क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य की रणनीतिक नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस प्रकार के दावों को विश्वसनीय माना जाता है तो इसका असर अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य में होने वाली किसी भी संभावित कूटनीतिक पहल पर पड़ सकता है। हालांकि अब तक किसी भी संबंधित एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं की है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को अभी खुफिया इनपुट के रूप में ही देखा जा रहा है।

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। जनवरी 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। उस घटना के बाद कई बार दोनों देशों के बीच तीखे बयान, प्रतिबंध और सैन्य गतिविधियां देखने को मिली हैं। डोनाल्ड ट्रंप भी पहले सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि उन्हें ईरान से खतरा हो सकता है, हालांकि उन्होंने ऐसे खतरों को लेकर चिंता व्यक्त नहीं की थी।

    हाल के सप्ताहों में क्षेत्र में संघर्षविराम की कोशिशों के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं। विभिन्न सैन्य गतिविधियों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है। इससे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। कई देशों ने संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान पर जोर देने की आवश्यकता भी दोहराई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिम एशिया की परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल इजरायल के इस दावे की आधिकारिक पुष्टि या स्वतंत्र सत्यापन सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में संबंधित देशों की प्रतिक्रियाओं और आधिकारिक जांच के बाद ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कूटनीतिक संवाद और संयम ही क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम साबित हो सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा

    अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। इसी बीच इजरायल की ओर से यह संकेत मिला है कि आवश्यकता पड़ने पर वह ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार है। हालांकि इजरायली सैन्य अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश की ओर से अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में शामिल होने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों और सेना को हर संभावित परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क रखा गया है।

    बढ़ते तनाव के बीच इजरायल के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा सैन्य टकराव आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे परिदृश्य में यदि अमेरिका अपने सहयोगी देशों से समर्थन चाहता है तो इजरायल भी संभावित सैन्य अभियान का हिस्सा बन सकता है। अधिकारियों का कहना है कि देश पहले भी अपने रणनीतिक सहयोगियों के साथ सुरक्षा अभियानों में भाग ले चुका है और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार रहेगा।

    इजरायल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया कि यदि हालात की मांग हुई तो देश दोबारा कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी पक्ष क्षेत्र में नए युद्ध की स्थिति नहीं चाहता, लेकिन ईरान की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। सुरक्षा से जुड़े निर्णय क्षेत्रीय हालात और सहयोगी देशों के साथ समन्वय को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    दूसरी ओर इजरायली रक्षा बलों का आकलन है कि वर्तमान समय में ईरान भी सीधे इजरायल को इस संघर्ष में शामिल करने की कोशिश नहीं कर रहा है। सेना का मानना है कि निकट भविष्य में इजरायल पर किसी बड़े हमले की आशंका सीमित है। इसके बावजूद सीमाओं की निगरानी बढ़ा दी गई है और सभी सैन्य इकाइयों को उच्च स्तर की तैयारियों में रखा गया है ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का तुरंत जवाब दिया जा सके।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। अमेरिका ने हालिया सैन्य कार्रवाई को इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमलों की प्रतिक्रिया बताया है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति तथा वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि कई देशों की नजर इस क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर बनी हुई है।

    अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी हाल के दिनों में ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए गए हैं। अमेरिका ने यह स्पष्ट किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसकी प्राथमिकता क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिले हैं कि कूटनीतिक विकल्पों के साथ-साथ सैन्य तैयारियों को भी बनाए रखा जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसके व्यापक असर पड़ सकते हैं। ऐसे में दुनिया की प्रमुख शक्तियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और उम्मीद की जा रही है कि तनाव को नियंत्रित रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी समानांतर रूप से जारी रहेंगे।

  • अमेरिका-ईरान तनाव फिर चरम पर, सीजफायर टूटने के बाद बढ़ी सैन्य कार्रवाई, पाकिस्तान ने संयम और बातचीत की अपील की

