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  • कटरा: मां वैष्णो देवी की नगरी, जहां श्रद्धा के साथ खानपान के नियम भी निभाए जाते हैं

    कटरा: मां वैष्णो देवी की नगरी, जहां श्रद्धा के साथ खानपान के नियम भी निभाए जाते हैं

    नई दिल्ली। भारत में खाने की बात हो और प्याज-लहसुन का जिक्र न आए, ऐसा शायद ही कभी होता हो। हर घर की रसोई से लेकर बड़े-बड़े होटलों तक इन दोनों का इस्तेमाल आम माना जाता है। लेकिन जम्मू-कश्मीर का कटरा एक ऐसा शहर है, जहां पहुंचते ही खान-पान की पूरी तस्वीर बदल जाती है। यहां न बाजारों में प्याज-लहसुन बिकता दिखाई देता है, न ढाबों और होटलों के खाने में इसका इस्तेमाल होता है और न ही लोग इसे अपने घरों में रखना पसंद करते हैं। यही वजह है कि कटरा को देश के सबसे अनोखे धार्मिक शहरों में गिना जाता है।

    कटरा माता वैष्णो देवी मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां से माता के दरबार के लिए यात्रा शुरू करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यात्रा शुरू करने से पहले शरीर और मन की पवित्रता बनाए रखना जरूरी माना जाता है। इसी वजह से पूरे शहर में सात्विक भोजन की परंपरा विकसित हुई। स्थानीय लोगों का मानना है कि प्याज और लहसुन तामसिक भोजन की श्रेणी में आते हैं, जो मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि वर्षों से यहां इनका इस्तेमाल नहीं किया जाता।

    सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा किसी सरकारी आदेश या कानूनी प्रतिबंध के कारण नहीं चल रही, बल्कि लोगों की आस्था और आपसी सम्मान से कायम है। यहां रहने वाले दूसरे धर्मों के लोग, यहां तक कि मुस्लिम परिवार भी स्थानीय परंपराओं का सम्मान करते हुए प्याज-लहसुन से दूरी बनाए रखते हैं। यही सामाजिक सौहार्द कटरा को बाकी शहरों से अलग पहचान देता है।

    अक्सर लोगों को लगता है कि बिना प्याज और लहसुन के खाना स्वादिष्ट नहीं हो सकता, लेकिन कटरा इस सोच को बदल देता है। यहां के रसोइए हींग, अदरक, हरी मिर्च और खास मसालों के इस्तेमाल से ऐसा स्वाद तैयार करते हैं कि श्रद्धालु खाने की तारीफ किए बिना नहीं रहते। दाल, कढ़ी, सब्जियां, पूरी और चटनियों का स्वाद यहां अलग ही अनुभव देता है। कई लोग तो कटरा के सात्विक भोजन को सेहत और स्वाद का बेहतरीन मेल मानते हैं।

    कटरा की यह परंपरा सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और धार्मिक वातावरण का हिस्सा बन चुकी है। दुकानदार भी प्याज-लहसुन का स्टॉक नहीं रखते और यदि कोई पर्यटक इसकी मांग करता है, तो उसे विनम्रता से यहां की परंपरा के बारे में बताया जाता है। यही वजह है कि कटरा आज भी अपनी आध्यात्मिक पहचान और सात्विक जीवनशैली के कारण देश-दुनि

  • कश्मीर के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता, अब किसान 40 हजार रुपये किलो वाले दुर्लभ मशरूम की कर सकेंगे खेती

    कश्मीर के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता, अब किसान 40 हजार रुपये किलो वाले दुर्लभ मशरूम की कर सकेंगे खेती

    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है, जिसके बाद अब किसान 15 हजार से 40 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकने वाला दुर्लभ मशरूम अपने खेतों में भी उगा सकेंगे। श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) के वैज्ञानिकों ने पहली बार नियंत्रित वातावरण में इस मशरूम की सफल खेती कर दिखाई है।

    जंगलों पर निर्भरता से मिली मुक्ति

    यह मशरूम मोरल्स या मोरचेला (स्थानीय नाम कंगाच) है, जो अब तक सिर्फ ऊंचे पहाड़ी जंगलों में बारिश के मौसम में प्राकृतिक रूप से उगता था। इसकी उपलब्धता बेहद सीमित और मुश्किल होने के कारण बाजार में इसकी कीमत बेहद अधिक रहती है।

    वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

    SKUAST के कुलपति प्रोफेसर नजीर अहमद गनई ने इस उपलब्धि को “गेम चेंजर” बताया है। उनके अनुसार, यह तकनीक जंगलों पर निर्भरता खत्म कर नियंत्रित उत्पादन का रास्ता खोलती है, जिससे किसानों, युवाओं और स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

