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  • जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला कैबिनेट का विस्तार, चार नए मंत्री शामिल, सतीश शर्मा की मंत्रिमंडल से छुट्टी

    जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला कैबिनेट का विस्तार, चार नए मंत्री शामिल, सतीश शर्मा की मंत्रिमंडल से छुट्टी

    नई दिल्ली ।जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार ने मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को मंत्रिमंडल का विस्तार किया। श्रीनगर स्थित लोक भवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में चार नए मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू शामिल हैं। इस फेरबदल में सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया है।

    मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मुख्यमंत्री समेत मंत्रिपरिषद में सदस्यों की संख्या नौ हो गई है। जम्मू-कश्मीर की 90 सदस्यीय विधानसभा के आधार पर मंत्रिमंडल में अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं। इस तरह उमर अब्दुल्ला सरकार ने मंत्रिपरिषद की निर्धारित संख्या पूरी कर ली है। अब नए मंत्रियों को विभागों की जिम्मेदारी सौंपे जाने और मौजूदा विभागों में बदलाव को लेकर नजर रहेगी।

    इस विस्तार में राजनीतिक अनुभव, महिला प्रतिनिधित्व और विभिन्न क्षेत्रों को मंत्रिमंडल में जगह देने पर जोर दिखाई देता है। अली मोहम्मद सागर और मीर सैफुल्लाह पहले भी मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं, जबकि शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू को पहली बार मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। शमीमा फिरदौस के शामिल होने से सरकार में महिला प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा।

    अली मोहम्मद सागर नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वह श्रीनगर जिले की खानयार विधानसभा सीट से सात बार विधायक चुने जा चुके हैं। पार्टी संगठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वह महासचिव की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। इससे पहले वह उमर अब्दुल्ला सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं। उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें फिर से मंत्रिमंडल में जगह दी गई है।

    मीर सैफुल्लाह उत्तरी कश्मीर के अनुभवी नेताओं में शामिल हैं। वह चार बार विधायक चुने गए हैं। उनके पिछले तीन कार्यकाल कुपवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से जुड़े रहे, जबकि 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने त्रेहगाम सीट से जीत हासिल की। पेशे से वकील रहे सैफुल्लाह पहले भी मंत्री पद संभाल चुके हैं। उनके मंत्रिमंडल में लौटने से उत्तरी कश्मीर का प्रतिनिधित्व सरकार में मजबूत होगा।

    शमीमा फिरदौस नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्रमुख महिला नेताओं में शामिल हैं। वह श्रीनगर की हब्बाकदल विधानसभा सीट से तीन बार विधायक चुनी गई हैं। पहली बार मंत्री बनने के साथ ही वह सकीना इट्टू के बाद मंत्रिमंडल में दूसरी महिला मंत्री होंगी। उनके शामिल होने से सरकार में महिला नेतृत्व की भागीदारी बढ़ेगी।

    अल्ताफ अहमद कल्लू, जिन्हें अल्ताफ कल्लू के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण कश्मीर के पहलगाम विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह दूसरी बार विधायक बने हैं और विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी काम कर चुके हैं। विधानसभा और विधान परिषद का अनुभव रखने वाले कल्लू को पहली बार मंत्रिमंडल में जिम्मेदारी मिली है।

    इस बीच, कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल होने तक सरकार में शामिल नहीं होने का अपना रुख बरकरार रखा है। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाली सरकार के भीतर ही हुआ है। अब विभागों के बंटवारे से यह स्पष्ट होगा कि नए मंत्रियों को कौन-कौन सी जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं और मौजूदा मंत्रियों के विभागों में कितना बदलाव होता है।

  • जम्मू-कश्मीर में हजारों किताबों पर कार्रवाई से सियासी बहस तेज, उमर और मीरवाइज ने उठाए सवाल

    जम्मू-कश्मीर में हजारों किताबों पर कार्रवाई से सियासी बहस तेज, उमर और मीरवाइज ने उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।जम्मू-कश्मीर के कॉलेजों और पुस्तकालयों में मौजूद किताबों की व्यापक स्क्रीनिंग और हजारों पुस्तकों को हटाए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सरकार के अनुसार 21,81,582 किताबों और प्रकाशनों की जांच की गई, जिनमें से 4,767 किताबों को प्रचलन से हटाया गया है। इनमें 518 ऐसी किताबें शामिल हैं, जिन पर पहले से प्रतिबंध लागू था। इसके अलावा 1,752 किताबों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेजा गया है।

    इस कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने का मुद्दा लोकतंत्र में व्यापक बहस का विषय है। उनके अनुसार मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार के पास ऐसे फैसले खुद लेने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि परिस्थितियां बदलने पर इस पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।