    अमेरिका-ईरान तनाव फिर चरम पर, सीजफायर टूटने के बाद बढ़ी सैन्य कार्रवाई, पाकिस्तान ने संयम और बातचीत की अपील की


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव तेजी से बढ़ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच हुआ अंतरिम युद्धविराम प्रभावी नहीं रह गया है। इससे पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। ताजा घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान तलाशने की अपील की है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच लागू अंतरिम युद्धविराम अब प्रभावी नहीं है। उनके इस बयान के बाद क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियां तेज हुई हैं, जिससे पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर व्यापक असर पड़ सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा है कि बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं और संवाद की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त की है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सभी पक्षों से संयम बरतने, किसी भी प्रकार की उकसाने वाली कार्रवाई से बचने और विवाद का समाधान बातचीत तथा कूटनीति के माध्यम से निकालने का आग्रह किया है। पाकिस्तान ने यह भी कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए संवाद ही सबसे प्रभावी माध्यम है और यदि आवश्यकता हुई तो वह मध्यस्थता के प्रयासों में सहयोग देने के लिए तैयार है।

    क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैन्य टकराव लंबा खिंचता है तो इसका प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है और किसी भी बड़े संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि वैश्विक निवेशक और विभिन्न देश इस घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    तनाव बढ़ने के साथ ऊर्जा बाजार में भी अस्थिरता देखने को मिली है। निवेशकों के बीच यह आशंका बनी हुई है कि यदि संघर्ष और व्यापक हुआ तो समुद्री व्यापार मार्गों तथा ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रहेगी, जिसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

    ईरान की ओर से भी हालिया घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाया गया है। वहां के वरिष्ठ नेताओं ने कहा है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर समझौता नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर अमेरिका ने भी अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात दोहराई है। दोनों पक्षों के सख्त बयानों ने तनाव कम होने की उम्मीदों को फिलहाल कमजोर किया है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश और संगठन लगातार संयम बरतने तथा संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी भी प्रकार की अतिरिक्त सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को व्यापक अस्थिरता की ओर ले जा सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता और दोनों देशों की अगली रणनीति पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।

  • ट्रंप ने खुद को बताया ईरान का 'नंबर वन टारगेट'…. बोले- उनकी हत्या की रच रहा साजिश!

    ट्रंप ने खुद को बताया ईरान का 'नंबर वन टारगेट'…. बोले- उनकी हत्या की रच रहा साजिश!


    अंकारा।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को खुलकर कहा कि वे ईरान (Iran) के नंबर वन टारगेट हैं और तेहरान उनकी हत्या की साजिश रच रहा है। ट्रंप ने NATO समिट के दौरान यह बयान देते हुए कहा कि ईरानी लीडरशिप (Iranian Leadership) उनसे बदला लेने पर तुली हुई है। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि ईरान के साथ कोई समझौता अब संभव नहीं है। उनके इस बयान के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसी डर के चलते उन्होंने ईरान के साथ चल रही डील को पूरी तरह खत्म कर दिया?


    ट्रंप ने क्या कहा?

    ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान उनकी हत्या की साजिश रच रहा है। इस दौरान उन्होंने खुद को ईरान का ‘नंबर वन टारगेट’ बताया। तुर्की की राजधानी अंकारा में NATO शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा कि उनके कुछ लीडर थे जो अब नहीं रहे। उनके पास कुछ और लीडर थे जो शायद अब नहीं रहे। मैं भी शायद जाऊं, क्योंकि मैं उनका नंबर वन टारगेट हूं। वे घटिया लोग हैं। उन्होंने 47 साल से ऐसा ही किया है।

    इस दौरान ट्रंप ने ईरान की पिछली नेतृत्व व्यवस्था को दुश्मन करार दिया, लेकिन कहा कि मौजूदा लीडरशिप थोड़ी ज्यादा समझदारी से काम कर रही दिख रही है। उन्होंने साफ कहा कि वे तनाव बढ़ाने के बजाय ईरान मुद्दे को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं। बता दें कि यह बयान दोनों देशों के बीच हालिया सैन्य टकराव के बाद वॉशिंगटन और तेहरान के बढ़ते तनाव के बीच आया है।


