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  • वंदे मातरम पर कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद का बयान, बोले दो छंद ही गाऊंगा जेल या फांसी मंजूर

    वंदे मातरम पर कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद का बयान, बोले दो छंद ही गाऊंगा जेल या फांसी मंजूर

    नई दिल्ली ।वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह वंदे मातरम के केवल दो छंद ही गाएंगे। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उन्हें जेल भेज दिया जाए या फांसी दे दी जाए, लेकिन वह पूरा वंदे मातरम नहीं गाएंगे। उनके इस बयान के बाद राष्ट्रगीत को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

    हरिप्रसाद का बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के गायन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में ध्वजारोहण के दौरान राष्ट्रगीत के गायन को लेकर भी विवाद सामने आया था। इस दौरान गीत के पूरे गायन और कार्यक्रम में उसके प्रस्तुतीकरण को लेकर अलग अलग दावे किए गए।

    इसके बाद गोवा में आयोजित कांग्रेस की बैठक में भी वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद गाए जाने का मामला सामने आया। इस कार्यक्रम में पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद थे। दो छंदों तक सीमित गायन को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठे और पार्टी के रुख को लेकर राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई।

    इसी बीच बीके हरिप्रसाद के बयान ने इस विवाद को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। उन्होंने अपने रुख को दोहराते हुए कहा कि वह वंदे मातरम के दो छंद ही गाएंगे। उनके बयान में जेल और फांसी का उल्लेख किए जाने से राजनीतिक प्रतिक्रिया और तीखी होने की संभावना बढ़ गई है।

    वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके सम्मान और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके गायन को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा होती रही है। राष्ट्रगीत के कुछ हिस्सों को लेकर ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों पर भी अलग अलग राजनीतिक विचार सामने आते रहे हैं।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि उन्होंने वही वंदे मातरम गाया है जिसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं से भी जोड़ा जाता है। खरगे ने यह सवाल भी उठाया कि यदि वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस के नेताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो ऐतिहासिक रूप से इससे जुड़े अन्य नेताओं के रुख पर भी चर्चा होनी चाहिए।

    खरगे ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने देश के राष्ट्रीय गीतों से संबंधित विषयों पर अपने ऐतिहासिक निर्णय पहले ही लिए थे। उनका तर्क है कि किसी एक राजनीतिक दल या सरकार के कहने मात्र से राष्ट्रीय मानक निर्धारित नहीं किए जा सकते।

    वहीं केंद्र सरकार की ओर से वंदे मातरम के सम्मान को लेकर हाल में कड़े प्रावधान किए जाने की चर्चा है। जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान करने या उसके गायन में बाधा डालने से जुड़े मामलों में कार्रवाई की व्यवस्था को लेकर भी राजनीतिक बहस चल रही है।

    स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले के कार्यक्रम में पूरे वंदे मातरम के गायन को भी इस विवाद के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में बीके हरिप्रसाद का बयान केवल व्यक्तिगत रुख तक सीमित नहीं रहने वाला है और इसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

    अब इस मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर आगे क्या रुख अपनाया जाता है और अन्य राजनीतिक दल किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं, इस पर नजर रहेगी। वंदे मातरम को लेकर सामने आया ताजा विवाद राष्ट्रगीत, ऐतिहासिक परंपरा और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच चल रही बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।

  • कर्नाटक में तीन तमिलों की कथित मुठभेड़ पर विवाद गहराया, विपक्ष ने निष्पक्ष जांच और बढ़े मुआवजे की मांग की

    कर्नाटक में तीन तमिलों की कथित मुठभेड़ पर विवाद गहराया, विपक्ष ने निष्पक्ष जांच और बढ़े मुआवजे की मांग की


    नई दिल्ली ।कर्नाटक के चामराजनगर और मैसूर क्षेत्र में वन विभाग के कर्मियों के साथ कथित मुठभेड़ में तीन तमिल लोगों की मौत के बाद विवाद लगातार गहराता जा रहा है। घटना को लेकर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों और नेताओं ने सवाल उठाए हैं। मृतकों के परिवारों के लिए घोषित मुआवजे को बढ़ाने के साथ ही मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की जा रही है।

    बताया गया है कि वन क्षेत्र में तीन लोगों और वन विभाग के कर्मचारियों के बीच कथित मुठभेड़ हुई थी। इसमें तीनों लोगों की मौत हो गई। शुरुआती तौर पर उन्हें शिकारी होने के संदेह से जोड़ा गया। हालांकि घटना के बाद सामने आए आरोपों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने पूरे मामले की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    घटना के बाद चामराजनगर के हनूर क्षेत्र में मृतकों के परिवारों और स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी जताई और घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की। मामले को लेकर तमिलनाडु में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हुई।