    मामले पर मीरवाइज उमर फारूक ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने हजारों किताबों को हटाए जाने की कार्रवाई को चिंताजनक बताते हुए संबंधित किताबों के नाम और उन्हें हटाने के कारण सार्वजनिक करने की मांग की। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अकादमिक स्वतंत्रता तथा अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोणों तक छात्रों की पहुंच शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में किताबों को हटाने के पीछे आखिर किस तरह की नीति और उद्देश्य काम कर रहा है।

    सरकार की ओर से कार्रवाई को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया गया है। मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने कहा कि किताबों की जांच करना और उनकी सामग्री का तथ्यात्मक परीक्षण करना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। उनका कहना है कि यदि कोई किताब आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित है या उसमें आपत्तिजनक सामग्री पाई गई है, तो उसे सरकारी संस्थानों और पुस्तकालयों में नहीं रखा जाना चाहिए।

    भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने भी कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में इतिहास तथ्यों के आधार पर पढ़ाया जाना चाहिए। उनके अनुसार काल्पनिक किस्सों, अफवाहों या किंवदंतियों को इतिहास के रूप में शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

    भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता जोरवार सिंह जमवाल ने भी हटाई गई किताबों की सामग्री पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐतिहासिक विषयों पर आधारित पुस्तकों में तथ्यात्मकता और विश्वसनीयता जरूरी है। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों में ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए जो युवाओं को भ्रमित करने वाली हो।

    किताबों की स्क्रीनिंग से जुड़े आंकड़े विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सामने आए। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू क्षेत्र में 9,32,941 और कश्मीर क्षेत्र में 12,48,641 किताबों तथा प्रकाशनों की जांच की गई। कार्रवाई के तहत कश्मीर क्षेत्र से 4,474 और जम्मू क्षेत्र से 293 किताबें हटाई गईं। वहीं 1,752 किताबों को विशेषज्ञ परीक्षण के लिए भेजा गया है, जिनमें जम्मू क्षेत्र की 538 और कश्मीर क्षेत्र की 1,214 किताबें शामिल हैं।

    सरकार के मुताबिक यह स्क्रीनिंग जुलाई में दो किताबों की खरीद को लेकर उठे विवाद के बाद शुरू हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने कॉलेजों और संबंधित पुस्तकालयों में उपलब्ध पुरानी और नई किताबों की सामग्री की जांच के निर्देश दिए। सरकार ने कहा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक मूल्यों, अकादमिक स्वतंत्रता, आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने वाला वातावरण बनाए रखना जरूरी है। मामले में राजनीतिक दलों और विभिन्न पक्षों के अलग-अलग रुख के बीच अब किताबों की जांच और उन्हें हटाने के कारणों को लेकर बहस जारी है।

  • कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने अमित शाह को लिखी चिट्ठी, कहा- 15 साल में बसाया घर, फिर बेघर मत होने दो

    कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने अमित शाह को लिखी चिट्ठी, कहा- 15 साल में बसाया घर, फिर बेघर मत होने दो

    नई दिल्ली। कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज (PM पैकेज) के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। लगातार मिल रही धमकियों के बीच कर्मचारियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर तत्काल सुरक्षा कदम उठाने की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि वे करीब 15 साल से घाटी में अपने जीवन को दोबारा बसाने की कोशिश कर रहे हैं और अब उन्हें फिर से विस्थापन की ओर धकेले जाने का डर सताने लगा है।

    ऑल PM पैकेज एम्प्लॉईज फोरम के अध्यक्ष सनी रैना ने चिट्ठी के माध्यम से कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों और उनके परिवारों की चिंताओं को सामने रखा है। उनका कहना है कि भले ही ऊपर से हालात सामान्य दिखाई देते हों, लेकिन जमीन पर डर और तनाव का माहौल बना हुआ है। कई परिवार अपनी सुरक्षा के साथ-साथ बच्चों के भविष्य को लेकर भी चिंतित हैं।

    कर्मचारियों ने कहा है कि हाल के दिनों में सामने आई हर धमकी उन्हें 1990 के दशक की घटनाओं की याद दिलाती है। उस दौर में धमकी भरे पत्र और नोटिस डर का माहौल बनाने के शुरुआती संकेत बने थे। इसके बाद बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। अब दोबारा धमकी भरे पत्र सामने आने से कर्मचारियों के बीच पुराने भय की स्थिति बन रही है।