    समझौता का प्रयास खत्म

    गौरतलब है कि ट्रंप ने कुछ घंटे पहले ही घोषणा की कि ईरान के साथ चल रही बातचीत और समझौते की कोशिशें पूरी तरह खत्म हो गई हैं। उन्होंने कहा कि उनके साथ डील करना बस समय की बर्बादी है। NATO समिट में ट्रंप ने आगे कहा कि हम आज रात उन्हें कड़ी टक्कर देंगे। वे हर दिन समझौते का उल्लंघन करते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या युद्धविराम अभी भी लागू है, तो उन्होंने जवाब दिया कि जहां तक मेरा सवाल है, यह खत्म हो चुका है।


    ईरान का जवाबी हमला

    इस बीच, ईरान ने ताजा अमेरिकी हमलों के जवाब में बुधवार को फारस की खाड़ी क्षेत्र में मिसाइलों और ड्रोन से जवाबी हमला किया। ईरानी सशस्त्र बलों ने कहा कि उन्होंने बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके बाद दोनों देशों में हवाई हमले के सायरन बजाये गये। अमेरिकी केंद्रीय कमान (सेंटकॉम) ने इस पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। उधर, कतर की मंत्रिपरिषद ने ओमान तट के निकट उसके तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) वाहक जहाज पर हुए हमले के बाद ईरान से होर्मुज में खतरनाक गतिविधियां बंद करने की मांग की है।

    कतर सरकार ने बयान में कहा कि देश अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है। कतर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज ने भी जहाज परिचालकों से फिलहाल होर्मुज से जहाज नहीं भेजने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इससे फारस की खाड़ी में फंसे लगभग 6000 नाविकों की सुरक्षा को अनावश्यक खतरा हो सकता है।

  • कच्चे तेल में उछाल और वैश्विक तनाव का असर, तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट के साथ धड़ाम हुए सेंसेक्स-निफ्टी

    कच्चे तेल में उछाल और वैश्विक तनाव का असर, तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट के साथ धड़ाम हुए सेंसेक्स-निफ्टी


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े भू-राजनीतिक तनाव का असर बुधवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। वैश्विक स्तर पर बढ़ी अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और निवेशकों की सतर्कता के चलते घरेलू बाजार में पूरे कारोबारी सत्र के दौरान बिकवाली हावी रही। दिन के अंत में प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ बंद हुए। इसके साथ ही पिछले कई कारोबारी सत्रों से जारी तेजी का सिलसिला भी थम गया और निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई।

    बाजार बंद होने पर बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1,677.12 अंक यानी 2.15 प्रतिशत टूटकर 76,503.60 अंक पर बंद हुआ। वहीं एनएसई का निफ्टी 50 भी 516.65 अंक यानी 2.12 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,882.05 अंक पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान दोनों सूचकांकों ने दिन का निचला स्तर भी छुआ और पिछले तीन महीनों की सबसे बड़ी दैनिक गिरावट दर्ज की।

    गिरावट केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक बाजार में भी दबाव देखने को मिला। मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक भी उल्लेखनीय कमजोरी के साथ बंद हुए। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि बिकवाली लगभग सभी वर्गों के शेयरों में फैली रही और निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाना उचित समझा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो बैंकिंग, निजी बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, एफएमसीजी, मीडिया, ऑटो, ऑयल एंड गैस तथा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के शेयरों में सबसे अधिक दबाव रहा। हालांकि फार्मा और मेटल क्षेत्र में भी गिरावट दर्ज हुई, लेकिन अन्य क्षेत्रों की तुलना में नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौरान निवेशक रक्षात्मक क्षेत्रों की ओर झुकाव दिखाते हैं, जिससे कुछ सेक्टरों में गिरावट सीमित रही।