    तमिलनाडु के कई नेताओं ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कर्नाटक सरकार से विस्तृत जांच कराने की मांग की है। कुछ नेताओं ने कथित मुठभेड़ को फर्जी मुठभेड़ करार देते हुए मृतकों के परिवारों को पर्याप्त आर्थिक सहायता देने की मांग की। साथ ही दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है।

    तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए हत्या का मामला दर्ज करने और पारदर्शी तथा निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग की। उन्होंने मृतकों के परिवारों को उचित मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग भी रखी।

    पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के पलानीस्वामी ने भी मामले को लेकर कर्नाटक सरकार पर सवाल उठाए और केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि मृतकों के परिजनों के लिए घोषित पांच लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त नहीं है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए।

    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने भी घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने वन विभाग की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को अस्वीकार्य बताते हुए मामले में गंभीर जांच की जरूरत बताई। उनके अनुसार, घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आनी चाहिए और मृतकों के परिवारों को न्याय मिलना चाहिए।

    दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। विरोध बढ़ने के बाद मजिस्ट्रेट जांच का निर्णय भी लिया गया है। जांच का उद्देश्य घटना के दौरान वास्तव में क्या हुआ, मुठभेड़ की परिस्थितियां क्या थीं और इसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका क्या रही, जैसे सवालों का जवाब तलाशना है।

    मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर उठ रही मांग है। एक तरफ वन विभाग की ओर से घटना को मुठभेड़ की परिस्थितियों से जोड़ा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मृतकों के परिवार और राजनीतिक दल इसे गंभीर संदेह के साथ देख रहे हैं।

    अब निगाह मजिस्ट्रेट जांच के निष्कर्षों पर है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि तीनों लोगों की मौत किन परिस्थितियों में हुई और क्या कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी। फिलहाल मुआवजा बढ़ाने, जिम्मेदारी तय करने और स्वतंत्र जांच की मांग के कारण यह मामला कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • कर्नाटक सरकार ने तंबाकू सेवन पर लगाम कसने के लिए गुटखा और प्रतिबंधित निकोटिन उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर लगाई पाबंदी

    कर्नाटक सरकार ने तंबाकू सेवन पर लगाम कसने के लिए गुटखा और प्रतिबंधित निकोटिन उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर लगाई पाबंदी


    नई दिल्ली ।कर्नाटक सरकार ने राज्य में गुटखा, पान मसाला और तंबाकू या निकोटिन युक्त प्रतिबंधित उत्पादों के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए एक साल के लिए रोक लगा दी है। सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने इस संबंध में 10 अगस्त 2026 को अधिसूचना जारी की। अधिसूचना जारी होने के साथ ही पूरे राज्य में यह प्रतिबंध प्रभावी हो गया है और अगले एक साल तक लागू रहेगा।

    नए आदेश के तहत तंबाकू और या निकोटिन वाले गुटखा, पान मसाला तथा अन्य प्रतिबंधित उत्पादों के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर रोक रहेगी। इसका मतलब है कि ऐसे उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार ने इस फैसले को सार्वजनिक स्वास्थ्य से जोड़ते हुए राज्य में तंबाकू की लत को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।

    कर्नाटक सरकार ने प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए विशेष निरीक्षण और प्रवर्तन अभियान भी शुरू किया है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के नेतृत्व में गठित टीमें अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिबंधित तंबाकू और निकोटिन उत्पादों की उपलब्धता तथा बिक्री पर नजर रखेंगी। दुकानों और अन्य स्थानों पर जांच के दौरान यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

    सरकार की अधिसूचना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(a) और खाद्य सुरक्षा और मानक नियमों के तहत निर्धारित प्रावधानों के आधार पर जारी की गई है। संबंधित विभाग को खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को देखते हुए ऐसे उत्पादों की बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्राप्त है।

    राज्य सरकार के इस फैसले का एक प्रमुख उद्देश्य तंबाकू और निकोटिन की लत को नियंत्रित करना है। गुटखा और तंबाकू उत्पादों का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। सरकार का मानना है कि इन उत्पादों की उपलब्धता सीमित करने से इनके इस्तेमाल को रोकने और लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।

    प्रतिबंध के साथ ही प्रशासन ने आम लोगों से भी सहयोग की अपील की है। विभाग ने कहा है कि यदि किसी स्थान पर प्रतिबंधित तंबाकू या निकोटिन उत्पादों के निर्माण, भंडारण, बिक्री या वितरण की जानकारी मिलती है तो इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जानी चाहिए। इससे प्रवर्तन अभियान को प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    कर्नाटक में लागू यह पाबंदी ऐसे समय में आई है जब सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्तर पर तंबाकू सेवन को नियंत्रित करना सरकारों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। अब खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की निगरानी और जांच अभियान यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि प्रतिबंधित उत्पाद बाजार में दोबारा उपलब्ध न हों।

