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  • ईरान और ओमान समुद्री मार्ग समझौते के करीब, अमेरिका के सामने तेहरान ने रखीं कड़ी शर्तें

    ईरान और ओमान समुद्री मार्ग समझौते के करीब, अमेरिका के सामने तेहरान ने रखीं कड़ी शर्तें


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में जारी रणनीतिक और कूटनीतिक तनाव के बीच ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को फिर से खोलने की प्रक्रिया पूरी तरह से अमेरिका द्वारा रखी गई शर्तों को स्वीकार करने पर निर्भर करेगी। जब तक अमेरिका ईरान की सभी मांगों और शर्तों को पूरी तरह से नहीं मान लेता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही बहाल नहीं की जाएगी।

    आईआरजीसी के आधिकारिक प्रवक्ता सरदार मोहेबी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि इस महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य को खोलने के लिए कुछ विशेष व्यवस्थाएं और कड़ी शर्तें तय की गई हैं। उन्होंने कहा कि यह मार्ग तभी खोला जाएगा जब अमेरिकी प्रशासन क्षेत्रीय बातचीत और मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप पूरी तरह बंद करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्रशासन के समक्ष रखी गई शर्तें ओमान के साथ चल रही कूटनीतिक वार्ताओं से अलग हैं।

    दूसरी तरफ, कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को लेकर नए प्रोटोकॉल पर सहमति बनती दिख रही है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि दोनों देश एक व्यावहारिक और नई जहाजरानी व्यवस्था पर समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जलमार्ग को पूर्ण रूप से चालू करने से पहले अमेरिका से जुड़े कुछ आर्थिक और तकनीकी मुद्दों का समाधान होना बाकी है।

    ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहम्मद बाघेर ज़ोलघद्र ने अमेरिका के समक्ष रखी गई शर्तों की विस्तृत रूपरेखा साझा की है। ईरान की प्रमुख मांगों में उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की सैन्य धमकियों और कार्रवाइयों को तुरंत रोकना, फारस की खाड़ी क्षेत्र में नाकाबंदी में शामिल नौसैनिक और वायुसैनिक बलों की वापसी, संघर्ष के दौरान हुए वित्तीय और ढांचागत नुकसान का उचित मुआवजा देना, आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना और विदेश में जब्त की गई ईरानी परिसंपत्तियों को तत्काल जारी करना शामिल है।

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां कूटनीतिक समझौते के लिए सबसे उपयुक्त अवसर प्रस्तुत करती हैं। हालांकि, उन्होंने दृढ़ता से दोहराया कि तेहरान अपने नागरिकों के अधिकारों और राष्ट्रीय स्वाभिमान से किसी भी सूरत में समझौता नहीं करेगा। उन्होंने देश की आंतरिक क्षमताओं और जनता के भरोसे को प्राथमिकता देने की बात कही।

    इसके अतिरिक्त, क्षेत्र में यमन के मारिब शहर से भी हिंसा की खबरें सामने आई हैं। यमनी सशस्त्र बलों ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर आवासीय इलाकों और विस्थापित लोगों के शिविरों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले करने का आरोप लगाया है। इन हमलों में दो लोगों की मौत हुई है और चौदह अन्य नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। यमनी सैन्य नेतृत्व ने उचित समय और स्थान पर इन हमलों का कड़ा जवाब देने की घोषणा की है।

  • ईरान की राजनीति में बड़ा उलटफेर, विदेश मंत्री पर संकट, राष्ट्रपति कमजोर, सुरक्षा मामलों में IRGC का बढ़ा नियंत्रण

    ईरान की राजनीति में बड़ा उलटफेर, विदेश मंत्री पर संकट, राष्ट्रपति कमजोर, सुरक्षा मामलों में IRGC का बढ़ा नियंत्रण

    ईरान । ईरान में सत्ता का समीकरण बदलता नजर आ रहा है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर महाभियोग की तैयारी और राष्ट्रपति मसूद पजशकियान की शक्तियों में कटौती के दावों ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। इसी बीच इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC की भूमिका पहले से कहीं अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है। इन घटनाक्रमों ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में ईरान की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

    ईरान के वरिष्ठ सांसद होसैनअली हाजीदेलिगानी ने कहा है कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए आवश्यक दस्तावेज और सबूत जुटाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि उचित समय आने पर संसद में यह प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सांसदों का आरोप है कि अमेरिका के साथ युद्धविराम के दौरान हुई बातचीत ने ईरान के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाया और भविष्य में ऐसे समझौते देश की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकते हैं।