    पिछले कुछ हफ्तों के दौरान PM पैकेज के तहत घाटी में तैनात कर्मचारियों को लगातार धमकियां मिलने की बात सामने आई है। कई पत्रों में उन्हें सरकारी नौकरी छोड़ने की चेतावनी दी गई है और ऐसा नहीं करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। इन मामलों में यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC) नाम के संगठन का उल्लेख सामने आया है।

    कर्मचारियों की चिंता उस समय और बढ़ गई, जब उनका निजी डेटा ऑनलाइन लीक होने की बात सामने आई। सोशल मीडिया पर कुछ कर्मचारियों के फोन नंबर, घर के पते और वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर तक साझा किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे घाटी में रह रहे कर्मचारियों और उनके परिवारों में सुरक्षा को लेकर डर बढ़ गया है।

    कर्मचारियों का कहना है कि बड़ी संख्या में लोग अभी भी किराए के कमरों में रहने को मजबूर हैं। वहीं, जहां ट्रांजिट कॉलोनियां बनाई गई हैं, वहां भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में कर्मचारियों ने आवासीय क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और उसे मजबूत करने की मांग की है।

    अमित शाह को लिखी चिट्ठी में धमकियों की गंभीरता से जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। कर्मचारियों ने PM पैकेज के तहत काम कर रहे लोगों, उनके परिवारों और आवासीय कॉलोनियों की सुरक्षा बढ़ाने की अपील की है। साथ ही ऐसा प्रभावी सिस्टम बनाने की मांग की गई है, जिसके जरिए किसी कर्मचारी को धमकी मिलने पर वह तुरंत शिकायत दर्ज करा सके और समय पर सुरक्षा सहायता मिल सके।

    कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि वे कश्मीर घाटी छोड़ना नहीं चाहते। उनका कहना है कि पिछले 15 वर्षों में उन्होंने उस जीवन को फिर से खड़ा करने की कोशिश की है, जो कई दशक पहले उजड़ गया था। वर्ष 2022 में राहुल भट की हत्या के बाद भी घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। अब नई धमकियों ने एक बार फिर उनकी सुरक्षा की चिंता बढ़ा दी है। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें नौकरी और सुरक्षा में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न किया जाए। वे कश्मीर में रहकर काम करना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए सुरक्षित माहौल चाहते हैं।

  • धमकियों के बीच कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने अमित शाह को लिखी चिट्ठी, सुरक्षा बढ़ाने और जांच की मांग उठाई

    धमकियों के बीच कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने अमित शाह को लिखी चिट्ठी, सुरक्षा बढ़ाने और जांच की मांग उठाई

    नई दिल्ली ।कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने बढ़ती धमकियों के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर सुरक्षा को लेकर तत्काल कदम उठाने की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि वे करीब 15 वर्षों से घाटी में अपना जीवन दोबारा बसाने की कोशिश कर रहे हैं और मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें फिर से विस्थापन की ओर धकेले जाने का डर सताने लगा है।

    ऑल PM पैकेज एम्प्लॉईज फोरम के अध्यक्ष सनी रैना ने पत्र के जरिए कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों और उनके परिवारों की चिंताओं को सामने रखा है। उनका कहना है कि भले ही बाहर से हालात सामान्य दिखाई दें, लेकिन घाटी में रहने वाले परिवारों के बीच डर और तनाव बना हुआ है। कर्मचारियों को अपनी सुरक्षा के साथ बच्चों के भविष्य की भी चिंता है।

    कर्मचारियों ने कहा है कि हाल में सामने आ रही हर धमकी उन्हें 1990 के दशक की घटनाओं की याद दिलाती है। उनके मुताबिक उस दौर में भी धमकी भरे पत्र और नोटिस डर का माहौल बनाने के शुरुआती संकेत बने थे। इसके बाद बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। अब नए धमकी भरे पत्रों के सामने आने से पुराना भय दोबारा गहराने लगा है।

    पिछले कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत तैनात कर्मचारियों को लगातार धमकियां मिलने की बात सामने आई है। कई पत्रों में सरकारी नौकरी छोड़ने का अल्टीमेटम दिए जाने और ऐसा नहीं करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी का उल्लेख है। इन धमकियों के पीछे यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल यानी ULC नाम के संगठन का नाम सामने आ रहा है।

    कर्मचारियों की चिंता केवल धमकी भरे पत्रों तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि निजी जानकारी ऑनलाइन लीक होने से भी असुरक्षा बढ़ी है। सोशल मीडिया पर कुछ कर्मचारियों के फोन नंबर, घर के पते और वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर तक प्रसारित किए जाने की बात कही गई है। इससे घाटी में रहने वाले परिवारों की चिंता और बढ़ गई है।