    सरकार ने इस फैसले को स्वस्थ और नशा-मुक्त कर्नाटक की दिशा में उठाया गया कदम बताया है। आने वाले महीनों में प्रतिबंध के पालन को लेकर बाजारों, दुकानों और आपूर्ति से जुड़े स्थानों पर निरीक्षण जारी रहने की संभावना है। एक साल की अवधि में प्रशासन की कार्रवाई और आम लोगों की भागीदारी इस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण होगी।

  • कर्नाटक कैबिनेट विस्तार के बाद बढ़ी कांग्रेस की अंदरूनी नाराजगी, डीके शिवकुमार ने खड़गे और वेणुगोपाल से की मुलाकात

    कर्नाटक कैबिनेट विस्तार के बाद बढ़ी कांग्रेस की अंदरूनी नाराजगी, डीके शिवकुमार ने खड़गे और वेणुगोपाल से की मुलाकात


    नई दिल्ली । कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति सामने आने लगी है। मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने से कुछ कांग्रेस विधायक नाराज बताए जा रहे हैं। इसी बीच मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने सोमवार को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर मंत्रियों के विभागों के बंटवारे और संभावित छोटे बदलावों को लेकर चर्चा की।

    डीके शिवकुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच दो घंटे से अधिक समय तक बातचीत होने की जानकारी सामने आई है। इससे पहले शिवकुमार ने कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से भी चर्चा की। इन बैठकों को कर्नाटक मंत्रिमंडल में हालिया विस्तार के बाद बने राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    कर्नाटक सरकार में इस महीने की शुरुआत में बड़ा कैबिनेट विस्तार किया गया था। इस विस्तार में 19 नए मंत्रियों को शामिल किया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की कुल संख्या 33 हो गई। हालांकि, नए मंत्रियों को अभी तक विभागों का आवंटन नहीं किया गया है। विभागों के बंटवारे में हो रही देरी के बीच पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं।

    मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाने वाले कुछ विधायक अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने इन नेताओं को साथ बनाए रखने की चुनौती है। वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और कुछ मंत्रियों ने ऐसे विधायकों से बातचीत भी की है। इसका उद्देश्य नाराजगी को कम करना और संगठन के भीतर समन्वय बनाए रखना बताया जा रहा है।

    विभागों के बंटवारे को लेकर मुख्यमंत्री की शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई बातचीत को इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। चर्चा है कि नाराज विधायकों को संतुष्ट करने के लिए कुछ मंत्रियों के विभागों में बदलाव किया जा सकता है। इसके अलावा एक या दो मौजूदा मंत्रियों को हटाने की संभावना पर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है, हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

    डीके शिवकुमार ने कैबिनेट में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल में एक महिला को शामिल किया जाना चाहिए और इस दिशा में काम किया जाएगा। साथ ही उन्होंने जल्दबाजी से बचने की बात कही। इससे माना जा रहा है कि कैबिनेट में संभावित बदलाव केवल विभागों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं रह सकते हैं।

    कर्नाटक विधानसभा का मानसून सत्र 13 अगस्त से शुरू होना है। कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश है कि विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले मंत्रियों के विभागों का बंटवारा और आवश्यक बदलाव पूरे कर लिए जाएं। इससे सरकार को सदन में एकजुटता के साथ काम करने में मदद मिल सकती है और मंत्रियों को भी अपनी जिम्मेदारियों के साथ काम शुरू करने का अवसर मिलेगा।

    उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने भी विभागों के बंटवारे को लेकर कहा है कि इसमें कोई बड़ी परेशानी नहीं है। उनके अनुसार, जल्द ही सभी मंत्रियों को जिम्मेदारियां सौंप दी जाएंगी। इससे संकेत मिलता है कि सरकार विभागों के आवंटन को लेकर अंतिम चरण की प्रक्रिया में है।

    कर्नाटक कांग्रेस के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक तरफ नए मंत्रियों को विभाग देकर सरकार के कामकाज को व्यवस्थित करना है, वहीं दूसरी तरफ मंत्रिमंडल से बाहर रह गए विधायकों की नाराजगी को संभालना है। ऐसे में खड़गे और वेणुगोपाल के साथ डीके शिवकुमार की बैठकों को पार्टी के भीतर समन्वय बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    हालांकि, संभावित फेरबदल को लेकर अभी अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। विभागों के बंटवारे और मंत्रियों में बदलाव से जुड़ी तस्वीर विधानसभा के मानसून सत्र से पहले स्पष्ट होने की उम्मीद है। फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व विधायकों की नाराजगी दूर करने और सरकार के भीतर संतुलन बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

  • 12 अगस्त के सूर्य ग्रहण से इन 3 राशियों पर मंडराया संकट, जानिए किसे रहना होगा सबसे ज्यादा सावधान