    इसी बीच इजराइली मीडिया की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति मसूद पजशकियान की शक्तियां सीमित कर दी गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका से जुड़ी रणनीतिक बातचीत जैसे अहम मामलों में अब अंतिम निर्णय सुप्रीम लीडर के प्रभाव वाली IRGC के हाथों में होगा। सुरक्षा मामलों में कमांडर अहमद वाहिदी की भूमिका भी पहले से अधिक मजबूत बताई जा रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इससे ईरान की आंतरिक राजनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। दोनों देशों के बीच बातचीत की तारीख और स्थान अब तक तय नहीं हो सके हैं। पाकिस्तान और कतर संभावित मेजबान देशों के रूप में सामने आए हैं और दोनों मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने उम्मीद जताई है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दोनों देशों के बीच जल्द कोई सहमति बन सकती है। यदि ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर राहत मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

    इस बीच होर्मुज स्ट्रेट लगातार वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है। ईरान ने दावा किया है कि उसने इस क्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है हालांकि उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि ड्रोन किस देश का था। दूसरी ओर एक लाइबेरियाई मालवाहक जहाज पर हमले की खबर भी सामने आई है जिसमें इंजन रूम में विस्फोट के बाद आग लग गई और एक नाविक लापता बताया गया। समुद्री सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    यमन के हूती विद्रोहियों ने भी सऊदी अरब के नजरीन एयरपोर्ट पर ड्रोन हमला करने का दावा किया है। वहीं लाल सागर में बढ़ते खतरे के कारण कई सऊदी सुपरटैंकरों ने अपना समुद्री मार्ग बदल लिया है। इससे वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान के भीतर सत्ता का संतुलन पूरी तरह सुरक्षा प्रतिष्ठान के पक्ष में जाता है तो विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसका रुख और अधिक कठोर हो सकता है। ऐसे में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। दूसरी ओर यदि वार्ता की कोई सकारात्मक पहल होती है तो इससे पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने का रास्ता भी खुल सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर ईरान के बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और उसके अगले कदम पर टिकी हुई है।

  • ईरान-सऊदी गुप्त समझौते में पाकिस्तान की भूमिका का दावा, असीम मुनीर पर तेल कारोबार से लाभ लेने के आरोप

    ईरान-सऊदी गुप्त समझौते में पाकिस्तान की भूमिका का दावा, असीम मुनीर पर तेल कारोबार से लाभ लेने के आरोप


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट ने नई चर्चा छेड़ दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने ईरान और सऊदी अरब के बीच एक कथित गुप्त समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि इस प्रक्रिया के समानांतर ईरान से पाकिस्तान तक तेल पहुंचाने वाली एक संयुक्त व्यवस्था से जुड़े कुछ लोगों को आर्थिक लाभ हुआ। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तान, सऊदी अरब तथा ईरान में से किसी भी देश ने इस संबंध में आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

    रिपोर्ट के अनुसार, यह कथित समझौता उस समय हुआ जब ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच सैन्य तनाव अपने शुरुआती चरण में था। दावा किया गया है कि पाकिस्तान की पहल पर सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐसा समझौता तैयार हुआ, जिसके बाद सऊदी अरब पर ईरान की ओर से होने वाले हमलों में कमी आई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस प्रक्रिया के दौरान ईरान से पाकिस्तान तक तेल पहुंचाने वाले एक संयुक्त तेल परिवहन नेटवर्क को जारी रखने पर सहमति बनी, जिससे जुड़े पक्षों को आर्थिक लाभ मिला।

    रिपोर्ट में यह आरोप भी लगाया गया कि इस कथित तेल परिवहन व्यवस्था का संचालन ऐसे समय में जारी रहा, जब ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और दबाव बढ़ा हुआ था। दावा किया गया कि यह नेटवर्क ईरान के तेल निर्यात को वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराने में सहायक बना। हालांकि इन आरोपों के समर्थन में किसी आधिकारिक जांच या सार्वजनिक दस्तावेज का उल्लेख सामने नहीं आया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ क्षेत्रीय अधिकारियों और कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि समझौते के बाद सऊदी अरब पर हमलों में उल्लेखनीय कमी देखी गई। बाद में एक मिसाइल हमले के बाद पाकिस्तान की ओर से कथित तौर पर ईरानी पक्ष को चेतावनी दिए जाने का भी दावा किया गया है। हालांकि इन घटनाओं की भी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और संबंधित देशों ने इस पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

    विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से रक्षा और सुरक्षा सहयोग मौजूद है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में ईरान के साथ भी संबंधों को संतुलित बनाए रखने की कोशिश की है। ऐसे में यदि किसी प्रकार की मध्यस्थता हुई भी हो, तो उसका उद्देश्य क्षेत्रीय तनाव कम करना बताया जा सकता है। हालांकि रिपोर्ट में लगाए गए आर्थिक लाभ और तेल कारोबार से जुड़े आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    कुछ कूटनीतिक विशेषज्ञों ने यह भी आशंका जताई है कि यदि इस तरह के अनौपचारिक समझौते वास्तव में हुए हों, तो वे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि ऐसे समझौते भविष्य में अन्य देशों के लिए भी जटिल कूटनीतिक परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं।

    फिलहाल यह मामला मीडिया रिपोर्टों और कूटनीतिक चर्चाओं तक सीमित है। पाकिस्तान, ईरान और सऊदी अरब की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद ही इन दावों की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक पुष्टि और स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों का इंतजार करना आवश्यक माना जा रहा है।

  • मोजतबा खामेनेई के ठिकाने पर फिर उठे सवाल, इजरायली सुरक्षा अधिकारी के दावे से ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर बढ़ी चर्चा

    मोजतबा खामेनेई के ठिकाने पर फिर उठे सवाल, इजरायली सुरक्षा अधिकारी के दावे से ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर बढ़ी चर्चा

    नई दिल्ली । ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को लेकर एक नया दावा सामने आने के बाद पश्चिम एशिया की राजनीतिक और सुरक्षा गतिविधियों पर फिर से चर्चा तेज हो गई है। एक इजरायली सुरक्षा अधिकारी के हवाले से यह दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई फिलहाल ईरान में मौजूद नहीं हैं। हालांकि, इस दावे की किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है और न ही ईरान की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया है। ऐसे में इस दावे को सत्यापित तथ्य के बजाय एक पक्ष के दावे के रूप में ही देखा जा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारी ने कहा कि मोजतबा खामेनेई का लंबे समय से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देना कई सवाल खड़े करता है। दावा किया गया कि हाल के दिनों में उनके नाम से जारी किए गए संदेश और सार्वजनिक बयान वास्तव में ईरान के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा तैयार और जारी किए जा रहे हैं। अधिकारी ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका हो सकती है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए कोई आधिकारिक या स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है।

    दावे में यह भी कहा गया कि ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद गहराते जा रहे हैं और इसका असर देश की सुरक्षा व्यवस्था तथा शीर्ष संस्थानों पर भी पड़ सकता है। इजरायली अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया कि ईरान ने इजरायल के खिलाफ एक गुप्त अभियान की योजना तैयार की थी, जिसका उद्देश्य वरिष्ठ इजरायली अधिकारियों को निशाना बनाना था। इस दावे को लेकर भी अभी तक किसी स्वतंत्र एजेंसी या आधिकारिक संस्था ने पुष्टि नहीं की है।

    मोजतबा खामेनेई को लेकर पहले भी कई तरह की अटकलें सामने आती रही हैं। उनकी सार्वजनिक अनुपस्थिति के कारण समय-समय पर उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर विभिन्न दावे किए गए। कुछ रिपोर्टों में उन्हें गंभीर रूप से घायल होने की बात कही गई, जबकि अन्य रिपोर्टों में उनके सुरक्षित होने का दावा किया गया। हालांकि, इन दावों पर भी कोई स्पष्ट और आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

    विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से जारी तनावपूर्ण संबंधों के बीच इस तरह के दावे और प्रतिदावे सामने आते रहते हैं। ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की ओर से सूचना युद्ध भी देखने को मिलता है, इसलिए किसी भी दावे को अंतिम निष्कर्ष मानने से पहले आधिकारिक पुष्टि और स्वतंत्र सत्यापन का इंतजार करना आवश्यक होता है।