    कर्मचारियों ने अपनी आवासीय स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। बड़ी संख्या में कर्मचारी अभी किराए के कमरों में रह रहे हैं। वहीं, जिन स्थानों पर ट्रांजिट कॉलोनियां बनाई गई हैं, वहां सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में वे खुद को खतरे के बीच महसूस कर रहे हैं।

    गृह मंत्री को भेजे गए पत्र में धमकियों की गंभीरता से जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। कर्मचारियों ने PM पैकेज के तहत काम कर रहे लोगों, उनके परिवारों और आवासीय कॉलोनियों की सुरक्षा बढ़ाने की अपील की है। साथ ही सभी आवासों की सुरक्षा समीक्षा कराने की मांग रखी गई है।

    कर्मचारियों ने यह भी कहा है कि धमकी मिलने की स्थिति में शिकायत दर्ज कराने और समय पर सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। उनका स्पष्ट कहना है कि वे कश्मीर घाटी छोड़ना नहीं चाहते। पिछले 15 वर्षों में उन्होंने उस जीवन को फिर से खड़ा करने की कोशिश की है, जो कई दशक पहले उजड़ गया था।

    2022 में राहुल भट की हत्या के बाद भी घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे थे। अब नई धमकियों के बाद उनकी चिंता फिर सामने आई है। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें नौकरी और सुरक्षा में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न किया जाए। वे घाटी में रहकर काम करना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए सुरक्षित माहौल की मांग कर रहे हैं।

  • भारत-अफगानिस्तान क्रिकेट सीरीज से पहले नक्शे को लेकर विवाद, वीडियो में गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके भारत का हिस्सा दिखाया गया

    भारत-अफगानिस्तान क्रिकेट सीरीज से पहले नक्शे को लेकर विवाद, वीडियो में गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके भारत का हिस्सा दिखाया गया


    नई दिल्ली ।
    भारत और अफगानिस्तान के बीच आगामी क्रिकेट सीरीज से पहले जारी एक प्रमोशनल वीडियो को लेकर पाकिस्तान में नाराजगी सामने आई है। अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड के इस वीडियो में भारत का नक्शा दिखाया गया, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत का हिस्सा दर्शाया गया है। वीडियो सामने आने के बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इस पर आपत्ति जताई है।

    अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने रविवार को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर यह प्रमोशनल वीडियो साझा किया था। इसमें भारत और अफगानिस्तान के बीच होने वाली आगामी सीरीज को लेकर उत्साह दिखाने की कोशिश की गई। हालांकि वीडियो में इस्तेमाल किए गए नक्शे को लेकर पाकिस्तान में विवाद खड़ा हो गया।

    पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पिछले कुछ समय से संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार झड़प और गोलीबारी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान पर यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि उसकी जमीन का इस्तेमाल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के हमलों के लिए किया जाता है। अफगानिस्तान इन आरोपों को लेकर अलग रुख रखता है।

    ऐसे माहौल में अफगान क्रिकेट बोर्ड के वीडियो में भारत का नक्शा दिखाया जाना पाकिस्तान के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन गया है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इस वीडियो पर आपत्ति जताई है। हालांकि इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने को लेकर पाकिस्तान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

    भारत और अफगानिस्तान के संबंधों की बात करें तो दोनों देशों के बीच क्रिकेट के साथ आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में भी संपर्क बना हुआ है। भारत और तालिबान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंधों की स्थिति अलग होने के बावजूद दोनों देशों के बीच संपर्क और सहयोग के रास्ते खुले हुए हैं। भारत अफगानिस्तान में आर्थिक विकास से जुड़े प्रयासों में भी सहयोग करता रहा है।

    जानकारों के अनुसार, अफगानिस्तान के इस कदम को उसकी स्वतंत्र विदेश नीति के संकेत के तौर पर भी देखा जा सकता है। भारत के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश के बीच अफगानिस्तान पाकिस्तान की आपत्तियों से अलग अपनी प्राथमिकताएं दिखाना चाहता है।

    अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने वीडियो के साथ जारी संदेश में भारत और अफगानिस्तान की आगामी सीरीज को दोनों देशों के बीच संबंधों से जोड़ते हुए उत्साह व्यक्त किया। बोर्ड के अनुसार, यह सीरीज दोनों देशों को करीब लाने वाली है और दोनों देशों के साझा इतिहास तथा संस्कृति से भी जुड़ी है।

    भारत और अफगानिस्तान के बीच तीन मैचों की यह सीरीज 13, 15 और 17 सितंबर को दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में खेली जानी है। सीरीज को लेकर दोनों देशों के क्रिकेट प्रशंसकों में भी उत्सुकता है।