    12 अगस्त के सूर्य ग्रहण से इन 3 राशियों पर मंडराया संकट, जानिए किसे रहना होगा सबसे ज्यादा सावधान

    नई दिल्ली । वर्ष 2026 का अंतिम सूर्य ग्रहण आगामी 12 अगस्त को घटित होने जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इस खगोलीय घटना को अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना गया है। गणना के अनुसार, यह सूर्य ग्रहण कर्क राशि और अश्लेषा नक्षत्र में लगेगा। इस ग्रहण के प्रभाव से राशि चक्र की तीन प्रमुख राशियों सिंह, धनु और कुंभ के त्रिक भाव सक्रिय हो रहे हैं, जिसके कारण इन राशियों के जातकों को स्वास्थ्य, करियर और आर्थिक मामलों में अत्यधिक सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

    ज्योतिष शास्त्र में छठे, आठवें और बारहवें भाव को त्रिक भाव कहा जाता है, जिन्हें सामान्यतः संघर्ष, व्यय और बाधाओं का कारक माना जाता है। ग्रहण के प्रभाव से सिंह राशि के जातकों के 12वें भाव पर असर पड़ेगा, जो अनियंत्रित खर्चों और आर्थिक नुकसान का संकेत देता है। इस अवधि में सिंह राशि के लोगों का बजट प्रभावित हो सकता है और पारिवारिक स्तर पर वैचारिक मतभेद उभर सकते हैं। विशेष रूप से विदेश से जुड़ा व्यापार करने वालों और सेहत के प्रति लापरवाह रहने वालों को सावधान रहने की जरूरत है।

    धनु राशि के जातकों के लिए यह सूर्य ग्रहण आठवें भाव में घटित हो रहा है, जो अचानक आने वाली रुकावटों और संकटों से संबंधित माना जाता है। इस दौरान बने-बनाए कार्यों में अड़चनें आ सकती हैं। ज्योतिषीय परामर्श के अनुसार, धनु राशि वाले इस समय किसी भी प्रकार के बड़े वित्तीय निवेश या जोखिम भरे फैसलों से बचें। यात्रा के दौरान सामान की सुरक्षा और वाहन चलाते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक रहेगा।

    कुंभ राशि के जातकों के लिए ग्रहण का प्रभाव छठे भाव में देखने को मिलेगा, जिसे रोग और प्रतिस्पर्धियों का भाव माना जाता है। इस दौरान कार्यस्थल पर गुप्त शत्रुओं की सक्रियता बढ़ सकती है, जो कार्यों में रुकावट डालने का प्रयास कर सकते हैं। व्यापार से जुड़े फैसलों में जल्दबाजी न करने और सहकर्मियों के साथ संयम बनाए रखने की सलाह दी गई है। इसके अलावा पेट और रक्त से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति भी सचेत रहना होगा।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस खगोलीय घटना के प्रभाव से बचने के लिए संबंधित राशि के जातकों को ईश्वर आराधना और नियमित मंत्र जाप करने का परामर्श दिया गया है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस ग्रहण को लेकर धार्मिक और आध्यात्मिक तैयारियां भी की जा रही हैं।

  • समुद्र किनारे स्थित इस पौराणिक शिवधाम का रावण से क्या है गहरा संबंध, जानिए 123 फीट ऊंची प्रतिमा का रहस्य

    समुद्र किनारे स्थित इस पौराणिक शिवधाम का रावण से क्या है गहरा संबंध, जानिए 123 फीट ऊंची प्रतिमा का रहस्य

    नई दिल्ली ।कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के अंतर्गत आने वाले भटकल तालुका में स्थित मुरुदेश्वर मंदिर देश के सबसे प्रमुख और भव्य धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। अरब सागर के तट पर कंदुका पहाड़ी पर स्थित यह पावन धाम अपनी अटूट धार्मिक आस्था, अद्वितीय वास्तुकला और मनोरम प्राकृतिक सुंदरता के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता है। तीन तरफ से नीले समुद्र से घिरे होने के कारण इस मंदिर परिसर की छटा अत्यंत आकर्षक और अद्भुत दिखाई देती है।

    मुरुदेश्वर मंदिर का पौराणिक इतिहास लंकापति रावण और भगवान शिव के परम पवित्र आत्मलिंग की कथा से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंकाधिपति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के उद्देश्य से अत्यंत कठोर तपस्या की थी। रावण की इस कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे अपना आत्मलिंग प्रदान किया था, लेकिन इसके साथ एक विशेष शर्त भी रखी गई थी कि इसे रास्ते में कहीं भी भूमि पर नहीं रखा जाना चाहिए।