    पांच साल की मेहनत से मिला परिणाम

    इस शोध में प्रोफेसर तारिक अहमद सोफी, उनके छात्र कमरान मुनीर और प्रोफेसर विकास गुप्ता शामिल रहे। टीम ने पिछले पांच वर्षों में 1000 से अधिक प्राकृतिक स्थलों से मोरचेला के नमूने एकत्र किए और उनके वातावरण, मिट्टी, नमी और पौधों का गहन अध्ययन किया।

    शोध के दौरान 10 किस्मों को चुना गया, जिनमें से 3 किस्मों में सफलतापूर्वक खेती संभव हो सकी।

    पॉलीहाउस से लेकर खुले खेत तक सफलता

    शुरुआत में इस मशरूम की खेती पॉलीहाउस में की गई, जबकि बाद में इसे खुले वातावरण में भी उगाने में सफलता मिली। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके लिए पेटेंट प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। यह प्रयोग बारामूला, अनंतनाग और श्रीनगर सहित कई क्षेत्रों में किया गया है।

    खास पर्यावरण की जरूरत वाला मशरूम

    मोरचेला की खेती हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है क्योंकि इसे विशेष तापमान, नमी और मिट्टी की स्थिति की आवश्यकता होती है। साथ ही अलग-अलग किस्मों के लिए अलग पौधों और प्राकृतिक वातावरण का संतुलन भी जरूरी होता है।

    किसानों के लिए नई आर्थिक संभावना

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से जम्मू-कश्मीर की कृषि अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग के चलते यह फसल किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत विकल्प बन सकती है और जैव-अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे सकती है।

  • जम्मू कश्मीर में LOC के पास दिखे पाकिस्तानी ड्रोन, इंडियन आर्मी की जवाबी कार्रवाई के बाद वापस लौटे

    जम्मू कश्मीर में LOC के पास दिखे पाकिस्तानी ड्रोन, इंडियन आर्मी की जवाबी कार्रवाई के बाद वापस लौटे

    जम्मू-कश्मीर। जम्मू-कश्मीर के सांबा, राजौरी और पुंछ जिलों में रविवार शाम को लाइन ऑफ कंट्रोल पर कुछ ड्रोन देखे गए। ड्रोन देखने के बाद भारतीय सेना के जवानों ने काउंटर उपाय अपनाए। इसके बाद पाकिस्तानी ड्रोन वापस लौट गए। अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) और नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे कई अग्रिम क्षेत्रों में सुरक्षा बलों ने संदिग्ध ड्रोन की गतिविधि देखी। अधिकारियों ने बताया कि सभी ड्रोन पाकिस्तान की तरफ से आए थे और भारतीय क्षेत्र के ऊपर कुछ मिनट तक मंडराने के बाद वापस लौट गए।
    सेना के अधिकारियों के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्रों में संदिग्ध ड्रोन की गतिविधि को देखते हुए सुरक्षा बलों ने जमीन पर तलाश अभियान शुरू किया है। उन्होंने बताया कि राजौरी में नियंत्रण रेखा के पास नौशेरा सेक्टर की रखवाली कर रहे सेना के जवानों ने शाम करीब छह बजकर 35 मिनट पर गनिया-कलसियां ​​गांव के ऊपर ड्रोन की गतिविधि को देखते हुए मध्यम और हल्की मशीन गनों से गोलीबारी की। राजौरी जिले के तेरियाथ के खब्बर गांव में शाम 6.35 बजे एक और ड्रोन देखा गया।

    सैन्य अधिकारियों ने शाम छह बजे ड्रोन देखे
    अधिकारियों ने बताया कि ड्रोन जैसी उड़ने वाली वस्तु कलाकोट के धर्मसाल गांव से आया और भरख की ओर बढ़ गयी। उन्होंने बताया कि शाम करीब 7:15 मिनट पर सांबा के रामगढ़ सेक्टर के चक बाबराल गांव के ऊपर एक ड्रोन जैसी वस्तु कुछ मिनटों तक मंडराती हुई देखी गई। अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार शाम छह बजकर 35 मिनट पर पुंछ जिले के नियंत्रण रेखा (एलओ) पर स्थित मनकोट सेक्टर में तैन से टोपा में भी एक ड्रोन जैसी वस्तु देखी गई थी।

    शुक्रवार को गिराया गया था पाकिस्तानी ड्रोन
    सैन्य अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार रात को सुरक्षा बलों ने सांबा जिले से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) के पास घगवाल के पलोरा गांव में पाकिस्तान से आए एक ड्रोन द्वारा गिराए गए हथियारों की खेप बरामद की। उन्होंने बताया कि इस खेप में दो पिस्तौल, तीन मैगजीन, 16 गोलियां और एक ग्रेनेड शामिल थे।