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  • मुरैना में जन्माष्टमी पर मातम: मंदिर से लौट रही तीन महिलाओं को कंटेनर ने रौंदा, सास-बहू सहित एक अन्य की मौत

    मुरैना में जन्माष्टमी पर मातम: मंदिर से लौट रही तीन महिलाओं को कंटेनर ने रौंदा, सास-बहू सहित एक अन्य की मौत


    मुरैना। जन्माष्टमी की खुशी मातम में बदल गई। राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर शनिवार तडक़े तेज रफ्तार कंटेनर ने तीन महिलाओं को कुचल दिया। तीनों महिलाएं घिरोना हनुमान मंदिर में श्रीकृष्ण जन्म के दर्शन कर घर लौट रही थीं। हादसे में तीनों की मौत हो गई। जानकारी के अनुसार हादसा तडक़े करीब 4 बजे का है। हरफूल का पुरा गांव की रहने वाली महिलाएं रात में घिरोना हनुमान मंदिर में आयोजित जन्मोत्सव कार्यक्रम में शामिल होने गई थीं। दर्शन के बाद तीनों पैदल ही हाईवे किनारे से अपने घर लौट रही थीं। तभी दिल्ली की ओर जा रहे तेज रफ्तार कंटेनर ने उन्हें पीछे से टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि एक महिला की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि सास-बहू गंभीर रूप से घायल हो गईं। चीख-पुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी।
    सिविल लाइन थाना पुलिस ने घायलों को तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया, लेकिन उपचार के दौरान दोनों ने दम तोड़ दिया।
    इन महिलाओं की हुई मौत –
    मृतकों की पहचान कमला कुशवाहा पत्नी फूल सिंह (50), कमला कुशवाहा पत्नी बालकिशन (50) और पूनम कुशवाहा पत्नी धर्मवीर (28) के रूप में हुई है। तीनों हरफूल का पुरा, थाना सिविल लाइन की निवासी थीं।
    बताया जा रहा है कि पूनम अपनी दो सास के साथ मंदिर गई थी। हादसे के बाद कंटेनर चालक नियंत्रण खो बैठा और सडक़ किनारे बनी कुछ दुकानों में जा घुसा। इससे दुकानों को भी नुकसान पहुंचा है।
    ग्रामीणों ने कंटेनर को घेर लिया और चालक को पकडक़र पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने कंटेनर को जब्त कर चालक को हिरासत में ले लिया है।
    तीनों शवों का पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया गया है। गांव में एक साथ तीन अर्थियां उठने से पूरे इलाके में शोक का माहौल है।
    सरपंच राजपाल सिंह कुशवाहा ने बताया कि तेज रफ्तार ट्रक की टक्कर से 3 महिलाओं की मौत हुई है। जिसमें सास-बहु है। यह बहुत ही दर्दनाक हादसा है। ग्रामीणों ने चालक को पकड़ लिया है। पुलिस को चाहिए कि वाहनों की रफ्तार को कंट्रोल मे करवाएं।
    नगर पुलिस अधीक्षक दीपाल चंदोरिया ने बताया कि थाना सिविल लाइन मे ट्रक की चपेट मे आने से तीन महिलाओं की मौत हो गई है। एक की मौके पर मौत हो गई थी। पुलिस ने ट्रक को जब्त कर लिया है और चालक को भी पकड़ लिया है। मामला दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।
  • जन्माष्टमी पर था द्वापर जैसा नजारा…. मध्यरात्रि मथुरा में जन्मे भगवान श्रीकृष्ण, देशभर में गूंज उठे जयकारे

    जन्माष्टमी पर था द्वापर जैसा नजारा…. मध्यरात्रि मथुरा में जन्मे भगवान श्रीकृष्ण, देशभर में गूंज उठे जयकारे