    पौराणिक प्रसंगों के मुताबिक, जब रावण उस दिव्य आत्मलिंग को लेकर अपनी राजधानी लंका की ओर बढ़ रहा था, तब देवताओं ने विशेष परिस्थितियां निर्मित कर दीं। इन्हीं परिस्थितियों के प्रभाव में आकर रावण ने अनजाने में आत्मलिंग को एक स्थान पर जमीन पर रख दिया। इसके बाद लाख कोशिशों के बावजूद वह उस शिवलिंग को दोबारा भूमि से नहीं उठा सका। माना जाता है कि इसी प्रक्रिया में आत्मलिंग के कुछ अंश जिन-जिन पवित्र स्थानों पर गिरे, उनमें मुरुदेश्वर की भूमि भी शामिल थी।

    इस ऐतिहासिक और धार्मिक परिसर की सबसे बड़ी और मुख्य विशेषता यहां स्थापित भगवान शिव की अत्यंत विशाल प्रतिमा है। खुले आकाश के नीचे निर्मित यह प्रतिमा ध्यान मुद्रा में बैठी हुई अवस्था में स्थापित की गई है, जिसकी कुल ऊंचाई 123 फीट बताई जाती है। अरब सागर के किनारे स्थित होने के कारण यह भव्य प्रतिमा काफी दूर से ही श्रद्धालुओं को स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। सूर्य की किरणों के बीच समुद्र की उठती लहरों के साथ इस प्रतिमा का दृश्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

    धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह मंदिर अपनी स्थापत्य कला और वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। मंदिर परिसर में बना विशाल एवं बहुमंजिला गोपुरम, जिसे ‘राजा गोपुरा’ कहा जाता है, यहां की प्रमुख संरचनात्मक पहचान है। श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए इस विशाल गोपुरम की ऊपरी मंजिलों तक जाने की व्यवस्था की गई है, जहां से पूरे मंदिर परिसर, विशाल शिव प्रतिमा और दूर तक फैले अरब सागर का विहंगम दृश्य साफ देखा जा सकता है।

    मंदिर की पारंपरिक नक्काशी और भव्य बनावट में दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला की गहरी छाप नजर आती है। समुद्र, पहाड़ी और मंदिर का यह विहंगम संयोजन यहां आने वाले हर व्यक्ति को एक नया और आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले तीर्थयात्री भी इस पवित्र स्थल के दर्शन कर आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

    आज के समय में मुरुदेश्वर एक बहुत बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है। साल भर यहां देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद लेने आते हैं। महाशिवरात्रि जैसे पावन और बड़े धार्मिक पर्वों पर तो यहां श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ता है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां का शांत समुद्री तट और प्राकृतिक नजारे भी पर्यटकों को निरंतर अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

    संक्षेप में कहा जाए तो मुरुदेश्वर धाम पौराणिक कथाओं, प्राचीन मान्यताओं, दक्षिण भारतीय वास्तुकला और समुद्री सौंदर्य का एक दुर्लभ एवं अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। 123 फीट ऊंची विशालकाय शिव प्रतिमा इस पावन स्थल को एक विशिष्ट पहचान देती है, वहीं रावण और आत्मलिंग से जुड़ी पौराणिक गाथा इसके धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व को और अधिक मजबूत बनाती है।

  • कर्नाटक विधान परिषद अध्यक्ष बसवराज होरत्ती ने दिया इस्तीफा, बोले- कांग्रेस ने क्यों हटाया इसकी जानकारी नहीं

    कर्नाटक विधान परिषद अध्यक्ष बसवराज होरत्ती ने दिया इस्तीफा, बोले- कांग्रेस ने क्यों हटाया इसकी जानकारी नहीं


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। कर्नाटक विधान परिषद के अध्यक्ष बसवराज होरत्ती ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। होरत्ती ने कहा कि उन्होंने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि उनसे पद छोड़ने के लिए कहा गया था। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कांग्रेस सरकार ने उनसे इस्तीफा क्यों मांगा। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    बसवराज होरत्ती ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उन्हें नहीं पता कि कांग्रेस सरकार ने उनसे इस्तीफा देने के लिए क्यों कहा। उन्होंने बताया कि उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। होरत्ती ने कहा कि वह सम्मानपूर्वक अपने पद से हटना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बिना किसी विवाद के इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि पूरे घटनाक्रम से उन्हें काफी दुख पहुंचा है।

    इससे पहले होरत्ती ने संकेत दिया था कि अगर उन्होंने पद छोड़ने से इनकार किया तो डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। उन्होंने कहा था कि सत्ताधारी दल चाहता है कि वह पद से हट जाएं। मुख्यमंत्री की ओर से उन्हें इस संबंध में जानकारी दी गई थी। होरत्ती के मुताबिक मुख्यमंत्री ने उनसे फोन पर दो बार बातचीत की और व्यक्तिगत मुलाकात के दौरान बताया कि पार्टी आलाकमान ने उनसे इस्तीफा मांगने का निर्देश दिया है।