    इसी बीच भारत और अफगानिस्तान के बीच आर्थिक सहयोग को लेकर भी बातचीत आगे बढ़ी है। दोनों पक्षों ने व्यापार और आर्थिक सहयोग से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में संस्थागत सहयोग मजबूत करने पर सहमति जताई है। इसमें सीमा शुल्क और डेटा साझा करने से जुड़े सहयोग को बढ़ाना, फार्मास्यूटिकल्स और कृषि क्षेत्र में नियामक सहयोग, व्यापार संपर्क बेहतर करना तथा निवेश और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देना शामिल है।

    इस पूरे घटनाक्रम में क्रिकेट सीरीज के प्रचार के लिए जारी एक वीडियो ने भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच पहले से संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। फिलहाल विवाद का केंद्र वीडियो में दिखाया गया नक्शा और उस पर पाकिस्तान की आपत्ति है।

  • संयुक्त राष्ट्र के नए मानचित्र प्रस्ताव पर भारत का स्पष्ट रुख, कहा संप्रभु क्षेत्र को गलत दिखाना किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं

    संयुक्त राष्ट्र के नए मानचित्र प्रस्ताव पर भारत का स्पष्ट रुख, कहा संप्रभु क्षेत्र को गलत दिखाना किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के नक्शे को अधिक वास्तविक क्षेत्रफल के साथ प्रस्तुत करने वाले Equal Earth Projection को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव पर भारत ने अपना रुख स्पष्ट किया है। भारत ने प्रस्ताव के मूल उद्देश्य का समर्थन करते हुए कहा है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व वास्तविक क्षेत्रफल के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही भारत ने यह भी साफ किया कि उसके संप्रभु क्षेत्र को किसी भी गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना स्वीकार्य नहीं है।

    संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को पेश किए गए प्रस्ताव के पक्ष में भारत समेत 164 देशों ने मतदान किया। छह देश मतदान से दूर रहे, जबकि अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्र प्रक्षेपण को बढ़ावा देना है, जिसमें विभिन्न महाद्वीपों और क्षेत्रों के क्षेत्रफल को पारंपरिक नक्शों की तुलना में वास्तविक अनुपात के अधिक करीब दिखाया जा सके।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को लेकर स्पष्ट किया कि इसका संबंध किसी विशेष राजनीतिक मानचित्र को स्वीकार करने से नहीं है। भारत के अनुसार, समान-क्षेत्र वाले मानचित्र प्रक्षेपण का मूल उद्देश्य दुनिया के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से अफ्रीका जैसे बड़े भूभागों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुरूप बेहतर प्रतिनिधित्व देना है।

    भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया है, लेकिन इसके साथ अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। भारत ने जोर दिया कि प्रस्ताव किसी विशेष मानचित्र, मानचित्र प्रक्षेपण या किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के चित्रण को प्रमाणित नहीं करता। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से भौगोलिक क्षेत्रफल के प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाना है।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि देश के आधिकारिक मानचित्र और संप्रभु क्षेत्र से जुड़े विषयों पर भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है। भारत के अनुसार, जम्मू-कश्मीर और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख समेत उसका संपूर्ण संप्रभु क्षेत्र आधिकारिक भारतीय मानचित्र के अनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

    भारत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच, प्रकाशन या मानचित्र में उसके क्षेत्र को गलत तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए। भारत का कहना है कि गलत या भ्रामक नक्शे उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े गंभीर विषय हैं। ऐसे चित्रण को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    इस पूरे मामले में मानचित्रों के राजनीतिक और भौगोलिक इस्तेमाल के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। Equal Earth Projection जैसे मानचित्र प्रक्षेपण मुख्य रूप से पृथ्वी के अलग-अलग क्षेत्रों के आकार को तुलनात्मक रूप से सही ढंग से दिखाने पर केंद्रित होते हैं। इसके विपरीत राजनीतिक मानचित्र देशों की सीमाओं, विवादित क्षेत्रों और स्थानों के नामों को प्रदर्शित करते हैं।

    भारत ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव किसी राजनीतिक सीमा या विवादित क्षेत्र की स्थिति तय नहीं करता। इसलिए प्रस्ताव के समर्थन को भारत की सीमाओं से संबंधित किसी अलग राजनीतिक स्थिति के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    प्रस्ताव के पारित होने के बाद दुनिया के नक्शे में बदलाव को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बदल गई हैं। यह पहल मुख्य रूप से मानचित्र प्रक्षेपण और भौगोलिक क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व से संबंधित है।