    फिलहाल मोजतबा खामेनेई के वर्तमान ठिकाने, स्वास्थ्य या सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ईरानी सरकार की ओर से भी इस दावे पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यदि किसी पक्ष की ओर से आधिकारिक बयान जारी होता है तो उससे इस पूरे मामले की वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि यह मामला दावों और अटकलों के बीच बना हुआ है तथा इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान में बढ़े मतभेद, सैन्य नेतृत्व और सरकार के अलग-अलग रुख से पश्चिम एशिया में तनाव गहराने के संकेत

    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान में बढ़े मतभेद, सैन्य नेतृत्व और सरकार के अलग-अलग रुख से पश्चिम एशिया में तनाव गहराने के संकेत

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के भीतर नीतिगत मतभेदों की चर्चाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है। विश्लेषकों का मानना है कि एक ओर ईरान के सैन्य प्रतिष्ठान का रुख अधिक सख्त दिखाई दे रहा है, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक नेतृत्व कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ने की वकालत कर रहा है। इन अलग-अलग संकेतों के कारण क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। ऐसे में इस जलमार्ग से जुड़ी किसी भी संभावित बाधा का प्रभाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, यूरोप और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ईरान के भीतर सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं दूसरा पक्ष क्षेत्रीय तनाव को कम करने, संवाद को प्राथमिकता देने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की आवश्यकता पर जोर देता है ताकि व्यापक संघर्ष की आशंका को टाला जा सके।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तथा समुद्री व्यापार प्रभावित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने की संभावना रहती है। इसका असर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था, परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।

    अमेरिका पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है और इसके निर्बाध संचालन को बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अधिकांश देश इस समुद्री मार्ग में किसी प्रकार की बाधा से बचने और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं।

    भारत जैसे देशों के लिए भी यह जलमार्ग विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। पश्चिम एशिया से आने वाला पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल और गैस इसी समुद्री मार्ग से भारत सहित अन्य एशियाई देशों तक पहुंचता है। ऐसे में यदि किसी कारण से आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर घरेलू ईंधन कीमतों, उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों पर भी देखने को मिल सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सभी पक्षों के लिए संवाद और कूटनीतिक प्रयास सबसे प्रभावी विकल्प हो सकते हैं। यदि बातचीत के जरिए तनाव कम करने की दिशा में प्रगति होती है तो क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। वहीं किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव या समुद्री मार्ग में व्यवधान वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

  • मध्य पूर्व में बढ़ा सैन्य टकराव, अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद ईरान का पलटवार का दावा, बहरीन में बजाए गए आपातकालीन सायरन

    मध्य पूर्व में बढ़ा सैन्य टकराव, अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद ईरान का पलटवार का दावा, बहरीन में बजाए गए आपातकालीन सायरन

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी हवाई हमलों के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने दावा किया है कि उसने बहरीन और कुवैत सहित क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को मिसाइलों और ड्रोन के जरिए निशाना बनाया है। इस घटनाक्रम के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और कई देशों ने एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

    आईआरजीसी के अनुसार यह कार्रवाई अमेरिका की हालिया सैन्य कार्रवाई के जवाब में की गई है। ईरान का दावा है कि उसके नौसैनिक और एयरोस्पेस बलों ने संयुक्त अभियान चलाकर अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को लक्ष्य बनाया। संगठन ने कहा कि बहरीन में स्थित अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट बेस और कुवैत के अली अल-सलेम एयर बेस समेत कई ठिकानों पर हमले किए गए। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और नुकसान की आधिकारिक जानकारी भी सामने नहीं आई है।

    ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने पहले उसके तटीय क्षेत्रों और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। ईरानी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई संघर्ष विराम और पूर्व में हुए समझौतों की भावना के विपरीत थी, जिसके जवाब में जवाबी सैन्य कार्रवाई की गई। ईरान ने इसे अपनी सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया है।

    तनावपूर्ण स्थिति के बीच बहरीन सरकार ने पूरे देश में आपातकालीन चेतावनी सायरन सक्रिय कर दिए। गृह मंत्रालय ने नागरिकों और प्रवासियों से शांत रहने तथा आवश्यकता पड़ने पर निकटतम सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की। सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त निगरानी बढ़ा दी गई है। क्षेत्र के अन्य देशों ने भी हालात पर लगातार नजर बनाए रखी है।