    होरत्ती ने कहा कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने उन्हें बताया कि उन्हें हटाने का फैसला पार्टी हाईकमान का है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और अन्य नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं और वे उनका सम्मान करते हैं। लेकिन जब यह राय बन गई कि उन्हें अब इस पद पर नहीं रहना चाहिए तो उन्होंने पद पर बने रहना उचित नहीं समझा।

    बसवराज होरत्ती ने कहा कि वह सदन में इस मुद्दे को उठाने के बाद इस्तीफा देना चाहते थे, लेकिन उन्होंने सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी पद को लेकर सहमति नहीं रहती तो जिम्मेदारी के साथ फैसला लेना जरूरी होता है।

    वहीं, इस घटनाक्रम के पीछे कांग्रेस संगठन की नई रणनीति को भी देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक में विधान परिषद के चेयरमैन पद के लिए सलीम अहमद और डिप्टी चेयरमैन पद के लिए उमाश्री के नाम को मंजूरी दी है। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए जीएस पाटिल और डिप्टी स्पीकर पद के लिए एएस पोन्नाना के नामों पर भी सहमति दी गई है।

    बसवराज होरत्ती लंबे समय से कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और विधान परिषद में उनका लंबा अनुभव रहा है। उनके इस्तीफे के बाद अब परिषद के नए अध्यक्ष को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से इस बदलाव को लेकर अभी विस्तृत कारण सामने नहीं रखा गया है। दूसरी ओर, होरत्ती के बयान ने इस पूरे मामले को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति में इस बदलाव का असर देखने को मिल सकता है।

  • पेपर लीक पर भाजपा का विपक्ष पर पलटवार, कर्नाटक-झारखंड का मुद्दा उठाकर राहुल गांधी से पूछा बड़ा सवाल

    पेपर लीक पर भाजपा का विपक्ष पर पलटवार, कर्नाटक-झारखंड का मुद्दा उठाकर राहुल गांधी से पूछा बड़ा सवाल

    नई दिल्ली । पेपर लीक के मुद्दे पर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने मंगलवार को प्रेस वार्ता कर कांग्रेस और विपक्षी दलों पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। भाजपा सांसद और पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष केवल चुनिंदा राज्यों के मामलों को राजनीतिक मुद्दा बनाता है, जबकि कर्नाटक और झारखंड में सामने आए कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के मामलों पर चुप्पी साधे हुए है। उन्होंने कहा कि छात्रों के हितों को लेकर विपक्ष का रुख समान नहीं है।

    संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि झारखंड में बड़ी संख्या में छात्र लंबे समय से कथित परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की ओर से उनके समर्थन में कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर भी विपक्ष इन मामलों को प्रमुखता से नहीं उठा रहा है। भाजपा का दावा है कि विपक्ष केवल उन्हीं मुद्दों को आगे बढ़ाता है जिनसे उसे राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना दिखाई देती है।

    भाजपा ने संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र के संचालन को लेकर भी विपक्ष पर निशाना साधा। संबित पात्रा ने कहा कि संसद का प्रत्येक सत्र जनता के धन से चलता है और इस पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन लगातार हंगामे के कारण प्रश्नकाल और कई महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के रवैये की वजह से महत्वपूर्ण विषयों पर सदन में अपेक्षित चर्चा नहीं हो पा रही है।

    प्रेस वार्ता के दौरान भाजपा ने कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खरगे के एक बयान का भी उल्लेख किया। पार्टी ने दावा किया कि पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के संबंध में मंत्री की टिप्पणी असंवेदनशील थी। भाजपा ने इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी प्रतिक्रिया देने की मांग करते हुए कहा कि उन्हें इस विषय पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। वहीं कांग्रेस की ओर से इस मामले में अलग-अलग अवसरों पर अपने विचार व्यक्त किए जाते रहे हैं।

    इधर झारखंड में राज्य लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी छात्र निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इसी मामले में झारखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष से जांच एजेंसियों द्वारा कई दौर की पूछताछ भी की जा चुकी है। उन्होंने इससे पहले अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जांच एजेंसियां पूरे मामले की पड़ताल कर रही हैं।

    पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बना हुआ है। विभिन्न राज्यों में सामने आए मामलों को लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। वहीं अभ्यर्थियों की मांग है कि सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए परीक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राज्यों की राजनीति में भी प्रमुख बना रह सकता है।

  • मनीपाल हेल्थ आईपीओ में लिस्टिंग गेन सीमित, मजबूत कारोबार के दम पर दीर्घकालिक निवेश की सलाह

    मनीपाल हेल्थ आईपीओ में लिस्टिंग गेन सीमित, मजबूत कारोबार के दम पर दीर्घकालिक निवेश की सलाह