    मथुरा।
    इस भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी (Krishna Paksha, Ashtami) तिथि की मध्यरात्रि नजारा बिल्कुल द्वापर (Dvapar) सरीखा ही था। दिन में खूब बदरा बरसे और रात को भी काली घटाएं छाईं थीं। हर पल जोर जोर से बरसने को आतुर। आसमान में बिजली भी खूब चमकी। जैसे ही घड़ी की सुइयों ने शुक्रवार को रात के 12 बजाए, संपूर्ण ब्रजमंडल नंद घर आनंद भए, जय कन्हैया लाल की के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। अलौकिक आभा, अपार जनसैलाब, ढोल-नगाड़ों की थाप और घंटे-घड़ियालों की गूंज के बीच भगवान श्रीकृष्ण (Lord Sri Krishna) का घर-घर और मंदिरों में जन्म हुआ। लाखों श्रद्धालु इसके साक्षी बने।

    मुख्य आयोजन श्रीकृष्ण जन्मस्थान (Shri Krishna Janmasthan) पर हुआ। श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भक्तों का उल्लास देखते ही बन रहा था। घड़ी में जैसे ही 11 बजे तत्काल नवगृह स्थापना के साथ पूजन शुरू हो गया। 11.55 बजे तक कमल पुष्प एवं तुलसीदल से सहस्त्रार्चन हुआ। 11.59 बजते ही भागवत भवन स्थित युगल सरकार के पट बंद हो गए।

    इस एक मिनट के पल में श्रद्धालुओं को लगा मानो घंटों बीत रहे हों। ठीक 12 बजे लीलाधर के चलित श्रीविग्रह को भागवत भवन लाया गया। यहां रजत कमल पुष्प में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक किया गया। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के ट्रस्टी अनुराग डालमिया, सचिव कपिल शर्मा और सदस्य गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने सोने-चांदी से निर्मित 100 किग्रा की कामधेनु गाय की मूर्ति में गंगाजल सहित पंचामृत भरकर लल्ला का अभिषेक किया।

    इस दौरान जन्मस्थान पर ढोल-नगाड़े और घंटे-घड़ियाल गूंजते रहे। झांझ-मजीरे, मृदंग और शंख की मंगलध्वनि के बीच कान्हा के बधाई गीत गुंजायमान हो उठे। दर्शन का दौर 1:30 बजे तक चलता रहा।

    श्रीकृष्ण के 5253वें जन्मोत्सव पर श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थित मूल श्रीगर्भगृह (कारागार) से अभिषेक व पूजा-अर्चना की लाइव स्ट्रीमिंग कराई गई। गर्भगृह में श्रीकृष्ण बाल-गोपाल रूप में विराजते हैं। अब तक केवल भागवत भवन से ही लाइव प्रसारण होता रहा है, शुक्रवार मध्यरात्रि करोड़ों श्रद्धालुओं ने घर बैठे टीवी स्क्रीन पर सीधा प्रसारण देखा। इसके लिए श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान द्वारा अत्याधुनिक कैमरे लगाकर डिजिटल प्रसारण की व्यवस्था की गई।

  • 4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से बढ़ा पर्व का महत्व

    4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से बढ़ा पर्व का महत्व

    नई दिल्ली ।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस वर्ष 4 सितंबर को मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू हुई और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। धार्मिक परंपरा में जन्माष्टमी की तारीख निर्धारित करते समय केवल अष्टमी तिथि ही नहीं, बल्कि मध्यरात्रि और रोहिणी नक्षत्र की स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इन्हीं पंचांग गणनाओं के आधार पर शुक्रवार को जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा। रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव और विशेष पूजा की जाएगी। इस बार पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है, क्योंकि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार कई शुभ संयोग एक साथ बन रहे हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि के संयोग में हुआ था। वर्ष 2026 में जन्माष्टमी पर भी अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष मेल बताया जा रहा है। इसी कारण इस संयोग को जयंती योग के रूप में विशेष महत्व दिया जा रहा है।

    इस वर्ष जन्माष्टमी पर जयंती योग के अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग, हर्षण योग, हंस योग, मालव्य योग, बुधादित्य राजयोग और नवपंचम राजयोग बनने की बात कही गई है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में शुभ योगों को पूजा, व्रत, भक्ति और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल माना जाता है।