    हाल के दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ी सैन्य गतिविधियों ने पहले ही वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी थी। इसी क्षेत्र में जहाजों पर हमलों और उसके बाद अमेरिकी कार्रवाई ने तनाव को और अधिक बढ़ा दिया। अब ईरान के जवाबी हमले के दावे के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई आशंकाएं पैदा हो गई हैं।

    अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सैन्य गतिविधियां इसी तरह जारी रहती हैं तो इसका प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। कई देशों ने सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के माध्यम से तनाव कम करने की अपील की है।

    फिलहाल क्षेत्र की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। विभिन्न देशों की सुरक्षा एजेंसियां लगातार घटनाक्रम पर नजर रख रही हैं और संभावित जोखिमों को देखते हुए सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जा रहा है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान की आगे की रणनीति तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इस संकट की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, बेटों की मौजूदगी के बीच सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की गैरहाजिरी पर तेज हुई चर्चाएं

    ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई, बेटों की मौजूदगी के बीच सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की गैरहाजिरी पर तेज हुई चर्चाएं

    नई दिल्ली । ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को शनिवार को तेहरान में पूरे राजकीय और धार्मिक सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम संस्कार में देश के शीर्ष राजनीतिक, सैन्य और धार्मिक नेतृत्व की मौजूदगी रही, जबकि सबसे अधिक चर्चा मौजूदा सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की सार्वजनिक गैरमौजूदगी को लेकर हुई। सुरक्षा कारणों के चलते उनके समारोह में खुलकर शामिल न होने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    अंतिम नमाज के दौरान अली खामेनेई के परिवार के कई सदस्य मौजूद रहे। उनके बेटों मसूद, मेयसाम और मुस्तफा ने अंतिम रस्मों में हिस्सा लिया और अपने पिता को श्रद्धांजलि अर्पित की। वहीं, देश के कई वरिष्ठ अधिकारी और धार्मिक नेता भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। समारोह के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों ने भी अपने पूर्व सर्वोच्च नेता को अंतिम विदाई दी।

    ईरानी प्रशासन के अनुसार, अंतिम नमाज का नेतृत्व वरिष्ठ धार्मिक नेता आयतुल्ला जाफर सोभानी ने किया। उनके साथ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ, न्यायपालिका प्रमुख गुलामहुसैन मोहसनी एजेई तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। कुद्स फोर्स के कमांडर इस्माइल क़ानी सहित कई प्रमुख सैन्य अधिकारी भी समारोह का हिस्सा बने।

  • पैगंबर के वंशज की हुकूमत, फिर भी ईरान से टकराव क्यों? जॉर्डन की रणनीतिक भूमिका बनी विवाद की वजह

    पैगंबर के वंशज की हुकूमत, फिर भी ईरान से टकराव क्यों? जॉर्डन की रणनीतिक भूमिका बनी विवाद की वजह

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच जॉर्डन एक बार फिर क्षेत्रीय संघर्ष के केंद्र में आ गया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने के दावों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जॉर्डन की रणनीतिक स्थिति और पश्चिमी देशों के साथ उसके मजबूत संबंध उसे लंबे समय से ईरान समर्थित आलोचनाओं और हमलों का संभावित लक्ष्य बनाते रहे हैं।

    हालिया घटनाक्रम में ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान ने जॉर्डन में स्थित एक महत्वपूर्ण अमेरिकी एयर बेस पर मिसाइल हमले का दावा किया है। हालांकि हमले से हुए नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इस दावे ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। जॉर्डन लंबे समय से अमेरिका का करीबी सुरक्षा साझेदार रहा है और उसके कई सैन्य अड्डों का उपयोग क्षेत्रीय अभियानों में किया जाता रहा है।

    विशेष रूप से अल-अजराक एयर बेस को क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का अहम केंद्र माना जाता है। यह सैन्य अड्डा जॉर्डन की राजधानी अम्मान से पूर्व दिशा में स्थित है और विभिन्न सुरक्षा अभियानों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ईरान का आरोप रहा है कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी उसके राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करती है। इसी कारण ऐसे सैन्य ठिकाने अक्सर ईरानी बयानबाजी और रणनीतिक विरोध का हिस्सा बनते रहे हैं।

    जॉर्डन और ईरान के बीच तनाव केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है। जॉर्डन ने वर्षों से अमेरिका और इजरायल के साथ संतुलित लेकिन घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं। दूसरी ओर ईरान स्वयं को क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल की नीतियों का प्रमुख विरोधी मानता है। ऐसे में जॉर्डन को अक्सर उस राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे का हिस्सा माना जाता है जिसका ईरान विरोध करता है।