    भारत का संदेश इस मामले में दो हिस्सों में स्पष्ट है। एक ओर उसने वास्तविक क्षेत्रफल को बेहतर तरीके से दर्शाने वाले मानचित्र प्रक्षेपण के सिद्धांत का समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े आधिकारिक मानचित्रण पर किसी भी तरह की गलत प्रस्तुति को अस्वीकार किया है। इसी रुख के साथ भारत ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए अपनी सीमा संबंधी स्थिति दोहराई है।

  • आतंकी धमकी से कश्मीरी पंडित कर्मचारियों में चिंता, पत्र में कई लोगों की निजी जानकारी का किया गया जिक्र

    आतंकी धमकी से कश्मीरी पंडित कर्मचारियों में चिंता, पत्र में कई लोगों की निजी जानकारी का किया गया जिक्र

    नई दिल्ली ।जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को कथित आतंकी संगठन की ओर से धमकी भरे पत्र मिलने का मामला सामने आया है। इन पत्रों में कई कश्मीरी पंडितों के नाम और उनके पते का उल्लेख किए जाने से सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पत्रों के स्रोत और इसके पीछे शामिल लोगों की जांच शुरू कर दी है।

    बताया गया है कि धमकी भरे पत्र में कश्मीरी पंडित समुदाय के कुछ लोगों को निशाना बनाने की चेतावनी दी गई है। पत्र में लोगों के नाम के साथ उनके घर और गली से जुड़ी जानकारी भी दर्ज होने की बात सामने आई है। इस तरह की निजी जानकारी का इस्तेमाल किए जाने से प्रभावित लोगों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन के सामने चुनौती बढ़ गई है।

    जानकारी के अनुसार, पत्र में कश्मीर से बाहर चले गए कश्मीरी पंडितों को लेकर आपत्तिजनक आरोप लगाए गए हैं। पत्र में यह भी दावा किया गया है कि संबंधित लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। हालांकि, प्रशासन इस बात की जांच कर रहा है कि पत्र वास्तव में किस संगठन या व्यक्ति की ओर से भेजे गए हैं और इनमें किए गए दावों की वास्तविकता क्या है।

    मामले में यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल नाम के संगठन का उल्लेख सामने आया है, जिसे लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा एक मोर्चा बताया जा रहा है। हालांकि, पत्र की वास्तविकता, इसे जारी करने वाले व्यक्ति या संगठन और इसके पीछे की मंशा की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। सुरक्षा एजेंसियां सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर मामले की पड़ताल कर रही हैं।

    यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे पहले भी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकी भरे पत्र मिलने की जानकारी सामने आई थी। पिछले मामले में कुछ सरकारी कर्मचारियों के नाम और संपर्क संबंधी जानकारी पत्र में शामिल होने की बात कही गई थी। इसके बाद संबंधित विभागों ने कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ाई थी।

    हालिया घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब घाटी में अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों की सुरक्षा पहले से संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। कुछ समय पहले कुलगाम में दो प्रवासी मजदूरों पर हमला कर उनकी हत्या किए जाने की घटना ने भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए थे।

    जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी हाल में घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही आतंकी धमकियों को गंभीरता से लेने की बात कही थी। उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों से ऐसे मामलों को नजरअंदाज नहीं करने की अपील की थी। मुख्यमंत्री ने पूर्व में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं का भी उल्लेख किया था।

    प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी प्राथमिकता धमकी की विश्वसनीयता का आकलन करने के साथ प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सुरक्षा एजेंसियां पत्रों की जांच, उनके प्रसार के स्रोत और संभावित जिम्मेदार लोगों की पहचान करने में जुटी हैं। अधिकारियों का कहना है कि मामले से जुड़े तथ्यों की पुष्टि जांच के आधार पर की जाएगी।

    कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए इस घटनाक्रम ने सुरक्षा और विश्वास से जुड़े पुराने सवालों को फिर सामने ला दिया है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और समय रहते आवश्यक कदम उठाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है, ताकि धमकी के कारण लोगों में भय का माहौल न बने और किसी संभावित घटना को रोका जा सके।

  • सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा

    सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा


    नई दिल्ली । 
    भारत में अमेरिका के राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर के जम्मू कश्मीर और लद्दाख दौरे के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर की समस्याओं का समाधान वॉशिंगटन से नहीं आएगा, बल्कि इनका समाधान भारत को ही करना है। उमर अब्दुल्ला का यह बयान सर्जियो गोर के श्रीनगर पहुंचने से पहले आया है।