    नई दिल्ली । देश के हेल्थकेयर सेक्टर की प्रमुख अस्पताल श्रृंखलाओं में शामिल मनीपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज का ₹9,275.22 करोड़ का आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) निवेशकों के लिए खुल चुका है। कंपनी इस सार्वजनिक निर्गम के माध्यम से अपने विस्तार की योजनाओं को गति देने के साथ-साथ कर्ज का बोझ कम करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। पहले दिन मिले शुरुआती निवेशकों के रुझान के बाद बाजार में यह चर्चा तेज है कि इस आईपीओ में निवेश करना कितना लाभदायक हो सकता है और किन निवेशकों के लिए यह अवसर उपयुक्त माना जा रहा है।

    मनीपाल हेल्थ देश की सबसे बड़ी निजी अस्पताल श्रृंखलाओं में गिनी जाती है। कंपनी के नेटवर्क में 13,000 से अधिक बेड उपलब्ध हैं और पिछले कुछ वर्षों में इसने नए अस्पताल स्थापित करने के साथ-साथ अस्पतालों के अधिग्रहण के जरिए अपने कारोबार का लगातार विस्तार किया है। मजबूत ब्रांड पहचान, व्यापक उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में लंबे अनुभव ने कंपनी को उद्योग की प्रमुख संस्थाओं में शामिल किया है।

    कंपनी की एक बड़ी विशेषता इसके प्रमोटर समूह और संस्थागत निवेशकों की मजबूत भागीदारी मानी जा रही है। वैश्विक स्तर के प्रतिष्ठित निवेशकों की मौजूदगी से कंपनी की विश्वसनीयता को मजबूती मिली है। साथ ही, बीते वर्षों में कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन में भी सुधार देखने को मिला है, जिससे इसके भविष्य की विकास संभावनाओं को लेकर निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।

    आईपीओ के मूल्यांकन को भी उद्योग के अन्य सूचीबद्ध अस्पताल समूहों की तुलना में प्रतिस्पर्धी माना जा रहा है। कंपनी ने प्रति शेयर ₹560 से ₹590 का प्राइस बैंड तय किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मूल्यांकन बाजार की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए संतुलित दिखाई देता है। सार्वजनिक निर्गम से प्राप्त राशि का बड़ा हिस्सा कंपनी अपने मौजूदा कर्ज को कम करने में लगाएगी, जिससे भविष्य में ब्याज व्यय में उल्लेखनीय कमी आने की संभावना है। इससे कंपनी की लाभप्रदता और नकदी प्रवाह दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    हालांकि निवेशकों के सामने कुछ जोखिम भी मौजूद हैं। कंपनी की आय का लगभग 46 प्रतिशत हिस्सा केवल कर्नाटक से आता है, जिससे किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर अधिक निर्भरता का जोखिम बना रहता है। यदि उस क्षेत्र में कारोबार प्रभावित होता है तो कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है। हालांकि कंपनी अन्य राज्यों में नए अस्पताल शुरू करने और अपनी मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में लगातार काम कर रही है, जिससे भविष्य में यह निर्भरता कम होने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस आईपीओ से पहले दिन भारी प्रीमियम पर लिस्टिंग की संभावना सीमित हो सकती है। इसलिए केवल अल्पकालिक मुनाफे या लिस्टिंग गेन की उम्मीद रखने वाले निवेशकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता। इसके विपरीत, जिन निवेशकों का निवेश दृष्टिकोण तीन वर्ष या उससे अधिक का है, उनके लिए यह आईपीओ बेहतर विकल्प माना जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग, कंपनी का मजबूत प्रबंधन और विस्तार की योजनाएं इसे लंबी अवधि में संभावनाओं वाला निवेश बना सकती हैं।

    मनीपाल हेल्थ का आईपीओ 29 जुलाई से 31 जुलाई 2026 तक निवेशकों के लिए खुला है। कंपनी इस निर्गम के जरिए कुल ₹9,275.22 करोड़ जुटाने की योजना पर काम कर रही है। इसमें नए शेयर जारी करने के साथ ऑफर फॉर सेल भी शामिल है। रिटेल निवेशकों के लिए न्यूनतम 25 शेयरों का एक लॉट निर्धारित किया गया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्गम उन निवेशकों के लिए अधिक उपयुक्त हो सकता है जो गुणवत्तापूर्ण कंपनियों में लंबी अवधि के निवेश के माध्यम से स्थिर रिटर्न की तलाश कर रहे हैं।

  • 3 दशक बाद कावेरी जल विवाद पर चर्चा की तैयारी…..तमिलनाडु-कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के बीच जल्द होगी बैठक

    3 दशक बाद कावेरी जल विवाद पर चर्चा की तैयारी…..तमिलनाडु-कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के बीच जल्द होगी बैठक