    विश्लेषकों के अनुसार इजरायल की सुरक्षा से जुड़े मामलों में जॉर्डन की भूमिका भी दोनों देशों के बीच अविश्वास को बढ़ाती रही है। क्षेत्रीय संघर्षों के दौरान कई बार ऐसी स्थितियां बनी हैं जब जॉर्डन के हवाई क्षेत्र और सुरक्षा तंत्र का उपयोग संभावित खतरों को रोकने के लिए किया गया। इससे ईरान समर्थक समूहों के बीच जॉर्डन की छवि पश्चिम समर्थक देश के रूप में और मजबूत हुई है।

    जॉर्डन के शासक किंग अब्दुल्ला द्वितीय को पैगंबर मोहम्मद का वंशज माना जाता है और उनका परिवार लंबे समय से इस ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा रहा है। इसके बावजूद क्षेत्रीय राजनीति में धार्मिक पहचान से अधिक महत्व रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों का रहा है। यही कारण है कि धार्मिक विरासत के बावजूद जॉर्डन और ईरान के बीच राजनीतिक मतभेद लगातार बने हुए हैं।

    हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका बढ़ा दी है। कई देशों ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की है और हवाई यातायात पर भी सतर्कता बढ़ाई गई है। जॉर्डन, कुवैत और बहरीन जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों पर बढ़ता दबाव इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है।

    मध्य पूर्व की मौजूदा परिस्थितियों में जॉर्डन की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने, सुरक्षा सहयोग जारी रखने और बढ़ते तनाव को नियंत्रित करने की चुनौती उसके सामने पहले से अधिक गंभीर रूप में मौजूद है।

  • ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी

    ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी




    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने अमेरिकी सेना के एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है। ईरान का कहना है कि यह ड्रोन उसके हवाई क्षेत्र में घुस आया था।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब क्षेत्र में अस्थायी संघर्ष विराम (सीजफायर) लागू बताया जा रहा है और इसी दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के पास सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    ईरान का दावा और कड़ी चेतावनी
    ईरान की मीडिया एजेंसी मेहर न्यूज के अनुसार, IRGC ने कहा कि अमेरिकी ड्रोन उसकी सीमा में प्रवेश कर रहा था, जिसके बाद उसे निशाना बनाकर मार गिराया गया। साथ ही ईरान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सीजफायर का उल्लंघन दोबारा किया गया तो इसका “कड़ा और निर्णायक जवाब” दिया जाएगा।ईरान ने यह भी कहा कि उसकी सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    अमेरिकी कार्रवाई का दावा
    दूसरी ओर, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा है कि उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई की है। अमेरिकी प्रवक्ता के मुताबिक, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों और युद्धपोतों को खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया।

    रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास संदिग्ध बोट्स पर भी कार्रवाई की, जिन पर कथित तौर पर बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश का आरोप था। इसके अलावा बंदर अब्बास के पास एक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल साइट पर भी हमले की बात सामने आई है।

    चार ईरानी सैनिकों की मौत का दावा
    ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिकी हमलों में रिवोल्यूशनरी गार्ड के चार सैनिकों की मौत हुई है। हालांकि इस पर स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

    क्षेत्र में बढ़ता तनाव
    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकती है।

    ईरान और अमेरिका के बीच पहले से ही परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर तनाव बना हुआ है। इस ताजा घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच हालात को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

  • ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग

    ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान की सैन्य तैयारियों को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) द्वारा देशभर में आम नागरिकों को हथियार चलाने और सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

    तेहरान सहित कई शहरों में कथित तौर पर सार्वजनिक स्थानों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहां महिलाओं, पुरुषों और युवाओं को हथियारों के उपयोग की जानकारी दी जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि छोटी उम्र के बच्चों को भी प्रतीकात्मक रूप से हथियार चलाने का अभ्यास कराया गया।

    इसके साथ ही ईरानी सरकारी मीडिया से जुड़े कुछ वायरल वीडियो में एंकरों को हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घटनाक्रम उस व्यापक भू-राजनीतिक तनाव का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान अभी भी अनिश्चित स्थिति में है।

    हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य गतिविधियों के संकेतों ने वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।