    सर्जियो गोर दो दिवसीय दौरे पर जम्मू कश्मीर और लद्दाख पहुंचे हैं। उनके कार्यक्रम में श्रीनगर में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के साथ अलग अलग संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत भी शामिल है। अमेरिकी राजदूत के लंबे अंतराल के बाद जम्मू कश्मीर दौरे को क्षेत्रीय और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वह सर्जियो गोर की बात सुनना अधिक पसंद करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अमेरिकी राजदूत के सामने जम्मू कश्मीर के आंतरिक मामलों को शिकायत के रूप में नहीं उठाएंगे। मुख्यमंत्री के मुताबिक किसी दूसरे देश के राजदूत के सामने अपने ही देश की शिकायत करना उनकी आदत नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर के हालात और क्षेत्र से जुड़े विषयों पर सर्जियो गोर से बातचीत जरूर होगी। हालांकि, वह इन मुद्दों का समाधान किसी दूसरे देश से हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे। उमर अब्दुल्ला का यह रुख जम्मू कश्मीर के आंतरिक विषयों पर विदेशी हस्तक्षेप की मांग से दूरी बनाए रखने वाला माना जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान देश के भीतर ही तलाशना होगा। उनके बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि के साथ बातचीत से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई, बल्कि बातचीत का दायरा क्षेत्र की स्थिति और संबंधित विषयों तक रखने की बात कही है।

    इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे को लेकर अलग मुद्दा उठाया है। उन्होंने कश्मीर यात्रा के संबंध में जारी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर उसे वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि कश्मीर में बड़ी संख्या में परिवार पर्यटन पर निर्भर हैं और ऐसी सलाह क्षेत्र को बाहरी दुनिया से जोड़ने में बाधा पैदा करती है।

    महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि ट्रैवल एडवाइजरी को हटाना कश्मीर के लोगों के लिए विश्वास बढ़ाने वाला कदम हो सकता है। पर्यटन जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।

    सर्जियो गोर के दौरे के दौरान क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर स्थानीय प्रतिनिधियों से बातचीत होने की संभावना है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला का बयान इस बात को रेखांकित करता है कि जम्मू कश्मीर से जुड़े आंतरिक मामलों पर स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व समाधान के लिए देश के संस्थानों और सरकारों को प्राथमिक पक्ष मानता है।

    कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी राजदूत का जम्मू कश्मीर दौरा स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ बातचीत को शिकायत या बाहरी हस्तक्षेप की मांग का माध्यम नहीं बनाएंगे।

    सर्जियो गोर की यात्रा के दौरान होने वाली बैठकों से क्षेत्र की स्थिति, स्थानीय अपेक्षाओं और भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा का अवसर मिलेगा। फिलहाल उमर अब्दुल्ला का संदेश स्पष्ट है कि जम्मू कश्मीर की आंतरिक समस्याओं पर संवाद हो सकता है, लेकिन उनके समाधान की जिम्मेदारी भारत की ही है।

  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद LoC पर बढ़ी सतर्कता, लश्कर जैश और हिज्बुल की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद LoC पर बढ़ी सतर्कता, लश्कर जैश और हिज्बुल की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

    नई दिल्ली । भारत-पाकिस्तान सीमा पर सुरक्षा को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। खुफिया इनपुट के हवाले से सामने आई जानकारी में दावा किया गया है कि नियंत्रण रेखा के पार 500 से अधिक आतंकियों के भारत में घुसपैठ के मौके का इंतजार करने की आशंका है। इस बीच पाकिस्तान की रणनीति में भी बदलाव की बात सामने आई है, जिसके तहत लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के बीच समन्वय बढ़ाने की कोशिश किए जाने का दावा किया गया है।

    रिपोर्टों के अनुसार, इन संगठनों की गतिविधियों पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की निगरानी और नियंत्रण पहले की तुलना में अधिक बढ़ा है। पहले अलग-अलग आतंकी संगठनों के अपने कमांड ढांचे और नेतृत्व के माध्यम से गतिविधियां संचालित होने की बात कही जाती थी। अब इनके बीच तालमेल को एक केंद्रीय व्यवस्था के तहत मजबूत किए जाने का दावा किया जा रहा है।

    खुफिया अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से आतंकी नेटवर्क को लेकर पुनर्गठन किया गया है। इसका कथित उद्देश्य अलग-अलग संगठनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और उनकी गतिविधियों पर केंद्रीय स्तर से निगरानी बढ़ाना है। हालांकि ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से नहीं हुई है।

    सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता नियंत्रण रेखा के पार मौजूद संभावित आतंकियों की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट में 500 से अधिक आतंकियों के घुसपैठ के अवसर की प्रतीक्षा करने की आशंका जताई गई है। ऐसे इनपुट के बाद सीमा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ना स्वाभाविक है।