    जन्माष्टमी की सबसे महत्वपूर्ण पूजा मध्यरात्रि के निशीथ काल में की जाती है। इस वर्ष निशीथ काल रात 11 बजकर 58 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। यानी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मुख्य पूजा के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 46 मिनट का समय मिलेगा।

    अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को देखते हुए इस अवधि में श्रीकृष्ण की पूजा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान भगवान का अभिषेक, पूजन, आरती और जन्मोत्सव से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। कई भक्त जन्माष्टमी पर व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में पूजा के बाद व्रत का पारण करते हैं।

    4 सितंबर के दिन की शुरुआत हर्षण योग से होगी, जो दोपहर 3 बजकर 44 मिनट तक रहने की जानकारी दी गई है। इसके बाद अन्य ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार दिन और रात में अलग-अलग योगों की स्थिति रहेगी। इन योगों को लेकर धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हैं और श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर समेत कई शहरों में जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं। राजधानी के इस्कॉन मंदिर, खाटू श्याम मंदिर और राधा-कृष्ण मंदिरों में शुक्रवार सुबह से ही धार्मिक कार्यक्रम, भजन और अन्य आयोजन शुरू होने की तैयारी है। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के श्रृंगार, झांकी और जन्मोत्सव के लिए व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं।

    जन्माष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि श्रीकृष्ण के जीवन, उनके उपदेशों और धर्म तथा कर्म की अवधारणा को स्मरण करने का अवसर भी माना जाता है। इस दिन देशभर में श्रद्धालु भगवान कृष्ण की बाल रूप में पूजा करते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्म का उत्सव मनाते हैं। इस बार बनने वाले विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण पर्व का धार्मिक महत्व और अधिक चर्चा में है।

  • राजवाड़ा स्थित अनोखे मंदिर में मां यशोदा की गोद में विराजते हैं बाल कृष्ण, देश विदेश से आती हैं श्रद्धालु महिलाएं

    राजवाड़ा स्थित अनोखे मंदिर में मां यशोदा की गोद में विराजते हैं बाल कृष्ण, देश विदेश से आती हैं श्रद्धालु महिलाएं

    मध्यप्रदेश: के इंदौर शहर में राजवाड़ा क्षेत्र की गलियों के बीच स्थित करीब 230 साल पुराना मां यशोदा मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है। जन्माष्टमी के अवसर पर यहां मां यशोदा की गोद भराई की रस्म निभाई जाती है। मान्यता है कि इस परंपरा में शामिल होकर महिलाएं संतान प्राप्ति की मनोकामना करती हैं।

    मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित मां यशोदा की प्रतिमा है, जिनकी गोद में बाल स्वरूप में भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं। इसी स्वरूप के कारण यह मंदिर श्रद्धालुओं के बीच अलग धार्मिक महत्व रखता है। मंदिर में मां और बेटे के पवित्र संबंध को केंद्र में रखते हुए पूजा और धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं।

    जन्माष्टमी के दिन मंदिर में संतान की इच्छा रखने वाली महिलाओं की विशेष उपस्थिति रहती है। महिलाएं मां यशोदा की गोद भराई की रस्म करती हैं और भगवान श्रीकृष्ण से अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करती हैं। इस दौरान पूजा सामग्री के साथ पारंपरिक तरीके से गोद भराई की रस्म पूरी की जाती है।

    मंदिर से जुड़ी मान्यता के कारण जन्माष्टमी पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इनमें इंदौर और मध्यप्रदेश के अलग अलग हिस्सों से आने वाली महिलाओं के साथ देश के दूसरे राज्यों से आने वाले श्रद्धालु भी शामिल होते हैं। मंदिर की यह परंपरा अब देश के बाहर रहने वाले श्रद्धालुओं के बीच भी आस्था का विषय बनी हुई है।