    दिनभर की बिकवाली का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव माना गया। हालिया घटनाक्रम के बाद पश्चिम एशिया में हालात फिर से संवेदनशील हो गए हैं, जिससे ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई दोनों में छह प्रतिशत से अधिक की तेजी ने आयातक देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की महंगाई का असर महंगाई, व्यापार घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर पड़ सकता है।

    विदेशी घटनाक्रम का असर भारतीय मुद्रा पर भी दिखाई दिया। रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर बंद हुआ, जिससे आयात लागत बढ़ने की आशंका और मजबूत हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर टिकती हैं तो भारतीय बाजारों में निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

    तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार आने वाले कारोबारी सत्रों में निफ्टी के लिए 23,780 से 23,750 अंक का दायरा महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है। यदि सूचकांक इस स्तर से नीचे टिकता है तो गिरावट और गहरी हो सकती है। वहीं 24,020 से 24,050 अंक का स्तर निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध रहेगा। बाजार की अगली दिशा काफी हद तक वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर निर्भर करेगी। निवेशकों को फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाने और अंतरराष्ट्रीय संकेतों पर लगातार नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव और गहराया, ट्रंप बोले- समझौते का दौर खत्म; मध्य पूर्व में बढ़ी नई टकराव की आशंका

    अमेरिका-ईरान तनाव और गहराया, ट्रंप बोले- समझौते का दौर खत्म; मध्य पूर्व में बढ़ी नई टकराव की आशंका

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह ईरान के साथ किसी भी नए समझौते के पक्ष में नहीं हैं और उनके अनुसार दोनों देशों के बीच समझौते की संभावना अब समाप्त हो चुकी है। ट्रंप के इस बयान ने पहले से तनावपूर्ण हालात के बीच नई कूटनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के नेतृत्व और उसकी नीतियों की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी नए समझौते की कोई आवश्यकता नहीं है और अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों तथा क्षेत्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देता रहेगा। उनके बयान को हाल के सैन्य घटनाक्रम और दोनों देशों के बीच बढ़ते टकराव के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि हाल की घटनाओं के बाद उन्हें नहीं लगता कि संघर्ष विराम से जुड़े प्रयास प्रभावी रूप से लागू हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात यह दर्शाते हैं कि दोनों देशों के बीच विश्वास का स्तर काफी कमजोर हो चुका है। ऐसे में किसी नए समझौते की संभावना फिलहाल बेहद सीमित दिखाई देती है।

    हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियों में भी तेजी देखने को मिली है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसने क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों और समुद्री मार्गों की रक्षा के उद्देश्य से आवश्यक कार्रवाई की है। वहीं दूसरी ओर ईरान भी लगातार अपने रुख पर कायम है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और अधिक बढ़ गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रम इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बने हुए हैं। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    ट्रंप ने अपनी टिप्पणी के दौरान नाटो और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ सुरक्षा और रणनीतिक हितों पर लगातार विचार कर रहा है। उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई विषयों पर नए सिरे से रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।

    मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों और ऊर्जा क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, निवेशकों की बढ़ती सतर्कता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित किया है। कई देशों ने स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखते हुए संयम और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले घटनाक्रम पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि तनाव कम करने के लिए प्रभावी कूटनीतिक प्रयास नहीं किए गए, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में दुनिया की निगाहें दोनों देशों के अगले कदम और संभावित कूटनीतिक पहल पर टिकी हुई हैं।

  • अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

    अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। बुधवार को कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती सत्र में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स 78 हजार के स्तर से नीचे फिसल गया, जबकि निफ्टी में भी उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई। वैश्विक अनिश्चितता और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।

    शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूटकर 77 हजार के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी 24,300 के नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार में बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। इससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने व्यापक स्तर पर जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    क्षेत्रवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऑयल एवं गैस, ऑटो, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया, कमोडिटी और एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली। दूसरी ओर फार्मा, हेल्थकेयर, सूचना प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ शेयरों में अपेक्षाकृत मजबूती बनी रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में निवेशक ऐसे क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं जिन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।