    चेन्नई।
    तमिलनाडु (Tamil Nadu) के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय (Chief Minister C. Joseph Vijay) और कर्नाटक (Karnataka) के मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार (Chief Minister D.K. Shivakumar) के बीच जल्द ही एक बैठक हो सकती है। कावेरी जल विवाद (Kaveri Water Dispute) को लेकर बुलाई गई यह बैठक काफी चर्चा में है। दरअसल मुख्यमंत्री थलपति विजय का यह कदम तमिलनाडु के तीन दशक पुराने रुख से बिल्कुल अलग है। इससे पहले तमिलनाडु हमेशा से बातचीत के बजाय अदालती फैसलों और ट्रिब्यूनल पर भरोसा करता आया है और राज्य के मुख्यमंत्री सीधी बातचीत से दूर ही रहे हैं। लेकिन अब विजय लीक से हटकर राह पकड़ रहे हैं। तमिलनाडु का मानना रहा है कि कावेरी विवाद दो मुख्यमंत्रियों की मेज पर बैठकर नहीं सुलझ सकता। हालांकि सीएम विजय सीधे संवाद का रास्ता अपना रहे हैं।

    विजय ने पानी के संकट को हल करने के लिए शिवकुमार के साथ 31 जुलाई से 3 अगस्त के बीच सीधी बातचीत का प्रस्ताव रखा है। अगर यह मुलाकात होती है, तो पिछले 14 सालों में यह पहला मौका होगा जब दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री कावेरी मुद्दे पर आमने-सामने बैठकर द्विपक्षीय बातचीत करेंगे।


    लीक से हटकर चल रहे विजय

    इससे पहले पिछले 30 से अधिक सालों से चेन्नई का मानना रहा है कि यह विवाद इतिहास, फसलों और चुनावी भावनाओं जैसे जटिल मुद्दों से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसे किसी बैठक में सुलझाने के बजाय कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), ट्रिब्यूनल के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के जरिए ही लागू किया जाना चाहिए। वहीं विजय कानूनी अधिकारों को छेड़े बिना, दोनों राज्यों के बीच संवाद का रास्ता खोलना चाहते हैं ताकि संकट की स्थिति में पानी की आपूर्ति जारी रहे।


    क्यों पड़ी बातचीत की जरूरत?

    तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा के किसानों के सामने इस समय संकट बेहद गंभीर है। ट्रिब्यूनल के आदेश के तहत 1 जून से 23 जुलाई के बीच तमिलनाडु को लगभग 32 हजार मिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना चाहिए था। लेकिन उसे केवल 3.5 TMC पानी ही मिला है। तमिलनाडु का मानना है कि कमजोर मॉनसून के बावजूद, कर्नाटक को कम से कम 3 TMC अतिरिक्त पानी तुरंत छोड़ना चाहिए था। पानी की कमी के कारण कावेरी डेल्टा में खड़ी फसलें सूखने की कगार पर हैं।


    क्यों उठ रहे सवाल?

    विजय की इस सीधी बातचीत की पहल पर विपक्षी दलों और किसान संगठनों ने कुछ चिंताएं जताई हैं। आलोचकों को डर है कि सीधी बातचीत से कर्नाटक को ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ को दरकिनार करने का मौका मिल सकता है। यह शक भी है कि कर्नाटक पानी छोड़ने के बदले तमिलनाडु पर मेकेदातु में प्रस्तावित डैम के निर्माण पर विरोध वापस लेने का दबाव बना सकता है। इस मामले पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के कन्नन का कहना है कि मुख्यमंत्रियों की बातचीत आपसी सहयोग का माहौल बना सकती है, लेकिन यह ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए अधिकारों की जगह नहीं ले सकती।


    क्या है राजनीतिक समीकरण?

    राजनीतिक रूप से विजय के पास एक फायदा यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, जो तमिलनाडु में विजय की सरकार की सहयोगी भूमिका में है। राहुल गांधी विजय के शपथ ग्रहण में शामिल हुए थे और डीके शिवकुमार से भी उनके मधुर संबंध हैं। ऐसे में विजय के लिए राह आसान हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जल विवादों में पार्टी लाइनें अक्सर बेअसर हो जाती हैं, क्योंकि दोनों राज्यों के नेताओं को अपने-अपने किसानों और स्थानीय जनता को जवाब देना होता है। अगर विजय बेंगलुरु में वार्ता से अपने राज्य के लिए तुरंत कावेरी का पानी लाने में सफल रहते हैं और मेकेदातु पर तमिलनाडु के रुख से समझौता नहीं करते, तो यह उनकी बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जाएगी। वहीं, अगर यह बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म होती है, तो आलोचक इसे राजनीतिक अपरिपक्वता करार देंगे।