    कई महिलाएं संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर मंदिर पहुंचती हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद दोबारा मां यशोदा और बाल कृष्ण के दर्शन करने आती हैं। श्रद्धालुओं के लिए गोद भराई की रस्म धार्मिक विश्वास और पारिवारिक सुख की कामना से जुड़ा अवसर होती है।

    मंदिर के पुजारियों के अनुसार मां यशोदा के मंदिर में जन्माष्टमी के दौरान गोद भराई की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसी मान्यता के चलते हर वर्ष इस अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। महिलाएं मां यशोदा की पूजा कर अपनी इच्छाओं और परिवार से जुड़ी प्रार्थनाएं रखती हैं।

    मंदिर का धार्मिक महत्व केवल संतान प्राप्ति की मान्यता तक सीमित नहीं है। मां यशोदा की गोद में बाल कृष्ण की प्रतिमा भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप और यशोदा के वात्सल्य की याद दिलाती है। यही कारण है कि जन्माष्टमी के अवसर पर यहां पूजा का माहौल विशेष रूप से भावनात्मक और श्रद्धापूर्ण दिखाई देता है।

    राजवाड़ा क्षेत्र में स्थित यह पुराना मंदिर इंदौर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है। लंबे समय से चली आ रही परंपराओं ने इसे स्थानीय आस्था के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित किया है। जन्माष्टमी पर यहां होने वाली गोद भराई की रस्म इसकी विशिष्ट पहचान मानी जाती है।

    देश के अलग अलग हिस्सों और विदेशों से आने वाली महिलाओं के लिए यह धार्मिक यात्रा अपनी संतान की कामना और आस्था से जुड़ा अनुभव होती है। मंदिर में पहुंचकर वे मां यशोदा और बाल कृष्ण के सामने प्रार्थना करती हैं तथा परिवार में खुशियों की कामना करती हैं।

    करीब 230 वर्ष पुराने इस मंदिर में जन्माष्टमी के अवसर पर दिखाई देने वाली श्रद्धा इंदौर की धार्मिक परंपराओं की विविधता को भी सामने लाती है। मां यशोदा की गोद में विराजमान बाल कृष्ण का स्वरूप और गोद भराई की परंपरा इस मंदिर को शहर के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है।

  • बांग्लादेश में इस बार जन्माष्टमी पर नहीं दिखेगी पहले जैसी रौनक…. सरकार ने रद्द किया अवकाश

    बांग्लादेश में इस बार जन्माष्टमी पर नहीं दिखेगी पहले जैसी रौनक…. सरकार ने रद्द किया अवकाश


    ढाका।
    जैसे-जैसे जन्माष्टमी (Janmashtami) के साथ अन्य हिंदू त्योहारों (Hindu Festivals Holidays) की समय नजदीक आ रहा है, बांग्लादेश (Bangladesh) में सरकार के प्रति हिंदुओं में रोष बढ़ता ही जा रहा है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि बांग्लादेश सरकार (Bangladesh Government) ने जन्माष्टमी को मिलने वाला सरकारी अवकाश रद्द कर दिया है। ढाकेश्वरी मंदिर, चट्टग्राम, सिलहट समेत कई मंदिरों में जन्माष्टमी मनाई जानी है, लेकिन इस बार यहां जन्माष्टमी को आधिकारिक छुट्टी नहीं रहेगी।

    खबरों के मुताबिक, इस वर्ष 2 जनवरी को ही बांग्लादेश में सरस्वती पूजा, जन्माष्टमी, दुर्गाष्टमी और बुद्ध पूर्णिमा की सरकारी छुट्टियां रद्द कर दी गईं। हिंदू जागृति समिति व इसकी अगुवाई में हिंदुओं ने इसका भारी विरोध किया है। हसीना के अपदस्थ होने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं की हिंसा के चलते ढाका, सिलहट, खुलना, कुमिला, जेसोर और मीरपुर में बड़े-बड़े जुलूस नहीं निकाले जा रहे हैं इस बार भी यहां उत्साह फीका रहेगा। देश के अखबार प्रोथोम आलो के मुताबिक, इस बार मंदिरों में जन्माष्टमी समारोह तो होंगे लेकिन दस दिन पूर्व से बाजारों में जो उत्साह देखा जाता था वह इस बार नहीं है। बांग्लादेश में एक समय रहा है जब हिंदू पर्वों के लिए मंदिरों में उत्साह होता था और बड़े बड़े उत्सव तथा जुलूस निकाले जाते थे, लेकिन अब देश में पूर्व पीएम शेख हसीना के कार्यकाल जैसी उमंग नहीं दिख रही।