    बताया गया है कि हाल के महीनों में लश्कर-ए-तैयबा की गतिविधियों में तेजी देखी गई है, जबकि जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन की गतिविधियों में अपेक्षाकृत कमी का आकलन किया गया है। सुरक्षा एजेंसियां इसे पाकिस्तान की बदली हुई रणनीति के संदर्भ में देख रही हैं।

    रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब जम्मू-कश्मीर में स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने पर अधिक जोर दे रहा है। स्थानीय युवाओं को प्रभावित करने और आतंकी नेटवर्क से जोड़ने की कोशिशों की आशंका सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे प्रयासों का उद्देश्य सीमा पार से होने वाली गतिविधियों के साथ स्थानीय नेटवर्क को जोड़ना बताया जा रहा है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अलग-अलग आतंकी संगठनों के बीच समन्वय बढ़ता है तो सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती का स्वरूप बदल सकता है। इसी वजह से सीमा सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और आतंकवाद के लिए होने वाली भर्ती को रोकना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिशों को लेकर सतर्क रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव के बीच इस तरह के इनपुट को और गंभीरता से देखा जा रहा है। हालांकि किसी भी खुफिया आकलन को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसकी पुष्टि जरूरी होती है।

    फिलहाल 500 से अधिक आतंकियों की संभावित मौजूदगी और आतंकी संगठनों पर आईएसआई के बढ़ते नियंत्रण से जुड़े दावे सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय हैं। आने वाले दिनों में सीमा पर गतिविधियों, घुसपैठ के प्रयासों और जम्मू-कश्मीर में आतंकी नेटवर्क से जुड़े घटनाक्रम पर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी।

  • भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    भारत से तनाव के बीच बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके की चुनौतियां पाकिस्तान की सुरक्षा रणनीति पर भारी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान इस समय कई स्तरों पर सुरक्षा और रणनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। भारत के साथ जारी तनाव के अलावा बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अफगानिस्तान से जुड़े मुद्दे उसकी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। इसी बीच ईरान और उसके समर्थक समूहों से जुड़ी संभावित परिस्थितियां भी पाकिस्तान के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही हैं।

    हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौते ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। इस समझौते को व्यापक इस्लामी सुरक्षा ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान के लिए इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने मौजूदा सुरक्षा संकटों से किस तरह निपटता है।

    पाकिस्तान के सामने सबसे प्रमुख चुनौती भारत से जुड़ा सुरक्षा तनाव है। पिछले वर्ष मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया था। इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा ढांचे और एयरबेस की क्षमता को लेकर भी सवाल उठे।

    पाकिस्तान के भीतर बलूचिस्तान लंबे समय से सुरक्षा संकट का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। अलगाववादी गतिविधियों और हिंसक घटनाओं ने इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण को चुनौती दी है। खैबर पख्तूनख्वा में भी आतंकवादी गतिविधियां पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगातार परेशानी का कारण बनी हुई हैं।

    पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी राजनीतिक और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है। दूसरी ओर अफगानिस्तान के साथ सीमा और सुरक्षा संबंधी तनाव पाकिस्तान के लिए अलग चुनौती पेश करता है। इन परिस्थितियों के बीच ईरान के साथ क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं, खासकर तब जब मध्य पूर्व में तनाव का प्रभाव आसपास के देशों पर पड़ रहा है।

    तुर्की और सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग पाकिस्तान को राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन दे सकता है, लेकिन इससे उसकी सभी आंतरिक समस्याओं का समाधान अपने आप नहीं हो जाता। तुर्की नाटो का सदस्य है और उसकी अपनी मजबूत सैन्य क्षमता है। सऊदी अरब के लिए भी ईरान और हूती गतिविधियों से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां लंबे समय से महत्वपूर्ण रही हैं।

    भारत ने भी क्षेत्रीय स्तर पर अपने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है। ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ भारत के संबंधों में रक्षा सहयोग का महत्व बढ़ा है। इजरायल के साथ भारत की सैन्य और तकनीकी साझेदारी भी लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    ऐसे में मक्का रक्षा समझौता पाकिस्तान को एक व्यापक सुरक्षा ढांचे से जोड़ने की कोशिश जरूर है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने घरेलू हालात हैं। यदि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके जैसे क्षेत्रों में अस्थिरता बनी रहती है, तो बाहरी रक्षा सहयोग के बावजूद पाकिस्तान पर सुरक्षा और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

    पाकिस्तान के लिए आने वाला समय इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहेगा कि वह इन अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ बढ़ते दबाव को किस तरह नियंत्रित करता है। सऊदी अरब और तुर्की का समर्थन उसके लिए रणनीतिक सहारा हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी होगा।