पैगंबर के वंशज की हुकूमत, फिर भी ईरान से टकराव क्यों? जॉर्डन की रणनीतिक भूमिका बनी विवाद की वजह

नई दिल्ली । मध्य पूर्व में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच जॉर्डन एक बार फिर क्षेत्रीय संघर्ष के केंद्र में आ गया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने के दावों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जॉर्डन की रणनीतिक स्थिति और पश्चिमी देशों के साथ उसके मजबूत संबंध उसे लंबे समय से ईरान समर्थित आलोचनाओं और हमलों का संभावित लक्ष्य बनाते रहे हैं।

हालिया घटनाक्रम में ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान ने जॉर्डन में स्थित एक महत्वपूर्ण अमेरिकी एयर बेस पर मिसाइल हमले का दावा किया है। हालांकि हमले से हुए नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इस दावे ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। जॉर्डन लंबे समय से अमेरिका का करीबी सुरक्षा साझेदार रहा है और उसके कई सैन्य अड्डों का उपयोग क्षेत्रीय अभियानों में किया जाता रहा है।

विशेष रूप से अल-अजराक एयर बेस को क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का अहम केंद्र माना जाता है। यह सैन्य अड्डा जॉर्डन की राजधानी अम्मान से पूर्व दिशा में स्थित है और विभिन्न सुरक्षा अभियानों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ईरान का आरोप रहा है कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी उसके राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करती है। इसी कारण ऐसे सैन्य ठिकाने अक्सर ईरानी बयानबाजी और रणनीतिक विरोध का हिस्सा बनते रहे हैं।

जॉर्डन और ईरान के बीच तनाव केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है। जॉर्डन ने वर्षों से अमेरिका और इजरायल के साथ संतुलित लेकिन घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं। दूसरी ओर ईरान स्वयं को क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल की नीतियों का प्रमुख विरोधी मानता है। ऐसे में जॉर्डन को अक्सर उस राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे का हिस्सा माना जाता है जिसका ईरान विरोध करता है।

विश्लेषकों के अनुसार इजरायल की सुरक्षा से जुड़े मामलों में जॉर्डन की भूमिका भी दोनों देशों के बीच अविश्वास को बढ़ाती रही है। क्षेत्रीय संघर्षों के दौरान कई बार ऐसी स्थितियां बनी हैं जब जॉर्डन के हवाई क्षेत्र और सुरक्षा तंत्र का उपयोग संभावित खतरों को रोकने के लिए किया गया। इससे ईरान समर्थक समूहों के बीच जॉर्डन की छवि पश्चिम समर्थक देश के रूप में और मजबूत हुई है।

जॉर्डन के शासक किंग अब्दुल्ला द्वितीय को पैगंबर मोहम्मद का वंशज माना जाता है और उनका परिवार लंबे समय से इस ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा रहा है। इसके बावजूद क्षेत्रीय राजनीति में धार्मिक पहचान से अधिक महत्व रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों का रहा है। यही कारण है कि धार्मिक विरासत के बावजूद जॉर्डन और ईरान के बीच राजनीतिक मतभेद लगातार बने हुए हैं।

हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका बढ़ा दी है। कई देशों ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की है और हवाई यातायात पर भी सतर्कता बढ़ाई गई है। जॉर्डन, कुवैत और बहरीन जैसे अमेरिकी सहयोगी देशों पर बढ़ता दबाव इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है।

मध्य पूर्व की मौजूदा परिस्थितियों में जॉर्डन की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने, सुरक्षा सहयोग जारी रखने और बढ़ते तनाव को नियंत्रित करने की चुनौती उसके सामने पहले से अधिक गंभीर रूप में मौजूद है।