    सरकार का दावा, मंदिरों में विशेष सुरक्षा प्रबंध

    बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने सियासी उथल-पुथल के समय अल्पसंख्यक सुरक्षा के बाद कहा है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन की तरफ से मंदिरों के लिए विशेष सुरक्षा बल तैनात किए जाएंगे। हालांकि बांग्लादेश हिंदू जागरण मंच के प्रवक्ता निहार हलदर ने कहा, अभी समुदाय में डर है। कुछ मंदिरों में जनमाष्टमी पर शोभायात्राएं निकाली जाएंगी लेकिन ज्यादातर जगहों पर पहले जैसी रंगत नहीं रहेगी।

  • भगवान कृष्ण को ही क्‍यों लगाते हैं 56 भोग? इसके पीछे हैं 3 पौराणिक मान्यताएं

    भगवान कृष्ण को ही क्‍यों लगाते हैं 56 भोग? इसके पीछे हैं 3 पौराणिक मान्यताएं


    नई दिल्ली। जन्माष्टमी हो या दिवाली के बाद मनाया जाने वाला अन्नकूट पर्व, भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। खास बात यह है कि छप्पन भोग में सिर्फ मिठाइयां ही शामिल नहीं होतीं, बल्कि मीठे-नमकीन व्यंजन, फल, पेय और कई तरह के पारंपरिक पकवान भी शामिल किए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर भगवान कृष्ण को 56 तरह के भोग ही क्यों लगाए जाते हैं? इस संख्या के पीछे तीन प्रमुख पौराणिक मान्यताएं बताई जाती हैं।

    पहली मान्यता : 7 दिन और 8 प्रहर से बना 56 का आंकड़ा

    पौराणिक कथा के अनुसार, माता यशोदा बाल स्वरूप भगवान कृष्ण को दिन में 8 प्रहर में 8 बार भोजन कराती थीं। जब भगवान कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया, तब वे लगातार 7 दिन तक अन्न-जल ग्रहण नहीं कर सके।

    कथा के अनुसार, आठवें दिन जब बारिश थमी और भगवान ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा, तब ब्रजवासियों और माता यशोदा ने सात दिनों के दौरान भगवान के लिए तय किए गए आठों प्रहर के भोजन को एक साथ परोसा। यानी 7 दिन × 8 प्रहर = 56। तभी से कृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा शुरू होने की मान्यता है।

    दूसरी मान्यता : दिव्य कमल की 56 पंखुड़ियां

    एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, गोलोक में भगवान कृष्ण राधा जी के साथ जिस दिव्य कमल पर विराजमान रहते हैं, उसमें 56 पंखुड़ियां होती हैं। इस कमल की तीन परतें बताई गई हैं।

    पहली परत में 8, दूसरी में 16 और तीसरी परत में 32 पंखुड़ियां मानी जाती हैं। तीनों को जोड़ने पर संख्या 8+16+32=56 होती है। इसी वजह से भी भगवान कृष्ण को 56 भोग अर्पित करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    तीसरी मान्यता : गोपिकाओं ने अर्पित किए थे 56 भोग

    श्रीमद्भागवत कथा से जुड़ी एक अन्य मान्यता में बताया जाता है कि भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने की इच्छा से गोपिकाओं ने एक महीने तक प्रतिदिन भोर में यमुना में स्नान किया और कात्यायिनी माता की पूजा-अर्चना करते हुए व्रत रखा।

    जब भगवान कृष्ण ने उनकी मनोकामना पूरी करने की सहमति दी, तब गोपिकाओं ने प्रसन्न होकर भगवान को 56 प्रकार के भोग बनाकर अर्पित किए। इस मान्यता को भी छप्पन भोग की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

    छप्पन भोग में क्या-क्या होता है?