    वैश्विक बाजारों में भी मिश्रित संकेत देखने को मिले। एशिया के कुछ प्रमुख बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ सूचकांक सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते रहे। अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में दबाव के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की निगाहें अब पश्चिम एशिया की स्थिति और उससे जुड़े अगले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार बाजार पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का पड़ा है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में उछाल का प्रभाव शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया।

    निवेशक फिलहाल वैश्विक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर यदि स्थिति सामान्य होती है तो निवेशकों का भरोसा दोबारा मजबूत होने की संभावना भी बनी रहेगी।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं अक्सर अल्पकालिक अस्थिरता पैदा करती हैं, लेकिन मजबूत आर्थिक आधार वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। आने वाले कारोबारी सत्रों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बड़ा बयान, परमाणु हथियार पर दोहराया अमेरिकी रुख

    खामेनेई के अंतिम संस्कार के बीच ट्रंप का बड़ा बयान, परमाणु हथियार पर दोहराया अमेरिकी रुख


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिका समझौते का रास्ता चाहता है, लेकिन यदि हालात बने तो निर्णायक कार्रवाई करने में भी देर नहीं करेगा। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका किसी भी स्थिति में अपने हितों की रक्षा करेगा। उनके अनुसार, पहला विकल्प समझौता है, लेकिन यदि बातचीत सफल नहीं होती तो अमेरिका अपने उद्देश्य पूरे करने में सक्षम है। उन्होंने यह भी कहा कि वह बड़े पैमाने पर जनहानि नहीं चाहते, इसलिए कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देते हैं।

    परमाणु कार्यक्रम पर दोहराया अमेरिकी रुख

    ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका किसी भी स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के पास परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता न बचे।

    उन्होंने यह भी कहा कि हाल के समय में तेल की कीमतें युद्ध के दौरान बढ़े स्तर से नीचे आ चुकी हैं और अमेरिका चाहता है कि ईरान किसी भी संभावित समझौते की शर्तों का पालन करे।

    सत्ता परिवर्तन नहीं चाहता अमेरिका

    ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका का लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन कराना नहीं है। उनका कहना था कि अमेरिका की प्राथमिकता क्षेत्रीय स्थिरता और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना है।

    युद्धविराम के बाद भी जारी है बयानबाजी

    हालांकि हाल के संघर्ष के बाद दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम लागू है, लेकिन बयानबाजी लगातार जारी है। ट्रंप पहले भी कई बार ईरान को लेकर कड़े बयान दे चुके हैं और राजनयिक समाधान के साथ-साथ सैन्य विकल्प खुले होने की बात कह चुके हैं।

    ईरान ने दिया कड़ा जवाब

    ट्रंप के बयान पर ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई। आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की हत्या से उसके विचार समाप्त नहीं होते। दूतावास ने अमेरिका पर ईरान के इतिहास और संस्कृति को न समझने का आरोप लगाया और कहा कि दबाव की राजनीति से उसके सिद्धांत नहीं बदलेंगे।

    दोनों देशों के बीच जारी यह तीखी बयानबाजी संकेत देती है कि युद्धविराम के बावजूद रिश्तों में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक बातचीत और क्षेत्रीय घटनाक्रम इस संबंध की दिशा तय करेंगे।

  • ईरान-इराक युद्ध के 38 साल बाद बदले हालात: खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में इराक के पवित्र शहरों में होंगी

    ईरान-इराक युद्ध के 38 साल बाद बदले हालात: खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में इराक के पवित्र शहरों में होंगी


    नई दिल्ली। कभी आठ वर्षों तक भीषण युद्ध लड़ने वाले ईरान और इराक के रिश्तों में समय के साथ बड़ा बदलाव आया है। इसी बदले हुए परिदृश्य की झलक ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार कार्यक्रम में भी देखने को मिल रही है। कार्यक्रम के अनुसार, ईरान में प्रारंभिक रस्मों के बाद उनके पार्थिव शरीर को इराक के पवित्र शिया शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा, जहां धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होंगे।