    छप्पन भोग में अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों के अनुसार व्यंजनों की सूची बदल सकती है। इसमें मिठाइयों के साथ नमकीन पकवान, फल, पेय और विभिन्न प्रकार के पारंपरिक भोजन शामिल किए जाते हैं। भक्त इन्हें श्रद्धा और प्रेम के साथ भगवान कृष्ण को अर्पित करते हैं।

    यानी 56 भोग सिर्फ व्यंजनों की संख्या नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने की धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इन मान्यताओं की अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग व्याख्या मिल सकती है। हम इनकी तथ्यात्मक पुष्टि नहीं करते हैं।

  • लड्डू गोपाल को क्या हर दिन चाहिए माखन मिश्री जानें कौन सा भोग है प्रिय और क्या कहते हैं शास्त्रीय नियम

    लड्डू गोपाल को क्या हर दिन चाहिए माखन मिश्री जानें कौन सा भोग है प्रिय और क्या कहते हैं शास्त्रीय नियम


    नई दिल्ली । भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की सेवा सनातन परंपरा में अत्यंत शुभ और मंगलकारी मानी जाती है। मान्यता है कि जिस घर में श्रद्धा और प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा की जाती है वहां सुख समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री सबसे प्रिय भोगों में माना जाता है इसलिए अधिकांश भक्त प्रतिदिन उन्हें माखन मिश्री अर्पित करते हैं। हालांकि कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि यदि किसी दिन माखन मिश्री उपलब्ध न हो या उसका भोग न लगाया जाए तो क्या लड्डू गोपाल नाराज हो जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रेम और सच्ची भावना के भूखे हैं न कि केवल किसी विशेष भोग के। यदि किसी कारणवश प्रतिदिन माखन मिश्री अर्पित करना संभव न हो तो इससे भगवान नाराज नहीं होते। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भी भोग अर्पित किया जाए वह पूरी श्रद्धा पवित्रता और प्रेम के साथ समर्पित किया जाए। भगवान के लिए भाव सबसे बड़ा होता है।

    यदि माखन मिश्री उपलब्ध न हो तो लड्डू गोपाल को मिश्री दूध दही ताजे मौसमी फल धनिया पंजीरी मखाने की खीर रबड़ी मालपुआ या घर में बना सात्विक भोजन भी भोग के रूप में अर्पित किया जा सकता है। केले आम खरबूजा जैसे मौसमी फल और केसर युक्त गुनगुना दूध भी भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय माने जाते हैं।

    भोग अर्पित करते समय कुछ धार्मिक नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। भगवान को जो भी प्रसाद अर्पित करें उसमें तुलसी दल या तुलसी का पत्ता अवश्य रखें क्योंकि बिना तुलसी के श्रीकृष्ण का भोग पूर्ण नहीं माना जाता। जिस प्रकार घर के छोटे बच्चे को समय पर भोजन कराया जाता है उसी भावना से लड्डू गोपाल को भी सुबह दोपहर शाम और रात्रि का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    भोग बनाते समय रसोई की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भोजन पूरी तरह सात्विक होना चाहिए और उसमें लहसुन प्याज या तामसिक पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। भोग अर्पित करने के बाद उसे कुछ समय तक भगवान के सामने रखा रहने दें और साथ में स्वच्छ जल का पात्र भी अवश्य रखें। इसके बाद प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों में श्रद्धापूर्वक बांट देना चाहिए।

    धार्मिक दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण भक्तों के निष्कपट प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होते हैं। इसलिए यदि किसी दिन माखन मिश्री उपलब्ध न हो तो चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। सच्चे मन से अर्पित किया गया सात्विक भोग और भक्तिभाव ही भगवान को सबसे अधिक प्रिय माना गया है।