    आठ साल के युद्ध से धार्मिक जुड़ाव तक
    ईरान और इराक के बीच वर्ष 1980 से 1988 तक चला युद्ध पश्चिम एशिया के सबसे विनाशकारी संघर्षों में गिना जाता है। उस समय इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद ईरान पर हमला किया था। माना जाता है कि उन्हें आशंका थी कि क्रांति का प्रभाव इराक के शिया बहुल क्षेत्रों तक फैल सकता है। इसके अलावा शत्त-अल-अरब जलमार्ग और सीमा विवाद भी दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण था।

    आठ वर्षों तक चले इस युद्ध में दोनों देशों को भारी जन-धन का नुकसान उठाना पड़ा। लाखों लोगों की जान गई और रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप भी लगे। युद्ध समाप्त होने के बाद भी दोनों देशों के संबंध लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे।

    अंतिम संस्कार का कार्यक्रम
    जानकारी के अनुसार, 7 जुलाई को खामेनेई के पार्थिव शरीर को ईरान के धार्मिक शहर कोम ले जाया जाएगा, जहां अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में पूरी होंगी। इसके बाद 8 जुलाई को इराक के पवित्र शहर नजफ और कर्बला में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें क्षेत्र के प्रमुख शिया धार्मिक और सामाजिक प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। अंतिम चरण में उन्हें ईरान के मशहद शहर स्थित इमाम रजा के मकबरे के निकट दफनाया जाएगा।

    नजफ और कर्बला का धार्मिक महत्व
    नजफ और कर्बला दुनिया भर के शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। किसी प्रमुख शिया धर्मगुरु के पार्थिव शरीर को इन शहरों में ले जाना केवल अंतिम संस्कार की परंपरा नहीं माना जाता, बल्कि इसे शिया इतिहास, धार्मिक विरासत और इमामों की परंपरा से जोड़कर भी देखा जाता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्यक्रम ईरान और इराक के बीच बदले राजनीतिक एवं धार्मिक संबंधों का भी प्रतीक है। आज इराक में कई शिया राजनीतिक और धार्मिक समूहों का प्रभाव है, जिनके ईरान से करीबी संबंध माने जाते हैं। ऐसे में यह अंतिम यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति और शिया समुदाय के बीच ईरान की भूमिका का भी महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है।

  • भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    नई दिल्ली । इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को अपने सबसे मजबूत और भरोसेमंद मित्र देशों में शामिल बताते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है और अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी अलग-अलग बयान सामने आए हैं।

    एक साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका निश्चित रूप से इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इजरायल के पक्ष में कई अहम फैसले लिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया में इजरायल के मित्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है, जहां से इजरायल को मजबूत समर्थन प्राप्त होता है।

    नेतन्याहू ने भारत का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 140 करोड़ आबादी वाले देश से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों की सक्रियता का भी जिक्र किया और कहा कि उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर भारत से बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं और समर्थन देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह दोनों देशों के बीच मजबूत जनसंपर्क और सकारात्मक भावनाओं का संकेत है।

    इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी निजी स्तर पर इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा रखते हैं। उन्होंने दावा किया कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में अनेक देश इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। उनके अनुसार सुरक्षा और तकनीकी सहयोग भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मौजूदा समय में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे प्रमुख नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप निश्चित रूप से व्हाइट हाउस में इजरायल के सबसे बड़े मित्र रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी की राय समान होना जरूरी नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल के कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी हैं, जिनमें भारत प्रमुख स्थान रखता है।

    साक्षात्कार के दौरान नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी अपनी सरकार का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना था कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच समान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच किसी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तब भी इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का भारत का उल्लेख करना दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की ओर भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत और इजरायल के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को सार्वजनिक रूप से मजबूत मित्र बताना दोनों देशों के संबंधों के महत्व को रेखांकित करने वाला बयान माना जा रहा है।